बुधवार, 16 जनवरी 2013

क्यों पकड़ में नहीं आ रहे लोकेश सोनवाल?

एसपी राजेश मीणा मंथली प्रकरण के अहम किरदार अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक लोकेश सोनवाल मीणा व दलाल ठठेरा की गिरफ्तारी के दिन से ही फरार है और अब तक उसका कोई सुराग हाथ नहीं लगा है। जाहिर तौर पर यह स्थिति एक ओर जहां पुलिस के खुफिया तंत्र की विफलता को उजागर करती है, वहीं कई सवालों को भी जन्म दे रही है।
दरअसल किसी को इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा कि पुलिस को सोनवाल के बारे में कुछ पता ही नहीं लग पा रहा। इसी कारण चर्चाओं का बाजार गर्म है कि सोनवाल किसी सुरक्षित स्थान पर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के संरक्षण में छुपे हुए हैं। बताया जाता है कि सोनवाल के शुरू से राजनेताओं व उच्च अधिकारियों से रसूकात रहे हैं। जैसे ही एसीबी उन पर हाथ डालने वाली थी, वे फरार हुए। फरारी के दौरान वे प्रभावशाली लोगों के संपर्क में हैं। इतना तो वे भी जानते हैं कि कानून के आगे आखिरकार नतमस्तक तो होना ही पड़ेगा। आखिर कब तक गच्चा देते रहेंगे। यानि कि वे अपने ऊंचे रसूकातों के दम पर बचने की जुगत में लगे हुए हैं। चर्चा ये भी है कि वे एक मंत्री के दखल के चलते ही अब तक बचे हुए हैं। ऐसे में एसीबी की निष्पक्षता पर सवाल उठना वाजिब हैं।
बताया जाता है कि सोनवाल ही एसपी मीणा मंथली प्रकरण के असली सूत्रधार हैं। सोनवाल ने ही रामदेव ठठेरा का परिचय एसपी राजेश मीणा से करवाया था। सोनवाल रामदेव से अपनी जोधपुर नियुक्ति के समय से ही सम्पर्क में थे। जोधपुर में भी रामदेव सोनवाल के लिए दलाली किया करता था।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, 14 जनवरी 2013

