सोमवार, 10 दिसंबर 2012

भगत पर धर्मेश जैन के हमले के क्या हैं मायने?

एक ओर जहां अजमेर नगर सुधार न्यास के मौजूदा अध्यक्ष नरेन शहाणी भगत ने अपने कार्यकाल का एक साल पूरा होने पर अपनी उपलब्धियों का बखान किया, वहीं पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन ने भगत और सरकार पर जम कर निशाने साधे। जैन की ओर से आयोजित संवाददाता सम्मेलन में हालांकि शहर भाजपा का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ उपाध्यक्ष अरविंद यादव मौजूद थे, मगर इसका आयोजन विशुद्ध रूप से जैन ने ही किया था। जाहिर ऐसे में यह सवाल तो बनता ही है कि जैन की इस गतिविधि के मायने क्या हैं?
पूरे संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने जिस प्रकार अपने कार्यकाल का बखान किया और अधूरे कार्य मौजूदा न्यास अध्यक्ष भगत द्वारा आगे न बढ़ाने पर अफसोस जताया, उससे साफ नजर आया कि उन्हें इस बात की बड़ी पीड़ा है कि वे अपने सपनों का अजमेर नहीं बना पाए। काश फर्जी सीडी का प्रकरण सामने नहीं आता तो अपना कार्यकाल पूरा कर पाते और उन्होंने जो-जो विकास योजनाएं आरंभ कीं, वे पूरी करके पूर्व न्यास अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत की तरह ही इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा पाते। ज्ञातव्य है कि एक फर्जी सीडी की वजह से जैन को इस्तीफा देना पड़ा, जिसकी जांच पर यह साफ हो गया कि किसी ने षड्यंत्रपूर्वक वह सीडी बनाई और जैन को क्लीन चिट मिल गई। उल्लेखनीय बात ये है कि यह क्लीन चिट कांग्रेस राज में आ कर मिली।
ऐसा नहीं है कि जैन कुछ कर ही नहीं पाए, उन्होंने अनेक उपलब्धियां हासिल कीं, मगर अधूरे कार्यकाल की वजह से उनका जो क्रेडिट मिलना चाहिए था, उस पर तो असर पड़ा ही है। जो मजा आना चाहिए था, वह नहीं आ पाया।
संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने जिस प्रकार बिंदुवार समस्याओं व विकास की संभावनाओं का जिक्र किया, उससे यह तो परिलक्षित हुआ ही कि न्यास के मामलों पर उनकी गहरी पकड़ है। इतनी ही पकड़ पूर्व अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत को भी है, मगर उन्होंने अपनी ओर से प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं समझी। असल में उन्हें प्रदेश की राजनीति से ही फुर्सत नहीं है। भाजपा के दो गुटों में कैसे तालमेल हो, किसका टिकट कटवाना है और किसे दिलाना है, वे अभी उसी में व्यस्त हैं। ऐसे में विपक्ष की भूमिका जैन ने निभाई, मगर उसमें उनका व्यक्तिगत एजेंडा ज्यादा नजर आया। और वो यह कि वे राजनीति में लगातार सक्रिय बने रहना चाहते हैं, ताकि फिर मौका मिले तो कुछ कर पाएं। यूं अजमेर उत्तर के टिकट दावेदारों में उनकी भी गिनती होती है, मगर वे स्वयं में लोकसभा चुनाव लडऩे का माद्दा रखने का अहसास पाले हुए हैं। यद्यपि वे स्वयं यही कहते हैं कि वे अपनी ओर से टिकट नहीं मांगेंगे, मगर समझा जाता है कि मौका आने पर हाथ-पैर जरूर मारेंगे। यूं अगर अगली सरकार भाजपा की हुई तो दुबारा न्यास अध्यक्ष बनने का उनका दावा कमजोर नहीं होगा।
जहां तक भगत के कार्यकाल पर टिप्पणी करने का सवाल है, उनकी इस बात में तो दम है ही कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक तो तीन साल बाद जा कर न्यास अध्यक्ष की नियुक्ति की और न्यासियों की नियुक्ति के मामले में चुप्पी साध गए। इससे पूर्व भी जब डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को अध्यक्ष बनाया था, तब भी न्यासियों की नियुक्ति नहीं की थी। जाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में जनप्रतिनिधियों की पूरी भागीदारी से शहर का जो विकास होना चाहिए, वह नहीं हो पाता। जैन को ज्यादा तकलीफ ये है कि उन्होंने जो कार्य आरंभ किए, उनको कांग्रेस के कार्यकाल में ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। उनका आरोप है कि न्यास खजाने में आने वाला करोड़ों रुपये का राजस्व भूमि दलालों को उपकृत करने में जा रहा है। अगर ये सच है तो यह वाकई चिंताजनक है। जैन ने भगत को तो नकारा बताया ही, राज्य सरकार पर भी गंभीर आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार करने की खातिर भू उपयोग परिवर्तन में राज्य एम्पावर्ड कमेटी का उपयोग किया जा रहा है।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 9 दिसंबर 2012

