रविवार, 17 मार्च 2013

ज्ञान सारस्वत : ऊंट किस करवट बैठेगा?


ज्ञान सारस्वत
ज्ञान सारस्वत
संघ व भाजपा पृष्ठभूमि के निर्दलीय पार्षद ज्ञान सारस्वत ने वार्ड दो के विकास कार्यों का शुभारंभ व वेब साइट का उद्घाटन अजमेर के कांग्रेसी सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट के हाथों से करवा कर राजनीतिक पंडितों को इसका फलित निकालने में उलझा दिया है। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि उनका अगला कदम क्या होगा? अर्थात ऊंट किस करवट बैठेगा? उनके इस चौंकाने वाले कृत्य से आखिरकार मुख्य धारा में आ कर भाजपा में शामिल होने की उम्मीद पाले भाजपा नेताओं को जहां झटका लगा है, वहीं कांग्रेसी अपने लिए शुभ संकेत मान रहे हैं। रहा सवाल ज्ञान सारस्वत का तो वे इस सारी माथापच्ची के बीच निरपेक्ष रह कर अपने वार्ड के विकास में ही जुटे हुए हैं।
हालांकि ज्ञान चूंकि अभी निर्दलीय हैं और भाजपा का उन पर कोई जोर नहीं है, इस कारण स्वतंत्र हैं, मगर लोग यह समझ ही नहीं पा रहे कि मूलत: भाजपाई होने के बाद भी ज्ञान सारस्वत ने आखिर क्या सोच कर शिक्षा राज्यमंत्री नसीम अख्तर इंसाफ, मेयर कमल बाकोलिया, यूआईटी अध्यक्ष नरेन शाहनी भगत, शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेंद्र सिंह रलावता आदि की मौजूदगी में पायलट के हाथों शुभारंभ करवाया? जिस भाजपाई जनाधार पर वे खड़े हैं, उस पर इसका क्या असर होगा? सिक्के का दूसरा पहलु ये भी है कि इस कार्यक्रम में जिस प्रकार जनसमूह उमड़ा, वह इस बात का संकेत है कि वहां की जनता को केवल ज्ञान सारस्वत से मतलब है, जो कि दिन-रात विकास कार्यों में जुटे हैं, इससे नहीं कि वे कैसा राजनीतिक कदम उठा रहे हैं। उन्हें यकीन है कि ज्ञान जो कुछ कर रहे हैं, उनके भले के लिए ही कर रहे होंगे।
एक बात और। ताली दोनों हाथों से बजी। पायलट ने भी ज्ञान सारस्वत की जम कर तारीफ की। एक केन्द्रीय मंत्री का भाजपा के बागी निर्दलीय पार्षद के बुलावे को स्वीकार करना और साथ ही पीठ थपथपाना सामान्य बाद नहीं है। शायद इस उम्मीद में कि कभी उन्हें कांग्रेस में लाया जा सकेगा। कुल मिला कर ज्ञान सारस्वत ने एक ऐसी गुत्थी को जन्म दिया है, जो कि आगामी विधानसभा चुनाव में जा कर ही खुलेगी, जब वार्ड के लोग ज्ञान सारस्वत का मुंह ताकेंगे कि वे क्या फरमान जारी करते हैं? किसको वोट देने की अपील करते हैं? और वहीं से शुरू होगी ज्ञान सारस्वत के नए केरियर की शुरुआत।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 16 मार्च 2013

धर्मेश जैन का छिपा एजेंडा क्या है?


