शुक्रवार, 18 मई 2012

कामनकाज सोसायटी की पहल वाकई सराहनीय

अजमेर शहर के विकास के लिए सतत प्रयत्नशील कामनकाज सोसायटी ने वर्षों से अपेक्षित सीवरेज सिस्टम का चालू करवाने के लिए वाकई सराहनीय कदम उठाया है। शहर में पिछले कई साल से चल रहे सीवरेज कार्य को जल्द अंजाम तक पहुंचाने व नागरिकों को सहूलियत देने को लेकर कामनकाज सोसायटी की ओर से दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार के मुख्य सचिव समेत संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
ज्ञातव्य है कि अजमेर में वर्ष 2002 में राजस्थान शहरी ढांचागत विकास परियोजना आरयूआईडीपी द्वारा सीवरेज निर्माण का कार्य शुरू किया था, जो 2008 में समाप्त हो गया है। इसके तहत 207.23 किलोमीटर सीवरेज लाइन बिछाने एवं 20 एमएलडी क्षमता के ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण खानपुरा में किया जा चुका है। 61.62 करोड़ रुपए खर्च किए जाने के बावजूद अब तक न तो नगर निगम सीवरेज संचालन का दायित्व ग्रहण किया है और न ही सीवेज लाइनों का कनेक्शन घरों में किया गया है। सरकारी कामकाज की कछुआ चाल के लिए जहां प्रशासन दोषी है, वहीं हमारे जनप्रतिनिधि भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जो अपेक्षित दबाव बना कर काम समय पर पूरा नहीं करवा पा रहे। ऐसे में सोसायटी के सचिव मनोज मित्तल ने अपने वकील पीयूष नाग के जरिए हाईकोर्ट के समक्ष राज्य सरकार समेत, नगरीय विकास विभाग, स्वायत्त शासन विभाग, संभागीय आयुक्त, कलेक्टर, नगर निगम और नगर सुधार न्यास के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया है कि सीवरेज योजना में जनता का धन लगा है। इसके निर्माण के दौरान नागरिकों को यातायात संबंधी भीषण परेशानियों, जगह जगह खुदी सड़कों की वजह से कई हादसे भी हुए और लोगों को जान तक गंवानी पड़ी। जिस परियोजना पर 170 करोड़ रुपए खर्च होने जा रहे हैं, उसका लाभ अजमेर की जनता को मिलना चाहिए। मित्तल ने अपनी याचिका में कहा कि घरों में सीवर लाइन के कनेक्शन का कार्य तुरंत प्रारंभ कर सीवर सिस्टम को प्रभावी तरीके चालू किया जाए। अजमेर निगम को सीवरेज व ट्रीटमेंट प्लांट के संचालन का दायित्व व कार्य सौंपने के निर्देश दिए जाएं, निगम असमर्थ हो तो अन्य एजेंसी को जिम्मेदारी दी जाए। जेएनएनयूआरएम के तहत 108 करोड़ की लागत से खानपुरा में 40 एमएलडी, आनासागर जोन में 13 एमएलडी और पुष्कर में 3.5 एमएलडी क्षमता के ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण और शेष बची सीवर लाइनों का कार्य समय पर पूरा हो। सीवर लाइन डालने 15 दिन के अंदर खोदी गई सड़कों को अनुबंध की शर्तों के अनुसार ठीक किया जाए। सीवरेज लाइन के संचालन एवं देखरेख के लिए पृथक से सीवरेज सेल गठित करे ताकि कार्य कुशलतापूर्वक संचालित हो सके। नगर सुधार न्यास, जेएनएनयूआरएम के तहत करवाए जा रहे सीवरेज निर्माण कार्य में नगर निगम अथवा अन्य एजेंसी की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने इससे काम में कोई कमी नहीं रहे। जो क्षेत्र अब तक परियोजना में शामिल नहीं किए गए हैं, उन्हें भी शामिल किया जाए। आनासागर ट्रीटमेंट प्लांट के चालू होने तक यहां उत्पन्न दुर्गंध की समस्या का अविलंब समाधान किया जाए। जब तक अजमेर में सीवरेज सिस्टम पूरी तरह कार्यशील नहीं हो तक तक सीवरेज सिस्टम से संबंधित सभी गतिविधियों के लिए हाईकोर्ट की देखरेख में एक मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया जाए। इसमें न्यास, निगम, अन्य सरकारी एजेंसियों, गैर सरकारी संगठनों एवं नगर के प्रमुख नागरिकों को शामिल किया जाए तथा समय समय पर रिपोर्ट कोर्ट में पेश हो। इस याचिका पर की खंडपीठ ने राज्य सरकार के मुख्य सचिव समेत संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। उम्मीद है कि सोसायटी की इस पहल का जनता को जल्द लाभ मिलेगा।
ज्ञातव्य है कि इससे पहले अजमेर व पुष्कर की छह झीलों के भराव क्षेत्र में हो रहे अतिक्रमण और निर्माण कार्यों पर रोक के लिए भी सोसायटी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिस पर कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी किया था। हालांकि हमारी निष्पक्ष व कड़ी न्यायिक व्यवस्था के चलते सोसायटी को यह जनहितकारी सफलता मिली, लेकिन कितना अफसोसनाक पहलु है कि सरकार और प्रशासन अपने स्तर पर जनहित में कुछ नहीं करना चाहते। उन पर अंकुश लगाने के लिए कोर्ट की मदद लेनी पड़ती है। यदि सोसायटी जैसी संस्थाएं न हों तो प्रशासन, नगर परिषद व नगर सुधार न्यास में बैठे स्वार्थी तत्व पूरे आनासागर को ही बेच खाएं। सोसायटी वाकई साधुवाद की पात्र है। 

