लकीर का फकीर की कहावत तो आपने सुनी ही होगी। यह गर्मियों में एक हफ्ता और स्कूल बंद रखने के प्रशासनिक फरमान के मामले में संस्कृति द स्कूल को बंद करवाने पर पूरी तरह से लागू होता है।हुआ दरअसल ये कि सरकार के निर्देश पर जयपुर की तर्ज पर अजमेर के जिला कलेक्टर वैभव गालरिया ने भी गर्मी को देखते हुए कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों की छुट्टी घोषित कर दी थी। मगर स्कूल के प्रिंसिपल अमरेंद्र मिश्रा ने इस आदेश को यह कहते हुए कि दरकिनार कर दिया कि न केवल स्कूल पूरी तरह से एसी है, बल्कि बच्चों को स्कूल लाने वाली बसें भी एसी हैं। स्कूल प्रशासन ने कलेक्टर को भी स्कूल खुली रखने देने का आग्रह किया था, लेकिन उन्होंने कोई तवज्जो नहीं दी। ऐसे में डीईओ आफिस से आरटीई अधिकारी राजेश तिवारी व प्रवीण शुभम निरीक्षण के लिए संस्कृति स्कूल पहुंच गए और कलेक्टर के आदेशों का हवाला देते हुए कक्षा 1 से लेकर 8 वीं तक के बच्चों की छुट्टी रखने के निर्देश दिए। मजबूरी में स्कूल प्रशासन को स्कूल बंद करनी पड़ी और सभी अभिभावकों को बाकायदा यह लिख कर भी भिजवाना पड़ा कि स्कूल अब 9 जुलाई को ही खुलेगी।यूं तो यह सामान्य सी बात है कि प्रशासनिक आदेश सभी पर एक समान लागू होता है, मगर यदि किसी के ठोस तर्क हो तो उसे स्वीकार करते हुए चाहें तो छूट भी दी जा सकती है। जब छुट्टी की ही गर्मी के कारण थी और यदि किसी स्कूल की बसें व पूरा स्कूल भवन एसी है तो उसे छूट देने में कोई बहुत बड़ा पहाड़ नहीं टूटने वाला था, मगर जिला व शिक्षा प्रशासन ने वैसा ही व्यवहार किया, जैसा लकीर का फकीर करता है।दरअसल सरकार ने यह जिला कलेक्टरों पर छोड़ा था कि वे चाहें तो एक सप्ताह तक स्कूल बंद करने के आदेश जारी कर सकते हैं। अर्थात सरकार का ऐसा स्टेंडिंग आदेश नहीं था, जिसके लिए सरकार से मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती। जिला कलेक्टर चाहते तो अपने स्तर पर छूट दे सकते थे। मगर हमारे यहां प्रशासनिक व्यवस्था है ही ऐसी कि कोई भी अधिकारी फालतू का पंगा मोल नहीं लेना चाहता। वो इस कारण भी कि या तो कुछ जिद्दी अभिभावक हल्ला करते या फिर शहर के हर मसले में दखल देने वाले संगठन विरोध कर देते। अजमेर शहर महिला कांग्रेस अध्यक्ष सबा खान ने तो जिला कलेक्टर को ज्ञापन देकर विरोध दर्ज भी करवा दिया। असल में किसी भी राजनीतिक दल के अग्रिम संगठन संबंधित वर्ग के हितों का ध्यान रखने व उनको संगठन से जोडऩे की खातिर बने होते हैं। सीधी सी बात है कि एनएसयूआई या अभाविप होते तो बात समझ में भी आती, मगर महिला कांग्रेस का तो स्कूल व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी हमारे यहां चलन ऐसा हो गया है कि अग्रिम संगठन उन मसलों पर भी सक्रिय हो जाते हैं, जिनका उनसे कोई लेना देना नहीं है। यहां तक कि कई बार अपने मूल संगठन की इजाजत भी नहीं लेते। यानि कि उन्हें शहर के हर मसले पर बोलने का लाइसेंस मिला हुआ है।