डॉ. बाहेती के डर से भगत ने थामा रलावता का हाथ


डॉ. बाहेती
आखिरकार स्टेशन रोड पर स्थित इंदिरा गांधी स्मारक पर इंदिरा गांधी की प्रतिमा लगाने का रास्ता खुल गया। पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती के क्रेडिट ले जाने के डर से शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष नरेन शहाणी भगत एक हो गए और शहर कांग्रेस कमेटी की ओर से प्रतिमा लगाने के लिए नगर सुधार न्यास को सवा दो लाख रुपए का चैक सौंप दिया गया। न्यास ने भी शहर कांग्रेस कमेटी को प्रतिमा सौंपने का फैसला कर लिया।
ज्ञातव्य है कि प्रतिमा लगाने का मामला काफी दिन से खटाई में इसलिए पड़ा था कि प्रतिमा की कीमत और लगाने की लगात कौन वहन करे। हालांकि न्यास पहले से ही प्रतिमा खरीद चुका है, मगर संभागीय आयुक्त दफ्तर के नए आदेश थे कि प्रतिमा का खर्च न्यास वहन नहीं करेगा। किसी स्वयंसेवी संस्था को ही यह खर्च वहन करना होगा। काफी दिन तक खर्च वहन करने को कोई आगे नहीं आया तो पूर्व विधायक डॉ. श्रीगापाल बाहेती ने चुनावी वर्ष में मौके का फायदा उठाने के लिए अपना प्रस्ताव रख दिया। उन्होंने महात्मा गांधी दर्शन समिति द्वारा प्रतिमा और समारोह का खर्चा उठाने के लिए न्यास अध्यक्ष नरेन शाहनी के पत्र लिख दिया। इसके बाद निगम में प्रतिपक्ष के नेता नरेश सत्यावना ने भी पार्षदों की मदद से प्रतिमा लगाने का प्रस्ताव रख दिया। क्रेडिट लेने की बाजी बाहेती अथवा सत्यावना के हाथ जाते देख शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता को होश आया और उन्होंने भी खर्च वहन करने का प्रस्ताव रख दिया। पूर्व में हालांकि रलावता ने दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी फाउंडेशन को प्रतिमा खरीदने के लिए पत्र लिखा था, मगर जब देखा कि वहां से न जाने कब जवाब आएगा और ऐसे में डॉ. बाहेती के प्रस्ताव को मंजूरी देने का दबाव बनेगा, इस कारण वे शहर कांग्रेस कमेटी की ओर से ही खर्च वहन करने को तैयार हो गए।
एक साथ हुए रलावता व भगत
जाहिर सी बात है कि जब रलावता की तरह भगत भी केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट खेमे से हैं, सो उन्होंने तुरंत रलावता प्रस्ताव मंजूर कर दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि डॉ. बाहेती की पायलट से नाइत्तफाकी लंबे समय से है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से भगत पर उनका प्रस्ताव मंजूर न करने का मानसिक दबाव था। रलावता के प्रस्ताव को स्वीकार करने की एक वजह ये भी है कि भगत अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र से टिकट के दावेदार हैं और इसे मजबूत करने के लिए रलावता का साथ देना उनकी मजबूरी थी। उधर डॉ. बाहेती भी टिकट के दावेदार हैं। अगर उनका प्रस्ताव मान लिया जाता तो उनका कद बढ़ जाता, जो कि भगत को भला कैसे गले उतरता। यूं रलावता भी टिकट के दावेदार हैं और उनकी अगुवाई में प्रतिमा लगती है तो उन्हीं को क्रेडिट मिलेगी, मगर बाहेती को आगे देने से रोकने के लिए भगत के पास रलावता का प्रस्ताव ही मानने के अलावा कोई चारा न बचा था।
