अजमेरनामा
खबरों के पीछे की खबर
बुधवार, 21 अक्टूबर 2026
पुष्कर के लिए मिल गया कांग्रेस प्रत्याशी?
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
बिंदास व्यक्तित्व के धनी तुलसी सोनी
एक बार संघ प्रचारक धर्मनारायण जी ने प्रस्ताव रखा कि अजमेर पश्चिम क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव लडें, लेकिन संघ के काम को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने चुनाव लडने से मना कर दिया। तब स्वर्गीय श्री नवल राय बच्चानी को उम्मीदवार बनाया गया और वे विधायक बने। बाद में संघ के आदेश पर राजनीति में प्रवेश किया। पहले मंडल अध्यक्ष, फिर जिला उपाध्यक्ष और महामंत्री के पद पर रहे।
एक बार फिर अजमेर पश्चिम से भाजपा टिकट के प्रबल दावेदार रहे, मगर पार्टी ने वासुदेव देवनानी को मौका दिया। जाहिर तौर पर मन को बहुत कष्ट हुआ होगा, मगर उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। एक बार पार्षद का चुनाव लडा, मगर पार्टी की अंदरूनी राजनीति के कारण पराजित हो गए।
उनके परिवार ने विभाजन की विभीषिका को भी झेला। उनके पिता रुची राम जी सिंध के शिकारपुर में सोने चांदी के जेवरात बनाने का काम करते थे। वे शिकारपुर की शाखा के मुख्य शिक्षक की भूमिका में थे, इसलिए परिवार को कुछ ज्यादा ही खतरा था। कट्टरपंथियों के हमले से बचने के लिए तब पिता ने बम बनाने का फैसला किया। विस्फोटक सामग्री से जब बम बनाया जा रहा था, तभी बम फट गया। इससे पिता के हाथ की दो अंगुलिया नष्ट हो गई। विभाजन के वक्त वे समुद्र मार्ग से मुंबई पहुंचे। वहां जेवरात बनाने का काम आरंभ किया। लेकिन बाद में दुकान अपने छोटे भाई को सौंप दी और 1951 में अजमेर आ गए। फिर अजमेर में सोने चांदी के जेवरात बनाने का काम नया बाजार में शुरू किया।
श्री तुलसी सोनी का जन्म 24 अक्टूबर 1946 को हुआ। आपने मुंबई से बीकॉम की शिक्षा अर्जित की। आपने 1965 से स्वर्णकार का काम आरंभ किया। समाजसेवा उनमें कूट कूट कर भरी है। हर वक्त जरूरतमंद की सेवा को तत्पर रहते हैं। 25 जून 1975 की रात को जब देश में आपातकाल की घोषणा हुई तो उस रात वे संघ के अन्य स्वयंसेवकों की तरह गिरफ्तार होना चाहते थे, मगर प्रचारक धर्मनारायण जी के आदेश पर भूमिगत हो, ताकि जेल गए स्वयंसेवकों के परिवार वालों को संभालें। आपातकाल में दस माह तक जेल से बाहर रहकर सक्रिय भूमिका निभाई। आखिरकार 10 अप्रैल 1976 को करीब पचास जवानों के साथ घेर लिया। बचने का कोई रास्ता नहीं था, अतः सरेंडर कर दिया। जेल में बंदियों के साथ अन्याय हो रहा था। इसके विरोध में 10 दिनं तक अनशन पर रहे। 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटा और वे रिहा हो गए।
वे अस्सी वर्श की उम्र में भी पूरी तरह से फिट हैं। दिलचस्प है कि उम्र के इस पडाव पर भी समाज की युवा टीम के खेवनहार हैं। सेल्फी लेने और वीडियो बनाने की बहुत षौक है। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उनकी दीर्घायु व स्वस्थ जीवन की कामना करता है।
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026
तो गहलोत लडेंगे आगामी विधानसभा चुनाव?
गौरतलब है कि गहलोत साहब ने फरमाया कि उन पर नगर निकाय चुनाव लड़ने की रोक तो लगी है, मगर विधानसभा चुनाव लड़ने पर कोई पाबंदी नहीं है। अब जनाब, सवाल यह उठता है कि आखिर इस बात को इतनी अहमियत के साथ कहने की जरूरत क्यों आन पड़ी? क्या इसके पीछे कोई सियासी मंसूबा है, या फिर यह महज कानूनी स्थिति की तरफ इशारा भर है?
