गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

न्यास अध्यक्ष पद को लेकर उभरा खंडेलवाल का नाम

अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का मामला काफी दिन से अटका हुआ है, इस कारण अब जब भी इसके बारे में कोई समाचार आता है तो यही लगता है कि अफवाह होगी, मगर ताजा जानकारी ये है कि इस पद को लेकर यकायक कवायद तेज हो गई है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दावेदारों की भागदौड़ में यूं तो पूर्व विधायक डॉ. के. सी. चौधरी व पूर्व उपमंत्री ललित भाटी का नाम चल रहा बताया, मगर हाल ही शहर के प्रमुख समाजसेवी व व्यवसायी कालीचरण खंडेलवाल का नाम इन दोनों से आगे आ गया बताया। इसके पीछे तर्क ये दिया जा रहा है कि वे पिछले काफी दिन से अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट के संपर्क में हैं और दूसरा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की भी पसंद बन गए हैं, क्योंकि उनके खासमखास पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती भी उनका समर्थन कर रहे हैं। जानकारी ये भी है कि इस पद से वंचित और उसके एवज में शहर कांग्रेस अध्यक्ष बने महेन्द्र सिंह रलावता भी उनकी पैरवी कर रहे हैं।
यहां उल्लेखनीय है कि कोई दस 0िदन पहले तक यह सूचना थी कि सरकार ने काफी जद्दोजहद के बाद डॉ. चौधरी व भाटी के नामों का पैनल बनाया था। उनमें से किसे इस पद से नवाजा जाएगा, इस पर मुहर सचिन पायलट को लगानी थी। जैसी की जानकारी है, पायलट का झुकाव चौधरी की ओर था। उसकी अहम वजह ये रही कि वे भाटी की तुलना में उनके ज्यादा करीब हैं। मगर अजमेर के वैश्य समाज के प्रमुख नेताओं के सक्रिय होने के बाद अचानक खंडेलवाल का नाम उभर आया है।
विश्लेषकों का मानना है कि डॉ. चौधरी के नाम इस कारण सामने था आया, क्योंकि किसी सिंधी अथवा वैश्य को बनाए जाने के फार्मूले में वैश्य को सरकार ज्यादा मुफीद समझती है। हालांकि सिंधी समाज के नेता नरेन शहाणी भगत की प्रबल दावेदारी रही है, वैश्य समुदाय ने यह तर्क दिया बताया कि अभी सिंधी समुदाय को खुश करने के लिए भले ही किसी सिंधी नेता को अध्यक्ष बना दिया जाए, मगर विधानसभा चुनाव में फिर किसी सिंधी को ही टिकट दिए जाने की बात सामने आएगी। वैश्य समुदाय की यह सोच इस कारण भी बनी है कि पिछले चुनाव में वैश्य समुदाय के एकजुट होने और भाजपा के परंपरागत वोटों में सेंध मारने के बाद भी उनके प्रत्याशी डॉ. श्रीगोपाल बाहेती हार गए, इस कारण अगली बार कांग्रेस सिंधी समाज की दावेदारी को काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी। यही वजह है कि उसने दबाव बनाया कि न्यास अध्यक्ष व विधायक की टिकट, दोनों में एक उसके लिए तय की जाए। अभी किसी सिंधी को अध्यक्ष बनाया जाता है तो विधानसभा की टिकट उनके लिए तय कर दी जाए। और अगर अभी वैश्य को मौका दिया जाता है तो वह विधानसभा चुनाव की