मंगलवार, 11 जून 2013

भगत हटे नहीं कि शुरू हो गई जोड़-बाकी-गुणा-भाग

लैंड फोर लैंड के मामले में रिश्वतखोरी की साजिश के मामले में एडीबी की जांच अभी सिरे चढ़ी नहीं है, नगर सुधार न्यास के सदर नरेन शहाणी भगत का इस्तीफा अभी हुआ नहीं है कि अभी से उनके आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से कांग्रेस का दावेदार न होने पर शहर की राजनीति क्या होगी, इसका गणित शुरू हो गया है। एक ओर जहां भगत के धुर विरोधी और सिंधी समाज के अन्य दावेदारों के चेहरे खिले हुए हैं, वहीं गैर कांग्रेसी दावेदारों के मुंह में भी पानी आने लगा है। जाहिर सी बात है कि भाजपाई खेमे में भी संभावित राजनीतिक समीकरण के तहत माथापच्ची आरंभ हो गई है।
आइये, अपुन भी उस संभावित स्थिति पर एक नजर डाल लें, जिसमें भगत को इस्तीफा देना पड़ेगा व उनका दावा समाप्त सा हो जाएगा। यह बात सही है कि भगत ही अकेले सबसे दमदार दावेदार थे, इस कारण अगर कांग्रेस को पिछली हार से सबक लेते हुए किसी सिंधी को ही टिकट देने का फार्मूला बनाना पड़ा तो उसे बड़ी मशक्कत करनी होगी। फिर से कोई नानकराम खोजना होगा। वजह ये कि सिंधी समाज में एक अनार सौ बीमार की स्थिति हो जाने वाली है। डॉ. लाल थदानी, नरेश राघानी, हरीश हिंगोरानी, रमेश सेनानी, हरीश मोतियानी, राजकुमारी गुलबानी, रश्मि हिंगोरानी इत्यादि-इत्यादि की लंबी फेहरिश्त है। फिलहाल जयपुर रह रहे शशांक कोरानी, जो कि वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एम. डी. कोरानी के पुत्र हैं, वे भी मन कर सकते हैं। जो वर्षों तक टिकट मांगते-मांगते थक-हार कर बैठ गए, वे भी अब फिर से जाग जाएंगे। इतना ही नहीं संभव है, कुछ नए नवेले भी खादी का कुर्ता-पायजामा पहन कर लाइन में लग जाएं। रहा सवाल गैर सिंधियों का तो उनमें प्रमुख रूप से पुष्कर के पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व शहर कांग्रेस के अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता अब पहले से ज्यादा दमदार तरीके से दावा ठोकेंगे।
राजनीतिक ठल्लेबाजी करने वालों ने एक नए समीकरण का भी जोड़-बाकी-गुणा-भाग शुरू कर दिया है। वो ये कि बिखरी हुई कांग्रेस को नए सिरे से फोरमेट किया जाएगा। यानि कि ताश नए सिरे फैंटी जाएगी। भगत की जगह रलावता को दी जाएगी, रलावता की जगह पर जसराज जयपाल या डॉ. राजकुमार जयपाल को काबिज करवाया जाएगा और टिकट बड़ी आसानी से डॉ. बाहेती को दे दिया जाएगा। यानि की सब राजी। मगर उसमें समस्या ये आएगी कि सिंधी नेतृत्व का क्या किया जाए? क्या सिंधी मतदाताओं को एन ब्लॉक भाजपा की थाली में परोस दिया जाए? या फिर कोई और तोड़ निकाला जाए?
चलो, अब बात करें भाजपा की। मोटे तौर पर यही माना जाता है कि भाजपा कांग्रेस के पिछली बार की तरह गैर सिंधी के प्रयोग को करने का साहस शायद ही दिखाए, क्योंकि इससे उसकी दक्षिण की सीट भी खतरे में पड़ सकती है। यदि कांग्रेस ने भगत के अतिरिक्त किसी और सिंधी को टिकट दे दिया तो उसे भाजपा के संभावित सिंधी प्रत्याशी से कड़ी टक्कर लेनी होगी।  और कांग्रेस ने अगर गैर सिंधी उतरा तो संभव है पिछली बार ही तरह फिर सिंधी-वैश्यवाद सिर चढ़ कर बोले।
जो कुछ भी हो, भगत के खतरे में आते ही अजमेर में राजनीतिक चर्चाएं जोर पकडऩे लगी हैं।
-तेजवानी गिरधर

