गुरुवार, 13 जून 2013

भगत के मामले में भाजपा की चुप्पी के मायने?

लैंड फोर लैंड के मामले में रिश्वतखोरी की साजिश के मामले में एडीबी की जांच अभी लंबित है, मगर पहले ही दिन इस मामले में नगर सुधार न्यास के सदर नरेन शहाणी भगत से इस्तीफा मांगने वाली भाजपा की अब कायम चुप्पी पर हर किसी को अचरज हो रहा है। लोगों का मानना है कि भाजपा ने इस प्रकरण में महज औपचारिकता निभाई है, इसे भुनाने की कोशिश नहीं की। हालांकि सच ये भी है कि अगर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भगत को हटाना ही होगा तो वे गुण-दोष, लाभ-हानि को देख कर ही कार्यवाही करवाएंगे, भाजपा के कहने से तो हटाने से रहे।
असल में भले ही एसीबी के अधिकारी भले ही ये कहें कि उसके पास साजिश के पर्याप्त सबूत हैं, मगर ट्रैप की कार्यवाही में विफल होने के बाद उसका मनोबल गिरा हुआ है। रही सही कसर जांच प्रक्रिया आगे बढऩे में हो रही देरी की वजह से पूरी हो गई और कई सवाल खड़े हो रहे हैं। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि सरकार मामले को लंबा खींच कर ठंडा करना चाहती है, इसी कारण ब्यूरो के महानिदेशक अजीत सिंह छुट्टी पर चले गए, ताकि इसका कोई तोड़ निकाला जा सके। कहने वाले यह कहने से भी नहीं चूक रहे कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भगत के खिलाफ कार्यवाही की हरी झंडी देकर चुनावी साल में सिंधी मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहते। यहां यह बताना प्रासंगिक ही होगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में नाराज हुए सिंधी मतदाताओं को राजी करने की खातिर ही भगत को न्यास अध्यक्ष बनाया गया था। अगर अब हटाया जाता है सिंधी मतदाता फिर नाराज हो सकते हैं, जिन्हें फिर कैसे राजी किया जाएगा, यह उनकी समझ से परे है।
खैर, बात भाजपा की। सरकार तो भले ही निहित हितों की वजह से ऐसा रवैया अपना सकती है, मगर भाजपा की चुप्पी दर्शाती है कि दाल में कुछ काला है। वरना भला कोई इतने हॉट कैक को यूं ही ठंडा क्यों होने देगा? जहां तक संगठनात्मक दृष्टि का सवाल है, शहर भाजपा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व प्रवक्ता अरविंद यादव पर चूंकि अखबारबाजी का जिम्मा है, इस कारण उन्होंने तुरंत विरोध जताते हुए विज्ञप्ति जारी कर दी, मगर इसमें पूरी पार्टी व अध्यक्ष रासासिंह रावत ने कोई खास रुचि ली हो, ऐसा कहीं से लगता नहीं है। इसकी एक प्रमुख वजह ये भी रही हो सकती है कि पिछले दिनों हुए नियमनों का लाभ भाजपा से जुड़े लोगों ने भी उठाए हैं। अगर वे ज्यादा हांगामा करते हैं तो गढ़े मुर्दे उखड़ सकते हैं। रहा सवाल अजमेर उत्तर के विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी का तो उन्होंने भी पहले दिन औपचारिक रूप से लंबी विज्ञप्ति जारी कर दी। समझा जाता है कि वे सीधे भगत पर हमला बोल कर अजमेर उत्तर के सिंधी मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहते। कहने की जरूरत नहीं है कि भगत की सिंधी समाज के खासी प्रतिष्ठा है और अगर उन पर व्यक्तिगत हमला अधिक होता है तो इसका खामियाजा देवनानी को चुनाव में उठाना पड़ सकता है, अगर पार्टी उन्हें अपना प्रत्याशी बनाती है तो। न्यास के मामलों में बढ़-चढ़ कर हमले बोलने वाली अजमेर दक्षिण की विधायक श्रीमती अनिता भदेल की चुप्पी के पीछे भी यही वजह समझ में आती है। अगर उन्हें पार्टी फिर प्रत्याशी बनाती है तो जीतने के लिए सिंधी वोटों की जरूरत होगी और उन्हें वे भगत पर व्यक्तिगत हमला कर नहीं खोना चाहेंगी। इस मामले में सर्वाधिक रुचि लेने वाले न्यास के पूर्व सदर और वरिष्ठ भाजपा नेता धर्मेश जैन ने भी पहले दिन दमदार तरीके से इस्तीफे की मांग की, क्योंकि चंद दिन पहले ही उन्होंने न्यास में व्याप्त भ्रष्टाचार पर संवाददाता सम्मेलन बुलाया था और बिना सबूत के ही भगत पर आरोपों की अतिरंजना की थी। हालांकि बाद में जब एसीबी की कार्यवाही हुई तो उनके आरोपों को संबल मिला। मगर बाद में वे भी चुप हो गए। उनकी चुप्पी की वजह समझ में नहीं आती। ये खबर लिखे जाने पर प्रतिष्ठा की खातिर मुंह खोलें तो बात अलग है।
चलते-चलते आपको ये भी बता दें कि चर्चा ये भी है कि एसीबी के पास मौजूद रिकार्डिंग में चंद पत्रकारों की आवाज भी है, भले ही वे इस मामले में न हो। चूंकि भगत का मोबाइल सतत सर्विलांस पर था, इस कारण बीट रिपोर्टर्स की आवाज तो होनी ही है, मगर बताते हैं कि नियमन के कुछ मामलों में भी उनकी आवाज रिकार्डिंग पर आ गई है। कुछ नेताओं व अफसरों की आवाजें भी होनी संभावित हैं, क्योंकि काम तो उनसे संबंधित लोगों के भी हुए ही हैं। यह बात दीगर है कि एसीबी को मतलब केवल ताजा मामले से है, ऐसे में वह इन आवाजों को कांट-छांट कर अलग कर देगी। वे तभी काम आएंगी, अगर ताजा प्रकरण के अतिरिक्त अन्य मामलों की भी जांच की जरूरत महसूस की जाती है।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, 11 जून 2013

