मंगलवार, 6 मार्च 2012

बुरा न मानो होली है

लालफीताशाही
मीनाक्षी हूजा-इमारत कभी बुलंद थी
सुभाष गर्ग-रंगा सियार
अतुल शर्मा-बेबस
मंजू राजपाल-अकड़ अमचूर
राजेश निर्वाण-मुंह में राम
राजेश मीणा-टाइम पास
वीरभान अजवानी-प्रशासनिक रासासिंह
लोकेश सोनवाल-लौट के बुद्धू...
अजय सिंह-नया नया मुसलमान
मोहम्मद हनीफ-थोड़ी सी जो पी ली है
किशोर कुमार-मस्तमौला
जगदीश पुरोहित-रंगरूट
सी. आर. मीणा-छाती पे मूंग
मेघना चौधरी-मत पियो सा
पुष्पा सत्यानी-भोली, गजब की गोली
प्रिया भार्गव-बाल-बाल बची
सुरेश सिंधी-यहां मैं सुरक्षित हूं
मिरजू राम शर्मा-भोला भंडारी
मनोज सेठ-झगड़े की जड़
के.के. पाठक-किताब का कीड़ा
हरि शंकर गोयल-हाथी के दांत
सी.पी. कटारिया-सेटिंग मास्टर
सत्येन्द्र नामा-मिसफिट
निशु अग्निहोत्री-मैं आदमी हूं
प्यारे मोहन त्रिपाठी-धरती पकड़
राजेन्द्र गुप्ता-बोर्ड का भौंपू
मुकुल मिश्रा-बम बम भोले
सफेदपोश
सचिन पायलट-मीडिया मेरी जेब में
डॉ. प्रभा ठाकुर-कभी तो याद आती होगी
नसीम अख्तर-नसीब अख्तर
डॉ. रघु शर्मा-इज्जत बच गई
ब्रह्मदेव कुमावत-सुनता कौन है
औंकारसिंह लखावत-घूरे के दिन फिर ही गए
सुशील कंवर पलाड़ा-सरकार मेरी जेब में
कमल बाकोलिया-कभी तो समझ आएगी
अजीत सिंह राठौड़-शौकिया राजनीतिज्ञ
नरेन शहाणी भगत-जागृति मंच का प्रोडक्ट
प्रो. वासुदेव देवनानी-लटकता खंजर
अनिता भदेल-तेरा पीछा ना छोडूंगी
महेन्द्र सिंह गुर्जर-विरासत का आनंद
रामचन्द्र चौधरी-सोलह दूनी आठ
रासा सिंह रावत-लाइलाज
प्रो. सांवरलाल जाट-वसुंधरा का हनुमान
जसराज जयपाल-और लो पंगा
डॉ. श्रीगोपाल बाहेती-कहां गया गहलोत का जादू
भंवर सिंह पलाड़ा-है कोई माई का लाल
सोमरत्न आर्य-आठ-सोलह का पाना
डॉ. के. सी. चौधरी-चुनावी मेंढ़क
सत्यकिशोर सक्सैना-हमारे भी दिन थे
महेन्द्र सिंह रलावता-रलावता कांग्रेस
इंसाफ अली-चेला शक्कर निकला
धर्मेश जैन-मेरा दर्द न जाने कोय
धर्मेन्द्र गहलोत-वक्त वक्त का फेर
नवलराय बच्चानी-काश...फिर
ललित भाटी-धीरे धीरे रे मना
बाबूलाल सिंगारिया-कछुआ चाल
हाजी कयूम खान-गरीब नवाज का करम
सुरेन्द्र सिंह शेखावत-राजनीतिक वैश्य
राजकुमार जयपाल-क्लब का राजा
श्रीकिशन सोनगरा-हाशिये पर
पुखराज पहाडिय़ा-नेतागिरी का जोम
पूर्णाशंकर दशोरा-अब कौन पूछता है
राजेश टंडन-दिन लद गए
कुलदीप कपूर-राजनीति काफूर
अरविन्द यादव-छपास का रोग
तुलसी सोनी-अब पछवावत क्या होत है
प्रताप यादव-कभी तो लहर आएगी
प्रकाश गदिया-काश बाबा होते तो
महेश ओझा-अब कांई करूं
प्रमिला कौशिक-बुरे वक्त की दोस्त
