सोमवार, 7 मई 2012

प्रदेश भाजपा में घमासान, अजमेर के नेता किंकर्तव्यविमूढ़

मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के कोपभवन में बैठने से प्रदेश भाजपा में घमासान मचा हुआ है और उसकी धमक से दिल्ली हाइकमान भी हिला हुआ है, अजमेर के भाजपाई किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि क्या करें, क्या न करें, किधर जाएं, किधर नहीं?
असल में अजमेर भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गढ़ रहा है। अधिसंख्य नेता या तो संघ पृष्ठभूमि से हैं अथवा किसी न किसी रूप में संघ से जुड़े हुए हैं। कुछ एक नेताओं को छोड़ कर सीधे तौर पर उनका जुड़ाव वसुंधरा राजे से नहीं है। बड़े नेताओं में अकेले पूर्व जलदाय मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट हैं, जो कि मुखर हो कर सामने आए हैं और उन्होंने बाकायदा किसान मोर्चा के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया है। यहां उल्लेखनीय है कि जाट संघ पृष्ठभूमि से नहीं हैं और उनकी गिनती वसुंधरा राजे के खास सिपहसालारों में होती है। रहा सवाल विधायकों का तो अजमेर जिले में तीन भाजपा विधायक हैं। सर्वविदित है कि प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल संघ पृष्ठभूमि से हैं, इस कारण उनके खुल कर वसुंधरा राजे के साथ आने की उम्मीद भी नहीं है। हालांकि कुछ समाचार पत्रों में यह जानकारी आई है कि अनिता भदेल व शंकर सिंह रावत इस्तीफा सौंपने वालों में शामिल हैं, मगर इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही। उलटे भाजपाई तो चौंक रहे हैं कि अनिता भदेल ने कैसे इस्तीफा दे दिया। देवनानी के बारे में भी कुछ पता नहीं है। जयपुर से आ रही साठ विधायकों के इस्तीफा देने की खबरों से अंदेशा होता है कि कदाचित वसुंधरा का पलड़ा भारी होने के चलते अजमेर के विधायकों ने भी गुपचुप साइन कर दिए हों, क्योंकि बाद में अगर वसुंधरा को फ्री हैंड मिल गया तो उनको टिकट लेने में दिक्कत आएगी। जहां तक ब्यावर के विधायक शंकरसिंह रावत का सवाल है, उनके यह कहने पर कि उनसे वसुंधरा जी ने इस्तीफा मांगा नहीं है, मांगेंगी तो दे देंगे, साफ है कि वे किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। अगर इस्तीफा दे भी दिया है तो खुल कर नहीं बोल रहे।
पार्टी नेताओं की बात करें तो प्रदेश उपाध्यक्ष औंकारसिंह लखावत प्रदेशाध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी खेमे के माने जाते हैं, इस कारण उन्होंने चुप्पी साध ली है। शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत की ढुलमुल नीति से सभी वाकिफ हैं। खुद का पल्लू झाडऩे के लिए उन्होंने यह कह दिया कि पार्टी के वरिष्ठ नेता मंथन कर रहे हैं। अलबत्ता उन्होंने वसुंधरा की महत्ता को जरूर स्वीकार किया है, जो कि साबित करता है कि वे ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर वाली नीति पर चल रहे हैं। इसी प्रकार विहिप से जुड़े प्रदेश भाजपा शिक्षा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष प्रो. बी.