बहरहाल, उनके इस बयान ने कयासों का बाजार गर्म कर दिया है। क्या वे आने वाले विधानसभा चुनाव में कोई नया सियासी दांव खेलने की तैयारी में हैं? वैसे भी, अपने बाकी सियासी सफर में उनके लिए नगर निकाय चुनाव लड़ने का कोई खास मतलब नजर नहीं आता, खास तौर पर तब, जबकि उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरना पड़े।
अब रही विधानसभा चुनाव की बात, तो वहां भी रास्ता इतना आसान नहीं है, हुजूर! फिलहाल वे भाजपा में नहीं हैं। ऐसे में उनके सामने दो ही रास्ते दिखाई देते हैं? या तो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरें, या फिर किसी दूसरी पार्टी का चुनाव चिह्न हासिल करने की गुंजाइश तलाशें।
और अगर विधानसभा चुनाव लड़ने का इरादा वाकई परवान चढ़ता है, तो जाहिर है कि उनका निशाना अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र ही होगा। यानी सीधा मुकाबला मौजूदा विधायक और विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी से हो सकता है। देवनानी साहब के लगातार छठी बार चुनावी मैदान में उतरने की पूरी संभावना है। अलबत्ता, अगर उम्र संबंधी कोई सीमा उनके आड़े आती है, तो उनके पुत्र मनीष देवनानी के मैदान में उतरने की अटकलें भी सियासी हलकों में सुनाई देती रहती हैं। ऐसे में गहलोत की संभावित सियासी पारी की तुलना ज्ञान सारस्वत के चुनावी तजुर्बे से की जाने लगी है। सारस्वत का सियासी हश्र किसी से छिपा नहीं है। हालांकि, अभी इस मामले को दूर की कौड़ी ही समझिए, क्योंकि चुनाव में अभी वक्त है और फिलहाल गहलोत साहब की तरफ से ऐसा कोई स्पष्ट ऐलान सामने नहीं आया है कि वे विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं। मगर जनाब, विधानसभा चुनाव लड़ने पर पाबंदी न होने की दलील देकर उन्होंने कौतुहल तो पैदा कर ही दिया है। अब यह महज एक कानूनी सफाई है या फिर किसी आने वाली सियासी पारी की भूमिका, इसका जवाब तो वक्त ही देगा।
और आखिर में एक दिलचस्प पहलू और भी है। गहलोत के विधानसभा चुनाव लड़ने पर रोक नहीं होने की बात कांग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक पराशर ने कही है। अब इस बयान को किस नजरिए से देखा जाए? क्या यह महज एक कानूनी राय है, या फिर सियासत की बुझती चिंगारी में घी डालने जैसा मामला? फिलहाल तो इतना ही कहा जा सकता है, कि गहलोत ने सवाल उछाल दिया है, सियासी गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है और निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में वे अपने पत्ते खोलते हैं या नहीं। बाकी, जनाब, सियासत में हर बयान के पीछे कोई मंसूबा हो, यह जरूरी नहीं, मगर हर बयान कोई न कोई सवाल जरूर छोड़ जाता है!
शनिवार, 3 अक्टूबर 2026
क्या अजमेर नगर निगम में कथित लिफाफा संस्कृति समाप्त होगी?
यदि नई महापौर वास्तव में निगम की कार्यशैली में पारदर्शिता और नई संस्कृति स्थापित करना चाहती हैं, तो उन्हें केवल विकास कार्यों की गति बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना होगा। उन्हें यह संदेश भी देना होगा कि निगम के ठेके, भुगतान, कार्यादेश और गुणवत्ता की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी और किसी भी जनप्रतिनिधि की भूमिका नियमों से बाहर नहीं होगी। यही वह मोर्चा होगा जहां अनामिका शर्मा की असली परीक्षा होगी।
क्या वे ठेकों की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बना पाएंगी? क्या सफाई व्यवस्था में भुगतान और काम की गुणवत्ता का सार्वजनिक हिसाब सामने आ सकेगा? क्या पार्षदों और ठेकेदारों के बीच किसी भी प्रकार के आर्थिक लेन-देन की गुंजाइश पर प्रभावी अंकुश लगेगा? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या वे स्वयं ऐसी किसी व्यवस्था से दूरी बनाए रखते हुए निगम में ‘काम के बदले कमीशन नहीं, काम के बदले जवाबदेही’ की संस्कृति स्थापित कर पाएंगी?
