मंगलवार, 23 जुलाई 2013

जाट लॉबी के दम पर सचिन से भिड़े चौधरी

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और प्रदेश प्रभारी गुरुदास कामत की मौजूदगी में अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट से जिस प्रकार एक बार फिर अजमेर डेयरी अध्यक्ष व पूर्व देहात जिला कांग्रेस अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी भिड़े, उससे साफ दिखता है कि उनको जाट लॉबी की पूरी शह है। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि जाटों का पूर्व विधानसभा अध्यक्ष परसराम मदेरणा लॉबी का तबका पूर्व जलदाय मंत्री महिपाल मदेरणा के भंवरी प्रकरण में फंसने के कारण खफा है। इस वजह से कांग्रेस इन दिनों कुछ दबाव में है। चौधरी भी उसी लॉबी से हैं।
असल में परिसीमन के बाद अजमेर संसदीय क्षेत्र जाट बहुल हो गया है। माना जाता है कि अब यहां दो लाख से ज्यादा जाट मतदाता हैं। परिसीमन से पूर्व जब यहां सवा से डेढ़ लाख जाट वोट थे, तब भी जाट यहां दावेदारी करते थे। विशेष रूप से भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय श्री रामनिवास मिर्धा का नाम चर्चा में आता था। कांग्रेस ने एक बार जाट नेता जगदीप धनखड़ को भी चुनाव मैदान में उतारा था, मगर वे रावतों की बहुलता व उनका मतदान प्रतिशत अधिक होने के अतिरिक्त अपनी कुछ गलतियों की वजह से हार गए। उल्लेखनीय है कि पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत के सामने बदल-बदल कर खेले गए जातीय कार्डों में सबसे बेहतर स्थिति धनखड़ की रही थी। रावत के सामने 1989 में सवा लाख गुर्जरों के दम उतरे बाबा गोविंद सिंह गुर्जर 1 लाख 8 हजार 89 वोटों से, सन् 1991 में डेढ़ लाख जाटों के दम पर उतरे जगदीप धनखड़ 25 हजार 343 वोटों से और सन् 1996 में एक लाख सिंधी मतदाताओं के मद्देनजर उतरे किशन मोटवानी 38 हजार 132 वोटों से पराजित हुए। सन् 1998 के मध्यावधि चुनाव में सोनिया गांधी लहर पर सवार हो कर सियासी शतरंज की नौसिखिया खिलाड़ी प्रभा ठाकुर ने रासासिंह को लगातार चौथी बार लोकसभा  में जाने रोक दिया था, हालांकि इस जीत का अंतर सिर्फ 5 हजार 772 मतों का रहा, लेकिन 1999 में आए बदलाव के साथ रासासिंह ने प्रभा ठाकुर को 87 हजार 674 मतों से पछाड़ कर बदला चुका दिया। इसके बाद 2004 में रासासिंह ने कांग्रेस के बाहरी प्रत्याशी हाजी हबीबुर्रहमान को 1 लाख 27 हजार 976 मतों के भारी अंतर से कुचल दिया। ये आंकड़े इशारा करते हैं कि तुलनात्मक रूप से जाट प्रत्याशी बेहतर रहा। अब जबकि परिसीमन के बाद जाटों की संख्या दो लाख को पार कर गई है, उनका दावा और मजबूत माना जाता है। इस सिलसिले में पिछले चुनाव में भी मांग उठी थी, मगर अपने प्रभाव के कारण करीब सवा लाख गुर्जर मतदाताओं के दम पर सचिन पायलट टिकट लेकर आ गए। इस बार लोकसभा चुनाव से एक साल पहले ही रामचंद्र चौधरी सचिन के खिलाफ झंडा बुलंद करने में लग गए हैं और स्थानीय की मांग पर अड़े हुए हैं। वैसे समझा जाता है कि उनकी रुचि लोकसभा चुनाव से अधिक विधानसभा चुनाव में है। पिछली बार वे मसूदा में निर्दलीय ब्रह्मदेव कुमावत की वजह से हार गए थे। इस बार फिर मसूदा से टिकट मांग रहे हैं। इसके लिए संसदीय क्षेत्र में जाटों की पर्याप्त तादाद को आधार बना कर दबाव डाल रहे हैं। कामत के सामने तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर उन्हें टिकट नहीं दिया गया तो वे लोकसभा चुनाव में सचिन के खिलाफ मैदान में उतर जाएंगे। अर्थात सीधे तौर पर बार्गेनिंग पर उतर आए हैं।
