शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

जारी है आनासागर में डूबने का सिलसिला, कब चेतेगा प्रशासन?

 रामप्रसाद घाट
अजमेर की ऐतिहासिक झील में हाल ही एक और जिंदगी मौत में तब्दील हो गई। इस पर लील गया रामप्रसाद घाट शीर्षक से शहर के जागरूक नागरिक जनाब ऐतेजाद अहमद खान ने फेसबुक पर लिखा है कि जब से यह घाट बना है, अगर आप इसके आंकड़े निकलवा कर देखंगे तो पाएंगे, हर महीने कम से कम 2-3 लोगों की यह बलि लेता है, और ज्यादातर लोग बाहर के होते हैं और परदेस मैं अपनों को खो देते हैं। उनका कहना है कि इस सिलसिले में वे पूर्व सचिव अश्फाक हुसैन को भी कह चुके हैं कि हरिद्वार की तर्ज पर यहां भी चैन और सुरक्षा का इन्तजाम होना चहिये। चेतावनी का बोर्ड होना चहिये। पर अफसर बात सुन कर उस पर अमल कर दे तो भारत अमेरिका और कनाडा नहीं हो जाये।
उनकी बात वाकई सही है। एक और जागरूक नागरिक सोमश्वर शर्मा जी ने इसी पर प्रतिक्रिया करते हुए लिखा है आपदा प्रबंधन इचार्ज पूर्व पार्षद श्री अशोक मलिक इस ओर ध्यान दें। साथ ही अजमेरनामा से भी अपेक्षा की है कि इस बारे में कुछ किया जाए। यद्यपि अजमेरनामा के नाम से चल रहे ब्लाग पर पूर्व में इस बारे में लिखा जा चुका है, मगर इन महानुभावों से प्रेरणा ले कर एक बार और इस मसले पर चर्चा कर लेते हैं।
हालांकि पहले बारादरी से गिर कर डूबने के वाकये होते थे, मगर वे अमूमन आत्महत्या के हुआ करते थे। डूबने की घटनाएं रामप्रसाद घाट बनने के बाद बढ़ गई हैं। यह सही है कि रामप्रसाद घाट यूआईटी की एक उपलब्धि है और इससे जायरीन को नहाने में काफी सुविधा होती है, लेकिन वहां सुरक्षा के इंतजाम आज तक दुरुस्त नहीं किए गए हैं। दरअसल घाट बनाए जाने के दौरान ही सुरक्षा के इंतजाम साथ-साथ किए जाने चाहिए थे।
इस बारे में पहले पूर्व नगर निगम महापौर धर्मेन्द्र गहलोत स्वीकार कर चुके हैं कि सरकार की ओर से सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। भ्रमण के लिए मोटर बोट जरूर हैं, जिनका जरूरत पडऩे पर उपयोग किया जाता है। कितने अफसोस की बात है कि जिला प्रशासन ने इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया। इसकी एक मात्र वजह ये है कि आनासागर किसी एक विभाग के अधीन नहीं आता। हक जताने के लिए जरूर नगर परिषद, सिंचाई विभाग और मत्स्य पालन विभाग आगे आते हैं, लेकिन जब कोई दुर्घटना हो जाती है तो सभी दूर हट जाते हैं। ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि जिला प्रशासन पहल कर जिम्मेदारी तय करे। या तो अलग से कोई सेल स्थापित करे या फिर इन्हीं तीनों विभागों में से किसी एक पर जिम्मेदारी डाले। वैसे तो आनासागर के चारों ओर खतरा ही खतरा है, लेकिन ज्यादातर घटनाएं रामप्रसाद घाट पर हो रही हैं। दरअसल घाट बनाने वक्त प्रशासन ने यह सोचा ही नहीं कि यदि कोई फिसला तो उसे बचाने के लिए क्या इंतजाम होने चाहिए। जब-जब भी कोई मौत होती है तो सुरक्षा के इंतजाम की चर्चा होती जरूर है, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया जाता। प्रशासन को इस