सीडी के लंका दहन कांड से निकल कर सुंदरकांड में पहुंचते ही नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन ने उन्हें शहीद करवाने में अहम भूमिका अदा करने वाले पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को ललकार दिया है। इतना ही नहीं उन्होंने खुद के कार्यकाल के साथ डॉ. बाहेती और पिछले दो साल के कार्यकाल की जांच करवाने की चुनौती दे दी है। समझा जाता है कि आने वाले दिनों वे न्यास को लेकर अन्य अनेक मामलों में ताबड़तोड़ हमले कर सकते हैं।
नए साल में बदली ग्रह दशा से उत्साहित जैन ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि यहा पता लगाया जाए कि आखिर सीडी आई कहां से थी। एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि जिस ऑडियो सीडी की वजह से उन्होंने नैतिकता के आधार पर अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, उस सीडी को सीआईडी सीबी ने जांच में संदिग्ध करार दे दिया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि वह सीडी उनके खिलाफ एक बड़ा षड्यंत्र था। सीडी बनाने वालों ने न केवल उन्हें अपितु प्रदेश की श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार को भी बदनाम करने की साजिश रची थी। उन्होंने कहा कि कदाचित भाजपा शासन काल में जांच रिपोर्ट पेश होती तो उस पर संदेह की गुंजाइश होती, मगर कांग्रेस शासन काल में ही जांच रिपोर्ट रखे जाने से साफ हो गया है कि उनके खिलाफ कितना बड़ा षड्यंत्र किया गया था।
जैन ने कहा कि सीआईडी सीबी ने साफ तौर पर माना है कि एफएसएल रिपोर्ट के अनुसार रिकार्डिंग की आवाज में कई अवरोध व जोड़ हैं, जिससे आवाज का प्रवाह जोड़-जोड़ कर बनाया गया है, अत: सीडी संदिग्ध प्रतीत होती है। हालांकि सीआईडी सीबी ने सीडी बनाने वाले का पता लगाना असंभव माना है, लेकिन यह सवाल आज भी मुंह बाये खड़ा है कि विधानसभा के पटल पर रखी गई सीडी आखिर आई कहां से? सरकार ने इसकी जांच क्यों नहीं की? सरकार से आग्रह है कि वह यह जांच कराए कि विधानसभा के में पेश की गई सीडी का मूल स्रोत क्या है? सरकार कांग्रेस के तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती से भी जवाब-तलब करे कि वे सीडी कहां से ले कर आए? कहीं इसमें वे स्वयं तो संलिप्त नहीं हैं? आज जब कि वह सीडी संदिग्ध करार दे दी गई है, वह कहां से आई, इसका जवाब देने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार हैं कांग्रेस के तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व अन्य विधायक, जिन्होंने बिना किसी ठोस आधार के विधानसभा की कार्यवाही को तुरंत रोक कर चर्चा करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने न केवल झूठ का सहारा लेकर स्थगन प्रस्ताव के जरिए विधानसभा की कार्यवाही बाधित की, अपितु तत्कालीन भाजपा सरकार और उन्हें बदनाम करने की साजिश भी रची। हालांकि सीआईडी सीबी ने सीडी बनाने वाले का पता लगाना असंभव माना है, लेकिन जब तक सीडी के मूल स्रोत का पता नहीं लग जाता, तब तक यह खुलासा होना कठिन है कि उस षड्यंत्र में शामिल कौन था?
जैने ने कहा कि जैसे ही सीडी उजागर हुई, उन्होंने स्वयं पहल कर नैतिकता के आधार पर पद त्याग दिया और उनके कार्यकाल की जांच कराने का आग्रह किया। अब मौजूदा कांग्रेस सरकार को खुली चुनौती है कि वह न केवल उनके कार्यकाल, अपितु सीडी प्रकरण को उछालने वाले तत्कालीन विधायक डॉ.श्रीगोपाल बाहेती के न्यास के अध्यक्षीय कार्यकाल के साथ पिछले दो साल के कार्यकाल की भी जांच कराए, ताकि यह खुलासा हो सके कि न्यास में किस हद तक भ्रष्टाचार किया जा रहा है और आम जनता कितनी पीडि़त है।
उन्होंने कहा कि बिना किसी ठोस आधार पर सीडी प्रकरण को उछालने का परिणाम ये हुआ कि उन्होंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया और उनके द्वारा शुरू किए गए सारे विकास कार्य ठप हो गए, जिसके लिए अजमेर की जनता डॉ. बाहेती को कोस रही है। कांग्रेस के सत्ता में आने बाद तो विकास कार्य पूरी तरह से बंद ही कर दिए गए हैं। अर्थात अकेले डॉ. बाहेती की वजह से अजमेर के तकरीबन तीन साल खराब हो गए हैं और कितना बड़ा नुकसान हुआ है। क्या बाहेती यह जवाब देंगे कि उनकी पार्टी की सरकार के बनने के बाद विकास कार्य क्यों बंद कर दिए और प्रशासन को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट क्यों दी हुई है, जिससे आम जनता त्रस्त है? हालात ये है कि कांग्रेस सरकार दो साल बाद तक भी न्यास में जनता के प्रतिनिधित्व वाला बोर्ड गठित नहीं कर पाई है। इन दो सालों में न्यास में किस प्रकार भ्रष्टाचार का नग्न तांडव हो रहा है, इसका खुलासा खुद कांग्रेस के ही जिम्मेदार पदाधिकारी ही कर रहे हैं। क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि सरकारी संरक्षण में ही प्रशासनिक अधिकारियों को भ्रष्टाचार करने की छूट दे रखी गई है?
