गुरुवार, 26 जुलाई 2012

दरगाह में भारतीय मुद्रा को रौंदे जाने पर छिड़ी बहस


दैनिक भास्कर में प्रकाशित फोटो

दैनिक भास्कर के 25 जुलाई के अंक छपी एक फोटो, जिसमें दरगाह शरीफ में भारतीय मुद्रा को पैरों तले रोंदा जा रहा था, पर आम पाठकों की क्या प्रतिक्रिया रही यह तो पता नहीं, मगर फेसबुक पर इस मुद्दे को लेकर जम कर गरमा-गरम बहस हुई। कुछ लोग जरूर संयत बन कर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे, मगर कुछ ने मर्यादाओं को ताक पर रख कर अभिव्यक्ति की आजादी का मजा उठाया। फेसबुक पर कुछ भी कहने की छूट जो है। आपको याद होगा कि पिछले दिनों ख्वाजा साहब के उर्स के दौरान सेंट्रल गल्र्स स्कूल में पाकिस्तानी जायरीन द्वारा भारतीय मुद्रा को रोंदे जाने पर बड़ा बवाल हुआ था, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला।
ताजा मसला है कुछ इस प्रकार है। ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में बीते मंगलवार को हजरत खातून ए जन्नत बीबी फातिमा रजियल्लाहु अन्हा के यौम-ए-वफात के मौके पर अहाता ए नूर में महफिल के दौरान शाही कव्वाल पर नोट उसारने के दौरान भारतीय मुद्रा पैरों तले रौंदे जा रहे थे। इसकी फोटो भास्कर ने प्रकाशित की तो उसे N A Real Story ने फेसबुक पर शाया कर दिया। इस पर अनेक प्रतिक्रियाएं आईं। इस बहस से जहां खादिमों के प्रति कायम हो रही आम राय का संकेत मिला तो वहीं दूसरी ओर एक खादिम Kashif Chishty Kashifchishty ने दंभ से भरी टिप्पणी की। आइये देखते हैं, बहस में किस ने क्या कहा-
Lokesh Tailor- desh sabse bada hota hai.isme rahne vala har admi aam admi hota hai nki khadim
Jitu Rangwani- People they forget everything once they r in Mandir or masjid they think god or Allah doing all once they r entered in dt area.... Nonsense log
N A Real Story- Jitu Rangwani पैसों को जान बूझ कर उछालना फिर पैरों के निचे रोंदना, इन सब का धर्म से क्या लेना देना है, इस्लाम में इतने बड़े वाली की महफ़िल में पैसों को उछालना तो खुद बहुत बड़ी तौहीन है ये एक वाली का आस्ताना है, पब डिस्को या फिर तवायफ का कोठा नहीं जहाँ पैसों को उछाला जाए। मेने जो शब्द इस्तेमाल किये हैं उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ पर इसके बिना शायद में समझा नहीं पता.
Jasmine Singhaniya- ye to vha ka roj ka kaam h
Jitu Rangwani- n a Wht m trying to say ki yeh log jab b kaisi darmik place par pahuchtey hai toh pane app ki hi khufu ya Bhagwan samaj bethtey hai and jo kartey hai Inge San sahi Lagta hai nd dey think ki San god ki Marji se Jo raha hai... So m saying they r totally nonsense