बाकोलिया अब बन गए हैं असली नेता

कल तक राजनीति के नौसीखिया कहलाने वाले अजमेर नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया असली नेता हो गए प्रतीत होते हैं। सब जानते हैं कि असली नेता वही होता है, जिसकी चमड़ी मोटी होती है, अर्थात छोटी-मोटी आलोचनाओं का तो उस पर असर ही नहीं होता। बाकोलिया पर भी अब असर होना बंद हो गया है। ऐसे में उन्हें असली नेता कहा जाना चाहिए।
आपको याद होगा कि पिछले दिनों जब कांग्रेस की संदेश यात्रा और भाजपा की सुराज संकल्प यात्रा के दौरान आपसी होड़ा-होड़ी में नेताओं ने  सारे कानून-कायदे ताक पर रख कर शहर भर को बैनर और होर्डिंगों से पाट दिया था तो अखबारों ने खूब शोर मचाया। मगर बाकोलिया के कान में जूं तक नहीं रेंगी। वे इस कान से सुर पर उस कान से निकालते रहे। बेशक अखबार वालों ने अपना जो फर्ज था, वह पूरी तरह से निभाया, उससे अधिक वे कर भी क्या सकते हैं, मगर यही जान कर वे कुछ कर नहीं सकते, केवल छाप ही सकते हैं, बाकोलिया ने भी कोई परवाह नहीं की। आखिर दोनों यात्राएं जब समाप्त हो गईं और नेताओं का मकसद पूरा हो गया, तब जा कर बैनर होर्डिंग्स हटाए गए।
असल में इस मामले में विल पॉवर की जरूरत होती है। वह बाकोलिया में कहीं नजर नहीं आई। आती भी कहां से? हुआ ये कि पहले कांग्रेस की संदेश यात्रा थी, इस कारण कांग्रेसी होने के नाते उन्हें कांग्रेसी नेताओं के होर्डिंग्स नजर ही नहीं आए। जानबूझ कर नजरअंदाज करना उनकी मजबूरी भी थी। भला अशोक गहलोत की फोटो वाले होर्डिंग्स हटा कर वे अपने हाईकमान की नाराजगी क्यों मोल लेते? इस कारण चुप बैठे रहे। अपुन ने तब भी ये बात लिखी थी।
इसके बाद जब भाजपा की सुराज संकल्प यात्रा आई तो भाजपा नेताओं ने भी कांग्रेस से भी ज्यादा होर्डिंग्स चस्पा कर दिए। वे जानते थे कि बाकोलिया उनके होर्डिंग्स हटाने की हिम्मत नहीं दिखा पाएंगे। वैसे भी वे कांग्रेसी पार्षदों की तुलना में भाजपाइयों से मिलजुल कर ज्यादा चलते हैं। इस पर भी अपनु ने साफ लिख दिया था कि सुराज संकल्प यात्रा के स्वागत के लिए शहर भर में लगाए हॉर्डिंग्स और बैनर पर मीडिया ने बड़ा हल्ला मचा रखा है, मगर नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया में इतनी हिम्मत कहां कि वे इन्हें हटा पाएं। हुआ भी वही। अखबार वाले चिल्लाते रहे, मगर बाकोलिया की पहले से चुकी हुई विल पॉवर नहीं जाग पाई। यहां तक निगम की सीईओ विनिता श्रीवास्तव ने महज औपचारिकता निभाते हुए होर्डिंग्स हटाने के कागजी आदेश जारी किए, मगर न उन पर अमल होना था और न हुआ।  अब जा कर जब कानून तोडऩे वाले नेताओं का मकसद पूरा हो गया है तो उन पर अमल हुआ है। ऐसे में बाकोलिया के इस कथन पर अफसोस ही होता है कि राजनेताओं को खुद शहर के हित को देखते हुए ख्याल रखना चाहिए। उन्होंने नसीहत दी कि नेताओं को खुद नियमों का ध्यान रखना चाहिए। यानि वे तो कम से कम नियमों की पालना के जो अधिकार मिले हुए हैं, जनता ने उन्हें चुन कर दिए हैं, उन्हें वे इस्तेमाल नहीं करेंगे। ऐसे में भला सारे नेता भी काहे को नियमों का ध्यान रखेंगे। यानि कि सब कुछ यूं ही चलता रहेगा। ऐसे में राजस्थानी कहावत याद आती है- रांडा रोवती रेई, पांवणा जीमता रेई।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 9 जून 2013