सचिन से परहेज, पिताश्री स्व. राजेश पायलट के गुणगान?

सबको पता है कि किसी जमाने में जसराज जयपाल व ललित भाटी खेमे में बंटी रहने वाली अजमेर शहर कांग्रेस अब यहां के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट के पक्ष और विपक्ष में बंटी हुई है। जहां शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता, निगम मेयर कमल बाकोलिया व न्यास अध्यक्ष नरेन शहाणी भगत को सचिन के खेमे में गिना जाता है तो वहीं पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल व डॉ. श्रीगोपाल बाहेती सहित मनोनीत पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा, पूर्व शहर उपाध्यक्ष डॉ. सुरेश गर्ग आदि विरोधी खेमे में। इस विरोधी खेमे ने विभिन्न जयंतियों व पुण्यतिथियों पर आम कांग्रेसजन के बैनर पर आयोजन भी शुरू कर दिए हैं। अर्थात लगभग समानांतर कांग्रेस चल रही है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री व किसान नेता स्वर्गीय राजेश पायलट की पुण्यतिथी पर भी ऐसा ही हुआ। शहर कांग्रेस ने अलग श्रद्धांजलि सभा की तो आम कांग्रेसजन से अलग से संगोष्ठी। यहां यह बताना प्रासंगिक ही होगा कि स्वर्गीय राजेश पायलट कांग्रेस के दिग्गज नेता थे, मगर अजमेर के कांग्रेसियों ने सचिन के यहां से सांसद बनने के बाद ही उनकी जयंती व पुण्यतिथी मनाना शुरू किया है।
खैर, आम कांग्रेसजन के कार्यक्रम ने सभी को चौंका दिया। भले ही इसके नेता यह कह कि स्व. राजेश पायलट कांग्रेस के बड़े नेता थे, इस कारण उन्होंने पुण्यतिथी मनाई, अपना बचाव करें, मगर हैं तो वे सचिन के पिताश्री ही। यानि कि सचिन से परहेज और उनके पिताश्री का गुणगान। अगर उनमेें राजेश पायलट के प्रति इतनी ही श्रद्धा थी तो शहर कांग्रेस की ओर से आयोजित कार्यक्रम में शरीक क्यों नहीं हुए? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसा करके वे ये जताना चाहते हैं कि उन्हें असल में सचिन नहीं, बल्कि उनके शागिर्द शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता से परेशानी है। यानि कि वे अब भी सचिन के साथ आने को तैयार हो सकते हैं, बशर्ते वे रलावता को दूर कर दें। यह कार्यक्रम इस बात का भी संकेत है कि कहीं न कहीं कथित रूप से विरोधी नेता भी सचिन से नजदीक हासिल करना चाहते हैं।
आखिर में ये बताते चलें कि आम कांग्रेसजन के कार्यक्रम में वे ही नेता शामिल हुए, जो कि शहर कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं। यथा पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल, मनोनीत पार्षद गुलाम मुस्तफा, डॉ. सुरेश गर्ग, श्रीमती तरा मीणा, इन्टक अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह शेखावत, प्रकाश गदिया, छात्र नेता सुनील लारा, विजय यादव, यासिर चिश्ती, शक्तिप्रताप सिंह, दीपक पराशर, लोकेश शर्मा, रूपसिंह नायक, अजीत सिंह छाबड़ा, काजी अनवर अली, रमेश सेनानी, फखरे मोइन आदि।
डॉ. सुरेश गर्ग ने तो बाकायदा फेसबुक पर भी स्व. राजेश पायलट को श्रद्धांजलि दी है।
-तेजवानी गिरधर