यहां यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि जाटों की बहुतलता के आधार पर भाजपा भी इस बार किसी जाट प्रत्याशी को मैदान में उतारने पर विचार कर रही है। भाजपा को यह समझ पिछले चुनाव में भी थी, मगर उसने भी बाहरी प्रत्याशी श्रीमती किरण माहेश्वरी का प्रयोग किया। पिछली बार तत्कालीन जलदाय मंत्री प्रो. सांवरलाल दावेदार के रूप में माने जाते थे। ऐसा लगता है कि उनकी रुचि लोकसभा चुनाव में नहीं है। इस बार कुछ जाट दावेदारों ने  टिकट के लिए मशक्कत शुरू कर दी है।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, 22 जुलाई 2013

सैयद आजम हुसैन : इतिहास के सहेजते-सहेजते वे स्वर्णिम इतिहास हो गए

अजमेर के राजकीय संग्रहालय के अधीक्षक सैयद आजम हुसैन का असमय निधन होने पर पूरा अजमेर सन्न रह गया। बेशक, उनसे पूर्व के अधीक्षकों ने भी संग्रहालय की भलीभांति देखभाल की, मगर सैयद आजम हुसैन ने जो कार्य किए, उनका विशेष उल्लेख अजमेर के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। उन्होंने अपने कार्यकाल में न केवल संग्रहालय में अनेकानेक आयोजन कर इसे लोकप्रिय किया, अपितु लाइट एंड साउंड शो जैसी बहुप्रतीक्षित योजना को भी मूर्त रूप प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। अजमेर के स्थापना दिवस पर आयोजन की शुरुआत भी उनके ही खाते में दर्ज की जाएगी। इसके अतिरिक्त तारागढ़ के जीर्णोद्धार में भी उन्होंने विशेष रुचि ली। चंद शब्दों में कहें तो उन्होंने अकबर के किले को नया जीवन प्रदान किया। ऐसे ऊर्जावान अधिकारी से अजमेर को और भी उम्मीदें थीं, मगर काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया। और अजमेर के प्रति विशेष दर्द को अपने दिल में लिए ही वे हमसे विदा हो गए।
उनकी सोच से परिचित करवाने के लिए यहां उनका वह आलेख प्रकाशित किया जा रहा है, जो कि अजमेर एट ए ग्लांस पुस्तक में प्रकाशित हो चुका है। लाइट एंड साउंड शो उनका एक सपना था, जो कि उन्होंने साकार किया, उसका भी इसमें जिक्र है:-
-सैयद आजम हुसैन-
अजमेर में नया बाजार के पास स्थित अकबर के किले में स्थापित राजपूताना म्यूजियम आज स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा के केन्द्र के रूप में भी अपनी भूमिका निभा रहा है। बाहर से आने वाले जायरीन और पर्यटकों के अतिरिक्त इतिहास के शोधार्थी भी इसको देखने में विशेष रुचि रखते हैं। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का प्रयास है कि इस ऐतिहासिक स्थल को और अधिक आकर्षक बनाया जाए। संग्रहालय को देखने के लिए आने वाले दर्शक हमारी कला, संस्कृति, स्थापत्य, शिल्प तथा इतिहास को काल क्रमानुसार आत्मसात कर सकें, इसके लिए पुरा सामग्री को काल क्रमानुसार प्रदर्शित किया जा रहा है। प्रदर्शित की जाने वाली सामग्री के पेडस्टल, शोकेस, अलमीरा, परिचय-पट्ट आदि संग्रहालय विज्ञान के अनुसार तैयार किए जा रहे हैं।