यानि कि पुष्कर सीट पर अड़ा रहेगा रावत समाज

हाल ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे के सुराज संकल्प यात्रा के दौरान पुष्कर पड़ाव के दौरान जिस प्रकार रावत समाज ने एक बार फिर पुष्कर विधानसभा सीट पर अपना दमदार दावा ठोका है, उससे लगता है कि समाज अब पीछे हटने वाला नहीं है। समाज ने जोर दे कर कहा है कि पुष्कर विधानसभा रावत बाहुल्य क्षेत्र है तथा चुनाव में प्रत्याशी की हार-जीत का फैसला रावत समाज ही तय करता है। दावेदार समुंद्र सिंह ने तो बाकायदा बायो-डाटा देते हुए टिकट की मांग की। उनके अतिरिक्त दावेदारी करने वालों में मुख्य रूप से भाजपा युवामोर्चा के प्रदेश मंत्री व श्रीनगर मंडल अध्यक्ष सुरेश सिंह रावत, एडवोकेट अशोक सिंह रावत, राजेंद्र सिंह रावत आदि भी शामिल हैं। अजमेर शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत भी एक दावेदार माने जाते हैं।
रावत समाज की इस दावेदारी के संदर्भ में आपको बता दें कि कुछ दिन पहले तो समाज की ओर से चेतावनी तक दी गई थी कि अगर कांग्रेस व भाजपा ने टिकट नहीं दी तो समाज तीसरे मोर्चे का समर्थन कर किया जाएगा। बूढ़ा पुष्कर में मत्स्य जयंती पर आयोजित समारोह में राजस्थान रावत महासभा नवयुवक मंडल के प्रदेशाध्यक्ष एडवोकेट अशोक सिंह रावत गोवलिया सहित मंडल के प्रदेश महामंत्री सुरेशसिंह मोहमी, प्रदेश संयोजक एडवोकेट महेन्द्र सिंह कानस, महासभा के प्रदेश मंत्री व जिला परिषद सदस्य राजेंद्र सिंह रावत, फूलसिंह, सेवा सिंह, शक्ति सिंह, ओमप्रकाश रावत, उप जिला प्रमुख ताराचंद रावत आदि ने इस बारे में एकजुटता दिखाई। ज्ञातव्य है कि इससे पहले भी पुष्कर स्थित रावत समाज के मंदिर में रावत महासभा राजस्थान की आमसभा में प्रदेश के 15 रावत बाहुल्य विधानसभा क्षेत्रों से टिकट की दावेदारी का फैसला किया गया था। रावत नेताओं के रुख से यह साफ है कि वे ब्यावर सहित पुष्कर में भी समाज के किसी व्यक्ति को टिकट देने पर अड़ेंगे।
उल्लेखनीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में ब्यावर से टिकट मिलने के बावजूद ज्यादा टिकटों की मांग कर रहे रावतों ने भाजपा को बड़ा झटका दिया था। रावतों की बगावत के कारण भाजपा को पुष्कर, नसीराबाद और मसूदा सीट से हाथ धोना पड़ा था। पुष्कर में भाजपा के बागी श्रवण सिंह रावत के मैदान में आ डटने के कारण भाजपा के भंवर सिंह पलाड़ा को हार का सामना करना पड़ा। मसूदा में ग्यारसीलाल रावत के निर्दलीय रूप में मैदान में उतरने के कारण भाजपा के नवीन शर्मा हार गए थे। नसीराबाद में रावत समाज के शक्तिसिंह की वजह से प्रो. सांवरलाल जाट हार गए। स्पष्ट है कि पिछले चुनाव में जो झटका रावत समाज ने दिया, उसी के प्लेटफार्म पर खड़े हो कर अब फिर दावेदारी की हुंकार भरी जा रही है। समाज अजमेर जिले में कम से कम दो सीटों पर तो कब्जा करना चाहेगा ही। ऐसे में पहले से कब्जे वाली ब्यावर सीट पर टिकट की प्रबल दावेदारी तो होगी ही, पुष्कर पर भी वे दमदार तरीके से दावा करेंगे।
-तेजवानी गिरधर

न्यास सचिव पुष्पा सत्यानी पहले ही भांप गई थीं?