बेशर्मी बेपर्दा हो गई अजमेर वासियों की


एक ओर जहां डेरा सच्चा सौदा के सेवादारों ने अपने गुरू गुरमीत संत राम रहीम सिंह इंसा के आदेश पर शहर के कोने-कोने को एक ही दिन में साफ कर अजमेर के इतिहास में यादगार व प्रेरणास्पद पन्ना जोड़ दिया, वहीं दूसरी ओर कथित रूप से टायर्ड व रिटायर्ड लोगों के शहर अजमेर के शहवासियों की बेशर्मी भी बेपर्दा हो गई। एक ओर सेवादार शहर की गंदी नालियों में हाथ डाल कर कीचड़ व कचरा ऐसे निकाल रहे थे, जैसे कोई अपने घर की नाली को भी साफ न करे, तो दूसरी ओर कई लोग तमाशबीन बन कर उन्हें देखभर रहे थे। वाहनों से गुजर रहे लोग एक पल को रुक कर सेवा के जज्बे की मन ही मन तारीफ तो कर रहे थे, मगर किसी के मन में यह ख्याल न आया कि वे भी इस काम में अपनी थोड़ी सी हिस्सेदारी निभाए। बेशक हर एक की जुबान पर इन सेवादारों के जज्बे की तारीफ थी, मगर न तो अजमेर के किसी नागरिक ने इस महाअभियान में हाथ बंटाया और न ही इस प्रकार का प्रस्ताव रखा। कई लोग तो ऐसे थे जो सेवादारों को गंदगी वाले स्थान ऐसे बता रहे थे, मानों सरकार ने उनके यहां सफाई करने के लिए सफाई कर्मचारी भेजे हों। दैनिक भास्कर ने आमजन की इस मानसिकता को कुछ इन शब्दों में पिरोया है- यह सब कुछ वैसा ही था, जैसे हमारे घर आया परदेसी मेहमान हमारी आंखों के सामने हमारे रसोई घर से लेकर शौचालय तक को साफ करता रहे और हम उठ कर झूठे मुंह उसे यह तक न कहें, आप रहने दीजिए, हम कर लेंगे।
अजमेर के बेशर्म नागरिकों में सफाई के प्रति कितनी जागरूकता है, इसका इजहार फेसबुक पर एक मित्र नरेन्द्र सिंह शेखावत ने कुछ इस प्रकार किया है:-पटेल मेदान के सामने से एक बारात जा रही थी। बारातियों को नाश्ता दिया था। एक ओर सेवादार सड़क को साफ कर चुके थे तो दूसरी और सभी बारातियों ने प्लेटें सड़क पर ऐसे फैंक दी मानों किसी कूड़ेदान का इस्तेमाल कर रहे हों। कुछ सेवादार यह सब देख कर मायूस हो गए। इस पर पास ही खड़े मित्र ने पूछा, यह देख कर कैसा लगा, उन्होंने कहा बहुत बुरा लगा। मित्र ने कहा यह तो आपने केवल यहां पर ही देखा है, अगर आप पूरे शहर में जाकर देखोगे, जहां आपने सफाई की है तो वहां पर भी ऐसा ही मिलेगा। इस पर सेवादार बोले कि हम क्या करें सर, हम तो हमारे गुरू के आदेश का पालन करते हैं।
क्या आप इस तरह अपने घर की नाली भी साफ कर सकते हैं?
आम जनता को भीड़ की संज्ञा देकर नजरअंदाज भी कर दिया जाए, मगर नगर निगम की कार्यप्रणाली तो कत्तई माफ करने लायक नहीं है। सफाई के लिए डेरा सच्चा सौदा की ओर से जो सहयोग की अपेक्षा थी, उस पर निगम खरा नहीं उतरा। हाल यह है कि सेवादारों के अजमेर से कूच करने के बाद अनेक जगहों पर कचरा ढ़ेर के रूप में पड़ा है। नगर निगम प्रशासन की उदासीनता के चलते नालों में उतरे सेवादारों को बिना गम बूट और बिना फावड़ों के गीला कचरा निकालना पड़ा। कचरा परिवहन के लिए लगाये गये ट्रेक्टर भी नदारद रहे। मात्र एक दिन के लिए आए सेवादारों ने उस सच को भी उघाड़ कर रख दिया है कि नगर निगम के सात सौ स्थाई व बारह सौ अस्थाई सफाई कर्मचारियों की फौज से काम लेने का जिम्मा जिन लोगों पर है, वे कितने कर्तव्यपरायण हैं।
असल में होना यह चाहिए था कि जब डेरा सच्चा सौदा का प्रस्ताव आया था तो जिला प्रशासन व निगम मेयर कमल बाकोलिया का इस स्वर्णिम मौके का फायदा उठाते हुए सफाई महाअभियान में अजमेर के नागरिकों की भागीदारी का सुझाव देना चाहिए था। अगर ऐसा होता तो इसमें कोई शक नहीं है कि अजमेर की अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं आगे बढ़ कर सहयोग देने को तैयार हो जातीं। अब जब कि सांप निकल गया है तो यह सांप पीटने के समान ही है कि ये नहीं हुआ, वो नहीं हुआ, मगर इसका अर्थ ये भी नहीं है कि अजमेर की पूरी जनता बिलकुल ही बेशर्म है। अच्छे नागरिक भी हैं, पढ़-लिखे समझदार भी हैं, मगर उन्हें दिशा देने की न तो प्रशासन को सूझी और न ही निगम को। सच तो ये है कि उन्होंने एक शानदार मौका गंवा दिया। राजनीतिक दल भी अपने आप को अलग किए रहे। भाजपा ने सेवादारों का आभार जरूरत जताया, मगर हाथ बंटाने की बात वहां भी नहीं उपजी। अगर इस अभियान में स्थानीय जनता की भागीदारी भी होती तो इससे उसमें भी जागृति आती। मगर, अफसोस कि किसी की इस पर नजर नहीं गई।
 ऐसा नहीं है कि अजमेर वासियों का ठंडा खून पहली बार उजागर हुआ है, इससे पहले भी इसका नजारा देखा जा चुका है। आपको याद होगा कि पूर्व जिला कलेक्टर मंजू राजपाल ने भी पहल करके सफाई अभियान की शुरुआत की थी, जिसका हश्र क्या हुआ, सब को पता है। देखिये यह चित्र, जो यह कड़वे सच से रूबरू करवा रहा है कि मंजू राजपाल तो झाडू हाथ में लेकर सफाई अभियान की शुुरुआत कर रही हैं, जबकि ऊपर दुकानदार हाथ पर हाथ धर कर बैठे हैं, जिन्हें इतनी भी शर्म नहीं कि अदब में नीचे उतर कर खड़े हो जाएं।