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

टंडन के उपवास पर तकलीफ तो व्यवस्थाएं क्यों नहीं सुधारीं?

ख्वाजा साहब के 800वें सालाना उर्स की अव्यवस्थाओं को लेकर बार अध्यक्ष व प्रदेश कांग्रेस के पूर्व सचिव राजेश टंडन का एक दिन का उपवास विवाद में आ गया। विवाद इतना भर है कि प्रदेश कांग्रेस के महासचिव सुशील शर्मा ने जबरन टांग अड़ा कर यह कह दिया है कि टंडन को व्यक्तिगत रूप से आंदोलन करने का अधिकार है, लेकिन पार्टी के पूर्व सचिव की हैसियत से इस तरह के आंदोलन का अधिकार नहीं है। शर्मा की यह बात है ही बेहूदा कि टंडन को पूर्व सचिव के नाते उपवास करने का अधिकार नहीं है। कौन बेवकूफ होगा जो अपने पूर्व पद के नाते आंदोलन करेगा। पूर्व पद के नाते आंदोलन होते भी हैं क्या? रहा सवाल टंडन के पूर्व सचिव होने का तो वह ऐसा पद है, जो उनसे अब कोई नहीं छीन सकता। ऐसे में यह शर्मा की अड़ंगी ही मानी जानी चाहिये क्योंकि टंडन कांग्रेस के बैनर तले अथवा यह बता कर कि वे प्रदेश कांग्रेस के पूर्व सचिव हैं और उस हैसियत से तो उपवास कर नहीं रहे, वे तो वैसे भी निजी तौर पर कर रहे हैं।
अगर इसे शर्मा के महासचिव होने के नाते प्रदेश कांग्रेस का फरमान माना जाए तो असल बात ये है कि टंडन के उपवास करने से कांग्रेसी सरकार की ही हल्की होती है। आखिर वे हैं तो वरिष्ठ कांग्रेसी ही न, भले ही अभी किसी पद न हों। शर्मा को लगा होगा कि कहीं टंडन के साथ अन्य कांगे्रसी भी न खड़े हो जाएं। मगर असल बात ये है टंडन कांग्रेस सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि जिला प्रशासन की लापरवाही के खिलाफ उपवास पर बैठे हैं। उन्होंने इस सिलसिले में कभी कांग्रेस सरकार की आलोचना नहीं की। वे तो यही कहते रहे कि जिला प्रशासन लापरवाही बरत रहा है। इसकी शिकायत वे हाल ही उर्स मेले की तैयारियों के सिलसिले में अजमेर आए राज्य सरकार के मुख्य सचिव सी के मैथ्यू से भी कर चुके थे। उनके सामने ही अपने उपवास करने का ऐलान भी कर चुके थे। शर्मा की इस बात को ध्यान में रखा जाए कि टंडन को व्यवस्था में कमियां नजर आती हैं तो पार्टी या प्रशासन के सामने रख कर दूर कराने का प्रयास करें, तब भी टंडन कहीं गलत नजर नहीं आते। वे राजस्थान प्रशासन के सबसे बड़े अफसर को शिकायत कर चुके। जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल को नकारा बताते हुए उन्हें हटाने का आग्रह सरकारी मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा से भी कर चुके। उसके बाद भी यदि जिला प्रशासन व्यवस्थाएं दुरुस्त नहीं करता तो प्रशासन ही दोषी हुआ न, टंडन कैसे दोषी हो गए? प्रशासन ही क्यों कांग्रेस संगठन व सरकार भी उतने ही जिम्मेदार हैं। उन्हें टंडन की शिकायत पर गौर करना चाहिए था। तब शर्मा कहां थे। तब उन्हें यह ख्याल नहीं आया कि टंडन के उपवास से कांग्रेस सरकार की बदनामी होगी।