कुल मिला कर दस साल से न्यास के स्टोर में रखी इंदिरा गांधी की प्रतिमा के उसके गंतव्य तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। जैसा कि रलावता का कहना है, प्रतिमा लगाने के लिए भव्य समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसमें कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं को बुलाया जाएगा, स्पष्ट है कि वे तकरीबन सवा तीन लाख रुपए के खर्च का पूरा मजा लेंगे।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 12 जनवरी 2013

आरपीएससी का वह आला अधिकारी कौन है?

अजमेर के एसपी राजेश मीणा की गिरफ्तारी को तकरीबन दस दिन हो गए हैं, इस दौरान एक दर्जन थानेदार लाइन हाहिर हो गए व एसपी की विशेष टीम भंग कर दी गई, मगर आज तक ये पता नहीं लग पाया कि एसपी का दलाल रामदेव ठठेरा मंथली का थैला लेकर आखिर राजस्थान लोक सेवा आयोग के किस उच्चाधिकारी के घर पर कुछ वक्त रुका था? उसने वहां क्या किया? क्या वहां आयोग से जुड़े किसी मसले की दलाली की गई? या फिर वह यूं ही मिलने चला गया, क्योंकि वह उनका पूर्व परिचित था? जाहिर सी बात है कि हर किसी को यह जानने की जिज्ञासा है कि आखिर वह अफसर कौन है और दलाल ने उसके घर पर जा कर क्या किया? इस बारे में अब तक एसीबी ने मुंह नहीं खोला है। मीडिया ने खबरों के फॉलो अप में उसका जिक्र तो कई बार किया है, मगर अपनी ओर से नाम उजागर करने से बचा ही है, क्योंकि बिना सबूत के उच्चाधिकारी का नाम घसीटना दिक्कत कर सकता है। यहां तक कि मीडिया ने इशारा तक नहीं किया है, जबकि ऐसे मामलों में अमूमन वह इशारा तो कर ही देता है, भले ही नाम उजागर न करे। स्वाभाविक सी बात है कि विपक्ष को यह मुद्दा उछालने का अच्छा मौका मिला हुआ है, सो एबीवीपी ने आयोग दफ्त के सामने प्रदर्शन किया, टायर जलाया और नारेबाजी की। मगर सवाल आज भी वहीं का वहीं खड़ा है।
समझा जाता कि इस मामले की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को अच्छी तरह से पता है कि आखिर वह अधिकारी कौन है? ऐसा हो ही नहीं सकता कि रिपोर्टिंग और फॉलो अप के दौरान जिन्होंने पुलिस व एसीबी में अपने संपर्क सूत्रों के जरिए सूक्ष्म से सूक्ष्म पोस्टमार्टम किया हो, उन्हें ये पता न लगा हो कि वह अधिकारी कौन है? मगर मजबूरी ये है कि अगर एसीबी ने अपनी कार्यवाही में उसका कहीं जिक्र नहीं किया अथवा कार्यवाही में उसे शमिल नहीं किया तो नाम उजागर करना कानूनी पेचीदगी में उलझा सकता है। वैसे भी यह पत्रकारिता के एथिक्स के खिलाफ है कि बिना किसी जिम्मेदारी के किसी जिम्मेदार अधिकारी का नाम किसी कांड में घसीटा जाए। वैसे जानकारी ये है सरकार एकाएक उस उच्चाधिकारी को फंसाने के मूड में नहीं है। चाहे उसके खिलाफ कुछ सबत हों या नहीं। इसकी वजह ये है उसकी नियुक्ति ही आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बिगड़े जातीय समीकरण के तहत की थी। इसके अतिरिक्त यदि उस पर हाथ डाला जाता है तो आयोग की कार्यप्रणाली को ले कर भी बवाल खड़ा हो जाएगा। ऐसे में संभावना कम ही है कि उस अधिकारी का नाम सामने आ पाए।
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, 9 जनवरी 2013