पी. सारस्वत ने भले ही यह कह दिया हो कि वे मेडम के साथ खड़े हैं, मगर वे कितने साथ हैं, इसका अनुमान उनके यह कहने से लगता है कि पार्टी नेताओं को इस्तीफा देने की आवश्यकता नहीं है। उधर देहात भाजपा अध्यक्ष नवीन शर्मा ने जरूर खुल कर कह दिया कि उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया है और पार्टी के अंदर समस्या का हल निकाला जा रहा है। ज्ञातव्य है कि उनका प्रो. जाट से छत्तीस का आंकड़ा है, इस कारण वसुंधरा के साथ जाने की संभावना बनती ही नहीं है। नगर निगम पार्षद व भाजयुमो के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नीरज जैन भी देवनानी के करीबी और संघ के निकट हैं, इस कारण उन्होंने भी यह कह कर कि वे राजस्थान से बाहर हैं, खुद को बचाने की कोशिश की है। मौजूदा संचार प्रचार युग में कोई यह कहे कि उन्हें कुछ पता नहीं है, अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे कोई टिप्पणी करने से क्यों बच रहे हैं। निचले स्तर पर जरूर कुछ वसुंधरा के साथ तो कुछ संघ के साथ हैं, मगर वे किसी विवाद में नहीं पडऩा चाहते। पता नहीं ऊंट किस करवट बैठे या काहे को आइटेंटिफाइड हों, पार्टी के साथ तो हैं ही।
ताजा घमासान में उन नेताओं को परेशानी ज्यादा है, जो कि आगामी विधानसभा चुनाव में दावेदारी करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अगर किसी एक पक्ष के साथ रहे तो बाद में दिक्कत आएगी, इस कारण वे टकटकी लगा कर देख रहे हैं कि देखें क्या होता है। रहा आम कार्यकर्ता सवाल, तो वह बेहद दुखी है कि पार्टी में ये क्या हो रहा है? आम जनता से वोट मांगने तो उन्हें ही जाना पड़ता है, मतदाता को क्या मुंह दिखाएंगे? उन्हें तो पार्टी के साथ रहना है, फिर चाहे वसुंधरा के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए या पार्टी के बैनर पर।

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

किरण और कटारिया की जंग काफी पुरानी है

लोकसभा चुनाव में किरण को निपटाने के लिए आया था एक परचा
हाल ही सुर्खियों में आई भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव व राजसमंद विधायक श्रीमती किरण माहेश्वरी व पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया की जंग काफी पुरानी है। जब किरण माहेश्वरी अजमेर से लोकसभा का चुनाव लडऩे आई थीं, तब एक पर्चा किरण को निपटाने को अजमेर में बंटा था। जिले के गिने-चुने भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को ही बारे में पता था। हालांकि यह परचा दबा दिया गया, लेकिन यह दैनिक न्याय सबके लिए के हाथ आ गया था। चर्चा ये थी कि इस परचे के पीछे पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया का हाथ था। तब भी यही बताया गया था कि उदयपुर में भाजपा कटारिया व किरण की लॉबियों में बंटी हुई है। दोनों नेताओं में छत्तीस का आंकड़ा है। ऐसे में किरण के चुनाव लडऩे को अजमेर आने पर कटारिया अथवा उनकी लॉबी के कोई नेता स्थानीय भाजपा नेताओं को यह बताना चाहते थे कि किरण की असलियत क्या है।