पर गंभीरता से विचार कर तुरंत इंतजाम करने चाहिए। घाट व बारहदरी पर स्थाई रूप से तैराकों की तैनाती करने की सख्त जरूरत है, ताकि यदि कोई आत्महत्या की कोशिश करे या फिर कोई फिसल कर डूबने लगे तो वे उसे तुरंत बचाने की कोशिश कर सकें। बचाव के लिए हर वक्त बोट की भी व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त लाइफ सेविंग ट्यूब व जैकेट भी रखे जाने चाहिए। घाट के आसपास दलदल, काई और गंदगी की नियमित सफाई के इंतजाम भी किए जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त रात्रि गश्त और पर्याप्त रोशनी की भी व्यवस्था की जानी चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह स्थिति की गंभीरता को समझे और शीघ्र ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करे। हालांकि अजमेर के जैसे हालात हैं, जैसा सुस्त प्रशासन है, जैसे सोये हुए लोग हैं और जैसे लापरवाह नेता हैं, पहले की तरह कुछ दिन चर्चा होगी और नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात का होने वाला है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

रलावता ने हटाया विशेषण, मगर उनके भाई अब भी राजा


शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता वाकई ईमानदार हैं। मीडिया द्वारा विवाद किए जाने पर और बाद में फागुन महोत्सव में बाकायदा राजा साहब पर एक रोचक झलकी दिखाए जाने पर उसे गंभीरता से लिया। हाल ही जब उनके परिवार में एक शादी हुई तो उन्होंने निमंत्रण पर अपने नाम के आगे से राजा शब्द हटा लिया।
दरअसल पिछले दिनों जब एक पारिवारिक शादी कार्ड में अपने नाम के आगे राजा शब्द का विशेषण लगाया तो बड़ी चर्चा हुई। होनी ही थी। लोकतांत्रिक देश में अगर अब भी कोई अपने आपको राजा कहलाता है तो अटपटा लगेगा ही। यूं अगर कोई अपने नाम के आगे राजा शब्द लगाता है, तो कौन ध्यान देता है, मगर चूंकि वे उस पार्टी के शहर अध्यक्ष हैं, जिसने पिछले विधानसभा चुनाव में राजा, महाराजा, राजकुमार, कुंवर शब्द से परहेज रखने का फरमान जारी किया था, इस कारण उन्हें लगा कि सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी का पालन करते हुए राजा शब्द हटा लेना चाहिए। हालांकि शब्द हटाए जाने से वे कोई राजा नहीं रह जाएंगे, ऐसा है नहीं। वे अब भी राजा हैं। उन्हें उनके परिचित प्यार से राजा शब्द से ही संबोधित करते हैं। यूं राजा के नाम से पूर्व विधायक डा. राजकुमार जयपाल को भी संबोधित किया जाता रहा है, मगर ऐसा उनका नाम राजकुमार होने के कारण है।
बहरहाल, मुद्दा ये नहीं है। असल रोचक बात ये है कि ताजा शादी कार्ड में जहां राजा साहब के नाम के आगे से राजा शब्द गायब है, वहीं ठीक नीचे उनके भाई गजेन्द्र सिंह रलावता के नाम के आगे राजा शब्द लगा हुआ है। जिसने भी कार्ड देखा, मुस्कराए बिना नहीं रह सका। रलावता भले ही अपने नाम के आगे से राजा शब्द हटा लें, मगर जब उनके भाई राजा हैं तो स्वाभाविक रूप से वे भी राजा ही हैं। गजेन्द्र बन्ना तो फिर भी सरकारी महकमे में हैं, अगर वे राजा हैं तो सक्रिय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले महेन्द्र बन्ना के राजा शब्द पर ऐतराज नहीं करना चाहिए था। आप भी सोचेंगे कि इतना बड़ा मुद्दा तो है नहीं कि ये आइटम बनाया जाए, मगर आप जानते हैं कि राजाओं के तो छोटे-मोटे किस्से भी सुर्खियां पाते हैं। रलावता भी राजा हैं, इस कारण इतनी चर्चा है, वरना अपुन ठहरे छोटे आदमी, हमारी तो कोई चर्चा नहीं करता।
