रविवार, 14 अप्रैल 2013

रावत समाज पैदा करेगा भाजपा के लिए सिरदर्द


हालांकि विधानसभा चुनाव में पुष्कर समेत प्रदेश के विभिन्न रावत बाहुल्य क्षेत्रों में रावत समाज के उम्मीदवार को कांग्रेस व भाजपा द्वारा टिकट नहीं दिए जाने पर समाज की ओर से तीसरे मोर्चे का समर्थन करने का ऐलान किया गया है, मगर लगता है कि भाजपा के लिए एक बड़ा सिरदर्द पैदा होने जा रहा है। इसकी वजह ये है कि रावत समाज का झुकाव भाजपा की ओर अधिक रहता है और स्वाभाविक रूप से भाजपा में ही रावत समाज के दावेदार अधिक हैं। ज्ञातव्य है कि हाल ही बूढ़ा पुष्कर में मत्स्य जयंती पर आयोजित समारोह में राजस्थान रावत महासभा नवयुवक मंडल ने साफ चेताया है कि रावत समाज चुनाव में चुप बैठने वाला नहीं है। मंडल के प्रदेशाध्यक्ष एडवोकेट अशोक सिंह रावत गोवलिया ने युवाओं में राजनीतिक चेतना व शक्ति प्रदर्शन की जरूरत बताई। इस मौके पर मंडल के प्रदेश महामंत्री सुरेशसिंह मोहमी, प्रदेश संयोजक एडवोकेट महेन्द्र सिंह कानस, महासभा के प्रदेश मंत्री व जिला परिषद सदस्य राजेंद्र सिंह रावत, फूलसिंह, सेवा सिंह, शक्ति सिंह, ओमप्रकाश रावत, उप जिला प्रमुख ताराचंद रावत आदि ने एकजुटता दिखाई। इससे पहले पिछले दिनों भी पुष्कर स्थित रावत समाज के मंदिर में रावत महासभा राजस्थान की आमसभा में प्रदेश के 15 रावत बाहुल्य विधानसभा क्षेत्रों से टिकट की दावेदारी का फैसला किया गया था। रावत नेताओं के रुख से यह साफ है कि वे ब्यावर सहित पुष्कर में भी समाज के किसी व्यक्ति को टिकट देने पर अड़ेंगे।
उल्लेखनीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में ब्यावर से टिकट मिलने के बावजूद ज्यादा टिकटों की मांग कर रहे रावतों ने भाजपा को बड़ा झटका दिया था। रावतों की बगावत के कारण भाजपा को पुष्कर, नसीराबाद और मसूदा सीट से हाथ धोना पड़ा था। पुष्कर में भाजपा के बागी श्रवण सिंह रावत के मैदान में आ डटने के कारण भाजपा के भंवर सिंह पलाड़ा को हार का सामना करना पड़ा। मसूदा में ग्यारसीलाल रावत के निर्दलीय रूप में मैदान में उतरने के कारण भाजपा के नवीन शर्मा हार गए थे। नसीराबाद में रावत समाज के शक्तिसिंह की वजह से प्रो. सांवरलाल जाट हार गए। स्पष्ट है कि पिछले चुनाव में जो झटका रावत समाज ने दिया, उसी के प्लेटफार्म पर खड़े हो कर अब फिर दावेदारी की हुंकार भरी जा रही है। समाज अजमेर जिले में कम से कम दो सीटों पर तो कब्जा करना चाहेगा ही। ऐसे में पहले से कब्जे वाली ब्यावर सीट पर टिकट की प्रबल दावेदारी तो होगी ही, पुष्कर पर भी वे दमदार तरीके से दावा करेंगे।
-तेजवानी गिरधर

