दस करोड़ रुपए दे कर नगर सुधार न्यास का अध्यक्ष बनने व उसकी भरपाई करने की बात कहने के आरोप का कड़वा घूंट पी कर पद छोडऩे को भले ही धर्मेश जैन मजबूर हुए हों, मगर आखिरकार उन पर लगा दाग सीआईडी की रिपोर्ट से धुल हो गया है। हालांकि उन्हें इसका आज तक बड़ा मलाल है कि वे किसी षड्यंत्र का शिकार हुए और अपनी ही पार्टी के राज में इस्तीफा देना पड़ा, मगर राहत की बात ये है कि अब सीआईडी ने खुद कह दिया है कि जिस सीडी में जैन के बारे में कथित बात कही गई थी, वह संदिग्ध प्रतीत होती है और सीडी बनाने वाले का पता लगाना भी असंभव है। सीआईडी ने यह भी माना है कि किसी भूमाफिया ने इधर-उधर के वार्तालापों को कांट छांट कर सीडी को तैयार किया है।
जाहिर है पार्टी की वर्षों तक सेवा करने के बाद जो इनाम मिला, वह जिस जलालत के साथ छीना गया, उसकी जिल्लत असहनीय रही होगी। अंदर से आह भी निकली होगी षड्यंत्रकारियों के प्रति। आह उनके प्रति भी निकली होगी जिन्होंने षड्यंत्रकारियों द्वारा बनाई गई सीडी का इस्तेमाल कर के विधानसभा में मुद्दा बनाया। भले ही स्वयं जैन ये स्वीकार न करें, लेकिन आह तो तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रति भी निकली होगी, जिन्होंने मामले की जांच करवाने की बजाय एक झटके में उनसे इस्तीफा मांग कर उन्हीं जलील होने को मजबूर किया। भूमाफिया कौन थे, यह तो आज तक पता नहीं लगा, इस कारण उन पर आह का क्या असर हुआ, यह भी पता लगाना असंभव है, मगर बाद में उन्हें पद से हटने को मजबूर करने वालों पर तो आह का असर साफ दिखाई दे रहा है। तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती ने इस मामले पर विधानसभा में स्थगन प्रस्ताव रखा था, वे जैन की आह के कारण दुबारा विधायक नहीं बन पाए। इसी प्रकार विधानसभा में स्थगन प्रस्ताव पारित करवाने में अहम भूमिका निभाने वाले संयम लोढ़ा व माहिर आजाद भी दुबारा नहीं जीत पाए। वसुंधरा ने भी अपना बचाव करने के लिए जैन को शहीद कर दिया, वे भी आह के असर की वजह से दुबारा मुख्यमंत्री नहीं बन पाईं।
बहरहाल, जिस तरीके से जैन को पद से हटना पड़ा था, उससे उनका राजनीतिक कैरियर चौपट हो गया था। हालांकि बाद में भी पार्टी की सेवा करते रहने के कारण उनके पुत्र को नगर निगम चुनाव में टिकट दिया, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि उन पर लगा दाग ही उसकी हार का एक कारण बना। लेकिन अब जब कि सीडी ही संदिग्ध साबित हो गई है, उन पर लगा दाग मिट गया है और भविष्य में फिर राजनीतिक पद मिलने का रास्ता आसान हो गया है। होना तो यह चाहिए कि वसुंधरा को खुद अफसोस करते हुए जैन को फिर से किसी जिम्मेदारी वाले पद पर आसीन करना चाहिए, ताकि जो गलती हुई है, उसे रैक्टिफाई किया जा सके।
आखिर सीडी बनवाई किसने थी?
जिस सीडी की वजह से जैन को पद छोडऩा पड़ा, वह भले ही संदिग्ध साबित हो गई हो, मगर यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर सीडी बनवाई किसने? सीआईडी ने यह कह कर हाथ खड़े कर दिए हैं कि सीडी बनाने वालों का पता लगाना संभव प्रतीत नहीं होता है। सवाल ये भी उठता है कि सीडी सामने कैसे आई? इस बारे में अखबार वालों से जब पूछा गया तो उन्होंने स्रोत न बताने के अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए यह तथ्य उजागर नहीं किया कि उनके पास सीडी आई कैसे। अब सवाल ये उठता है कि जो सीडी विधानसभा के पटल पर रखी गई, वह कहां से आई? अब जब कि सारा मामला इस पर ही आ कर टिक गया है सीडी बनवाने वाले षड्यंत्रकारियों का पता लगाया जाए तो उन पर यह दायित्व आ गया है कि वे साफ करें कि उनके पास सीडी कैसे आई?