दावेदारी छोड़ देगा। माना ये जा रहा है कि कांग्रेस हाईकमान भी विधानसभा चुनाव में दुबारा सिंधी समाज को नाराज करने के मूड में नहीं है। ऐसे में किसी वैश्य को ही बनाने की जोड़तोड़ चल रही है। वैश्य समुदाय से यूं तो सबसे तगड़े दावेदार डॉ. श्रीगोपाल बाहेती हैं, मगर पायलट उनके लिए तैयार नहीं हो रहे। यही वजह है कि किसी और वैश्य के नाम पर चर्चा शुरू हो गई। डॉ. चौधरी राजनीति के खिलाड़ी हैं, इस कारण उन्होंने पूरा जोर लगा दिया और एक बार तो लगा कि वे ही घोषित होने वाले हैं, मगर यकायक खंडलेवाल का नाम सामने आ गया है। चौधरी के खिलाफ सबसे बड़ा तर्क ये दिया जा रहा है कि वे मूलत: किशनगढ़ और बाद में ब्यावर के रहे हैं। कदाचित स्थानीय वैश्य समुदाय भी चौधरी की बजाय खंडेलवाल का समर्थन कर रहा है। चूंकि चुनाव में खंडेलवाल ने डॉ. बाहेती का साथ दिया था, इस कारण डॉ. बाहेती भी उनका साथ दे रहे हैं।
यूं ललित भाटी ने भी पूरा जोर लगा दिया है और तर्क ये है कि कभी कांग्रेस के लिए पक्की रही सीट अजमेर दक्षिण (जो पहले अजमेर पूर्व थी) को फिर कब्जे में लेने के लिए इस कोली बहुल इलाके में कांग्रेस को फिर मजबूत करना है तो भाटी को अहमियत देनी होगी। मगर भाटी के खिलाफ सबसे बड़ा रोड़ा ये आ रहा है कि अन्य जाति वर्ग उनकी नियुक्ति को उचित नहीं मानते। उनका तर्क ये है कि पहले से अजमेर शहर की एक सीट विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इसके अतिरिक्त मेयर भी अनुसूचित जाति से है। ऐसे में शहर की एक और महत्वपूर्ण सीट भी अनुसूचित जाति के नेता को देना अन्य जातियों के साथ अन्याय होगा।
कुल मिला कर लगता यही है कि वैश्य समुदाय में से ही किसी को मौका मिलेगा, जिसमें फिलहाल खंडलेवाल का नाम सबसे ऊपर आ गया है।

मुफ्त दवा योजना बेहतरीन, मगर सावधानियां भी जरूरी

राज्य सरकार की ओर से 2 अक्टूबर से शुरू की मुफ्त दवा योजना बेशक बेहतरीन है, मगर उसको विफल किए जाने की आशंकाएं भी कम नहीं हैं। ऐसे में सरकार को अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी।
वस्तुत: यह सही है कि आम आदमी के इलाज का जिम्मा अगर सरकार लेती है तो इससे बेहतरीन कल्याणकारी योजना कोई हो ही नहीं सकती। इसकी अहम वजह ये है कि लाख कोशिशों के बाद भी दवा माफिया पर काबू नहीं पाया जा सका है। दवा माफिया ने ब्रांडेड और उन्नत किस्म की दवा के नाम पर बड़े पैमाने पर कमीशनबाजी शुरू कर जहां चिकित्सकों को मालामाल कर दिया है, वहीं आम आदमी की कमर ही तोड़ दी है। कल्पना कीजिए कि एक जेनेरिक दवाई अगर मात्र दस रुपए में आती है और उसी साल्ट की ब्रांडेड कंपनी की दवा सौ रुपए में है तो जाहिर तौर पर उसे बेचने के लिए दवा लिखने वाले डॉक्टरों को मोटी राशी बतौर कमीशन दी जाती है। डॉक्टर भी उसी कंपनी की दवाई लिखते हैं, जो उनको ज्यादा कमीशन देती है। हालांकि सरकार ने आदेश जारी कर केवल जेनेरिक