जैन ने कहा कि अकेले एक मामले से ही स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस केवल झूठ पर ही टिकी हुई है। कांग्रेस ने आम जनता को बरगला कर पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगाए। वे बार-बार खुली चुनौती दे रही हैं कि आरोपों को साबित करके दिखाएं, मगर आज दो साल बाद तक एक भी आरोप को वह सच साबित नहीं कर पाई है। आम जनता अच्छी तरह से जान गई है कि कांग्रेस को आम जनता के हित और विकास से कोई लेना-देना नहीं है और वह खुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है।
न्यास में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अब भाजपा भी करेगी हमला
अजमेर नगर सुधार न्यास में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर सत्तारूढ़ दल ने तो आसमान सिर पर उठा ही रखा है, अब भाजपा भी इस मामले में न्यास को घेरने जा रही है। हालांकि पूर्व में बुधवार को ही प्रदर्शन कर ज्ञापन देने की योजना थी, मगर उस दिन पूर्व राज्यपाल बलिराम भगत के निधन की वजह से अवकाश घोषित होने के कारण उसे टाल दिया गया। अब समझा जाता है कि नई जिला कलेक्टर मंजू राजपाल के कार्यभार संभालने के बाद ही भाजपा हल्ला बोलेगी। लंबे समय की चुप्पी के बाद भाजपा भी चाहती है कि सक्रियता दिखाई जाए, वरना आम जनता में गलत संदेश जाएगा कि कांग्रेस सत्ता में होते हुए भी जनहित के मुद्दे को उठा रही है, जबकि भाजपा चुप बैठी है। समझा जाता है कि न्यास पर हमले की जिम्मेदारी मौटे तौर पर न्यास के पूर्व सदर धर्मेश जैन को सौंपी जा सकती है, क्यों कि उनकी न्यास के मामलों में अच्छी जानकारी है।
जानकारी के अनुसार भाजपा ने भी न्यास में हो रहे करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार के तथ्य जुटा लिए हैं और साथ ही उन कामों को भी सूचीबद्ध किया जा रहा है, जिनको भाजपा शासनकाल में शुरू किया गया, लेकिन कांग्रेस ने सत्ता में आते ही उन्हें बंद कर दिया।
मामले का दिलचस्प पहलु ये है कि कांग्रेस ने भले ही केवल न्यास सचिव अश्फाक हुसैन व विशेषाधिकारी अनुराग भार्गव को निशाना बनाया है, मगर न्यास के पदेन अध्यक्ष होने के नाते जिला कलेक्टर राजेश यादव पर भी इसकी जिम्मेदारी है। उनका तबादला कर मुख्यमंत्री कार्यालय में लगाए जाने पर भी कई तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोग कह रहे हंै कि यादव को बचाने के लिए सरकार ने ऐसा किया है, जबकि कुछ लोग मानते हैं कि उन्हें इसी कारण हटाया गया है, क्यों कि यादव तक भी आंच वाली थी। सच क्या है यह सरकार ही जाने, मगर चर्चा है कि कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन के बाद भी कोई कार्यवाही न होने के कारण अब भ्रष्टाचार के मामलों की सूची बना कर तथ्यों के साथ एसीबी को देने की रणनीति भी बनाई जा रही है। इसके अतिरिक्त सीबीआई जांच भी कराने पर जोर डाला जाएगा। समझा जाता है कि जिस प्रकार के प्रमाण हैं, न केवल जिम्मेदार अधिकारी अपितु कुछ प्रमुख भूमि दलाल शिकंजे में आ सकते हैं।
बुधवार, 5 जनवरी 2011
मंगलवार, 4 जनवरी 2011
यादव सीएमओ में, हासानी की बल्ले-बल्ले
अजमेर के जिला कलेक्टर राजेश यादव को सीएमओ में लगाने के राजनीतिक हलकों में जो भी अर्थ लगाए जा रहे हों, मगर इससे कांग्रेस के उन नेताओं के सीने पर सांप लौटने लगे हैं, जिनको यादव ने कभी नहीं गांठा। वे कई बार इसकी शिकायत मौखिक रूप से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से करते रहे, मगर यादव का बाल भी बांका नहीं हुआ। इस कारण कई कांग्रेसी इसी का इंतजार करते रहे कि कब यादव साहब यहां से रुखसत होंगे। वैसे भी आईएएस का बाल इतना कडक़ होता है कि उसे बांका किया ही नहीं जा सकता। एक अर्थ में देखा जाए तो यादव ने यहां राजा बन कर ही काम किया। अर्थ तो इसके भी लगाए जा रहे हैं कि सीएमओ में पहले से दो आईएएस होने के बावजूद यादव सहित दो और युवा आईएएस को क्यों लगाया गया है।