भगत हटे नहीं कि शुरू हो गई जोड़-बाकी-गुणा-भाग

लैंड फोर लैंड के मामले में रिश्वतखोरी की साजिश के मामले में एडीबी की जांच अभी सिरे चढ़ी नहीं है, नगर सुधार न्यास के सदर नरेन शहाणी भगत का इस्तीफा अभी हुआ नहीं है कि अभी से उनके आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से कांग्रेस का दावेदार न होने पर शहर की राजनीति क्या होगी, इसका गणित शुरू हो गया है। एक ओर जहां भगत के धुर विरोधी और सिंधी समाज के अन्य दावेदारों के चेहरे खिले हुए हैं, वहीं गैर कांग्रेसी दावेदारों के मुंह में भी पानी आने लगा है। जाहिर सी बात है कि भाजपाई खेमे में भी संभावित राजनीतिक समीकरण के तहत माथापच्ची आरंभ हो गई है।
आइये, अपुन भी उस संभावित स्थिति पर एक नजर डाल लें, जिसमें भगत को इस्तीफा देना पड़ेगा व उनका दावा समाप्त सा हो जाएगा। यह बात सही है कि भगत ही अकेले सबसे दमदार दावेदार थे, इस कारण अगर कांग्रेस को पिछली हार से सबक लेते हुए किसी सिंधी को ही टिकट देने का फार्मूला बनाना पड़ा तो उसे बड़ी मशक्कत करनी होगी। फिर से कोई नानकराम खोजना होगा। वजह ये कि सिंधी समाज में एक अनार सौ बीमार की स्थिति हो जाने वाली है। डॉ. लाल थदानी, नरेश राघानी, हरीश हिंगोरानी, रमेश सेनानी, हरीश मोतियानी, राजकुमारी गुलबानी, रश्मि हिंगोरानी इत्यादि-इत्यादि की लंबी फेहरिश्त है। फिलहाल जयपुर रह रहे शशांक कोरानी, जो कि वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एम. डी. कोरानी के पुत्र हैं, वे भी मन कर सकते हैं। जो वर्षों तक टिकट मांगते-मांगते थक-हार कर बैठ गए, वे भी अब फिर से जाग जाएंगे। इतना ही नहीं संभव है, कुछ नए नवेले भी खादी का कुर्ता-पायजामा पहन कर लाइन में लग जाएं। रहा सवाल गैर सिंधियों का तो उनमें प्रमुख रूप से पुष्कर के पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व शहर कांग्रेस के अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता अब पहले से ज्यादा दमदार तरीके से दावा ठोकेंगे।
राजनीतिक ठल्लेबाजी करने वालों ने एक नए समीकरण का भी जोड़-बाकी-गुणा-भाग शुरू कर दिया है। वो ये कि बिखरी हुई कांग्रेस को नए सिरे से फोरमेट किया जाएगा। यानि कि ताश नए सिरे फैंटी जाएगी। भगत की जगह रलावता को दी जाएगी, रलावता की जगह पर जसराज जयपाल या डॉ. राजकुमार जयपाल को काबिज करवाया जाएगा और टिकट बड़ी आसानी से डॉ. बाहेती को दे दिया जाएगा। यानि की सब राजी। मगर उसमें समस्या ये आएगी कि सिंधी नेतृत्व का क्या किया जाए? क्या सिंधी मतदाताओं को एन ब्लॉक भाजपा की थाली में परोस दिया जाए? या फिर कोई और तोड़ निकाला जाए?
चलो, अब बात करें भाजपा की। मोटे तौर पर यही माना जाता है कि भाजपा कांग्रेस के पिछली बार की तरह गैर सिंधी के प्रयोग को करने का साहस शायद ही दिखाए, क्योंकि इससे उसकी दक्षिण की सीट भी खतरे में पड़ सकती है। यदि कांग्रेस ने भगत के अतिरिक्त किसी और सिंधी को टिकट दे दिया तो उसे भाजपा के संभावित सिंधी प्रत्याशी से कड़ी टक्कर लेनी होगी।  और कांग्रेस ने अगर गैर सिंधी उतरा तो संभव है पिछली बार ही तरह फिर सिंधी-वैश्यवाद सिर चढ़ कर बोले।
जो कुछ भी हो, भगत के खतरे में आते ही अजमेर में राजनीतिक चर्चाएं जोर पकडऩे लगी हैं।
-तेजवानी गिरधर