लगे हाथ मसले का एक पहलु भी आपकी नजर पेश है। राजस्थान क्षत्रिय महासभा के महासचिव व राजपूत स्टूडेंट यूथ ऑर्गेनाइजेशन के प्रदेशाध्यक्ष कुंवर दशरथ सिंह सकराय का तर्क है कि राजपूत समाज में ठाकुर, कुंवर, कुंवरानी, बाईसा जैसे शब्दों से उद्बोधन करना सांस्कृतिक परम्परा है, जिसका पट्टा राजूपत समाज को किसी राजनीतिक या सरकार से लेने की आवश्यकता नहीं है। ये हमारी सांस्कृतिक विरासत है। ठीक उसी प्रकार जैसे मुस्लिम समाज में नवाब, बेगम, शहजादी, शहजादा शब्दों का प्रचलन आम बोलचाल में संस्कृति का स्वरूप लिए हुए हैं। बात में दम तो है भाई। सकराय जी के इस तर्क के बाद तो ये आइटम ही बेमानी हो जाता है।
तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

दरगाह विकास योजना पर सफेद झूठ बोल गए रघु शर्मा?

अजमेर फोरम की ओर से इंडोर स्टेडियम में आयोजित नगर चौपाल में राज्य सरकार के मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा आगामी आठ सौवें उर्स के मद्देनजर दरगाह विकास के लिए तकरीबन तीन सौ करोड़ रुपए की प्रस्तावित और फिलहाल ठंडे बस्ते में पड़ी योजना पर सफेद झूठ बोल गए। उनका कहना था कि इस प्रकार की कोई योजना थी ही नहीं और मीडिया इस प्रकार का भ्रम नहीं फैलाना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने यह सवाल ही खड़ा कर दिया कि अगर ऐसी कोई योजना थी तो उसके कागज दिखाइये, वे हवाई बात में यकीन नहीं रखते। दुर्भाग्य से मौके पर उनको कोई ठोस जवाब नहीं दे पाया, हालांकि वहां शहर के सभी प्रमुख राजनीतिज्ञ व पत्रकार मौजूद थे। अलबत्ता न्यास के पूर्व सदर धर्मेश जैन जरूर अड़े और बताया कि दरगाह विकास योजना जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत बनाई गई थी और उसका बाकायदा पीडीकोर ने सर्वे भी किया था। विवाद बढ़ता देख इस चर्चा को बीच में ही छोड़ दिया गया, मगर इससे अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं, जिन पर चर्चा करना प्रासंगिक होगा।
अव्वल तो यदि इस प्रकार की कोई योजना नहीं थी तो उस पर बाकायदा जयपुर में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में प्रशासनिक बैठक क्यों हुई? उसके बाद प्रदेश के गृह व स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने बाकायदा इसी योजना पर चर्चा के लिए अजमेर में प्रशासन, जनप्रतिनिधियों व दरगाह से जुड़े अंजुमन पदाधिकारियों की बैठक क्यों ली? यदि ऐसी कोई योजना नहीं थी तो उसके तहत दरगाह के चारों ओर गलियारा बनाने व मकान अधिग्रहित करने के मसले पर भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व अंजुमन के तत्कालीन सदर सैयद गुलाम किबरिया के बीच