रहा सवाल शर्मा के यह कहने का कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद उर्स की व्यवस्थाओं पर नजर रखे हुए हैं और सरकार ने उर्स को लेकर अतिरिक्त राशि उपलब्ध कराई है तो यह सही है, मगर स्वीकृत तीन करोड़ रुपए से क्या हो सकता था? यह भी तब मंजूर की जब तीन सौ करोड़ की योजना पर खुद ही ध्यान नहीं दिया और वह अधर में लटकी गई। इज्जत बचाने की खातिर तीन करोड़ दिए। बहरहाल, जो तीन करोड़ आए, उनसे हुए कामों का परिणाम ये है कि पूरे मेला क्षेत्र में आज भी भारी अव्यवस्थाएं पसरी पड़ी हैं।
शर्मा ने टंडन के इस उपवास को सस्ती लोकप्रियता करार दिया है। इसे सही माना जाए तो कांग्रेस ने उन्हें पिछले तीन साल में दिया भी क्या है? इतने वरिष्ठ कांग्रेसी को बर्फ में लगा रखा है। वो तो वे अपने दम पर दुबारा बार अध्यक्ष बन गए, वरना कांग्रेस तो उन्हें भुला ही चुकी थी। ऐसे में अब पूर्व सचिव होने के नाते उपवास पर ऐतराज करने के क्या मायने रह जाते हैं?
असल में दरगाह की व्यवस्थाओं को लेकर कांग्रेस में ही दो धड़े से बन गए हैं। एक ओर शिक्षा मंत्री श्रीमती नसीम अख्तर हैं तो दूसरी ओर अन्य। इससे पहले जब पूर्व विधायक डा. श्रीगोपाल बाहेती बोले थे तो नसीम अख्तर खेमे के चंद कांग्रेसियों ने उस पर कड़ा ऐतराज किया था। उन्होंने इसे डा. बाहेती राजनीतिक स्वार्थ करार दिया था और आरोप लगाया था कि डा. बाहेती ने सार्वजनिक बैठक लेकर लोगों को प्रशासन के खिलाफ उकसाने, भड़काने एवं गुमराह करने का काम किया है, जबकि सरकार ने पहली बार नसीम अखतर को उर्स की जिम्मेदारी सौंपी है। जाहिर सी बात है कि उन्हें तकलीफ ये रही कि जब मंत्री महोदया को जिम्मेदारी दे दी गई है तो बाहेती बीच में कैसे बोल रहे हैं। बाहेती तो चूंकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी हैं, इस कारण विवाद से बचते हुए चुप हो गए, मगर टंडन ने झंडा हाथ में थामे रखा।
उधर भारतीय जनता पार्टी अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष इब्राहित फखर ने टंडन के आंदोलन को समर्थन दे कर एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। टंडन की हालत अन्ना हजारे जैसी हो गई है। बेचारे अन्ना बार बार इंकार करते रहे कि संघ से उनका कोई लेना देना नहीं है, मगर संघ वाले अपनी मर्जी से ही समर्थन करने लगे तो अन्ना भी इंकार नहीं कर पाए। कुल मिला कर टंडन के लिए मामला पेचीदा हो गया है। कहीं अजमेर के अन्ना के रूप में उनका नया अवतार तो नहीं होने वाला है?