दवाई ही लिखने के आदेश जारी कर दिए, मगर पूरा मार्केट माफियाओं के चंगुल में इस कदर जकड़ा हुआ है कि उस आदेश पर ठीक से अमल हो ही नहीं पाया। अगर कोई डॉक्टर जेनेरिक दवाई लिख भी देता है तो वह दवा मार्केट में आसानी से मिलती ही नहीं, ऐसे में मरीज मजबूर हो कर ब्रांडेड दवाई लेने को ही मजबूर होता है। जब सरकार ने देखा कि उसके आदेश का पर अमल हो ही नहीं रहा तो उसने आखिरकार ऐसी योजना बना दी, जिससे माफिया की चालें ध्वस्त हो जाएंगी। जाहिर तौर पर जब मरीज को अस्पताल में ही मुफ्त दवाई उपलब्ध करवा दी जाएगी तो वह बाजार में जाएगा ही नहीं। इन सबके बाद भी सरकार की इस योजना को लेकर भारी आशंकाएं हैं। एक आशंका तो ये है कि कमीशन के आदी हो चुके डॉक्टर इसे विफल करने के तरीके निकालेंगे। कदाचित वे यह कह सकते हैं कि वह सरकार के कहने पर अमुक जेनेरिक दवाई लिख तो रहा है और वह अस्पताल में मिल भी जाएगी, मगर असर नहीं करेगी। यदि असरकारक दवाई चाहिए तो अमुक ब्रांडेड दवाई लेनी होगी। इसके अतिरिक्त दवा माफिया भी यह प्रचारित कर रहे हैं कि जेनेरिक दवाइयां घटिया होती हैं। ऐसे में सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये है कि उसे एक तो सावधानी से जेनेरिक दवाई खरीदनी होगी और दूसरा उसके प्रति विश्वास कायम हो, इसके भरसक प्रचास करने होंगे। अगर आम आदमी में विश्वास कायम नहीं किया जा सका तो सरकार की योजना विफल हो सकती है। यदि मरीज को जेनेरिक दवाई पर यकीन नहीं हुआ तो वह मुफ्त में मिल रही दवाई की बजाय ब्रांडेड दवाई ही खरीदेगा। सरकार को जेनेरिक दवाई की गुणवत्ता कायम रखने पर पूरा जोर लगाना होगा। अगर इस मामले में भाई-भतीजावाद और रिश्वतखोरी चली तो घटिया कंपनियों को माल सप्लाई करने का मौका मिल जाएगा। यदि कुछेक मामले ऐसे हुए कि जेनेरिक दवाई से मरीज ठीक नहीं हुआ तो जाहिर तौर पर उसका प्रचार दवा माफिया जम कर करेगा।
एक बड़ी आशंका ये भी है कि क्या सरकार वाकई उतनी दवाई उपलब्ध करवा पाएगी, जितनी कि जरूरत है? क्या सरकार ने वाकई पूरा आकलन कर लिया है कि प्रतिदिन कितने मरीजों के लिए कितनी दवाई की खपत है? इसके अतिरिक्त क्या समय पर दवा कंपनियां माल सप्लाई कर पाएंगी? अगर कुछ दवाई अस्पताल से मिली और कुछ बाहर से खरीदनी पड़ी तो भी योजना पर संकट आ सकता है। एक खतरा ये भी है कि सरकारी दवाई में कहीं बंदरबांट न हो जाए। अगर अस्पताल प्रशासन मुस्तैद नहीं रहा तो सरकारी दवाई बिकने को मार्केट में चली जाएगी। कुल मिला कर योजना तभी कारगर होगी, जबकि सरकार इस मामले की मॉनिटरिंग मुस्तैदी से करेगी।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

न्यास चेयरमेन के पैनल में है के. सी. चौधरी व भाटी का नाम



