सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

जयपाल व भाटी में सुलह कैेसे हुई?

अजमेर शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष डॉ राजकुमार जयपाल व अजमेर दक्षिण के कांग्रेस प्रत्याशी रहे हेमंत भाटी के बीच सुलह हो गई है। बेषक अजमेर के राजनीतिक पन्ने पर अंकित इस ऐतिहासिक वाकये से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह है। माना जाता है कि कम से कम भाटी समर्थकों के टिकट तो सुरक्षित हो गए हैं। समझौते के वक्त भाटी के इस कथन पर कि लड कर देख लिया, अब लाड कर के देखेंगे, के निहितार्थ समझने की तमाम कोष्ज्ञिषें हो रही हैं, लेकिन अभी तक यह सवाल अनुत्तरित ही है कि वाकई हुआ क्या था? किसने पहल की? किसने हस्तक्षेप किया? समझौेते की मंजिल नींव की किस ईंट पर खडी की गई है? अंदरखाने हुए करार के मुख्य बिंदु क्या हैं? केवल अनुमान ही लगाए जा रहे हैं। कुछ का मानना है कि मुकदमे में राजीनामा तो एक बहाना है, असल कहानी दिृवपक्षीय लाभ के लिए लिखी गई है। कोई कह रहा है कि अपने समर्थकों के टिकट सुनिष्चित करने के लिए भाटी को मजबूर होना पडा। कुछ राजनीति पर्यवेक्षक आंक रहे हैं कि निगम चुनाव में जीत के लिए जयपाल को हाथ आगे बढाना मजबूरी हो गया। वरना अपेक्षित परिणाम न आने पर आगे की राजनीतिक या़त्रा पर विराम लग जाता। सवाल यह भी तैर रहा है कि क्या हाथ मिलाने से पहले भाटी ने सचिन पायलट की मंजूरी ली है? क्या यह धर्मेन्द्र सिंह राठौड की षकुनी चाल की उपज तो नहीं है? क्या केवल नगर निगम चुनाव के लिए ही हाथ मिलाए गए हैं, या फिर विधानसभा चुनाव का भी तानाबाना बुना गया है? कहीं सुलह की चादर के नीचे द्रोपदी कोली का राजनीतिक भविश्य तो नहीं दफन हो जाएगा? क्या यह तय हुआ है कि टिकट तो भाटी को मिलेगी और जयपाल सरकार आने पर एडीए के अध्यक्ष होंगे? इन सब के बीच अजीबोगरीब स्थिति सालों से खेमों में बंटे उन सिपाहियों की हो गई है, जो एक दूसरे के खिलाफ बाहें ताने रहते थे। ऐसे अनेक सवालों की अबाबीलें अजमेर के राजनीतिक आकाष्ज्ञ में उड रही हैं। एक ओर जहां जयपाल राजा बॉस के नाम से जाने जाते हैं, वहीं भाटी अपने राजाई मिजाज के कारण चर्चित हैं। दोनों कें चेहरों पर इठलाती भोली भाली मुस्कान भले ही सहज लगती हो, मगर हैं दोनों कूटनीतिज्ञ। बहरहाल, दूसरी ओर कुछ लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस में ऐसे समझौतों की लंबी फेहरिष्त है, मगर उनका हश्र क्या हुआ, ढाक के तान पात।


 https://youtu.be/V0rmJnT8kZ4

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

वार्डों के आरक्षण की व्यवस्था में बदलाव हो

स्वामी न्यूज की ओर से नगर निगम के वार्डों में पार्शदों का रिपोर्ट कार्ड लिए जाने के दौरान एक विचार निकल कर आया है। वो यह कि वार्डों में विभिन्न वर्गों की जनसंख्या के आधार पर आरक्षण होना चाहिए। असल में हर बार लॉटरी के जरिए विभिन्न वर्गों का आरक्षण निर्धारित किए जाने की वजह से पार्शद पूरी षिद्दत के साथ विकास कार्य करने में रूचि नहीं लेते, क्योंकि उन्हें आषंका होती है कि अगली बार उन्हें मौका नहीं मिलेगा। अगर विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए वार्डवार जनसंख्या के आधार पर आरक्षण फिक्स किया जाए तो इससे निर्वाचित पार्शद इस उम्मीद में बेहतर से बेहतर काम करवाएगा,  कि उसे दुबारा मौका मिलेगा। इससे विकास कार्य और अधिक होंगे। ज्ञातव्य है कि जनसंख्या के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था विधानसभा चुनाव में है। इस कारण निर्वाचित विधायक पूरी ईमानदारी से काम करवाते हैं, क्यांें कि उन्हें अगली बार फिर चुनाव लडने की उम्मीद होती है। अजमेर की ही बात करें तो यहां जनता दोनों विधायकों के काम से संतुश्ट हो कर उन्हें लगातार जितवा रही है। रहा सवाल महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का तो इसकी जिम्मेदारी या तो राजनीतिक दलों पर आयद की जाए, या फिर उसकी लॉटरी निकाली जाए।