मंगलवार, 4 जनवरी 2011
रविवार, 2 जनवरी 2011
अजमेर को मंजू राजपाल, मंजू राजपाल को अजमेर सूट करेगा
भीलवाड़ा से अजमेर स्थानांतरित हो कर आ रही जिला कलेक्टर मंजू राजपाल के आगामी 6 दिसम्बर को कार्यभार संभालने की संभावना है। उनका पदापर्ण कैसा रहेगा, इसको लेकर अभी से चर्चा शुरू हो गई है। कुछ का ख्याल है कि अजमेर में चूंकि कपड़ा फाड़ राजनीति है, इस कारण उन्हें दिक्कत आएगी तो कुछ मानते हैं कि चूंकि यहां कपड़ा फाड़ राजनीति है, इसी कारण उनको अजमेर सूट करेगा। कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी सोच है कि अजमेर को मंजू राजपाल और मंजू राजपाल को अजमेर सूट करेगा।
असल में अजमेर ऐसा टिपिकल शहर है कि यदि ट्रिक से चला जाए तो यहां लोगों को चलाना बेहद आसान काम है। वजह सिर्फ इतनी है कि विपक्ष में चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, उनसे कोई खतरा नहीं होता। अलबत्ता आपस में कपड़े जरूर फाड़ते हैं, मगर प्रशासन के कपड़े सलामत रहते हैं। एक अर्थ में देखा जाए तो यहां विपक्ष नाम मात्र का है। और है भी तो केवल अखबारबाजी में। धरातल पर कोई खास गडबड़ नहीं होती। इस कारण यहां विपक्ष को सेट करने जैसी कोई समस्या नहीं है। अलबत्ता सत्तारूढ़ दल के लोगों को जरूर सैट करना पड़ता है। और अगर उन्हें सैट न किया तो वे ऐसी भूमिका निभाते हैं, जैसी कि विपक्ष भी नहीं अदा कर सकता। अब न्यास सचिव जनाब अश्फाक हुसैन को ही लीजिए। चूंकि वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खास हैं, इस कारण सत्तारूढ़ दल कांग्रेस को सैट करने की जरूरत नहीं समझी। नतीजतन कांग्रेस ने उनका जीना हराम कर रखा है। पहले तो उन्हें छेड़ा और थोड़ा छिड़े तो हंगामा करवा दिया। यानि जो ड्यूटी भाजपा की थी, वो कांग्रेस ने पूरी कर दी। भाजपा तो अब सोच रही है कि कुछ किया जाना चाहिए। मगर दिक्कत ये है कि करे कौन, शहर अध्यक्ष शिवशंकर हेडा तो दिन काट कर रहे हैं। बहरहाल, अश्फाक हुसैन पर बरस रही आग की आंच तो न्यास सदर व जिला कलेक्टर राजेश यादव तक आती दिखाई दे रही थी, मगर उनका तबादला हो गया। ये वही राजेश यादव हैं, जिनके आने पर यही माना गया था कि उन्हें भाजपाइयों को दुरुस्त करने को भेजा गया है। वे पाली में सत्तारूढ दल भाजपा के एक नेता को थप्पड़ मारने के कारण बड़े चर्चित थे। मगर आने पर उन्हें पता लगा कि यहां तो कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। रहा सवाल कांग्रेसियों का तो उनमें से कुछ सैट किया और कुछ कुढ़ते रहे, मगर कुछ कर नहीं पाए। और बड़े सुकून के साथ उनका कार्यकाल निकल गया। अब मंजू राजपाल की बारी है। यादव के लिए तो जरूर अजमेर नया था, लेकिन मंजू राजपाल अजमेर से सुपरिचित हैं और अजमेर के कुछ लोग उनसे अच्छी तरह सुपरिचित हैं। वे प्रोबशनरी पीरियड यहां काट चुकी हैं। तब उन्होंने अजमेर की नब्ज जानने वाले अश्फाक हुसैन से जमीनी तालीम ली थी। इस कारण मात नहीं खाएंगी। हालांकि बताते ये हैं कि अजमेर उन्हें भीलवाड़ा में मात खाने के कारण ही भेजा गया है। वहां गुर्जर आंदोलन से निपटने में कामयाब नहीं हो रही थीं तो राजसमंद के कलेक्टर औंकारसिंह को विशेष रूप से भेजा गया और उन्होंने दो दिन बंद रहा रेल यातायात शुरू करवाया। उनकी सफलता को देखते हुए ही उन्हें वहीं पर लगा दिया गया है। रहा सवाल अजमेर का तो यहां के गुर्जर आंदोलन का हश्र सबसे ने देख ही लिया। कांग्रेसियों ने उसकी हवा निकाल दी। लिहाजा मंजू राजपाल को कोई खास मशक्कत नहीं करनी है। हां, राज(कुमार जय)पाल से जरूर लाइजनिंग बैठानी होगी। जब हंगामा करने वाले से ही दोस्ती कर लेंगी तो हंगामा करेगा कौन? रहा सवाल विकास का तो केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट से ट्यूनिंग होना जरूरी है। राजेश यादव की ट्यूनिंग नहीं थी, इस कारण थोड़ी-बहुत दिक्कत आ रही थी, मगर उम्मीद है कि मंजू राजपाल के साथ ऐसा नहीं होगा। कदाचित उन्हीं की पसंद के मुताबिक ही उन्हें यहां लगाया गया हो। और... और मंजू राजपाल को अजमेर व अजमेर को मंजू राजपाल सूट करेंगी।