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-तेजवानी गिरधर, अजमेर

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

लो फिर मैदान में आ गए महेन्द्र चौधरी

अजमेर शहर युवक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष महेन्द्र चौधरी लंबे समय की चुप्पी के बाद फिर सक्रिय हो गए हैं। हाल ही जब अखिल भारत किसान खेत मजदूर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष शमशेर सिंह सुरजेवाला अजमेर आए तो चौधरी को अजमेर का जिलाध्यक्ष नियुक्त कर गए। समझा जा सकता है कि जिस प्रकार सुरजेवाला का पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल के यहां उनके गुट के कांग्रेसियों बीच मजमा लगा, उसी दौरान चौधरी को नई जिम्मेदारी दे कर फिर से सक्रिय करने का निर्णय हुआ होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि यह डॉ. जयपाल के वजूद बरकरार होने और फिर से ताल ठोकने का आगाज भी है। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि डॉ. जयपाल ने अपने तरकश में फिर से तीर संजोने का काम शुरू कर दिया है। नियुक्ति की घोषणा संबंधी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जिस प्रकार खुद डॉ. जयपाल व उनके समर्थक मौजूद थे, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि चौधरी की पुन: वापसी हल्के में नहीं ली जा सकती।
आपको याद होगा कि चौधरी युवक कांग्रेस के अब तक के सर्वाधिक सक्रिय अध्यक्षों में शुमार रहे हैं। उनके कार्यकाल के दौरान युवक कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कांग्रेस कार्यालय में जमावड़ा लगा ही रहता था। दुर्योग से कतिपय प्रकरणों की वजह से विवादित हुए, जिसकी वजह से उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा। उनके ऊपर के तार इतने मजबूत थे कि अन्य दावेदारों की भरसक कोशिश के बाद भी उन्हें तभी हटाया जा सका, जब खुद उन्होंने चाहा। अब जब कि सारी बातें नैपथ्य में चली गई हैं, वे एक बार फिर से सक्रिय हो गए हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि उनके पास कार्यकर्ताओं की कोई कमी नहीं है। अगर जज्बा रहा तो इस बैनर के तले ही फिर से अपना जलवा बिखेर सकते हैं। डॉ. जयपाल का आशीर्वाद तो है ही।
जानकारों को पता है कि जब वे शहर युवक कांग्रेस के अध्यक्ष बन कर आए थे तो उनका मकसद कांग्रेस के लिए कुछ करने के बाद विधानसभा चुनाव की जमीन तलाशना था। वे किशनगढ़ की जाट बहुल सीट सहित नागौर जिले की किसी सीट से भाग्य आजमाना चाहते थे। फिलहाल जबकि कांग्रेस की मुख्य धारा वाले पदों पर अन्य गुटों के लोग काबिज हैं, उन्होंने कांग्रेस के इस सहयोगी संगठन के जरिए ही अपने आपको फिर से तराशने का निर्णय किया है। यूं इस बैनर तले भी किसानों व ग्रामीणों के लिए काफी कुछ करने की गुंजाइश है। एकाध भी ढ़ंग का किसान सम्मेलन कर लिया तो फिर से लाइम लाइट में आ सकते हैं। बशर्ते कि इस बार पूरा ध्यान केवल अपने राजनीतिक कैरियर पर ही रखें।
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

इंदिरा गांधी की मूर्ति से होगा मास्टर प्लान का उल्लंघन?


