अजमेरनामा
खबरों के पीछे की खबर
बुधवार, 2 अप्रैल 2025
शिक्षा जगत की जानी-मानी हस्ती श्रीमती स्नेहलता शर्मा नहीं रहीं
अजमेर के शिक्षा जगत में श्रीमती स्नेहलता शर्मा धर्मपत्नी स्वर्गीय श्री सुरेन्द्र जी शर्मा एक जाना-पहचाना नाम है। हाल ही उनका देहावसान हो गया। वे राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की सचिव रहीं और शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर रहते हुए अतिरिक्त निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुईं। उसके पश्चात संस्कार सीनियर सेकंडरी पब्लिक स्कूल का संचालन किया। उनका जन्म 26 अक्टूबर 1938 को श्री प्रहलाद किशन शर्मा के घर हुआ। उन्होंने एम.एससी., बी.एड. तक शिक्षा अर्जित की और माध्यमिक शिक्षा में लेक्चरर के रूप में केरियर का आरंभ किया। इसके बाद सीनियर सेकंडरी स्कूल की प्रिंसीपल, शिक्षा विभाग की उप सचिव, जिला शिक्षा अधिकारी, उप निदेशक, शिक्षा बोर्ड सचिव व शिक्षा विभाग में अतिरिक्त निदेशक पद पर रहीं। उन्हें राज्य स्तर पर 1985 में श्रेष्ठ शिक्षक के रूप में सम्मानित किया गया। उन्होंने शिक्षा बोर्ड के लिए अनेक पुस्तकें भी लिखीं। इतना ही नहीं, समाजसेवा में भी उनकी गहरी रुचि रही। वे लायंस क्लब आस्था की सदस्य और कला-अंकुर संस्था की अध्यक्ष रहीं। उनके निधन से शिक्षा जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। वे अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड गई हैं। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उनको भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
मंगलवार, 1 अप्रैल 2025
भगवान को भगवान ने बुला लिया अपने पास
अजमेर में जेएलएन मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के कार्डियोलॉजी यूनिट के एचओडी वरिष्ठ आचार्य डॉ. राकेश महला प्राणदाता थे। हजारों रोगियों के प्राण बचाए उन्होंने। कैसी विडंबना है कि जिस रोग से निजात दिलाने में वे पारंगत थे, उसी रोग ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया। वे कार्डियक और रीनल डिजीजेज से जूझ रहे थे। उपचार के दौरान गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया। उनका निधन हृदयविदारक है, जिसकी पूर्ति नितांत असंभव है। जिन्होंने उनके माध्यम से जीवन बचा लिया, वे उन्हें भगवान सदृश मानते हैं। वे अत्यंत सहज व विनम्र थे। विशेष रूप से गरीबों के लिए मसीहा थे। एंजियोग्राफी व एंजियोप्लाटी के सिद्धहस्त। उनकी विशेषज्ञता का पूरे राजस्थान में कोई सानी नहीं। एसएमएस अस्पताल, जयपुर में 93 बैच के डॉ. महला के अजमेर आने के बाद यहां हार्ट के मरीजों को बहुत राहत मिल रही थी। इससे पहले हर मरीज को जयपुर रेफर कर दिया जाता था। उन्होंने दो बार बैलून माइट्रल वैल्वोट्रॉमी के ऑपरेशन करके रिकॉर्ड बनाया। खान-पान में लापरवाही और कोराना इफैक्ट के चलते हृदय रोगियों की संख्या लगातार बढती ही जा रही है। ऐसे में उनकी अभी बहुत अधिक जरूरत थी। मगर, अफसोस, पूरे जगत को प्राण देने वाले ने उनको हमसे हठात छीन लिया। प्रमाणित हो गया कि जैसे अच्छे इंसान हमे प्रिय हैं, वैसे ही भगवान को भी अच्छे लोग अतिप्रिय हैं। अपने पास बुला लेते हैं। डॉ. विद्याधर महला के सुपुत्र डॉ. राकेष महला की धर्मपत्नी डॉ. आरती महला गायनोकोलॉजिस्ट हैं। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल डॉ. राकेश महला के निधन पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
मरहूम सूफी संत भी करते हैं दरगाह जियारत?