डा. सुरेश गर्ग-बड़े बेआबरू हो कर निकले
नीरज जैन-उग्रवादी
हरिश मोतियानी-सब मेरे यहां आते हैं
सतीश बंसल-इससे तो कांगे्रस बेहतर थी
दीपक हासानी-राजनीति रास नहीं आई
देवेन्द्र सिंह शेखावत-त्रिशंकु
विजय नागौरा-पीए टू भगत
कैलाश झालीवाल-हम चौड़े गली संकड़ी
नौरत गूजर-तो पंगा मोल क्यों लिया
सुनिल मोतयानी-पेराशूट
ललित गूजर-साहब मेहरबान तो
महेन्द्र तंवर-हल्दी की गांठ
शैलेन्द्र अग्रवाल-सदाबहार
बिपिन बेसिल-यस सर
जयकिशन पारवानी-मेरे तो वासुदेव देवनानी
सोनम किन्नर-सिरफिरी सरकार
सुरजीत कपूर-बल नहीं गया
अशोक तेजवानी-फोकट में सलट लिए
गुलाम मुस्तफा-पकड़ बरकरार है
जे पी शर्मा-ये कहां आ गए
जोधा टेकचंदानी-अदद ट्रस्टी बनने की चाह
रतनलाल बाकोलिया-हम किसी से कम नहीं
कामना मिश्रा-कामना रह गई
नरेश राघानी-हार नहीं मानी है
भारती श्रीवास्तव-निगम की हीरोइन
वनिता जैमन-राजनीति में केवल गंदगी ही नहीं
जयंती तिवारी-और जाग गई किस्मत
कमला गोखरू-सपना कब पूरा होगा?
ललित जड़वाल-अब मैडम जो यहां नहीं हैं
सौरभ बजाड़-कलई उतर गई
भूपेन्द्र सिंह राठौड़-एमएलए की तैयारी
चंद्रभान खंजन-राजनीतिक दंपत्ति
राजेन्द्र नरचल-दोस्ती जिंदाबाद
रमेश सेनानी-खूंटे से बंधा हूं
जुल्फिकार चिश्ती-तूफान अली
श्रीमती मधु सिंह-फिर मांगूगी टिकट
अशोक मटाई-तेरा पीछा ना छोडूंगा
सुकेश कांकरिया-सेटिंग कब तक
एस.एफ. हसन चिश्ती-ख्वाजा का शुक्र
दिनेश शर्मा-किसकी फूंक पर
मुजफ्फर भारती-मंत्र मैं पढ़ता हूं...
सत्यनारायण गर्ग-चुगलखोर
छपास स्पेशलिस्ट
डी.बी. चौधरी-आमरण अध्यक्ष
रमेश अग्रवाल-नई दुकान
दौलत सिंह-ना काहू से दोस्ती
कंवल प्रकाश-देवनानी का सिरदर्द
जे.पी. गुप्ता-एक थे गुप्ता जी
नरेन्द्र राजगुरू-ईद के चांद
नरेन्द्र सिंह चौहान-घर का रईस
वीरेन्द्र आर्य-लौट के आऊंगा
सुरेन्द्र चतुर्वेदी-अभी तो मैं जवान हूं
राजेन्द्र शर्मा-दाढ़ी की रौनक
एस.पी. मित्तल-अमूल बटर
गिरधर तेजवानी-जिंदा जड़
आर. डी. कुवेरा-पत्रकारिता का पट्टा
संतोष गुप्ता-नौकरी करो भाई
ओम माथुर-मेरे तो डीबी साहब
राजेन्द्र गुंजल-कसक बाकी है
हरीश वर्यानी-माचिस
गोपाल सिंह लबाना-गंगा नहा लिए
ऋषिराज शर्मा-न्याय का डंडा
तिलोक जैन-तीन फीत कायम है
अशोक शर्मा-मस्तमौला
प्रेम आनंदकर-अटकना छोड़ दिया मैने
सुरेश कासलीवाल-काम के दम पर
अमित वाजपेयी-चाकरी काम आई
अरविन्द गर्ग-चिरांध
यशवंत भटनागर-भोला भंडारी
संजय माथुर-सब फ्रॉड हैं
सचिन मुद्गल-प्रतिबद्ध पत्रकार
प्रताप सनकत-टांग तो ऊपर है
राजेन्द्र गुप्ता-लो, मैं वापस आ गया