आइये, देखते हैं कि उस परचे में लिखा क्या था-छह माह पहले ही किरण माहेश्वरी ने राजसमंद विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं के सामने पांच साल तक नेक सेवा करने की वचनबद्धता के साथ सौगंध खाकर व करोड़ों रुपए खर्च कर चुनाव जीता था, लेकिन छह माह बाद ही उन्हें धोखा दे दिया।
इसमें अजमेर के भाजपा नेताओं को ललकारते हुए लिखा गया है कि क्या अजमेर में लोकसभा सदस्य बनने की क्षमता किसी भी भाजपा कार्यकर्ता में नहीं है, लेकिन केन्द्र की नजर तो आप पर है, यानि किरण पर है, सब कार्यकर्ताओं का हक मार दिया। अजमेर का मतदाता शिक्षित है। वह पैसे से नहीं बिकेगा। पैसा हजम-वोट नहीं। चलो बेईमानी से एकत्र बीस-पच्चीस करोड़ जनता तक तो पहुंचेंगे।
परचे में लिखा है कि विधायक बनने के बाद राजसमंद से किरण ने जिला परिषद के प्रमुख के उपचुनाव में जीवनभर जनसंघ व भाजपा के लिए खपने वाले नंदलाल सिंघली को अनदेखा करके आपने विश्वस्त वोटों को कांग्रेस के उम्मीदवार को दिला कर कांगे्रसी जिला प्रमुख बना दिया और भाजपा के साथ गद्दारी की। इसमें लिखा है कि जब किरण माहेश्वरी तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष गुलाबचंद कटारिया की मेहरबानी से भाजपा के महिला मोर्चे की अध्यक्ष बनीं तो जयपुर के स्विन एंड स्माइल रेस्टोरेंट की मालकिन मिन्नी सिद्धू उनकी खास महामंत्री थी। किरण का अधिकांश समय रेस्टोरेंट पर ही बीतता था। यहां महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ाने की पाठशाला चलाई गई थी। इस पाठशाला के प्रमोटर एस.एन. गुप्ता थे। परचे में लिखा है कि तरणताल में जल क्रीड़ा की जाती थी। मिन्नी सिद्धू पर दलाली के आरोप में मुकदमा चल रहा है। उसने उस पाठशाला में आने वाले स्त्री-पुरुषों के नाम उजागर किए हैं, यहां लिखेंगे तो भाजपा में भूचाल आ जाएगा। उदयपुर में कार्यकर्ता जानते हैं कि किरण नई-नई सखियां बना कर रखती हैं। इसमें लिखा था कि पिछले चार साल में किरण ने फर्जी दस्तखतों से भाई साहब कटारिया जी की छवि बिगाडऩे के लिए मनगढ़ंत आक्षेप वाले पत्र प्रदेश व देश के नेताओं को भेजने का रिकार्ड बनाया है। उसी शैली में यह पत्र आपको भिजवाया जा रहा है, ताकि आपकी बॉडी लैंग्वेज के पीछे छिपे निहायत खतरनाक षड्यंत्रकारी फेस की वास्तविकता सब जान सकें।
इसमें लिखा है कि किरण को राजनीति में जमीन मुहैया कराने की भूल तो भाई साहब ने ही किया था। उन्होंने जनसंघ काल से ही सक्रिय रही सारी महिलाओं की वरिष्ठता दरकिनार कर आपकी खूबसूरती की योग्यता को पैमाना बना कर नगर परिषद का सभापति बनवाया था। सभापति बनने से पहले आपकी माली हालत खस्ता थी और सभापति बनते ही माली हालत ठीक करने के एजेंडे पर चलना चालू कर दिया। सभापति बनने से पहले आपके पति एक उद्योगपति के यहां नौकरी करते थे और आर्थिक अभावों में गबन कर बैठे, उसका पुलिस केस भी बना। यह तो अच्छा हुआ कि आप सभापति बन गईं और अपने प्रभाव से उस केस का रफा-दफा करवा दिया, नहीं जेल जाने की नौबत आ जाती। उसके बाद भी आपके पति ने सीए के रूप में व्यावसायिक बेईमानी की, उसका भी केस बना ओर हिरासत में जाना पड़ा।