दोस्तो, नमस्कार। तकरीबन बीस पहले की बात है। एक सज्जन उर्स के दौरान यूपी से अजमेर में दरगाह जियारत को आए थे। वे यहां कुछ माह ठहरे। मेरी उनसे कई बार मुलाकात हुई। षहर जिला कांग्रेस के प्रवक्ता मुजफ्फर भारती और मरहूम जनाब जुल्फिकार चिष्ती के साथ। वे विद्वान थे। कई विधाओं के जानकार। बहुत संजीदा। निहायत सज्जन। उनके चेहरे से नूर टपकता था। मुझे उनका नाम अब याद नहीं। उनसे अनेक आध्यात्मिक विशयों पर चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि उर्स के दौरान दुनिया भर के मरहूम सूफी संत ख्वाजा साहब की दरगाह की जियारत करने को आते हैं। वे यहां अकीदत के साथ हाजिरी देते हैं। जैसे मजार षरीफ के चारों ओर जायरीन का हुजूम होता है, वैसे ही मरहूम सूफी संतों का भी जमावडा होता है। जाहिर तौर पर वे अदृष्य होते हैं। आम आदमी को उन्हें देखना संभव नहीं होता। मगर आत्म ज्ञानियों को वे नजर आते हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें भी उनके दर्षन होते हैं। स्वाभाविक रूप से इस रहस्यपूर्ण तथ्य को मानना वैज्ञानिक दृश्टि से ठीक नहीं है। मगर जितने यकीन के साथ उन्होंने यह जानकारी दी तो लगा कि षायद वे सही कह रहे होंगे। उन्होंने बताया कि ख्वाजा साहब को सुल्तानुल हिंद इसीलिए कहा जाता है कि वे भारत भर के सूफी संतों के सरताज हैं। उनकी अलग ही दुनिया है, जिसके वे बादषाह हैं। कदाचित आप इस पर यकीन नहीं करें। मुझे मिली जानकारी को आपसे साझा करने मात्र की मंषा है।
https://youtu.be/Wx_tC7ItgZM
सोमवार, 31 मार्च 2025
आखिर हम नहीं मना पाए अजमेर का स्थापना दिवस
हालांकि यह आज तक तय नहीं है कि अजमेर का स्थापना दिवस कब है, मगर मोटे तौर पर यह मान लिया गया है कि विक्रम संवत 1170 यानी सन् 1112 में चैत्र प्रतिपदा के दिन अजमेर की स्थापना हुई थी। चलो कोई बात नहीं, हमें ठीक से पता नहीं लग पाया कि अजमेर की स्थापना कब हुई, मगर हमने जिस तिथि को मान लिया है, उसे भी तो ठीक से नहीं मना रहे। हां, नवरात्र स्थापना, चैत्र प्रतिपदा, नवसंवत्सर के साथ औपचारिक रूप से अजमेर का स्थापना दिवस भी मना लिया, लेकिन उसे भव्य रूप से मनाने का ख्याल ही नहीं किया। चंद बुद्धिजीवियों ने जरूर इसे मना कर औपचारिकता निभाई है, मगर सवाल उठता है कि जैसे सिंधी समाज साल में एक बार चेटी चंड पर विषाल षोभायात्रा निकालता है, महावीर जयंती पर जैन समाज की ओर से विषाल जुलूस निकाला जाता है, हिंदूवादी संगठन राम नवमी को भव्य तरीके से मनाते है, अन्य समाज भी अपने अपने इश्ट देवताओं की जयंती धूमधाम से मनाते हैं, कावड यात्राएं निकालते हैं, क्या उसी तरह का भव्य आयोजन अजमेर के स्थापना दिवस पर नहीं किया जा सकता? असल में स्थापना दिवस मनाने की जिम्मेदारी किसी संस्था या संगठन पर आयद नहीं की जा सकती, और न ही किसी के बस की बात है, मगर अजमेर जिला प्रषासन व नगर निगम तो अपने संसाधनों से बडा आयोजन कर ही सकते हैं। जब हम दषहरा मना सकते हैं, गरबा का आयोजन कर सकते हैं, फागुन महोत्सव मना सकते हैं, बादषाह की सवारी निकाल सकते हैं, आनासागर जेटी पर आतिषबाजी कर सकते हैं, तो अजमेर स्थापना दिवस के लिए फंड क्यों नहीं जुटा सकते? यह तभी संभव हो सकता है, जब कि सिविल सोसायटी प्रषासन पर इसके लिए दबाव बनाए। यूं सिविल सोसायटी में अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं, मगर एक भी इस स्थिति में नहीं है, जो दमदार तरीके से स्थापना दिवस मनाने का दबाव बना सकंे। और सबसे बडी बात कि उसके लिए जो विल चाहिए, वह अभी जागृत नहीं हो पाई है।
https://www.youtube.com/watch?v=J498QWNN8Z0&t=13s
रविवार, 30 मार्च 2025
मिजाज ए अजमेर
एक व्यक्ति मरने के बाद ऊपर गया। यमराज ने उसे सजा देने के लिए पहले उसे एक ठण्डे मकान में रखा जहां तापमान 4 डिग्री था। फिर भी वह आदमी हंसता हुआ बाहर आया और बोला कि एक पंखा और होता तो मजे आ जाते। अब यमराज ने उसे एक गर्म मकान में रखा, जहां का तापमान 45 डिग्री था और उसमें एक पंखा भी लगा दिया ...फिर भी वह आदमी हंसता हुआ बाहर आया और बोला बिना पंखे के भी सही था। यमराज को गुस्सा आया और उस पर बारिश, ओले व तूफान आदि सब प्रयोग किये, लेकिन उसे कुछ नहीं हुआ तो फिर यमराज ने उसको एक गड्ढे और पानी से भरी डिग्गी में भेजा और बोला इसको पार करके आ...वो आदमी हंसता हुआ दूसरी तरफ से बाहर आकर बोला अपने शहर की याद आ गयी। वो बोला मैं अपने षहर की गलियों अक्सर ऐसे पार करता हूं। यमराज ने परेशान होकर चित्रगुप्त से कहा कि इसका रिकॉर्ड चैक करो.....चित्रगुप्त ने रिकॉर्ड देखकर कहा महाराज ये आदमी अजमेर का रहने वाला है। ये सब यातनाएं झेल कर अपने आप को हर तरह से डॅवलप कर चुका है।
ये 45 डिग्री के तापमान में भी गरमा गरम कचौरी खाता है। ठण्ड में भी मटके की कुल्फियां खाता है और गड्ढे और पानी से भरी सड़कों की आदत हो चुकी है इसे। ये इसका कुछ नही बिगाड़ सकती.. उसके बावजूद ये टैक्स भरता है। सहनशील ’अजमेर’ वासियो को पुनः समर्पित है।
यह आलेख कभी अजमेर में जनस्वास्थ अभियांत्रिकी विभाग में अधिषाशी इंजीनियर रहे इंजीनियर शिव शंकर गोयल ने भेजा है। वे सुपरिचित व्यंग्य लेखक हैं और वर्तमान में दिल्ली में रहते हैं। अजमेर से उनका गहरा लगाव है।
https://ajmernama.com/chaupal/429295/
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