शनिवार, 12 सितंबर 2026

क्या पार्षद पशु हैं, जिन्हें बाड़े में बंद किया गया है?

 क्या पार्षद पशु हैं, जिन्हें बाड़े में बंद किया गया है? 

“बाड़ाबंदी” शब्द वास्तव में पार्षदों जैसे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के संदर्भ में कुछ हद तक अपमानजनक और अमानवीय बिंब पैदा करता है। “बाड़ा” सामान्यतः उस स्थान को कहा जाता है जहां पशुओं को घेरकर रखा जाता है। राजनीति में “बाड़ाबंदी” का अर्थ हो गया है, चुनाव के दौरान पार्षदों को किसी होटल, रिसॉर्ट या अन्य स्थान पर एक साथ रखकर उनकी आवाजाही और संपर्क पर निगरानी रखना। इसलिए सवाल स्वाभाविक है कि जनता द्वारा चुने गए पार्षदों को पशुओं की तरह ‘बाड़े’ में बंद करने की स्थिति को हम सामान्य राजनीतिक शब्दावली क्यों मानें? यह शब्द इस पूरी प्रक्रिया की विडंबना को तो उजागर करता है, लेकिन जनप्रतिनिधियों की गरिमा को देखते हुए इसका इस्तेमाल सहज नहीं होना चाहिए। तो क्या “लामबंदी” बेहतर शब्द है? बिलकुल, “लामबंदी” कहीं अधिक गरिमापूर्ण और राजनीतिक रूप से उपयुक्त शब्द है। “लामबंदी” का अर्थ है, किसी उद्देश्य या पक्ष में लोगों को संगठित करना, एकजुट करना अथवा समर्थन के लिए तैयार करना। इसलिए कहा जा सकता है, 

पार्षदों की लामबंदी, समर्थन के लिए पार्षदों को एकजुट करना, मेयर चुनाव में पार्षदों का शक्ति-संगठन, पार्षदों को अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश। हां, इतना जरूर है कि “बाड़ाबंदी” में व्यंग्य और विडंबना है, जबकि “लामबंदी” में राजनीतिक गरिमा है।

कैसा रहा अब तक के अजमेर नगर निकाय प्रमुखों का मिजाज?

आज जब अजमेर नगर निगम चुनाव की प्रक्रिया जारी है, ऐसे में यह प्रासंगिक होगा कि पूर्व के अध्यक्षों की कार्यशैली व मिजाज पर भी नजर डाली जाए।

1990 से 95 तक नगर परिषद के सभापति रहे स्वर्गीय श्री रतनलाल यादव का कार्यकाल ठीक ठाक रहा। जब भी आमसभा होती थी तो पार्षद खूब हंगामा करते थे, हावी रहते थे। रोचक बात है कि यादव चुपचाप सुनते रहते थे। कुछ नहीं बोलते थे। यहां तक कि हंगामा होते देख कर मुस्कराते रहते थे। उनके बाद 1995 से 2000्र तक सभापति रहे स्वर्गीय श्री वीरकुमार का कार्यकाल जीवंत रहा। उन्होंने नगर परिषद की ओर से कई नवाचार किए। पहली बार लगा कि नगर परिषद भी कोई संस्था है, जो नगर की धडकन से सीधे जुडी हुई है। दुर्भाग्य से वे कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और हृदयाघात से उनका निधन हो गया। उसके बाद 24 जनवरी 2000 से 9 अप्रैल 2000 श्रीमती विद्या कमलाकर जोशी कार्यवाहक सभापति रहीं। 10 अप्रैल से 28 अगस्त 2000 तक सभापति का दायित्व श्री सुरेन्द्र सिंह शेखावत ने निभाया और वे वीरकुमार के नक्शेकदम पर चले। 28 अगस्त 2000 से 22 दिसम्बर 2003 सभापति श्रीमती अनिता भदेल बनीं। चूंकि अध्यापिका से सीधे पार्षद बन कर राजनीति में प्रवेश करने वाली श्रीमती अनिता भदेल को राजनीतिक अनुभव नहीं था, इस कारण ऐसे मौके आए, जब आम सभा में हंगामा होने पर रूआंसी हो जाती थीं और सभा स्थागित कर देती थीं। अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही वे विधायक बन गईं और उनके स्थान पर 22 दिसम्बर 2003 से 31 दिसम्बर 2005ः श्रीमती सरोज देवी जाटव को सभापति बनने की मौका मिला। वे कुछ खास उपलब्धि अपने खाते में दर्ज नहीं करवा पाई। फिर स्वर्गीय श्री वीरकुमार के शिष्य धर्मेन्द्र गहलोत ने 2005 से 2010 तक कुर्सी पर काबिज हुए। सन् 2008 में भाजपा शासनकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की पहल पर नगर परिषद को नगर निगम का दर्जा दे दिया गया। इसकी घोषणा उन्होंने अजमेर में ही की। वे यहां राज्य स्तरीय गणतंत्र समारोह में शिरकत करने आई थीं। इस लिहाज से श्री धर्मेन्द्र गहलोत को पहला मेयर बनने का गौरव हासिल हुआ। हालांकि जनसंख्या संबंधी औपचारिकता बाद में कुछ गांव मिला कर की गई। उनका यह कार्यकाल जांबाजी से भरा रहा। उन्हें कई बार अतिक्रमण हटाओ दस्ते का नेतृत्व करते देखा गया। उन्होंने स्वर्गीय श्री वीर कुमार के कदमों पर चलते हुए निगम में कामकाज में सुधार किया। अगस्त 2010 में करीब बीस साल भाजपा का कब्जा रहने के बाद पहली बार कांग्रेस के नए चेहरे वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व पार्षद स्वर्गीय श्री हरिशचंद जटिया के पुत्र श्री कमल बाकोलिया अजमेर नगर निगम के पहले निर्वाचित मेयर बने। उन्होंने भाजपा के डॉ. प्रियशील हाड़ा को पराजित किया। आरंभ के चंद साल तो ठीक ठाक काम किया, मगर कार्यकाल का बाकी हिस्सा सरकार पलटने के कारण यूं ही बीत गया। 2015 में नई व्यवस्था के तहत मेयर का चुनाव पार्षदों में से किया गया और एक बार फिर धर्मेन्द्र गहलोत मेयर बने। दूसरी बार वे कुछ संयत नजर आए और उनमें मैच्योरिटी नजर आई। उनके कार्यकाल में भी निगम ने सामाजिक सरोकार के बहुत काम किए।

2020 में भाजपा की श्रीमती ब्रजलता हाडा मेयर चुनी गई। उनके कार्यकाल में आनासागर में जलकुंभी और भारी बारिश के दौरान सडकों पर पानी फैलने की विकट समस्याएं आईं, जिनसे उन्होंने बखूबी निपटा। वे कूल माइंड रहीं, इस कारण विवादों में नहीं उलझीं। जाहिर तौर पर उनके पति डॉ प्रियशील हाडा, जो शहर जिला भाजपा के अध्यक्ष रहे, उनका भरपूर सहयोग किया। एक बार फिर अजमेर को महिला मेयर मिलने जा रही है।