आपके सभापति काल में भ्रष्टाचारों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आपने निर्माण कार्यों हेतु परंपरागत रूप से सभापति को मिलने वाले डेढ़ प्रतिशत को बढ़ा कर दो से तीन प्रतिशत कर दिया। परिषद में खड़े दर्जनों जंगी पेड़ों कटवा कर वन कानून का उल्लंघन किया। देबारी द्वार के निर्माण हेतु आबंटित कुलियां राशि आठ लाख छासठ हजार रुपयों को नींव भरने में खर्च करवा कर बहुत भारी कमीशन खाया। इस मामले की जांच हुई, लेकिन आपने दबवा दिया। हिरण मगरी स्थिति विद्या निकेतन परिसर में गड्ढों को भरवाने के लिए मलबा डलवाया। उसमें ट्रक के 175 ट्रिप्स अध्यापक गिने, आपने रिश्वत खा कर 230 ट्रिप्स का चुकारा करवा दिया। आपने अपनी मां के नाम पर बंपर खरीद कर परिषद में ही ठेके पर लगा दिए। जांच में गड़बडिय़ां सामने आर्इं। स्वायत्त शासन विभाग के एक सेवानिवृत्त भ्रष्ट अधिकारी गुलाबसिंह को विभाग की स्वीकृति के बिना ही विशेष अधिकारी बना दिया। उस पर कई आरोप लगे तो उसको भगा दिया। आपके भ्रष्टाचार के विरुद्ध पार्षद अजय कुशवाहा आमरण अनशन पर बैठे। इस फाइलें जयपुर मंगवा ली गर्इं। आप सौभाग्यशाली रहीं कि इसके बाद कांग्रेस शासन में स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल बने, जो स्वभाव से महिलाओं के प्रति बड़े उदार हैं। आपकी बॉडी लैंग्वेज से सभी फाइलों को निपटारा हो गया।
आपने विदेश यात्रा के लाखों रुपए नगर परिषद से उठाए, जबकि सारी यात्रा का खर्च अमरीका में आमंत्रित करने वाले मेजबानों ने उठाया था। जांच में मेजबानों का सहयोग न मिलने पर जांच बंद कर दी गई। दी महिला समृद्धि अरबन को-ऑपरेटिव बैंक की आप अध्यक्ष थीं। उसमें गड़बडिय़ों की जांच अपने ही पति को ऑडिट की जिम्मेदारी दे दी। आपके पांच साल के सभापति कार्यकाल में दौरान किए कारनामों से उदयपुर के अखबार भरे रहे। इस पर आपको पद से हटाने पर विचार भी हुआ। शहर भाजपा अध्यक्ष मदनलाल मूंदड़ा की ओर बुलाई गई बैठक में बाईस पार्षदों ने आपकी कड़ी आलोचना की। केवल पांच पार्षद ही आपके पक्ष में रहे। इस पर बड़े नेताओं ने आपको फटकार लगाई। आप फूट-फूट कर रो पड़ीं। आपके खिलाफ पच्चीस पार्षदों ने प्रदेश अध्यक्ष रघुवीर सिंह कौशल को ज्ञापन दिया था। विधायक शिवकिशोर सनाढ्य ने आपका बचाव किया। उद्योगपतियों ने भी आपके खिलाफ उप मुख्यमंत्री हरिशंकर भाभड़ा को ज्ञापन दिया था।
आपका असली रूप तो पिछले चुनाव में ही सामने आ गया था। विधानसभा टिकट वितरण के दौर में आपने स्व. प्रमोद महाजन के जरिए सभी तौर तरीकों से कोशिश की कि भाई साहब बड़ी सादड़ी से चुनाव लड़ें। आप उदयपुर से चुनाव लडऩा चाहती थीं। आपने वसुंधरा राजे की परिवर्तन यात्रा के दौरान समय व स्थान के अनुरूप वस्त्र भी तैयार करवाए, ताकि बाद में आपको मंत्री पद मिल जाए, लेकिन भई साहब की संघ में मजबूत पकड़ के कारण आपकी पार नहीं पड़ी।
इस परचे से ही स्पष्ट है कि यह किरण के विरोधी और कटारिया के चहेते ने लिखा है। कानाफूसी है कि भिजवाया कटारिया जी ने ही था। कटारिया जी के ही किसी चेले ने यह करतूत की थी, क्योंकि इसमें साफ तौर पर कटारिया जी की पैरवी की गई है और किरण को निपटाया गया है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

बुधवार, 2 मई 2012

कल के अछूत बाबो सा अब पूजनीय कैसे हो गए?

संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते बाबोसा के दोहित्र अभिमन्यू सिहं
ये दुनिया भी अजीब है। कई बार जीते जी किसी शख्स की दो कौड़ी की इज्जत कर देती है और मरने के बाद पूजने लग जाती है। कभी राजस्थान के एक मात्र सिंह के नाम से अलंकृत पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत जब उपराष्ट्रपति पद से निवृत्त हो कर प्रदेश में लौटे तो भाजपा में ऐसा माहौल बना दिया गया था, मानो वे कोई अनजान प्राणी हैं, जिनके लिए इस प्रदेश में कोई जगह ही नहीं है। इसे यूं भी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक वक्त ऐसा भी आया, जब राजस्थान का यह शेर अपने ही प्रदेश में बेगाना करार दे दिया गया था।
अजमेर वासी भलीभांति जानते हैं कि जब वे दिल्ली से लौट कर दो बार अजमेर आए तो उनकी अगुवानी करने को चंद दिलेर भाजपा नेता ही साहस जुटा पाए थे। शेखावत जी की भतीजी संतोष कंवर शेखावत, युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा और पूर्व मनोनीत पार्षद सत्यनारायण गर्ग सहित चंद नेता ही उनका स्वागत करने पहुंचे। अधिसंख्य भाजपा नेता और दोनों तत्कालीन विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल ने उनसे दूरी ही बनाए रखी। वजह थी मात्र ये कि अगर वे शेखावत से मिलने गए तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया नाराज हो जाएंगी। पूरे प्रदेश के भाजपाइयों में खौफ था कि वर्षों तक पार्टी की सेवा करने वाले वरिष्ठ नेताओं को खंडहर करार दे कर हाशिये पर धकेल देने वाली वसु मैडम अगर खफा हो गईं तो वे कहीं के नहीं रहेंगे। असल में वे नहीं चाहतीं थीं कि शेखावत जी की परिवार शृंखला राजनीति में वजूद कायम कर पाए। इसी कारण शेखावत जी के जवांई नरपत सिंह राजवी को भी पीछे धकेलने की उन्होंने भरसक कोशिश की।
मगर अब समय बदल गया है। स्व. शेखावत की द्वितीय पुण्यतिथि के अवसर पर आगामी मंगलवार दिनांक 15 मई 2012 को प्रात: 10.00 बजे उनके पैतृक गांव खाचरियावास जिला सीकर में उनकी आदमकद प्रतिमा लगाने के समारोह में न केवल पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा भाग लेंगी, अपितु प्रदेश सहित अजमेर के विधायक, पदाधिकारी व कार्यकर्ता भी शिरकत करेंगे। इसकी जानकारी स्वर्गीय शेखावत के दोहित्र अभिमन्यु सिंह राजवी ने एक संवाददाता सम्मेलन में दी, वह भी भाजपा नेताओं रासासिंह रावत, अजित सिंह राठौड़, सलावत खान, अरविन्द यादव, विधायक अनिता भदेल आदि की मौजूदगी में दी।
यह पहला मौका नहीं कि स्वर्गीय शेखावत को मरणोपरांत सम्मान दिया जा रहा है। पिछले साल 15 मई को भारतीय जनता पार्टी शहर जिला अजमेर ने स्वर्गीय शेखावत को पहली पुण्यतिथि पर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। उसमें भी अधिसंख्य भाजपा नेता शरीक हुए थे। प्रवक्ता व वरिष्ठ उपाध्यक्ष अरविंद यादव की ओर से जारी भाजपा की अधिकृत विज्ञप्ति में बाबो सा शेखावत जी के नाम के साथ भारतीय जनसंघ और भाजपा के संस्थापक सदस्य अलंकार भी जोड़े गए थे।
बेशक स्वर्गीय शेखावत न केवल भाजपाइयों के लिए अपितु पूरे प्रदेश के लिए सम्मानीय हैं। मगर सवाल ये है कि क्या आज श्रद्धा के पात्र ये वही शेखावत जी हैं, जिन्हें उनके जीते जी अजमेर आने पर किसी ने भाव नहीं दिया था। कैसी विडंबना। कल के अछूत बाबो सा आज अचानक पूजनीय कैसे हो गए? साफ है कि जीते जी उनसे वसुंधरा को खतरा था, मगर अब नहीं। उलटे अब तो उन्हें पूजने पर पूरे एक समुदाय के वोट हासिल होंगे।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
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जश्नेमिलादुन्नबी में मंच पर पायलट की मौजूदगी पर सवाल

