ख्वाजा गरीब नवाज का मूल नाम मोइनुद्दीन हसन चिश्ती था। उन्हें यूं तो अनेक नामों से जाना चाहता है, मगर गरीब नवाज एक ऐसा नाम है, जिससे सभी आम-ओ-खास वाकिफ हैं। इस नाम के मायने हैं गरीबों पर रहम करने वाला। यूं तो अनेक नवाबों, राजाओं-महाराजाओं ने यहां झोली फैला कर बहुत कुछ हासिल किया है, मगर गरीबों पर उनका कुछ खास ही करम है। उनके दरबार में तकसीम होने वाले लंगर के लिए अमीर और गरीब एक ही लाइन में खड़े होते हैं, यही वजह है कि उन्हें गरीब नवाज के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों और आम लोगों के बीच ही बिताया। जो लोग आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से गरीब थे, जिन्हें इबादत करना नहीं आता था, जिन्हें भक्ति व सच्चाई का ज्ञान नहीं था, उन्हें उन्होंने सूफी मत का ज्ञान दिया। उन्होंने किसी भी राजा या सुल्तान का आश्रय नहीं लिया और न ही उनके दरबारों में गए। उन्होंने स्वयं भी गरीबों की तरह सादा जीवन बिताया। इन्हीं गुणों के कारण उन्हें गरीब नवाज कहा जाता है, जो कि उनका सबसे प्रिय नाम है।
बुजुर्गवार बताते हैं कि उनके व्यक्तिगत सामान में दो जोड़ी कपड़े, एक लाठी, एक तीर-कमान, एक नमकदानी, एक कंछी और एक दातून थी। हर वक्त वे इतना ही सामान अपने पास रखते थे। उन्होंने कभी तीसरी जोड़ी अपने पास नहीं रखी। यदि कपड़े फटने लगते तो उसी पर पैबंद लगा कर साफ करके उसे पहन लेते थे। यह काम भी वे खुद ही किया करते थे। पैबंद लग-लग कर उनके कपड़े इतने वजनी हो गए थे कि आखिरी वक्त में उनके कपड़ों का वजन साढ़े बारह किलो हो गया था।
ख्वाजा साहब को अता-ए-रसूल के नाम से भी जाना जाता है, जिसका मतलब होता है खुदा के पैगंबर मोहम्मद साहब का उपहार। अपने जीवन का अधिकांश समय अजमेर से ही सूफीवाद का प्रचार-प्रसार करने और यहीं पर इबादत करने की वजह से उन्हें ख्वाजा-ए-अजमेर के नाम से भी पुकारा जाता है। वे हिंदल वली के नाम से भी जाने जाते हैं, जिसका मतलब होता हिंदुस्तान के संत और रक्षक। इसी प्रकार उन्हें सुल्तान-उल-हिंद भी कहा जाता है, जिसका मतलब आध्यात्मिक संदर्भ में हिंदुस्तान की अध्यात्मिक शक्तियों का राजा होता है। इसी संदर्भ में उन्हें नायाब-ए-रसूल हिंद भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त उन्हें ताजुल मुकर ए बिन बल मुश्हक कीन भी कहते हैं, जिसके मायने है नैसर्गिक तेज व ज्ञान का आलोक, जिसके चारों ओर हमेशा खुशी ही खुशी और आशीर्वाद व रहमत बरसती रहती है। उन्हें सैयद उल आबेदीन भी कहते हैं, अर्थात पवित्र तजुल आशिकीन प्रेमियों के सम्राट। उन्हें ताज बुरहन उल वासेलीन यानि एकता के प्रतीक, इसके अतिरिक्त उन्हें आफताब ए जहान यानि संसार का सूरज व संसार को रोषन करने वाला कहा जाता है
-तेजवाणी गिरधर
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