आम लोगों को ही जोड़ पाई कीर्ति पाठक


कभी देवनानी साथ हुआ करते थे, मगर आज नहीं
आम आदमी पार्टी की अजमेर जिले की कार्यकारिणी यथा नाम तथा गुण वाली ही साबित हो गई। इसमें जिला संयोजक कीर्ति पाठक को छोड़ कर एक भी चेहरा ऐसा नहीं है, जिसकी जिले में कोई पहचान हो या किसी की किसी क्षेत्र में कोई खास उपलब्धि रही हो। यूं तो कीर्ति पाठक का भी कोई लंबा इतिहास नहीं है, मगर अन्ना आंदोलन के साथ अजमेर के राजनीतिक क्षितिज पर उभरने के बाद उन्होंने अपने बौद्धिक स्तर और उग्र तेवरों से अलग पहचान तो बनाई ही है।
खैर, कुल मिला कर आम आदमी पार्टी में आम आदमी ही हैं, कोई खास नहीं। बड़ी अच्छी बात है, होना भी नहीं चाहिए, यही उनका सिद्धांत है। वैसे इसका अर्थ ये भी नहीं निकाला जाना चाहिए कि आम आदमी पार्टी की कोई क्रेडिट नहीं है, क्योंकि कई बार ठीकरी भी घड़ा फोड़ देती है। खुद कुछ हासिल कर पाए न पाए, कम से कम रायता तो बिखेर ही सकती है। कांग्रेस व भाजपा को समान रूप से गाली दे सकती है। जिस मामलों में दोनों पार्टियों की मिलीभगत होती है, उनमें आलोचना करने को कम से कम कोई एक तो पैदा हुआ। एसपी राजेश मीणा मंथली प्रकरण में खुल कर दोनों दलों को निशाने पर लेने को इसका ताजा उदाहरण माना जा सकता है।
अब गिनती के लोग ही साथ नजर आते हैं
असल में जब अन्ना हजारे के नेतृत्व में इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन चला तो उसे अजमेर में भी अच्छा खासा समर्थन मिला था। उसमें आम जन की तो भागीदारी थी ही, आरएसएस और भाजपा के लोग भी समर्थन कर रहे थे। कोई फ्रंट में तो कोई बैक ग्राउंड में। अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी तो खुल कर साथ दिखाई दिए। एक बार अरविंद केजरीवाल की सभा में प्रो. देवनानी के साथ संघ महानगर प्रमुख सुनिल जैन भी नजर भी नजर आए। वस्तुत: तब भाजपा मानसिकता के लोगों का मकसद था कि जैसे भी हो कांग्रेस के खिलाफ चल रहे माहौल को गरमाया जाए। यही वजह रही कि उन दिनों अजमेर में आंदोलन का नेतृत्व कर रही कीर्ति पाठक को अच्छा समर्थन मिल रहा था। उनके प्रतिद्वंद्वी धड़े का भी लोग साथ दे रहे थे, हालांकि अब उसका कोई अता-पता नहीं है। बाद में जब अन्ना के खास सेनापति अरविंद केजरीवाल ने अपनी अलग से पार्टी बनाई तो लोगों को जुनून ठंडा पड़ गया। आंदोलन के साथ जितने लोग थे, वे पार्टी के साथ जुडऩे को तैयार नहीं हुए। चूंकि अब उस आंदोलन की शक्ल राजनीतिक पार्टी ने अख्तियार कर ली है, इस कारण लोग अब उससे परहेज करने लगे हैं। वे सिर्फ निस्वार्थ आंदोलन के साथ थे, सत्तालोलुप पार्टी के प्रति नहीं। भाजपा के लोग तो उससे पूरी तरह से दूर रहने लगे हैं। वैसे भी केजरीवाल ने जब से भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ मोर्चा खोला, तब से भाजपाइयों को केजरीवाल समर्थक फूटी आंख नहीं सुहाते। यानि कि जो लोग तक गलबहियां कर रहे थे, वे भी मुंह फेर चुके हैं। ऐसे में समर्थकों का टोटा होना ही था। आंदोलन ने जो ऊंचाई छुई थी, उसका दसवां हिस्सा भी पार्टी के साथ नहीं जुड़ पाया है। हालांकि कीर्ति पाठक की कोशिश में कोई कमी नहीं है, मगर जाने-पहचाने व प्रभावशाली लोग इस पार्टी के साथ जुडऩे में कोई रुचि नहीं दिखा रहे। बिना भावी स्वार्थ के जुड़ता भी कौन है? स्वाभाविक सी बात है कि वे जानते हैं कि सरकार या तो कांग्रेस की बनेगी या फिर भाजपा की, ऐसे में नई नई पार्टी से कौन जुड़े? इसी का नतीजा है कीर्ति पाठक के नेतृत्व में गठित टीम का चेहरा। ये टीम कैसे आगामी विधानसभा व लोकसभा चुनाव लड़वाएगी, अब इस पर सवाल उठ खड़े होने लगे हैं। अर्थात पार्टी को खड़ा करने और उसे चलाने में कीर्ति पाठक को बहुत जोर आएगा और वो भी खुद की जेब के खर्चे पर।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

