शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

मजबूत तो हैं, मगर मजबूर भी कम नहीं संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा


एक ओर जहां अजमेर का यह सौभाग्य है कि मौजूदा संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा अजमेर के ही रहने वाले हैं और वे अजमेर के लिए कुछ करना चाहते हैं, मगर साथ ही दुर्भाग्य ये भी है कि वे कई बार मजबूत होने के बाद भी राजनीतिक कारणों से मजबूर साबित हुए हैं। मौजूदा जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल की भी अजमेर में कुछ कर दिखाने की मानसिकता है। यह एक आदर्श स्थिति है, मगर फिर भी संभागीय आयुक्त कमजोर साबित हो गए हैं। हालत ये है कि अब वे उनसे मिलने जाने वालों के सामने राजनीतिज्ञों व आम जनता का सहयोग न मिलने का रोना रोते दिखाई देते हैं। उन्हें बड़ा अफसोस है कि वे अपने पद का पूरा उपयोग करते हुए अजमेर का विकास करना चाहते हैं, मगर जैसा चाहते हैं, वैसा कर नहीं पाते।
असल में यह शहर वर्षों से अतिक्रमण और यातायात अव्यवस्था से बेहद पीडि़त है। पिछले पच्चीस साल के कालखंड में अकेले पूर्व कलेक्टर श्रीमती अदिति मेहता को ही यह श्रेय जाता है कि उन्होंने मजबूत इरादे के साथ अतिक्रमण हटा कर शहर का कायाकल्प कर दिया था। वे भी जब संभागीय आयुक्त बनीं तो उनके तेवर ढ़ीले पड़ गए। और जो भी कलेक्टर आए वे मात्र नौकरी करके चले गए। उन्होंने कभी शहर की हालत सुधारने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। इसकी एक मात्र वजह ये है कि यहां राजनीतिक दखलंदाजी बहुत अधिक है, इस कारण प्रशासनिक अधिकारी कुछ करने की बजाय शांति से नौकरी करना पसंद करते हैं।
यह सही है कि जैसा वरदहस्त अदिति मेहता को तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत का मिला हुआ था, वैसा मौजूदा संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा व जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल पर नजर नहीं आता। बावजूद इसके उन्होंने मिल कर कुछ करना चाहा, मगर राजनीति आड़े आ गई।
आपको याद होगा कि कुछ अरसे पहले संभागीय आयुक्त शर्मा के विशेष प्रयासों से शहर को आवारा जानवरों से मुक्त करने का अभियान शुरू हुआ, मगर चूंकि राजनीति में असर रखने वालों ने केन्द्रीय राज्य मंत्री सचिन पायलट का दबाव डलवा दिया, इस कारण वह अभियान टांय टांय फिस्स हो गया। नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया व तेज तर्रार सीईओ सी. आर. मीणा तक को मन मसोस कर रह जाना पड़ा। वे दोनों भी कोई कीर्तिमान स्थापित करने के चक्कर में थे, मगर पार्षदों की आए दिन की सिर फुटव्वल के कारण अब हिम्मत हार कर बैठे हैं।
अतिक्रमण के मामले को ही लें। यह अजमेर शहर का दुर्भाग्य ही है कि जब भी प्रशासन अजमेर शहर की बिगड़ती यातायात व्यवस्था को सुधारने के उपाय शुरू करता है, अतिक्रमण हटाता है, शहर वासियों के दम पर नेतागिरी करने वाले लोग राजनीति शुरू कर देते हैं। शहर के हित में प्रशासन को साथ देना तो दूर, उलटे उसमें रोड़े अटकाना शुरू कर देते हैं। यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए वन-वे करने के निर्णय उसी राजनीति की भेंट चढ़ गया। वे अड़े तो बहुत, मगर जब ऊपर डंडा पड़ा तो व्यापारियों से समझौता कर लिया।
