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शनिवार, 26 सितंबर 2026
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शनिवार, 12 सितंबर 2026
क्या पार्षद पशु हैं, जिन्हें बाड़े में बंद किया गया है?
क्या पार्षद पशु हैं, जिन्हें बाड़े में बंद किया गया है?
“बाड़ाबंदी” शब्द वास्तव में पार्षदों जैसे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के संदर्भ में कुछ हद तक अपमानजनक और अमानवीय बिंब पैदा करता है। “बाड़ा” सामान्यतः उस स्थान को कहा जाता है जहां पशुओं को घेरकर रखा जाता है। राजनीति में “बाड़ाबंदी” का अर्थ हो गया है, चुनाव के दौरान पार्षदों को किसी होटल, रिसॉर्ट या अन्य स्थान पर एक साथ रखकर उनकी आवाजाही और संपर्क पर निगरानी रखना। इसलिए सवाल स्वाभाविक है कि जनता द्वारा चुने गए पार्षदों को पशुओं की तरह ‘बाड़े’ में बंद करने की स्थिति को हम सामान्य राजनीतिक शब्दावली क्यों मानें? यह शब्द इस पूरी प्रक्रिया की विडंबना को तो उजागर करता है, लेकिन जनप्रतिनिधियों की गरिमा को देखते हुए इसका इस्तेमाल सहज नहीं होना चाहिए। तो क्या “लामबंदी” बेहतर शब्द है? बिलकुल, “लामबंदी” कहीं अधिक गरिमापूर्ण और राजनीतिक रूप से उपयुक्त शब्द है। “लामबंदी” का अर्थ है, किसी उद्देश्य या पक्ष में लोगों को संगठित करना, एकजुट करना अथवा समर्थन के लिए तैयार करना। इसलिए कहा जा सकता है,पार्षदों की लामबंदी, समर्थन के लिए पार्षदों को एकजुट करना, मेयर चुनाव में पार्षदों का शक्ति-संगठन, पार्षदों को अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश। हां, इतना जरूर है कि “बाड़ाबंदी” में व्यंग्य और विडंबना है, जबकि “लामबंदी” में राजनीतिक गरिमा है।
कैसा रहा अब तक के अजमेर नगर निकाय प्रमुखों का मिजाज?
1990 से 95 तक नगर परिषद के सभापति रहे स्वर्गीय श्री रतनलाल यादव का कार्यकाल ठीक ठाक रहा। जब भी आमसभा होती थी तो पार्षद खूब हंगामा करते थे, हावी रहते थे। रोचक बात है कि यादव चुपचाप सुनते रहते थे। कुछ नहीं बोलते थे। यहां तक कि हंगामा होते देख कर मुस्कराते रहते थे। उनके बाद 1995 से 2000्र तक सभापति रहे स्वर्गीय श्री वीरकुमार का कार्यकाल जीवंत रहा। उन्होंने नगर परिषद की ओर से कई नवाचार किए। पहली बार लगा कि नगर परिषद भी कोई संस्था है, जो नगर की धडकन से सीधे जुडी हुई है। दुर्भाग्य से वे कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और हृदयाघात से उनका निधन हो गया। उसके बाद 24 जनवरी 2000 से 9 अप्रैल 2000 श्रीमती विद्या कमलाकर जोशी कार्यवाहक सभापति रहीं। 10 अप्रैल से 28 अगस्त 2000 तक सभापति का दायित्व श्री सुरेन्द्र सिंह शेखावत ने निभाया और वे वीरकुमार के नक्शेकदम पर चले। 28 अगस्त 2000 से 22 दिसम्बर 2003 सभापति श्रीमती अनिता भदेल बनीं। चूंकि अध्यापिका से सीधे पार्षद बन कर राजनीति में प्रवेश करने वाली श्रीमती अनिता भदेल को राजनीतिक अनुभव नहीं था, इस कारण ऐसे मौके आए, जब आम सभा में हंगामा होने पर रूआंसी हो जाती थीं और सभा स्थागित कर देती थीं। अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही वे विधायक बन गईं और उनके स्थान पर 22 दिसम्बर 2003 से 31 दिसम्बर 2005ः श्रीमती सरोज देवी जाटव को सभापति बनने की मौका मिला। वे कुछ खास उपलब्धि अपने खाते में दर्ज नहीं करवा पाई। फिर स्वर्गीय श्री वीरकुमार के शिष्य धर्मेन्द्र गहलोत ने 2005 से 2010 तक कुर्सी पर काबिज हुए। सन् 2008 में भाजपा शासनकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की पहल पर नगर परिषद को नगर निगम का दर्जा दे दिया गया। इसकी घोषणा उन्होंने अजमेर में ही की। वे यहां राज्य स्तरीय गणतंत्र समारोह में शिरकत करने आई थीं। इस लिहाज से श्री धर्मेन्द्र गहलोत को पहला मेयर बनने का गौरव हासिल हुआ। हालांकि जनसंख्या संबंधी औपचारिकता बाद में कुछ गांव मिला कर की गई। उनका यह कार्यकाल जांबाजी से भरा रहा। उन्हें कई बार अतिक्रमण हटाओ दस्ते का नेतृत्व करते देखा गया। उन्होंने स्वर्गीय श्री वीर कुमार के कदमों पर चलते हुए निगम में कामकाज में सुधार किया। अगस्त 2010 में करीब बीस साल भाजपा का कब्जा रहने के बाद पहली बार कांग्रेस के नए चेहरे वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व पार्षद स्वर्गीय श्री हरिशचंद जटिया के पुत्र श्री कमल बाकोलिया अजमेर नगर निगम के पहले निर्वाचित मेयर बने। उन्होंने भाजपा के डॉ. प्रियशील हाड़ा को पराजित किया। आरंभ के चंद साल तो ठीक ठाक काम किया, मगर कार्यकाल का बाकी हिस्सा सरकार पलटने के कारण यूं ही बीत गया। 