पलाड़ा ने जो सोचा, जो कहा, वही कर दिखाया

पति भंवर सिंह पलाडा के साथ जिला प्रमुख श्रीमती पलाडा

याद कीजिए उन दिनों को जब युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा ने राजनीति में कदम रखा तो एक ही मूल मंत्र का उद्घोष किया था कि वे राजनीति में राजनीति करने नहीं बल्कि जनता की सेवा करने आए हैं, तो सहसा किसी को यकीन नहीं हुआ। हर कोई कहता था कि कहने ओर करने में बहुत फर्क होता है। भला कोई समाज सेवा के लिए भी राजनीति में आ सकता है। मगर आज जबकि उनकी ही वास्तविक देखरेख में, उनकी धर्म पत्नी जिला प्रमुख श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के नेतृत्व में काम कर रही अजमेर जिला परिषद को पंचायतीराज की योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने पर केंद्र सरकार ने पुरस्कृत करने के लिए चयन किया है, उनकी सोच और कार्यप्रणाली पर वास्तविक धरातल पर ठप्पा लग गया है। ज्ञातव्य है कि आधिकारिक रूप से जिला प्रमुख सुशील कंवर पलाड़ा की पहल पर आयोजित जिला परिषद आपके द्वार कार्यक्रम का पहले मुख्यमंत्री ने तारीफ कर इसे प्रदेश में किया लागू किया था। और अब बेहतरीन कार्य के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों उन्हें पुरस्कृत किया जाना है।
इस सिलसिले में दैनिक भास्कर के सिटी चीफ सुरेश कासलीवाल के न्यूज आइटम में लिखी पंक्तियों पर जरा गौर कीजिए कि राजघरानों से राजनीतिक क्षेत्र में महिलाएं पहले भी आती रही हैं और अपनी शक्ति का लोहा मनवाती रही है, लेकिन निहायत घरेलू माहौल से घर की देहलीज लांघकर पहली बार राजनीति के मैदान में उतरी जिला प्रमुख सुशील कंवर पलाड़ा ने अपनी प्रबल इच्छा शक्ति व उर्वरक प्रतिभा के बल पर वह काम कर दिखाया, जिसे करने में कई नेताओं को बरस लग जाते हैं। यह तथ्य औपचारिक रूप से तो सही ही है, मगर इसमें कोई दोराय नहीं होगी कि उनकी सफलता में अहम भूमिका उनके पति की ही है। बेशक श्रीमती पलाड़ा भी पूरे समर्पण के साथ काम कर रही हैं, उनकी सोच भी पलाड़ा की ही तरह गरीबों की सेवा करने की है, मगर उनकी असली ताकत तो पलाड़ा ही हैं।
यहां सर्वाधिक उल्लेखनीय बात ये है कि केन्द्र व राज्य में कांग्रेस की सरकार है, जबकि अजमेर जिला परिषद पर भाजपा बोर्ड का कब्जा है। समझा जा सकता है कि पुरस्कार के काबिल बनने में पलाड़ा दंपति को किन कठिन रास्तों से गुजरना पड़ा होगा। असल में वे चाहते तो ये थे कि जिला परिषद आपके द्वार कार्यक्रम में सभी विभागों के अधिकारियों को ब्लॉक स्तर पर जनता के बीच ले जाया जाए, मगर ऐसा तकनीकी कारणों और राज्य में कांग्रेस की सरकार होने के चलते संभव हो नहीं पाया। इस पर उन्होंने पंचायतीराज विभाग को सौंपे गए 5 विभागों के सहयोग से ही शिविर लगाना आरंभ किया। और जब उसके अनुकूल परिणाम आने लगे तो कांग्रेस के मंत्रियों तक को उनकी सफलता की सराहना करनी पड़ी।
आइये, जरा जानें कि पलाड़ा किस पृष्ठभूमि से उठ कर आज इस मुकाम पर आए हैं।