सुरेश लालवानी-बॉडी बिल्डर
अमित टंडन-चमचागिरी नहीं कर सकता
विक्रम चौधरी-सब छोड़ दिया
सुमन शर्मा-रौनक
राजेन्द्र याज्ञिक-पंडित जी, कहां हो
दिलीप मोरवाल-अस्पताल की नब्ज
मुकेश खंडेलवाल-आ गए ठिकाने
तीरथदास गोरानी-टाइम पास
देवेन्द्र सिंह-अब खुश हूं
शिव कुमार जांगीड़-की सेवा, पाया मेवा
भानुप्रताप गुर्जर-मेहनतकश
मधुलिका सिंह-जलवा बरकरार है
बलजीत सिंह-असली संपादक
संतोष खाचरियावास-अखबार तो हम निकालते हैं
निर्मल मिश्रा-छैल भंवर
क्षितिज गौड़-अंग्रेजी की टांग
गिरीश दाधीच-पता लगा दाल-रोटी का भाव
आरिफ कुरैशी-ख्वाजा का दीवाना
योगेश सारस्वत-मंजिल मिल ही गई
अनिल दुबे-गुरू घंटाल
रजनीश रोहिल्ला-अब टिक कर काम करूंगा
अजय गुप्ता-अल्लाह की गाय
रहमान खान-अरे, भई जान हो कहां
मोईन कादरी-तीन लोक से मथुरा न्यारी
रूपेन्द्र शर्मा-मौकू कोई ठोर नहीं
मनोज दाधीच-डायरेक्टर
अभिजीत दवे-ऊंचे रसूखात
जाकिर हुसैन-शामिल बाजा
मनवीर सिंह-मिर्ची
राजकुमार वर्मा-चले तो खूब
रईस खान-अल्लाह निगेहबान
राकेश भट्ट-पुष्कर नरेश
प्रियांक शर्मा-मुंबइया स्टाइल
अनिल माहेश्वरी-सीट के साथ
गजेन्द्र बोहरा-दाईपना छोड़ दिया
समंदर सिंह-यातायात महकमा जेब में
एन. के. जैन-विशेषांक का चस्का
विकास छाबड़ा-टूलिप जिंदाबाद
नवाब हिदायतुल्ला-सेटिंगबाज
संग्राम सिंह-सपनों का सौदागर
सुरेन्द्र जोशी-इसमें मेरा क्या दोष?
तिलक माथुर-पुराना चावल
अखिलेश शाह-सेठ बनाम पत्रकार
सुधीर मित्तल-रुतबा कायम है
बुधराज जैन-दुकानदार
संजय अग्रवाल-जाने माने पत्रकार
अमर सिंह-मैं कहां जाऊं
बालकिशन-मीठी छुर्री
दिनेश कुमार गर्ग-नारद मुनि
विजय शर्मा-उठाऊ चूल्हा
नरेन्द्र भारद्वाज-देखन में छोटे लगैं
अनुराग जैन-दो नाव में सवार
माधवी स्टीफन-नैन कटारी
हर्षिता शर्मा-यस सर
अंतिमा व्यास-बहन जी
कौशल जैन-दिन फिर गए
आशु-एक बेचारा
नरेश शर्मा-आपका नाम क्या है
आशुतोष-काम से मतलब
मुजफ्फर अली-अमीबा
याद हुसैन कुरैशी-कार्यवाहक ही सही
मधुसूदन चौहान-ठेकेदार
संतोष सोनी-घाघ
इन्द्र नटराज-एक जमाना था
महेश नटराज-जिंदगी कट ही जाएगी
मुकेश परिहार-एडीटर मेरी जेब में
सत्यनारायण झाला-क्या क्या करूं
दीपक शर्मा-हाउ आर यू
मोहन कुमावत-नौकरी जिंदाबाद
जय माखीजा-चुलबुला
मोहम्मद अली-हरफनमौला
बालकिशन झा-गिरगिट
अनिल-चल पड़ी
नवीन सोनवाल-अजमेर का प्रभुदेवा
नानक भाटिया-नानक दुखिया सब संसार
आलोक राठी-पत्रकारिता का रुतबा
अनिल गुप्ता-ठसके से
राजकुमार जोशी-शर्मा जी का भला हो
बद्रीश घिल्डियाल-पीए टू...
