गुरुवार, 5 नवंबर 2026

भाजपा भ्रम में तो कांग्रेस का भ्रम टूटा

 दो निर्दलीय मुस्लिम पार्शदों के कदम ने चौंकाया

भाजपा ने अजमेर नगर निगम बोर्ड में अपना कुनबा बढ़ाते हुए पार्षदों की संख्या 32 से बढ़ाकर 40 कर ली है। भाजपा से बगावत कर निर्दलीय चुनाव जीतने वाले छह पार्षदों के अलावा दो अन्य निर्दलीय मुस्लिम पार्षदों अजहर खान व सूफिया कुरैषी ने भी विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की मौजूदगी में भाजपा का दामन थाम लिया। बेशक, यह घटनाक्रम भाजपा के लिए एक सुखद राजनीतिक उपलब्धि है। इससे निगम में उसकी ताकत बढ़ी है। जाहिर है कि इस घटनाक्रम से न केवल देवनानी की राजनीतिक स्थिति और मजबूत हुई है, बल्कि संगठन पर उनकी पकड़ भी पहले से अधिक पुख्ता हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा रेखांकित करने वाली बात यह है कि जिन मुस्लिम बहुल इलाकों में भाजपा को अब तक गिनती के वोट हासिल होते रहे हैं, वहां अब उसके पास दो मुस्लिम पार्षद भी हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इसे कमतर करके नहीं आंका जा सकता। भाजपा ने मुस्लिम बहुल इलाकों में सेंधमारी की है और इसके राजनीतिक मायने दूरगामी हो सकते हैं।
हालांकि, गहरी राजनीतिक समझ रखने वाले इसे भाजपा की एक तरह की गलतफहमी और कांग्रेस की गलतफहमी टूटने के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि महज दो मुस्लिम पार्षदों के भाजपा में शामिल हो जाने से यह मान लेना सियासी नादानी होगी कि उन्हें चुनाव में मिले तमाम वोट अब भाजपा की झोली में आ गिरेंगे। किसी प्रत्याशी को मिलने वाले वोटों के पीछे उसकी व्यक्तिगत छवि, संपर्क, व्यवहार और स्थानीय समीकरण भी अहम भूमिका निभाते हैं। लिहाजा, निर्दलीय रहते हुए जिन मतदाताओं ने उन्हें समर्थन दिया, जरूरी नहीं कि वे भाजपा के चुनाव चिह्न पर भी उनके साथ खड़े नजर आएं। यहां एक दिलचस्प सवाल भी उठता है कि यदि भाजपा आगामी निगम चुनाव में इन पार्षदों को अपने चुनाव चिह्न पर मैदान में उतारती है तो क्या वे जीत का सिलसिला बरकरार रख पाएंगे? निगम चुनाव में मतदाताओं ने उन्हें उनकी व्यक्तिगत पहचान और स्थानीय लोकप्रियता के आधार पर समर्थन दिया था। मगर जब वे भाजपा का झंडा लेकर मैदान में उतरेंगे तो क्या वही मतदाता भाजपा के प्रति अपनी तमाम राजनीतिक हिचक छोड़कर उनके साथ खड़े होंगे? और क्या विधानसभा चुनाव में भी इन इलाकों के मतदाता भाजपा को उसी तरह समर्थन देंगे? इन सवालों का जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।