बहरहाल, संस्कृति द स्कूल के मामले में तो यह भी महसूस होता है कि इसमें बड़े लोगों को उनकी हैसियत दिखाने की मंशा भी रही होगी। जाहिर सी बात है, कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो, जिला कलेक्टर से तो बड़ा नहीं हो सकता। आखिर वे जिले के मालिक हैं। वैसे, एक बात बता दें, इस मालिक वाले भाव को समाप्त करने की खातिर ही सरकार ने इस पद का नाम जिलाधीश से जिला कलेक्टर किया था, क्योंकि जिलाधीश नाम से अधिनायकवाद व सामंतशाही का आभास होता था। खैर, नाम भले ही बदल दिया गया हो, मगर अधिकार तो सारे वो ही हैं। ओर हैं तो उनका उपयोग भी होगा ही।-तेजवानी गिरधर7742067000tejwanig@gmail.com
इन दिनों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य और भाजपा से मुसलमानों को जोडऩे की मुहिम के सेनापति इंद्रेश कुमार खादिमों के निशाने पर हैं। विवाद ये है कि उनकी जमात के एक युवक सैयद इफशान चिश्ती ने संघ के पूर्व सर संघ चालक के पी सुदर्शन और इंद्रेश कुमार के साथ फोटो कैसे खिंचवा ली, जबकि इंद्रेश कुमार पर दरगाह में बम विस्फोट की साजिश में शामिल होने का आरोप है। यानि की इंद्रेश कुमार खादिमों के दुश्मन नंबर वन हैं। और इसी वजह से खादिमों की रजिस्र्टड संस्था अंजुमन सैयद जादगान को भी शिकायत के आधार पर इफशान से जवाब तलब करना पड़ा।दरअसल अंजुमन कई बार ऐसे धर्म संकट में इसलिए पड़ जाती है क्योंकि यह एक सामाजिक संस्था है और राजनीति से इसका कोई सीधा संबंध नहीं है। इस कारण संस्था यह तय नहीं कर सकती कि उसके सदस्य किस पार्टी से संबंध रखें और किस के साथ नहीं। और यही वजह है कि कुछेक खादिम हिंदूवादी पार्टी भाजपा के साथ जुड़े हुए हैं, मगर उस पर कभी ऐतराज नहीं होता। वे पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारी भी हैं। अमूमन वे ही भाजपा नेताओं को जियारत भी करवाते हैं। जायरीन व दुआगो का यह रिश्ता इसलिए कायम है क्योंकि दरगाह का दर हर मजहब को मानने वाले के लिए खुला है। इस मामले में कोई परहेज नहीं किया जाता। खादिमों के लिए हर जायरीन बराबर है। हकीकत तो यह भी मानी जाती है कि ख्वाजा साहब के दर पर सालभर में मुसलमान की तुलना में हिंदू कहीं अधिक आता है।खैर, बात ताजा विवाद की। चूंकि विवाद में आए खादिम युवक सैयद इफशान चिश्ती भाजपा नेता के पुत्र हैं। ऐसे में जाहिर सी बात है कि उनके भाजपा के नेताओं से संबंध हैं। हाल ही जब तीर्थराज पुष्कर में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच का तीन दिवसीय शिविर हुआ तो भाजपा नेता और वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सलावत खां के फोन पर बुलावे की वजह से वे पुष्कर पहुंचे। बकौल इफशान उन्हें नहीं मालूम था कि पुष्कर में आयोजित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सम्मेलन में कौन लोग आए थे। वहां कौन लोग मुख्य अतिथि अथवा विशिष्ट अतिथि थे, इसके बारे में भी उसे नहींं मालूम था। हालांकि बात हजम नहीं होती, मगर जब वे लिखित में कह रहे हैं तो उस पर यकीन करना ही होगा कि उन्होंने गफलत में सुदर्शन व इंद्रेश कुमार के साथ फोटो खिंचवा लिया। इस बयान के साथ ही विवाद खुद ब खुद