एक प्रकरण देखिए। पिछले दिनों संभागीय आयुक्त शर्मा और जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल के प्रयासों से टे्रफिक मैनेजमेंट कमेटी की अनुशंसा पर यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए जवाहर रंगमंच के बाहर बनी गुमटियों को दस साल ही लीज समाप्त होने के बाद हटाया गया तो शहर के नेता यकायक जाग गए। जहां कुछ कांग्रेसी पार्षदों ने वोटों की राजनीति की खातिर गरीबों का रोजगार छीनने का मुद्दा बनाते हुए जेसीबी मशीन के आगे तांडव नृत्य कर बाधा डालने की कोशिश की, वहीं भाजपा दूसरे दिन जागी और कांग्रेसी पार्षदों पर घडिय़ाली आंसू बहाने का आरोप लगाते हुए प्रशासन को निरंकुश करार दे दिया। गुमटियां तोडऩे पर इस प्रकार उद्वेलित हो कर नेताओं ने यह साबित करने की कोशिश की कि प्रशासन तो जन-विरोधी है, जबकि वे स्वयं गरीबों के सच्चे हितैषी। विरोध करने वालों को इतनी भी शर्म नहीं आई कि अगर वे इस प्रकार करेंगे तो प्रशासनिक अधिकारी शहर के विकास में रुचि क्यों लेंगे। केवल नौकरी ही करेंगे न। बहरहाल, विरोध का परिणाम ये रहा कि प्रशासन को न केवल गुमटी धारकों को अन्यत्र गुमटियां देनी पड़ीं, अपितु यातायात में बाधा बनी अन्य गुमटियों को हटाने का निर्णय भी लटक गया।
इसी प्रकार शहर की यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा की अध्यक्षता में अनेक महत्वपूर्ण निर्णय तो हुए, पर उन पर कितना अमल हुआ, ये पूरा शहर जानता हैं। उनकी लाचारी इससे ज्यादा क्या होगी कि जिस कचहरी रोड और नेहरू अस्पताल के बाहर उन्होंने सख्ती दिखाते हुए ठेले और केबिने हटाई थीं, वहां फिर पहले जैसे हालात हो गए हैं और शर्मा चुप बैठे हैं।
शर्मा ने पशु पालन की डेयरियों को अजमेर से बाहर ले जाने की कार्यवाही शुरू करने का ऐलान किया, मगर आज भी स्थिति जस की तस है। बड़े-बड़े गोदाम शहर से बाहर निर्धारित स्थल पर स्थानांतरित करने की व्यवस्था करने का निर्णय किया गया, मगर आज तक कुछ नहीं हुआ। रोडवेज बस स्टैंड के सामने रोडवेज की बसों को खड़ा करके यात्रियों को बैठाने पर पांबदी लगाई गई, मगर उस पर सख्ती से अमल नहीं हो पा रहा। शहर के प्रमुख चौराहों को चौड़ा करने का निर्णय भी धरा रह गया। खाईलैंड में नगर निगम की खाली पड़ी जमीन पर बहुमंजिला पार्किंग स्थल बनाने की योजना खटाई में पड़ी हुई है।
-tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

लाइलाज हो गई आनासागर झील के पानी की बदबू

इन दिनों एक बार फिर शहर की एक मात्र कथित सुरम्य झील के पानी से इतनी बदबू आ रही है कि उसके आसपास से गुजरना बहुत मुश्किल है। उसके आसपास रहने वाले तो मानों नरक में ही रह रहे हैं। मगर अफसोस कि न तो जिला प्रशासन व नगन निगम को इसकी परवाह है और न ही राजनीतिक दलों व समाजसेवी संस्थाओं को।
आनासागर झील की यह समस्या लाइलाज सी हो गई प्रतीत होती है। ऐसा नहीं कि इस मामले में कभी आवाज नहीं उठी या प्रशासन ने अपने स्तर कवायद नहीं की, बावजूद इसके समस्या का यदि समाधान नहीं हो रहा है, तो इससे साफ लगता है कि वाकई कहीं न कहीं चूक हो रही है। झील की नियमित सफाई और मॉनिटरिंग नहीं होती। जब-जब हल्ला होता है तो प्रशासन की नींद थोड़ी खुलती है और वह उस वक्त लोगों को शांत करने की खातिर कोई तात्कालिक उपाय कर दिए जाते हैं और उसके बाद फिर कुंभकरणी नींद में खो जाता है।