2015 में नई व्यवस्था के तहत मेयर का चुनाव पार्षदों में से किया गया और एक बार फिर धर्मेन्द्र गहलोत मेयर बने। दूसरी बार वे कुछ संयत नजर आए और उनमें मैच्योरिटी नजर आई। उनके कार्यकाल में भी निगम ने सामाजिक सरोकार के बहुत काम किए।
2020 में भाजपा की श्रीमती ब्रजलता हाडा मेयर चुनी गई। उनके कार्यकाल में आनासागर में जलकुंभी और भारी बारिश के दौरान सडकों पर पानी फैलने की विकट समस्याएं आईं, जिनसे उन्होंने बखूबी निपटा। वे कूल माइंड रहीं, इस कारण विवादों में नहीं उलझीं। जाहिर तौर पर उनके पति डॉ प्रियशील हाडा, जो शहर जिला भाजपा के अध्यक्ष रहे, उनका भरपूर सहयोग किया। एक बार फिर अजमेर को महिला मेयर मिलने जा रही है।
गुरुवार, 20 अगस्त 2026
डॉ. शामिका रवि ने किया बिहार के प्रथम सेंटर फॉर अर्बन पॉलिसी एंड गवर्नेस का विधिवत शुभारंभ
उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. शामिका रवि ने आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शरद कुमार यादव की पहल, दूरदृष्टि और नेतृत्व की विशेष सराहना की। उन्होंने कहा कि शहरी नीति और शासन जैसे समसामयिक विषय पर केंद्र की स्थापना समय की आवश्यकता है। देश तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल कक्षाओं और पाठ्यक्रमों तक सीमित नहीं रह सकती। उच्च शिक्षण संस्थानों को समाज और शासन के सामने मौजूद वास्तविक समस्याओं पर शोध करना होगा और उनके व्यावहारिक समाधान के लिए नीति संवाद को मजबूत करना होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह केंद्र शहरी विकास से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर गुणवत्तापूर्ण शोध को बढ़ावा देगा और नीति-निर्माताओं तथा अकादमिक जगत के बीच प्रभावी संवाद का मंच बनेगा।
कुलपति प्रो. (डॉ.) शरद कुमार यादव ने कहा कि सेंटर फॉर अर्बन पॉलिसी एंड गवर्नेस केवल एक नए अकादमिक केंद्र की शुरुआत नहीं, बल्कि शहरी भारत की बदलती जरूरतों पर शोध, संवाद और नीति-विमर्श के लिए समर्पित मंच का निर्माण है। उन्होंने कहा कि बिहार के शहर तेजी से बदल रहे हैं। शहरीकरण से आर्थिक गतिविधियों, रोजगार और विकास के अवसर बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके साथ आवास, यातायात, जलापूर्ति, स्वच्छता, पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना जैसी चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। इन समस्याओं का समाधान स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध आंकड़ों और नागरिकों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर ही संभव है।
प्रो. शरद कुमार यादव ने कहा कि शहरी समस्याओं को समझने के लिए केवल एक विषय का दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, पर्यावरण अध्ययन, इंजीनियरिंग, प्रशासन, सार्वजनिक नीति और डेटा विज्ञान जैसे विभिन्न क्षेत्रों को साथ लेकर बहुविषयक शोध की आवश्यकता है। केंद्र का उद्देश्य इसी समन्वित दृष्टिकोण को संस्थागत रूप देना है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का प्रयास रहेगा कि केंद्र शोध, नीति और व्यावहारिक शासन के बीच प्रभावी सेतु के रूप में कार्य करे। विद्यार्थियों और शोधार्थियों को वास्तविक शहरी समस्याओं, स्थानीय निकायों और समुदायों के साथ काम करने का अवसर भी उपलब्ध कराया जाएगा।