Brajesh Samaria- VOTE SE BADA DESH NAHEE HOTA BECAUSE VOTE SE HEE LOKTANTRA CHALTA H...HHHAAAA....YE KAAM SABHEE DHARMO KE LOG SHADIYO ME KARTE HAIN BECAUSE INDIA IS NOT A RASTRA,,,ONLY A NATION
Vikas Ojha- bcoz.1 they are not hindu 2nd our govt.discriminates us from community abhi aajkal hi dekh lijiye ,,, jaha pure rajasthan me vidyut katuati lagu hain.. kal se .. ajmer ke muslim ilako ko katuati se mukt rakha gya hain... aur hamare sabse bade tyohar diwali ke time .. jan bujhkar light ki katauti ki jati hain ... agar light nai hain to sab ke liye nai honi chaiye na ,. phir discrimination kyu .. on basis of community or caste..
Mukul Mishra- Desh ki gandi rajnitik vayvastha ne kuchh suwaro ko aisa ahsaas kara diya hai k is desh or sanvidhan se bhi bade hai,jab ki satya ye hai k desh se bade na to ye hai or na hi inke rajnitik baap.Jarurat sirf itni hai k muze ya mere jaise kisi aadmi k haath me sanvadhanik shakti aa jaye,yakin maniye dargah pe kam or bajrangarh pe jute saaf karte jyada nazar aayenge,suabah alla k naam ki jagah vandematrum gate nazar aayenge.Shariyat k bajaye i p c k samne haath jode nazar aayenge.Jai hindu rashtra.
Tolaram Siyag- ya galat bat hai
Jassu Jasmin- kya kare ab. .congressi kutto ka jo raaz h..
Pandit Surendra Dhar Dwivedi- sahi kaha rahe ho desh se bada kon ho sakts hai
Kapil Sharma- jada hai na isliye bhai
Jagdish Jas- Sharma Des phle h
Shatrughan Meena- ajmer me ''khadim raaz'' abi cntrol kr lo to sai h..
Sher Mohammed Khan- Mukul g ap smajdar hokar kis jamane ki bat kar rhe muslimo ko thodi si rahat kya d di ap jal uthe kabi apne sarkar k neta afsro k kharche p dhyan dene ki kosis ki h kya
Kashif Chishty Kashifchishty- yuhi jal jal ke mar jana
Parvez Khan- maro salo ko bhjga do yaha s lutmar lagga rkhi h
Amit Ranka- chin lo raj path or bena do wapas sevadar
Ramesh Rawat- khuda ne shaayad inahe kuch jyaada hi de diya h.........kabhi hum pe bhi rehamat kar diya karo
Kashif Chishty Kashifchishty- Sevedar to hum log he hi khwaja ke tum log jab yaha aate ho na mannat mangne to hum hi log dua karte he samjhe or cheen ti duniya ki takat nahi sakti he
N A Real Story- ‎Kashif Chishty Kashifchishty dunya ki taqat chahe na cheen sakti ho, Par Khwaja Saehb Ki Taqat Aur Allah Ki Taqat Sab Kuch Cheen Sakti Hai......