हालांकि संभागीय आयुक्त श्रीमती किरण सोनी गुप्ता की अध्यक्षता में गठित समिति ने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी की मूर्ति मोइनिया इस्लामिया स्कूल के समीप इन्दिरा स्मारक स्थल पर लगाने के प्रस्ताव को स्वीकृत कर दिया है, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या इससे सन् 2005-2023 के मास्टर प्लान का उल्लंघन नहीं होगा? मास्टर प्लान के मुताबिक स्टेशन रोड 120 फीट चौड़ा होना चाहिए। सरकार व प्रशासन उसकी अनुपालना तो कर नहीं पा रहे, उलटा मूर्ति लगा कर भविष्य के लिए समस्या खड़ी कर रहे हैं। एक ओर तो सुप्रिम कोर्ट मार्गाधिकार की अनुपालना के लिए मंदिर इत्यादि तक को हटाने के निर्देश देता है तो दूसरी ओर स्मारक बनाने के लिए नियमों की अवहेलना की जा रही है। आश्चर्य तो इस बात है कि इस मूर्ति को लगाने वाला नगर सुधार न्यास स्वयं मास्टर प्लान का कस्टोडियन है, अगर वही मार्गाधिकार का उल्लंघन करता है तो आम आदमी से क्या अपेक्षा की जा सकती है? इसके अतिरिक्त नगर नियोजन विभाग व यातायात पुलिस की जिस प्रकार तुरत-फुरत में हरी झंडी मिली है, उससे से जाहिर है कि अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने वाले विभागों पर पूरा राजनीतिक दबाव रहा है।
धर्मेश जैन
इस सिलसिले में नगर सुधार न्यास के पूर्व सदर धर्मेश जैन का मानना है कि मौजूदा स्थान पर मूर्ति लगाने से मार्गाधिकार तो उल्लंघन तो होगा ही, यातायात भी प्रभावित होगा। उनका कहना है कि किसी महापुरुष का स्मारक बनाने पर भले ही ऐतराज नहीं किया जाना चाहिए, मगर इतना तो ध्यान रखा ही जाना चाहिए कि उससे आम जनता को कोई परेशानी न हो। जाहिर सी बात है कि मूर्ति लगने के बाद उसके सामने कार्यक्रम इत्यादि भी होंगे, ऐसे में यातायात बुरी तरह से प्रभावित होगा। इसके अतिरिक्त मेन रोड पर होने के कारण मूर्ति की सुरक्षा का भी सवाल खड़ा होगा। उनका सुझाव है कि कांग्रेस के जिम्मेदार नेताओं को मौजूदा की बजाय कोई और स्थान चुनना चाहिए। एक तरीका ये भी हो सकता है कि मार्गाधिकार कायम रखने के लिए मौजूदा जगह से कुछ और पीछे मूर्ति स्थापित की जाए।
नरेन शहाणी
बहरहाल, दूसरी ओर न्यास के मौजूदा सदर नरेन शहाणी भगत ने कांग्रेसियों के लिहाज से एक उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने संभागीय आयुक्त के सभी संबंधित विभागों से दुबारा स्वीकृति लेने के निर्देश की पालना करवाने के लिए अधिशासी अभियंता अनूप टंडन को व्यक्तिगत रूप से विभागों के अधिकारियों से मिलने भेजा और स्वीकृतियां हासिल कीं। इसी के साथ संभागीय आयुक्त की अध्यक्षता वाली कमेटी ने मूर्ति लगाने को हरी झंडी दे दी है।