Dharmesh Jain
श्रीश्याम सत्संग समिति की ओर से सुभाष उद्यान में आयोजित श्रीरामनाम परिक्रमा कार्यक्रम में नगर सुधार न्यास के पूर्व सदर धर्मेश जैन जिस तरह से विशेष भूमिका अदा की, उसे देख कर राजनीति के जानकार उनके छिपे एजेंडे को सूंघने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कि वे हैं तो जैन समाज के, जो कि सनातन अथवा हिंदू धर्म से अलग धर्म का पालन करने वाला है, मगर सनातन धर्म से जुड़े समूह के इतने विशाल आयोजन में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। शहर को शायद ही कोई ऐसा नेता हो, जिसे उन्होंने इस आयोजन में बुलवा कर आरती करने का मौका न दिया हो। ख्वाजा साहब की दरगाह के प्रमुख खादिमों ने भी सांप्रदायिक सौहार्द्र का परिचय देते हुए इसमें शिरकत की। इतना ही नहीं कार्यक्रम की विशालता का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह के दीवान सैयद जेनुअल आबेदीन का अभिनंदन करने अजमेर आए शिवसेना के सांसद अनंत गीते, संजय राउत तथा अनिल देसाई ने भी इस कार्यक्रम में शिरकत करना मुनासिब समझा। उनका स्वागत करने वालों में जैन की ही पुत्र विवेक जैन आगे थे। इसी प्रकार विहिप नेता प्रवीण भाई तोगडिय़ा का आगमन भी विशेष अर्थ रखता है।
हालांकि यह सही है कि भले ही जैन धर्म हिंदू धर्म से अलग है, मगर वैश्य समुदाय का हिस्सा होने और जैनियों के सामान्यत: भाजपा मानसिकता के होने के कारण जैनियों की नजदीकी सनातन धर्मियों से रहती ही है। जहां तक जैन का सवाल है वे भाजपा संगठन में अहम भूमिका में रहे हैं और पिछले भाजपा कार्यकाल में न्यास सदर भी रह चुके हैं, इस कारण उनकी हिंदूवादी संगठनों से स्वाभाविक करीबी है। इस नाते हिंदू धर्म के आयोजनों में भी उनकी विशेष मौजूदगी रहती है। हालांकि जैन स्वभाव से धार्मिक हैं और समाज के धार्मिक कार्यों में भी अग्रणी भूमिका में रहते हैं, इस कारण चौंकने जैसा कुछ नहीं है, मगर सनातन धर्मावलंबियों के इतने विशाल आयोजन में उनकी अहम भूमिका में होना तनिक चौंकाने वाला प्रतीत होता है। जैन धर्म से होने के कारण यूं भले ही वे हिंदुओं की तरह हनुमान जी को न मानते हों, मगर उन्होंने अपने संस्थान की ओर से हनुमान चालीसा बड़े छपवा कर उनका वितरण भी किया है।
भले ही जैन का इस आयोजन में अग्रणी भूमिका में रहने के पीछे कोई खास मकसद न हो और वे विशुद्ध धार्मिक व सामाजिक भाव से जुड़े हों, मगर चुनावी मौसम में इस प्रकार की गतिविधियों को स्वाभाविक रूप से उसी की रोशनी में देखा जाता है। भले ही जैन आयोजन की सफलता को राजनीति में भुनाने की अपनी ओर से कोई कोशिश न करें, मगर यह स्वयंसिद्ध तथ्य है कि इस आयोजन से उनके कद में इजाफा हुआ है और उन्हें इसका राजनीति पृष्ठभूमि में लाभ जरूर मिलेगा। कहने की आवश्यकता नहीं है कि उनकी नजर आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर की सीट सहित अजमेर लोकसभा सीट पर है।
-तेजवानी गिरधर

शक की सुई पूर्व बोर्ड अध्यक्ष डॉ. गर्ग पर भी?