टंडन-सिंह में ट्यूनिंग नहीं, कैसे चलेगी बार की गाडी?


अध्यक्ष राजेश टंडन 

ऐसा प्रतीत होता है कि अजमेर बार एसोसिएशन के इंजन में लगे दो पहिये रूपी अध्यक्ष राजेश टंडन व सचिव चंद्रभान सिंह अलग-अलग दिशाओं में जाने को आतुर में हैं। ऐसे में बार की गाडी क्या होगा, खुदा ही जाने। एक माह में दो बार ऐसी नौबत आई कि बार पूरी तरह से दो फाड़ सी हो गई। पहले ई कियोस्क मसले पर टंडन के जिला कलेक्टर वैभव गालरिया से वार्ता कर आने पर सिंह खेमे ने उनकी इज्जत उतार कर हाथ में दे दी तो अब सिंह ने अपने स्तर पर अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान किया तो टंडन खेमा पसर गया। ये तो गनीमत है कि दोनों ही बार सुलह हो गई, और दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी तलवारें म्यानों में रख लीं।
यह एक सुविज्ञ तथ्य है कि कोई भी संगठन तभी कामयाब होता है, जबकि अध्यक्ष और सचिव की ट्यूनिंग ठीक होती है, वरना आए दिन मतभेद होते हैं। टंडन व सिंह के बीच भी ट्यूनिंग का अभाव प्रतीत होता है। इसी कारण दोनों एक-दूसरे की राय लिए बिना अपने स्तर पर ही काम निपटाने की कोशिश में लगे रहते हैं। पहले टंडन ने सिंह को विश्वास में लिए बिना ही कलेक्टर से समझौता वार्ता कर ली तो अब सिंह ने टंडन को जानकारी दिए बिना ही अन्ना को समर्थन देने का निर्णय कर लिया। सिंह ने अन्ना हजारे द्वारा दिल्ली में शुरू किए गए आंदोलन के समर्थन में बुधवार को कामकाज स्थगित रखने का पत्र अदालतों में भिजवा दिया। वकीलों को सचिव के स्तर पर की गई कार्रवाई की जानकारी दूसरे दिन सुबह अदालत पहुंचने पर मिली तो कांग्रेस विधि विभाग के अध्यक्ष वैभव जैन समेत अन्य वकीलों ने सचिव से इसका विरोध किया। उनका कहना था कि किसी के समर्थन में अदालतों का कामकाज स्थगित रखने का फैसला बार या साधारण सभा के द्वारा ही लिया जा सकता है। किसी को आंदोलन विशेष का समर्थन करना है तो वह व्यक्तिगत रूप से कर सकता है।
ऐसा प्रतीत होता है कि सिंह से यही गलती हो गई कि उन्होंने निजी तौर पर अन्नावाद के प्रभाव में आ कर अति उत्साह में पत्र जारी कर दिया। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि उन्हें यह प्रतीत हुआ हो कि उनकी ही तरह अन्य वकील भी भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे आंदोलन का साथ दे देंगे। बाद में विरोध हुआ तो उस पर खेद जता दिया। नतीजतन अन्ना के समर्थन का आंदोलन फुस्स हो गया। यहां तक कि पुतला तक नहीं फूंका जा सका। इस पूरे प्रकरण का अफसोसनाक पहलु ये रहा कि अध्यक्ष टंडन पूरी तरह से अंधेरे में थे। उन्होंने आंदोलन के बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कह दिया वे जयपुर गए हुए थे। है न अजीबोगरीब विडंबना। इससे यह साबित हो गया है कि सचिव सिंह बार अध्यक्ष टंडन को कितना गांठते हैं और टंडन  सिंह को। प्रतिष्ठा व अहम की इस लड़ाई से दोनों को तो आए दिन नुकसान होगा ही, बार के साधारण सदस्य भी असमंजस में रहेंगे।
 -तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