विचारणीय पहलू यह भी है कि क्या इन मुस्लिम पार्षदों के समर्थक उनके भाजपा में शामिल होने के फैसले को सहजता से स्वीकार कर लेंगे? हालांकि, इन पार्षदों के पास अपना एक दमदार तर्क जरूर होगा। वे कह सकते हैं कि निर्दलीय पार्षद के रूप में रहते हुए वार्ड का अपेक्षित विकास करवाना आसान नहीं है। सत्ता पक्ष के साथ रहकर ही विकास कार्यों को बेहतर ढंग से अंजाम दिया जा सकता है। ऐसे में यदि वार्ड के विकास और जनहित को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने भाजपा का दामन थामा है तो इसमें ऐतराज की क्या गुंजाइश है?
दूसरी ओर, इस तर्क को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि भले ही इन पार्षदों को मिले तमाम वोट भाजपा के खाते में स्थानांतरित न हों, मगर उसका वोट शेयर कुछ तो बढ़ेगा ही। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि निगम, राज्य और केंद्र तीनों जगह भाजपा सत्ता में है। ऐसे में यदि इन वार्डों में विकास कार्यों को गति मिलती है और स्थानीय समस्याओं का समाधान होता है तो भाजपा वहां अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में कामयाब हो सकती है।
अब बात कांग्रेस की। दरअसल, कांग्रेस की एक बड़ी राजनीतिक गलतफहमी इस घटनाक्रम से जरूर टूटी है। उसे लगता रहा है कि मुस्लिम मतदाता उसकी जेब में हैं। मुस्लिम प्रत्याशी निर्दलीय चुनाव जीत भी जाए तो अंततः उसका झुकाव कांग्रेस की ओर ही रहेगा, क्योंकि भाजपा की तरफ जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। मगर दो मुस्लिम निर्दलीय पार्षदों ने भाजपा में शामिल होकर कांग्रेस की इस पारंपरिक सोच को करारा झटका दिया है। यह कांग्रेस की रणनीतिक हार भी है।

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

अमित जैन गहरे से अनुभव कर रहे हैं पिताश्री का अभाव

अजमेर नगर सुधार न्यास के भूतपूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय श्री धर्मेष्ज्ञ जैन के पुत्र अमित जैन को राजनीति में उपलब्धि हासिल करने के लिए अब अधिक संघर्श करना पड रहा है। जब तक स्वर्गीय श्री जैन हयात थे, जीवन के अंतिम क्षणों तक वे इसी प्रयास में रहे कि अपने पुत्र को अजमेर विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष या कोई और महत्वपूर्ण राजनीति पद दिलवा सकें। वे सफलता के करीब थे, मगर सरकार ने ही नियुक्यिों के द्वार बंद रखे थे। बार बार नियुक्तियों में रूकावट आ जाती थी। जब सरकार नियुक्तियों की कवायद लगभग पूरी कर चुकी थी, तब निकाय व पंचायत चुनाव की बाधा आ गई। इस बीच स्वर्गीय श्री जैन गंभीर रूप से बीमार हो गए। और वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए। हकीकत तो यह है कि वे स्वयं ही प्राधिकरण का अध्यक्ष बनना चाहते थे, क्योंकि उनका न्यास अध्यक्ष का पिछला कार्यकाल राजनीतिक शड्यंत्र के चलते पूरा नहीं हो पाया था। यह विडंबना ही थी कि जब भाजपा की सरकार थी, तब उन्हें फर्जी सीडी उजागर होने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के दबाव में इस्तीफा देना पडा, और कांग्रेस सरकार में उन्हें क्लीन चिट मिल गई। जब दुबारा भाजपा की सरकार आई तो उनकी उम्मीद जागी कि उन्हें फिर से अध्यक्ष बनाया जा सकता है। प्रयास भी खूब किए। संघ का भी आषीर्वाद रहा, मगर राजनीतिक समीकरण अनुकूल नहीं बन पाए। इस पर उन्होंने अपने पुत्र अमित जैन के लिए प्रयास षुरू कर दिए। वे जब भी किसी बडे नेता से मिलते तो अमित को भी साथ ले जाते। सफलता के करीब भी पहुंचे, मगर षायद उनके भाग्य में राजयोग नहीं था। इसी बीच अस्वस्थ होने और फिर देहावसान हो जाने के बाद अमित जैन सांप सीढी के खेल की तरह वापस नीचे आ गए। अब फिर नए सिरे से प्रयास कर रहे हैं। स्वर्गीय श्री जैन के प्रभावषाली मित्रों का भी साथ मिल रहा है, मगर पहले जैसी बात कहां। काष्ज्ञ, जीवित रहते स्वर्गीय श्री जैन मनोकामना पूरी कर पाते। आज निष्चित ही अमित जैन पिताश्री का अभाव गहरे से अनुभव कर रहे होंगे। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है। वे अब भी पार्टी व सरकार के कार्यक्रमों में लगातार सक्रिय बने हुए हैं। बहुधा मंचों पर नजर आ जाते हैं।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

कांग्रेस पार्षदों पर संगठन की पकड़ कमजोर क्यों?