असल में अजमेर ऐसा टिपिकल शहर है कि यदि ट्रिक से चला जाए तो यहां लोगों को चलाना बेहद आसान काम है। वजह सिर्फ इतनी है कि विपक्ष में चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, उनसे कोई खतरा नहीं होता। अलबत्ता आपस में कपड़े जरूर फाड़ते हैं, मगर प्रशासन के कपड़े सलामत रहते हैं। एक अर्थ में देखा जाए तो यहां विपक्ष नाम मात्र का है। और है भी तो केवल अखबारबाजी में। धरातल पर कोई खास गडबड़ नहीं होती। इस कारण यहां विपक्ष को सेट करने जैसी कोई समस्या नहीं है। अलबत्ता सत्तारूढ़ दल के लोगों को जरूर सैट करना पड़ता है। और अगर उन्हें सैट न किया तो वे ऐसी भूमिका निभाते हैं, जैसी कि विपक्ष भी नहीं अदा कर सकता। अब न्यास सचिव जनाब अश्फाक हुसैन को ही लीजिए। चूंकि वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खास हैं, इस कारण सत्तारूढ़ दल कांग्रेस को सैट करने की जरूरत नहीं समझी। नतीजतन कांग्रेस ने उनका जीना हराम कर रखा है। पहले तो उन्हें छेड़ा और थोड़ा छिड़े तो हंगामा करवा दिया। यानि जो ड्यूटी भाजपा की थी, वो कांग्रेस ने पूरी कर दी। भाजपा तो अब सोच रही है कि कुछ किया जाना चाहिए। मगर दिक्कत ये है कि करे कौन, शहर अध्यक्ष शिवशंकर हेडा तो दिन काट कर रहे हैं। बहरहाल, अश्फाक हुसैन पर बरस रही आग की आंच तो न्यास सदर व जिला कलेक्टर राजेश यादव तक आती दिखाई दे रही थी, मगर उनका तबादला हो गया। ये वही राजेश यादव हैं, जिनके आने पर यही माना गया था कि उन्हें भाजपाइयों को दुरुस्त करने को भेजा गया है। वे पाली में सत्तारूढ दल भाजपा के एक नेता को थप्पड़ मारने के कारण बड़े चर्चित थे। मगर आने पर उन्हें पता लगा कि यहां तो कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। रहा सवाल कांग्रेसियों का तो उनमें से कुछ सैट किया और कुछ कुढ़ते रहे, मगर कुछ कर नहीं पाए। और बड़े सुकून के साथ उनका कार्यकाल निकल गया। अब मंजू राजपाल की बारी है। यादव के लिए तो जरूर अजमेर नया था, लेकिन मंजू राजपाल अजमेर से सुपरिचित हैं और अजमेर के कुछ लोग उनसे अच्छी तरह सुपरिचित हैं। वे प्रोबशनरी पीरियड यहां काट चुकी हैं। तब उन्होंने अजमेर की नब्ज जानने वाले अश्फाक हुसैन से जमीनी तालीम ली थी। इस कारण मात नहीं खाएंगी। हालांकि बताते ये हैं कि अजमेर उन्हें भीलवाड़ा में मात खाने के कारण ही भेजा गया है। वहां गुर्जर आंदोलन से निपटने में कामयाब नहीं हो रही थीं तो राजसमंद के कलेक्टर औंकारसिंह को विशेष रूप से भेजा गया और उन्होंने दो दिन बंद रहा रेल यातायात शुरू करवाया। उनकी सफलता को देखते हुए ही उन्हें वहीं पर लगा दिया गया है। रहा सवाल अजमेर का तो यहां के गुर्जर आंदोलन का हश्र सबसे ने देख ही लिया। कांग्रेसियों ने उसकी हवा निकाल दी। लिहाजा मंजू राजपाल को कोई खास मशक्कत नहीं करनी है। हां, राज(कुमार जय)पाल से जरूर लाइजनिंग बैठानी होगी। जब हंगामा करने वाले से ही दोस्ती कर लेंगी तो हंगामा करेगा कौन? रहा सवाल विकास का तो केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट से ट्यूनिंग होना जरूरी है। राजेश यादव की ट्यूनिंग नहीं थी, इस कारण थोड़ी-बहुत दिक्कत आ रही थी, मगर उम्मीद है कि मंजू राजपाल के साथ ऐसा नहीं होगा। कदाचित उन्हीं की पसंद के मुताबिक ही उन्हें यहां लगाया गया हो। और... और मंजू राजपाल को अजमेर व अजमेर को मंजू राजपाल सूट करेंगी।