खैर, जहां तक यादव का सवाल है, शिकायतों के कारण बाल बांका होना तो दूर, उलटे यादव का कद और बढ़ गया है। यादव का कद तो बढ़ा सो बढ़ा, राजनीतिक हलकों में माया मंदिर वाले दीपक हासानी की भी अहमियत बढ़ गई। जैसे ही यह खबर आई कि यादव साहब सीएमओ में लगाए गए हैं, हासानी को भी बधाइयां मिलने लगीं। असल में हासानी की यादव से गहरी दोस्ती है। बताया जा रहा है कि जब से वे यूआईटी में अध्यक्ष पद के लिए हाथ मार रहे हैं, यादव भी उनकी मदद कर रहे हैं। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि प्रशासन से जो रिपोर्ट गई है, उसमें हासानी को इस पद के लिए सर्वाधिक अनुकूल माना गया है। एक तो वे संपन्न हैं, इस कारण पद पर बैठते ही खाने के लिए नहीं टूट पड़ेंगे, और दूसरा ये कि इससे कांग्रेस से खफा सिंधी समाज भी राजी हो जाएगा। अब जबकि यादव खुद ही सीएमओ में पहुंच गए हैं तो यूं समझो कि हासानी की बल्ले-बल्ले हो गई है। जाहिर तौर पर हासानी के लिए अब और बेहतर तरीके से लॉबिंग होगी। अकेले यूआईटी सदर के लिए क्यों और कई मामलों में भी हासानी के लिए यादव का सीएमओ में पहुंचना काफी महत्वपूर्ण है। सबको पता है कि हासानी की अफसरों में खासी उठ-बैठ है। यादव के सीएमओ में होने पर यह और भी बढ़ जाएगी।
खैर, जहां तक यादव का सवाल है, शिकायतों के कारण बाल बांका होना तो दूर, उलटे यादव का कद और बढ़ गया है। यादव का कद तो बढ़ा सो बढ़ा, राजनीतिक हलकों में माया मंदिर वाले दीपक हासानी की भी अहमियत बढ़ गई। जैसे ही यह खबर आई कि यादव साहब सीएमओ में लगाए गए हैं, हासानी को भी बधाइयां मिलने लगीं। असल में हासानी की यादव से गहरी दोस्ती है। बताया जा रहा है कि जब से वे यूआईटी में अध्यक्ष पद के लिए हाथ मार रहे हैं, यादव भी उनकी मदद कर रहे हैं। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि प्रशासन से जो रिपोर्ट गई है, उसमें हासानी को इस पद के लिए सर्वाधिक अनुकूल माना गया है। एक तो वे संपन्न हैं, इस कारण पद पर बैठते ही खाने के लिए नहीं टूट पड़ेंगे, और दूसरा ये कि इससे कांग्रेस से खफा सिंधी समाज भी राजी हो जाएगा। अब जबकि यादव खुद ही सीएमओ में पहुंच गए हैं तो यूं समझो कि हासानी की बल्ले-बल्ले हो गई है। जाहिर तौर पर हासानी के लिए अब और बेहतर तरीके से लॉबिंग होगी। अकेले यूआईटी सदर के लिए क्यों और कई मामलों में भी हासानी के लिए यादव का सीएमओ में पहुंचना काफी महत्वपूर्ण है। सबको पता है कि हासानी की अफसरों में खासी उठ-बैठ है। यादव के सीएमओ में होने पर यह और भी बढ़ जाएगी।
चलो दाग तो मिट गया धर्मेश जैन का
दस करोड़ रुपए दे कर नगर सुधार न्यास का अध्यक्ष बनने व उसकी भरपाई करने की बात कहने के आरोप का कड़वा घूंट पी कर पद छोडऩे को भले ही धर्मेश जैन मजबूर हुए हों, मगर आखिरकार उन पर लगा दाग सीआईडी की रिपोर्ट से धुल हो गया है। हालांकि उन्हें इसका आज तक बड़ा मलाल है कि वे किसी षड्यंत्र का शिकार हुए और अपनी ही पार्टी के राज में इस्तीफा देना पड़ा, मगर राहत की बात ये है कि अब सीआईडी ने खुद कह दिया है कि जिस सीडी में जैन के बारे में कथित बात कही गई थी, वह संदिग्ध प्रतीत होती है और सीडी बनाने वाले का पता लगाना भी असंभव है। सीआईडी ने यह भी माना है कि किसी भूमाफिया ने इधर-उधर के वार्तालापों को कांट छांट कर सीडी को तैयार किया है।
जाहिर है पार्टी की वर्षों तक सेवा करने के बाद जो इनाम मिला, वह जिस जलालत के साथ छीना गया, उसकी जिल्लत असहनीय रही होगी। अंदर से आह भी निकली होगी षड्यंत्रकारियों के प्रति। आह उनके प्रति भी निकली होगी जिन्होंने षड्यंत्रकारियों द्वारा बनाई गई सीडी का इस्तेमाल कर के विधानसभा में मुद्दा बनाया। भले ही स्वयं जैन ये स्वीकार न करें, लेकिन आह तो तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रति भी निकली होगी, जिन्होंने मामले की जांच करवाने की बजाय एक झटके में उनसे इस्तीफा मांग कर उन्हीं जलील होने को मजबूर किया। भूमाफिया कौन थे, यह तो आज तक पता नहीं लगा, इस कारण उन पर आह का क्या असर हुआ, यह भी पता लगाना असंभव है, मगर बाद में उन्हें पद से हटने को मजबूर करने वालों पर तो आह का असर साफ दिखाई दे रहा है। तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती ने इस मामले पर विधानसभा में स्थगन प्रस्ताव रखा था, वे जैन की आह के कारण दुबारा विधायक नहीं बन पाए। इसी प्रकार विधानसभा में स्थगन प्रस्ताव पारित करवाने में अहम भूमिका निभाने वाले संयम लोढ़ा व माहिर आजाद भी दुबारा नहीं जीत पाए। वसुंधरा ने भी अपना बचाव करने के लिए जैन को शहीद कर दिया, वे भी आह के असर की वजह से दुबारा मुख्यमंत्री नहीं बन पाईं।