ऐसा पाया गया है कि कांग्रेस के निर्वाचित पार्शद संगठन के नियंत्रण में नहीं रहते। जब तक उन्हें टिकट चाहिए, तब तक तो संगठन पदाधिकारियों की मिजाजपुर्सी करते हैं, मगर जीतने के बाद अपनी स्वतंत्र सत्ता मानते हैं। संगठन की ओर से जारी निर्देष्ज्ञ मानने में आनाकानी करते हैं, अथवा उसे नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसा पूर्व में भी देखा गया और हाल ही फिर पाया गया है। यही वजह है कि अजमेर नगर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ राजकुमार जयपाल को फरमान जारी करना पडता है। ज्ञातव्य है कि एक फरमान में उन्होंने कहा कि दिनांक 28 सितंबर 2026 को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्देशानुसार जयपुर में आयोजित प्रदेश स्तरीय विशाल धरना-प्रदर्शन कार्यक्रम में सभी पार्षदों की उपस्थिति अपेक्षित थी। यह संज्ञान में आया है कि कुछ पार्षद उक्त महत्वपूर्ण संगठनात्मक कार्यक्रम में अनुपस्थित रहे। अतः जिन पार्षदों की कार्यक्रम में उपस्थिति नहीं रही, वे उनके समक्ष अपनी अनुपस्थिति का कारण स्पष्ट करते हुए लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। संगठन द्वारा निर्धारित कार्यक्रमों में बिना पूर्व सूचना अथवा उचित कारण के अनुपस्थित रहना संगठनात्मक अनुशासन की दृष्टि से गंभीर विषय माना जाएगा। भविश्य में यदि कोई पार्षद लगातार संगठनात्मक कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखता है अथवा बिना उचित कारण अनुपस्थित रहता है, तो यह माना जाएगा कि वह संगठनात्मक गतिविधियों के प्रति सक्रिय नहीं है। ऐसी स्थिति में संगठन के नियमानुसार संबंधित पार्षद के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि बाद में अजमेर की समस्याओं को लेकर सभी पार्शदों से कहा गया था कि वे निगम अधिकारियों से मिलने के लिए आएं तो संख्या अपेक्षाकृत संतोशजनक थी, वह इसलिए कि अभी नेता प्रतिपक्ष का चुनाव होना बाकी है।

खैर, मोटे तौर पर सवाल उठता है कि आखिर पार्शद अमूमन संगठन के नियंत्रण में क्यों नहीं रहते? वस्तुतः पार्षद का पद और पार्टी की सदस्यता अलग-अलग हैं। पार्टी निलंबन एक संगठनात्मक पार्टी अनुशासन की कार्रवाई है। इससे वह व्यक्ति अपने-आप नगर निगम का निर्वाचित सदस्य नहीं रहता, ऐसा राजस्थान नगरपालिकाओं से संबंधित कानून में नहीं है।

राजस्थान म्यूनिसिपटल एक्ट 2009 की धारा 39 में पार्षद को पद से हटाने के लिए अलग-अलग वैधानिक आधार और प्रक्रिया निर्धारित है। केवल राजनीतिक दल द्वारा निलंबन उस धारा में अपने-आप पद समाप्त करने का आधार नहीं बनता। यानि पार्टी से निष्कासन पर भी अपने-आप पार्षद पद नहीं छीनता। इसके अतिरिक्त यदि पार्षद ने चुनाव किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में जीता है, तो किसी विशेष मतदान या पार्टी निर्देश की अवहेलना की स्थिति में दल-बदल संबंधी वैधानिक प्रावधान लागू हो सकते हैं। प्रसंगवष्ज्ञ बता दें कि धारा 39 के तहत राज्य सरकार द्वारा सदस्य को हटाने की प्रक्रिया है और कुछ मामलों में जांच तथा न्यायिक अधिकारी की भूमिका भी आती है। जब तक कानून के अनुसार हटाने का आदेश नहीं होता, सदस्य अपने पद पर बना रहता है। वह कांग्रेस का निलंबित सदस्य हो सकता है, लेकिन नगर निगम का निर्वाचित पार्षद बना रह सकता है।