नौंकझोंक क्यों हुई? बैठक से पूर्व प्रशासनिक तैयारी नहीं होने पर धारीवाल ने नाराजगी क्यों जाहिर की और संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा से यह क्यों कहा कि जल्द से जल्द मास्टर प्लान बना कर भेजें, वरना केन्द्र सरकार से योजना के तहत धन राशि नहीं ली जा सकेगी? कैसी विडंबना है कि सरकार का एक जिम्मेदार मंत्री तो केवल इसी योजना पर विचार करने के लिए अजमेर आता है और मुख्य सचेतक कहता है कि इस प्रकार की कोई योजना थी ही नहीं? सवाल ये भी है कि अगर योजना थी ही नहीं तो अजमेर फोरम सहित अन्य पक्षों ने लगातार योजना राशि समय पर मंजूर करने पर जोर क्यों डाला? यदि योजना थी ही नहीं तो इस सिलसिले में राज्य सरकार ने निर्देश क्यों दिए गए कि समयाभाव की वजह से पहले चरण में अस्सी करोड़ के प्रस्ताव बना कर भेजे जाएं? प्रशासन ने क्या हवा में ही प्रस्ताव बना कर भेज दिए? यह सही है कि योजना का प्रारूप बनाते वक्त पीडीकोर ने स्थानीय जिला प्रशासन से कोई राय मशविरा नहीं किया था, इसका खुलासा अजमेर फोरम की एक बैठक में संभागीय आयुक्त शर्मा ने किया था और यही कहा था कि अभी राशि मंजूर हो कर नहीं आई है।
इन सारे सवालों से एक ही जवाब आता है कि योजना प्रस्तावित तो थी, उसका सर्वे पीडीकोर ने किया भी था और उसका प्रारूप एक बड़े पुलिंदे के रूप में मौजूद भी है, मगर उसकी वित्तीय स्वीकृति के लिए उचित कागजात समय पर केन्द्र सरकार को नहीं भेजे जा सके। इसके लिए बेशक राज्य सरकार जिम्मेदार है कि उसने कोई रुचि ली ही नहीं। और इसकी एक मात्र वजह ये है कि अजमेर में एक भी नेता ऐसा नहीं है जो सरकार पर दबाव बना कर अजमेर का विकास करवा सके। इसका इजहार खुद रघु शर्मा ने चौपाल में किया था, यह कह कर कि मजबूत राजनीतिक नेतृत्व के अभाव में अजमेर पिछड़ा है। अजमेर के लोग तो यही सोच रहे थे कि अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट, मुख्य सचेतक रघु शर्मा व शिक्षा राज्य मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ इस योजना के लिए ठीक से पैरवी करेंगे, मगर रघु शर्मा के कथन से तो यही लगता है कि किसी ने रुचि ली ही नहीं। जहां तक रघु शर्मा का सवाल है तो जब उन्हें पता ही नहीं है कि इस प्रकार की योजना थी तो वे रुचि किसमें लेते। रघु शर्मा के दावे पर गौर करें तो यही लगता है कि उन्हें वाकई पता ही नहीं है कि इस प्रकार की योजना पर काम हो रहा था। अगर ऐसा है तो यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है कि अजमेर जिले के एक विधायक और बाद में बने मुख्य सचेतक को अपने विधानसभा क्षेत्र केकड़ी में बनाए जाने वाले हास्पीटल की तो बहुत चिंता है, मगर अजमेर जिला मुख्यालय पर अमल में लाई जाने वाली विकास योजना से कोई सरोकार ही नहीं है। जब वे मुख्य सचेतक बने तो अजमेर जिले की जनता में एक आशा जगी थी कि वे जिले के लिए कुछ करेंगे, क्योंकि वे प्रदेश में खासी धाक रखते हैं, मगर उनके इस रवैये से तो यही लगता है कि उन्हें ज्यादा फिक्र केवल अपने विधानसभा क्षेत्र की है ताकि अगली बार फिर