बाकोलिया अब बन गए हैं असली नेता

कल तक राजनीति के नौसीखिया कहलाने वाले अजमेर नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया असली नेता हो गए प्रतीत होते हैं। सब जानते हैं कि असली नेता वही होता है, जिसकी चमड़ी मोटी होती है, अर्थात छोटी-मोटी आलोचनाओं का तो उस पर असर ही नहीं होता। बाकोलिया पर भी अब असर होना बंद हो गया है। ऐसे में उन्हें असली नेता कहा जाना चाहिए।
आपको याद होगा कि पिछले दिनों जब कांग्रेस की संदेश यात्रा और भाजपा की सुराज संकल्प यात्रा के दौरान आपसी होड़ा-होड़ी में नेताओं ने  सारे कानून-कायदे ताक पर रख कर शहर भर को बैनर और होर्डिंगों से पाट दिया था तो अखबारों ने खूब शोर मचाया। मगर बाकोलिया के कान में जूं तक नहीं रेंगी। वे इस कान से सुर पर उस कान से निकालते रहे। बेशक अखबार वालों ने अपना जो फर्ज था, वह पूरी तरह से निभाया, उससे अधिक वे कर भी क्या सकते हैं, मगर यही जान कर वे कुछ कर नहीं सकते, केवल छाप ही सकते हैं, बाकोलिया ने भी कोई परवाह नहीं की। आखिर दोनों यात्राएं जब समाप्त हो गईं और नेताओं का मकसद पूरा हो गया, तब जा कर बैनर होर्डिंग्स हटाए गए।
असल में इस मामले में विल पॉवर की जरूरत होती है। वह बाकोलिया में कहीं नजर नहीं आई। आती भी कहां से? हुआ ये कि पहले कांग्रेस की संदेश यात्रा थी, इस कारण कांग्रेसी होने के नाते उन्हें कांग्रेसी नेताओं के होर्डिंग्स नजर ही नहीं आए। जानबूझ कर नजरअंदाज करना उनकी मजबूरी भी थी। भला अशोक गहलोत की फोटो वाले होर्डिंग्स हटा कर वे अपने हाईकमान की नाराजगी क्यों मोल लेते? इस कारण चुप बैठे रहे। अपुन ने तब भी ये बात लिखी थी।
इसके बाद जब भाजपा की सुराज संकल्प यात्रा आई तो भाजपा नेताओं ने भी कांग्रेस से भी ज्यादा होर्डिंग्स चस्पा कर दिए। वे जानते थे कि बाकोलिया उनके होर्डिंग्स हटाने की हिम्मत नहीं दिखा पाएंगे। वैसे भी वे कांग्रेसी पार्षदों की तुलना में भाजपाइयों से मिलजुल कर ज्यादा चलते हैं। इस पर भी अपनु ने साफ लिख दिया था कि सुराज संकल्प यात्रा के स्वागत के लिए शहर भर में लगाए हॉर्डिंग्स और बैनर पर मीडिया ने बड़ा हल्ला मचा रखा है, मगर नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया में इतनी हिम्मत कहां कि वे इन्हें हटा पाएं। हुआ भी वही। अखबार वाले चिल्लाते रहे, मगर बाकोलिया की पहले से चुकी हुई विल पॉवर नहीं जाग पाई। यहां तक निगम की सीईओ विनिता श्रीवास्तव ने महज औपचारिकता निभाते हुए होर्डिंग्स हटाने के कागजी आदेश जारी किए, मगर न उन पर अमल होना था और न हुआ।  अब जा कर जब कानून तोडऩे वाले नेताओं का मकसद पूरा हो गया है तो उन पर अमल हुआ है। ऐसे में बाकोलिया के इस कथन पर अफसोस ही होता है कि राजनेताओं को खुद शहर के हित को देखते हुए ख्याल रखना चाहिए। उन्होंने नसीहत दी कि नेताओं को खुद नियमों का ध्यान रखना चाहिए। यानि वे तो कम से कम नियमों की पालना के जो अधिकार मिले हुए हैं, जनता ने उन्हें चुन कर दिए हैं, उन्हें वे इस्तेमाल नहीं करेंगे। ऐसे में भला सारे नेता भी काहे को नियमों का ध्यान रखेंगे। यानि कि सब कुछ यूं ही चलता रहेगा। ऐसे में राजस्थानी कहावत याद आती है- रांडा रोवती रेई, पांवणा जीमता रेई।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 9 जून 2013