हाँ, यदि उसके विरुद्ध दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता की कार्यवाही या राजस्थान नगरपालिका कानून के तहत कोई अलग वैधानिक कार्यवाही होती है, तो परिणाम अलग हो सकता है।


बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

बेअसर रही शांति. शांति. शांति की अपील

शांति... शांति... शांति! मगर अफसोस, महापौर श्रीमती अनामिका शर्मा की इस अपील का नगर निगम की बैठक में कोई असर होता दिखाई नहीं दिया। पार्षद आपस में भिड़ते रहे और महापौर हाथ बांधे बेबस-सी खड़ी देखती रहीं। दृश्य कुछ ऐसा था, मानो सदन में उनकी मौजूदगी का कोई वजूद ही न हो। मन ही मन शायद सोच रही होंगी कि जब अपनी ही पार्टी के पार्षद काबू में नहीं हैं, तो विपक्ष से अनुशासन की उम्मीद आखिर कैसे की जाए!

विडंबना देखिए कि जिस सदन की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठी महिला से शहर की समस्याओं के समाधान और सदन के संचालन की उम्मीद की जाती है, उसी सदन में उनकी गरिमा का ख्याल रखने की जहमत पक्ष लॉबी के पार्षद भी उठाते नजर नहीं आए। सवाल केवल हंगामे का नहीं, बल्कि उस कुर्सी के सम्मान का भी है, जिस पर बैठकर शहर की सरकार चलाई जाती है।

यह नजारा देखकर अचानक एक पुराना दृश्य आंखों के सामने घूम गया। नगर परिषद की सभा में तत्कालीन सभापति श्रीमती अनिता भदेल शुरुआती दिनों में हंगामे देखकर हक्का-बक्का रह जाती थीं। एक बार तो नौबत यहां तक आ गई कि वे रूआंसी हो गईं। स्वाभाविक भी था। पहली बार पार्षद बनी थीं और सौभाग्य से सीधे सभापति की कुर्सी तक पहुंच गई थीं। संभवतः सदन की ऐसी तीखी और अप्रत्याशित राजनीतिक परिस्थितियों से उनका पहली बार सामना हुआ था।

आज कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति श्रीमती अनामिका शर्मा के सामने दिखाई दी। एक गृहिणी से सीधे पार्षद और फिर महापौर की कुर्सी तक पहुंचने का उनका सफर निस्संदेह उल्लेखनीय है। मगर घर-परिवार की सहज दुनिया और सियासत के शोरगुल भरे अखाड़े में जमीन-आसमान का अंतर है। यहां केवल विनम्रता, सरलता और सद्भाव से काम नहीं चलता, कभी-कभी दृढ़ता, निर्णय क्षमता और अनुशासन लागू करने का साहस भी दिखाना पड़ता है।

बैठक में उनकी ओर से बार-बार की गई ‘शांति... शांति... शांति!’ की अपील ऐसी साबित हुई, मानो नक्कारखाने में तूती की आवाज। पार्षदों पर उसका कोई खास असर नहीं पड़ा। श्रीमती अनामिका शर्मा के व्यक्तित्व में नारी सुलभ सहजता, सरलता के साथ बालसुलभ मासूमियत की झलक दिखाई देती है। लेकिन सियासत की विडंबना यही है कि यहां कई बार इन गुणों को कमजोरी समझ लिया जाता है। जो जितना सरल है, उसे उतना ही आसानी से नजरअंदाज कर देने की प्रवृत्ति भी राजनीति में कम नहीं। ऐसे में अनामिका शर्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सहजता को बनाए रखते हुए अपने पद की गरिमा और अधिकारों का अहसास कराना है।