subhash gargराजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के वित्तीय सलाहकार नरेंद्र कुमार तंवर के एसीबी के शिकंजे में फंसने के साथ ही बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सुभाष गर्ग पर भी शक की सुई घूमती नजर आ रही है। कयास ये लगाया जा रहा है कि तंवर के पास मिली करोड़ों की संपत्ति का कहीं न कहीं डॉ. गर्ग से भी कनैक्शन है। इस प्रकरण को शिक्षा मंत्री बृजकिशोर शर्मा के उस बयान की रोशनी में भी देखा जा रहा है कि जब डॉ. गर्ग का कार्यकाल समाप्त हो रहा था तो उन्होंने बाकायदा सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे तो ये चाहते हैं कि डॉ. गर्ग को ही अध्यक्ष बनाया जाए, यह दीगर बात है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनकी सिफारिश को नजरअंदाज कर दिया।
हालांकि यह जांच में ही सामने आ पाएगा कि तंवर के पासा मिली संपत्ति का डॉ. गर्ग से कोई संबंध है या नहीं, मगर राजस्थान शिक्षक संघ (राधाकृष्णन) के प्रदेश अध्यक्ष विजय सोनी ने तो बाकायदा बयान जारी कर डॉ. गर्ग के कार्यकाल की जांच कराने की मांग कर डाली है। सोनी का आरोप है कि वित्तीय सलाहकार नरेंद्र तंवर ने डॉ. गर्ग की मिलीभगत से ही भ्रष्टाचार किया है। उन्होंने कहा कि एक ओर प्रायोगिक परीक्षाओं की राशि, उडनदस्तों की राशि व अन्य भुगतान अटके हैं, दूसरी ओर वित्तीय सलाहकार के कृपा पात्रों को करोड़ों रुपए के भुगतान इनके कार्यकाल में किए गए। ज्ञातव्य है कि सोनी उस वक्त भी आरोप लगाते रहते थे, जब कि डॉ. गर्ग पद पर थे, मगर उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह दब जाती थी।
ज्ञातव्य है कि भाजपा विधायक वासुदेव देवनानी भी पूर्व में बोर्ड अध्यक्ष डॉ. गर्ग पर आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने निर्माण कार्यों व ठेकों में गड़बड़ी सहित आरटेट परीक्षा 2011 के दौरान बोर्ड को मिली बेरोजगार युवकों की फीस का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया था और राज्य सरकार से डॉ. गर्ग के कार्यकाल की निष्पक्ष आयोग से जांच करवाने सहित उन्हें बर्खास्त करने की मांग की थी।
इस प्रकरण में अहम सवाल ये उठ रहा है कि डॉ. गर्ग के कार्यकाल में ही एफए नरेंद्र तंवर का तबादला अन्यत्र हो गया था, लेकिन इस तबादले को रद्द करवा कर उन्हें यहीं पदस्थापित किया गया। जानकारी ये भी मिली है कि एसीबी को तंवर के कक्ष में तलाशी के दैरान बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष का एक सिफारिशी पत्र भी मिला है, जिसमें तंवर को काम का आदमी बताते हुए तबादला निरस्त करने की बात लिखी है। इसी सिलसिले में अहम बात ये भी है कि बोर्ड के इतिहास में पहली बार एक ही अध्यक्ष और एफए के कार्यकाल में रिकार्ड निर्माण कार्य हुए। बोर्ड में बीते तीन साल में 40 करोड़ रुपए से अधिक के निर्माण कार्य हुए हैं। सवाल ये भी कि जिस आरएसआरडीसी के काम को पूर्व वित्तीय सलाहकार ने घटिया करार दे दिया था, उसी से बोर्ड ने सभी निर्माण कार्य कराए। बताया जाता है कि डॉ. सुभाष गर्ग की गुड बुक में शामिल तंवर की देखरेख में ही में निर्माण कार्य से लेकर रद्दी के ठेके, परीक्षा सामग्री के परिवहन संबंधी ठेके, पुस्तक प्रकाशन के लिए विभिन्न फर्मों से संबंधित टेंडर और इन छपी पुस्तकों के प्रदेश भर में पहुंचाने के टेंडर आदि हुए। बोर्ड ने 1970 से 2000 तक के विद्यार्थिर्यों के परीक्षा दस्तावेज के डिजिटलाइजेशन के लिए भी बड़ा ठेका किया। बोर्ड प्रबंधन ने गोपनीयता के नाम पर आज तक इस ठेके की राशि सार्वजनिक नहीं की है। बोर्ड ने दो बार आरटेट का आयोजन किया है। इसका अधिकतर कार्य भी एफए के हाथ में रहा है।
ज्ञातव्य है कि तंवर के अजमेर के पंचशील स्थित बंगले से बोर्ड की 54 करोड़ 70 लाख रुपए की एफडीआर मिली है। बोर्ड के निकट स्थित आईसीआईसीआई बैंक के लॉकर से करीब 3.50 लाख रुपए के सोने के सिक्के और नकदी बरामद हुई। जांच में आरोपी की संपति का आंकड़ा करीब 11 करोड़ पहुंच चुका है।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 14 मार्च 2013