यानि कि पुष्कर सीट पर अड़ा रहेगा रावत समाज

हाल ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे के सुराज संकल्प यात्रा के दौरान पुष्कर पड़ाव के दौरान जिस प्रकार रावत समाज ने एक बार फिर पुष्कर विधानसभा सीट पर अपना दमदार दावा ठोका है, उससे लगता है कि समाज अब पीछे हटने वाला नहीं है। समाज ने जोर दे कर कहा है कि पुष्कर विधानसभा रावत बाहुल्य क्षेत्र है तथा चुनाव में प्रत्याशी की हार-जीत का फैसला रावत समाज ही तय करता है। दावेदार समुंद्र सिंह ने तो बाकायदा बायो-डाटा देते हुए टिकट की मांग की। उनके अतिरिक्त दावेदारी करने वालों में मुख्य रूप से भाजपा युवामोर्चा के प्रदेश मंत्री व श्रीनगर मंडल अध्यक्ष सुरेश सिंह रावत, एडवोकेट अशोक सिंह रावत, राजेंद्र सिंह रावत आदि भी शामिल हैं। अजमेर शहर भाजपा अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत भी एक दावेदार माने जाते हैं।
रावत समाज की इस दावेदारी के संदर्भ में आपको बता दें कि कुछ दिन पहले तो समाज की ओर से चेतावनी तक दी गई थी कि अगर कांग्रेस व भाजपा ने टिकट नहीं दी तो समाज तीसरे मोर्चे का समर्थन कर किया जाएगा। बूढ़ा पुष्कर में मत्स्य जयंती पर आयोजित समारोह में राजस्थान रावत महासभा नवयुवक मंडल के प्रदेशाध्यक्ष एडवोकेट अशोक सिंह रावत गोवलिया सहित मंडल के प्रदेश महामंत्री सुरेशसिंह मोहमी, प्रदेश संयोजक एडवोकेट महेन्द्र सिंह कानस, महासभा के प्रदेश मंत्री व जिला परिषद सदस्य राजेंद्र सिंह रावत, फूलसिंह, सेवा सिंह, शक्ति सिंह, ओमप्रकाश रावत, उप जिला प्रमुख ताराचंद रावत आदि ने इस बारे में एकजुटता दिखाई। ज्ञातव्य है कि इससे पहले भी पुष्कर स्थित रावत समाज के मंदिर में रावत महासभा राजस्थान की आमसभा में प्रदेश के 15 रावत बाहुल्य विधानसभा क्षेत्रों से टिकट की दावेदारी का फैसला किया गया था। रावत नेताओं के रुख से यह साफ है कि वे ब्यावर सहित पुष्कर में भी समाज के किसी व्यक्ति को टिकट देने पर अड़ेंगे।
उल्लेखनीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में ब्यावर से टिकट मिलने के बावजूद ज्यादा टिकटों की मांग कर रहे रावतों ने भाजपा को बड़ा झटका दिया था। रावतों की बगावत के कारण भाजपा को पुष्कर, नसीराबाद और मसूदा सीट से हाथ धोना पड़ा था। पुष्कर में भाजपा के बागी श्रवण सिंह रावत के मैदान में आ डटने के कारण भाजपा के भंवर सिंह पलाड़ा को हार का सामना करना पड़ा। मसूदा में ग्यारसीलाल रावत के निर्दलीय रूप में मैदान में उतरने के कारण भाजपा के नवीन शर्मा हार गए थे। नसीराबाद में रावत समाज के शक्तिसिंह की वजह से प्रो. सांवरलाल जाट हार गए। स्पष्ट है कि पिछले चुनाव में जो झटका रावत समाज ने दिया, उसी के प्लेटफार्म पर खड़े हो कर अब फिर दावेदारी की हुंकार भरी जा रही है। समाज अजमेर जिले में कम से कम दो सीटों पर तो कब्जा करना चाहेगा ही। ऐसे में पहले से कब्जे वाली ब्यावर सीट पर टिकट की प्रबल दावेदारी तो होगी ही, पुष्कर पर भी वे दमदार तरीके से दावा करेंगे।
-तेजवानी गिरधर