समाप्त हो जाता है। वो इसलिए भी कि इस बयान के साथ ही यह बयान खुद ब खुद बयां हो गया है कि अगर उन्हें यह मालूम होता कि वहां दरगाह बम ब्लास्ट की साजिश के कथित आरोपी इंद्रेश कुमार भी आए हैं तो वे वहां नहीं जाते। कम से कम उनके साथ फोटो तो कत्तई नहीं खिंचवाते, जिसकी वजह से जमात में गलत संदेश चला गया। एक अर्थ में उन्होंने आम खादिम की इस भावना का सम्मान किया है कि इंद्रेश कुमार जैसों से जमात के लोगों को परहेज करना चाहिए। अलबत्ता उसी हिंदू मानसिकता वाली भाजपा से भले ही जुड़े रहें। यानि कि गुड़ भले ही खा लें, मगर गुलगुले से परहेज रखें। वजह साफ है। अंजुमन किसी भी खादिम को यह निर्देश नहीं दे सकती कि अमुक पार्टी से नाता रखें और अमुक से परहेज। उसके लिए सभी समान हैं। मगर चूंकि इंद्रेश कुमार का नाम सीधे तौर पर बम ब्लास्ट से जुड़ा हुआ माना जा रहा है तो आम खादिम की यही सोच है कि कम से कम उनसे तो परहेज रखें ही। इसी सोच को धार देने वाले पूर्व अंजुमन सचिव सैयद सरवर चिश्ती के दबाव में अंजुमन को इशफान की सुनवाई करनी पड़ी।बात सही भी है। बम विस्फोट की साजिश के कथित आरोपी के साथ कोई खादिम फोटो खिंचवाएगा तो क्या संदेश जाएगा? अलबत्ता इंद्रेश कुमार के लिए यह बात उल्लेखनीय है कि सरकार व जांए एजेंसियां उन्हें जबरन फंसाने की कोशिश कर रही हैं, जबकि दरगाह के खादिमों के साथ तो उनके बेहतर रिश्ते हैं। -तेजवानी गिरधर7742067000
कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के नवनियुक्त शहर जिला अध्यक्ष मुबारक अली के सम्मान में कांग्रेस दफ्तर में आयोजित सम्मेलन के दौरान कांग्रेस शहर अध्यक्ष महेन्द्रसिंह रलावता की जुबान क्या फिसली, जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश टंडन ने पकड़ ली। आइये, जरा देखते हैं कि रलावता ने ऐसा क्या कह दिया, जिससे टंडन का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया।रलावता ने कहा था कि कांग्रेसी विचारधारा के वकील विधि सलाहकार आदि पदों पर काबिज होने के लिए पार्टी का उपयोग करते हैं और जरूरत पडऩे पर कांग्रेस के वकील के नाते पैरवी नहीं करते। उन्होंने बाकायदा इसका उदाहरण भी दिया कि जिस तरह से दरगाह बम कांड के आरोपियों की वकालत भाजपा और आरएसएस विचारधारा के वकील कर रहे हैं, उस तरह से कांग्रेसी वकीलों को भी उनके खिलाफ पैरवी करनी चाहिए। आप समझ गए ना। टंडन को रलावता की सीख पसंद नहीं आई। वकीलों को किस की पैरवी करनी चाहिए अथवा किसकी नहीं, यह भला यदि शहर कांग्रेस अध्यक्ष तय करेगा तो कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है। और चूंकि टंडन बार के अध्यक्ष हैं, इस कारण उन्हें तुरंत प्रतिक्रिया देनी पड़ी। उनके लिये यह जरूरी इस कारण भी हो गया कि वे स्वयं कांग्रेस के एक जिम्मेदारी नेता भी हैं। अगर चुप रहते तो उन पर पक्षपात का आरोप लगता। वैसे भी वकालत ऐसा पेशा है, जिसमें पार्टीबाजी नहीं होती। ऐसे अनेक मामले मिल जाएंगे, जिसमें एक पार्टी से जुड़े वकील ने दूसरी पार्टी के मुवक्किल की पैरवी की होगी। ऐसे