टीम अन्ना का साथ देकर फिर चौंकाया देवनानी ने


कीर्ति पाठक से गुफ्तगू करते प्रो. देवनानी

एक ओर जहां शहर जिला भाजपा टीम अन्ना के आंदोलन से अधिकृत रूप से अपने आप को अलग रखे हुए हैं, वहीं अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक व पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी आंदोलन का न केवल खुल कर समर्थन कर रहे हैं, अपितु सक्रिय रूप से भाग भी ले रहे हैं। राजनीतिक हलकों में उनके इस कदम को कौतुहल की नजर से देखा जा रहा है।
 यज्ञ में आहुति देते प्रो. देवनानी
प्रो. वासुदेव देवनानी ने जन लोकपाल बिल के समर्थन में कलेक्ट्रेट पर आईएसी के कीर्ति पाठक वाले गुट की ओर से किये जा रहे अनशन पर पहुंच कर केन्द्र सरकार को सद्बुद्धि प्रदान किये जाने हेतु आयोजित हवन में आहूति भी दी। जाहिर सी बात है कि एक ओर जहां पूरी भाजपा इस मामले पर चुप्पी साधे बैठी है, वहीं अकेले देवनानी सक्रिय हैं तो सभी का चौंकाना स्वाभाविक है। ऐसा नहीं है कि देवनानी वहां बिना बुलाए पहुंचे हैं। बाकायदा उन्हें आमंत्रित किया गया था। उन्हें ही नहीं, कीर्ति पाठक ने तो अन्य सभी भाजपा नेताओं, यहां तक कि कांग्रेसी नेताओं को भी आमंत्रित किया, मगर पहुंचे केवल देवनानी।
ज्ञातव्य है कि इससे पूर्व भी देवनानी इंडिया अगेंस्ट करप्शन की ओर से अन्ना संदेश यात्रा के तहत जवाहर रंगमंच पर आयोजित कुमार विश्वास की सभा में प्रमुख श्रोताओं के रूप में विधायक वासुदेव देवनानी और साथ ही आरएसएस अजमेर महानगर संघ चालक सुनील दत्त मौजूद थे। तब भी सभी चौंके थे और विशेष रूप से भाजपा कार्यकर्ता असमंजस में पड़ गए थे कि उन्हें इस आंदोलन में शामिल होना चाहिए अथवा नहीं। तब तो चलो केवल एक भाषण कार्यक्रम था, इस कारण यह समझा गया कि देवनानी के पास यह तर्क होगा कि किसी का भाषण सुनने में क्या बुराई है, मगर अब जब अनशन स्थल पर जा कर यज्ञ में आहुतियां दीं तो मामला गंभीर नजर आया। राजनीतिक हलकों में उनके इस कदम पर कयास लगाए जा रहे हैं। सवाल ये उठाए जा रहे हैं कि ऐसा करके वे क्या जताना चाहते हैं? आखिर वे कौन सा गणित ले कर चल रहे हैं? क्या ऐसा वे किसी के इशारे पर कर रहे हैं? ऐसी क्या वजह है कि पूरी भाजपा एक ओर है और देवनानी एकला चालो रे की तर्ज पर दूसरी ओर?
बाबा रामदेव के समर्थन में निकाली रैली में देवनानी
प्रसंगवश बता दें कि देवनानी का अन्ना आंदोलन में शिरकत करना इसलिए भी चौंकाने वाला है कि पिछले दिनों कुमार विश्वास ने अजमेर प्रवास के दौरान सभा व प्रेस कांफ्रेंस में सरकार पर तो हमले किए ही, भाजपा को भी नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा था कि भाजपा ने प्रतिपक्ष के रूप में कमजोर भूमिका निभाई है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा नेता एक राय नहीं हैं। संसद के बाहर भाजपा नेता सीबीआई को जन लोकपाल के दायरे में लाने की बात करते हैं तो सदन में इस मुद्दे पर चुप्पी साध लेते हैं। टीम अन्ना के भाजपा पर भी हमले के बावजूद उसका साथ देना वाकई चौंकाने वाला है।प्रो. देवनानी ने एक ही दिन में एक और चौंकाने वाली घटना को अंजाम दिया। वे स्वामी रामदेव द्वारा 9 अगस्त 2012 को दिल्ली के रामलीला मैदान में किए जा रहे आन्दोलन के समर्थन में पतंजलि योग समिति, भारत स्वाभिमान, युवा भारत, महिला पतंजलि एवं किसान पंचायत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित रैली में भी पहुंच गए। यहां भी वही स्थिति रही। भाजपा के जाने-पहचाने चेहरे नदारद रहे, जबकि अकेले प्रो. देवनानी भाजपा का प्रतिनिधित्व करते नजर आए। भाजपाइयों ने प्रो. देवनानी की इन गतिविधियों पर सिर तो खूब धुना, मगर उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर देवनानी कौन सी चाल चल रहे हैं?
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, 23 जुलाई 2012