नारायण दास सिंधी-फैक्ट्री ऑफ जर्नलिस्ट
इत्यादि-इत्यादि
अरुणा रॉय-अन्ना जाए भाड़ में
कालीचरण खंडेलवाल-नोट धरे रह गए
सुनिल दत्त जैन-क्रीज से बाहर
सीताराम गोयल-चांदी का जूता
मनोज मित्तल-दिल में छुपा अरमान
जगदीश वच्छानी-साईं जिन चेई विया आहिन
किशन गुर्जर-फटे में टांग
जे. पी. दाधीच-सबसे बड़ा रुपैया
प्रो. बी. पी. सारस्वत-असली हम हैं
डॉ. लाल थदानी-राजनीति का तीतर
कमलेन्द्र झा-सारेगामापा
रासबिहारी गौड़-अजमेर का सिद्धू
रणजीत मलिक-कोलावेरी डी
अनन्त भटनागर-आधा तीतर, आधा बटेर
उमरदान लखावत-अंडर करंट
दशरथ सिंह सकराय-राजपूत ब्रिगेड
गोपाल गर्ग-मैं शायर तो नहीं
सूर्य प्रकाश गांधी-लेबल कायम है
कोसिनोक जैन-मैनेजमेंट फंडा
कीर्ति पाठक-अजमेर की अन्नी
प्रमिला सिंह-असली तो मैं हूं
प्रकाश जैन पाटनी-सर्वधर्म की दुकान
शंकर बन्ना-जो हम से टकराएगा
लाखन सिंह-हमारा बजाज
गोपाल बंजारा-ऊंची दुकान
जयबहादुर माथुर-बच्चों का सौदागर
उमेश चौरसिया-लिखना हम भी जानते हैं
सुनिल बुटानी-दूध का जला
वासुदेव माधानी-इच्छा दफ्न है
दिलीप पारीक-इन्हें चाहिए सिंकारा
प्रभु लौंगानी-प्रभु कहे सो सही
दौलत लौंगानी-खबरची
मोहन चेलानी-कामरेड
हरीश हिंगोरानी-इस बार नहीं छोडूंगा
महेन्द्र तीर्थानी-हर जगह हाजिर
हरि चंदनानी-नंगे से भगवान भी डरते हैं
मोहन तुल्सियानी-भाई साहब जिंदाबाद
महेश तेजवानी-साईं तेरा आसरा
राजकुमार लुधानी-एटीएम मशीन
बलराम हरलानी-घर फूंक तमाशा
भगवान कलवानी-समाजसेवा की बीमारी
मनोज आहूजा-कुमावत की परछाई
तेजू लौंगानी-देवनानी की पूंछ
प्रकाश जेठरा-बेनागा विज्ञप्ति

सोमवार, 5 मार्च 2012

भगत को फंसवा न दें यूआईटी के अफसर


जैसी कि आशंका थी, वही होता जा रहा है। अजमेर नगर सुधार न्यास के घाघ अफसर सदर नरेन शहाणी भगत की जानकारी में लाए बिना ही महत्वपूर्ण आदेश जारी कर रहे हैं। आखिरकार भगत को उन्हें कहना पड़ा कि मुझे बताया तो करो, क्या कर रहे हो। असल में भगत की जब नियुक्ति हुई थी तो यह धारणा आम थी कि चूंकि वे और राजनीतिकों की तरह तेज-तेर्रार नहीं हैं, इस कारण यूआईटी के अफसर उन्हें गाठेंगे नहीं। एक तो स्वभाव से सरल, ऊपर से यूआईटी के कानून-कायदों से अनभिज्ञ होने के कारण यह आशंका स्वाभाविक ही थी कि भगत को अपना कामकाज समझने में थोड़ा वक्त लगेगा। सब जानते हैं कि यूआईटी एक ऐसा महकमा है, जिसका शहर के शातिर भू माफियाओं से पड़ता है। इस कारण वहां के अफसर भी उतने की घाघ हैं। वरना भू माफिया शहर को बेच खाएं। कई जगह बेच कर खा भी गए हैं। यह बात दीगर है कि ऐसा अफसरों के बेवकूफ होने के कारण नहीं, बल्कि मिलीभगत या लापरवाही के कारण संभव हुआ। ऐसे शातिर दिमाग वालों की मंडी में भगत को दिक्कत आनी ही थी। उससे भी ज्यादा दिक्कत उनके अपने कांग्रेसी भाइयों से होने की आशंका रहती है, जो कि उनके न्यास अध्यक्ष बनने से नाखुश हैं। भगत के सामने सबसे पहली दिक्कत तो तब आई जब अधिकारियों ने जवाहर की नाडी, लोहागल व चंद्रवरायी नगर में तोडफ़ोड़ की। भाजपा विधायक श्रीमती अनिता भदेल ने तो हंगामा किया ही, खुद भगत की पार्टी के शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता ने भी जांच कमेटी गठित कर उन्हें परेशानी में डालने की कोशिश की। हालत ये हो गई कि तीन दिन तक तो भगत से कुछ कहते नहीं बना। वो तो अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट ने बुला कर रलावता को फटकार लगाई, तब जा कर कांग्रेसी एकजुट हुए। हाल ही भूखंड खरीद के लिए एनओसी पर रोक लगाने व पुरानी योजनाओं के भूखंडों से जुड़े आवेदन पत्रों पर मूल आवंटियों से शपथ पत्र लेने के मामले में भी यही हुआ कि भगत को कोई जानकारी दिए बिना ही कार्यवाही के आदेश जारी कर दिए गए। कुछ ऐसा ही कृषि भूमि