-तेजवानी गिरधर
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tejwanig@gmail.com

बुधवार, 16 मई 2012

न्यास की एक और मंशा पर पानी फेरा पत्रकारों ने

अजमेर। पत्रकारों की पहल पर स्वायत्त शासन विभाग व नगरीय विकास विकास विभाग के प्रमुख शासन सचिव जी. एस. संधु ने अजमेर नगर सुधार सचिव श्रीमती पुष्पा सत्यानी को नसीहत दे दी है कि वे आवासीय योजनाओं में मकानों के व्यावसायिक भू उपयोग परिवर्तन न नहीं करें। जाहिर सी बात है कि भू उपयोग परिवर्तन के मामलों में आवेदक कुछ ले दे कर अपना काम करवाना चाहता है। यानि कि संधु के निर्देश के बाद अब खाने-कमाने का यह जरिया तो बंद हो जाएगा।
असल में हुआ यूं कि संधु हाल ही जब उर्स की तैयारियों के सिलसिले में अजमेर आए तो पत्रकारों ने उनसे कई विषयों पर चर्चा की। दैनिक नवज्योति के पत्रकार संजय माथुर ने संधु के सामने सवाल खड़ा किया कि आवासीय योजना के भूखंडों का योजना मानचित्र से परे जा कर भूउपयोग परिवर्तन आवासीय से व्यावसायिक करके योजना के मूल स्वरूप को क्यों बदला जा रहा है, जबकि योजना में ही व्यावसायिक गतिविधियों के लिए पहले से ही स्थान आरक्षित है? इसी सिलसिले में उन्होंने न्यास की दोहरी नीति की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। एक ओर तो वह किसी कालोनाइजर की स्कीम में व्यावसायिक परिसर, स्कूल, पार्क आदि के लिए पर्याप्त जगह न छोड़े जाने पर उसका नक्शा निरस्त कर देता है, जब कि खुद की बसाई हुई कालोनियों में सारे नियम कायदे तक पर रख रहा है।
इस पर संधु ने न्यास सचिव की ओर मुखाबित होते हुए कहा कि इस प्रकार के आवेदन करने वालों को हतोत्साहित कीजिए। इसी प्रकार के निर्देश नगर निगम सीईओ सी आर मीणा को भी दिए कि हाउसिंग बोर्ड से निगम को हस्तांतरित योजनाओं में पूर्व में आवंटित आवासों का व्यावसायिक प्रयोजन के लिए भू उपयोग परिवर्तन पर पाबंदी लगाएं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि आवासीय योजनाओं को उसी रूप में रहने दें, उसका स्वरूप न बिगाड़ें। यहां उल्लेखनीय है कि न्यास ने हाल ही भू उपयोग परिवर्तन के कुछ आवेदित मामलों में आपत्तियां मांगी थी, जिसका मतलब ये है कि न्यास भू उपयोग करने को तैयार है। बहरहाल, स्वायत्त शासन महकमे के सबसे बड़े अफसर के निर्देश के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि अजमेर को सुंदर और सुव्यवस्थित करने की जिम्मेदारी रखने वाले अधिकारी इसे और नहीं बिगडऩे देंगे।
यहां बताना प्रासंगिक होगा कि संजय माथुर की रिपोर्ट पर ही भाजपा विधायक श्रीमती अनिता भदेल ने अफोर्डेबल स्कीम के तहत आवास बनाने की योजना में की जा रही नियमों की अनदेखी का मसला सरकार के सामने उठाया और उसे बंद करने के आदेश हो गए। इसमें भी अच्छी खासी आमदमी होने की उम्मीद थी, जिस पर पानी फिर गया। वस्तुतः माथुर को स्वायत्त शासन विभाग से संबंधित मामलों में विशेषता हासिल हैं, जिसकी खुद संधु ने भी आश्चर्य जाहिर करते हुए सराहना की।
