रविवार, 15 जून 2025

छोटा सा गांव टहला बना शक्तिकेन्द्र

 मातृभूमि की अनूठी पूजा की औंकार सिंह लखावत ने

अजमेर के निकटवर्ती नागौर जिले का छोटा सा टहला गांव। गत दिनों चहल-पहल के आगोश में था। प्रदेश भर के छोटे-बडे नेताओं की आवाजाही से आबाद। एक जागृत शक्ति केन्द्र का आभास। मौका था राजस्थान धरोहर संरक्षण प्राधिकरण के अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत की धर्म पत्नी के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करने का। दिनभर श्रद्धालुओं का तांता। आवभगत में कोई कमी नहीं। हर एक को आते ही पानी की बोतल। तुरंत बाद चाय की प्याली। भीषण गर्मी से निजात दिलाने के लिए दो बडे कूलर। लखावत बैठक के एक कोने में मुड्डे पर बैठे हुए दिखाई देते हैं। शांत, अविचल। धीर-गंभीर चहरे के भीतर से झांकता जीवनसाथी के विछोह का दर्द। हर खास को अपने पास सोफे पर बिठाते हैं। सुनते सबकी हैं, खुद चंद शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। पूरे बाहर दिन सुबह से लेकर शाम तक लगातार बैठना कितना कठिन है, यह वे ही समझ सकते हैं। कौतुहल होता है कि वे चाहते तो शोक बैठक अपनी कर्मस्थली अजमेर में भी रख सकते थे, जहां कहीं अधिक गुना लोग संवेदना व्यक्त करने आते, मगर उन्होंने इसके लिए चुना अपनी मातृभूमि को। कदाचित धर्मपत्नी की मृत्युपूर्व इच्छानुसार या पारिवारिक परंपरा के निर्वहन की खातिर। और उससे भी अधिक जन्म देने वाली भूमि की पूजा की खातिर। भाव भंगिमा में मातृभूमि के प्रति समर्पण की संतुष्टि साफ झलकती है। कुछ इस तरह जताया आभारः-

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शुक्रवार, 6 जून 2025

लंबी राजनीतिक यात्रा के बाद बी पी सारस्वत को मिला यथोचित सम्मान

अजमेर जिले में लंबी राजनीतिक यात्रा में अनेक उतार-चढाव वाले पडावों से गुजरने के बाद अंततः प्रो. भगवती प्रसाद सारस्वत को यथोचित सम्मान मिल गया। उन्हें कोटा विश्वविद्यालय का कुलगुरू बनाया गया है। वे महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के पूर्व कॉमर्स विभागाध्यक्ष व पूर्व डीन रहे हैं। हालांकि उनकी मनोकामना विधायक अथवा सांसद बनने की रही, मगर जिले के जातिगत समीकरणों की मजबूरी के चलते बहुत कवायद के बाद भी ऐसा हो नहीं पाया। इस दरम्यान पार्टी को जिलेभर में मजबूत करने का दायित्व निभाया, मगर प्रदेश भाजपा के अंदरूनी पेचोखम इतने उलझे रहे कि पात्रता के बाद भी उन्हें कभी टिकट नहीं मिल पाया। अब जा कर उनकी शैक्षिक योग्यताओं का प्रतिफलन कुलगुरू के रूप में घटित हुआ है।

जब उन्हें देहात जिला भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई तो यह माना जाने लगा कि उनकी किस्मत में केवल सेवा ही लिखी है। तीन विधानसभा चुनावों में वे ब्यावर सीट के दावेदार रहे, उसके बाद अजमेर उत्तर अथवा केकड़ी से प्रबल दावेदार थे, मगर उन्हें मौका नहीं मिला। देहात जिले की छहों सीटों पर पार्टी की जीत ने यह साबित हो गया कि सांगठनिक लिहाज से उनकी कार्यशैली अद्भुद है। जिले में पूरी निष्पक्षता के साथ शानदार सदस्यता अभियान चलाने का श्रेय भी उनके ही खाते में दर्ज है। वे पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नजदीकी लोगों में माने जाते हैं।  