बहरहाल, जिस तरीके से जैन को पद से हटना पड़ा था, उससे उनका राजनीतिक कैरियर चौपट हो गया था। हालांकि बाद में भी पार्टी की सेवा करते रहने के कारण उनके पुत्र को नगर निगम चुनाव में टिकट दिया, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि उन पर लगा दाग ही उसकी हार का एक कारण बना। लेकिन अब जब कि सीडी ही संदिग्ध साबित हो गई है, उन पर लगा दाग मिट गया है और भविष्य में फिर राजनीतिक पद मिलने का रास्ता आसान हो गया है। होना तो यह चाहिए कि वसुंधरा को खुद अफसोस करते हुए जैन को फिर से किसी जिम्मेदारी वाले पद पर आसीन करना चाहिए, ताकि जो गलती हुई है, उसे रैक्टिफाई किया जा सके।
आखिर सीडी बनवाई किसने थी?
जिस सीडी की वजह से जैन को पद छोडऩा पड़ा, वह भले ही संदिग्ध साबित हो गई हो, मगर यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर सीडी बनवाई किसने? सीआईडी ने यह कह कर हाथ खड़े कर दिए हैं कि सीडी बनाने वालों का पता लगाना संभव प्रतीत नहीं होता है। सवाल ये भी उठता है कि सीडी सामने कैसे आई? इस बारे में अखबार वालों से जब पूछा गया तो उन्होंने स्रोत न बताने के अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए यह तथ्य उजागर नहीं किया कि उनके पास सीडी आई कैसे। अब सवाल ये उठता है कि जो सीडी विधानसभा के पटल पर रखी गई, वह कहां से आई? अब जब कि सारा मामला इस पर ही आ कर टिक गया है सीडी बनवाने वाले षड्यंत्रकारियों का पता लगाया जाए तो उन पर यह दायित्व आ गया है कि वे साफ करें कि उनके पास सीडी कैसे आई?
जाहिर है पार्टी की वर्षों तक सेवा करने के बाद जो इनाम मिला, वह जिस जलालत के साथ छीना गया, उसकी जिल्लत असहनीय रही होगी। अंदर से आह भी निकली होगी षड्यंत्रकारियों के प्रति। आह उनके प्रति भी निकली होगी जिन्होंने षड्यंत्रकारियों द्वारा बनाई गई सीडी का इस्तेमाल कर के विधानसभा में मुद्दा बनाया। भले ही स्वयं जैन ये स्वीकार न करें, लेकिन आह तो तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रति भी निकली होगी, जिन्होंने मामले की जांच करवाने की बजाय एक झटके में उनसे इस्तीफा मांग कर उन्हीं जलील होने को मजबूर किया। भूमाफिया कौन थे, यह तो आज तक पता नहीं लगा, इस कारण उन पर आह का क्या असर हुआ, यह भी पता लगाना असंभव है, मगर बाद में उन्हें पद से हटने को मजबूर करने वालों पर तो आह का असर साफ दिखाई दे रहा है। तत्कालीन पुष्कर विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती ने इस मामले पर विधानसभा में स्थगन प्रस्ताव रखा था, वे जैन की आह के कारण दुबारा विधायक नहीं बन पाए। इसी प्रकार विधानसभा में स्थगन प्रस्ताव पारित करवाने में अहम भूमिका निभाने वाले संयम लोढ़ा व माहिर आजाद भी दुबारा नहीं जीत पाए। वसुंधरा ने भी अपना बचाव करने के लिए जैन को शहीद कर दिया, वे भी आह के असर की वजह से दुबारा मुख्यमंत्री नहीं बन पाईं।
बहरहाल, जिस तरीके से जैन को पद से हटना पड़ा था, उससे उनका राजनीतिक कैरियर चौपट हो गया था। हालांकि बाद में भी पार्टी की सेवा करते रहने के कारण उनके पुत्र को नगर निगम चुनाव में टिकट दिया, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि उन पर लगा दाग ही उसकी हार का एक कारण बना। लेकिन अब जब कि सीडी ही संदिग्ध साबित हो गई है, उन पर लगा दाग मिट गया है और भविष्य में फिर राजनीतिक पद मिलने का रास्ता आसान हो गया है। होना तो यह चाहिए कि वसुंधरा को खुद अफसोस करते हुए जैन को फिर से किसी जिम्मेदारी वाले पद पर आसीन करना चाहिए, ताकि जो गलती हुई है, उसे रैक्टिफाई किया जा सके।
आखिर सीडी बनवाई किसने थी?