हालांकि, किसी एक बैठक के दृश्य को उनके पूरे कार्यकाल का पैमाना मान लेना जल्दबाजी होगी। यह भी संभव है कि सदन के शुरुआती कटु अनुभव उन्हें आगे के लिए अधिक सजग और मजबूत बनाएं। सियासत का अनुभव किताबों या भाषणों से नहीं, बल्कि ऐसे ही कठिन प्रसंगों से हासिल होता है। देखने वाली बात यह होगी कि वे इन अनुभवों से कितना सीखती हैं और आने वाली बैठकों में अपनी नेतृत्व क्षमता का कैसा परिचय देती हैं।

वैसे, उनके भाषणों की शुरुआत और समापन ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष के साथ होता है। स्कूल में सीखे इस संस्कार की झलक उनके आत्मविश्वास में भी दिखाई देती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यही आत्मविश्वास सदन के भीतर भी नजर आएगा। क्योंकि महापौर की कुर्सी केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, जिम्मेदारी निभाने और जरूरत पड़ने पर सख्त फैसले लेने का अधिकार भी देती है।

और अंत में, उम्मीद तो यही है कि भगवान परशुराम के वंश से जुड़ी अनामिका शर्मा की रगों में दौड़ रहा लहू केवल परिचय और गौरव का विषय बनकर न रह जाए। उसमें अन्याय, अनुशासनहीनता और अपनी ही कुर्सी की अवमानना के खिलाफ खड़े होने का उबाल भी दिखाई दे।

आखिरकार, सदन में शांति बनाए रखना अच्छी बात है, मगर हर बार केवल शांति की अपील करना काफी नहीं। कभी-कभी शांति स्थापित करने के लिए सख्ती भी जरूरी होती है। अब देखना यह है कि महापौर मैडम कब कब सदन को यह अहसास कराती हैं कि उनकी विनम्रता को कमजोरी समझने की भूल न की जाए।


अजमेर कांग्रेस के युगपुरुष एडवोकेट जसराज जयपाल

राजनीति, समाजसेवा और सहकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाने वाले जसराज जयपाल के परिवार का आजादी के बाद से अजमेर की सियासत में रहा है खासा दखल

अजमेर की सियासत में कुछ शख्सियतें ऐसी हैं, जिनकी पहचान किसी पद या ओहदे की मोहताज नहीं होती। उनका तजुर्बा, उनकी सियासी सूझबूझ और समाज के प्रति उनकी खिदमत ही उनकी असल पहचान होती है। एडवोकेट जसराज जयपाल ऐसी ही शख्सियतों में शुमार हैं। राजस्थान सरकार के पूर्व मंत्री और अजमेर शहर जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रहे जसराज जयपाल ने अपनी लंबी राजनीतिक पारी में न केवल कांग्रेस की सियासत में अहम किरदार अदा किया, बल्कि सामाजिक और सहकारी क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान कायम की।

28 अक्टूबर 2026 को उनका 97वां जन्मदिन सादगी के साथ मनाया गया। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका व्यक्तित्व और अनुभव उन्हें अजमेर की सियासत की एक अहम शख्सियत बनाते हैं। वे अपने आप में एक संस्था हैं। आजादी के बाद से अजमेर की राजनीति में उनके परिवार का खासा वर्चस्व रहा है और इस परिवार की राजनीतिक विरासत कई पीढ़ियों तक पहुंची है।

एडवोकेट जसराज जयपाल का जन्म वर्ष 1930 में ब्यावर इलाके के छोटे से गांव झाक में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय केशवराम ब्यावर की कपड़ा मिल में मुकद्दम के पद पर कार्यरत थे। कामकाजी जीवन के साथ-साथ वे सामाजिक और सार्वजनिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे। ब्यावर नगर पालिका के छह बार पार्षद चुना जाना उनकी जनसेवा और स्थानीय राजनीति में प्रभाव का प्रमाण था।