चूंकि अकबर का किला अजमेर के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है, अत: पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का यह प्रयास है कि पर्यटकों को आकर्षित करने केलिए किले में शीघ्र ही लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से अकबरी किले में घटित प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं को दिखाया जायेगा। न केवल पर्यटकों अपितु शहरवासियों के लिए भी यह शो आकर्षण का केन्द्र होगा। शो के माध्यम से दर्शक जान सकेंगे कि हल्दी घाटी युद्ध (1576 ई.) के समय सम्राट अकबर द्वारा मुगल सेना को मेवाड़ की ओर अजमेर से ही रवाना किया था। ब्रिटिश प्रतिनिधि सर टामस रो ने जनवरी, 1616 ईस्वी में मुगल सम्राट जहांगीर से इसी किले में भेंट की थी। शाहजहां के दो शहजादों का जन्म भी इसी किले में हुआ था। इस लिहाज से यह स्थल इतिहास के नजरिये से काफी महत्वपूर्ण है। सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई विशेष राशि से अकबरी किले में जीर्णोद्धार व मरम्मत के कार्य प्रगति पर हैं। इन कार्यों के तहत किले की बायीं बुर्ज के मरम्मत कार्य करवाये जा रहे हैं। इस बुर्ज में संग्रहालय को जीवन्त व आकर्षक बनाने हेतु प्रदर्शनी व सेमीनार आदि का आयोजन किया जायेगा।
ज्ञातव्य है कि राजकीय संग्रहालय, अजमेर की स्थापना अकबरी किले में सन् 1908 ई. में राजपूताना म्यूजियम के नाम से हुई। यहां पुरातात्विक वस्तुओं यथा शिलालेख, प्रतिमाएं, अस्त्र-शस्त्र, लघु रंग चित्र व अन्य सामग्री संग्रहित है, जिन्हें विभिन्न प्रमुख दीर्घाओं में प्रदर्शित किया गया है।
म्यूजियम में में सिन्धु घाटी सभ्यता को प्रदर्शित करने के लिए अलग से कक्ष बनाया हुआ है। सन् 1920 ई. में प्रकाश में आयी सिन्ध सभ्यता के अवशेषों के नमूने यथा मोहरंे, मृद-भांड, आभूषण, मृद प्रतिमाएं व खिलौने आदि इस कक्ष में प्रदर्शित हैं, जिन्हें देख कर दर्शक दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाता है।
यह सर्वविदित है कि शिलालेख इतिहास लेखन में महत्वपूर्ण व विश्वसनीय स्रोत हैं। यहां स्थापित शिलालेख कक्ष में ग्राम बरली, अजमेर से प्राप्त शिलालेख दूसरी शताब्दी ईस्वी पूव समय का है। इसी कक्ष में ढ़ाई दिन का झोंपड़ा से प्राप्त महत्वपूर्ण शिलालेख भी दिग्दर्शित हैं। इसी प्रकार म्यूजियत के प्रतिमा कक्ष में 8-9 शताब्दी ईस्वी से 16-17वीं शताब्दी ईस्वी काल की प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। यहां प्रदर्शित प्रतिमाएं शैव, वैष्णव व जैन प्रतिमा शिल्प की उत्कृष्ठ कृतियां हैं, जो साबित करती हैं कि शिल्प कला में प्राचीन काल से हम कितने संपन्न रहे हैं।
राजस्थान की धरा शूर वीरों की धरा रही है। म्यूजियम के अस्त्र-शस्त्र कक्ष में मध्य काल में प्रयुक्त होने वाले अस्त्र-शस्त्र यथा भाले, तलवार, ढाल, कटार, जिरह-बख्तर, बन्दूकें आदि दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र हैं। रियासत काल में राजपूताना के राजा-महाराजाओं ने अन्य कलाओं के साथ-साथ चित्रकला को भी आश्रय प्रदान किया। राजाश्रय में बने चित्र तत्कालीन दरबारी व्यवस्था हमारी धार्मिक मान्यताओं तथा रीति रिवाजों का दर्पण है। यहां लघु रंग चित्र-कक्ष में प्रदर्शित मुल्ला दो प्याजा के कथानक पर आधारित लघु रंग चित्र मेवाड़ चित्र शैली के नायाब नमूने हैं।
सरकारी नौकरी की औपचारिता की सीमाओं से बाहर निकल कर अजमेर के लिए कुछ कर गुजरने की उनकी उत्कट इच्छा को सलाम। आने वाले अधीक्षकों के लिए वे सदैव प्रेरणा के स्रोत रहेंगे।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

क्या रलावता की शह पर हुई बाकोलिया की आलोचना?