वस्तुतः वे मूल्य आधारित विचारधारा के पोषक हैं और मूल्यों की रक्षा के कारण ही उठापटक की राजनीति में अप्रासंगिक से नजर आते हैं। नैतिक मूल्यों की रक्षा की खातिर ही उन्होंने भाजपा के शिक्षा प्रकोष्ठ के प्रदेशाध्यक्ष पद को त्याग दिया, हालांकि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद व विश्व हिंदू परिषद में सक्रिय रहे हैं। पिछली अशोक गहलोत सरकार के दौरान विहिप नेता प्रवीण भाई तोगडिया के त्रिशूल दीक्षा कार्यक्रम के दौरान उनको सहयोग करने वालों में प्रमुख होने के कारण उनके खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ था।

विद्यार्थी काल से ही वे संघ और विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए। वे सन् 1981 से 86 तक परिषद के विभाग प्रमुख रहे। वे सन् 1992 से 95 तक संघ के ब्यावर नगर कार्यवाह रहे। वे सन् 1997 से 2004 तक विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री रहे हैं। वे सन् 1986 से 97 तक राजस्थान यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अनेक पदों पर और 2001 से 2003 तक अजमेर यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं। उनकी चौदह पुस्तकें और बीस पेपर्स प्रकाशित हो चुके हैं। उनके मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने पीएचडी की है। वे चीन, सिंगापुर, श्रीलंका व पाकिस्तान आदि देशों की यात्रा कर चुके हैं।

उनका जन्म जिले के छोटे से गांव ब्रिक्चियावास में सन् 1960 में हुआ। उच्च शिक्षा पाने के बाद वे ब्यावर स्थित राजकीय सनातन धर्म महाविद्यालय में लेक्चरर बने। लंबे समय तक नौकरी करने के बाद महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बनाए गए। पदोन्नति के बाद प्रोफेसर बने। बाद में वे कॉमर्स विभाग के विभागाध्यक्ष और डीन बनाए गए। ग्यारह साल तक पीटीईटी (प्री. बी.एड़ परीक्षा) के कोर्डिनेटर बने। यह विश्वविद्यालय तब पीटीईटी की नोडल एजेंसी रहा। एक बार राज्य सरकार की ओर से रजिस्ट्रार पद नहीं भरा गया तो उनको तत्कालीन कुलपति ने रजिस्ट्रार का दायित्व सौंपा, जिसका निर्वहन करते हुए उन्होंने अनेक उपब्धियां हासिल कीं।

शुक्रवार, 30 मई 2025

बहुत जीवट वाले थे पत्रकार श्री निर्मल मिश्रा

अजयमेरु प्रेस क्लब के पूर्व महासचिव और वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय श्री निर्मल मिश्रा बहुत जीवट वाले पत्रकार थे। पिछले कुछ साल से अस्वस्थ थे, मगर तब भी कुछ नया करने को लालायित थे। कुछ दिन पहले ही उनका फोन आया। आधे घंटे बात की। कहा कि कुछ ऐसा करना चाहते हैं, कि लोग मान जाएं कि हम भी किसी से कम नहीं। फाइनेंसर भी उपलब्ध है। न्यूज चैनल आरंभ करना चाहते हैं। सहयोग की अपेक्षा थी उनको कि उसका स्वरूप केसा हो? कदाचित अस्वस्थता के कारण उनका संकल्प पूरा न हो पाया। गत दिवस उनका देहावसान हो गया।