अंतहीन है दरगाह दीवान और खादिमों का विवाद


महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह के दीवान और ख्वाजा साहब के सज्जादानशीन सैयद जेनुअल आबेदीन और खादिमों के बीच वर्षों से चल रहा विवाद अंतहीन है। किसी न किसी बहाने ये विवाद आए दिन उभरता है। हाल ही दीवान की ओर से जारी एक बयान पर बवाल हुआ है।
जैसे ही दरगाह दीवान ने यह बयान जारी कर कहा कि फिल्मी कलाकारों, निर्माता और निर्देशकों द्वारा फिल्मों और धारावाहिकों की सफलता के लिए गरीब नवाज के दरबार में मन्नत मांगना शरीयत और सूफीवाद के मूल सिद्धांतों के खिलाफ और नाकाबिले बर्दाश्त है तो खादिमों ने उस पर कड़ी प्रतिक्रिया की।
दीवान ने कहा कि दरगाह शरीफ का इस्तेमाल आस्था और अकीदत के बजाय व्यावसायिकता, प्रचार-प्रसार और ख्याति प्राप्त करने के लिए किया जाना नाजायज है। इसलिए फिल्मी हस्तियों, निर्माता और निर्देशकों को धार्मिक भावनाएं आहत करने वाले ऐसे किसी भी कार्य से परहेज करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर इस्लामिक विद्वानों और शरीयत के जानकारों की खामोशी चिंताजनक है।
ख्वाजा साहब आध्यात्मिक संत थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन कुरान और इस्लामी शरीयत को आत्मसात करके लोगों को कानूने शरीअत के मुताबिक जिंदगी बसर करने का संदेश दिया। इस्लाम में नाच गाने, चित्र, चलचित्र, अश्लीलता को हराम करार दिया गया है। गरीब नवाज ने लोगों को इन सामाजिक बुराइयों से दूर रहकर शरीयत के मुताबिक इबादत इलाही में व्यस्त रहने की हिदायत दी। आज गरीब नवाज के मिशन को दरकिनार करके उनके दरबार में इन गैर शरई कार्यों के लिए मन्नतें मांगी जा रही हैं । फिल्में रिलीज करने से पहले मजार पर पेश की जाकर फिल्म की कामयाबी के लिए दुआएं की जा रही हैं।
हालांकि दीवान ने सीधे तौर पर खुद्दाम हजरात पर कोई टिप्पणी नहीं की, मगर तुरंत उनकी ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आ गई। खादिमों की रजिस्टर्ड संस्था अंजुमन सैयद जादगान के पूर्व सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने कहा कि दीवान का बयान सस्ती लोकप्रियता पाने का हथकंडा मात्र है। दीवान अपने दरगाह का मुखिया प्रदर्शित करना चाहते हैं, जबकि दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट के मुताबिक खादिम, दरगाह दीवान और दरगाह कमेटी के अपने कार्यक्षेत्र हैं। एक्ट के मुताबिक दरगाह दीवान कमेटी के मुलाजिम हैं और 200 रुपए महीना वेतन हैं।
इसी प्रकार अंजुमन शेख जादगान के सह सचिव एस नसीम अहमद चिश्ती का कहना है कि ख्वाजा साहब का दरबार सभी 36 कौमों के लिए है। मन्नत और दुआ पर आपत्ति सही नहीं है। अमूमन फिल्मी हस्तियों को जियारत करवाने वाले खादिम सैयद कुतुबुद्दीन चिश्ती ने कहा कि ये दीवान का मीडिया स्टंट मात्र है। ख्वाजा साहब के दरबार में कोई भेदभाव नहीं है। हर आने वाला अपनी मुराद लेकर आता है। अंजुमन सैयद जादगान के मौजूदा सचिव सैयद वाहिद हुसैन अंगाराशाह  ने प्रतिक्रिया दी कि मुराद और दुआ व्यक्ति के निजी मामले हैं। कौन क्या मांग रहा है, यह कैसे तय किया जा सकता है। उर्स में दरगाह दीवान साहब के मकान के आसपास खासी तादाद में किन्नर ठहरते हैं, दीवान साहब उनकी हरकतों को ही रुकवा दें।