पत्रकारों के भूखंडों की लाटरी निकलने का रास्ता साफ
माथुर व वहां मौजूद अन्य पत्रकारों की पहल से नगर सुधार न्यास में पत्रकारों के लिए भूखण्ड आवंटन की लाटरी निकलने का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है। जब संधु को बताया गया कि नगर सुधार न्यास प्रशासन जयपुर की बैठक के निर्णयों को जयपुर विकास प्राधिकरण से जुड़ा निर्णय बता कर अजमेर में इन्हें लागू नहीं कर रहा है और राज्य स्तरीय समिति के निर्णय न्यास प्रशासन नहीं मानता, तो संधु ने न्यास सचिव पुष्पा सत्यानी को निर्देश दिए कि वे उक्त निर्देशों की रोशनी में न्यास में प्राप्त पत्रकारों के आवेदनों का निस्तारण कर भूखण्ड आवंटन की लाटरी जल्द निकालें।
उल्लेखनीय है कि संधु की अध्यक्षता में ही गत 16 जून 2011 को जयपुर में पत्रकारों की आवासीय समस्याओं के समाधान के लिए गठित राज्य स्तरीय समिति की बैठक में श्रमजीवी पत्रकारों को पीपीएफ विवरणी जमा कराने के साथ फार्म 16 भरकर देने की अनिवार्यता से मुक्ति दी गई थी। समिति ने श्रमजीवी पत्रकारों के लिए पीपीएफ विवरणी देने की अनिवार्यता को हटाने के साथ ही यह निर्णय लिया था कि साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक समाचार पत्रों के लिए ही फार्म नंबर 16 एवं आयकर विवरण का शपथ पत्र लिया जायेगा। इस समिति ने उन पत्रकारों को भी भूखण्ड का आवंटन का पात्र माना था, जो राजस्थान के मूल निवासी है, किंतु प्रदेश के बाहर कार्यरत हैं, लेकिन उनके साथ यह शर्त जोड़ी थी कि उन्हें अपने मूल निवास का प्रमाण पत्र देना होगा। चूंकि संधु को इस बारे में पूरी जानकारी थी, इस कारण वे तुरंत सहमत हो गए और हाथोंहाथ न्यास सचिव को निर्देश दे दिए। इस प्रकार पत्रकारों की तकरीबन छह साल पुरानी समस्या का समाधान होने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। उल्लेखनीय है कि पूर्व कलैक्टर राजेश यादव ने अपने पूरे कार्यकाल में इसमें रुचि नहीं ली और जब उनके तबादला आदेश आए तो रिलीव होने वाले दिन न जाने क्या सोच कर आवेदन पत्रों की छंटनी करवाई, मगर उनकी लाटरी नहीं निकाली। उधर जैसे नई कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल ने कार्यभार संभाला तो उनके सामने अनेक शिकायतें पेश हो गईं। इससे वे भिन्ना गईं और यह तय कर लिया कि कम से कम वे तो लाटरी नहीं निकालेंगी। जब न्यास अध्यक्ष पद पर नरेन शहाणी नियुक्त हुए तो पत्रकारों की उम्मीद जागी, मगर वे भी किसी विवाद फंसने की आशंका में मामले को लटकाते रहे। आखिरकार अब जब कि विभाग के सर्वोच्च अधिकारी ने निर्देश दे दिए हैं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि अब जल्द ही पत्रकारों का अपना घर बनाने का सपना पूरा हो जाएगा। 