विधायक बन सकें। कम से कम उनकी तो रुचि नहीं है कि अजमेर जिले के कद्दावर नेता बनें। और ही वजह रही कि चौपाल में उठाए गए कई मसलों पर वे बोले के उनके नहीं, बल्कि सचिन पायलट के नेतृत्व में एक जुट हों। कदाचित उन्हें इस बात का भय है कि यदि जिले की नेतागिरी की तो सचिन नाराज न हो जाएं। ऐसे में बार अध्यक्ष राजेश टंडन की उस टिप्पणी पर उनका भिनकना स्वाभाविक है कि रुठ कर कोप भवन में बैठने की फितरत का इस्तेमाल अजमेर के विकास के लिए भी कीजिए। शर्मा ने तो साफ कह ही दिया कि वे रुठेंगे तो अपने केकड़ी में बनने वाले हास्पीटल के ड्रीम प्रोजेक्त के लिए। उसमें कोई रोड़ा डालेगा तो उसे भुगतना होगा, चाहे वह कोई अधिकारी हो या मंत्री।
आखिर में एक बार शर्मा की बात मान भी ली जाए कि दरगाह विकास की कोई योजना थी ही नहीं थी और यह केवल जुबानी जमा खर्च था, तो भी सरकार की कार्यशैली पर तो सवाल उठता ही है कि वह फोकट ही अजमेर वासियों को सब्जबाग दिखा रही थी।
इस न्यूज आइटम के साथ दी गई फोटो उस बैठक ही है, जिसकी सदारत अजमेर में स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने की थी।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

ये राठौड़ फैन क्लब नहीं, लाला बन्ना फैन क्लब है

पूर्व मंत्री व मौजूदा भाजपा विधायक राजेन्द्र सिंह राठौड़ के लिए यह सुखद है कि भाजपा के साथ-साथ उनके अपने समर्थक भी उनकी गिरफ्तारी का विरोध कर रहे हैं। अजमेर में भी उनके समर्थन में रातोंरात गठित फैन क्लब मैदान में उतर आया है। राठौड़ फैन क्लब राजस्थान की अजमेर इकाई की ओर से उनके 58वें जन्मदिवस पर 101 यूनिट रक्तदान किया गया। जाहिर तौर पर इस अवसर पर क्लब के सदस्यों ने राजेन्द्र सिंह राठौड़ की गिरफ्तारी को अनुचित बताते हुए इसका विरोध किया। साथ ही संकल्प लिया कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा जाएगा।
श्रीनगर रोड स्थित होटल दाता इन में हुए रक्तदान शिविर में रक्तदान करने वाले युवाओं में जबरदस्त उत्साह देखा गया। ऐसे में यह जिज्ञासा स्वाभाविक सी है कि यकायक राठौड़ के इतने सारे पक्के समर्थक कहां से आ गए, जबकि उनका न तो यह विधानसभा क्षेत्र है और न ही कर्मक्षेत्र। जानकार बताते हैं कि असल में इनमें से अधिसंख्य समर्थक मूलत: क्लब के संरक्षक व नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत उर्फ लाला बन्ना के हैं, जो कि उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर चलते हैं। राठौड़ से उनका कोई सीधा वास्ता नहीं है, वे तो सीधे-सीधे लाला बन्ना से जुड़े हुए हैं। शिविर के दौरान मौजूद युवाओं में अधिसंख्य वे ही थे, जो कि आमतौर पर लाला बन्ना के साथ नजर आया करते हैं। राठौड़ साहब को लाला बन्ना का शुक्र अदा करना चाहिए कि उन्होंने अपने निजी समर्थकों को एकत्रित कर राठौड़ का समर्थक दर्शा दिया।