कुल मिला कर खादिमों का पूरा जोर इस बात पर है कि दीवान को जियारत के मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि वे कोई दरगाह के मुखिया नहीं है, महज दरगाह कमेटी के मुलाजिम हैं। हालांकि यूं तो खादिमों की ओर से कई बार यह बात आती रही है कि दीवान ख्वाजा साहब के वंशज नहीं है, जैसा कि वे अपने आपको बताते हैं, मगर इस बार कदाचित इस बात से बचते हुए यही कह रहे हैं कि वे कमेटी के मुलाजिम मात्र हैं।
असल में यह विवाद काफी पुराना है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने  निर्णय में दरगाह दीवान को ख्वाजा साहब का निकटतम उत्तराधिकारी माना है, मगर इसे कम से खादिम समुदाय मानने को तैयार नहीं है। वो इसलिए कि दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट के तहत साथ ही उसकी नियुक्ति प्रक्रिया में दरगाह कमेटी का भी दखल है। बस यही है विवाद की जड़। और इसी वजह है कि आए दिन टकराव होता रहता है। इस बारे में कुछ जानकारों की राय है कि चूंकि एक्ट 1955 में बना है, जबकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला 1987 का है। इस कारण वह फैसला एक्ट से ज्यादा प्रभावकारी है। मगर मामले में पेच तो है ही। इसी को लेकर एक बार इस बात पर विवाद हो चुका है कि दीवान साहब के बेटे नसीरुद्दीन उनके कार्यवाहक अथवा उत्तराधिकारी नहीं माने जा सकते क्योंकि दीवान की नियुक्ति दरगाह कमेटी करती है।
हुआ यूं था कि दीवान की अस्वस्थता के कारण उर्स के दौरान जब उनके बेटे गुसल की रस्म में आए तो खादिमों को ऐतराज था। उनका कहना था कि मौजूदा दरगाह दीवान की गैर मौजूदगी अथवा पद खाली होने पर अंतरित व्यवस्था दरगाह कमेटी को करनी चाहिए, वंश परंपरा के अनुसार उनके बेटे को गुसल के समय मौजूद नहीं रह सकते। आखिरकार दीवान को मजबूरी में अस्पताल से व्हील चेयर पर आना पड़ा, वरना उनकी गैर मौजदगी में गुसल हो जाता और यह भी एक नजीर बन जाती कि दीवान की गैर मौजूदगी में भी गुसल हो सकता है। बस इसी से बचने के लिए दीवान आए।
इस पूरे प्रकरण पर एक अहम सवाल ये भी उठा था कि यदि खादिम मौजूदा दीवान के भाई या बेटे को उनका प्रतिनिधि नहीं मानते तो उन्होंने अब तक कई बार उर्स के दौरान उनको महफिल की सदारत क्यों करने दी? क्या महफिल और गुसल में मौजूद रहना अलग-अलग मुद्दे हैं? जब महफिल में उनका बेटा सदारत कर सकता है तो वह गुसल के दौरान क्यों नहीं बैठ सकता? इस बारे में कुछ खादिमों को अफसोस है कि यदि पहले अंजुमन इस मामले पर कड़ा कदम उठाती तो आज यह नौबत नहीं आती। अंजुमन को चाहिए था कि वह जैसे ही दीवान की ओर से उनके बेटा या भाई महफिल की सदारत करने के लिए पहली बार आया तो आज की ही तरह ऐतराज कर देती। उस वक्त की लापरवाही ही आज परेशानी का सबब बन गई है।
वैसे एक बात तो साफ है कि भले ही एक्ट के मुताबिक दीवान की नियुक्ति की कोई औपचारिकता होती होगी, मगर इतना भी तय है कि दीवान का पद है तो वंशानुगत ही। यदि खादिम वंशानुगत तरीके से आठ सौ से भी ज्यादा सालों से खिदमत कर रहे हैं, अकबर के जमाने से मौरुसी अमला वंशानुगत रूप से अपनी जिम्मेदारियों निभा रहा है तो क्या अकेला दीवान का ही पद है, जिसके वंशानुगत होने पर ऐतराज किया जा सकता है।
कुल मिला कर यह विवाद अंतहीन है और समय-समय पर उबलता रहेगा। समाधान कुछ होना नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