महेन्द्र सिंह रलावता
एक ओर विधानसभा चुनाव सिर पर हैं तो दूसरी ओर एकजुटता की बजाय शहर जिला कांग्रेस में सिर फुटव्वल चल रही है। शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता विरोधी लॉबी उन्हें अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट की नजर में गिराने की कोशिश कर रही है। या फिर ये भी हो सकता है कि वह पायलट को वास्तविकता से अवगत करना चाह रही है। इसका ताजा उदाहरण है आम कांग्रेसजन के नाम से मनोनीत पार्षद सैयद गुलाम मुस्तफा व शहर कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. सुरेश गर्ग की ओर से जारी वह बयान, जिसमें शहर जिला कांग्रेस की बैठक में प्रायोजित तरीके से महापौर कमल बाकोलिया की आलोचना करने की भत्सर्ना की गई है।
उनकी विज्ञप्ति से यह साफ जाहिर है कि वे यह कहना चाहते हैं कि बैठक में बाकोलिया की आलोचना रलावता की शह पर ही हुई। इस बात को स्थापित करने के लिए तर्क दिया गया है कि एक ओर तो समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों और कथित बयानबाजी की आड़ लेकर एक पार्षद और कच्ची बस्ती व व्यापारिक महासंघ के वरिष्ठ पदाधिकारी, अर्थात मोहन लाल शर्मा को निलम्बित किया जाता है तो दूसरी संगठन की बैठक में ही बाकोलिया की खिलाफत बर्दाश्त की जाती है, यानि कि यह सब प्रायोजित तरीके से हुआ।
बैठक में हुई इस घटना को भी रेखांकित किया गया है कि कभी तो एक लाइन का प्रस्ताव पारित कर जिले के सारे विधानसभा टिकट पायलट के जिम्मे सौंपे जाते हैं, दूसरी ओर मेयर की खिलाफत की आड़ में पायलट की खिलाफत भी कर रहे हैं। सवाल ये भी उठाया गया कि प्रस्ताव पारित करते वक्त किसी ने टिकट का जिम्मा देने के मामले में राहुल गांधी व अशोक गहलोत का नाम क्यों नहीं लिया गया। मुस्तफा व गर्ग ने इसका अर्थ ये निकाला है कि टिकट की चाह रखने वाले अध्यक्ष तथा अन्य लोग, अर्थात पूर्व उप मंत्री ललित भाटी पायलट के पक्ष में पारित प्रस्ताव से खिन्न हैं। इसका प्रमाण ये है कि एक ओर तो पायलट के प्रति पूर्ण समर्थत जाहिर करते हैं, दूसरी ओर पर्यवेक्षक के सामने अपने समर्थकों के साथ टिकट की दावेदारी भी करते हैं। यानि उनकी नजर में पायलट के बारे में पारित प्रस्ताव का कोई महत्व ही नहीं है।
मुस्तफा व गर्ग ने पार्टी की दयनीय स्थिति पर भी अफसोस जताया है। यह कह कर कि चुनाव को लेकर भाजपा पूरी तरह से सक्रिय है, दूसरी ओर कांग्रेस में कागजों में बूथ लेवल कमेटी मतदाता सूची पुननरीक्षण के बाद बनेगी, जिसका कोई औचित्य नहीं है।
कुल मिला कर इससे यह आभास हो रहा है कि शहर कांग्रेस में संगठन को लेकर कुछ न कुछ पक रहा है।
-तेजवानी गिरधर

चार माह में क्या जादू से करेंगे मगरे का विकास?