शनिवार, 1 जनवरी 2011
हिसाब बराबर कर लिया कांग्रेसियों ने
घोषणा के बावजूद संयुक्त गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति की ओर से रेलवे ट्रेक को जाम करने का निर्णय टाल कर कांग्रेसियों ने कर्नल बैंसला के इशारे पर आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले ओमप्रकाश भडाणा से हिसाब बराबर कर दिया है। बुधवार को संयुक्त गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष व श्रीनगर के कांग्रेसी प्रधान रामनारायण के साथ अन्य कांग्रेसी सदस्यों एडवोकेट हरिसिंह, नौरत गुर्जर, सौरभ बजाड़ आदि ने आंदोलन में अब तक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे भडाणा को नजरअंदाज कर जिला प्रशासन के साथ वार्ता की और ट्रेक जाम करने का निर्णय स्थगति कर दिया। कांग्रेसियों ने इतनी चालाकी की कि भडाणा को वार्ता के बारे में जानकारी ही नहीं दी।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस विचारधारा से जुड़े गुर्जर नेता शुरू से आंदोलन के साथ खुल कर सामने नहीं आ रहे थे। वस्तुस्थिति तो ये है कि सक्रिय ही नहीं थे। अजमेर में चूंकि कांग्रेस विचारधारा के गुर्जरों का प्रभाव अधिक है और वे लगातार स्थानीय सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट के संपर्क में हैं, आंदोलन जोर ही नहीं पकड़ रहा था। जब समाज का दबाव पड़ा तो आखिरकार कांग्रेसियों को भी सामने आना पड़ा, मगर वे सचिन के दबाव और पार्टी के अनुशासन के तहत शांतिपूर्वक और प्रतीकात्मक आंदोलन करने को राजी हो गए। इस लिहाज से इसे भडाणा की कामयाबी ही मानी गई, भले ही उन्हें नेतृत्व श्रीनगर के कांग्रेसी प्रधान रामनारायण गुर्जर को सौंपना पड़ा। भडाणा की दूसरी कामयाबी ये रही कि उन्होंने कांग्रेसियों को आगे कर व्यापारिक महासंघ के अध्यक्ष व कांग्रेसी पार्षद मोहन लाल शर्मा को बाजार बंद में समर्थन देने को मना लिया। लेकिन बंद वाले दिन भडाणा ने शांतिपूर्ण आंदोलन को रुख पलट कर कांग्रेसियों को झटका दे दिया। नयाबाजार में तो गुर्जर व व्यापारी आमने-सामने आ गए। ऐसे में कांग्रेसियों को नीचा देखना पड़ा। शहर कांग्रेस अध्यक्ष जसराज जयपाल को गांधीवादी तरीके से बंद करवाने का वादा भी झूठा पड़ गया। कांग्रेसी होने के नाते उन्हें सहयोग करने वाले मोहन लाल शर्मा भी भडक़े। वे तो भडक़े ही उनके अति उत्साही शागिर्द रमेश लालवानी उनसे भी एक कदम आगे निकल गए और देहली गेट इलाके की छोटी सी संस्था पूज्य सिंधी पंचायत के बैनर का इस्तेमाल कर व्यापारियों व आंदोलनकारियों के टकराव को गुर्जर-सिंधी टकराव की ओर मोडऩे की कोशिश की, जबकि सिंधियों को इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है।
बहरहाल, पूरे प्रकरण से यह साफ-साफ संदेश गया कि आंदोलन कांग्रेसियों के हाथ से निकल गया है। जाहिर तौर पर यह उन्हें नागवार गुजरा और उन्होंने अपनी ताकत फिर खींचना शुरू कर दिया। नतीजतन मांगलियवास में ब्यावर रोड जाम तो हटा ही, दूसरे दिन रेलवे ट्रेक जाम के लिए भी अपेक्षित भीड़ नहीं जुटाई जा सकी, इस कारण उसे स्थगित करने का निर्णय लेना पड़ा। इतना ही उन्होंने भडाणा से बदला चुकाने के लिए जिला प्रशासन के बुलावे पर वार्ता की और उसमें भडाणा को बुलाया ही नहीं। साथ ही 4 जनवरी तक आंदोलन को टाल और दिया। इसके लिए उन्होंने बैंसला की सरकार से होने जा रही वार्ता की आड़ ली।