नियमन में आवेदकों से नियमन शुल्क व विकास शुल्क की वसूली के लिए गठित समिति की सिफारिशों के बारे में उन्हें कुछ नहीं बताया गया, जबकि अखबारों में लंबी चौड़ी खबरें छप गईं। कुल मिला कर हालत ये हो गई कि पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार खेमे के पूर्व पार्षद रमेश सेनानी सहित कुछ कॉलोनाइजर्स ने भगत को घेर लिया, तब उनकी हालत देखने लायक थी। उनसे कुछ जवाब देते नहीं बना और बड़ी किरकिरी हुई। तब जा कर उन्हें समझ में आया कि अगर यूं ही अफसर अपने स्तर पर निर्णय करते रहे तो एक दिन वे बुरी तरह से फंस जाएंगे। अफसरों की इन हरकतों से परेशान हो कर उन्होंने उनसे कहा कि आखिर मुझे तो बताया करो कि कर क्या रहे हो। आम जनता को जवाब तो मुझे देना पड़ता है। आखिरकार जनप्रतिनिधि मैं हूं। सरकार को भी मुझ ही जवाब देना होगा, जिसने विश्वास करके मुझे इस पद पर बैठाया है। आशंका है कि भगत के लिए सबसे परेशानी तब आ सकती है, जब कि अफसर उनसे ऐसी फाइल पर दस्तखत करवा लेंगे, जिसको लेकर विवाद हो सकता है। हालांकि सुना है कि भगत फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं, क्योंकि उन्हें न केवल न्यास बनाम काजल की कोठरी में रह कर कालिख से बचना है, अपितु आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर पश्चिम का टिकट हासिल करने के लिए अच्छी परफोरमेंस भी देनी है। यद्यपि भगत सचिव पद पर पुष्पा सत्यानी को ले कर आए हैं, मगर बताते हैं वह भी कोई बहुत भोली-भाली नहीं हैं। देखना है उनकी भगत से पटरी बैठती है या नहीं।
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युवती की हत्या मात्र ट्रेलर, खौफनाक फिल्म का है इंतजार


आईडी प्रूफ के गेस्ट हाउस में ठहर कर एक युवक द्वारा अपने साथ पत्नी बता कर लाई गई युवती की हत्या कर फरार हो जाना साबित करता है न तो गेस्ट हाउस संचालक नियमों की पालना करने के प्रति गंभीर हैं और न ही पुलिस ने इससे पहले हुए एकाधिक मामलों से सबक लेते हुए अपने आप को मुस्तैद किया है। ज्ञातव्य है कि दरगाह इलाके में अंदरकोट पार्किंग के सामने नूरी हशमती मंजिल में गत दिवस एक जायरीन युवती की गला काटकर हत्या कर दी गई। और उसके साथ आया अज्ञात कातिल युवती की हत्या कर शव कमरे में बंद कर के फरार हो गया। कमरे में मिली वस्तुओं से हालांकि अंदाजा यही लगाया गया है कि युवती अहमदाबाद की हो सकती है, इस कारण पुलिस वहां तहकीकात करने गया है, मगर गेस्ट हाउस संचालक के इस युगल से आईडी प्रूफ न लिए जाने के कारण पुलिस की मशक्कत बढ़ गई है। मामले से यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि गेस्ट हाउस संचालक मुबारक ने घोर लापरवाही बरती। पुलिस के बार-बार चेताने पर कि आईडी प्रूफ के बिना किसी को न ठहरने दें, उसने युगल के आईडी प्रूफ बाद में देने की बात कहने पर शक नहीं किया। इससे जाहिर है कि गेस्ट हाउस संचालकों के केवल अपनी कमाई की चिंता है। न तो उन्हें कानून-कायदों की चिंता है और न ही अति संवेदनशील अजमेर शहर की सुरक्षा से कोई मतलब। आपको जानकारी में होगा कि इससे पहले भी बिना आईडी प्रूफ के होटल में ठहर कर एक दूल्हे ने खुदकशी कर ली थी। इस प्रकार के वायये होना साबित करता है कि मुंबई ब्लास्ट के मास्टर माइंड व देश में आतंकी हमले करने का षड्यंत्र रचने के आरोपी डेविड कॉलमेन हेडली से गच्चा खाने के बाद भी पुलिस ने सबक नहीं लिया है। भले ही पुलिस इस मामले के लिए गेस्ट हाउस संचालक मुबारक को ही दोषी ठहराए, मगर ऐसा तभी तो संभव हुआ है न कि पुलिस आईडी प्रूफ की अनिवार्यता का कानून लागू करवाने में विफल हो रही है। पुलिस की लापरवाही का यह आलम तब है, जब कि दरगाह में एक बार बम विस्फोट हो चुका है। बेंगलुरु