सोहन सिंह चौहान
राजस्थान मगरा विकास बोर्ड के नव नियुक्त अध्यक्ष सोहन सिंह चौहान ने अपनी नियुक्ति के बाद पहली बार ब्यावर पहुंचने पर ऐलान किया कि वे मगरा क्षेत्र के विकास में कोई कसर नहीं छोडेंग़े। वे खुद सरपंच व प्रधान के रहे हैं, ऐसे में वे खुद भी मगरा क्षेत्र से वाकिफ हैं। जल्द ही जनता से रूबरू होंगे और क्षेत्र की समस्याओं के लिए सरपंच व प्रधानों से भी मिलेंगे। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मिल कर समस्याओं का समाधान कराएंगे।  बेशक ऐसी सुहावनी बातें किसी भी नवनियुक्त जनप्रतिनिधि करनी ही चाहिए, करते ही हैं, मगर सवाल ये उठता है कि वे मौजूदा सरकार के शेष रहे चार माह में ऐसा क्या वे जादू से करेंगे? क्या जादूगरी में माहिर अशोक गहलोत से नियुक्ति पत्र के साथ कोई जादू भी सीख कर आए हैं? सच तो ये है कि किसी भी जनप्रतिनिधि को चार माह तो संबंधित लोगों से मिलने और समस्याओं को जानने और उनके निराकरण के लिए प्रस्ताव बनाने में ही लग जाता है। उसके बाद आती है बजट राशि की बात। समस्याओं के निवारण के लिए उतनी राशि भी तो होनी चाहिए। असल में यह तभी संभव होता है, जबकि समस्याओं का सतत निवारण किया जाए और समय-समय पर अपेक्षित बजट भी आवंटित किया जाए, जो कि अब इन चार माह में तो संभव नजर नहीं आता।
ज्ञातव्य है कि अरावली पर्वत शृंखला से जुड़ी 14 पंचायत समितियों के एक हजार गांवों के लोगों के उत्थान तथा विकास के मद्देनजर पिछली भाजपा सरकार ने इस बोर्ड का गठन किया था, जो कांग्रेस राज आने के बाद अस्तित्वविहीन हो गया। सरकार ने बोर्ड के लिए न तो किसी प्रकार का बजट आवंटित किया और न ही किसी को अध्यक्ष मनोनीत किया। मात्र वोटों की राजनीति के लिए गठित इस बोर्ड का ख्याल भी भाजपा राज में तब आया, जबकि सरकार के कार्यकाल में मात्र नौ माह शेष बचे थे। मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने 27 मार्च 2008 को मदन सिंह रावत को बोर्ड का पहला अध्यक्ष मनोनीत किया, मगर उसी साल दिसंबर में चुनाव के बाद भाजपा सरकार रुखसत हो गई। तब से पूरे साढ़े चार साल तक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बोर्ड के पुनर्गठन का ख्याल नहीं आया। इसी से साबित होता है कि सरकारें इस बोर्ड से होने वाले वास्तविक लाभ के प्रति कितनी गंभीर हैं। स्पष्ट है कि वोटों की खातिर वसुंधरा ने भी चुनावी साल में इसका गठन किया और अब गहलोत ने भी चुनाव नजदीक देख कर इसका पुनर्गठन कर दिया है।
जहां तक रावत के नौ माह के कार्यकाल का सवाल है, उनके वक्त विकास के लिए पांच करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया, जिससे पानी, बिजली, सड़क के साथ अन्य निर्माण काम भी इस बजट से कराए गए। हालांकि रावत ने मांग रखी थी कि बजट कम से कम बीस करोड़ रुपए का होना चाहिए।
बोर्ड के गठन की पृष्ठभूमि