इब्राहिम फखर ने खुद ही किया अपने आपको दावेदारी से अलग

सैयद इब्राहिम फखर

पुष्कर विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम जमात से भाजपा के प्रबल दावेदार सैयद इब्राहिम फखर ने खुद अपने आपको दोवदारी से अलग कर लिया है। तीर्थराज पुष्कर में भाजपा के तीन मुस्लिम दावेदार शीर्षक से इसी कॉलम में प्रकाशित आइटम पर प्रतिक्रिया करते हुए जनाब फखर ने कहा है कि न वे पहले कभी दावेदार थे और न ही आज हैं। साथ यकीन दिलाया है कि वे कभी खुद टिकट मांगने नहीं जाएंगे। इतना ही नहीं उन्होंने दरियादिली दिखाते हुए यह तक लिखा है कि दूसरे जो लोग कोशिश कर रहे हैं तो उन्हें भी उनकी वजह से हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। वे पार्टी के साथ बंधे हैं और पार्टी जो निर्णय करेगी, उसका पालन करेंगे।
जनाब फखर साहब इतनी साफगोई के लिए धन्यवाद के पात्र हैं। राजनीति में कभी कोई इस तरह से अपने आपको दावेदारी से अलग नहीं करता, जिसे कि अन्य लोग ही दावेदार मान रहे हों। वैसे अपना मानना है कि जहां कई लोग इस कोशिश में रहते हैं कि उनको मीडिया में दावेदार माना जाए तो कई ऐसे भी होते हैं जो दावेदार तो होते हैं, मगर उसे जताना नहीं चाहते क्योंकि पहले से दावेदारी उजागर हो जाने पर कारसेवा का खतरा रहता है। जहां तक फखर साहब का सवाल है, हालांकि वे खुद की ओर से दावेदारी नहीं करने की बात कह जरूर रहे हैं, जो कि सही ही मानी जानी चाहिए, मगर अपनी जानकारी यही है कि वे पुष्कर विधानसभा क्षेत्र में दावेदारी के लिए ही सक्रिय रहे हैं और डिजर्स भी करते हैं। खैर, जहां तक फखर साहब ने टिकट की कोशिश करने वाले अन्य को हतोत्साहित न होने का संदेश दिया है, अपना मानना है कि यह आईएनजी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी में ग्रुप सेल्स मैनेजर के रूप में काम कर रहे मुंसिफ अली के लिए सुखद हो सकता है, जो कि जमीन पर पूरी तैयारी कर रहे हैं।
जनाब इब्राहिम फखर ने अपनी प्रतिक्रिया कितनी संजीदगी और कूल मांइड से दी है, जरा आप भी पढ़ लीजिए:-
tejwani ji,
shukriya app ka ki app bande ko is layak mante ho lekin bhai sahib na me pehle ticket ka davedar tha aur na hi ajj hu ,mujhe party ne jimmedari di jise me imandari se pura karna chahta hu vishwas rakhiye me kabhi swaym ticket mangne nahi jaunga aur meri vajag se dusre log jo koshish kar rahe ho unhe bhi hatossahit nahi hona chahiye me puri tarah se bjp ke sath hu aur voh jo bhi nirnay karegi akhshartaya uski palna karunga phir party chahe jo nirnay kare ,ek bar phir app ka dhanyewad tejwani ji lekin mujhe is race se door hi rakhe to meharbani hogi .
अब आप समझ सकते हैं कि उन्होंने न्यूज आइटम को कितने सकारात्मक रूप से लिया है, जो कि एक सुलझे हुए राजनीतिज्ञ की निशानी है।
-तेजवानी गिरधर