नागौर जिले के पलाड़ा गांव में श्री पीरू सिंह राठौड़ के घर 25 जून 1970 को जन्मे पलाड़ा ने स्नातक स्तर तक शिक्षा अर्जित की है और उनका मौलिक व्यवसाय रॉयल्टी का है। समाजसेवा की भावना से उन्होंने प्रिंट व इलैक्ट्रोनिक मीडिया के क्षेत्र में कदम रखा है और अजमेर में सांध्य दैनिक सरे-राह समाचार पत्र और सरे-राह न्यूज चैनल का सफलतापूर्वक संचालन कर रहे हैं। राजपूत समाज में भी उन्होंने समाजसेवा के जरिए विशेष स्थान बनाया है। वे अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा, अजमेर के संभाग प्रभारी, राजपूत सामूहिक विवाह समिति, पुष्कर के संरक्षक, मेजर शैतानसिंह राजपूत छात्रावास व शिक्षण संस्थान, अजमेर के मुख्य संरक्षक, श्री क्षत्रिय प्रतिभा विकास व शोध संस्थान, अजमेर के संरक्षक सदस्य, राजपूत एकता मंच के सरंक्षक और राजपूत स्टूडेन्ट यूथ ऑर्गेनाइजेशन, राजस्थान के प्रधान संरक्षक हैं। आध्यात्मिक विचारों से ओतप्रोत पलाड़ा सक्रिय राजनीति में तो पिछले करीब दस साल से सक्रिय हुए हैं, लेकिन सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में तन, मन, धन से सेवा कार्यों में वे पहले से ही जुटे हुए हैं।
एक बार उन्होंने जब राष्ट्र रक्षा संकल्प रैली निकाली और अकेले उनके दम पर ही जब भारी भीड़ उमड़ी तो सभी दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो गए थे। उनकी संगठन शक्ति को देख कर स्थानीय भाजपा नेता भी समझ गए थे कि इस आंधी को रोका नहीं जा सकेगा। स्थानीय भाजपा नेताओं को बड़ी तकलीफ होती थी कि यह शख्स आगे आया तो उनका वजूद खतरे में पड़ जाएगा। वे तो चाहते ही नहीं थे कि उन्हें टिकट मिले, मगर पार्टी के बड़े नेता जानते थे कि इस युवा नेता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा।
असल में उनका राजनीतिक कद 2003 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में तीस हजार वोट हासिल करने के कारण बना। उन्हीं की वजह से भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार रमजान खान हार गए थे। पिछली हार से सबक लेते हुए भाजपा उन्हें 2008 में पुष्कर से अपना प्रत्याशी बनाया, मगर एक बागी के खड़े हो जाने के कारण उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। राजनीतिक लिहाज से यह एक बड़ा झटका था, मगर उन्होंने हार नहीं मानी। जिला परिषद के चुनाव में उनकी पत्नी श्रीमती सुशील कंवर मैदान में उतरीं।  वे भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में जिला परिषद के वार्ड एक से कांग्रेस की लक्ष्मी कंवर को 3500 वोटों से पराजित कर जिला परिषद सदस्य निर्वाचित हुई। इसी प्रकार जिला प्रमुख पद पर कांग्रेस की श्रीमती कीर्ति चौधरी को 9 मतों से पराजित किया। इसके बाद पलाड़ा दंपति ने अपना पूरा ध्यान जिले के विकास पर लगा दिया। श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा जिला परिषद का काम बखूबी संचालित कर रही हैं, उन्हें उनके पति भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा का सहयोग मिल रहा है, जिससे उन्होंने अनेक उपलब्धियां अर्जित की हैं। उन उपलब्धियों का ही परिणाम है कि आज उनका नाम राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरने जा रहा है। आज पलाड़ा अजमेर जिले में के राजनीति क्षेत्र में एक ऐसा उभरता हुआ युवा चेहरा है, जिससे सभी को काफी उम्मीदें हैं।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