वहीं, मौके पर केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. राजभूषण चौधरी ने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के दौर में बेहतर आधारभूत संरचना और प्रभावी प्रशासन बेहद जरूरी है। शहरों के विकास के लिए स्वच्छता, पेयजल, परिवहन, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक सुविधाओं की मजबूत व्यवस्था के साथ शहरी प्रशासन को अधिक जवाबदेह, सक्षम और नागरिक केंद्रित बनाना होगा। उन्होंने कुलपति की पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह केंद्र बिहार में शहरी नीति और प्रशासन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। उन्होंने सरकार, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय को समय की आवश्यकता बताया।
सांसद शांभवी चौधरी ने कहा कि शहरी विकास को केवल सड़कों, भवनों और भौतिक आधारभूत संरचना तक सीमित नहीं किया जा सकता। बेहतर शहर के लिए पारदर्शी प्रशासन, नागरिक सहभागिता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समावेशन और समान अवसर भी जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि परिवहन, स्वच्छता, हरित क्षेत्र और सार्वजनिक सुविधाएं सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। उन्होंने केंद्र की स्थापना को विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए नई संभावनाओं का द्वार बताया।
केंद्र के माध्यम से सरकार, शहरी स्थानीय निकायों, विकास एजेंसियों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और विशेषज्ञों के बीच सहयोग बढ़ाने की योजना है। यहां विशेषज्ञ व्याख्यान, नीति संवाद, शोध परियोजनाएं, कार्यशालाएं, क्षेत्रीय अध्ययन, अंतर्विषयक शोध और व्यावहारिक प्रशिक्षण जैसी गतिविधियां संचालित की जाएंगी। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों को शहरी विकास की जमीनी चुनौतियों से परिचित कराने के साथ उन्हें शोध और नीति-विश्लेषण की व्यावहारिक समझ देना है।
कार्यक्रम में शहरी विकास, सुशासन, स्थानीय शासन, नागरिक सहभागिता और भविष्य की शहरी चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि बिहार के सतत और समावेशी शहरी विकास के लिए प्रमाण आधारित नीति, सक्षम स्थानीय संस्थाएं और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। विश्वविद्यालय के विभिन्न स्कूलों के शिक्षक, विद्यार्थी और शोधार्थियों के साथ पटना स्थित अन्य शोध संस्थानों के शिक्षकों एवं शोधार्थियों की भी सक्रिय भागीदारी रही।
कुलपति प्रो. शरद कुमार यादव ने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में यह केंद्र शहरी नीति, शासन और विकास के क्षेत्र में शोध, प्रशिक्षण और नीति संवाद का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य ज्ञान को समाज और शासन की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना है। बिहार के तेजी से बदलते शहरी परिदृश्य में स्थानीय अनुभवों और प्रमाणों पर आधारित ज्ञान का निर्माण ही बेहतर नीति और बेहतर शहरों की आधारशिला बनेगा।
बदलती सामाजिक संवेदनाओं में वृद्धों को चाहिए उजाले
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस-21 अगस्त, 2026
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस समाज के अंतर्मन को झकझोरने एवं वृद्धों की त्रासद स्थितियों पर सोचने को विवश करता है कि जिन हाथों ने परिवार की नींव रखी, जिन कंधों ने बच्चों के भविष्य का भार उठाया और जिन अनुभवों ने जीवन की अनेक कठिन राहों को पार करने में अगली पीढ़ियों का मार्गदर्शन किया, उन्हीं वृद्ध माता-पिता को जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेलापन, उपेक्षा, असुरक्षा और अपमान क्यों झेलना पड़ रहा है? निश्चित ही कहीं-न-कहीं हमारी सामाजिक संवेदना कमजोर हुई है। जिस समाज में बुजुर्गों का सम्मान सहज संस्कार होना चाहिए था, वहां उनके अधिकारों और सुरक्षा के लिए अलग से दिवस मनाना हमारी सामूहिक आत्मचिंता का विषय है। भारत तेजी से वृद्ध होती आबादी की ओर बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023 के अनुसार 2050 तक भारत की आबादी में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत हो सकती है; यानी हर पांच भारतीयों में लगभग एक वरिष्ठ नागरिक होगा। यह केवल जनसांख्यिकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था के सामने आने वाली एक बड़ी चुनौती है। अधिक उम्र तक जीना मानव सभ्यता की उपलब्धि है, लेकिन यदि लंबी आयु के साथ अकेलापन, बीमारी, आर्थिक असुरक्षा और भावनात्मक उपेक्षा जुड़ जाए तो दीर्घ जीवन वरदान के बजाय बोझ जैसा अनुभव होने लगता है।