कुल मिला कर कांग्रेसियों ने तेजी से आगे बढ़ रहे भडाणा को झटका दे दिया है, जो शुरू से बैंसला का ही राग अलाप रहे हैं। भडाणा भले ही यह कहें कि वे संयुक्त संघर्ष समिति के अस्तित्व को नकार रहे हैं, मगर सच यह है कि कांगे्रेसियों ने उनका अस्तित्व नकार दिया है। इस पूरे मामले में अजमेर बार के अध्यक्ष किशन गुर्जर की भूमिका दिलचस्प रही। पहले तो उन्होंने कांग्रेसियों को पीछे छोड़ते हुए मांगलियावास में जाम लगवा दिया और फिर दूसरे दिन प्रशासन से वार्ता के दौरान उनके साथ हो लिए।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस विचारधारा से जुड़े गुर्जर नेता शुरू से आंदोलन के साथ खुल कर सामने नहीं आ रहे थे। वस्तुस्थिति तो ये है कि सक्रिय ही नहीं थे। अजमेर में चूंकि कांग्रेस विचारधारा के गुर्जरों का प्रभाव अधिक है और वे लगातार स्थानीय सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट के संपर्क में हैं, आंदोलन जोर ही नहीं पकड़ रहा था। जब समाज का दबाव पड़ा तो आखिरकार कांग्रेसियों को भी सामने आना पड़ा, मगर वे सचिन के दबाव और पार्टी के अनुशासन के तहत शांतिपूर्वक और प्रतीकात्मक आंदोलन करने को राजी हो गए। इस लिहाज से इसे भडाणा की कामयाबी ही मानी गई, भले ही उन्हें नेतृत्व श्रीनगर के कांग्रेसी प्रधान रामनारायण गुर्जर को सौंपना पड़ा। भडाणा की दूसरी कामयाबी ये रही कि उन्होंने कांग्रेसियों को आगे कर व्यापारिक महासंघ के अध्यक्ष व कांग्रेसी पार्षद मोहन लाल शर्मा को बाजार बंद में समर्थन देने को मना लिया। लेकिन बंद वाले दिन भडाणा ने शांतिपूर्ण आंदोलन को रुख पलट कर कांग्रेसियों को झटका दे दिया। नयाबाजार में तो गुर्जर व व्यापारी आमने-सामने आ गए। ऐसे में कांग्रेसियों को नीचा देखना पड़ा। शहर कांग्रेस अध्यक्ष जसराज जयपाल को गांधीवादी तरीके से बंद करवाने का वादा भी झूठा पड़ गया। कांग्रेसी होने के नाते उन्हें सहयोग करने वाले मोहन लाल शर्मा भी भडक़े। वे तो भडक़े ही उनके अति उत्साही शागिर्द रमेश लालवानी उनसे भी एक कदम आगे निकल गए और देहली गेट इलाके की छोटी सी संस्था पूज्य सिंधी पंचायत के बैनर का इस्तेमाल कर व्यापारियों व आंदोलनकारियों के टकराव को गुर्जर-सिंधी टकराव की ओर मोडऩे की कोशिश की, जबकि सिंधियों को इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है।
बहरहाल, पूरे प्रकरण से यह साफ-साफ संदेश गया कि आंदोलन कांग्रेसियों के हाथ से निकल गया है। जाहिर तौर पर यह उन्हें नागवार गुजरा और उन्होंने अपनी ताकत फिर खींचना शुरू कर दिया। नतीजतन मांगलियवास में ब्यावर रोड जाम तो हटा ही, दूसरे दिन रेलवे ट्रेक जाम के लिए भी अपेक्षित भीड़ नहीं जुटाई जा सकी, इस कारण उसे स्थगित करने का निर्णय लेना पड़ा। इतना ही उन्होंने भडाणा से बदला चुकाने के लिए जिला प्रशासन के बुलावे पर वार्ता की और उसमें भडाणा को बुलाया ही नहीं। साथ ही 4 जनवरी तक आंदोलन को टाल और दिया। इसके लिए उन्होंने बैंसला की सरकार से होने जा रही वार्ता की आड़ ली।
कुल मिला कर कांग्रेसियों ने तेजी से आगे बढ़ रहे भडाणा को झटका दे दिया है, जो शुरू से बैंसला का ही राग अलाप रहे हैं। भडाणा भले ही यह कहें कि वे संयुक्त संघर्ष समिति के अस्तित्व को नकार रहे हैं, मगर सच यह है कि कांगे्रेसियों ने उनका अस्तित्व नकार दिया है। इस पूरे मामले में अजमेर बार के अध्यक्ष किशन गुर्जर की भूमिका दिलचस्प रही। पहले तो उन्होंने कांग्रेसियों को पीछे छोड़ते हुए मांगलियावास में जाम लगवा दिया और फिर दूसरे दिन प्रशासन से वार्ता के दौरान उनके साथ हो लिए।
गुरुवार, 30 दिसंबर 2010
बिना गड़बड़ के कैसे मान गए गड़बड़?