मामले भी हैं, जिनमें किसी पार्टी से जुड़े किसी प्रकरण में पीडि़त ने दूसरी पार्टी से जुड़े वकील से इसलिए संपर्क साधा होगा कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का लाभ मिलेगा, मगर वकील ने पैरवी करने से इंकार कर दिया होगा। सीधी सी बात है, यह वकील की मर्जी है कि वह किस की पैरवी करे और किसी की नहीं। इस सिलसिले में एक पुराना किस्सा याद आता है। बताया जाता है कि कांग्रेस के पूर्व विधायक डा. राजकुमार जयपाल पर जब स्वामी लोढ़ा बलात्कार कांड की पैरवी के लिए चंद पत्रकारों ने स्वाती को भाजपा नेता औंकार सिंह लखावत के पास भेजा तो उन्होंने पैरवी करने से इंकार कर दिया। वे चाहते तो मौके का फायदा उठा सकते थे, मगर उन्हें यह शायद ठीक नहीं लगा। यह किस्सा तब बहुत चर्चित हुआ था। किस्सा अक्षरश: सही है या नहीं, मगर इसकी चर्चा उन दिनों खूब थी।यानि कि पार्टी अलग है और वकालत का पेशा अलग। अगर रलावता की मान ली जाए तो कई वकीलों को मुवक्किलों से हाथ धोना पड़ेगा। माना कि विचारधारा से जुड़े वकील विधि सलाहकार जैसे पदों पर काबिज होने के लिए पार्टी का ही सहारा लेते हैं क्योंकि अमूमन ऐसी नियुक्तियां पार्टी के आधार पर ही होती देखी गई हैं। मगर इसका मतलब ये तो नहीं कि उसके एवज में वह पार्टी से जुड़े मामलों की फोकट में पैरवी करें। घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या? रहा उल्लेखित बम कांड का तो ये भाजपा व संघ से जुड़े नेताओं की मर्जी है कि वे क्या करते हैं, वह फार्मूला कांग्रेस पर थोड़े ही लागू हो जाता है। ऐसा तो है नहीं कि बम कांड में पार्टी स्तर पर कोई प्रस्ताव पारित हुआ अथवा भाजपा की ऐसी कोई नीति है। वह तो पैरवी करने वालों की मर्जी है। हो सकता है वे इस मामले की पैरवी फ्री में इसलिए कर रहे हों ताकि बाद में उसका कोई राजनीतिक लाभ मिल जाए।बहरहाल, ऐसा लगता है कि रलावता की जुबान फिसल गई। पार्टी प्रेम के अतिरेक में ऐसा कह गए। ये उनके निजी विचार ही थे, पार्टी संविधान में तो ऐसा कहीं नहीं लिखा है। मगर चूंकि वे शहर अध्यक्ष के जिम्मेदार पद पर हैं, इस कारण उनकी निजी राय भी फरमान जैसी लगी। जाहिर सी बात है कि वकील समुदाय को रलावता की राय नागवार गुजरी होगी।ताजा स्थिति ये कि टंडन ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर रलावता पर सात दिन में कार्यवाही करने और ऐसा नहीं होने पर कांग्रेस कार्यालय पर एक दिन का उपवास रखकर रलावता को सदबुद्धि देने की प्रार्थना करने की बात कह रखी है।मामले से जरा हट कर देखें तो राजनीतिक रूप में टंडन के इस कदम को पार्टी के विपरीत माना जा सकता है, मगर टंडन किसी की परवाह करते हैं। इससे पहले भी वे उर्स के दौरान इंतजामात के लिए प्रशासन से टकराव ले चुके हैं, जिसे कि पार्टी व सरकार के विपरीत माना जा गया था।अपुन को तो यही समझ में आता है कि टंडन साहब को चर्चाओं में रहने में महारत हासिल है। कदाचित उनकी नजर आगामी विधानसभा चुनाव पर हो। वे पहले भी दावेदार के रूप में गिने जाते रहे हैं। वो तो उनका जातीय जनाधार नहीं है, वरना उनमें एक एमएलए बनने के लिए जरूरी एक भी गुण गैर मौजूद नहीं है।