सीरियल बम ब्लास्ट का मास्टर माइंड व इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकी उमर फारुख सहित कई अन्य संदिग्धों के बिना पहचान पत्र के ठहरने के सनसनीखेज खुलासे हो चुके हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि दरगाह और पुष्कर के कारण अजमेर एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल है और मेलों के अतिरिक्त भी यहां सालभर जायरीन व श्रद्धालुओं का आना जारी रहता है। जायरीन इतनी बड़ी तादात में आते हैं उन पर निगरानी रखना बेहद मुश्किल काम है। इसी का फायदा उठा कर आतंकी व संदिग्ध छुपने अथवा षड्यंत्र रचने के लिए यहां का रुख करते हैं। ऐसे अनेक मामले अब तक उजागर हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त मादक पदार्थों की तस्करी का भी अजमेर ट्रांजिट सेंटर बन चुका है। अनेक दरगाह व पुष्कर जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त धर्मस्थलों के अतिरिक्त पुष्कर स्थित यहूदी धर्मस्थल बेद खबाद को भी सदैव खतरा बना रहता है। यही वजह है कि सरकार ने यहां होटलों में ठहरने वालों पर निगरानी के लिए विशेष निर्देश दे कर आईडी प्रूफ हर हालत में लेने के आदेश दे रखे हैं। हालांकि समय-समय पर पुलिस जांच अभियान चलाती रहती है, मगर अमूमन तब या तो कोई मामला होता है या फिर राष्ट्रीय पर्व व त्यौहारों के दौरान देशभर में हाईअलर्ट जारी किया जाता है। सामान्य दिनों में कैसी जांच होती है, यह हाल ही गेस्ट हाउस में युवमी की हत्या कर दिए जाने से साफ हो गया है। हालांकि यह सही है कि सरकार के निर्देश का पालन करना होटल वालों के लिए बेहद जरूरी है, मगर उससे भी कहीं जिम्मेदारी पुलिस की बनती है, जिसके जिम्मे कानून की पालना करवाना है। ताजा मामले से स्पष्ट है कि होटल वालों में पुलिस के प्रति कोई खौफ नहीं है। ऐसा इसलिए भी संभव है कि पुलिस नियमों को तोडऩे वाले होटल मालिकों के खिलाफ सख्त कार्यवाही को अंजाम नहीं देती। आपको याद होगा कि हेडली भले ही अपनी पुष्कर यात्रा के दौरान और कोई गड़बड़ी नहीं कर पाया था, मगर उसके यहां आ कर चले जाने से खुफिया पुलिस की बड़ी किरकिरी हुई थी। तब खुद तत्कालीन पुलिस कप्तान हरिप्रसाद शर्मा ने कहा कि आईडी प्रूफ की अनिवार्यता के बारे में पहले ही होटल मालिकों को पाबंद कर दिया गया था, लेकिन वे ध्यान ही नहीं देते। तब सवाल उठा था कि यदि पुलिस को यहां के होटल वालों के रवैये का पता था तो उसने सख्ती क्यों नहीं बरती। तब यह तथ्य भी उभरा था कि पुलिस के पूरा स्टाफ नहीं है। इसी कारण विदेशियों पर तो थोड़ी-बहुत निगरानी जरूरी की जाती है, मगर आम लोगों के बारे में पुलिस को सभी होटलों के रजिस्टर जांचने का वक्त ही नहीं मिलता। तब पुलिस अधीक्षक का कहना था कि सरकार को अतिरिक्त पुलिस नफरी के लिए लिखा हुआ है, मगर उस पर क्या कार्यवाही हुई, आज तक पता नहीं लगा। यही आलम रहा तो किसी दिन कोई बड़ा हादसा आ कर यहां कानून-व्यवस्था की चूलें हिला कर चला जाएगा।
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शुक्रवार, 2 मार्च 2012

उसी विधानसभा में बेदाग हुए, जहां दाग लगाया गया था जैन पर


अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष व वरिष्ठ भाजपा नेता धर्मेश जैन ने राजस्थान विधानसभा के उसी सदन में अपने आप को पाक साफ साबित करवा दिया, जिसमें उनके बारे में बनी कथित विवादित सीडी लहराई गई थी। लहराई क्या गई, उस सीडी ने उनकी इज्जत ही मिट्टी में मिला दी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने दामन को पाक साफ रखने के चक्कर में जैन से इस्तीफा मांग लिया था। यानि पद भी गया और प्रतिष्ठा भी। ऐसे मामलों के लिए ही तो कहा जाता है कि माल भी गया और माजना भी।