अकेले डॉ. जयपाल लॉबी ने दिखाई मर्दानगी


यह सर्वमान्य धारणा है कि पुलिस तंत्र की निचली इकाई पुलिस चौकी व थानों से मंथली एसपी और उच्चाधिकारियों से लेकर गृहमंत्री तक पहुंचती है और इसी कारण जब यह बात मीडिया में उजागर हुई कि एसपी मीणा मथंली प्रकरण में लाइन हाजिर थानेदार पूरे गड़बड़झाले की पोल खोलने को आतुर हैं तो आरोप के दायरे में आई कांग्रेस व भाजपा को सांप सूंघ गया। न तो सत्तारूढ़ कांग्रेस और न ही विपक्षी दल भाजपा की ओर से इस कथित आरोप का प्रतिकार किया गया। अकेले कांग्रेस के पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल की लॉबी ने मर्दानगी दिखाते हुए कहा कि मंथली देने के मामले में लाइन हाजिर हुए सर्किल इंस्पेक्टर सार्वजनिक करें कि उन्होंने किस दल के किस नेता को मंथली व खाने के पैकेट बना कर दिए।
हालांकि यह बात ठीक है कि फिलहाल खुद लाइन हाजिर थानेदारों ने मुंह नहीं खोला है, मगर मीडिया के जरिये जो बातें सामने आईं हैं, उस पर कांग्रेस व भाजपा को प्रतिक्रिया देना लाजिमी है। ज्ञातव्य है कि मीडिया में यह बात खुल कर आई है कि लाइन हाजिर थानेदारों ने अपना नाम उजागर न करने की शर्त पर चेतावनी दी है कि अगर उन्हें फंसाया गया तो वे इस पूरे गोरखधंधे की पोल खोल देंगे कि चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ही सरकारों के दौरान उच्चाधिकारियों व मंत्रियों तक मंथली जाती रही है। वे बड़े अधिकारियों को रिश्वत देते रहे हैं, जिनमें कई लोग आज डीआईजी, आईजी और भ्रष्टाचार निरोधक विभाग में बड़े पदों पर आसीन हैं। लाइन हाजिर हुए थाना प्रभारियों को इस बात की भी तकलीफ है कि केवल वे ही शिकंजे में क्यों आए, जबकि मंथली केवल शहर से ही नहीं वरन जिले के सभी 33 थानों से की जाती थी, फिर गाज उन पर ही क्यों गिर रही है? मीडिया में इससे भी अधिक बातें आई हैं। ऐसे में आम तौर पर हर छोटी-मोटी घटना पर प्रतिक्रिया जाहिर करने वाले नेताओं की चुप्पी वाकई चकित करने वाली और शर्मनाक है। अगर नेताओं को अपने ईमान का गुमान है कि होना यह चाहिए कि डॉ. जयपाल की तरह और नेता भी लाइन हाजिर थानेदारों के आरोपों पर खुल कर अपनी प्रतिक्रिया करें। वरना माना यही जाएगा कि जिस प्रकार पुलिस तंत्र भ्रष्ट है, ठीक वैसे ही नेता भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं।
ऐसे में डॉ. जयपाल सहित  बीस सूत्रीय क्रियान्वयन कमेटी के सदस्य कुलदीप कपूर, सैयद फखरे मोइन, पार्षद गुलाम मुस्तफा, विजय यादव, रमेश सेनानी व सुनील केन आदि की खुली चुनौती तारीफ ए काबिल है कि सभी लाइन हाजिर सीआई ने यदि आरोप सार्वजनिक नहीं किए गए तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। कम से कम उन्होंने सच को उजागर करवाने की चुनौती तो दी, भले ही बाद में सच सामने आने पर जो कुछ भी होगा सो होगा।
जहां तक लाइन हाजिर थानेदारों का सवाल है, उनकी यह धमकी कि उनको फंसाया गया तो वे सब की पोल खोलेंगे, कायराना हरकत है। उन्हें फंसाने पर ही क्यों, क्या बिना फंसे उनका फर्ज नहीं बनता कि सच को आम जन के सामने रखें। अगर वाकई उनके पास सबूत हैं तो उन्हें उजागर करना ही चाहिए। सच तो ये है कि इतने बड़े गोरखधंधे के सबूत अगर वे दबा रहे हैं तो वे गंभीर अपराध कर रहे हैं। केवल अपने पत्रकार मित्रों के जरिए सरकार, नेताओं, राजनीतिक दलों और उच्चाधिकारियों पर दबाव बनाना तो कायराना हरकत ही कही जाएगी।
वैसे एक बात पक्की है, मीडिया में चाहे जितने रहस्य उजागर हों, लाइन हाजिर थानेदार खुल कर सामने आने वाले नहीं हैं क्योंकि उन्हें पता है कि चंद दिन बाद मामला ठंडा पड़ जाएगा और उन्हीं मैदानों पर वही घोड़े दौडऩे वाले हैं। वैसे भी उन्हें अपनी नौकरी प्यारी है, न कि भ्रष्ट पुलिस तंत्र की पोल खोलना। कदाचित ये बात डॉ. जयपाल भी जानते हैं कि आरोप लगाने वाले कथित थानेदारों की हिम्मत नहीं कि मुंह खोलें, मगर कम से कम चुनौती दे कर उन्होंने अपनी मर्दानगी तो दिखाई ही है। और अगर वाकई थानेदारों ने मुंह खोला तो यह बहुत ही अच्छी बात होगी कि सारे बेईमान व भ्रष्ट लोगों पर से नकाब उतर जाएगा।
-तेजवानी गिरधर