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

मंगलवार, 15 मई 2012

भ्रूण मौजूद है दरगाह विकास योजना का तो खाद-पानी दीजिए

आठ सौवें उर्स की तैयारियों की समीक्षा करते मैथ्यू
आखिर राज्य के मुख्य सचिव सी के मैथ्यू ने खुलासा कर ही दिया कि दरगाह विकास योजना पर काम चल रहा है और आने वाले समय में इसे पूरा किया जाएगा। अलबत्ता समय जरूर लगेगा। अजमेर वासियों के लिए यह एक सुखद खबर है।
असल में पिछले दिनों अजमेर फोरम की बैठक में जब सरकारी मुख्य सचेतक डा. रघु शर्मा ने यह कह कर कि इस प्रकार की कोई योजना है नहीं, अजमेर के हितचिंतकों को चिंता में डाल दिया था। हुआ भी कुछ ऐसा ही। केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच पत्रावलियों में झूलती योजना के तकरीबन तीन सौ करोड़ रुपए के मद में से एक भी रुपया नहीं मिला तो यह अंदेशा हुआ कि योजना को गाय खा गई या उसकी भ्रूण हत्या हो गई। अब जब कि राज्य सरकार के मुख्य सचिव ने ही इसकी पुष्टि कर दी है कि योजना पर काम चल रहा है और यह जरूर लागू होगी तो अजमेर वासियों ने राहत की सांस ली है। इसी के साथ वह भ्रम समाप्त हो गया है, जो कि अजमेर फोरम की ओर से इंडोर स्टेडियम में आयोजित नगर चौपाल में राज्य सरकार के मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा यह कह पैदा किया था कि इस प्रकार की कोई योजना थी ही नहीं और मीडिया को इस प्रकार का भ्रम नहीं फैलाना चाहिए। बहरहाल, अब जब कि यह दिलासा मिला है कि योजना को गाय नहीं खा गई या उसकी भू्रण हत्या नहीं हुई है, अजमेर के जनप्रतिनिधियों, समाजसेवकों, बुद्धिजीवियों व हित चिंतकों का यह फर्ज है कि वे खाद व पानी से सिंचन करते रहें, ताकि योजना पल्लवित-पुष्पित हो सके।
असल में होता ये है कि सरकार के सामने प्रस्ताव तो बहुत पेश होते हैं और सरकार की ओर से बनाए भी जाते हैं, मगर जब तक उन पर अमल के लिए जरूरी दबाव नहीं बनाया जाता, वे कभी पूरे नहीं हो पाते। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि जहां योजना के लिए प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति मिलती है, वहां वे ही फायदे में रहते हैं, जो कि मजबूती से अपना पक्ष रख पाते हैं, वरना ऐसी कई योजनाएं सालों तक फाइलों में ही पड़ी रहती हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि योजना लागू करने के लिए दरगाह से जुड़े पक्षों, मीडिया और अजमेर फोरम ने भरपूर दबाव बनाए रखा, मगर जनप्रतिनिधियों की लापरवाही अथवा अप्रभावी भूमिका और प्रशासन की बेरुखी के चलते यह अधर में ही लटकी रही। हालत ये थी कि ये पता ही नहीं लग रहा था कि आखिर योजना कहां गायब हो गई। वो तो मुख्य सचिव ने पत्रकारों के पूछने पर जानकारी दी, वरना यही माना जाता कि योजना दफ्तर दाखिल हो चुकी है।
खैर, अब भी वक्त है। सभी को मिल कर इस योजना की मंजूरी के दबाव बनाए रखना होगा, वरना सरकारी तंत्र की गति तो नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली होती है।
यहां आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मोटे तौर पर इस योजना में वर्षों से अपेक्षित बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य कराने सहित अतिक्रमणों को हटाये जाने का प्रस्ताव है। जायरीन की सुरक्षा और सुविधा के लिए पानी, बिजली सड़क, टॉयलेट जैसी सुविधाओं पर पूरा जोर दिया गया है। इसके तहत विद्युत ट्रांसफार्मर और विद्युत तार भूमिगत किए जाने हैं और आवागमन को सुविधाजनक बनाने के लिए सड़कों को चौड़ा करने का प्रस्ताव है। इतना ही नहीं 115 दुकानों का अधिग्रहण व दरगाह के चारों ओर 15 फीट चौड़े कॉरिडोर निर्माण का चुनौतीपूर्ण कार्य भी शामिल किया गया है।