आइये, जरा आपको जरा पीछे ले चलें। आज भले ही इसका श्रेय भगत के खाते में दर्ज हो मगर असल में यह स्मारक केकड़ी के पूर्व विधायक बाबूलाल सिंगारिया की राजनीति में धमाकेदार शुरुआत का आगाज रही है। तकरीबन पच्चीस साल पहले जिन दिनों सिंगारिया कांग्रेस में सक्रिय हुए ही थे तो उन्होंने अपनी एंट्री धमाकेदार तरीके से करने के लिए स्टेशन रोड पर मोइनिया
बाबूलाल सिंगारिया
इस्लामिया स्कूल की दीवार पर इंदिरा गांधी के फोटो के साथ उनके लोकप्रिय बीस सूत्र का एक भित्ति चित्र लगवाया था। इस पर विवाद हुआ और बाद में विवाद तब ज्यादा बढ़ गया, जबकि उसके ऊपर कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हाथ भी लगा दिया गया। बाद में जब टैम्पो स्टैंड के लिए स्कूल के मैदान की जमीन ली गई तो दीवार तोड़े जाने के सबब इसे हटाने की नौबत आ गई। मगर कांग्रेसी अड़ गए। उन दिनों सिंगारिया, पूर्व विधायक हाजी कयूम खान, महेन्द्र सिंह रलावता, महेश ओझा, कैलाश झालीवाल वाली सशक्त लॉबी ने इसे प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था। बड़ी जद्दोजहद हुई। आखिर भित्ति चित्र वाली दीवार के हिस्से को छोड़ते हुए दोनों तरफ मार्ग निकालना पड़ा। बाद में पुराने भित्ति चित्र के ठीक पीछे नया भित्ति चित्र व्यवस्थित तरीके से बनवाया गया और तब से यह स्थान इंदिरा गांधी के स्मारक के रूप में स्थापित हो गया, जहां पर कांग्रेस का एक गुट जयंती व पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करने आया करता था।
यहां पर मूर्ति की स्थापना करने की बात तो बहुत बाद में आई। नगर सुधार न्यास ने वर्ष 2002 में मोइनिया इस्लामिया स्कूल के बाहर प्रतिमा लगाने के आवेदन किया था। इस पर संभागीय आयुक्त कार्यालय ने नगर सुधार न्यास को 16 अक्टूबर 2003, 6 जुलाई 2004, 6 सितंबर 2004, 7 अक्टूबर 2004 और फरवरी 2005 को पत्र लिखकर निगम की एनओसी पेश करने के निर्देश दिए थे, लेकिन प्रदेश में भाजपा का शासन होने की वजह से न्यास ने केवल 7 अप्रैल 2004 को पत्र लिखकर निगम से एनओसी देने का आग्रह कर इतिश्री कर ली। निगम में भाजपा का बोर्ड होने की वजह से मामला लटका रहा।
ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों गांधी जयंती पर कांग्रेस की एक सभा में मूर्ति स्थापना के मुद्दे को मुख्य रूप से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रताप यादव ने उठाया था। इससे पहले भी वे अनेक बार इस मुद्दे पर राज्य सरकार से पत्र व्यवहार करते रहे हैं। उनका मुद्दा था कि जब केन्द्र व राज्य में कांग्रेस की सरकार है और नगर निगम में मेयर व न्यास में सदर कांग्रेस के हैं, तब भी क्या इंदिरा गांधी की प्रतिमा नियत स्थान पर लगने के इंतजार में न्यास में ही पड़ी रहेगी। इस हलचल का परिणाम ये रहा कि मेयर कमल बाकोलिया ने दस साल से लंबित मामले का निबटारा कर दिया। इसके बाद भगत ने भी त्वरित कार्यवाही करवाई।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 2 दिसंबर 2012