जिस सीडी की वजह से जैन को पद छोडऩा पड़ा, वह भले ही संदिग्ध साबित हो गई हो, मगर यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर सीडी बनवाई किसने? सीआईडी ने यह कह कर हाथ खड़े कर दिए हैं कि सीडी बनाने वालों का पता लगाना संभव प्रतीत नहीं होता है। सवाल ये भी उठता है कि सीडी सामने कैसे आई? इस बारे में अखबार वालों से जब पूछा गया तो उन्होंने स्रोत न बताने के अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए यह तथ्य उजागर नहीं किया कि उनके पास सीडी आई कैसे। अब सवाल ये उठता है कि जो सीडी विधानसभा के पटल पर रखी गई, वह कहां से आई? अब जब कि सारा मामला इस पर ही आ कर टिक गया है सीडी बनवाने वाले षड्यंत्रकारियों का पता लगाया जाए तो उन पर यह दायित्व आ गया है कि वे साफ करें कि उनके पास सीडी कैसे आई?
रविवार, 2 जनवरी 2011
अजमेर को मंजू राजपाल, मंजू राजपाल को अजमेर सूट करेगा
भीलवाड़ा से अजमेर स्थानांतरित हो कर आ रही जिला कलेक्टर मंजू राजपाल के आगामी 6 दिसम्बर को कार्यभार संभालने की संभावना है। उनका पदापर्ण कैसा रहेगा, इसको लेकर अभी से चर्चा शुरू हो गई है। कुछ का ख्याल है कि अजमेर में चूंकि कपड़ा फाड़ राजनीति है, इस कारण उन्हें दिक्कत आएगी तो कुछ मानते हैं कि चूंकि यहां कपड़ा फाड़ राजनीति है, इसी कारण उनको अजमेर सूट करेगा। कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी सोच है कि अजमेर को मंजू राजपाल और मंजू राजपाल को अजमेर सूट करेगा।
असल में अजमेर ऐसा टिपिकल शहर है कि यदि ट्रिक से चला जाए तो यहां लोगों को चलाना बेहद आसान काम है। वजह सिर्फ इतनी है कि विपक्ष में चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, उनसे कोई खतरा नहीं होता। अलबत्ता आपस में कपड़े जरूर फाड़ते हैं, मगर प्रशासन के कपड़े सलामत रहते हैं। एक अर्थ में देखा जाए तो यहां विपक्ष नाम मात्र का है। और है भी तो केवल अखबारबाजी में। धरातल पर कोई खास गडबड़ नहीं होती। इस कारण यहां विपक्ष को सेट करने जैसी कोई समस्या नहीं है। अलबत्ता सत्तारूढ़ दल के लोगों को जरूर सैट करना पड़ता है। और अगर उन्हें सैट न किया तो वे ऐसी भूमिका निभाते हैं, जैसी कि विपक्ष भी नहीं अदा कर सकता। अब न्यास सचिव जनाब अश्फाक हुसैन को ही लीजिए। चूंकि वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खास हैं, इस कारण सत्तारूढ़ दल कांग्रेस को सैट करने की जरूरत नहीं समझी। नतीजतन कांग्रेस ने उनका जीना हराम कर रखा है। पहले तो उन्हें छेड़ा और थोड़ा छिड़े तो हंगामा करवा दिया। यानि जो ड्यूटी भाजपा की थी, वो कांग्रेस ने पूरी कर दी। भाजपा तो अब सोच रही है कि कुछ किया जाना चाहिए। मगर दिक्कत ये है कि करे कौन, शहर अध्यक्ष शिवशंकर हेडा तो दिन काट कर रहे हैं। बहरहाल, अश्फाक हुसैन पर बरस रही आग की आंच तो न्यास सदर व जिला कलेक्टर राजेश यादव तक आती दिखाई दे रही थी, मगर उनका तबादला हो गया। ये वही राजेश यादव हैं, जिनके आने पर यही माना गया था कि उन्हें भाजपाइयों को दुरुस्त करने को भेजा गया है। वे पाली में सत्तारूढ दल भाजपा के एक नेता को थप्पड़ मारने के कारण बड़े चर्चित थे। मगर आने पर उन्हें पता लगा कि यहां तो कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। रहा सवाल कांग्रेसियों का तो उनमें से कुछ सैट किया और कुछ कुढ़ते रहे, मगर कुछ कर नहीं पाए। और बड़े सुकून के साथ उनका कार्यकाल निकल गया। अब मंजू राजपाल की बारी है। यादव के लिए तो जरूर अजमेर नया था, लेकिन मंजू राजपाल अजमेर से सुपरिचित हैं और अजमेर के कुछ लोग उनसे अच्छी तरह सुपरिचित हैं। वे प्रोबशनरी पीरियड यहां काट चुकी हैं। तब उन्होंने अजमेर की नब्ज जानने वाले अश्फाक हुसैन से जमीनी तालीम ली थी। इस कारण मात नहीं खाएंगी। हालांकि बताते ये हैं कि अजमेर उन्हें भीलवाड़ा