अनामिका शर्मा ने पदभार ग्रहण करते समय जनसमस्याओं के त्वरित समाधान और शहर की मूलभूत सुविधाओं को प्राथमिकता देने की बात कही है। अब शहर यह देखना चाहेगा कि उनकी ऊर्जा और सक्रियता व्यवस्था की पारदर्शिता तक भी पहुंचती है या नहीं। क्योंकि अजमेर को केवल साफ सड़कें और बेहतर सफाई व्यवस्था ही नहीं चाहिए, उसे ऐसी निगम व्यवस्था भी चाहिए जिस पर भरोसा किया जा सके। और शायद यही अनामिका शर्मा के कार्यकाल की सबसे बड़ी कसौटी होगी।
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026
कछुआ चाल से मंजिल की तलाश में चौधरी और डॉ. बाहेती?
इसके बावजूद दोनों की सक्रियता में कोई कमी दिखाई नहीं देती। ऐसे में सवाल उठता है, क्या यह राजनीतिक टाइम पास है? अथवा हाशिये पर जाने से बचने की रणनीति? या फिर दोनों नेता आने वाले समय के लिए अपनी जमीन तैयार कर रहे हैं?
राजनीति का भविष्य निश्चित रूप से कोई नहीं बता सकता, लेकिन दोनों की गतिविधियों को देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि वे जल्दबाजी के बजाय कछुआ चाल से मंजिल तक पहुंचने की रणनीति पर भरोसा करते दिखाई देते हैं।
रामचंद्र चौधरी के सामने सबसे बड़ा तर्क अजमेर लोकसभा क्षेत्र का सामाजिक समीकरण है। जाट बहुल संसदीय क्षेत्र में वे कांग्रेस का प्रमुख जाट चेहरा हैं। कांग्रेस के पास फिलहाल उनके मुकाबले का कोई ऐसा विकल्प नहीं है, जो समान राजनीतिक आधार तैयार कर सके। ऐसे में लगातार सक्रिय रह कर संगठन में अपनी उपयोगिता बनाए रखना भविष्य में टिकट की दावेदारी को मजबूत कर सकता है। चौधरी स्वयं भी यह दावा करते रहे हैं कि वे दोबारा टिकट हासिल करेंगे और चुनाव लड़ेंगे। दूसरी ओर डॉ. श्रीगोपाल बाहेती की राजनीति का गणित कुछ अलग नजर आता है। अजमेर उत्तर में धर्मेन्द्र सिंह राठौड़ और महेन्द्र सिंह रलावता जैसे प्रमुख दावेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा है। ऐसे में राजनीति की पुरानी कहावत, दो की लड़ाई में तीसरे को लाभ, क्या बाहेती के पक्ष में काम कर सकती है?
बाहेती के लिए एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि पिछली विधानसभा चुनावी हार में मतों का अंतर बहुत बड़ा नहीं था। यही बात शायद उनके आत्मविश्वास का आधार भी हो सकती है। यदि पार्टी के भीतर परिस्थितियां उनके अनुकूल बनती हैं, तो वे एक बार फिर दावेदारी पेश कर सकते हैं।
कांग्रेस में टिकट की राजनीति में व्यक्तिगत दावेदारी के साथ-साथ गुटीय समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अजमेर उत्तर को लेकर भी यही चर्चा है कि यदि अशोक गहलोत खेमे का प्रभाव निर्णायक रहा तो डॉ. बाहेती की दावेदारी मजबूत हो सकती है, जबकि सचिन पायलट के प्रभाव की स्थिति में विजय जैन का नाम चर्चा में आ सकता है। फिलहाल इन तमाम संभावनाओं पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन चौधरी और बाहेती की निरंतर सक्रियता यह संकेत जरूर देती है कि दोनों ने राजनीति से संन्यास लेने का मन नहीं बनाया है।
राजनीति में कई बार तेज दौड़ने वाला नहीं, बल्कि लगातार चलते रहने वाला ही मंजिल तक पहुंचता है। शायद चौधरी और बाहेती इसी कछुआ चाल पर भरोसा कर रहे हैं।