अजमेर। पुष्कर रोड स्थित विश्राम स्थली पर गत दिवस आयोजित जश्ने मिलादुन्नबी में केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट के शिरकत कर मंच पर मौजूद होने पर दबे स्वर में सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि खुल कर कोई नहीं बोल रहा है, मगर भीतर ही भीतर इसकी आलोचना हो रही है।
असल में जश्ने मिलादुन्नबी की आयोजन समिति को 2009 में इसके गठन के समय मुस्लिम कांग्रेसी नेताओं के इसमें शामिल होने से यह आभास हो गया था कि भविष्य में इस धार्मिक कार्यक्रम में किसी तरह की सियासत हो सकती है, लिहाजा उसी समय सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि इस धार्मिक आयोजन में किसी भी तरह की सियासत से परहेज रखा जाएगा और आयोजनकर्ता कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार के लिए जारी अपने पोस्टर बेनरों में लगातार इस सूचना को प्रकाशित कर अपनी इस प्रतिबद्धता पर कायम रहेंगे और जश्न को किसी भी राजनीतिक गतिविधि से दूर ही रखा जाएगा।
हुआ यूं कि गत शुक्रवार को विश्राम स्थली पर जश्न मिलादुन्नबी का शानदार आयोजन हो रहा था और जिलेभर से लगभग 15 हजार मुसलमानों का मजमा इस धार्मिक आयोजन में शिरकत के लिये यहां मौजूद था। विश्राम स्थल पर माहौल पूरी तरह धार्मिक रंग में सराबोर था। नातिया कलामों से फिजाओं में रूहानियत की खुशबू की महक मे आशिके रसूल झूम रहे थे कि अचानक सायरन बजाते हुई पुलिस की जीप के साथ लाल बत्तियों की गाडिय़ों की लम्बी कतार ने विश्राम स्थल में प्रवेश किया और मंच के पास जाकर रुक गई। वहां मौजूद लोग और आयोजन समिति के कार्यकर्ता माजरा समझ पाते कि पायलट पूरे लवाजमे के साथ मंच पर पहुंच गए। उनके साथ मेयर कमल बाकोलिया, यू.आई.टी. चेयरमेन नरेन शाहनी भगत, शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता व देहात कांग्रेस के उपाध्यक्ष हाजी इंसाफ अली सहित कई कांग्रेसी नेता मंच पर चढ़ गए। बताया जाता है कि लवाजमे के साथ आईं शिक्षा राज्य मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ भी मंच पर जा रही थीं, मगर वहां मौजूद कमेटी कार्यकर्ताओं ने उन्हें मंच पर जाने से रोक दिया। उनका तर्क था कि मुसलमानों के धार्मिक कार्यक्रमों में मर्दों के बीच औरतों के बैठने की कोई परंपरा नहीं है। वहां मौजूद गंज थाना प्रभारी रविन्द्र यादव ने मामले में हस्तक्षेप की कोशिश की मगर आयोजकों ने कार्यक्रम धार्मिक होने का हवाला देकर उन्हें चुप कर दिया। काफी बहस और जद्दोजहद के बाद आयोजन समिति के कार्यकर्ता इस बात पर राजी हुए कि नसीम अख्तर का स्वागत मंच के नीचे होगा। आखिरकार शिक्षा राज्यमंत्री का मंच के नीचे कार्यक्रम के संयोजक मोहम्मद शाकिर और जुल्फिकार चिश्ती ने स्वागत किया। मंच पर अंजुमन के सदर सैयद हसामुद्दीन नियाजी ने पायलट को शाल उढ़ाया।
इस पूरे घटनाक्रम से वहां मौजूद लोगों में नाराजगी देखी गई। मुस्लिम धर्मावलम्बी इस बात के लिये खफा थे कि सियासी लोगों को मजहबी प्रोग्राम में लाकर मंच पर बैठाना किसी ऐतबार से सही नहीं है। यह आलिमे दीन और इस्लामी विद्वानों का अपमान है, क्योंकि इस तरह के आयोजनों में मंच पर बैठना सिर्फ उनका अधिकार है।
इस सिलसिले में लोगों का मानना है कि पायलट सहित अन्य नेताओं को भले ही मजहबी रवायतों का पता न हो, मगर कम से कम इंसाफ अली तो पता था ही। उन्हें ध्यान रखना चाहिए था कि जलसे को सियासत का रंग न हासिल हो जाए। आयोजन समिति के कार्यकर्ताओं में इस बात की भी कानाफूसी है कि आयोजन समिति को विश्वास लिए बिना ही पायलट को मंच पर ले आया गया।
-तेजवानी गिरधर
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