में मात खाने के कारण ही भेजा गया है। वहां गुर्जर आंदोलन से निपटने में कामयाब नहीं हो रही थीं तो राजसमंद के कलेक्टर औंकारसिंह को विशेष रूप से भेजा गया और उन्होंने दो दिन बंद रहा रेल यातायात शुरू करवाया। उनकी सफलता को देखते हुए ही उन्हें वहीं पर लगा दिया गया है। रहा सवाल अजमेर का तो यहां के गुर्जर आंदोलन का हश्र सबसे ने देख ही लिया। कांग्रेसियों ने उसकी हवा निकाल दी। लिहाजा मंजू राजपाल को कोई खास मशक्कत नहीं करनी है। हां, राज(कुमार जय)पाल से जरूर लाइजनिंग बैठानी होगी। जब हंगामा करने वाले से ही दोस्ती कर लेंगी तो हंगामा करेगा कौन? रहा सवाल विकास का तो केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट से ट्यूनिंग होना जरूरी है। राजेश यादव की ट्यूनिंग नहीं थी, इस कारण थोड़ी-बहुत दिक्कत आ रही थी, मगर उम्मीद है कि मंजू राजपाल के साथ ऐसा नहीं होगा। कदाचित उन्हीं की पसंद के मुताबिक ही उन्हें यहां लगाया गया हो। और... और मंजू राजपाल को अजमेर व अजमेर को मंजू राजपाल सूट करेंगी।
असल में अजमेर ऐसा टिपिकल शहर है कि यदि ट्रिक से चला जाए तो यहां लोगों को चलाना बेहद आसान काम है। वजह सिर्फ इतनी है कि विपक्ष में चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, उनसे कोई खतरा नहीं होता। अलबत्ता आपस में कपड़े जरूर फाड़ते हैं, मगर प्रशासन के कपड़े सलामत रहते हैं। एक अर्थ में देखा जाए तो यहां विपक्ष नाम मात्र का है। और है भी तो केवल अखबारबाजी में। धरातल पर कोई खास गडबड़ नहीं होती। इस कारण यहां विपक्ष को सेट करने जैसी कोई समस्या नहीं है। अलबत्ता सत्तारूढ़ दल के लोगों को जरूर सैट करना पड़ता है। और अगर उन्हें सैट न किया तो वे ऐसी भूमिका निभाते हैं, जैसी कि विपक्ष भी नहीं अदा कर सकता। अब न्यास सचिव जनाब अश्फाक हुसैन को ही लीजिए। चूंकि वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खास हैं, इस कारण सत्तारूढ़ दल कांग्रेस को सैट करने की जरूरत नहीं समझी। नतीजतन कांग्रेस ने उनका जीना हराम कर रखा है। पहले तो उन्हें छेड़ा और थोड़ा छिड़े तो हंगामा करवा दिया। यानि जो ड्यूटी भाजपा की थी, वो कांग्रेस ने पूरी कर दी। भाजपा तो अब सोच रही है कि कुछ किया जाना चाहिए। मगर दिक्कत ये है कि करे कौन, शहर अध्यक्ष शिवशंकर हेडा तो दिन काट कर रहे हैं। बहरहाल, अश्फाक हुसैन पर बरस रही आग की आंच तो न्यास सदर व जिला कलेक्टर राजेश यादव तक आती दिखाई दे रही थी, मगर उनका तबादला हो गया। ये वही राजेश यादव हैं, जिनके आने पर यही माना गया था कि उन्हें भाजपाइयों को दुरुस्त करने को भेजा गया है। वे पाली में सत्तारूढ दल भाजपा के एक नेता को थप्पड़ मारने के कारण बड़े चर्चित थे। मगर आने पर उन्हें पता लगा कि यहां तो कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। रहा सवाल कांग्रेसियों का तो उनमें से कुछ सैट किया और कुछ कुढ़ते रहे, मगर कुछ कर नहीं पाए। और बड़े सुकून के साथ उनका कार्यकाल निकल गया। अब मंजू राजपाल की बारी है। यादव के लिए तो जरूर अजमेर नया था, लेकिन मंजू राजपाल अजमेर से सुपरिचित हैं और अजमेर के कुछ लोग उनसे अच्छी तरह सुपरिचित हैं। वे प्रोबशनरी पीरियड यहां काट चुकी हैं। तब उन्होंने अजमेर की नब्ज जानने वाले अश्फाक हुसैन से जमीनी तालीम ली थी। इस कारण मात नहीं खाएंगी। हालांकि बताते ये हैं कि अजमेर उन्हें भीलवाड़ा में मात खाने के कारण ही भेजा गया है। वहां गुर्जर आंदोलन से निपटने में कामयाब नहीं हो रही थीं तो राजसमंद के कलेक्टर औंकारसिंह को विशेष रूप से भेजा गया और उन्होंने दो दिन बंद रहा रेल यातायात शुरू करवाया। उनकी सफलता को देखते हुए ही उन्हें वहीं पर लगा दिया गया है। रहा सवाल अजमेर का तो यहां के गुर्जर आंदोलन का हश्र सबसे ने देख ही लिया। कांग्रेसियों ने उसकी हवा निकाल