बार-बार निशाने पर आ जाते हैं बार अध्यक्ष टंडन


अजमेर बार के अध्यक्ष राजेश टंडन का पिछला अध्यक्षीय काल भले ही अपेक्षाकृत चमकदार रहा हो, मगर इस बार तो वे बार-बार अपने ही वकील साथियों के निशाने पर आ रहे हैं। और दिलचस्प बात ये है कि जिस बार अध्यक्ष पद की बदौलत उन्होंने कांग्रेस में अहमियत पाई थी, उसी पार्टी का नेता होने के कारण ही उन्हें बार की नेतागिरी में दिक्कत आ जाती है।
हाल ही जब उन्होंने सरकार को सद्बुद्धि देने के लिए ख्वाजा साहब की दरगाह की जियारत करने का निर्णय किया तो कुछ वकीलों ने विरोध कर दिया। वकील संजीव टंडन, राजेश ईनाणी, प्रदीप कुमार, जितेंद्र खेतावत व विनोद शर्मा समेत अन्य वकीलों ने इस संबंध में टंडन को पत्र लिख कर जियारत को स्वार्थ से प्रेरित बताया और यात्रा के मुद्दे पर साधारण सभा बुलाने की मांग की। कुछ ऐसा ही विरोध पाक प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की यात्रा का विरोध करने के दौरान भी हुआ, जब कुछ कांग्रेसी विचारधारा के वकीलों ने इस पर ऐतराज जताया। असल में दिक्कत ये है कि बार अध्यक्ष होने के साथ-साथ वे राजनीतिक दल के नेता भी हैं। अगर कभी बार अध्यक्ष होने के नाते निष्पक्ष हो कर वकीलों की पैरवी करते हैं तो कांग्रेस से बुरे बन जाते हैं और अपनी कांग्रेसी छवि बचाने की कोशिश करते हैं तो अन्य विचारधारा के वकीलों के निशाने पर आ जाते हैं।
आपको याद होगा कि एक बार जब शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता ने वकीलों के बारे में कुछ आपत्तिजनक टिप्पणी की तो टंडन को बार अध्यक्ष होने के नाते उनसे भिडऩा पड़ा, जिसका नतीजा ये हुआ कि उनकी फोकट में ही रलावता से टशल हो गई। रलावता के शागिर्दों ने टंडन को कड़ा जवाब देने की कोशिश की। इसी प्रकार बार अध्यक्ष के नाते शहर के हित में उर्स की बदइंतजामियों पर उग्र रुख अपनाया तो कांग्रेसियों ने उनके कपड़े फाडऩा शुरू कर दिया। उन्होंने एक दिन का उपवास किया तो उस पर प्रदेश कांग्रेस के महासचिव सुशील शर्मा ने यह कह विवाद किया कि टंडन को व्यक्तिगत रूप से आंदोलन करने का अधिकार है, लेकिन पार्टी के पूर्व सचिव की हैसियत से इस तरह के आंदोलन का अधिकार नहीं है। शर्मा ने टंडन के इस उपवास को सस्ती लोकप्रियता करार दिया। कुल मिला कर टंडन पर कांग्रेसी होने के बावजूद कांग्रेस सरकार को घेरने का आरोप झेलना पड़ा।
वैसे भी उनका मौजूदा कार्यकाल कुछ कमजोर साबित होता जा रहा है। अध्यक्ष भले ही वे हैं, मगर एंटी लॉबी के सचिव उनसे कहीं अधिक पावरफुल प्रतीत होते हैं। पावरफुल न भी हों, तो भी वे उन्हें चैक तो करते ही हैं। इसी के चलते एक बार प्रशासन से समझौता वार्ता करने के बाद विरोध का सामना करना पड़ा। अब वे समझौतावादी रुख रख कर ही अध्यक्ष पद को निभा रहे हैं।
-तेजवानी गिरधर