पिता से मिले संस्कारों और सार्वजनिक जीवन के अनुभवों ने जसराज जयपाल के व्यक्तित्व को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने राजकीय महाविद्यालय, अजमेर में अध्ययन करते हुए बी.कॉम., एम.ए. और एल.एल.बी. की डिग्रियां हासिल कीं। वकालत को उन्होंने अपना पेशा बनाया, लेकिन उनकी दिलचस्पी का दायरा अदालतों तक सीमित नहीं रहा। राजनीति, समाजसेवा और सहकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।

जसराज जयपाल ने वर्ष 1967 से 1972 तक अजमेर जिले की भिनाय विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया। इस दौरान वे राजस्थान सरकार में मंत्री भी बने। विधायक और मंत्री के रूप में उनका राजनीतिक अनुभव उन्हें प्रदेश की सियासत में एक पहचान दिलाने में कामयाब रहा।

उनकी खासियत यह रही कि उन्होंने राजनीति को महज सत्ता और पद हासिल करने का जरिया नहीं माना, बल्कि सामाजिक सरोकारों से जोड़कर देखा। अनुसूचित जाति एवं जनजाति समाज से जुड़ी अनेक संस्थाओं में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। समाज के वंचित और पिछड़े तबकों के उत्थान से जुड़े प्रयासों में भी उन्होंने अपनी भूमिका निभाई।

जसराज जयपाल की शख्सियत का एक अहम पहलू सहकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान भी है। अजमेर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक के संचालक मंडल के सदस्य और राजस्थान उपभोक्ता समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने काम किया।

उपभोक्ता समिति के अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने राज्य सरकार को एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे सरकार ने यथावत स्वीकार कर लिया। यह उनके अध्ययन, अनुभव और विषय की समझ को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण प्रसंग है।

राजनीति और सार्वजनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच उन्होंने लेखन के लिए भी समय निकाला और अनेक पुस्तकें लिखीं। इस तरह उनका योगदान केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विचार और अध्ययन के क्षेत्र में भी उनकी सक्रियता दिखाई देती है।

जसराज जयपाल का परिवार अजमेर और आसपास के इलाकों की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली रहा है। उनकी धर्मपत्नी स्वर्गीया श्रीमती भगवती देवी ने भी राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। वे वर्ष 1972 और 1980 के विधानसभा चुनावों में भिनाय सीट से विजयी हुईं और राजस्थान सरकार में मंत्री भी रहीं।

इसी राजनीतिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनके सुपुत्र डॉ. राजकुमार जयपाल वर्ष 1985 में अजमेर पूर्व विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। वे अजमेर शहर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष और अजमेर क्लब के अध्यक्ष भी हैं।

इस परिवार की राजनीतिक यात्रा पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि सार्वजनिक जीवन में इसकी मौजूदगी केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रही। पिता, माता और पुत्रकृतीनों ने अलग-अलग समय पर राजनीति में अपनी भूमिका निभाई और अजमेर के राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित किया।

आज की तेज रफ्तार राजनीति में जहां सियासी समीकरण तेजी से बदलते हैं, वहीं जसराज जयपाल जैसी शख्सियतों का लंबा अनुभव अपने आप में महत्व रखता है। उन्होंने वह दौर भी देखा है, जब राजनीति का स्वरूप आज से काफी अलग था, और वह दौर भी, जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के तौर-तरीकों में व्यापक बदलाव आए।

एडवोकेट जसराज जयपाल की जीवन यात्रा वकालत, राजनीति, सहकारिता, लेखन और समाजसेवा के विविध पहलुओं को समेटे हुए है। उनका 97वां जन्मदिन केवल एक वरिष्ठ राजनेता की उम्र के पड़ाव का अवसर नहीं, बल्कि अजमेर की राजनीतिक विरासत के एक महत्वपूर्ण अध्याय को याद करने का मौका भी है।

अजमेर कांग्रेस की सियासत में उनकी पहचान एक अनुभवी और वरिष्ठ नेता के रूप में रही है। यही वजह है कि उन्हें अजमेर कांग्रेस का युगपुरुष कहना उनकी लंबी राजनीतिक पारी और सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान को रेखांकित करता है।

अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उनकी दीर्घायु व स्वस्थ जीवन की कामना करता है।