चलते-चलते एक पुछल्ला झेलिए। हाल की गुरु पूर्णिमा के मौके पर टंडन ने अपने कुछ पे्रमियों को जो शुभकामना के जो एसएमएस भेजे, उनमें आखिर में लिखा था कि आप मेरे गुरू हो, मेरा चरण स्पर्श स्वीकार करें। पाने वाले तो चकित रह गए। अपुन को जब पता लगा तो यही समझ में आया कि शायद टंडन साहब को लोकप्रिय सांसद रहे प्रो. रासासिंह रावत का गुर दिमाग में बैठ गया है, जिसे कि वे आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट मिलने पर आजमा सकते हैं। यह कहने की जरूरत नहीं है कि रावत साहब जब प्रचार पर निकलते हैं तो दरवाजा खटखटाते ही सबसे पहले दरवाजा खोलने वाले को धोक देते हैं, फिर वह चाहे उनका शिष्य ही क्यों न रहा हो।-तेजवानी गिरधर7742067000tejwanig@gmail.com

भले ही अपने आंचल में दरगाह ख्वाजा गरीब नवाज और तीर्थराज पुष्कर को समेटे अजमेर को सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता हो, मगर हकीकत ये है कि यह आज बारूद के ढ़ेर पर बैठा है। दरगाह इलाके और पुष्कर में अंडरवल्र्ड की बढ़ती गतिविधियों के चलते यहां किसी भी वक्त बड़ा आतंकी वारदात हो सकती है। इसी प्रकार किशनगढ़ की मार्बल मंडी में देशभर के लोगों की आवाजाही पर खुफिया नजर न रही तो भी किसी दिन कोई आतंकी घुसपैठ कर दहशत को अंजाम दे सकता है। संभव है सुकून से जी रहे अजमेर जिले के लोगों को ये पंक्तियां अतिश्योक्तिपूर्ण लगें, मगर सच्चाई यही है कि दरगाह में हुई बम विस्फोट की घटना के बाद हाल ही में मिले 14 जिंदा हैंड ग्रेनेड इशारा करते हैं कि अजमेर बारूद के मुहाने पर बैठा है। आनासागर झील की चौपाटी के नजदीक एस्केप चैनल की सफाई के दौरान बरामद हुए बम, एक खुखरी और चाकू ने शांत नजर आने वाला अजमेर को यकायक किसी बड़ी आशंका की आगोश में ले लिया है। आयुध विशेषज्ञों का मानना है कि ये हथगोले 300 मीटर तक मार कर सकते थे और 150 मीटर के दायरे में भारी तबाही मचा सकते थे। चौंकाने वाला तथ्य ये है इन बमों को एक सप्ताह के भीतर ही रखा गया था। नगर निगम प्रशासन ने करीब एक सप्ताह पूर्व ही एस्केप चैनल की जब सफाई करवाई थी तो उस समय कुछ नहीं मिला था। यानि की इन बमों के पीछे कोई ताजा साजिश जुड़ी हुई है।हालांकि त्वरित कार्यवाही करते हुए इन्हें शहर से दूर सुनसान इलाके में नष्ट कर दिया गया, मगर इस सनसनीखेज घटना के साथ अनके सवाल मुंह बाये खड़े हैं। मसलन ये हथगोले कहीं शहर में आतंक मचाने के इरादे से तो नहीं लाए गए थे। बम यहां कैसे पहुंचे? इसके पीछे किसका हाथ है? कहीं यह किसी आतंकी संगठन की ओर से या इशारे पर की गई हरकत तो नहीं है? यहां उल्लेखनीय है कि शहर में जिंदा हथगोला मिलने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पूर्व वर्ष 2009 में सितंबर के अंतिम सप्ताह में हाथीखेड़ा गांव के पहाड़ी क्षेत्र में भी 4 जिंदा हैंड ग्रेनेड मिले थे। लोहाखान क्षेत्र में एक खंडहर से मशीनगन की बुलेट भी बरामद हो चुकी हैं।