वस्तुत: नरवर से दिवेर तक अरावली पर्वत शृंखला की तलहटी में पांच जिलों में फैले क्षेत्र में बहुसंख्या ऐसे लोगों की है, जिन्हें चौहान वंश का माना जाता है। इनमें प्रमुख रूप से रावत, चीता, मेहरात तथा काठात वर्ग के हैं। इनके अतिरिक्त भील, मीणा तथा गरासिया जातियां भी इस क्षेत्र में रहती हैं। माना जाता है कि इन जातियों के लोग आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं। क्षेत्र के उत्थान के लिए अंग्रेजी हुकूमत में भील, मीणा, गरासिया, रावत तथा मेहरात जाति के लोगों को आरक्षित जातियों की सूची में शामिल किया गया था। आजादी के बाद इनमें से रावत व मेहरात को हटा दिया गया, जबकि भील, मीणा तथा गरासिया जाति के लोग आज भी शामिल हैं। इन्हीं के विकास के लिए बोर्ड का गठन किया गया था।
बोर्ड के कार्यक्षेत्र में अजमेर, चित्तौडगढ़़, राजसमंद, पाली तथा भीलवाड़ा की 14 पंचायत समितियों को रखा गया। इनमें मसूदा के 137, जवाजा 193, निंबाहेड़ा के 32, आसींद के 65, रायपुर के 23(भीलवाड़ा), मांडल के 74, रायपुर के 41 (पाली), मारवाड़ जंक्शन के 41, भीम के 109, राजसमंद के 103, देवगढ़ के 131, आमेट के 136, कुंभलगढ़ के 161 तथा खमनोर पंचायत समिति के 132 गांव शामिल हैं। जब रावत अध्यक्ष थे तो उन्होंने अजमेर की श्रीनगर, पीसांगन तथा भिनाय पंचायत समितियों को भी शामिल करने के प्रस्ताव भेजा था, जो कि सरकार के जाने के साथ ठंडे बस्ते में चला गया।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

बोर्ड अध्यक्ष सच्चाई कह गए तो भाटी को बुरा लग गया

रेलवे बोर्ड अध्यक्ष अरुणेंद्र कुमार ने गत दिवस अजमेर दौरे के दौरान जैसे ही यह बयान दिया कि पुष्कर-मेड़ता तथा नसीराबाद-कोटा रेल लाइन की उपयोगिता नहीं पाई गई है और इन पर रेल लाइन बिछाने से कोई विशेष प्रभाव पडऩे वाला नहीं है, तो पूर्व उप मंत्री ललित भाटी को बुरा लग गया। उन्होंने बाकायदा बयान जारी कर कहा कि वे अजमेर से जुड़े रेलवे के मसलों पर सर्वोच्च सदन के निर्णय के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं।
बेशक उनकी इस प्रतिक्रिया में दम है कि रेल बजट की घोषणा क्या देश के सर्वोच्च सदन में बिना किसी ठोस आधार के की जा सकती है, मगर सवाल ये भी तो है न कि उस सर्वोच्च सदन भी तो आखिरकार उसी सरकारी तंत्र की रिपोर्ट पर ही घोषणाएं करता है, जो कि अब ये कह रहा है कि इन रेल लाइनों की उपयोगिता नहीं पाई गई है। संसद को खुद-ब-खुद सपना थोड़े ही आता है। इससे तो ऐसा संदेह होता है कि कहीं रेल बजट में जो घोषणा की गई, उसके पीछे कोरा राजनीतिक दबाव तो नहीं था। सबको पता है कि इन रेल लाइनों के लिए काफी अरसे से मांग की जा रही थी और फौरी तौर पर सर्वे भी हुआ। मगर घोषणा तभी हुई जब अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट ने विशेष प्रयास कर रेलवे बजट में उसे शामिल करवा दिया।
