रविवार, 11 जनवरी 2026

प्रमुख समाजसेवी श्री मनोहर मोटवानी का देहावसान

अजमेर। प्रमुख समाजसेवी श्री मनोहर मोटवानी अब हमारे बीच नहीं रहे। व्यवसाय के क्षेत्र में तो उन्होंने प्रतिष्ठा पाई ही, समाजसेवा के लिए भी सतत समर्पित रहते थे। सिंध के नौशहरो नवाबशाह के निवासी श्री भगवान दास मोटवानी के सुपुत्र श्री मनोहर मोटवानी का जन्म 13 फरवरी 1960 को अजमेर में हुआ। उन्होंने 1975 में डीएवी स्कूल से दसवीं की पढाई की। पढाई के बाद व्यवसाय में जुट गए। केसरगंज में मनोहर ऑटोमोबाइल का काम किया। बाद में व्यापार बढा कर परबतपुरा चौराहा पर आरंभ किया। 1998 में ट्रक-ट्रेलर बॉडी निर्माण आरंभ किया। इसके बाद ग्रेनाइट कटिंग मशीन बनाना आरंभ किया। वे समाजसेवा में सदैव अग्रणी रहे। मधुर व्यवहार की वजह से वे लोकप्रिय थे। वे स्वभाव से जज्बाती थे। उनकी कमी समाज को सदा खलती रहेगी। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।


बुधवार, 7 जनवरी 2026

दैदीप्यमान नक्षत्र प्रो. राम जैसवाल का अवसान

अजमेर। शब्द, रेखा और रंग की साधना में जीवन अर्पित करने वाले प्रो. राम जैसवाल आज अनंत की यात्रा पर प्रस्थान कर गए। राजस्थान के साहित्य और कला आकाश का यह दैदीप्यमान नक्षत्र भौतिक रूप से भले ही ओझल हो गया हो, किंतु उसकी उजास आने वाली पीढ़ियों के रचनात्मक पथ को सदैव आलोकित करती रहेगी।

लगभग नब्बे वर्षों तक उन्होंने कहानी और कविता में संवेदना के रंग भरे और चित्रकला में मौन को बोलता बनाया। यदि उन्हें राजस्थान में कला शिक्षा का भीष्म पितामह कहा जाए, तो यह श्रद्धा का अलंकार मात्र नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक सत्य है। दयानंद महाविद्यालय के ड्राइंग एंड पेंटिंग विभाग में उन्होंने दशकों तक न केवल कलाकार गढ़े, बल्कि मनुष्यता, अनुशासन और सौंदर्यबोध की परंपरा भी सौंप दी।

सरलता उनका स्वभाव थी और सहजता उनकी पहचान। बड़े कद के बावजूद वे सदैव विनम्र रहे—शायद इसीलिए इतने अपने थे। उनके शब्दों में गुरु की करुणा थी और उनकी रेखाओं में साधक का मौन।

आज कला-जगत ने एक प्रकाशस्तंभ खो दिया है, पर उनकी सृजन-यात्रा विरासत बनकर हमारे बीच जीवित रहेगी।

अजमेरनामा न्यूज पोर्टल इस महान सर्जक को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बहुत साल पहले मेरे पिताजी ने आरंभ किया था ऑनेस्टी स्टोर

 हाल ही दैनिक भास्कर में एक खबर छपी है, जिसका षीर्शक है- स्कूल चला रहा है बिना दुकानदार के दुकान ताकि बच्चे ईमानदार बनें। इसमें बताया गया है कि पष्चिम बंगाल के बनगांव में एक ऐसी दुकान जहां सामान तो बिकते हैं, मगर दुकानदार नहीं होता। मुझे यह जानकारी आपसे साझा करते हुए गर्व होता है कि बहुत वर्श पहले मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री टी सी तेजवानी ने डूंगरपुर जिले के पुनाली गांव में स्थित सेंकडरी स्कूल में इसी प्रकार की दुकान खोली थी। तब वे स्कूल में प्रधानाचार्य थे। मैं कक्षा छह में पढता था। पिताजी ने स्कूल के एक कमरे में स्टेषनरी की एक दुकान खोली थी। दीवार पर स्टेषनरी की हर वस्तु की रेटलिस्ट चस्पा थी। साथ में एक बॉक्स रखा था। दुकान की देखरेख कोर्इ्र नहीं करता था। बच्चों को जो भी वस्तु चाहिए होती थी, वे उसे ले लेते थे और रेट लिस्ट में लिखी राष्ज्ञि बॉक्स में डाल देते थे। हर सप्ताह बिकी हुई वस्तुओं और बॉक्स में जमा राष्ज्ञि का मिलान किया जाता था। कभी कोई गडबडी नहीं हुई। यानि बच्चे सामान लेते समय पूरी ईमानदारी बरतते थे। इससे एक तो उन्हें स्टेषनरी उचित दर पर मिलती थी, दूसरा उनमें ईमानदारी का गुण विकसित होता था। आज जब भास्कर में छपी खबर पढी तो यकायक ख्याल आ गया कि मेरे पिताजी ने कितने साल पहले इस प्रकार का सफल प्रयोग किया था।


मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

कई नामों से जाना जाता है ख्वाजा साहब को

दुनिया के मशहूर चिश्ती संतों में ख्वाजा गरीब नवाज का नाम से सबसे ऊंचा है। अनेक नामों से उनकी इबादत कर अकीदतमंद सुकून पाते हैं।

ख्वाजा गरीब नवाज का मूल नाम मोइनुद्दीन हसन चिश्ती था। उन्हें यूं तो अनेक नामों से जाना चाहता है, मगर गरीब नवाज एक ऐसा नाम है, जिससे सभी आम-ओ-खास वाकिफ हैं। इस नाम के मायने हैं गरीबों पर रहम करने वाला। यूं तो अनेक नवाबों, राजाओं-महाराजाओं ने यहां झोली फैला कर बहुत कुछ हासिल किया है, मगर गरीबों पर उनका कुछ खास ही करम है। उनके दरबार में तकसीम होने वाले लंगर के लिए अमीर और गरीब एक ही लाइन में खड़े होते हैं, यही वजह है कि उन्हें गरीब नवाज के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों और आम लोगों के बीच ही बिताया। जो लोग आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से गरीब थे, जिन्हें इबादत करना नहीं आता था, जिन्हें भक्ति व सच्चाई का ज्ञान नहीं था, उन्हें उन्होंने सूफी मत का ज्ञान दिया। उन्होंने किसी भी राजा या सुल्तान का आश्रय नहीं लिया और न ही उनके दरबारों में गए। उन्होंने स्वयं भी गरीबों की तरह सादा जीवन बिताया। इन्हीं गुणों के कारण उन्हें गरीब नवाज कहा जाता है, जो कि उनका सबसे प्रिय नाम है।

बुजुर्गवार बताते हैं कि उनके व्यक्तिगत सामान में दो जोड़ी कपड़े, एक लाठी, एक तीर-कमान, एक नमकदानी, एक कंछी और एक दातून थी। हर वक्त वे इतना ही सामान अपने पास रखते थे। उन्होंने कभी तीसरी जोड़ी अपने पास नहीं रखी। यदि कपड़े फटने लगते तो उसी पर पैबंद लगा कर साफ करके उसे पहन लेते थे। यह काम भी वे खुद ही किया करते थे।  पैबंद लग-लग कर उनके कपड़े इतने वजनी हो गए थे कि आखिरी वक्त में उनके कपड़ों का वजन साढ़े बारह किलो हो गया था।

ख्वाजा साहब को अता-ए-रसूल के नाम से भी जाना जाता है, जिसका मतलब होता है खुदा के पैगंबर मोहम्मद साहब का उपहार। अपने जीवन का अधिकांश समय अजमेर से ही सूफीवाद का प्रचार-प्रसार करने और यहीं पर इबादत करने की वजह से उन्हें ख्वाजा-ए-अजमेर के नाम से भी पुकारा जाता है। वे हिंदल वली के नाम से भी जाने जाते हैं, जिसका मतलब होता हिंदुस्तान के संत और रक्षक। इसी प्रकार उन्हें सुल्तान-उल-हिंद भी कहा जाता है, जिसका मतलब आध्यात्मिक संदर्भ में हिंदुस्तान की अध्यात्मिक शक्तियों  का राजा होता है। इसी संदर्भ में उन्हें नायाब-ए-रसूल हिंद भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त उन्हें ताजुल मुकर ए बिन बल मुश्हक कीन भी कहते हैं, जिसके मायने है नैसर्गिक तेज व ज्ञान का आलोक, जिसके चारों ओर हमेशा खुशी ही खुशी और आशीर्वाद व रहमत बरसती रहती है। उन्हें सैयद उल आबेदीन भी कहते हैं, अर्थात पवित्र तजुल आशिकीन प्रेमियों के सम्राट। उन्हें ताज बुरहन उल वासेलीन यानि एकता के प्रतीक, इसके अतिरिक्त उन्हें आफताब ए जहान यानि संसार का सूरज व संसार को रोषन करने वाला कहा जाता है

-तेजवाणी गिरधर

7742067000


 https://youtu.be/peCdxvzXj8Q

रविवार, 28 दिसंबर 2025

आरन पायलट: धमाकेदार एंट्री ने चौंकाया

राजनीतिक आकाश में कभी-कभी ऐसे चेहरे उभरते हैं, जो अपनी मौजूदगी भर से चर्चा का विषय बन जाते हैं। आरन पायलट भी कुछ ऐसे ही नए नक्षत्र के रूप में सामने आए हैं। निहायत नवीन नाम। कई संभावनाओं को जन्म देता चेहरा। चेहरा मात्र, क्योंकि फिलहाल वह चेहरा ही है। भीतर कितना पोटेंशियल है, वह भविष्य के गर्भ में छिपा है। फिलहाल वे राजनीति में सक्रिय भूमिका में नहीं हैं, इसलिए कहना होगा कि आज की तारीख में वे संभावना हैं, उपलब्धि नहीं।