मुस्लिम वक्फ बोर्ड के सदर के लिए हुए चुनाव में सेवानिवृत्त आईजीपी लियाकत अली के निर्विरोध जीतते ही स्पष्ट हो गया है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उन पर पहले से कायम आशीर्वाद बरकरार रखा है और इस पद के दूसरे दावेदार दरगाह सरवाड़ शरीफ के आरजी मुतवल्ली यूसुफ उर्फ गड़बड़ को गड़बड़ करने का मौका नहीं मिल पाया है। यही वजह रही वे अजमेर से तो निकले थे दावेदारी करने को, मगर वहां जा कर तलवार म्यान में डाल कर अपना समर्थन जता दिया। जिन पुष्कर विधायक श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ का पल्लू वे थाम कर चल रहे थे, वे भी खुल कर लियाकत अली के साथ हो लीं। और तो और बधाई देने वालों में भी वे ही छुटभैये सबसे आगे रहे, जो कि गड़बड़ का साथ दे रहे थे।
चुनाव भले ही शांतिपूर्वक व निर्विरोध हो गए हों, मगर चर्चा यही है कि यूसुफ गड़बड़ बिना कोई गड़बड़ किए चुप नहीं हुए हैं। जैसी उनकी फितरत है, बिना किसी मतलब के कुछ नहीं करते। इतने नादान भी नहीं कि जीतने या दावा करके कुछ पाने के बिना दावा करके चुनाव में अपनी फजीहत करवाएं। उनके करीबी उन्हें अच्छी तरह जानते हैं कि वे कितने गुरू घंटाल हैं। आरजी मुतवल्ली होने के कारण उनकी माली हालत खासी तगड़ी है। इसको लोग उन पर दरगाह में वित्तीय गड़बड़ के आरोपों से जोड़ कर देखते हैं। तीसरी आंख को तो पहले से पता था कि चुनाव जीतने के लिए पैसा पानी की तरह बहाने का माद्दा रखते हैं। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि लियाकत अली भी केवल मुख्यमंत्री के वरदहस्त पर निर्भर नहीं थे। वे भी दिल खोल कर बैठे थे। ऐसे अनेक गड़बड़ वे अपनी जेब में रखते हैं। जब पंजा लड़ा तो लियाकत भारी पड़ गए, ऐसे में गड़बड़ ने यही सोचा कि सार्वजनिक गड़बड़ क्यों की जाए, जब अंदर की गड़बड़ ही आखिरी रास्ता है। कुल मिला कर अपुन तो यही कहेंगे कि कोई गड़बड़ न करके भी गड़बड़ कर जाना हर किसी के बूते की बात नहीं।
चुनाव भले ही शांतिपूर्वक व निर्विरोध हो गए हों, मगर चर्चा यही है कि यूसुफ गड़बड़ बिना कोई गड़बड़ किए चुप नहीं हुए हैं। जैसी उनकी फितरत है, बिना किसी मतलब के कुछ नहीं करते। इतने नादान भी नहीं कि जीतने या दावा करके कुछ पाने के बिना दावा करके चुनाव में अपनी फजीहत करवाएं। उनके करीबी उन्हें अच्छी तरह जानते हैं कि वे कितने गुरू घंटाल हैं। आरजी मुतवल्ली होने के कारण उनकी माली हालत खासी तगड़ी है। इसको लोग उन पर दरगाह में वित्तीय गड़बड़ के आरोपों से जोड़ कर देखते हैं। तीसरी आंख को तो पहले से पता था कि चुनाव जीतने के लिए पैसा पानी की तरह बहाने का माद्दा रखते हैं। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि लियाकत अली भी केवल मुख्यमंत्री के वरदहस्त पर निर्भर नहीं थे। वे भी दिल खोल कर बैठे थे। ऐसे अनेक गड़बड़ वे अपनी जेब में रखते हैं। जब पंजा लड़ा तो लियाकत भारी पड़ गए, ऐसे में गड़बड़ ने यही सोचा कि सार्वजनिक गड़बड़ क्यों की जाए, जब अंदर की गड़बड़ ही आखिरी रास्ता है। कुल मिला कर अपुन तो यही कहेंगे कि कोई गड़बड़ न करके भी गड़बड़ कर जाना हर किसी के बूते की बात नहीं।
बुधवार, 29 दिसंबर 2010
ठगे से देखते रह गए कांग्रेसी आंदोलनकारी
कर्नल किरोड़ सिंह बैंसला के निर्देशन पर अजमेर में गुर्जर आंदोलन का संचालन कर रहे ओमप्रकाश भढ़ाणा ने सोमवार को ऐसा खेल खेला कि समाज के नाते बमुश्किल साथ आए कांग्रेसी नेता ठगे से देखते रह गए और आंदोलन उनके हाथ से निकल गया। आंदोलन में साथ देने के कारण संगठन में भी बुरे बने और आंदोलन हाथ से निकलने के कारण समाज के सामने भी ठिठोली का पात्र बन गए।