पाठकों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले झीलों की सुरक्षा व संरक्षा का मामला जब राजस्थान हाईकोर्ट में गया था तो उसने कड़ा रुख अपनाया था। हाईकोर्ट के आदेशों की पालना में जिला प्रशासन ने आनासागर, फायसागर व तीर्थराज पुष्कर सरोवर की सुरक्षा और सौंदर्यीकरण के लिए अपनी ओर से बेहतरीन और आदर्श ड्राफ्ट प्लान पेश किया था, जिसे देख कर यही लगता था कि इन झीलों का कायाकल्प हो जाएगा। मगर उन्हीं दिनों इस बात पर आशंका भी जाहिर की गई थी कि जैसा खूबसूरत ड्राफ्ट प्लान पेश किया गया है, उस पर अमल आसान काम नहीं है। आपको याद होगा कि झील का पानी शुद्ध करने के लिए 35 लाख रुपए की लागत से 4 फ्लोटिंग फाउंटेन लगाने के साथ 28 लाख की लागत से 5 एयरेटर्स लगाने की बात हुई थी। उस पर अमल भी हुआ, उसके बाद भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है तो साफ जाहिर है कि हाईकोर्ट के डर से वादा तो कर दिया गया, मगर बाद में उस पर ठीक से अमल नहीं किया गया। तब ये भी कहा गया कि पानी की गुणवत्ता एवं नियंत्रण के लिए हर वर्ष पानी व गर्द की जांच की जाएगी। यदि वाकई उस पर अमल हुआ होता तो आज जो हालात पैदा हुए हैं, वे नहीं होते। हालांकि प्रशासन ने आनासागर झील में कचरा डालने और मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाने के लिए कदम तो उठाया, मगर उससे भी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। हाल ही जब बारहदरी पर आनंदम संस्था की ओर से गीत गुलजार कार्यक्रम रखा गया तो वहां बैठे दर्शकों को बदबू के मारे बुरा हाल था। हालांकि आयोजकों ने बदबू समाप्त करने के लिए खुशबू के उपाय किए, मगर वे बदबू की अधिकता के कारण नाकाफी ही रहे।
समय रहते प्रशासन, नगर सुधार न्यास व नगर निगम को इस ओर ध्यान देना चाहिए। उसे न केवल बदबू का निराकरण करना होगा, अपितु आनासागर को सुरम्य बनाने के भी पूरे इंतजाम करने होंगे, वरना इस झील को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने का सपना सपना ही रह जाएगा।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

यूआईटी का गठन न होने से अटका विकास

ढ़ाई साल से भी ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी प्रदेश की सरकार ने अब तक नगर सुधार न्यास का गठन नहीं किया है। चाहे इसके लिए सत्तारूढ़ कांग्रेस की भीतरी राजनीति जिम्मेदार हो या फिर सरकार का कोई असमंजस, मगर यह अजमेर शहर पर तो भारी ही पड़ रहा है। महत्वपूर्ण ये नहीं है कि अध्यक्ष और सदस्यों के रूप में मनोनयन से कांग्रेसी अब तक वंचित हैं और उनमें असंतोष बढ़ रहा है, बल्कि महत्वपूर्ण ये है कि शहर के विकास में अहम भूमिका अदा कर सकने वाली इस विशेष संस्था की निष्क्रियता से शहर का विकास अवरुद्ध हो रहा है। ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है कि कांग्रेस के दावेदारों की अपेक्षा पूरी हो, बल्कि जरूरी ये है कि अजमेर वासियों की अपेक्षाएं पूरी हों।
ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कभी साफ मना किया है कि वे न्यास अध्यक्ष की नियुक्ति करेंगे ही नहीं और न ही इसके प्रति अरुचि दिखाई है। हर बार यही कहा कि जल्द ही होगी। मगर अब तक नियुक्ति न करने से खुद उनकी ही पार्टी के नेता और कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर उनके मन में है क्या? अफसोसनाक बात तो ये है कि नियुक्ति को लेकर अनेक बार कवायद करने के बावजूद वे चुप बैठे हैं। बताते हैं कि नाम तक लगभग तय है और घोषणा भर की देरी है। लेकिन घोषणा न होने से अब तो यह समझा जाने लगा है कि वे नियुक्ति करने के मूड में ही नहीं