असल में जैन को उस विवादित सीडी की वजह से पद व प्रतिष्ठा जाने का बड़ा मलाल है। वे अब तक उस अपमान को भूल नहीं पाए हैं। हालांकि पिछले साल जनवरी में ही सीआईडी सीबी, जयपुर के पुलिस अधीक्षक परिवाद की गृह विभाग के शासन उप सचिव को भेजी गई जांच रिपोर्ट में वे पूरी तरह से निर्दोष साबित हो चुके हैं और तब अखबारों में वह खबर सुर्खियों में छपी भी, मगर इससे भी उनको संतुष्टि नहीं हुई। वे चाहते थे कि उसी विधानसभा में यह खुलासा हो, जहां उनकी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई गई थी। और इसी कारण उन्होंने विधायक हरि सिंह रावत के जरिए विधानसभा में प्रश्न उठवा कर सरकार से जवाब मंगवाया। लगता है कि अब वे पूरी तरह से खुश हैं। कदाचित इस वजह से भी कि उन्हीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सामने सदन में उनको निर्दोष करार दिया गया, जिन्होंने उन पर थोड़ा भी भरोसा न करके तुरंत इस्तीफा मांग लिया। कम से कम इससे उन्हें अपनी गलती का अहसास तो होगा।
सरकार की ओर से दिए गए जवाब में एक बात जरूर खटकती है कि उसमें तत्कालीन कांग्रेस विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती का कोई जिक्र नहीं है, जबकि उन्हीं के विधानसभा में सीडी लहराने के बाद मामले ने तूल पकड़ा था। ज्ञातव्य है कि पूर्व में जांच रिपोर्ट उजागर होने पर जैन ने एक बयान जारी कर कहा था कि हालांकि सीआईडी सीबी ने सीडी बनाने वाले का पता लगाना असंभव माना है, लेकिन यह सवाल आज भी मुंह बाये खड़ा है कि विधानसभा के पटल पर रखी गई सीडी आखिर आई कहां से? सरकार से आग्रह है कि वह यह जांच कराए कि विधानसभा के में पेश की गई सीडी का मूल स्रोत क्या है? सरकार कांग्रेस के तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती से भी जवाब-तलब करे कि वे सीडी कहां से ले कर आए? कहीं इसमें वे स्वयं तो संलिप्त नहीं हैं? आज जब कि वह सीडी संदिग्ध करार दे दी गई है, वह कहां से आई, इसका जवाब देने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार हैं कांग्रेस के तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व अन्य विधायक, जिन्होंने बिना किसी ठोस आधार के विधानसभा की कार्यवाही को तुरंत रोक कर चर्चा करने का प्रस्ताव रखा। उन्हें मलाल है कि बिना किसी ठोस आधार पर सीडी प्रकरण को उछालने का परिणाम ये हुआ कि उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया और उनके द्वारा शुरू किए गए सारे विकास कार्य ठप हो गए, जिसके लिए अजमेर की जनता डॉ. बाहेती को कोस रही है।
बहरहाल, ताजा घटनाक्रम से एक सवाल तो यह उठता ही है कि आखिर अजमेर जिले के किसी भाजपा विधायक की बजाय राजसमंद जिले के भीम विधानसभा क्षेत्र के विधायक हरिसिंह रावत ने ही सवाल क्यों उठाया? जाहिर सी बात है कि खुद रावत की इसमें कोई रुचि नहीं रही होगी। जैन के कहने पर ही उन्होंने सवाल लगाया होगा। ऐसे में यह जिज्ञासा होना लाजिमी है कि क्या अजमेर जिले के भाजपा विधायकों को उन्होंने इस लायक नहीं समझा या फिर उन्होंने अनुरोध किया, मगर उन्होंने रुचि नहीं ली? कहीं ऐसा तो नहीं कि अजमेर के विधायकों ने इस कारण रुचि नहीं ली कि उन्हें जैन का निर्दोष साबित होना कुछ खास अच्छा नहीं लग रहा। स्वाभाविक सी बात है कि निर्दोष साबित होने के बाद जैन पूरे फॉर्म में हैं। वे एक बार फिर अजमेर की राजनीति में शिखर पर आना चाहते हैं। इसी सिलसिले में हाल ही उन्होंने 90 बी प्रकरण व जयपुर जिले के मावठा तालाब को बीसलपुर के पानी से भरने के मुद्दे पर अपने नंबर बढ़ाए हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में तो दोवदारी का मानस रखते ही थे, संभव है इस बार भी कुछ ऐसा ही विचार हो?
