शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

तो गहलोत लडेंगे आगामी विधानसभा चुनाव?

दोस्तो, आदाब! हाल ही में जब अजमेर नगर निगम के पूर्व महापौर धर्मेन्द्र गहलोत पर स्वायत्त शासन विभाग ने छह साल के लिए नगर निकाय चुनाव लड़ने की पाबंदी लगा दी, तो इस पर उनका फौरी रद्दे-अमल कुछ ऐसा सामने आया कि सियासी हलकों में एक नया सवाल खड़ा हो गया। क्या गहलोत आने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने का इरादा रखते हैं, या फिर उन्होंने महज एक ऐसा शगूफा छोड़ा है, ताकि सियासत के गलियारों में उनका जिक्र लगातार बना रहे?

गौरतलब है कि गहलोत साहब ने फरमाया कि उन पर नगर निकाय चुनाव लड़ने की रोक तो लगी है, मगर विधानसभा चुनाव लड़ने पर कोई पाबंदी नहीं है। अब जनाब, सवाल यह उठता है कि आखिर इस बात को इतनी अहमियत के साथ कहने की जरूरत क्यों आन पड़ी? क्या इसके पीछे कोई सियासी मंसूबा है, या फिर यह महज कानूनी स्थिति की तरफ इशारा भर है?

बहरहाल, उनके इस बयान ने कयासों का बाजार गर्म कर दिया है। क्या वे आने वाले विधानसभा चुनाव में कोई नया सियासी दांव खेलने की तैयारी में हैं? वैसे भी, अपने बाकी सियासी सफर में उनके लिए नगर निकाय चुनाव लड़ने का कोई खास मतलब नजर नहीं आता, खास तौर पर तब, जबकि उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरना पड़े।

अब रही विधानसभा चुनाव की बात, तो वहां भी रास्ता इतना आसान नहीं है, हुजूर! फिलहाल वे भाजपा में नहीं हैं। ऐसे में उनके सामने दो ही रास्ते दिखाई देते हैं? या तो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरें, या फिर किसी दूसरी पार्टी का चुनाव चिह्न हासिल करने की गुंजाइश तलाशें।

और अगर विधानसभा चुनाव लड़ने का इरादा वाकई परवान चढ़ता है, तो जाहिर है कि उनका निशाना अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र ही होगा। यानी सीधा मुकाबला मौजूदा विधायक और विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी से हो सकता है। देवनानी साहब के लगातार छठी बार चुनावी मैदान में उतरने की पूरी संभावना है। अलबत्ता, अगर उम्र संबंधी कोई सीमा उनके आड़े आती है, तो उनके पुत्र मनीष देवनानी के मैदान में उतरने की अटकलें भी सियासी हलकों में सुनाई देती रहती हैं। ऐसे में गहलोत की संभावित सियासी पारी की तुलना ज्ञान सारस्वत के चुनावी तजुर्बे से की जाने लगी है। सारस्वत का सियासी हश्र किसी से छिपा नहीं है। हालांकि, अभी इस मामले को दूर की कौड़ी ही समझिए, क्योंकि चुनाव में अभी वक्त है और फिलहाल गहलोत साहब की तरफ से ऐसा कोई स्पष्ट ऐलान सामने नहीं आया है कि वे विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं। मगर जनाब, विधानसभा चुनाव लड़ने पर पाबंदी न होने की दलील देकर उन्होंने कौतुहल तो पैदा कर ही दिया है। अब यह महज एक कानूनी सफाई है या फिर किसी आने वाली सियासी पारी की भूमिका, इसका जवाब तो वक्त ही देगा।

और आखिर में एक दिलचस्प पहलू और भी है। गहलोत के विधानसभा चुनाव लड़ने पर रोक नहीं होने की बात कांग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक पराशर ने कही है। अब इस बयान को किस नजरिए से देखा जाए? क्या यह महज एक कानूनी राय है, या फिर सियासत की बुझती चिंगारी में घी डालने जैसा मामला? फिलहाल तो इतना ही कहा जा सकता है, कि गहलोत ने सवाल उछाल दिया है, सियासी गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है और निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में वे अपने पत्ते खोलते हैं या नहीं। बाकी, जनाब, सियासत में हर बयान के पीछे कोई मंसूबा हो, यह जरूरी नहीं, मगर हर बयान कोई न कोई सवाल जरूर छोड़ जाता है!


शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

क्या अजमेर नगर निगम में कथित लिफाफा संस्कृति समाप्त होगी?