हैं। कदाचित वे नियुक्ति के बाद होने वाली उठापटक से बचना चाहते हैं। कई बार तो उन्हें नियुक्ति के आदेश जारी न करने के बहाने भी उन्हें मिले हैं। कभी बजट सत्र तो कभी संगठन चुनाव। कभी लोकसभा चुनाव तो कभी स्थानीय निकाय व पंचायतीराज का चुनाव। हर बार उन्हें नियुक्ति टालने का मौका मिला है। अंंतत: निष्कर्ष ये निकाला गया कि वे किसी भी विवाद से बचने केलिए नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति होने तक कोई कदम नहीं उठाना चाहते। उन्होंने ऐसा किया भी। जैसे ही प्रदेश अध्यक्ष पद पर डॉ. चंद्रभान की नियुक्ति हुई, ये आशा जगी कि अब तो कुछ होगा। नियुक्ति की संभावना इस कारण भी कायम हुई क्योंकि गहलोत के साथ डॉ. चंद्रभान ने भी यही कहा कि जल्द ही नियुक्ति हो जाएगी। मगर इसके बाद भी कुछ नहीं हुआ।
बहरहाल, इसका परिणाम ये है कि वह सब ठप्प पड़ा है, जिसकी न्यास से उम्मीद की जाती है। असल में इस बात के प्रमाण हैं कि जब भी न्यास के अध्यक्ष पद पर कोई राजनीतिक प्रतिनिधि बैठा है, शहर का विकास हुआ है। चाहे कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की। हर न्यास अध्यक्ष ने चाहे शहर के विकास के लिए चाहे अपनी वाहवाही के लिए, काम जरूर करवाया है। पृथ्वीराज चौहान स्मारक, महाराजा दाहरसेन स्मारक, विवेकानंद स्मारक, अशोक उद्यान, राजीव उद्यान सहित अनेक आवासीय योजनाएं उसका साक्षात प्रमाण हैं। जब भी सरकारी अधिकारियों ने न्यास का कामकाज संभाला है, उन्होंने महज नौकरी की बजाई है, विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया है। पत्रकार कॉलोनी के लिए अरसे लंबित आवेदन उसका ज्वलंत उदाहरण हैं। दुर्भाग्य से सरकार की अरुचि के कारण नगर सुधार न्यास पिछले तकरीबन साढ़े चार साल से प्रशासनिक अधिकारियों भरोसे ही चल रहा है। ऐसे में विकास तो दूर रोजमर्रा के कामों की हालत भी ये है कि जरूरतमंद लोग चक्कर लगा रहे हैं और किसी को कोई चिंता नहीं। नियमन और नक्शों के सैंकड़ों काम अटके पड़े हैं। पिछले सात साल से लोग न्यास के चक्कर लगा रहे हैं, मगर नियमन के मामले नहीं निपटाए जा रहे। इसका परिणाम ये है कि अपना मकान बनाने का सपना मात्र पूरा होता नहीं दिखाई देता। स्पष्ट है कि विकास अवरुद्ध हुआ है।
असल में न्यास के पदेन अध्यक्ष जिला कलैक्टर को तो न्यास की ओर झांकने की ही फुरसत नहीं है। वे वीआईपी विजिट, जरूरी बैठकों आदि में व्यस्त रहते हैं। कभी उर्स मेले में तो कभी पुष्कर मेले की व्यवस्था में खो जाते हैं। न्यास से जुड़ी अनेक योजनाएं जस की तस पड़ी हैं। कुल मिला कर जब तक न्यास के सदर पद पर किसी राजनीतिक व्यक्ति की नियुक्ति नहीं होती, तब तक अजमेर का विकास यूं ही ठप पड़ा रहेगा।

300 करोड़ की दरगाह विकास योजना में लीपापोती की आशंका

सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के 800 वें सालाना उर्स के मौके पर दरगाह परिसर व अजमेर शहर के विकास के लिए सरकार की ओर से बनाई गई तीन सौ करोड़ की महत्वाकांक्षी योजना के क्रियान्वयन के लिए जितना समय बचा है, उससे साफ जाहिर है कि प्रशासन चाहे भी तो समय पूरे कार्य संपन्न नहीं कर सकता। ऐसे में आशंका इस बात की है कि कहीं लीपापोती ही हो कर न रह जाए।