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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

...तो क्या अखबार में खबर छपने पर ही जागते हैं विधायक?


जयपुर के मावठा तालाब को बीसलपुर के पानी से भरने पर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन के ऐतराज करने पर कांग्रेस विचारधारा के सोनम किन्नर ने तो सियापा किया ही, अजमेर के दोनों भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल भी जाग गए हैं। असल में यह अजमेर जिले के सभी विधायकों की जिम्मेदारी है कि वे इस मामले पर एकजुट हो कर आगे आएं, मगर कांग्रेसी यदि पर्यटन मंत्री बीना काक से घबराते हों तो कम से कम भाजपा के विधायकों से तो उम्मीद की जा सकती है। जैन का बयान छपने के बाद भी जब देवनानी व अनिता चुप रहे तो आश्चर्य हुआ कि वे कैसे पीछे रह गए। हर छोटे-मोटे मुद्दे पर विज्ञप्ति जारी करने वाले इतने बड़े मुद्दे पर कैसे चूक गए? संभावना यही थी या तो वे विधानसभा सत्र के कारण व्यस्त होंगे या फिर सीधे विधानसभा में ही मामला उठाएंगे। ऐसा ही हुआ। देवनानी ने जहां विधानसभा अध्यक्ष के सामने 295 के तहत अर्जी लगाने की बात कही है, वहीं अनिता ने भी विरोध में बयान जारी किया है। बड़ी अच्छी बात है। मगर अहम सवाल ये है कि हमारे नेता सांप के चले जाने पर ही लाठी क्यों पीटते हैं? वस्तुत: जब राजस्थान पत्रिका में खबर छपी, तब जा कर हमारे नेताओं का होश आया कि अजमेर का हक मार कर मावठा तालाब भर दिया गया है। इससे साफ जाहिर है कि उन्हें पता ही नहीं लगा कि कब पानी ले लिया गया। इससे साबित होता है कि वे अपनी ओर से कोई खैर-खबर नहीं रखते। जब मीडिया जगाता है, तब जा कर जागते हैं। इस मामले में भी देवनानी व भदेल ने कोई अपनी ओर से पहल नहीं की है। वो तो चूंकि खबर राजस्थान पत्रिका में छपी थी और उसी पर धर्मेश जैन बोले तो वह पत्रिका का फॉलोअप बन गया। स्वाभाविक सी बात है कि संवाददाता ने उनसे संपर्क किया तो दोनों ने बयान दे दिया। अगर स्वतंत्र रूप से बयान जारी करते तो और अखबारों में भी बयान छपता। वैसे सच्चाई ये है कि ऐसे बयानों से होता जाता कुछ नहीं है। बस यह पता लगता रहता है कि हमारे नेता सोये हुए नहीं हैं। खैर, अब चूंकि वे सियापा कर रहे हैं तो उसका स्वागत किया ही जाना चाहिए। मगर एक सवाल आज भी मुंह बाये खड़ा है कि कभी अकेले धर्मेश जैन और कभी पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती, मौजूदा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल के या फिर किसी और के इस प्रकार सियापा करने से होता क्या है? विशेष रूप से भाजपा नेताओं का यह सवाल कभी पीछा नहीं छोड़ेगा, जब उनकी ही पार्टी की सरकार ने अजमेर के हक का पानी जयपुर को देने का फैसला किया था, तब क्या कर रहे थे? यह एक कड़वी सच्चाई है कि पिछली भाजपा सरकार के दौरान अजमेर जिले की भिनाय विधानसभा सीट के विधायक प्रो. सांवरलाल जाट ने जलदाय मंत्री रहते हुए बीसलपुर से जयपुर को पानी देने का फैसला होने दिया था। खैर, देखते हैं कि अब जब मावठा तालाब भरा जा चुका है तो देवनानी के लाठी भांजने से होता क्या है?
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