हालांकि अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी करने वाले नेता अब थक गए हैं और उन्हें उम्मीद कम ही है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार के बाकी बचे कार्यकाल के लिए न्यास अध्यक्ष की नियुक्ति करेंगे, मगर राजनीतिक गलियारों में यकायक दो नए नाम चर्चा में आ गए हैं। ये नाम हैं पूर्व विधायक डॉ. के. सी. चौधरी व पूर्व उपमंत्री ललित भाटी के। बताया जा रहा है कि सरकार ने काफी जद्दोजहद के बाद इन दो नाम का पैनल बनाया है और उस पर विचार कर अपनी राय देने के लिए अजमेर के सांसद व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट को भेज दिया है। सरकार चाहती है कि पायलट की सहमति से ही अध्यक्ष बनाया जाए, ताकि कोई विवाद हो तो वे ही उससे निपटें। वैसे भी पायलट का हाईकमान में इतना दखल है कि उनको नजरअंदाज कर किसी को अध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता।
जैसे ये दोनों नाम सामने आए हैं, राजनीतिक विश्लेषक माथपच्ची करने में जुट गए हैं कि आखिर इन दोनों के नाम कैसे उभरे और इन दोनों में से कौन नंबर वन हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि कभी कांग्रेस के लिए पक्की रही सीट अजमेर दक्षिण (जो पहले अजमेर पूर्व थी) को फिर कब्जे में लेने के लिए वह उस कोली बहुल इलाके के प्रमुख व सर्वसम्मत नेता पूर्व उप मंत्री ललित भाटी को मजबूत करना चाहती है। वह जानती है कि जब तक भाटी को मजबूत नहीं किया जाता, वहां के कोली वोटों पर फिर कब्जा नहीं किया जा सकता। वर्तमान में भाजपा विधायक श्रीमती अनीता भदेल की वजह से कोली वोटों पर कांग्रेस की पहले जैसी पकड़ नहीं रही है। और जब श्रीमती भदेल के सामने कोई कोली नेता खड़ा नहीं किया जाता, उसका अधिकांश हिस्सा भाजपा की ओर झुक जाता है। यह एक सच्चाई है कि कोली वोटों की अहमियत को समझते हुए ही भाजपा ने मेयर पद के लिए कोली नेता डॉ. प्रियशील हाड़ा पर दाव खेला था, मगर वह कामयाब इस कारण नहीं हो पाया क्योंकि अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल अन्य जातियां लामबंद हो गईं थीं। दूसरा बताया ये जाता है कि श्रीमती भदेल नहीं चाहती थीं कि उनके रहते कोई दूसरा भाजपा नेता उनके समाज में खड़ा हो। मेयर का चुनाव तो पूरे शहर का था, मगर यदि अजमेर दक्षिण की बात करें तो वहां कोली वोटों का ही वर्चस्व है। इस लिहाज से कांग्रेस की सोच ठीक ही प्रतीत होती है, मगर भाटी के खिलाफ सबसे बड़ा रोड़ा ये आ रहा है कि अन्य जाति वर्ग उनकी नियुक्ति को उचित नहीं मानते। उनका तर्क ये है कि पहले से अजमेर शहर की एक सीट विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इसके अतिरिक्त मेयर भी अनुसूचित जाति से है। ऐसे में शहर की एक और महत्वपूर्ण सीट भी अनुसूचित जाति के नेता को देना अन्य जातियों के साथ अन्याय होगा।