यहां उल्लेखनीय है कि इस परियोजना के अन्तर्गत विभिन्न मार्गों के विकास, नालियों के निर्माण, सीवरेज, विद्युत सप्लाई उपकरण, सुरक्षा, पार्किंग, शौचालय, कोरिडोर, दरगाह शरीफ के प्रवेश द्वारों की चौड़ाई बढाना, अग्नि शमन, विश्राम स्थलियों का विकास, ईदगाह के विकास के साथ-साथ अजमेर शहर की कई बड़ी सड़कों के निर्माण एवं विकास का प्रावधान रखा गया है। ऐसी बड़ी योजना यदि पूरी तरह से लागू हो जाए और उस पर पूरी ईमानदारी के साथ काम हो तो शहर की काया ही पलट जाएगी। मगर समय के अभाव में संदेह ये होता है कि कहीं काम पूरे होने से पहले ही उर्स सर पर न आ जाए और बिखरी हुई निर्माण सामग्री व खुदे हुए गड्ढे वरदान की बजाय अभिशाप बन जाएं।
हालांकि यह समस्या प्रशासन भी अच्छी तरह से समझ रहा है, लेकिन उसने अभी तक कोई कार्य योजना नहीं बनाई है। होना दरअसल ये चाहिए कि काम दु्रत गति से निपटें, इसके लिए उच्च कोटि के प्रोजेक्ट प्रबंधन की व्यवस्था की जााए। क्रियान्वयन के लिए चुनिंदा विशेषज्ञों की इकाई का गठन किया जाए, जो समयबद्ध तरीके से कार्यों का प्रबंधन व मोनिटरिंग करे। समय पर कार्य पूरे कराने के लिए सभी कार्य रात्रि के समय भी कराने जरूरी होंगे। शहर के संकरे एवं दुर्गम मार्गों पर रात्रि के समय कार्य कराने से यातायात बाधित होने से भी बचाया जा सकता है।
आम तौर पर पाया गया है कि विकास योजनाओं में जनता और जनप्रतिनिधियों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता। अमूमन तो जनता उसमें बाधा ही डालती है, क्योंकि उसे कुछ समय के लिए परेशानी होती है। ऐसे में बेहतर यह होगा कि जिस क्षेत्र में भी कार्य आरम्भ किया जाना है, उस क्षेत्र के सभी वर्गों को साथ लिया जाये। न सिर्फ कार्यों के चयन, प्राथमिकताओं के निर्णय निर्माण में सहयोग एवं रखरखाव के लिये इनकी राय ली जाये, बल्कि जनसहयोग प्राप्त करने के लिए जन सम्पर्क की एक विशेष इकाई भी बनाई जाये, जो होने वाले लाभों से लोगों को पहले से अवगत कराए।
एक अहम समस्या विभिन्न विभागों के बीच तालमेल नहीं होने की भी रहती है। इस कारण कई बार एक ओर तो सार्वजनिक निर्माण विभाग या नगर निगम व न्यास की देखरेख में सड़क बन जाती है और दूसरी जलदाय विभाग, बिजली विभाग व टेलीफोन महकमे के देखरेख में सड़क की खुदाई कर दी जाती है। इससे धन व समय का अपव्यय होता हो। अत: जरूरी है कि एक समन्वय इकाई हो, जो सभी विभागों के बीच तालमेल रखे।
यहां उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी ख्वाजा साहब के 786वें उर्स में विशेष पैकेज आया था, मगर समय के अभाव में लीपापोती हुई और बाद में लंबे समय तक उसकी जांच होती रही। अत: बेहतर ये होगा कि योजना की समीक्षा भी इसी मौके पर हो जाए, ताकि एक तो यह जाना जा सके कि पहले क्या गलतियां हुईं, जिनसे अब बचा जा सके। दूसरे यह पता भी चले कि जिन कार्यों पर पहले पैसा खर्च हुआ बताया गया उनका अब वजूद भी हैं अथवा नहीं।

पाक मंत्री की सभा : प्रशासन की मुस्तैदी पर बड़ा सवाल

अजमेर में गत 30 सितम्बर को प्रशासन की अनुमति के बिना मेरवाड़ा एस्टेट में अवैधानिक व नियम विरुद्ध हुई पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्री मकदूम अमीन फहीम की सभा जिला प्रशासन व पुलिस की मुस्तैदी पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।
सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि यह सभा आयोजित ही कैसे कर ली गई? इसके लिए अनुमति क्यों नहीं ली गई? सभा स्थल पर हजारों लोगों के एकत्रित होने पर पुलिस ने ऐतराज क्यों नहीं किया? अनुमति तो दूर की बात है, प्रशासन के प्रोटोकॉल अधिकारी और पुलिस अफसर खुद ही उनको एस्कॉर्ट कर सभा स्थल पर ले गए। उन अधिकारियों को यह ख्याल कैसे नहीं आया कि पाक मंत्री के जियारत कार्यक्रम में यह तो शामिल था ही नहीं। इसके अतिरिक्त इस सभा की अनुमति तो ली ही नहीं गई है। उन्हें वहां ले जाने से पहले उनसे अनुमति पत्र मांगा जाना चाहिए था, मगर वे सब कुछ चुपचाप देखते रहे। इससे सवाल ये उठता है कि आखिर वे चुप क्यों थे? क्या उन्हें ऊपर से कोई इशारा था? सवाल ये भी है कि पाकिस्तानी मंत्री की सभा में गुपचुप तरीके से हजारों लोग एकत्रित कैसे हो गए? वे सभी सीमावर्ती जिलों के थे और पाक मंत्री के मुरीद होने के नाते उनके दीदार करने आए थे। उनको एकत्रित करने वाला और सभा आयोजित करने वाला कौन था? सवाल ये है कि क्या पाकिस्तानी मंत्री का मकसद दरगाह जियारत के नाम पर अजमेर आकर सभा करना ही था? जांच का विषय ये भी है कि पाक मंत्री ने यहां सभा करने के अतिरिक्त किन-किन लोगों से मंत्रणा की और उसका मकसद क्या था? अफसोसनाक बात ये रही कि हरवक्त मुस्तैद रहने वाले मीडिया कर्मियों के मन में भी यह ख्याल नहीं आया कि यह सभा कैसे हो रही है। मीडिया ने दूसरे दिन भी कोई सवाल नहीं उठाया। तीसरे दिन जा कर भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष औंकार सिंह लखावत की इस मामले पर नजर पड़ी। उन्होंने तुरंत शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत और विधायक द्वय प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल को बुला कर पे्रेस कॉन्फ्रेंस की।
अफसोसनाक ये भी कम नहीं है कि अजमेर के घटनाक्रम के विषय में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह बयान दिया कि उन्हें इस विषय पर कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई हैं। कैसी विडंबना है कि राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े इस मसले पर एक मुख्यमंत्री ऐसा कह रहे हैं, जबकि पूरा प्रशासन व पुलिस उन्हीं के नियंत्रण में है। होना तो यह चाहिए था कि भाजपा के ऐतराज करने से पहले ही उनको मामले की जांच करने के आदेश दे कर संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों को तलब करना था।
जहां तक भाजपा के ऐतराज का सवाल है, वह भले ही प्रत्यक्षत: राजनीति लगे, लेकिन निष्पक्ष रूप से यह मसला वाकई बेहद आपत्तिजनक है। जिस मंत्री ने बिना अनुमति के यहां सभा की, वह उसी पाकिस्तान के हैं, जिसके इशारे पर हमारे आए दिन आतंकी घटनाएं होती हैं। उस देश के मंत्री का अजमेर में भारत के सीमांत जिलों बाड़मेर और जैसलमेर से आए हजारों लोगों को उनके धार्मिक नेता के रूप में संबोधित करना घोर आपत्तिजनक है। इससे राज्य व केन्द्र सरकार की कार्य प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
इन सबसे इतर पाक मंत्री की यह हरकत अजमेर जैसे अंतराष्ट्रीय महत्व के शहर में करना बेहद चिंतनीय है। अजमेर को दरगाह ख्वाजा साहब और तीर्थराज पुष्कर की वजह से सर्वाधिक संवेदनशील शहरों में शुमार किया जाता है। दरगाह में बम विस्फोट और पुष्कर में मुंबई ब्लास्ट के मास्टर माइंड का खबाद हाउस की रेकी करने जैसी घटनाएं हो चुकी हैं। उसके बाद तो अजमेर और भी असुरक्षित हो गया है। इसके बाद भी प्रशासन व पुलिस ने लापरवाह बरती तो वह पूरी तरह से इस घटना के लिए जवाबदेह हो गया है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह मामले की पूरी जांच करवा कर दोषी अधिकारियों को दंडित करे।