उन्होंने पत्रकारिता की यात्रा 1984 में दैनिक आधुनिक राजस्थान से आरंभ की। तब मैं इंचार्ज था। वे बहुत महत्वाकांक्षी थे। ग्रामीण पृष्ठभूमि से अजमेर आ कर उन्होंने अपने आपको स्थापित करने के लिए बहुत मेहनत की। आरंभिक दिनों में उनका कहना था कि वे बहुत उंचाई को छूना चाहते हैं। मुझे चुनौती देते थे कि आप तो यहीं रह जाओगे, मैं नेशनल लेवल तक जा कर चैन लूंगा। उन्होंने दैनिक न्याय, दैनिक नवज्योति व राजस्थान पत्रिका में भी काम किया। आखिर में दैनिक भास्कर से जुडे रहे। खोजपूर्ण पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने खास पहचान बनाई। कम लोगों को ही पता होगा कि अजमेर के बहुचर्चित अश्लील छायाचित्र ब्लैकमेल कांड से जुडी महत्वपूर्ण जानकारियां व छायाचित्र सबसे पहले उनके हाथ लगे थे। उन्हें प्रकाशित करने में कुछ बाधाएं थीं। बाद में दूसरे पत्रकारों के हाथ लगे। ब्लैकमेल कांड पर कार्यवाही के लिए सरकार व प्रशासन पर दबाव बनाने वाले समूह में उनकी अहम भूमिका थी। क्राइम रिपोर्टिंग पर उनकी विशेष पकड थी। राजनीति व प्रशासन के क्षेत्र में भी खूब हाथ आजमाये। उन्होंने दैनिक नवज्योति में अजमेर विशेष पेज के लिए वरिष्ठ पत्रकार श्री सुरेन्द्र चतुर्वेदी के निर्देशन में अनेक खोजपूर्ण व दिलचस्प न्यूज आइटम दिए। दैनिक भास्कर में भी कई महत्वपूर्ण स्टोरीज कीं। वे राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ में भी सक्रिय रहे। पार्टटाइम पत्रकारिता करने वाले कर्मचारी नेता स्वर्गीय श्री सत्येश्वर प्रसाद शर्मा उन्हें पुत्रवत मानते थे। उनकी अच्छी खासी मित्र मंडली थी। राजनीतिक नेताओं भी गहरे ताल्लुकात थे। पत्रकार मित्र मंडली में सबसे छोटे होने के कारण सबके प्रिय थे और उनके छोटे-मोटे हठ को पूरा करने में खुशी महसूस करते थे। करीबी दोस्तों को सहसा यकीन ही नहीं हो रहा कि वे हमारे बीच नहीं रहे। कुल जमा अजमेर के पत्रकार जगत ने बहुत प्यारा, यारबाज व दिलेर पत्रकार खो दिया है। उनके जैसे यारबाज शख्स कम ही हैं, खासकर पत्रकार जगत में। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उनके निधन पर अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता है। ईश्वर उनकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें। साथ ही उनके परिवार को इस वज्रपात को सहन करने की शक्ति प्रदान करे।

गुरुवार, 29 मई 2025

अग्रणी समाजसेवी थे श्री सुनील भुटानी

अजमेर में सिंधी समाज के सर्वाधिक सक्रिय व अग्रणी समाजसेवी थे स्वर्गीय श्री सुनील वीरूमल भुटानी। हाल ही उनका देहावसान हो गया। उन्होंने 1992 में समाजसेवा के लिए सिंधु समिति का गठन किया था। उस जमाने के चंद एनर्जेटिक युवकों में उनकी गिनती हुआ करती थी। उनके साथ एक मजबूत टीम सक्रिय थी। गजब की संगठन क्षमता थी उनमें। उन्हीं के अन्य साथियों ने बाद में अन्य सामाजिक संस्थाओं का गठन किया। वे सिंधियत के लिए समर्पित रहे। उनकी परिकल्पना अजमेर के समूचे सिंधी समाज को जोडने वाले सिंधियत मेले के रूप में साकार हुई। हालांकि पिछले कुछ सालों से स्वास्थ्यगत और व्यावयायिक कारणों से वे अधिक सक्रिय नहीं रह पाए, मगर अनेक आयोजनों में उनका मार्गदर्शन लिया जाता रहा। उनमें कमाल की पॉजिटिव एनर्जी थी और अस्वस्थता को उन्होंने कभी हावी नहीं होने दिया। वे सिंधी कौंसिल ऑफ इंडिया के राजस्थान चैप्टर के सुप्रीम काउंसलर भी थे। इसके अतिरिक्त आदर्श विद्या समिति व एचकेएच विद्या समिति के संयुक्त सचिव रहे। पुष्कर झूलेलाल घाट विकास समिति से भी जुडे रहे। उनकी दिलचस्पी राजनीति में भी रही। वे भूतपूर्व केबीनेट मंत्री स्वर्गीय श्री किशन मोटवानी के करीबी थे। अजमेर नगर परिषद के चुनाव में अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष श्री नरेन शहाणी के बहुत अनुनय व आग्रह पर कांग्रेस के एक मात्र सिंधी प्रत्याशी बनाए गए, मगर भाजपा मानसिकता के सिंधियों ने उनका साथ नहीं दिया। कांग्रेस के इस प्रयोग से यह लगभग स्पष्ट हो गया कि भाजपा से जुडे सिंधी कांग्रेस के सिंधी प्रत्याशी का समर्थन नहीं किया करते।