यूं तो मादक पदार्थों का ट्रांजिट सेंटर बने दरगाह इलाके व पुष्कर में अंडरवल्र्ड के लोगों की आवाजाही की वजह से इस सरजमीं के नीचे सुलग रही आग का इशारा समय-समय पर मिलता रहा है, मगर दरगाह में बम फटने के बाद तो यह साबित ही हो गया कि आतंकवाद के राक्षस ने यहां भी दस्तक दे दी है। अफसोसनाक बात ये है कि लंबा समय गुजर जाने के बाद भी साजिश पर से पर्दा नहीं उठ पाया है। इसी प्रकार मादक पदार्थों व हथियारों की तस्करी के मामले तो अनेक बार पकड़े गए, लेकिन आज तक प्रशासन व सरकार ने कोई ऐसी ठोस कार्ययोजना नहीं बनाई है, ताकि यहां अंडरवल्र्ड की गतिविधियों पर अंकुश लगाया जा सके।जहां तक अंडरवल्र्ड की गतिविधियों का सवाल है, अनेक बार यह प्रमाणित हो चुका है कि अजमेर मादक पदार्थों की तस्करी कर ट्रांजिट सेंटर बन चुका है। जोधपुर के सरदारपुरा इलाके में एक साइबर कैफे से पकड़ा गया आईएसआई एजेंट ऋषि महेन्द्र बिना पासपोर्ट व वीजा के बांग्लादेश सीमा से भारत में घुसा और अजमेर के दरगाह इलाके में रहने लगा। बाद में पता लगा कि उसे आईएसआई ने भारतीय सेना के पूना से लेकर पश्चिमी सीमा पर स्थित ठिकानों का पता लगाने के लिए भेजा था। वह यहां लंगरखाना गली में होटलों में नौकरी करता रहा। वह कुछ वक्त जयपुर के रामगंज इलाके में रह चुका था।इसी प्रकार निकटवर्ती किशनगढ़ की मार्बलमंडी में हिजबुल मुजाहिद्दीन का खुंखार आतंकवादी शब्बीर हथियारों सहित पकड़ा गया तो पुलिस और खुफिया तंत्र सकते में आ गया था। तब जा कर इस बात का खुलासा हुआ कि दरगाह इलाके की ही तरह किशनगढ़ की मार्बलमंडी में भी देशभर से लोगों की आवाजाही के कारण संदिग्ध लोग आसानी से घुसपैठ कर जाते हैं। इसी प्रकार दरगाह इलाके में पाक जासूस मुनीर अहमद और सलीम काफी दिन तक रह कर अपनी गतिविधियां संचालित कीं, लेकिन खुफिया तंत्र तो भनक तक नहीं लगी। शब्बीर की निशानदेही पर हैदराबाद में पकड़े गए मुजीब अहमद के तार आईएसआई से जुड़े होने के पुख्ता प्रमाण मिले।खुफिया पुलिस बीच-बीच में आसानी से आ-जा रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ कर भले ही अपनी पीठ थपथपाती रही है, मगर वह इसके लायक नहीं, यह तब साबित हो गया, जब मुंबई बम ब्लास्ट का मास्टर माइंड हेडली पुष्कर हो कर चला गया। बाद में जब खुद हेडली ने खुलासा किया कि वह पुष्कर भी गया था, तब जा कर खुफिया पुलिस ने छानबीन शुरू की। शर्मनाक बात तो ये रही कि विदेशियों से भराया जाने वाला फार्म तक गायब हो गया। यह वही हेडली है कि जिसके बारे में खुलासा हुआ है कि वह पुणे में हुए हमले से पहले वहां की रेकी कर चुका है। उसी ने पुष्कर में यहूदियों के धर्म स्थल बेद खबाद की रेकी थी। जैसे ही पुणे में उसके रेकी करने की जानकारी मिली, स्थानीय पुलिस तंत्र के तो होश ही उड़ गए। आपदा प्रबंधन दल ने बेद खबाद का दौरा कर यह साबित कर दिया है कि यहां भी किसी भी वक्त आतंकी राक्षस दरवाजा खटखटा सकता है। कुल मिला कर अजमेर आज बारूद के ढ़ेर पर बैठा है और हमारा प्रशासन नीरो की तरह चैन की बंसी बजा रहा है।-तेजवानी गिरधर7742067000tejwanig@gmail.com
 |