हालांकि शुरू से ओम प्रकाश भढ़ाणा ने पूरी ताकत झोंक रखी थी, लेकिन आंदोलन जोर नहीं पकड़ पा रहा था। तभी राजनीतिक जानकार यह समझने लगे थे कि एक ओर जहां पूरा प्रदेश गुर्जर आंदोलन से गरमाया हुआ है, वहीं अजमेर में यह उतना जोर नहीं पकड़ पा रहा, जितना कि यहां गुर्जरों की बहुलता के मद्देनजर होना चाहिए था। इसकी एक मात्र वजह ये भी कि किसी भी राजनीतिक दल से प्रतिबद्धता न रखने वाले गुर्जर नेताओं के लिए तो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन अधिसंख्य कांग्रेसी गुर्जर नेताओं के लिए इधर कुआं उधर खाई वाली स्थिति बनी हुई थी। कांग्रेसियों को डर था कि अगर आंदोलन में साथ दिया तो एक तो सीधे अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट से बुरे बनेंगे और कांग्रेस संगठन में भी हेय नजर से देखे जाएंगे। मगर साथ ही दूसरी ओर खतरा ये था कि आज यदि समाज का साथ नहीं देते तो जनाधार ही खिसक जाएगा। आगे राजनीति क्या खाक करेंगे। इसी उधेड़बुन में आखिरकार उन्होंने समाज को तरजीह देते हुए आंदोलन में खुल कर साथ देने का निश्चय किया। दिलचस्प बात ये रही कि इसके लिए गठित कोर कमेटी के सदर सचिन के ही खास व श्रीनगर प्रधान रामनारायण गुर्जर बनाए गए और कमेटी के अधिसंख्य नेता भी कांग्रेस ही थे। कांग्रेस के लिए जैसे ही यह अनहोनी हुई, मीडिया वालों ने शहर कांग्रेस अध्यक्ष जसराज जयपाल को पकड़ लिया। उनके पास कहने को क्या था, सच सबको दिखाई दे रहा था कि कांग्रेसी ही सरकार के खिलाफ चल रहे आंदोलन में साथ दे रहे हैं, मगर फिर भी उन्होंने गोलमोल जवाब देते हुए यही कहा कि आंदोलन में शरीक होने वाले कांग्रेसियों ने आश्वासन दिया है कि वे गांधीवादी तरीके से आंदोलन में शामिल हो रहे हैं।
मजेदार बात ये रही कि अजमेर बंद के लिए भी भढ़ाणा ने बड़ी चतुराई से इन्हीं कांग्रेसियों का सहारा लिया। व्यापारिक महासंघ के अध्यक्ष कांग्रेसी पार्षद मोहनलाल शर्मा और अन्य व्यापारियों को मनाने के लिए इन्हीं को आगे किया। कांग्रेसियों की लाज रखने के लिए शर्मा ने ही हामी भर दी कि एक दिन के शांतिपूर्ण बंद से क्या फर्क पड़ जाएगा। कुल मिला कर यही लग रहा था कि आंदोलन पर कांग्रेसियों की पकड़ बनी रहेगी और सब कुछ शांति से हो जाएगा, मगर हुआ उलटा ही। वैसा ही जैसा इससे पहले एक बार हो चुका है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन अचानक उग्र हो गया और गुर्जर कार्यकर्ताओं ने रोडवेज बस स्टैंड के सामने इतना हंगामा मचाया कि कांग्रेस नेता एडवोकेट हरिसिंह गुर्जर समझाते ही रह गए थे। सोमवार को भी जैसे ही भीड़ जमा हुई, वह कांग्रेसी नेताओं के कब्जे से बाहर हो गई। ऐसे में कांग्रेसी समझ गए कि मामला कुछ और हो गया है और अपने आपको इससे अलग रखना ही ठीक है। वे तो इधर-उधर हो गए और उग्र कार्यकर्ताओं ने कमान अपने हाथ में ले ली। जम कर हंगामा हुआ। नया बाजार में तो एक कार का शीशा तोड़़ दिए जाने पर हालात बेकाबू हो गए और टकराव होते-होते बचा। इस सब के बीच बार अध्यक्ष किशन गुर्जर ने भढ़ाणा से भी एक कदम आगे बढ़ते हुए ऐसा खेल खेला कि सब देखते ही रह गए। वे उग्र कार्यकर्ताओं को लेकर मांगलियावास पहुंच गए और अजमेर-अहमदाबाद मार्ग जाम कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने फोन पर कर्नल बैंसला से बात भी की और आगे के निर्देश मांगते हुए जता दिया कि कांग्रेसियों को आंदोलन से दूर छिटक दिया गया है। इस पूरे प्रकरण में मजेदार बात ये रही कि भढ़ाणा और किशन गुर्जर ने कांग्रेसी नेताओं को हवा तक न लगने दी कि वे अब कौन सा कदम उठाने जा रहे हैं। जाहिर है कि अब कांग्रेसी नेताओं के पास अपने संगठन के सामने केवल यही कहने को रह गया है कि उन्होंने तो बहुत कोशिश की, मगर उग्र कार्यकर्ता बस में ही नहीं रहे। ठीक वैसे ही जैसे बाबरी मस्जिद को घेरने पर उग्र कार्यकर्ताओं ने उसे शहीद कर दिया और भाजपा नेताओं को यही दलील देना पड़ी कि सब कुछ अचानक हो गया। कांग्रेसी नेताओं को अभी तो सचिन को भी जवाब देना होगा कि आखिर यह सब कैसे हो गया।
अजमेर में आंदोलन ने जो रुख अख्तियार किया, वह सचिन के लिए भी चिंताजनक तो है ही। वे प्रदेशभर के आंदोलन से निपटने की मंत्रणाओं में शामिल हैं और दूसरी ओर उनके गृह जिले में ही हालत उनके कब्जे में नहीं है।