आइये, एक विहंगम नजर डालते हैं इस योजना पर:-
दरगाह शरीफ की ओर जाने वाली सड़कों के ड्रेनेज सिस्टम को डवलप करने के लिए देहली गेट से निजाम गेट तक 27 लाख, निजाम गेट से मदार गेट तक 35 लाख, ढाई दिन के झोंपड़े से निजाम गेट तक 19.50 लाख, कॉरिडोर के चारों ओर 17.50 लाख रुपए का प्रस्ताव है। इसी प्रकार दरगाह के चारों ओर 7 किलोमीटर क्षेत्र में सीवरेज कार्य केलिए 3 करोड़ रुपए प्रस्तावित हैं। विद्युत व्यवस्था में सुधार पर 102.90 लाख खर्च होंगे। इसमें 11 केवी और एलटी केबल का अंडरग्राउंड कार्य पर 109 लाख और कॉरिडोर की स्ट्रीट लाइटों पर 20 लाख रुपए का प्रावधान है। दरगाह इलाके में जायरीन के लिए सार्वजनिक शौचालय की कमी अरसे से महसूस की जाती रही है। अढ़ाई दिन के झोंपड़ा क्षेत्र में पुरुषों के लिए 16 व महिलाओं के लिए 12, सोलह खंभा क्षेत्र में पुरुषों के लिए 25 व महिलाओं के लिए 19, बाम्बे होटल क्षेत्र में पुरुषों के लिए 28 व महिलाओं के लिए 17, झालरा क्षेत्र में पुरुषों के लिए 18 व महिलाओं के लिए 14 टॉयलेट व शौचालयों का निर्माण कराया जाना है। कुल 139 शौचालयों पर 85.17 लाख रुपए खर्च होगा।
दरगाह आने वाले जायरीन के जूते और चप्पलों के लिए निजाम गेट के सामने शू कलैक्शन सेंटर का प्रस्ताव है। करीब 6 दुकानों को अधिगृहीत कर बनाए जाने वाले इस सेंटर पर 775 लाख रुपए खर्च किए जाएंगे।
दरगाह में हर जायरीन पर पैनी नजर रखने के लिए सुरक्षा इंतजामों के तहत 74 कैमरों का प्रस्ताव है, जिनमें 16 फंक्शनल व 58 अन्य कैमरे होंगे। इस पर 70 लाख की राशि खर्च होगी।
वर्षों से पार्किंग की समस्या भोग रहे शहर के लिए 7 स्थानों पर पार्किंग हब की योजना है। इसके तहत जयपुर रोड से हाथी भाटा के बीच 11.74 लाख, कचहरी रोड पर आई हॉस्पिटल के पीछे 60.89 लाख, महावीर सर्किल पर 83.82 लाख, नसीराबाद रोड पर नौ नंबर पेट्रोल पंप के पीछे 214.16 लाख, सुभाष गार्डन में वीआईपी पार्किंग पर 9.50 लाख, सुभाष उद्यान के बेसमेंट में 580 लाख, प्राइवेट बस स्टैंड में मल्टी स्टोरी पार्किंग पर 846 लाख, लौंगिया मोहल्ले में 1148.89 लाख रुपए खर्च किए जाएंगे। जायरीन के ठहरने के लिए कायड़ में 230 बीघा जमीन पर 202 करोड़ 15 लाख रुपए खर्च कर विशेष इंतजाम किए जाने हैं। ईदगाह विश्राम स्थली में प्लेटफार्म, स्नानघर और टॉयलट सुविधाओं के निमार्ण कार्य पर 200 लाख रुपए खर्च किए जाने प्रस्तावित हैं। तारागढ़ तक जाने वाले रास्ते की सीढिय़ों के दोनों और रेलिंग पर 20 लाख रुपए खर्च होंगे।
शहर के 34 स्थानों की सड़क मरम्मत और निर्माण पर 128.98 लाख खर्च होंगे। दरगाह से वाया देहलीगेट, मदार गेट और त्रिपोलिया गेट वाया ढ़ाई दिन का झोंपड़े तक की सड़क नवीनीकरण प्रस्तावित है। देहलीगेट से तांगा स्टैंड तक की सड़क का विस्तार और नवीनीकरण करने के लिए 80 दुकानों को अधिगृहीत किया जाना है।
दरगाह के भीतर व्यवस्थित रूप से जियारत करने के लिए स्टील ग्रिल की बैरिकेडिंग की जाएगी। दरगाह परिसर के फर्श पर कोटिंग होगी। दरगाह परिसर का समतलीकरण किया जाएगा। जायरीन के आने और जाने के लिए गेट की चौड़ाई बढ़ाई जाएगी। लंगर खाना को अधिक व्यवस्थित करने और सराय चिश्ती चमन और ईदगाह को विकसित करने का भी प्रस्ताव है। दरगाह के 11 ऐतिहासिक गेट और 8 भवनों के जीर्णोद्धार के लिए 435.62 लाख रुपए की आवश्यकता बताई गई है।