वे सुपरिचित कर कानून सलाहकार थे। उनका जन्म 5 फरवरी 1962 को हुआ। उनके पूर्वज सिंध के सेवण में रहते थे। उन्होंने 1985 में एम कॉम की डिग्री जीसीए से हासिल की और अपने मामा जाने-माने समाजसेवी श्री मोतीलाल ठाकुर के साथ टैक्स प्रैक्टिस आरंभ की। 2002 से उन्होंने अपना ऑफिस आरंभ किया। उनके पास अच्छा क्लाइंटेज था। प्रमुख व्यवसायी उनसे सलाह लिया करते थे। उनके चार भाई व चार बहिनें हैं। उनका विवाह 24 मार्च 1996 को हुआ। उनके एक पुत्र व एक पुत्री है। ज्ञातव्य है कि उनके जीजाजी श्री जगदीश वच्छानी समाज के एक स्तम्भ हैं। स्वामी श्री हिरदाराम जी के आशीर्वाद से प्रशासन पर गहरी पकड और एनआरआई से घनिष्ठ संबंधों के चलते समाजसेवा के अनेक प्रकल्प संचालित कर रहे हैं। स्वर्गीय श्री भुटानी के निधन से समाज को जो क्षति हुई है, उसकी पूर्ति असंभव है। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता है।


शुक्रवार, 23 मई 2025

जियारत व पूजा भी कोई खबर है?

किसी भी व्यक्ति का दरगाह जियारत करना अथवा तीर्थराज पुश्कर की पूजा अर्चना करना उसका पूर्णतः वैयक्तिक कृत्य है। यह उसकी व्यक्तिगत आस्था का मामला है, जिससे आम जनता का कोई सरोकार नहीं होता। बावजूद इसके लंबे अरसे से वीवीआईपी, वीआईपी, नेता-अभिनेता आदि जियारत करता है अथवा पुश्कर सरोवर की पूजा करता है तो उसकी विस्तृत खबर छपती है। क्या उस खबर की कोई उपयोगिता है?

उसमें किसने जियारत करवाई, किसने तवरूख भेंट किया, किसने पूजा करवाई, कौन कौन मौजूद थे, आदि का जिक्र होता है। सवाल उठता है कि आम पाठक की क्या इसको जानने में रूचि होती है। वह हैडिंग पढ कर उसे छोड देता है या पूरी खबर पढता है। हां, अगर जियारत व पूजा के दौरान वह कोई बयान देता है तो वह जरूर खबर है, मगर केवल जियारत व पूजा खबर कैसे हो सकती है। होता अमूमन ये है कि जब भी कोई दरगाह षरीफ में आता है या तीर्थराज पुश्कर की पूजा करता है तो मीडिया उसे घेर लेती है और संबंधित व ताजा मामलों में उसका बयान लेती है, जो कि खबर बन जाती है। मुझे ख्याल आता है कि दैनिक भास्कर अजमेर के तत्कालीन स्थानीय संपादक श्री जगदीष षर्मा ने एक व्यवस्था बनाई थी कि जियारत व पूजा की कोई खबर नहीं जाएगी। यदि जाएगी भी तो दो तीन लाइन में, जानकारी मात्र के लिए। ताकि यह पता रहे कि अमुक विषिश्ट व्यक्ति यहां आया था। खबर तभी बनाई जाए जब वह कुछ बयान दे। उसमें भी जियारत व पूजा की जानकारी दो तीन लाइन में होनी चाहिए। यह व्यवस्था काफी दिन चली। 

अब बात करते हैं कि जियारत व पूजा की खबर बनाने की परंपरा कैसे षुरू हुई। ऐसा प्रतीत होता है कि आरंभ में अखबार वालों ने विषिश्ट व्यक्ति के दरगाह व पुश्कर आने पर जियारत व पूजा करवाने वालों से खबर ली। बाद में इसका उलट हो गया। खबर अखबार के दफ्तर में भी आने लगी। यह ठीक वैसा ही है कि अमुक वकील ने अमुक मामले में अमुक को जमानत दिलवाई या बरी करवाया, और उसकी खबर बन जाए। अब तो जियारत व पूजा करने वाले स्वयं भी खबर लगवाने में रूचि लेते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=vvHkmnZ2HJ0