जहां तक ब्यावर के पूर्व विधायक डॉ. चौधरी के नाम का सवाल है, यह वैश्य समुदाय को खुश करने के लिए सामने आया है। असल में माना ये जा रहा था कि महेन्द्र सिंह रलावता को शहर कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पिछले विधानसभा चुनाव में टिकट से वंचित रहे सिंधी समाज के नेता नरेन शहाणी भगत ही प्रबल दावेदार रह गए हैं। मगर इसमें वैश्य समुदाय ने लंगी मारने की कोशिश शुरू कर दी। उनका तर्क ये है कि अभी सिंधी समुदाय को खुश करने के लिए भले ही किसी सिंधी नेता को अध्यक्ष बना दिया जाए, मगर विधानसभा चुनाव में फिर किसी सिंधी को ही टिकट दिए जाने की बात सामने आएगी। वैश्य वर्ग समझ रहा है कि पिछले चुनाव में वैश्य समुदाय के एकजुट होने और भाजपा के परंपरागत वोटों में सेंध मारने के बाद भी उनके प्रत्याशी डॉ. श्रीगोपाल बाहेती हार गए, इस कारण अगली बार कांग्रेस सिंधी समाज की दावेदारी को काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी। इसी कारण उसने दबाव बनाया कि न्यास अध्यक्ष व विधायक की टिकट, दोनों में एक उसके लिए सुनिश्चित की जाए। अगर अभी किसी सिंधी को अध्यक्ष बनाया जाता है तो विधानसभा की टिकट उनके लिए तय कर दी जाए। और अगर अभी वैश्य को मौका दिया जाता है तो वह विधानसभा चुनाव की दावेदारी छोड़ देगा। कांग्रेस हाईकमान भी समझ रहा है कि विधानसभा चुनाव में दुबारा सिंधी समाज को नाराज नहीं किया जा सकता, इस कारण न्यास अध्यक्ष की कुर्सी किसी वैश्य नेता को देने का मानस बना रही है। वैश्य वर्ग से डॉ. श्रीगोपाल बाहेती प्रबल दावेदार हैं, मगर पायलट से नाइत्तफाकी की वजह से उनका नंबर आता दिखाई नहीं देता। पूर्व में मुकेश पोखरणा का नाम भी सामने आया था, लेकिन साथ ही कालीचरण खंडेलवाल की पायलट से नजदीकी के कारण उनका नाम भी लिया जाने लगा। इसी प्रकार किन्हीं गोपी चंद लढ़ा का नाम भी चर्चा में आया बताया। इन सबके साथ दिक्कत ये है कि ये सभी राजनीति में शून्य हैं। इन सबमें पूर्व विधायक डॉ. चौधरी को ही ज्यादा उपयुक्त माना जा रहा है। वे प्रदेश कांगेस के कोषाध्यक्ष भी रह चुके हैं। अर्थात मनी मैनेजमेंट में माहिर हैं। हालांकि उनके खिलाफ एक सबसे बड़ा तर्क ये दिया जा सकता है कि वे मूलत: किशनगढ़ और बाद में ब्यावर के रहे हैं। मगर साथ ही दूसरा पहलु ये है कि कांग्रेस ने नानकराम जगतराय के चुनाव के अतिरिक्त सचिन पायलट के चुनाव में उनका उपयोग अजमेर में करके सफलता हासिल की है, अत: उन्हें अजमेर से बाहर का नहीं माना जा सकता।
जहां तक डॉ. चौधरी व भाटी में से किसी एक के नाम पर सहमति बनाने का सवाल है, जाहिर तौर पर वैश्य वर्ग के नाते उनका नाम ही तय हो सकता है। वे पायलट के काफी करीब भी हैं। भाटी के मुकाबले तो निश्चित रूप से नजदीक हैं ही। देखते हैं दोनों में से किस पर पायलट हाथ रखते हैं। यूं दावेदारों में नरेन शहानी के अतिरिक्त पिछले दिनों पूर्व सूचना आयुक्त एम. डी. कोरानी के पुत्र शशांक कोरानी का नाम भी है। वैश्य वर्ग से वरिष्ठ कांग्रेसी प्रकाश गदिया और डॉ. सुरेश गर्ग भी पूरी ताकत लगाए हुए हैं। देखते हैं क्या होता है?