मंगलवार, 20 जनवरी 2026

एसआईआर विवाद पर मुस्लिम नेता खुश भी

एक ओर जहां एसआईआर के दौरान नाम कटवाये जाने की कवायद का आरोप लगाते हुए मुस्लिम नेता मुखर हैं, वहीं उनमें से कुछ इसे सकारात्मक दृश्टि से भी देख रहे हैं और कथित रूप से खुष्ज्ञ भी हैं कि इस बहाने कौम में जागृति तो आएगी। इस सिलसिले में एक मुस्लिम नेता से चर्चा की तो उन्होंने कहा कि नाम कटवाने की षिकायतें सामने नहीं आतीं तो कदाचित समाज के लोग जागरूक नहीं होते। उनका मानना है कि चूंकि समाज के जागरूक कार्यकर्ता आपत्तियों का प्रतिकार करने में जुटे हैं, इस कारण यकायक जागृति भी आ रही है। इसका लाभ यह होगा कि अब उनका मतदान प्रतिषत बढ सकता है। जाहिर जो लोग अपना नाम कटने से बचाने मे कामयाब होंगे, कम से कम वे तो वोट डालेंगे ही। साथ ही अन्य भी मतदान के लिए प्रेरित होंगे। वस्तुतः अफवाह के चलते एक आषंका यह फैल रही है कि यदि वोटर लिस्ट से नाम कट गया तो आगे चल कर नागरिकता की समस्या आ सकती है। इस कारण वे अपना नाम बचाने में जुट गए हैं। ज्ञातव्य है कि मतदान के प्रति रूचि कम होने के कारण मुस्लिम बहुल इलाकों में मतदान प्रतिषत अपेक्षाकृत कम रहता है। जागरूकता के अभाव में वे इस बात की परवाह ही नहंी करते थे कि उनका वोट बेकार हो रहा है। लेकिन अगर जागरूकता आई तो मतदान प्रतिषत में इजाफा होगा।


सोमवार, 19 जनवरी 2026

जिंदादिल डॉ. वाई. के. खन्ना का देहावसान

ब्यावर स्थित प्रसिद्ध जेएमडी हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के संस्थापक, प्रसिद्ध सर्जन और क्रिकेट प्रशिक्षक डॉक्टर वाई. के. खन्ना का गत 18 जनवरी 2026 को देहावसान हो गया। पाइल्स के ऑपरेशन में उनको विशेषज्ञता हासिल थी। यह ऑपरेशन करवाने के लिए दूर-दूर के मरीज उनके यहां आते रहे। वे बहुत जिंदादिन इंसान थे। एनर्जी से लबरेज। चेहरे पर सदैव स्मित मुस्कार सबको आकर्षित करती थी। खासकर मरीज उनको निकट पा कर सूकून पाते थे। खेलों में उनकी बहुत दिलचस्पी थी। उन्होंने ब्यावर में दो बार राष्ट्रीय स्तर का डे-नाइट किक्रेट टूर्नामेंट कराया तथा हरभजन, विनोद काम्बले, गगन खोडा जैसे कई धुरंधर खिलाडियों को ब्यावर बुलाकर क्रिकेट खिलाकर प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया। उनका जन्म 18 जुलाई 1956 को श्री वी.पी. खन्ना के घर हुआ। उन्होंने एम.एम.बी.एस. व एम.एस.(जनरल सर्जरी) की डिग्रियां हासिल की। आरंभ उन्होंने सरकारी नौकरी की, फिर जल्द ही अपना निजी हॉस्पीटल आरंभ किया, जिसने बहुत लोकप्रियता हासिल की। उनकी धर्मपत्नी डॉक्टर आशा खन्ना ने चिकित्सकीय क्षेत्र में उनका आजीवन साथ निभाया। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल डॉक्टर खन्ना के निधन पर अश्रुपूतिर श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

रविवार, 18 जनवरी 2026

एसआईआर के शोर का फायदा बीजेपी को

इन दिनों एसआईआर को लेकर विवाद गहरा गया है। कांग्रेस चौडे धाडे आरोप लगा रही है कि सरकार द्वारा नियुक्त बी.एल.ओ. द्वारा फर्जी आपत्तियों की पुष्टि किये बगैर व पार्टी बी.एल.ए. के फर्जी हस्ताक्षरों द्वारा कूटरचित षिकायतों के आधार पर अल्पसंख्यकों व कांग्रेस विचाधारा के मतदाताओं के नाम हटाये जा रहे हैं, जो कि लोकतंत्र व मतदान प्रक्रिया के विरूद्ध है। इसी तरह का आरोप मुस्लिम एकता मंच ने भी लगाया है। मोटे तौर पर यही निहितार्थ निकल रहा है कि अल्पसंख्यकों के वोट बडे पैमाने पर कटवाने की कवायद चल रही है। विपक्ष के नाते कांग्रेस का विरोध प्रदर्षन उसकी मजबूरी है, मगर भाजपाई मन नही मन खुष्ज्ञ हैं कि कांग्रेस जितनी जोर से विरोध करेगी, मतदाताओं का धु्रवीकरण उतना अधिक होगा और उसका लाभ सीधे तौर पर भाजपा को होगा। ज्ञातव्य है कि अजमेर अति संवेदनषील है। यदाकदा ऐसे मुद्दे लगातार उठाए जाते रहे हैं, जिससे मतदाताओं का पोलराइजेषन हो। हालांकि ऐसे प्रयासों को कम ही सफलता मिल पाई है, और उसकी वजह है अजमेर का भाईचारे वाला मिजाज। आर्थिक कारणों से कोई भी समुदाय यहां अषांति नहीं चाहता। फिर भी ताजा एसआईआर विवाद से मतदाताओं के धु्रवीकरण का खतरा तो बना ही हुआ है। देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस कटने जा रहे नामों को कितना बचा पाती है, मगर धरातल पर काम करने की बजाय कोरी बयानबाजी और कोरा षोर मचाया तो उसका उलटा नुकसान हो सकता है।