दी। लिहाजा मंजू राजपाल को कोई खास मशक्कत नहीं करनी है। हां, राज(कुमार जय)पाल से जरूर लाइजनिंग बैठानी होगी। जब हंगामा करने वाले से ही दोस्ती कर लेंगी तो हंगामा करेगा कौन? रहा सवाल विकास का तो केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट से ट्यूनिंग होना जरूरी है। राजेश यादव की ट्यूनिंग नहीं थी, इस कारण थोड़ी-बहुत दिक्कत आ रही थी, मगर उम्मीद है कि मंजू राजपाल के साथ ऐसा नहीं होगा। कदाचित उन्हीं की पसंद के मुताबिक ही उन्हें यहां लगाया गया हो। और... और मंजू राजपाल को अजमेर व अजमेर को मंजू राजपाल सूट करेंगी।
शनिवार, 1 जनवरी 2011
हिसाब बराबर कर लिया कांग्रेसियों ने
घोषणा के बावजूद संयुक्त गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति की ओर से रेलवे ट्रेक को जाम करने का निर्णय टाल कर कांग्रेसियों ने कर्नल बैंसला के इशारे पर आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले ओमप्रकाश भडाणा से हिसाब बराबर कर दिया है। बुधवार को संयुक्त गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष व श्रीनगर के कांग्रेसी प्रधान रामनारायण के साथ अन्य कांग्रेसी सदस्यों एडवोकेट हरिसिंह, नौरत गुर्जर, सौरभ बजाड़ आदि ने आंदोलन में अब तक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे भडाणा को नजरअंदाज कर जिला प्रशासन के साथ वार्ता की और ट्रेक जाम करने का निर्णय स्थगति कर दिया। कांग्रेसियों ने इतनी चालाकी की कि भडाणा को वार्ता के बारे में जानकारी ही नहीं दी।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस विचारधारा से जुड़े गुर्जर नेता शुरू से आंदोलन के साथ खुल कर सामने नहीं आ रहे थे। वस्तुस्थिति तो ये है कि सक्रिय ही नहीं थे। अजमेर में चूंकि कांग्रेस विचारधारा के गुर्जरों का प्रभाव अधिक है और वे लगातार स्थानीय सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट के संपर्क में हैं, आंदोलन जोर ही नहीं पकड़ रहा था। जब समाज का दबाव पड़ा तो आखिरकार कांग्रेसियों को भी सामने आना पड़ा, मगर वे सचिन के दबाव और पार्टी के अनुशासन के तहत शांतिपूर्वक और प्रतीकात्मक आंदोलन करने को राजी हो गए। इस लिहाज से इसे भडाणा की कामयाबी ही मानी गई, भले ही उन्हें नेतृत्व श्रीनगर के कांग्रेसी प्रधान रामनारायण गुर्जर को सौंपना पड़ा। भडाणा की दूसरी कामयाबी ये रही कि उन्होंने कांग्रेसियों को आगे कर व्यापारिक महासंघ के अध्यक्ष व कांग्रेसी पार्षद मोहन लाल शर्मा को बाजार बंद में समर्थन देने को मना लिया। लेकिन बंद वाले दिन भडाणा ने शांतिपूर्ण आंदोलन को रुख पलट कर कांग्रेसियों को झटका दे दिया। नयाबाजार में तो गुर्जर व व्यापारी आमने-सामने आ गए। ऐसे में कांग्रेसियों को नीचा देखना पड़ा। शहर कांग्रेस अध्यक्ष जसराज जयपाल को गांधीवादी तरीके से बंद करवाने का वादा भी झूठा पड़ गया। कांग्रेसी होने के नाते उन्हें सहयोग करने वाले मोहन लाल शर्मा भी भडक़े। वे तो भडक़े ही उनके अति उत्साही शागिर्द रमेश लालवानी उनसे भी एक कदम आगे निकल गए और देहली गेट इलाके की छोटी सी संस्था पूज्य सिंधी पंचायत के बैनर का इस्तेमाल कर व्यापारियों व आंदोलनकारियों के टकराव को गुर्जर-सिंधी टकराव की ओर मोडऩे की कोशिश की, जबकि सिंधियों को इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है।
बहरहाल, पूरे प्रकरण से यह साफ-साफ संदेश गया कि आंदोलन कांग्रेसियों के हाथ से निकल गया है। जाहिर तौर पर यह उन्हें नागवार गुजरा और उन्होंने अपनी ताकत फिर खींचना शुरू कर दिया। नतीजतन मांगलियवास में ब्यावर रोड जाम तो हटा ही, दूसरे दिन रेलवे ट्रेक जाम के लिए भी अपेक्षित भीड़ नहीं जुटाई जा सकी, इस कारण उसे स्थगित करने का निर्णय लेना पड़ा। इतना ही उन्होंने भडाणा से बदला चुकाने के लिए जिला प्रशासन के बुलावे पर वार्ता की और उसमें भडाणा को बुलाया ही नहीं। साथ ही 4 जनवरी तक आंदोलन को टाल और दिया। इसके लिए उन्होंने बैंसला की सरकार से होने जा रही वार्ता की आड़ ली।