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

शहर भाजपा में चल रही सिर फुटव्वल से ही फूटा ज्वालामुखी

भाजपा का प्रदेश नेतृत्व भले ही भारतीय जनता युवा मोर्चा की अजमेर शहर अध्यक्ष की हाल ही में हुई नियुक्ति को लेकर उठे बवाल को अनुशासनहीनता करार दे, मगर यह खुद उसके यहां मौजूद गुटबाजी और अजमेर भाजपा में चल रही सिर फुटव्वल का ही परिणाम है।
असल में इस पद के कुल तीन दावेदारों नीतेश आत्रे, गौरव टाक व देवेन्द्र सिंह शेखावत के नाम का पैनल बना कर जयपुर भेजा गया था। इनमें से नीतेश आत्रे विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी खेमे के माने जाते हैं, जबकि विधायक अनिता भदेल ने गौरव टाक पर हाथ रख रखा था। इन दोनों को लेकर कुछ न कुछ परेशानी थी, लेकिन दोनों विधायकों के दबाव की वजह से पैनल में उनका नाम आ गया। देवनानी को पूरी उम्मीद थी कि वे अपनी पसंद के आत्रे को अध्यक्ष बनवाने में कामयाब हो जाएंगे और संभावना भी यही थी, मगर जयपुर में देवनानी की विरोधी लॉबी अचानक सक्रिय हो गई और उसने झटपट देवेन्द्र सिंह शेखावत का नाम फाइनल करवा कर घोषित भी कर दिया। उस लॉबी की रुचि इस बात में नहीं थी कि शेखावत को अध्यक्ष बनाया जाए, बल्कि इस बात में ज्यादा थी कि देवनानी को झटका दिया जाए। हालांकि अनिता भदेल को पता लग गया था कि उनकी ओर से प्रस्तावित नाम तय नहीं हो रहा है, मगर उन्हें इस बात से संतुष्टि थी कि देवनानी की ओर से पेश किया गया नाम भी तय नहीं हो रहा है, इस कारण उन्होंने ऐन वक्त पर शेखावत के नाम पर सहमति जता दी। जहां तक शेखावत का सवाल है, वे लाला बन्ना के नाम से प्रसिद्ध पूर्व नगर परिषद सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत के बेहद करीबी हैं। इसके बावजूद उन पर गुटबाजी की छाप कोई खास गहरी नहीं हैं और सभी गुटों के नेताओं से संपर्क रखने में माहिर हैं। उनका नेगेटिव प्वाइंट है तो केवल ये कि वे कई साल तक जीसीए में एसडब्ल्यूओ के बैनर तले एबीवीपी की बारह बजाते रहे हैं। मगर यह भी सच है कि साथ ही हाल के कुछ वर्षों में युवा मोर्चा के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं। उनके विरोधी युवा नेता प्रशांत यादव उनके नेगेटिव प्वाइंट को ही आधार बना कर विरोध कर रहे हैं, मगर अकेला यह बिंदु इस कारण कारगर नहीं हो पाएगा क्योंकि ऐसे तो जिला भाजपा में कई बड़े नेता हैं, जिनकी निष्ठा पूर्व में कहीं और रही है। खुद शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत भी किसी जमाने में भीम से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं, जबकि बाद में भाजपा में आने के बाद चार बार सांसद बने। इसी प्रकार पूर्व जल संसाधन मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट भी मूलत: भाजपा से नहीं थे। रहा सवाल मेयर के चुनाव में डॉ. प्रियशील हाड़ा के खिलाफ काम करने के आरोप का तो ऐसे कई नेता हैं, जिन पर बगावत करने का आरोप है, मगर उनके खिलाफ अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। ऐसे में इस आरोप को कितनी गंभीरता से लिया जाएगा, समझा जा सकता है।