लैंड फॉर लैंड के मामले में प्लॉट और रुपए मांगने के मामले में नगर सुधार न्यास की जिन पूर्व सचिव श्रीमती पुष्पा सत्यानी के लिए भी एक प्लॉट मांगने का टेलीफोनिक वार्ता में जिक्र एसीबी की जांच में आ रहा है, वे वहीं हैं, जो चंद माह में ही अजमेर से रुखसत हो गई थीं। तब इस पर आश्चर्य भी जताया गया था।
अपुन ने तो इस बारे में पहले ही लिख दिया था। असल में उन्हें न्यास सदर नरेन शहाणी भगत अपनी सुविधा के लिए यहां ले कर आए थे। चंद माह में ही जब वे विवादित होने लगीं तो उनका तबादला हो गया। तब दो बातें उभरी थीं। एक ये कि क्या वे विवाद की वजह से हटाईं गईं और दूसरा ये कि खुद उन्होंने ही यहां से जाने की इच्छा जताई थी।
जहां तक विवाद का सवाल है, वे नियमन के एक मामले में भाजपा विधायक श्रीमती अनिता भदेल के निशाने पर आ गई थीं। उन्हें मजबूरी में नियमन रद्द करना पड़ा था। वस्तुत: श्रीमती भदेल ने भगवान गंज स्थित 2421 वर्ग गज जमीन का मामला उठाया था। मामला ये था कि जयपुर के रामनगर, सोडाला निवासी मीरा छतवानी ने भगवान गंज स्थित खसरा संख्या 5237 की 2421 वर्ग जमीन का नियमन करने के लिए आवेदन किया था। यूआईटी ने 18 जुलाई को आवेदन मंजूर कर नियमन आदेश जारी कर दिए। यहां तक कि नियमन राशि जमा कर पट्टा भी जारी कर दिया गया और सब रजिस्ट्रार के यहां से रजिस्टर्ड हो गया। इस पर विधायक श्रीमती अनिता भदेल ने इस नियमन में भारी अनियमितता बताते हुए यूआईटी पर भू माफियाओं को उपकृत करने का आरोप लगाया। इस पर न्यास सदर नरेन शहानी भगत ने तुरंत जांच के आदेश दिए और स्वयं सचिव श्रीमती सत्यानी को ही नियमन रद्द करने के आदेश जारी करने पड़े। इस मामले में न्यास की बड़ी भारी फजीहत हुई। इस प्रकरण के साथ ही पुष्पा सत्यानी संदेह के घेरे में आ गई हैं और आशंका व्यक्त की जा रही थी कि अगर वे यहीं जमी रहीं तो भगत के कार्यकाल का सत्यानाश कर देंगी। ऐसे में सरकार ने उन्हें यहां से हटाना ही बेहतर समझा।
प्रकरण का दूसरा पहलु ये है कि असल में वे भांप गई थीं कि अजमेर नगर सुधार न्यास में काम करना बहुत कठिन है। कार्यभार संभाले दो-तीन माह ही हुए थे कि मीडिया की तीखी नजर के चलते परेशान हो गईं। उन्होंने कहना शुरू कर दिया था कि अजमेर में तो काम करना संभव ही नहीं है। यहां के लोग कुछ करने ही नहीं देना चाहते। केवल हर काम में घोचा करते हैं।
आपको याद होगा कि मीडिया के दबाव की वजह से ही स्वायत्त शासन विभाग व नगरीय विकास विकास विभाग के प्रमुख शासन सचिव जी. एस. संधु ने श्रीमती पुष्पा सत्यानी को नसीहत दी कि वे आवासीय योजनाओं में मकानों के व्यावसायिक भू उपयोग परिवर्तन नहीं करें। नतीजतन कमाई का एक जरिया बंद हो गया। इसी प्रकार पत्रकार संजय माथुर की रिपोर्ट पर भाजपा विधायक श्रीमती अनिता भदेल ने अफोर्डेबल स्कीम के तहत आवास बनाने की योजना में की जा रही नियमों की अनदेखी का मसला सरकार के सामने उठाया और उसे बंद करने के आदेश हो गए। इसमें भी अच्छी खासी आमदमी होने की उम्मीद थी, जिस पर पानी फिर गया।
बहरहाल, पुष्पा सत्यानी के जल्द यहां से रुखसत होने की जो भी वजह हो, मगर इतना तो तय सा लगता है कि वे यहां के हालात को अच्छी तरह से भांप गई थीं। अब ये संयोग ही है कि उनके जाने के बाद ही न्यास में चल रहे गोरखधंधे का भांडा फूटा है, जिसमें जिक्र आ रहा है कि उन्हें भी एक प्लाट दिया जाना था।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 7 जून 2013