अजमेर नगर निगम की नवनिर्वाचित महापौर अनामिका शर्मा जिस ऊर्जा और सक्रियता के साथ अपनी नई जिम्मेदारी संभालती दिखाई दे रही हैं, उससे शहर को उनसे कुछ नया और बेहतर करने की उम्मीद बंधना स्वाभाविक है। पदभार संभालने के बाद ही उनका सफाई व्यवस्था का जायजा लेने निकल पड़ना भी इसी सक्रिय तेवर का संकेत माना जा सकता है। लेकिन नगर निगम की चुनौतियां केवल सड़कों, नालियों, सफाई और विकास कार्यों तक सीमित नहीं हैं। निगम की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर उठते सवाल भी नई महापौर के सामने बड़ी चुनौती होंगे। इन्हीं सवालों में एक है ‘लिफाफा संस्कृति’ का आरोप। नगर निगम की एक बैठक में एक पार्षद द्वारा कथित रूप से इस तरह की व्यवस्था पर खुलकर सवाल उठाए जाने की चर्चा होती रही है। इसके अलावा आम धारणा के रूप में यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि सफाई जैसे ठेकों के निर्धारित बजट में से किसी न किसी रूप में हिस्सा पार्षदों तक पहुंचता है। हालांकि ऐसे आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानने से पहले उनके ठोस प्रमाण और आधिकारिक जांच का होना जरूरी है। फिर भी सवाल अपनी जगह गंभीर है।

यदि नई महापौर वास्तव में निगम की कार्यशैली में पारदर्शिता और नई संस्कृति स्थापित करना चाहती हैं, तो उन्हें केवल विकास कार्यों की गति बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना होगा। उन्हें यह संदेश भी देना होगा कि निगम के ठेके, भुगतान, कार्यादेश और गुणवत्ता की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी और किसी भी जनप्रतिनिधि की भूमिका नियमों से बाहर नहीं होगी। यही वह मोर्चा होगा जहां अनामिका शर्मा की असली परीक्षा होगी।

क्या वे ठेकों की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बना पाएंगी? क्या सफाई व्यवस्था में भुगतान और काम की गुणवत्ता का सार्वजनिक हिसाब सामने आ सकेगा? क्या पार्षदों और ठेकेदारों के बीच किसी भी प्रकार के आर्थिक लेन-देन की गुंजाइश पर प्रभावी अंकुश लगेगा? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या वे स्वयं ऐसी किसी व्यवस्था से दूरी बनाए रखते हुए निगम में ‘काम के बदले कमीशन नहीं, काम के बदले जवाबदेही’ की संस्कृति स्थापित कर पाएंगी?

अनामिका शर्मा ने पदभार ग्रहण करते समय जनसमस्याओं के त्वरित समाधान और शहर की मूलभूत सुविधाओं को प्राथमिकता देने की बात कही है। अब शहर यह देखना चाहेगा कि उनकी ऊर्जा और सक्रियता व्यवस्था की पारदर्शिता तक भी पहुंचती है या नहीं। क्योंकि अजमेर को केवल साफ सड़कें और बेहतर सफाई व्यवस्था ही नहीं चाहिए, उसे ऐसी निगम व्यवस्था भी चाहिए जिस पर भरोसा किया जा सके। और शायद यही अनामिका शर्मा के कार्यकाल की सबसे बड़ी कसौटी होगी।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

कछुआ चाल से मंजिल की तलाश में चौधरी और डॉ. बाहेती?

अजमेर कांग्रेस में दो चेहरे ऐसे हैं, जो संगठन के लगभग हर कार्यक्रम में नजर आ ही जाते हैं, रामचंद्र चौधरी और डॉ. श्रीगोपाल बाहेती। दोनों की सक्रियता को देखकर सहज ही कौतूहल पैदा होता है कि क्या यह महज संगठन के प्रति प्रतिबद्धता है या इसके पीछे कोई भावी राजनीतिक रणनीति भी काम कर रही है? सवाल इसलिए भी उठना स्वाभाविक है, क्योंकि दोनों नेताओं की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग होते हुए भी एक समान सवाल खड़ा करती हैं। रामचंद्र चौधरी पिछला लोकसभा चुनाव हार चुके हैं, जबकि डॉ. बाहेती विधानसभा चुनाव में एक बार बगावत करने के बाद कांग्रेस में लौटे हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी रही है कि चौधरी पर कांग्रेस दोबारा दांव लगाएगी या नहीं और बाहेती के लिए पिछली बगावत टिकट की राह में कितनी बड़ी बाधा बनेगी।

इसके बावजूद दोनों की सक्रियता में कोई कमी दिखाई नहीं देती। ऐसे में सवाल उठता है, क्या यह राजनीतिक टाइम पास है? अथवा हाशिये पर जाने से बचने की रणनीति? या फिर दोनों नेता आने वाले समय के लिए अपनी जमीन तैयार कर रहे हैं?