आरन के व्यक्तित्व के साथ उनकी पृष्ठभूमि स्वतः जुड़ी हुई है। सचिन पायलट के पुत्र और स्वर्गीय राजेश पायलट के पौत्र होने का प्रभाव उनके चेहरे से अलग नहीं किया जा सकता। फिर भी उनकी देहयष्टि, आत्मविश्वास से भरी चाल, संयत मुस्कान और युवा आभा उन्हें केवल वंशज नहीं रहने देती। उनकी आंखों में नाना फारूक अब्दुल्ला की झलक और मुस्कान में सचिन पायलट की मृदुता देखी जा रही है। यह संयोग हो सकता है, पर राजनीति में संयोग भी संकेत बन जाते हैं। यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकती है, मगर सचिन पायलट के कानों के पास झलकती सफेदी की तुलना में अंग्रेजीदां भूरे बाल अपेक्षाकृत अधिक चुंबकीय प्रतीत होते हैं। जाहिर सी बात है, पायलट के दीवाने उन्हें अपनी हथेलियों पर उठा लेंगे।

कहावत है, पूत के पग पालने में ही दिख जाते हैं। कदाचित यह चरितार्थ हो जाए। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो अल्हड़ जवानी की दहलीज पर खड़ा ऐसा चेहरा युवाओं को सहज ही आकर्षित कर सकता है। सोशल मीडिया ने इस आकर्षण को कई गुना बढ़ा दिया है। आरन का अवतार वायरल है, उनके व्यक्तित्व पर चर्चाएँ और आकलन इंटरनेट पर लगातार तैर रहे हैं। यह दौर पहली छवि का है, और आरन इस कसौटी पर फिलहाल खरे उतरते दिखते हैं।

राजनीति सौंदर्य, आभा या विरासत से आगे चलती है। किसी भी पौधे का भविष्य केवल बीज से नहीं, बल्कि उसे मिलने वाली धूप, हवा, पानी और खाद से तय होता है। ठीक वैसे ही आरन पायलट का भविष्य भी उनकी क्षमता, संगठन में सक्रियता, जनसंपर्क और संघर्ष पर निर्भर करेगा। वंशवाद उन्हें प्रवेश दिला सकता है, पर टिके रहना स्वयं अर्जित करना होगा।

यदि आरन पायलट सक्रिय राजनीति में आते हैं, तो उनका जुड़ाव डिजिटल राजनीति व सोशल मीडिया से होगा। यह कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि पार्टी लगातारयुवा चेहरों की कमी से जूझ रही है। उनका प्रवेश सचिन पायलट गुट को संस्थागत मजबूती देगा और यह संकेत देगा कि पायलट परिवार राजनीति में दीर्घकालिक निवेश कर रहा है। यह उन नेताओं को असहज करेगा, जो सचिन पायलट की उपस्थिति से पहले से परेशान हैं। हालांकि एंट्री धमाकेदार है, नया मगर दमदार नाम है, पर आज का मतदाता भावनात्मक नहीं, परिणामोन्मुख होता जा रहा है। यदि आरन जमीन पर काम करेंगे, संगठन में समय देंगे और सिर्फ विरासत नहीं, विजन पेश करेंगे तो वे स्वीकार किए जाएंगे। अन्यथा वे भी लॉन्च किए गए उन कई चेहरों की सूची में जुड़ सकते हैं, जो चमक कर बुझ गए।

आरन पायलट के मामले में सवाल यह नहीं है कि वे राजनीति में आएंगे या नहीं, सवाल यह है कि आने के बाद वे क्या साबित करेंगे। राजनीति में चेहरा प्रवेश दिलाता है, लेकिन पहचान केवल कर्म से बनती है।

एक बात और। एनएसयूआई के जिस प्रदर्शन में वे अवतरित हुए, उसमें उनके पीछे निरंजन साये की तरह दिखाई दिए। ज्ञातव्य है कि वे पायलट के निजी सहायक हैं। यानि आरन को उनका भी मानसिक संरक्षण हासिल है।

प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि 2008 में जन्मे आरन पायलट, वर्तमान में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया में राजनीति विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पढ़ाई कर रहे हैं। वे फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी रहे हैं और किशोरावस्था में उभरते खेल प्रतिभा के रूप में चर्चा में आए थे। सोशल मीडिया पर वे अपने पिता और दादा की स्मृतियों से जुड़ी तस्वीरें साझा करते रहते हैं, जो उनकी पहचान को अतीत से जोड़ती हैं।