क्या नाजिम और दरगाह कमेटी की गैर माजूदगी में ही होगा उर्स?


एक ओर सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में हुए बम विस्फोट के बाद यह अति अति संवेदनशील धर्मस्थलों में शुमार है, दूसरी ओर हालत ये है कि आगामी 7 मई से ख्वाजा साहब का उर्स शुरू होने जा रहा है, मगर अजमेर में न तो नाजिम की नियुक्ति हो पाई है और न ही दरगाह कमेटी का गठन किया गया है। यह संभवत: पहला मौका है, जबकि दरगाह के अंदरूनी इंतजामात के लिए बनी दरगाह कमेटी का सात माह से पुनर्गठन नहीं हुआ है और कमेटी के पदेन सचिव नाजिम का पद खाली पड़ा हुआ है। यह केन्द्र सरकार की घोर लापरवाही की इंतहा है। ऐसे में जाहिर है इस क्षेत्र के लोगों में गुस्सा होना लाजिमी है। वह फूट भी पड़ा और नेशनल यूथ कौमी एकता कमेटी के अध्यक्ष उस्मान घडिय़ाली के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने दरगाह गेस्ट हाउस के सामने मंत्री के. रहमान का पुतला फूंक दिया।
यहां ज्ञातव्य है कि दरगाह कमेटी भारत सरकार के अधीन एक संवैधानिक संस्था है, जिसका गठन संसद द्वारा पारित दरगाह ख्वाजा साहब अधिनियम 1955 के तहत किया जाता है और राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग इसके सदस्य नियुक्त किए जाते हैं। इस कमेटी का कार्यकाल पिछली 24 जुलाई को समाप्त हो गया, मगर नए सदस्यों की नियुक्ति अब तक अटकी हुई है। उल्लेखनीय है कि कमेटी सदस्यों का मनोनयन केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलात मंत्री सलमान खुर्शीद को करना था। मगर केंद्र सरकार के कोयला ब्लॉक घोटाला प्रकरण में उलझे होने के कारण मामला लंबित पड़ा रहा। इसके बाद खुर्शीद विदेश मंत्री बना दिए गए, जब कि उनकी जगह मंत्रालय का जिम्मा के. रहमान को दिया गया, मगर उन्होंने भी इस बाबत कोई रुचि नहीं ली। इतना ही नहीं दरगाह कमेटी का प्रशासनिक इंतजाम करने वाले नाजिम का पद भी फरवरी 2011 से रिक्त है। तत्कालीन नाजिम अहमद रजा के बाद कुछ समय के लिए अब्दुल मजीद खान इस पद पर रहे, लेकिन उनके रिटायरमेंट के बाद से कोई नाजिम नहीं आया। वर्तमान में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलात मंत्रालय में उपसचिव मोहम्मद अफजल को ही अतिरिक्त चार्ज नाजिम का दिया हुआ है, जो कि दिल्ली में रहते हैं। मंत्रालय ने नाजिम पद के लिए एक बार पूरी भर्ती प्रक्रिया कर ली थी। नाजिम के पद पर सैन्य अफसर राशिद अब्बास अंसारी की नियुक्ति हो चुकी थी, लेकिन वे ज्वाइन करने ही नहीं पहुंचे। इस पद दूसरी बार प्रक्रिया शुरू की गई, उसका भी परिणाम नहीं आया।
स्वाभाविक सी बात है कि दरगाह कमेटी व नाजिम के अभाव में दरगाह विकास के कार्य अटके हुए हैं। जायरीन की सुविधा के लिए किए जाने वाले विभिन्न कार्य भी अधूरे पड़े हैं। दरगाह कमेटी के अमले को समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है। छोटे-छोटे से बिल को पास कराने के लिए कमेटी के प्रतिनिधि को दिल्ली जाना पड़ता है। इन सबसे ज्यादा गंभीर बात ये है कि उर्स सामने है, मगर दरगाह के अंदरूनी इंतजामात को अमली जामा पहनाने वाली संस्था और उसके प्रतिनिधि की नियुक्ति ही नहीं हो पाई है। इससे साबित होता है कि अति संवेदनशील मानी जाने वाली दरगाह के प्रति सरकार गंभीर नहीं है। उसकी लापरवाही का ही सबूत है कि दरगाह क्षेत्र विकास के लिए तीस सौ करोड़ की योजना बनी मगर, उसे गाय खा गई। अब जब कि लोगों में सरकार के प्रति गुस्सा फूट पड़ा है, देखते हैं कि क्या सरकार कानों पर जूं रेंगती है या नहीं।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