भारत की पारंपरिक संस्कृति में वृद्ध व्यक्ति परिवार के मुखिया, मार्गदर्शक और अनुभव के भंडार माने जाते थे। संयुक्त परिवार में उनकी भूमिका केवल निर्णय लेने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे परिवार की स्मृति, परंपरा और संस्कारों के जीवंत केंद्र होते थे। लेकिन तेजी से बदलती जीवनशैली, महानगरीय संस्कृति, रोजगार के लिए पलायन, छोटे परिवारों की प्रवृत्ति, उपभोक्तावाद और बढ़ती व्यक्तिवादी सोच ने इस व्यवस्था को बदल दिया है। आज कई वृद्ध अपने ही घर में रहते हुए भी भावनात्मक रूप से अकेले हैं। उनके पास रहने को छत है, लेकिन संवाद के लिए कोई अपना नहीं; परिवार है, लेकिन समय नहीं; संतान है, लेकिन अपनापन कम होता जा रहा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस वृद्ध ने जीवनभर परिवार को अपने केंद्र में रखा, सेवानिवृत्ति के बाद वही परिवार उसे अपने केंद्र से बाहर करने लगता है। नौकरी में रहते हुए जिस व्यक्ति की सलाह महत्वपूर्ण थी, नौकरी से मुक्त होते ही उसकी उपयोगिता जैसे समाप्त मान ली जाती है।
वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इसी बदलती सामाजिक संरचना का संकेत है। हर वृद्धाश्रम दुख की कहानी नहीं है; कुछ स्थानों पर वे अकेले और असहाय वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षा और देखभाल का महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। लेकिन जब वृद्धाश्रम उन माता-पिता का अंतिम ठिकाना बन जाए जिन्हें सक्षम संतान केवल इसलिए घर से दूर कर देती है कि वे आधुनिक जीवन की सुविधाओं के बीच ‘असुविधा’ बन गए हैं, तब प्रश्न केवल परिवार का नहीं, पूरे समाज के संस्कारों का बन जाता है। संपत्ति अपने नाम कराने के बाद माता-पिता से दूरी बना लेना, उनकी बीमारी को बोझ समझना या उन्हें केवल घरेलू जिम्मेदारियों के लिए उपयोग करना ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जिन पर समाज को गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए। यह भी सच है कि वृद्धावस्था की समस्या केवल युवाओं की संवेदनहीनता से पैदा नहीं होती। वरिष्ठ नागरिकों को भी बदलते समय के साथ स्वयं को बदलना होगा। नई पीढ़ी की स्वतंत्रता, निजी निर्णय और जीवनशैली को समझना होगा। अनावश्यक हस्तक्षेप से बचते हुए अपने अनुभव को आदेश नहीं, मार्गदर्शन के रूप में प्रस्तुत करना होगा। उम्र बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन मन का बूढ़ा हो जाना अनिवार्य नहीं। वरिष्ठ नागरिक यदि सामाजिक गतिविधियों, अध्ययन, सेवा, आध्यात्मिकता, सामुदायिक कार्यक्रमों और रचनात्मक कार्यों से जुड़े रहें तो उनका जीवन अधिक सक्रिय, सार्थक और आनंदपूर्ण बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट का कल आया फैसला बुजुर्गों के लिए कानूनी संजीवनी की तरह है जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि संतान माता-पिता की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाने में विफल रहती है, तो वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति और सम्मान की रक्षा के लिए कानून के तहत बच्चों को उस संपत्ति से बेदखल करने का रास्ता खुला है।