राजनीति का भविष्य निश्चित रूप से कोई नहीं बता सकता, लेकिन दोनों की गतिविधियों को देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि वे जल्दबाजी के बजाय कछुआ चाल से मंजिल तक पहुंचने की रणनीति पर भरोसा करते दिखाई देते हैं।

रामचंद्र चौधरी के सामने सबसे बड़ा तर्क अजमेर लोकसभा क्षेत्र का सामाजिक समीकरण है। जाट बहुल संसदीय क्षेत्र में वे कांग्रेस का प्रमुख जाट चेहरा हैं। कांग्रेस के पास फिलहाल उनके मुकाबले का कोई ऐसा विकल्प नहीं है, जो समान राजनीतिक आधार तैयार कर सके। ऐसे में लगातार सक्रिय रह कर संगठन में अपनी उपयोगिता बनाए रखना भविष्य में टिकट की दावेदारी को मजबूत कर सकता है। चौधरी स्वयं भी यह दावा करते रहे हैं कि वे दोबारा टिकट हासिल करेंगे और चुनाव लड़ेंगे। दूसरी ओर डॉ. श्रीगोपाल बाहेती की राजनीति का गणित कुछ अलग नजर आता है। अजमेर उत्तर में धर्मेन्द्र सिंह राठौड़ और महेन्द्र सिंह रलावता जैसे प्रमुख दावेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा है। ऐसे में राजनीति की पुरानी कहावत, दो की लड़ाई में तीसरे को लाभ, क्या बाहेती के पक्ष में काम कर सकती है?

बाहेती के लिए एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि पिछली विधानसभा चुनावी हार में मतों का अंतर बहुत बड़ा नहीं था। यही बात शायद उनके आत्मविश्वास का आधार भी हो सकती है। यदि पार्टी के भीतर परिस्थितियां उनके अनुकूल बनती हैं, तो वे एक बार फिर दावेदारी पेश कर सकते हैं।

कांग्रेस में टिकट की राजनीति में व्यक्तिगत दावेदारी के साथ-साथ गुटीय समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अजमेर उत्तर को लेकर भी यही चर्चा है कि यदि अशोक गहलोत खेमे का प्रभाव निर्णायक रहा तो डॉ. बाहेती की दावेदारी मजबूत हो सकती है, जबकि सचिन पायलट के प्रभाव की स्थिति में विजय जैन का नाम चर्चा में आ सकता है। फिलहाल इन तमाम संभावनाओं पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन चौधरी और बाहेती की निरंतर सक्रियता यह संकेत जरूर देती है कि दोनों ने राजनीति से संन्यास लेने का मन नहीं बनाया है।

राजनीति में कई बार तेज दौड़ने वाला नहीं, बल्कि लगातार चलते रहने वाला ही मंजिल तक पहुंचता है। शायद चौधरी और बाहेती इसी कछुआ चाल पर भरोसा कर रहे हैं।


अजमेर नगर निगम में कौन होगा नेता प्रतिपक्ष?