आखिर आ ही गए भगत लपेटे में

जिस बात की अपुन ने अरसे पहले ही आशंका जता दी थी, आखिर वह सच साबित हो ही गई। भले ही सीधे तौर पर नहीं, कथित दलाल मनोज गिदवानी के जरिए ही अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष नरेन शहाणी भगत एसीबी के लपेटे में आ ही गए। भले ही एसीबी की कार्यवाही लीक होने से कथित दलाल मनोज गिदवानी को रंगे हाथों गिरफ्तार नहीं किया जा सका, मगर एसीबी के पास मौजूद रिकार्ड से इस बात की तो पुष्टि होती ही है कि लेन-देन का तानाबान तो बुना ही गया था, वरना एसीबी हवा में ही गिदवानी के घर पर छापा मारने नहीं पहुंच गई।
आपको याद होगा कि अपुन ने नरेन शहाणी भगत के न्यास अध्यक्ष पद पर काबिज होते ही इस बात की आशंका जताई थी कि उनकी नियुक्ति से तकलीफ पाए अन्य दावेदार उन्हें फंसाने का कोई मौका नहीं चूकेंगे, भाजपा के निशाने पर तो रहेंगे ही। ऐसे में उन्हें इस काजल की कोठरी में बड़ी सावधान से काम करना होगा। अपुन ने यह भी आशंका जता दी थी कि भगत राजनीतिक रूप से चतुर नहीं हैं, जबकि न्यास के अधिकारी बेहद घाघ, ऐसे में वे उन्हें कभी भी फंसवा सकते हैं।
होली के मौके पर ठिठोली के बहाने भी अपुन ने इशारा कर दिया था कि वे एसीबी की निगरानी में हैं। उनका मोबाइल फोन लंबे अरसे से सर्विलांस पर था। अजमेर के पुलिस टाइगर तक को गिरफ्त में लेने वाली एसीबी ताजा कार्यवाही में भले ही चूक गई, मगर एसीबी के डीएसपी भीम सिंह बीका का कहना है कि उनके पास परिवादी अजमत की नरेन शाहनी, निशु अग्निहोत्री, साहिबराम जोशी और एक अन्य प्रापर्टी डीलर महेश अग्रवाल के साथ रिश्वत राशि के लेनदेन को लेकर लंबी बातचीत के रिकार्ड हैं।
बीका ने बताया कि 28 जनवरी 2012 को चौरसियावास निवासी अजमत खान ने मामले में शिकायत दी थी। अजमत ने बताया था कि माकड़वाली रोड पर उसकी पुश्तैनी 20 बीघा जमीन राज्य सरकार ने अवाप्त कर ली थी। जमीन के बदले जमीन के लिए उसने नगर सुधार न्यास को आवेदन किया था। इस मामले में वह शाहनी से मिला। उन्होंने जमीन आवंटित करने के एवज में चार प्लॉट व 20 लाख रुपए की मांग की और उसे प्रॉपर्टी डीलर मनोज गिदवानी से इस बारे में संपर्क करने को कहा था। इसके बाद उसने कार्यवाहक सचिव निशु अग्निहोत्री, उप नगर नियोजक साहिब राम जोशी से भी संपर्क किया। सभी प्लाट और रुपए की डिमांड कर रहे थे। अग्निहोत्री ने एक लाख रुपए की मांग की थी, इसमें से 35 हजार रुपए वह दो दिन पहले उन्हें दे चुका है। तीन महीने पहले राज्य सरकार की एम्पॉवर्ड कमेटी में उसे 4800 वर्ग गज जमीन का आवंटन किया गया, जबकि 5200 वर्ग गज जमीन का आवंटन किया जाना था। शाहनी ने कार्यवाहक सचिव निशु अग्निहोत्री और गिदवानी से मिलने को कहा। बातचीत में दो प्लॉट और 12 लाख रुपए में सौदा तय हुआ था। जांच अधिकारी बीका ने बताया कि 28 जनवरी 2012 से मामले की जांच के दौरान संबंधित लोगों के टेलीफोन ट्रेस किए गए। एसीबी से चूक हो गई कि उसने मामले के एक आरोपी न्यास के उप नगर नियोजक साहिब राम जोशी को स्वतंत्र गवाह बनाने का फैसला किया, वही उलटा पड़ गया।
बहरहाल अब भले ही भगत यह तर्क दें कि चुनावी वर्ष के दौरान राजनीतिक द्वेष के चलते उन्हें बदनाम करने की साजिश रची गई है, मगर  पूर्व न्यास अध्यक्ष धर्मेश जैन ने न्यास में चल रहे गोरखधंधे का जो आरोप दो दिन पहले लगाया था, वह तो पुष्ट हुआ ही है। ऐसे में उन सहित भाजपा के अन्य नेताओं को भगत से इस्तीफा लेने की मांग का मौका मिल गया है।
-तेजवानी गिरधर