राठौड़ के समर्थन में आयोजित रक्तदान शिविर से एक बारगी फिर स्थापित हो गया है कि लाला बन्ना भले ही वर्तमान में किसी बहुत महत्वपूर्ण पद पर न हों, मगर उनके अपने स्वयं के दोस्त और समर्थकों की एक लंबी फौज है। माना कि वे भाजपा के प्लेटफार्म पर खड़े हैं, मगर उनका असली वजूद अपना खुद का है, जो कि उन्होंने छात्र जीवन से लेकर अब तक अर्जित किया है। बेशक ताजा शिविर राठौड़ के समर्थन में आयोजित किया गया, मगर राजनीतिक के जानकारों का मानना है कि इससे यह संदेश जरूर गया है कि लाल बन्ना सक्रिय राजनीति में हाथ जरूर आजमाएंगे। पिछली बार तो उनका अजमेर उत्तर से टिकट पक्का ही हो गया था। प्रो. वासुदेव देवनानी का टिकट कट ही गया था, मगर नागपुर का देवरा ढोक कर आने पर लाला बन्ना का पक्का टिकट धरा रह गया। ताजा शिविर को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखना प्री मैच्योर डिलीवरी के रूप में ही देखा जाएगा, मगर इससे यह संदेश जरूर जाता है कि वे फिर दावेदारी करेंगे। जानकार तो यहां तक बताते हैं कि उनकी तैयारी पूरी है। भले ही अभी इतना दूर की सोचना लोगों को नहीं पचे, मगर चुनावी राजनीति का जोड़-बाकी करने वाले लाला बन्ना फैक्टर भी भी काउंट करके चल रहे हैं।
चलते-चलते एक बात और। इस शिविर से एक जिज्ञासा यह भी होती है कि आखिर क्या वजह है कि सशक्त विपक्षी दल भाजपा के होते हुए आखिर क्यों राठौड़ के प्रशंसकों को अलग से मुहिम चलानी पड़ रही है। जरूर जयपुर में कोई गड़बड़ है। बताते हैं कि पार्टी का एक धड़ा राठौड़ के मुद्दे को पार्टी का नंबर वन मुद्दा बनाने से असहमत है। इसी के चलते अलग बैनर पर मुहिम चलाई जा रही है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

...लो फिर बर्फ से निकल आए एडवोकेट राजेश टंडन

अपने हरफनमौला व्यक्तित्व की बदोलत सुपरिचित वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजेश टंडन ने तीसरी बार अजमेर जिला बार एसोसिएशन का अध्यक्ष बन कर साबित कर दिया है कि अगर आदमी की जड़ जिंदा हो तो मौका पा कर वह फिर से हरा-भरा हो जाता है।
असल में टंडन पिछले काफी दिन से बर्फ में लगे हुए थे। कहलाते जरूर जाने-माने कांग्रेसी थे, मगर कांग्रेस में उनकी वखत कम सी हो गई थी। कम इसलिए कि उन्हें इस बार कांगे्रस सरकार के रहते ही कोई ढंग का पद नहीं मिल पाया। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस बार जिस तरह से अपने पिटारे का मुंह संकड़ा कर रखा है, उसके चलते कई नेता अपने घर तक ही कैद हो कर रह गए हैं। नरेन शहाणी भगत को भी तब जा कर न्यास अध्यक्ष पद मिला, जब कि लगभग हताश हो चुके थे। जहां तक संगठन का सवाल है, इन दिनों जिस तरह की कांग्रेस अजमेर में पैदा हुई है, उसमें टंडन सहित कई दिग्गज हाशिये पर चुपचाप बैठे हैं। उनका कोई जोर नहीं चल रहा। संपर्क उनके जरूर जयपुर-दिल्ली तक हैं, मगर सचिन पायलट के कारण कोई भी बड़ा नेता अजमेर का नाम आते ही तुरंत हाथ खींच लेता है। टंडन ठहरे उखाड़-पछाड़ वाले नेता, सो उन्हें यह स्थिति बेहद दुखी किए हुए थी। कांग्रेस से उम्मीद खत्म सी हो गई थी और अगली सरकार किसकी होगी, कुछ पता नहीं, सो आखिर उन्हें यही बेहतर लगा कि अपने पेशे की जमात में ही फिर से अपना कद कायम करें। इसी चक्कर में बार अध्यक्ष के चुनाव में उतर गए। उतर तो गए, मगर इस बार राह आसान नहीं थी। आसान की छोडि़ए, यूं कहिये कि प्रतिष्ठा दाव पर ही लग गई थी। एक तरफ पुराने दुश्मन और दूसरी ओर संघ के नेता भी आ डटे, फिश प्लेटें गायब करने को। जोर तो बहुत आया, मगर अपने पुराने रसूखात और मिजाज के दम पर नैया पार लगा ही ली।