जयपाल का भला क्यों साथ देने लगे रलावता?

भगवंत विश्वविद्यालय के चेयरमेन अनिल सिंह द्वारा छात्रा के साथ की गई कथित छेड़छाड़ के मामले में युवक कांग्रेस के कार्यकर्ता भले ही इस बात से खफा हों कि शहर कांग्रेस ने उनके आंदोलन का साथ नहीं दिया, मगर असल बात ये है कि भला जिस मामले को पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल ने उठाया हो, उसमें भला शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता क्यों साथ देने लगे?
यह जगजाहिर है कि जब से शहर कांगे्रस अध्यक्ष की कुर्सी पर रलावता काबिज हुए हैं, डॉ. जयपाल का गुट स्थानीय संगठन की मुख्य धारा से अलग हो गया है। सच तो ये है कि उनके गुट ने मन से अब तक भी रलावता को अध्यक्ष के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है। ऐसे में जब डॉ. जयपाल ने छात्रा का मुद्दा उठाया तो अपने दमखम पर। उन्होंने रलावता से सलाह मश्विरे की जरूरत ही नहीं समझी। इतना ही नहीं, उन्होंने इसके लिए कांग्रेस के बैनर का भी इस्तेमाल नहीं किया। शुरू से वे अपने दम की राजनीति करते आए हैं और उनके पास अपने समर्थकों की अच्छी खासी फौज है। बहरहाल, जब जयपाल ने अपने स्तर पर मुद्दा उठाया तो रलावता ने उस ओर झांका भी नहीं। उनके तर्क में दम भी है कि युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने आंदोलन की उनसे इजाजत ही नहीं ली थी, तो भला वे क्यों साथ देते। मगर इसके साथ ही उनकी कमजोरी भी उजागर हो गई कि जिस संगठन के वे अध्यक्ष कहलाते हैं, उसके अग्रिम संगठन ही उनके कहने में नहीं हैं। होना तो यह चाहिए था, चूंकि मामला छात्रा से संबंधित था, इस कारण शहर अध्यक्ष की इजाजत से एनएसयूआई को आंदोलन के लिए आगे आती, मगर इस पर विचार ही नहीं किया गया।
जो कुछ भी हो, लेकिन जब आंदोलन शुरू हो ही गया था तो जाहिर तौर पर कांग्रेस के नाम का इस्तेमाल हो रहा था। यहां तक कि लाठीचार्ज में कांग्रेस कार्यकर्ता घायल भी हुए। भद्द तो कांग्रेस की ही पिटी। तब तो उन्हें अध्यक्ष होने के नाते मामले में आगे आना ही चाहिए था। मगर समस्या ये थी कि जयपाल के मामले में टांग कैसे अड़ाएं, सो तमाशबीन बने रहे। और यही वजह है कि युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में उनके प्रति रोष उत्पन्न हो गया है। जिस संगठन के नाम पर वे आंदोलन कर रहे थे, उसी के बड़े नेता चुपचाप देखते रहेंगे तो गुस्सा आना ही है। गुस्सा भी इतना कि उन्होंने न केवल स्थानीय किसी नेता की मदद की बजाय नसीराबाद विधायक महेन्द्र सिंह गुर्जर का साथ लिया, अपितु रलावता की शिकायत मुख्यमंत्री से करने का ऐलान कर दिया। इतना ही नहीं युवक कांग्रेस से इस्तीफे तक की चेतावनी दी दी। अब जब कि विधानसभा चुनाव को एक साल बाकी रह गया है, संगठन का यह बिखराव कांग्रेस के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
-तेजवानी गिरधर