| पुष्पा सत्यानी
|
अव्वल तो अजमेर यूआईटी में लग कैसे गई नैंसी जैन?अजमेर नगर सुधार न्यास में सहायक नगर नियोजक भीम सिंह के साथ अनुबंध के आधार पर उनकी सहायक के रूप में अनुबंध पर लगी नैंसी जैन विवादों में आ गई हैं। भीम सिंह को तो उनके वर्तमान पद से हटाया ही गया है और नैंसी जैन को भी यहां से रुखसत करने पर विचार किया जा रहा है। हालांकि यह सब न्यास के अंदर चल रही गुटबाजी का ही परिणाम है, मगर इस बहाने न्यास सचिव पुष्पा सत्यानी ने पहली बार अपनी सख्ती दिखाई है।ज्ञातव्य है कि नगरीय विकास विभाग ने करीब 8 माह पहले न्यास में नैंसी जैन को अनुबंध पर रखा था, लेकिन मीडिया में अब जा कर चर्चा हो रही है कि सहायक नगर नियोजक भीम सिंह केवल प्रभावशाली लोगों की फाइलों को ही निबटाने में व्यस्त रहते हैं और उनकी सहायक नैंसी जैन अनुबंध पर होने के बावजूद फाइलों पर हस्ताक्षर कर रही हैं। इसके अलावा सभी मुख्य फाइलें भी उसके पास से होकर जाती हैं। न्यास के बाबुओं द्वारा जांच करने के बाद नैंसी ही फाइलों को चैक करती रही हैं।इतना ही नहीं अब जा कर न्यास अधिकारियों को होश आया है कि नैंसी के एक रिश्तेदार न्यास के आर्किटेक्ट हैं, जो कि शहर के जाने-माने व प्रतिष्ठित आर्किटेक्ट हैं। नैंसी जैन लोगों से उनके माध्यम से नक्शा आदि कार्य बनाने की वकालत करती थीं। यहां तक कि अब जा कर सामने आ रहा है कि नैंसी के एक रिश्तेदार के न्यास भवन से सटे एक मकान का करीब डेढ़ साल पहले आवासीय नक्शा स्वीकृत हुआ था। नैंसी के न्यास कार्यालय में लगने के बाद संशोधित नक्शा लगाया गया था। हालांकि कुछ कारणों से वह स्वीकृत नहीं हो पाया। यूं भी क्षेत्राधिकार से बाहर होने की वजह से न्यास को नक्शा स्वीकृत करने का अधिकार ही नहीं था। जानकारी के अनुसार वर्तमान में वहां पर व्यावसायिक निर्माण चल रहा है।कुल मिला कर समझा जा सकता है नैंसी जैन न्यास में अनुबंध पर होने के बावजूद कैसी भूमिका अदा करती रही हैं। इस प्रकरण में बड़ा सवाल ये है कि न्यास के ही जाने-माने आर्किटेक्ट की निकट संबंधी होने के बाद भी वे अजमेर न्यास में कैसे लग गई? जाहिर है यह सब नगरीय विकास विभाग में सैटिंग कर योजनाबद्ध रूप से हुआ होगा। ऐसा नहीं है कि जब नैंसी यहां लगीं तब किसी को पता ही नहीं था कि वे कौन हैं? आम जनता को पता न भी हो, मगर कम से कम अधिकारी व कर्मचारी तो अच्छी तरह से जानते थे। मगर कोई कुछ नहीं बोला क्योंकि वह ऊपर की पहुंच से यहां लगी थीं। अब जब शिकायतों की तादात काफी अधिक हो गई तब जा कर न्यास सचिव पुष्पा सत्यानी ने कार्यवाही की है। इसके तहत अनियमितता बरतने को लेकर सहायक नगर नियोजक भीम सिंह को तुरंत उनके पद से हटा दिया है। साथ ही सहायक नगर नियोजक के सहायक के रूप में अनुबंध पर लगी नैंसी जैन को भी न्यास से रवाना करने का विचार है। श्रीमती सत्यानी अब कह रही हैं कि वे भीम सिंह से भी जवाब तलब करेंगी कि अनुबंध पर लगी नैंसी जैन को सभी फाइलों की जांच करने और हस्ताक्षर करने तक की छूट कैसे दी गई।-तेजवानी गिरधर7742067000tejwanig@gmail.com