अजमेर नगर निगम के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। अब सियासी गलियारों में एक नया सवाल तैरने लगा है कि निगम में कांग्रेस का नेता प्रतिपक्ष कौन होगा? कयास लगाए जा रहे हैं कि यह जिम्मेदारी चंद्रशेखर बालोटिया उर्फ काकू या सुनील केन में से किसी एक को सौंपी जा सकती है। हालांकि कांग्रेस के भीतर इसके लिए और भी दावेदार हो सकते हैं, लेकिन फिलहाल चर्चा इन्हीं नामों के इर्द-गिर्द घूम रही है। यह भी गौरतलब है कि शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. राजकुमार जयपाल ने पिछले निगम बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने से चंद दिन पहले ही काकू की धर्मपत्नी को सचेतक घोषित कर दिया था। हालांकि प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व से इसकी अनुमति नहीं मिली, लेकिन इस घटनाक्रम से इतना संकेत जरूर मिला कि संगठन में काकू को लेकर एक विशेष भरोसा मौजूद था। दूसरी ओर, उपमहापौर चुनाव में पराजित नौरत गुर्जर जिस तरह से सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, उससे भी यह आभास मिल रहा है कि वे निगम में कांग्रेस की आवाज बनने की भूमिका निभा सकते हैं। आखिर उपमहापौर के चुनाव में उन्हें भाजपा प्रत्याशी के बराबर 40 वोट मिले थे। यह आंकड़ा अपने आप में उनकी राजनीतिक स्थिति का संकेत देता है। इतना ही नहीं, महापौर के चुनाव में पराजित किरण गढ़वाल को लेकर नौरत गुर्जर का यह कहना कि “कांग्रेस के लिए तो वे ही मेयर हैं”, इस बात की ओर भी संकेत करता है कि निगम की राजनीति में किरण गढ़वाल का प्रभाव आगे भी बना रह सकता है। ऐसे में कांग्रेस के सामने असली चुनौती केवल नेता प्रतिपक्ष का नाम तय करने की नहीं होगी, बल्कि निगम में अलग-अलग प्रभाव रखने वाले नेताओं और समूहों के बीच तालमेल बनाए रखने की भी होगी। एक तरफ नेता प्रतिपक्ष का औपचारिक पद होगा, दूसरी तरफ काकू, नौरत गुर्जर और किरण गढ़वाल जैसे अलग-अलग राजनीतिक प्रभाव वाले चेहरे भी सक्रिय रह सकते हैं। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि कांग्रेस किसे अपना आधिकारिक चेहरा बनाएगी और बाकी शक्ति केन्द्रों को किस तरह साथ लेकर चलेगी? कुल जमा बात यह कि निगम में नेता प्रतिपक्ष कोई भी बने, कांग्रेस की राजनीति शायद केवल एक शक्ति केन्द्र तक सीमित नहीं रहने वाली। आने वाले दिनों में निगम की सियासत में एक से अधिक शक्ति केन्द्र दिखाई दे सकते हैं।

 

https://youtu.be/Iu1NN4F8RqQ

शनिवार, 26 सितंबर 2026

क्या दरगाह में मिला था कांग्रेस को हाथ?

हालांकि वर्तमान में इस तथ्य के पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, अथवा पुश्टि करना कठिन है, मगर दरगाह से जुडे लोगों में यह किस्सा प्रचलित है कि कांग्रेस को चुनाव चिन्ह हाथ का आइडिया अजमेर स्थित दरगाह ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिष्ती में मिला था। प्रसंग इस प्रकार बताया जाता है। कोई 43 साल पहले भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीया श्रीमती इंदिरा गांधी दरगाह जियारत को आई थीं। उनके खादिम थे यूसुफ महाराज व इलियास महाराज। उन दिनों पार्टी का चुनाव बदलना जाना था। दरगाह जियारत कर गुंबद षरीफ से बाहर आने पर इंदिरा जी ने बताया कि उन्हें मजार षरीफ में हाथ का पंजा दिखाई दिया। इस पर खादिम यूसुफ महाराज ने कहा कि आप इसे कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बना सकती हैं। उन्होंने सहमति जता दी। बाद में इसी चुनाव चिह्न पर कांग्रेस जीती। इंदिरा जी फिर जियारत को आईं तो उन्होंने चांदी का एक पंजा दरगाह षरीफ में भेंट किया। प्रसंगवष बता दें कि उनके ही भाई यूनुस महाराज को इंदिरा जी ने मसूदा से टिकट दिया था। वे जीते भी। कदाचित ऐसा भी हो सकता है कि हाथ को चुनाव चिन्ह बनाने की प्रेरणा उन्हें कहीं और से भी मिली हो, और दरगाह में भी ख्याल आ गया हो। कुछ लोगों का मानना है कि हाथ चिन्ह दरगाह षरीफ में मिलने का प्रसंग प्रोजेक्टेड भी हो सकता है। जानकारी के अनुसार इंदिरा जी जियारत के बाद मुख्य द्वार पर दुपट्टा बिछा कर माथा टेकती थीं। वे कई बार दरगाह आईं। एक बार वे संजय गांधी को पुत्र-रत्न (वरुण) होने पर संजय, मेनका व वरुण के साथ आईं और इतनी ध्यान मग्न हो गईं कि चांदी का जलता हुआ दीपक हाथ में लिए हुए काफी देर तक आस्ताना शरीफ में खड़ी रहीं। वह दीपक उन्होंने यहीं नजर कर दिया।