बहरहाल, जैसे ही शेखावत की नियुक्ति हुई तो मानो भूचाल आ गया। नीतेश आत्रे के नेतृत्व में पार्टी का अनुशासन सड़क पर तार-तार कर दिया गया। असंतुष्ट कार्यकर्ता अजमेर भाजपा के भीष्म पितामह औंकारसिंह लखावत के घर पर भी प्रदर्शन करने पहुंच गए। वे समझते हैं कि लखावत के देवनानी से नाइत्तफाकी रखने के कारण ही आत्रे की नियुक्ति नहीं हो पाई। मजे की बात ये रही कि असंतुष्ट कार्यकर्ता देवनानी के घर पर भी प्रदर्शन करने पहुंच गए। इसे इस रूप में लिया गया कि ऐसा देवनानी के कहने से ही हुआ है। दरअसल जैसे ही कार्यर्ताओं ने भाजपा का बैनल आग के हवाले किया, सारा ठीकरा देवनानी पर ही फूटने की नौबत आ गई। यही माना जाना लगा कि उनके इशारे पर ही हंगामा हुआ है। कदाचित इस आरोप से बचने के लिए उन्होंने इशारा किया कि खुद उनके घर पर भी प्रदर्शन की रस्म निभा दी जाए। आत्रे देवनानी गुट के ही हैं, इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि उनके खेमे के भाजयुमो राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नीरज जैन ने भी शेखावत की नियुक्ति पर सवालिया निशान लगा दिया है। उनका कहना है कि नियुक्ति के समय आम कार्यकर्ताओं की भावना का ध्यान नहीं रखा गया और नियुक्ति पर फिर से विचार होना चाहिए। जाहिर तौर पर जैन के लिए यह पचा पाना कठिन है कि उनके गुट के आत्रे को अध्यक्ष नहीं बनवा पाए। ज्ञातव्य है कि हाल ही वे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बन कर अपनी धाक जमा चुके हैं। हालांकि उनकी नियुक्ति में देवनानी की कोई खास भूमिका नहीं रही और वे अपने दम पर ही बन कर आए हैं, मगर खुद अपने ही शहर में अपनी पसंद का अध्यक्ष न बनवा पाना वाकई कष्टप्रद कहा जाएगा।
अब रहा सवाल असंतुष्टों पर कार्यवाही का तो लगता तो यही है कि प्रदेश हाईकमान इसे गंभीरता से ले रहा है। असल में उसका ऐतराज इस बात पर ज्यादा है कि जिस तरह से सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया गया और प्रदेश नेतृत्व का चुनौती दी गई, वह संगठन के लिए काफी घातक है। असंतुष्ट युवा नेता प्रशांत यादव को तो आदर्श मंडल अध्यक्ष घीसूलाल गढ़वाल ने मंडल मंत्री पद से मुक्त भी कर दिया है। अन्य के खिलाफ भी कार्यवाही होने की पूरी संभावना है। दूसरी ओर असंतुष्ट भी कमजोर नहीं हैं। उनके पास कार्यकर्ताओं की अच्छी ताकत है। इसी कारण एकाएक शांत होते नजर नहीं आते। वे घोषणा भी कर चुके हैं कि वे शेखावत को किसी भी सूरत में अध्यक्ष नहीं मानेंगे और आत्रे के नेतृत्व में युवा शक्ति का गठन करेंगे। देखना ये है कि पार्टी उनको मनाने में कामयाब हो पाती है या नहीं।

सोमवार, 12 सितंबर 2011

इलायची बाई की गद्दी को मिला राजनीतिक वारिस

किन्नर गुरू इलायची बाई की गद्दी के लिए मशहूर अजमेर शरीफ में पहली बार एक किन्नर को नगर निगम का पार्षद बनने का खुशनसीबी हासिल हुई है। बताते तो यहां तक हैं कि सोनम के नाम से सुपरिचित यह किन्नर पूरे देश में भी सरकार की ओर से मनोनीत पहला किन्नर है। शहर की सियासत में दिलचस्पी रखने वाला शायद ही कोई शख्स हो, जो सोनम किन्नर को न जानता हो। अजमेर ही नहीं, कांग्रेस के जयपुर और दिल्ली दरबार तक में इसकी पहचान है, जहां ये बेधड़क दस्तक दे देता है।
