मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026
वैभव गहलोत को अजमेर में लॉंच करने की तैयारी?
कानाफूसी है कि पूर्व मुख्यमंत्री अषोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत के लिए अजमेर में जमीन तलाषी जा रही है? उन्हें मनरेगा बचाओ संग्राम का अजमेर जिला प्रभारी बनाए जाने से यह षगूफा उठा है कि वे अजमेर में खास दिलचस्पी ले रहे हैं। क्या वजह है कि उन्हें अजमेर का ही प्रभारी बनाया गया? एक मायने यह निकाले जा रहे हैं कि आरटीडीसी के पूर्व चेयरमेन धर्मेन्द्र सिंह राठौड अपना रूतबा गालिब करने के लिए आग्रह करके उन्हें अजमेर लाए हैं। बताने की जरूरत नहीं है कि राठौड अषोक गहलोत के खासमखास हैं और अनेक बार वैभव के साथ राजस्थान के अनेक दौरों में उनके साथ नजर आए हैं। दूसरा पहलु यह माना जा रहा है कि राठौड वैभव के लिए अजमेर में जमीन तलाष्ज्ञ रहे हैं। ज्ञातव्य है कि आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर में तीन सीटें बनने की संभावना है। एक सामान्य सीट के लिए खुद राठौड जाजम जमा रहे हैं, जमा ही चुके हैं। दूसरी सामान्य सीट पर वैभव को उतारा जा सकता है। यहां माली जाति के पर्याप्त वोट हैं। ज्ञातव्य है कि अजमेर एक राजनीतिक चरागाह रहा है। वैभव ने मनरेगा बचाओ संग्राम के जिला प्रभारी होने के नाते अजमेर में आयोजित प्रदर्षन में भाग लिया। अजमेर में उनकी दिलचस्पी का एक प्रमाण इससे भी स्थापित होता है कि अजमेर आगमन पर अजमेर माली सैनी समाज की ओर से ज्योतिबा फूले सर्किल पर उनका स्वागत किया गया। समाज की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया है कि अजमेर माली बाहुल्य शहर है और मनरेगा जैसे जनहितकारी विषय की जिम्मेदारी अजमेर से जुड़े प्रतिनिधि को मिलना समाज के लिए गर्व का विषय है। साफ इषारा है कि आगे चल कर माली सैनी समाज की ओर से वैभव को अजमेर से चुनाव लडाए जाने की मांग की जाएगी। एक कयास यह भी है कि वैभव की नजर आगामी लोकसभा चुनाव पर हो, क्योंकि फिलवक्त अजमेर में कोई प्रबल दावेदार नहीं है।
सोमवार, 2 फ़रवरी 2026
जयपाल व भाटी में सुलह कैेसे हुई?
अजमेर शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष डॉ राजकुमार जयपाल व अजमेर दक्षिण के कांग्रेस प्रत्याशी रहे हेमंत भाटी के बीच सुलह हो गई है। बेषक अजमेर के राजनीतिक पन्ने पर अंकित इस ऐतिहासिक वाकये से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह है। माना जाता है कि कम से कम भाटी समर्थकों के टिकट तो सुरक्षित हो गए हैं। समझौते के वक्त भाटी के इस कथन पर कि लड कर देख लिया, अब लाड कर के देखेंगे, के निहितार्थ समझने की तमाम कोष्ज्ञिषें हो रही हैं, लेकिन अभी तक यह सवाल अनुत्तरित ही है कि वाकई हुआ क्या था? किसने पहल की? किसने हस्तक्षेप किया? समझौेते की मंजिल नींव की किस ईंट पर खडी की गई है? अंदरखाने हुए करार के मुख्य बिंदु क्या हैं? केवल अनुमान ही लगाए जा रहे हैं। कुछ का मानना है कि मुकदमे में राजीनामा तो एक बहाना है, असल कहानी दिृवपक्षीय लाभ के लिए लिखी गई है। कोई कह रहा है कि अपने समर्थकों के टिकट सुनिष्चित करने के लिए भाटी को मजबूर होना पडा। कुछ राजनीति पर्यवेक्षक आंक रहे हैं कि निगम चुनाव में जीत के लिए जयपाल को हाथ आगे बढाना मजबूरी हो गया। वरना अपेक्षित परिणाम न आने पर आगे की राजनीतिक या़त्रा पर विराम लग जाता। सवाल यह भी तैर रहा है कि क्या हाथ मिलाने से पहले भाटी ने सचिन पायलट की मंजूरी ली है? क्या यह धर्मेन्द्र सिंह राठौड की षकुनी चाल की उपज तो नहीं है? क्या केवल नगर निगम चुनाव के लिए ही हाथ मिलाए गए हैं, या फिर विधानसभा चुनाव का भी तानाबाना बुना गया है? कहीं सुलह की चादर के नीचे द्रोपदी कोली का राजनीतिक भविश्य तो नहीं दफन हो जाएगा? क्या यह तय हुआ है कि टिकट तो भाटी को मिलेगी और जयपाल सरकार आने पर एडीए के अध्यक्ष होंगे? इन सब के बीच अजीबोगरीब स्थिति सालों से खेमों में बंटे उन सिपाहियों की हो गई है, जो एक दूसरे के खिलाफ बाहें ताने रहते थे। ऐसे अनेक सवालों की अबाबीलें अजमेर के राजनीतिक आकाष्ज्ञ में उड रही हैं। एक ओर जहां जयपाल राजा बॉस के नाम से जाने जाते हैं, वहीं भाटी अपने राजाई मिजाज के कारण चर्चित हैं। दोनों कें चेहरों पर इठलाती भोली भाली मुस्कान भले ही सहज लगती हो, मगर हैं दोनों कूटनीतिज्ञ। बहरहाल, दूसरी ओर कुछ लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस में ऐसे समझौतों की लंबी फेहरिष्त है, मगर उनका हश्र क्या हुआ, ढाक के तान पात।
https://youtu.be/V0rmJnT8kZ4
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