सरकार की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। विशेष रूप से 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों को आय की परवाह किए बिना आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवरेज देना एक महत्वपूर्ण कदम है। सरकार के अनुसार अक्टूबर 2024 में शुरू हुए इस विस्तार से लगभग छह करोड़ वरिष्ठ नागरिकों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य है; जून 2026 तक योजना के अंतर्गत 70 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए कवरेज का दायरा इसी दिशा में आगे बढ़ाया गया है। इसी प्रकार अटल वयो अभ्युदय योजना का उद्देश्य केवल वृद्धों को आश्रय देना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा, आवास, सक्रिय एवं उत्पादक वृद्धावस्था, कौशल, परिवहन तथा पीढ़ियों के बीच संबंधों को मजबूत करना भी है। योजना में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सहायता, वृद्धाश्रम, सहायक उपकरण, सक्रिय वृद्धावस्था और अनुभव आधारित रोजगार जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया है। ये प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सरकारी योजनाओं की सफलता अंततः उनके अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी पहुंचने पर निर्भर करती है। पेंशन, स्वास्थ्य सुविधा, डिजिटल सेवाओं और कानूनी संरक्षण को अधिक सरल, सुलभ और स्थानीय स्तर पर प्रभावी बनाना अभी भी आवश्यक है।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए आर्थिक सुरक्षा जितनी जरूरी है, उससे कहीं अधिक जरूरी भावनात्मक सुरक्षा है। पैसा दवा खरीद सकता है, लेकिन अकेलेपन का उपचार नहीं कर सकता। अस्पताल शरीर का इलाज कर सकता है, लेकिन उपेक्षा से घायल मन का उपचार परिवार का प्रेम ही कर सकता है। इसलिए वृद्ध कल्याण को केवल सरकारी योजना या पेंशन के दायरे में नहीं देखा जा सकता। परिवार को यह समझना होगा कि वृद्ध माता-पिता को केवल भोजन और दवा नहीं चाहिए; उन्हें बातचीत चाहिए, सम्मान चाहिए, निर्णयों में सहभागिता चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि वे परिवार के लिए अब भी महत्वपूर्ण हैं। आज की युवा पीढ़ी को यह बात विशेष रूप से समझनी होगी कि माता-पिता का वर्तमान हमारे भविष्य का संकेत है। जो व्यवहार हम आज अपने वृद्ध माता-पिता के साथ करेंगे, आने वाला समय उसी व्यवहार को हमारे सामने खड़ा करेगा। आज हम युवा हैं, कल हम वृद्ध होंगे। आज जिन आंखों को हम अनदेखा कर रहे हैं, कल उन्हीं जैसी आंखों में हमारी अपनी संतानों के व्यवहार का प्रतिबिंब दिखाई दे सकता है। इसलिए वृद्धों की सेवा दया नहीं, कर्तव्य है; उनका सम्मान उपकार नहीं, संस्कार है।
विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस की वास्तविक सार्थकता तभी होगी जब यह एक दिन का आयोजन न रहकर जीवन की स्थायी दृष्टि बने। परिवार में सप्ताह में एक दिन नहीं, प्रतिदिन संवाद हो; समाज में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सक्रिय सामुदायिक मंच हों; स्थानीय संस्थाएं उन्हें ज्ञान, अनुभव और सेवा के अवसर दें; सरकार स्वास्थ्य, पेंशन और सुरक्षा की व्यवस्थाओं को मजबूत करे और युवा पीढ़ी अपनी सोच में परिवर्तन लाए। वृद्धावस्था जीवन की संध्या है, लेकिन संध्या का अर्थ अंधेरा नहीं होता। वह दिनभर की यात्रा के बाद सुनहरी रोशनी का समय भी हो सकती है। आवश्यकता केवल इतनी है कि परिवार उस रोशनी को बुझने न दे। हमारे वृद्ध जीवन के बीते हुए पन्ने नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुभव की खुली किताब हैं। यदि हम उनके अंतिम वर्षों को भय, अकेलेपन और उपेक्षा से भर देंगे तो हम केवल उनके साथ अन्याय नहीं करेंगे, बल्कि अपनी सभ्यता और संस्कारों को भी कमजोर करेंगे। इसलिए आज संकल्प होना चाहिए-वृद्धों के जीवन में अंधेरा नहीं, सम्मान का उजाला हो; अकेलापन नहीं, अपनापन हो; उपेक्षा नहीं, सहभागिता हो और शेष जीवन बोझ नहीं, आनंद एवं गरिमा का उत्सव बने। यही विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस का वास्तविक संदेश और हमारी सबसे बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज
दिल्ली-110092, मो. 9811051133



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