अकबर के किले से ही ईस्ट इंडिया कंपनी को मिली भारत में व्यापार की अनुमति


राजकीय संग्रहालय अर्थात अकबर के किले में प्रारंभ लाइट और साउंड शो के मौके पर आइये जानें इस किले के बारे में कि इसका इतिहास कितना गौरवशाली है।
अजमेर शहर के केन्द्र में नया बाजार के पास स्थित इस किले का निर्माण अकबर ने 1571 से 1574 ईस्वी में राजपूतों से होने वाले युद्धों का संचालन करने और ख्वाजा साहब के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए करवाया था। अकबर ने यहां से समस्त दक्षिणी पूर्वी व पश्चिमी राजस्थान को अपने अधिकार में कर लिया था। जहांगीर ने भी 1613 से 1616 के दौरान यहीं से कई सैन्य अभियानों का संचालन किया। इसे राजपूताना संग्रहालय और मैगजीन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें चार बड़े बुर्ज और 54 फीट व 52 फीट चौड़े दरवाजे हैं। यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल भारतीय राजनीति में अहम स्थान रखता है, क्योंकि यहीं पर सम्राट जहांगीर ने दस जनवरी 1916 ईस्वी को इंग्लेंड के राजा जॉर्ज पंचम के दूत सर टामस रो को ईस्ट इंडिया कंपनी को हिंदुस्तान में व्यापार करने की अनुमति दी थी। टामस रो यहां कई दिन जहांगीर के साथ रहा। ब्रिटिश काल में 1818 से 1863 तक इसका उपयोग शस्त्रागार के रूप में हुआ, इसी कारण इसका नाम मैगजीन पड़ गया। वर्तमान में यह संग्रहालय है। पूर्वजों की सांस्कृतिक धरोहर का सहज ज्ञान जनसाधारण को कराने और संपदा की सुरक्षा करने की दृष्टि से भारतीय पुरातत्व के महानिदेशक श्री मार्शल ने 1902 में लार्ड कर्जन के अजमेर आगमन के समय एक ऐसे संग्रहालय की स्थापना का सुझाव रखा था, जहां जनसाधारण को अपने अतीत की झांकी मिल सके। अजमेर के गौरवमय अतीत को ध्यान में रखते हुये लार्ड कर्जन ने संग्रहालय की स्थापना करके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन एजेन्ट श्री कालविन के अनुरोध पर कई राज्यों के राजाओं ने बहुमूल्य कलाकृतियां उपलब्ध करा संग्रहालय की स्थापना में अपना अपूर्व योग दिया। संग्रहालय की स्थापना 19 अक्टूबर, 1908 को एक शानदार समारोह के साथ हुई। संग्रहालय का उद्घाटन ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन एजेन्ट श्री कालविन ने किया और उस समारोह में विभिन्न राज्यों के राजाओं के अतिरिक्त अनेकों विदेशी भी सम्मिलित हुये। पुरातत्व के मूर्धन्य विद्वान पं. गौरी शंकर हीराचन्द ओझा को संग्रहालय के अधीक्षक पद का भार सौंपा गया और ओझा जी ने अपनी निष्ठा का परिचय ऐसी बहुमूल्य कलाकृतियां एकत्रित कर दिया कि जिसके परिणामस्वरूप अजमेर का संग्रहालय दुर्लभ सामग्री उपलब्ध कराने की दृष्टि से देशभर में धाक जमाये हुए है। इसमें अनेक प्राचीन शिलालेख, राजपूत व मुगल शैली के चित्र, जैन मूर्तियां, सिक्के, दस्तावेज और प्राचीन युद्ध सामग्री मौजूद हैं। सन् 1892 में इसके दक्षिणी पूर्वी बुर्ज में नगरपालिका का दफ्तर खोला गया।
-तेजवानी गिरधर