कुल मिला कर कांग्रेसियों ने तेजी से आगे बढ़ रहे भडाणा को झटका दे दिया है, जो शुरू से बैंसला का ही राग अलाप रहे हैं। भडाणा भले ही यह कहें कि वे संयुक्त संघर्ष समिति के अस्तित्व को नकार रहे हैं, मगर सच यह है कि कांगे्रेसियों ने उनका अस्तित्व नकार दिया है। इस पूरे मामले में अजमेर बार के अध्यक्ष किशन गुर्जर की भूमिका दिलचस्प रही। पहले तो उन्होंने कांग्रेसियों को पीछे छोड़ते हुए मांगलियावास में जाम लगवा दिया और फिर दूसरे दिन प्रशासन से वार्ता के दौरान उनके साथ हो लिए।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस विचारधारा से जुड़े गुर्जर नेता शुरू से आंदोलन के साथ खुल कर सामने नहीं आ रहे थे। वस्तुस्थिति तो ये है कि सक्रिय ही नहीं थे। अजमेर में चूंकि कांग्रेस विचारधारा के गुर्जरों का प्रभाव अधिक है और वे लगातार स्थानीय सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट के संपर्क में हैं, आंदोलन जोर ही नहीं पकड़ रहा था। जब समाज का दबाव पड़ा तो आखिरकार कांग्रेसियों को भी सामने आना पड़ा, मगर वे सचिन के दबाव और पार्टी के अनुशासन के तहत शांतिपूर्वक और प्रतीकात्मक आंदोलन करने को राजी हो गए। इस लिहाज से इसे भडाणा की कामयाबी ही मानी गई, भले ही उन्हें नेतृत्व श्रीनगर के कांग्रेसी प्रधान रामनारायण गुर्जर को सौंपना पड़ा। भडाणा की दूसरी कामयाबी ये रही कि उन्होंने कांग्रेसियों को आगे कर व्यापारिक महासंघ के अध्यक्ष व कांग्रेसी पार्षद मोहन लाल शर्मा को बाजार बंद में समर्थन देने को मना लिया। लेकिन बंद वाले दिन भडाणा ने शांतिपूर्ण आंदोलन को रुख पलट कर कांग्रेसियों को झटका दे दिया। नयाबाजार में तो गुर्जर व व्यापारी आमने-सामने आ गए। ऐसे में कांग्रेसियों को नीचा देखना पड़ा। शहर कांग्रेस अध्यक्ष जसराज जयपाल को गांधीवादी तरीके से बंद करवाने का वादा भी झूठा पड़ गया। कांग्रेसी होने के नाते उन्हें सहयोग करने वाले मोहन लाल शर्मा भी भडक़े। वे तो भडक़े ही उनके अति उत्साही शागिर्द रमेश लालवानी उनसे भी एक कदम आगे निकल गए और देहली गेट इलाके की छोटी सी संस्था पूज्य सिंधी पंचायत के बैनर का इस्तेमाल कर व्यापारियों व आंदोलनकारियों के टकराव को गुर्जर-सिंधी टकराव की ओर मोडऩे की कोशिश की, जबकि सिंधियों को इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है।
बहरहाल, पूरे प्रकरण से यह साफ-साफ संदेश गया कि आंदोलन कांग्रेसियों के हाथ से निकल गया है। जाहिर तौर पर यह उन्हें नागवार गुजरा और उन्होंने अपनी ताकत फिर खींचना शुरू कर दिया। नतीजतन मांगलियवास में ब्यावर रोड जाम तो हटा ही, दूसरे दिन रेलवे ट्रेक जाम के लिए भी अपेक्षित भीड़ नहीं जुटाई जा सकी, इस कारण उसे स्थगित करने का निर्णय लेना पड़ा। इतना ही उन्होंने भडाणा से बदला चुकाने के लिए जिला प्रशासन के बुलावे पर वार्ता की और उसमें भडाणा को बुलाया ही नहीं। साथ ही 4 जनवरी तक आंदोलन को टाल और दिया। इसके लिए उन्होंने बैंसला की सरकार से होने जा रही वार्ता की आड़ ली।
कुल मिला कर कांग्रेसियों ने तेजी से आगे बढ़ रहे भडाणा को झटका दे दिया है, जो शुरू से बैंसला का ही राग अलाप रहे हैं। भडाणा भले ही यह कहें कि वे संयुक्त संघर्ष समिति के अस्तित्व को नकार रहे हैं, मगर सच यह है कि कांगे्रेसियों ने उनका अस्तित्व नकार दिया है। इस पूरे मामले में अजमेर बार के अध्यक्ष किशन गुर्जर की भूमिका दिलचस्प रही। पहले तो उन्होंने कांग्रेसियों को पीछे छोड़ते हुए मांगलियावास में जाम लगवा दिया और फिर दूसरे दिन प्रशासन से वार्ता के दौरान उनके साथ हो लिए।
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