हालांकि शुरू से ओम प्रकाश भढ़ाणा ने पूरी ताकत झोंक रखी थी, लेकिन आंदोलन जोर नहीं पकड़ पा रहा था। तभी राजनीतिक जानकार यह समझने लगे थे कि एक ओर जहां पूरा प्रदेश गुर्जर आंदोलन से गरमाया हुआ है, वहीं अजमेर में यह उतना जोर नहीं पकड़ पा रहा, जितना कि यहां गुर्जरों की बहुलता के मद्देनजर होना चाहिए था। इसकी एक मात्र वजह ये भी कि किसी भी राजनीतिक दल से प्रतिबद्धता न रखने वाले गुर्जर नेताओं के लिए तो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन अधिसंख्य कांग्रेसी गुर्जर नेताओं के लिए इधर कुआं उधर खाई वाली स्थिति बनी हुई थी। कांग्रेसियों को डर था कि अगर आंदोलन में साथ दिया तो एक तो सीधे अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट से बुरे बनेंगे और कांग्रेस संगठन में भी हेय नजर से देखे जाएंगे। मगर साथ ही दूसरी ओर खतरा ये था कि आज यदि समाज का साथ नहीं देते तो जनाधार ही खिसक जाएगा। आगे राजनीति क्या खाक करेंगे। इसी उधेड़बुन में आखिरकार उन्होंने समाज को तरजीह देते हुए आंदोलन में खुल कर साथ देने का निश्चय किया। दिलचस्प बात ये रही कि इसके लिए गठित कोर कमेटी के सदर सचिन के ही खास व श्रीनगर प्रधान रामनारायण गुर्जर बनाए गए और कमेटी के अधिसंख्य नेता भी कांग्रेस ही थे। कांग्रेस के लिए जैसे ही यह अनहोनी हुई, मीडिया वालों ने शहर कांग्रेस अध्यक्ष जसराज जयपाल को पकड़ लिया। उनके पास कहने को क्या था, सच सबको दिखाई दे रहा था कि कांग्रेसी ही सरकार के खिलाफ चल रहे आंदोलन में साथ दे रहे हैं, मगर फिर भी उन्होंने गोलमोल जवाब देते हुए यही कहा कि आंदोलन में शरीक होने वाले कांग्रेसियों ने आश्वासन दिया है कि वे गांधीवादी तरीके से आंदोलन में शामिल हो रहे हैं।
मजेदार बात ये रही कि अजमेर बंद के लिए भी भढ़ाणा ने बड़ी चतुराई से इन्हीं कांग्रेसियों का सहारा लिया। व्यापारिक महासंघ के अध्यक्ष कांग्रेसी पार्षद मोहनलाल शर्मा और अन्य व्यापारियों को मनाने के लिए इन्हीं को आगे किया। कांग्रेसियों की लाज रखने के लिए शर्मा ने ही हामी भर दी कि एक दिन के शांतिपूर्ण बंद से क्या फर्क पड़ जाएगा। कुल मिला कर यही लग रहा था कि आंदोलन पर कांग्रेसियों की पकड़ बनी रहेगी और सब कुछ शांति से हो जाएगा, मगर हुआ उलटा ही। वैसा ही जैसा इससे पहले एक बार हो चुका है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन अचानक उग्र हो गया और गुर्जर कार्यकर्ताओं ने रोडवेज बस स्टैंड के सामने इतना हंगामा मचाया कि कांग्रेस नेता एडवोकेट हरिसिंह गुर्जर समझाते ही रह गए थे। सोमवार को भी जैसे ही भीड़ जमा हुई, वह कांग्रेसी नेताओं के कब्जे से बाहर हो गई। ऐसे में कांग्रेसी समझ गए कि मामला कुछ और हो गया है और अपने आपको इससे अलग रखना ही ठीक है। वे तो इधर-उधर हो गए और उग्र कार्यकर्ताओं ने कमान अपने हाथ में ले ली। जम कर हंगामा हुआ। नया बाजार में तो एक कार का शीशा तोड़़ दिए जाने पर हालात बेकाबू हो गए और टकराव होते-होते बचा। इस सब के बीच बार अध्यक्ष किशन गुर्जर ने भढ़ाणा से भी एक कदम आगे बढ़ते हुए ऐसा खेल खेला कि सब देखते ही रह गए। वे उग्र कार्यकर्ताओं को लेकर मांगलियावास पहुंच गए और अजमेर-अहमदाबाद मार्ग जाम कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने फोन पर कर्नल बैंसला से बात भी की और आगे के निर्देश मांगते हुए जता दिया कि कांग्रेसियों को आंदोलन से दूर छिटक दिया गया है। इस पूरे प्रकरण में मजेदार बात ये रही कि भढ़ाणा और किशन गुर्जर ने कांग्रेसी नेताओं को हवा तक न लगने दी कि वे अब कौन सा कदम उठाने जा रहे हैं। जाहिर है कि अब कांग्रेसी नेताओं के पास अपने संगठन के सामने केवल यही कहने को रह गया है कि उन्होंने तो बहुत कोशिश की, मगर उग्र कार्यकर्ता बस में ही नहीं रहे। ठीक वैसे ही जैसे बाबरी मस्जिद को घेरने पर उग्र कार्यकर्ताओं ने उसे शहीद कर दिया और भाजपा नेताओं को यही दलील देना पड़ी कि सब कुछ अचानक हो गया। कांग्रेसी नेताओं को अभी तो सचिन को भी जवाब देना होगा कि आखिर यह सब कैसे हो गया।
अजमेर में आंदोलन ने जो रुख अख्तियार किया, वह सचिन के लिए भी चिंताजनक तो है ही। वे प्रदेशभर के आंदोलन से निपटने की मंत्रणाओं में शामिल हैं और दूसरी ओर उनके गृह जिले में ही हालत उनके कब्जे में नहीं है।
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