कुछ इस तरह घेरा रघु शर्मा को कीर्ति पाठक ने


सब जानते हैं कि फेसबुक इन दिनों अभिव्यक्ति का और अतिरेक अवस्था में भड़ास निकालने का सबसे अच्छा जरिया है। जो बात आप किसी के मुंह पर अथवा कहीं और नहीं कह सकते, वह आपको फेसबुक पर कहने की पूरी छूट है। फिर वह चाहे कितनी ही बड़ी तोप क्यों न हो। और अगर गलती से उस तोप ने भी उसमें हिस्सा ले लिया तो पलट कर ऐसा वार होता है कि उसका जवाब देते नहीं बनता। गर बनता भी है तो उसे आगे बढ़ा कर कौन अपनी फजीहत करवाए। कुछ ऐसा ही हुआ राजस्थान के तेजतर्रार व बयानबाजी में दूसरों के छक्के छुड़ाने वाले सरकारी मुख्य सचेतक डा. रघु शर्मा के साथ। गलती से जानबूझ कर डा. शर्मा ने अपने बारे में इंडिया अगेंस्ट करप्शन की अजमेर प्रभारी की ओर से की गई एक टिप्पणी का जवाब दे दिया तो पटल कर ऐसा जवाब आया कि उसका आज तक वे प्रत्युत्तर नहीं दे पाए हैं।
हुआ यूं कि खबर केकड़ी के फेसबुक अकाउंट पर यह खबर छपी कि रघु शर्मा ने अगले पांच साल में केकड़ी को जिला बनाने का ऐलान किया है। इस पर कीर्ति शर्मा पाठक को तरारा आ गया और बोल दिया रघु शर्मा पर ताबड़तोड़ हमला, मानो पहले की कोई खुन्नस हो। उनके कमेंट की भाषा से ही आप अनुमान लगा लेंगे कि अभिव्यक्ति की आजादी का कितना सदुपयोग किया गया है। देखिए-
अगले पांच सालों में क्यों ???इन पांच सालों में इस का ख्याल क्यों नहीं आया ???अब जब चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो झुनझुने बांटने का शौक हो गया है जनप्रतिनिधियों को ....ये राजनीतिज्ञों की चुनावों को ले कर जो चालें चली जाती है उन्हें जनता अब जान चुकी है .....अब बहकावे में नहीं आएगी .....रघु शर्मा जी को इस बात का खुलासा करना ही होगा कि इन पांच सालों में केकड़ी को जिला बनाने का उन्होंने क्या प्रयास किया ???? अगर वे शुरू से ही प्रयासरत रहे हैं तो सही वर्ना अभी नए मुद्दे न उठायें वरन उन कोशिशों का खुलासा करें जिन्हें वे चुनाव जीतने के बाद से करते आये हैं .....जनता अब उन का ही हिसाब मांग रही है ...घोषणाएं और वादे तो चुनाव घोषणा पत्र में आते रहेंगे ...भरमाने का दौर शुरू न करें ...लेखा जोखा दें ...जनता आप से काम का हिसाब मांग रही है जो आप ने चुनाव जीतने से अब तक किया है.......जनता ने आप को काम करने को चुना था...स्थानीय जनता ने आप पर विश्वास कर के आप को विधानसभा तक पहुंचाया था कि आप उन के प्रतिनिधि बन कर स्थानीय हित और राज्य हित व देश हित में कार्य करेंगे...अब सभाएं कर के फिर चुनाव कि तैयारी में सार्थक प्रकार से जुड़े...अपने किये हुए कार्य गिनाएं....अपने किये वादे जो-जो आप ने पूरे किये हैं, उन्हें जनता के सामने लाइए न कि और वादे करने चालू करें...हम जनता को पुराना हिसाब देखना है...जानना है कि आप हमारी कसौटी पर कितना खरा उतरे हैं......आपने इन सालों में क्या काम किया है.......
इस पर रघु शर्मा ने अंग्रेजी में यह जवाब दिया-
Raghu Sharma - What I have done in my constituency people know better than any body else who speaks from far far away look mam in democracy it is peoples endorsement which matters time will reply weather dovelopment has taken place or not so don't be bothered about my work let it be between me and people of kekri
जाहिर सी बात है कि रघु शर्मा के लिए इससे बेहतर जवाब हो भी नहीं सकता था, मगर इस पर कीर्ती शर्मा पाठक ने उन्हें अंग्रेजी में ही कैसा लपेटा, देखिए-
Kirti Sharma Pathak - My views stand.....Please do not take it personal Mr.Raghu Sharma,I personally do not/cannot have any grudge against you but this is not the time for going on about the policies you WILL undertake in your supposedly ne&t term.....We are the people of Ajmer district and are working in Kekri too.....so the allegation of talking from far away does not stand.....I personally never ever stoop to personal statements and think of India as one but your statement of me talking from far far away and everything between you and the people of Kekri seems that you are against your leadership too where Mrs Sonia Gandhi speaks about the developmental or any other work going on in various parts of India..... She speaks from far far away.....So what do have to say about this.....???The people are being educated and awakened by IAC,we are against corruption and corruption alone....there is no politics if we question any one or speak against any statement issued....I am sorry if this hurts but nothing personal.....and ofcourse the endorsement as you say will follow...if there is.....an endorsement I mean.....regards....
क्या हम गलत हैं ????
आया न मजा। भला इस पर रघु शर्मा क्या जवाब देते? कदाचित इस कारण नहीं दिया होगा कि कौन अपनी और फजीहत करवाए। सीधी सी बात है, वे बैठे हैं एक प्रतिष्ठित पद पर और पलट कर हमलावर रुख अपना नहीं सकते और हमला करने वाले को फ्रीस्टाइल का पूरा अधिकार है, वो भी अगर टीम अन्ना का सदस्य हो। वैसे आजकल फेसबुक का अमूमन इस्तेमाल आजकल या तो फूहड़ और सैक्सी फोटो दिखाने के लिए होता है या फिर इस प्रकार की अंतहीन बहस के लिए।
क्या हम गलत हैं?
-तेजवानी गिरधर