-तेजवानी गिरधर
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रविवार, 13 मई 2012

पहली बार दिखाई होटल मालिकों ने पुलिस के खिलाफ हिम्मत

उर्स मेले में बेगारी का करेंगे विरोध
अजमेर के होटल वालों ने पहली बार पुलिस की बेगारी के खिलाफ बोलने की हिम्मत जुटाई है। होटल एसोसिएशन आफ अजमेर के नाम से गठित संस्था ने बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपना विरोध दर्ज कराया है। होटल आराम के मालिक दिनेश अग्रवाल की अध्यक्षता में हुई आपात बैठक में होटल व्यवसाइयों ने अपना दुखड़ा तो रोया ही कि किस प्रकार पुलिस ने राठौड़ी कर रखी है तो साथ ही पुलिस की बेगारी को बर्दाश्त न करने का जज्बा भी दिखाया है।
असल में पिछले कुछ दिनों से होटल मालिकों में यह सुगबुगाहट थी कि 800 वें उर्स के मद्देनजर अन्य जिलों से आने वाले पुलिस अधिकारियों के ठहरने की व्यवस्था के लिए एसपी राजेश मीणा ने मेला क्षेत्र में आने वाली सभी होटलों में दो-दो कमरे आरक्षित रखने का जो फरमान जारी किया है, उसका क्या किया जाए? अजमेर में एक तो उर्स मेले के चक्कर में होटलों की बाढ़ आई हुई है, इस कारण पूरे साल धंधा मंदा ही रहता है। कंपीटीशन इतना अधिक है कि टैक्सी वालों को पच्चीस से चालीस प्रतिशत तक कमीशन देना पड़ता है। कमाई होती भी है तो केवल उर्स मेले के दौरान ही। एक तरह से देखा जाए तो उर्स मेले के दौरान ही पूरे साल की कमाई करनी होती है। ऐसे में यदि उर्स मेले के दौरान दो कमरे पुलिस को दे दिए जाएंगे तो जाहिर है कमाई मारी जाएगी। समझा जा सकता है कि मेले के दौरान कमरों का किराया मनमानी दर से वसूला जाता है। अव्वल तो होटल मालिकों की हिम्मत होती ही नहीं कि पुलिस वालों से किराया वसूल सकें, अगर किसी ने ईमानदारी से दे भी दिया तो क्या देगा, केवल न्यूनतम दर। वैसे भी उर्स की बुकिंग करीब एक माह पूर्व ही कर ली गई थी। ऐसे में पुलिस के लिए दो-दो कमरों की व्यवस्था करना मुश्किल है। इससे बुकिंग कराने वाले जायरीन को असुविधा का सामना करना पड़ेगा।
बहरहाल, एसपी के फरमान को लेकर होटल मालिक परेशान थे, मगर पुलिस के गले में घंटी बांधे कौन, इसी चक्कर में कोई बोल नहीं रहा था। कई तो इस असमंजस में थे कि पुलिस का यह फरमान राठौड़ी हैं फिर बाकायदा नियम के तहत हो रहा है। फिर किसी ने समझाया कि प्रशासन व सरकार को यह इख्तियार है कि वह व्यवस्था के लिए इस प्रकार होटल के कमरे आरक्षित कर सकती है। जैसे चुनाव के वक्त वाहनों का अधिग्रहण किया जाता है और बाकायदा सरकारी दर से किराया दिया जाता है। ठीक उसी प्रकार से होटलों के दो-दो कमरों का अधिग्रहण किया जा सकता है। बात केवल इतनी है कि नियमानुसार पुलिस को भी उसका किराया देना चाहिए। आखिरकार एसोसिएशन ने बीड़ा उठाया और साफ कर दिया कि बिना किराये के पुलिस वालों के लिए कमरा बुक नहीं किया जाएगा। साथ ही यह भी तय किया गया कि इस मसले को निपटाने के लिए पांच सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल एसपी से बात करेगा।
असल में यह पहला मौका नहीं है कि एसपी ने फरमान जारी किया हो। इससे पहले भी हर उर्स मेले के दौरान यह कवायद चलती रही है। मगर पुलिस से पंगा मोल किसी ने नहीं लिया। जहां तक बेगारी का सवाल है, केवल उर्स मेले के दौरान ही क्यों, सालभर भी थोड़ी बहुत बेगारी तो करनी ही पड़ती है। वजह साफ है। कानून-कायदे इतने अधिक हैं कि उनकी पालना संभव नहीं है। ऐसे में पुलिस को राजी रखना ही पड़ता है, ताकि वह परेशान न करे। यह पहला मौका है कि बेगारी के खिलाफ होटल मालिकों ने मुंह खोला है। देखना ये है कि वे आखिर किस हद तक अपने विरोध पर कामय रह पाते हैं। क्या वे अन्य यात्रियों की तरह पुलिस वालों के आईडी प्रूफ ले कर बाकायदा बुकिंग का रिकार्ड रख पाते हं या नहीं? क्या उस बुकिंग के आधार पर किराया वसूल कर पाते हैं या नहीं?
ज्ञातव्य है कि पुलिस अधीक्षक कार्यालय से 4 मई को जारी किए गए पत्र क्रमांक 6155 में एसपी ने समस्त थाना प्रभारियों को मेला क्षेत्र में आने वाली होटलों को पुलिस अधिकारियों के लिए दो-दो कमरों की व्यवस्था करने के लिए कहा था।

-तेजवानी गिरधर
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