यह भी सर्वविदित तथ्य है कि कई बार राजनीतिक दबाव की वजह से नई योजनाएं लागू कर दी जाती हैं, भले ही उनकी उतनी उपयोगिता हो न हो। ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं। अजमेर-पुष्कर रेल लाइन का मसला ही लीजिए। भारी दबाव के चलते उसे चालू तो कर दिया गया, मगर धरातल पर उसकी उपयोगिता कितनी साबित हो पाई है, किसी से छिपी हुई नहीं है। ताजा मामले में भी ऐसा ही प्रतीत होता है। आम जनता व उसे सपने बेचने वाली नेता नगरी अपने नजरिये से पुष्कर-मेड़ता तथा नसीराबाद-कोटा रेल लाइन की उपयोगिता आंकती है, जबकि रेलवे के तकनीकी जानकारों के आंकने का तरीका कुछ और है। और यही वजह है कि इनकी बजट घोषणा तो हो गई, मगर आज रेलवे के सर्वोच्च अधिकारी ही कह रहे हैं कि इनकी उपयोगिता नहीं पाई गई है। उनकी बात में जरूर कोई दम होगा। यूं ही जुगाली तो नहीं कर गए होंगे। हां, इतना जरूर है कि सच कड़वा होता है, इस कारण भाटी सहित हर अजमेरवासी को बुरा लगा होगा, यह दीगर बात है कि अकेले भाटी ही बोले, बाकी नेताओं की तो जुबान तक नहीं खुली। इस लिहाज भाटी साधुवाद के पात्र हैं कि उन्होंने इतने गंभीर मसले पर प्रतिक्रिया तो जाहिर की।
रहा सवाल भाटी का सर्वोच्च सदन में की गई घोषणा को पत्थर की लकीर की तरह प्रस्तुत करने का तो यह भी सबको पता है कि ऐसी अनेक घोषणाएं होती हैं, जो बाद में पूरी ही नहीं होतीं। इसके प्रति संसद कितनी प्रतिबद्धता रखता है, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। विपक्ष चिल्लता ही रह जाता है और सत्तारूढ़ दल के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।
भाटी ने सलाह दी है कि बोर्ड अध्यक्ष कार्यवाहक हैं और उन्हें प्रचलित सामान्य व्यवहार के क्रम में ऐसे में निर्णय लेने तथा सार्वजनिक बयानबाजी से परहेज करना चाहिए। सलाह देने का अधिकार सभी को है, मगर बोर्ड अध्यक्ष ने तो वास्तविक तथ्य लोगों के सामने रखा है, कम से कम राजनेताओं की तरह सब्ज बाग तो नहीं दिखाए। इसके अतिरिक्त उनका बयान राजनीतिक बयानबाजी की श्रेणी में नहीं गिना जा सकता, जिससे परहेज की जाए। वे ऐसी जानकारी देने के लिए अधिकृत हैं, और इसके लिए उन्हें किसी की इजाजत लेने की जरूरत नहीं है।
भाटी ने एक बात बड़ी दिलचस्प और काम की कही है, वो यह कि बोर्ड अध्यक्ष ने ऐसा कर अजमेर के सांसद तथा केंद्रीय कंपनी मामलात के राज्यमंत्री सचिन पायलट को संदेह के घेरे मेें लाने का अनपेक्षित कार्य किया है। बात बिलकुल सही है। स्पष्ट है कि पायलट ने ही दोनों रेल लाइनों की घोषणा करवाई है और यदि रेलवे का सर्वोच्च अधिकारी अजमेर में आ कर यहीं पर इन घोषणाओं की धज्जियां उड़ता है तो पायलट पर संदेह होता है कि एक बार घोषणा करवाने के बाद शायद उन्होंने उसके क्रियान्वयन की ओर ध्यान नहीं दिया। खैर, अच्छी बात है कि बोर्ड अध्यक्ष आइना दिखा गए हैं, अब भाटी सहित सभी कांग्रेसी नेताओं को पायलट पर दबाव बनाना चाहिए कि बोर्ड अध्यक्ष आपकी फजीहत कर गए हैं और आप जनता के सामने झूठे पड़ रहे हैं, लिहाजा पीछे पड़ कर इस पर अमल करवाएं। विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे भाजपा नेताओं को भी पायलट को घेरना चाहिए कि उनके प्रयासों से घोषणाओं का यह हश्र कैसे हो रहा है?
-तेजवानी गिरधर