कुल मिला कर अब जनाब फिर शहर की मुख्य धारा में आ गए हैं और वह भी दमदार तरीके से। दिलचस्प बात ये रही कि बार अध्यक्ष बनते ही सीधे जिला व सत्र न्यायाधीश से भिड़ंत की नौबत आ गई। इसे कहते हैं सिर मुंडाते ही ओल गिरना। खैर, इसे भी उन्होंने बड़ी दिलेरी और चतुराई से निभा लिया। कुल जमा बात ये है कि उन्होंने एक कविता की इन पंक्तियों को साकार कर दिया है कि जड़ अगर जिंदा रही तो फिर हरा हो जाऊंगा। उम्मीद है कि उनकी यह पारी कामयाब रहेगी। वैसे भी शहर के गिने-चुने बुद्धिजीवी राजनीतिज्ञों में उनकी गिनती होती है, सो उम्मीदें कुछ ज्यादा ही हैं।
आइये, जरा उनके व्यक्तिगत जीवन में भी झांक कर देख लें-
उनका जन्म 3 अक्टूबर 1951 को स्वर्गीय श्री प्रेम नारायण टंडन के घर हुआ। उन्होंने बी.ए. व एल.एल.बी. तक शिक्षा अर्जित की। वे 1968 से लगातार कांग्रेस जुड़े हुए हैं। वे 1972 में श्रमजीवी कॉलेज छात्र संघ व 1974 में लॉ एसोसिएशन, राजकीय महाविद्यालय के अध्यक्ष, 1977 से 1986 तक जिला युवक कांग्रेस के अध्यक्ष व 1987 से 1995 तक जिला कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता रहे। 1978 में भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी को जेल भेजे जाने पर किए गए जेल भरो आंदोलन में भाग ले चुके हैं। वे 1998 से 2003 कई सरकारी समितियों के सदस्य रहे हैं। इसके अतिरिक्त सन् 1997 से लगातार अजमेर उत्तर से प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्वाचित सदस्य रहे। वे 1997 से 2007 तक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव भी रहे हैं। उन्होंने 8 नवंबर 1975 से वकालत करते हुए विशेष उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने पांच साल तक प्रदेश के खनन विभाग के लिए विधि सलाहकार के रूप में काम किया है और पर्यावरण संबंधी मसलों पर विशेष जानकारी रखते हैं। वे अजमेर संभागीय आयुक्त व गुंडा एंड आम्र्स एक्ट के लिए सरकारी वकील रहे हैं। उन्होंने एससी एसटी कोर्ट और टाडा कोर्ट में सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक के रूप में भी काम किया है। राजस्व मंडल व आबकारी महकमे में भी बतौर सरकारी वकील और नगर परिषद में विधि सलाहकार के रूप में काम किया है। वे एक लंबे अरसे से नोटेरी पब्लिक भी हैं।
वे पंडित जवाहर लाल नेहरू की ओर से स्थापित फ्रेंड्स सोवियत यूनियन के जिला अध्यक्ष, इंडो-चाइना सोसायटी की राजस्थान इकाई के महासचिव, राजस्थान स्टेट रेसलिंग एसोसिएशन के उपाध्यक्ष, अजमेर जिला रेसलिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष, कला घर सोसायटी के सचिव और दूरभाष सलाहकार समिति के सदस्य रहे हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com