असल में सोनम किन्नर का नाम आते ही एक जलजले का ख्याल मन में उभर आता है। तकरीबन 26 साल का सोनम मूलत: केकड़ी का रहने वाला बताया जाता है। जब से इसने अजमेर की कांग्रेसी राजनीति में दस्तक दी है, धरने-प्रदर्शन में इसी का बोलबाला रहता आया है। कई बार तो ऐसा लगा कि शहर कांग्रेस के साबिक सदर जसराज जयपाल की सदारत में किए जा रहे प्रदर्शन को इसने अपने हिसाब से ही दिशा दे दी। जैसा की अमूमन होता है कि किन्नर अमूमन मुंहफट होते हैं, इस कारण कोई भी उसके सामने आ कर अपनी फजीहत करवाना पसंद नहीं करता। असामान्य शख्सियत के कारण किन्नर की मौजूदगी हंसी-ठ_े का माहौल पैदा कर देता है। ठीक वैसे ही सोनम की मौजूदगी कांग्रेस के छोटे-मोटे आंदोलनों में अलग की मंजर पैदा कर देता है। कई बार तो ऐसा भी हुआ जब किसी वीआईपी के सामने कोई बात रखने के लिए उसका उपयोग किया गया। वह बिंदास हो कर अपनी बात कहने में माहिर है। संयोग से वह खूबसूरत और जवान भी है, इस कारण उसको एकाएक कोई भी नेता नजरअंदाज नहीं करता। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के दरबार में भी वह बेधड़क घुसा जाता है। बताते हैं कि अपने खास अंदाज की बदौलत उसने कांग्रेस के दिग्गज नेता मुकुल वासनिक के यहां भी उसकी खूब चलती है। उन्हीं की बदौलत उसको पार्षद बनने का मौका मिला बताते हैं। कांग्रेस हाईकमान में उसने अपनी कितनी हैसियत बना रखी है कि पिछले निगम चुनाव में बागी बन कर खड़े होने के बाद भी उसे मनोनीत किया गया है।
उसके मनोनयन पर जहां कुछ कांग्रेसी इस बात से खफा हैं कि क्या उसके अलावा उन्हें कोई मर्द या औरत नहीं मिली, तो कुछ इस बात से खुश हैं कि वह भाजपा पार्षदों को छठी का दूध याद दिलाएगा। बहरहाल, अजमेर के सियासी गलियारे में सोनम किन्नर की मौजूदगी क्या गुला खिलाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा, मगर इतना तय माना जा रहा है कि पहले से कपड़ा फाड़ सियासत का ठिकाना बने हुए नगर निगम में अब पहले से ज्यादा हंगामे हुआ करेंगे। हालांकि खुद सोनम का मानना है कि वह हंगामा अपने खातिर नहीं, बल्कि शहर की खातिर करता है। वह शहर के विकास केलिए कुछ करना चाहता है। उसके आगे पीछे तो कोई है नहीं है, जिसके लिए वह अपने पद का दुरुपयोग करेगा। रहा सवाल आजीविका का तो वह किन्नर होने के नाते वैसे ही खूब फलफूल रहा है। इसलिए सारा ध्यान शहर की भलाई पर लगा देगा। सरकार की ओर से पार्षद बनाए जाने से वह इतना खुश है कि शुकवार को कांग्रेस दफ्तर में उसके खुशी के आंसू थामे नहीं थम रहे थे। उसके ये आंसू कितने सच्चे हैं, और वह शहर के भले के लिए क्या करता है, यह तो वक्त ही बताएगा। अजमेरवासियों के लिए उसके एक पार्षद का किन्नर होना कितने गौरव की बात है, मगर किन्नर जमात केलिए तो यह जश्र का मौका है ही। वे इस बात ये खुश हैं कि एक ओर जहां लागे किन्नरों को हंसी ठिठोली का पात्र मानते हैं, वहीं सरकार ने उन्हें पहली बार सियासत में जगह दी है।