दो साल पहले ही बन गया था लाइट एंड साउंड शो का ब्ल्यू प्रिंट


पर्यटन, कला-संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के संयुक्त तत्वावधान में अजमेर के अकबर किले में साउंड एंड लाइट शो का उद्घाटन शुक्रवार, 12 अप्रैल को किए जाने के मौके पर पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग,अजमेर वृत्त के अधीक्षक सैयद आजम हुसैन का वह आलेख प्रासंगिक है, जो जनवरी, 2011 में अजमेर इतिहास पर लिखित पुस्तक अजमेर एट ए ग्लांस में प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने साउंड एंड लाइट शो आरंभ करने बाबत जानकारी दी थी। प्रस्तुत है वह आलेख:-
लाइट एंड साउंड  होगा आकर्षण
-सैयद आजम हुसैन-
अजमेर में नया बाजार के पास स्थित अकबर के किले में स्थापित राजपूताना म्यूजियम आज स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा के केन्द्र के रूप में भी अपनी भूमिका निभा रहा है। बाहर से आने वाले जायरीन और पर्यटकों के अतिरिक्त इतिहास के शोधार्थी भी इसको देखने में विशेष रुचि रखते हैं। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का प्रयास है कि इस ऐतिहासिक स्थल को और अधिक आकर्षक बनाया जाए। संग्रहालय को देखने के लिए आने वाले दर्शक हमारी कला, संस्कृति, स्थापत्य, शिल्प तथा इतिहास को काल क्रमानुसार आत्मसात कर सकें, इसके लिए पुरा सामग्री को काल क्रमानुसार प्रदर्शित किया जा रहा है। प्रदर्शित की जाने वाली सामग्री के पेडस्टल, शोकेस, अलमीरा, परिचय-पट्ट आदि संग्रहालय विज्ञान के अनुसार तैयार किए जा रहे हैं।
चूंकि अकबर का किला अजमेर के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है, अत: पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का यह प्रयास है कि पर्यटकों को आकर्षित करने केलिए किले में शीघ्र ही लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से अकबरी किले में घटित प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं को दिखाया जायेगा। न केवल पर्यटकों अपितु शहरवासियों के लिए भी यह शो आकर्षण का केन्द्र होगा। शो के माध्यम से दर्शक जान सकेंगे कि हल्दी घाटी युद्ध (1576 ई.) के समय सम्राट अकबर द्वारा मुगल सेना को मेवाड़ की ओर अजमेर से ही रवाना किया था। ब्रिटिश प्रतिनिधि सर टामस रो ने जनवरी, 1616 ईस्वी में मुगल सम्राट जहांगीर से इसी किले में भेंट की थी। शाहजहां के दो शहजादों का जन्म भी इसी किले में हुआ था। इस लिहाज से यह स्थल इतिहास के नजरिये से काफी महत्वपूर्ण है। सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई विशेष राशि से अकबरी किले में जीर्णोद्धार व मरम्मत के कार्य प्रगति पर हैं। इन कार्यों के तहत किले की बायीं बुर्ज के मरम्मत कार्य करवाये जा रहे हैं। इस बुर्ज में संग्रहालय को जीवन्त व आकर्षक बनाने हेतु प्रदर्शनी व सेमीनार आदि का आयोजन किया जायेगा।
ज्ञातव्य है कि राजकीय संग्रहालय, अजमेर की स्थापना अकबरी किले में सन् 1908 ई. में राजपूताना म्यूजियम के नाम से हुई। यहां पुरातात्विक वस्तुओं यथा शिलालेख, प्रतिमाएं, अस्त्र-शस्त्र, लघु रंग चित्र व अन्य सामग्री संग्रहित है, जिन्हें विभिन्न प्रमुख दीर्घाओं में प्रदर्शित किया गया है।
म्यूजियम में में सिन्धु घाटी सभ्यता को प्रदर्शित करने के लिए अलग से कक्ष बनाया हुआ है। सन् 1920 ई. में प्रकाश में आयी सिन्ध सभ्यता के अवशेषों के नमूने यथा मोहरंे, मृद-भांड, आभूषण, मृद प्रतिमाएं व खिलौने आदि इस कक्ष में प्रदर्शित हैं, जिन्हें देख कर दर्शक दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाता है।
यह सर्वविदित है कि शिलालेख इतिहास लेखन में महत्वपूर्ण व विश्वसनीय स्रोत हैं। यहां स्थापित शिलालेख कक्ष में ग्राम बरली, अजमेर से प्राप्त शिलालेख दूसरी शताब्दी ईस्वी पूव समय का है। इसी कक्ष में ढ़ाई दिन का झोंपड़ा से प्राप्त महत्वपूर्ण शिलालेख भी दिग्दर्शित हैं। इसी प्रकार म्यूजियत के प्रतिमा कक्ष में 8-9 शताब्दी ईस्वी से 16-17वीं शताब्दी ईस्वी काल की प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। यहां प्रदर्शित प्रतिमाएं शैव, वैष्णव व जैन प्रतिमा शिल्प की उत्कृष्ठ कृतियां हैं, जो साबित करती हैं कि शिल्प कला में प्राचीन काल से हम कितने संपन्न रहे हैं।
राजस्थान की धरा शूर वीरों की धरा रही है। म्यूजियम के अस्त्र-शस्त्र कक्ष में मध्य काल में प्रयुक्त होने वाले अस्त्र-शस्त्र यथा भाले, तलवार, ढाल, कटार, जिरह-बख्तर, बन्दूकें आदि दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र हैं। रियासत काल में राजपूताना के राजा-महाराजाओं ने अन्य कलाओं के साथ-साथ चित्रकला को भी आश्रय प्रदान किया। राजाश्रय में बने चित्र तत्कालीन दरबारी व्यवस्था हमारी धार्मिक मान्यताओं तथा रीति रिवाजों का दर्पण है। यहां लघु रंग चित्र-कक्ष में प्रदर्शित मुल्ला दो प्याजा के कथानक पर आधारित लघु रंग चित्र मेवाड़ चित्र शैली के नायाब नमूने हैं।