रविवार, 28 जुलाई 2013

बार अध्यक्ष टंडन की नौटंकी काम कर गई

भले ही अजमेर बार के अध्यक्ष राजेश टंडन की छवि ये बन गई हो कि वे फटे में टांग फंसाते हैं व कई बार कांग्रेस की मुख्य धारा से हट कर काम करते हैं, मगर बीते दिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की जनसुवाई में उनकी नौटंकी काम कर गई।
असल में प्रशासन ने सुरक्षा के लिहाज से जनसुवाई के दौरान वाहनों को सर्किट हाउस जाने से रोक दिया, नतीजतन विशिष्ट जन, बुजुर्गों और बीमार लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा। कई लोग तो बिना गुहार लगाए ही लौट गए। सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी थी कि सर्किट हाउस के नीचे ही सभी प्रशासनिक अधिकारी व नेताओं के वाहनों को रोक दिया गया। उन्हें पैदल ही चलकर सर्किट हाउस तक जाना पड़ा। यह स्थिति टंडन को नागवार गुजरी। वैसे भी उन्हें अपने आप को हाईलाइट करने के लिए मौके की तलाश रहती है, वह उन्हें सहज ही मिल गया। हांपते-हांपते जैसे ही ऊपर पहुंचे मुख्यमंत्री व कांग्रेस संगठन की नाराजगी की परवाह न करते हुए उन्होंने हंगामा कर दिया। अजमेर की कांग्रेस में अकेले वे ही हैं, जिनमें इतना माद्दा है। बाद में उन्होंने अव्यवस्था की शिकायत मुख्यमंत्री से भी की। इस पर मुख्यमंत्री ने आईजी, एसपी, अन्य अधिकारियों से इस बारे में चर्चा की। मुख्यमंत्री के निर्देश पर अजमेर प्रशासन ने तय किया कि मुख्यमंत्री या अन्य कोई मंत्री आदि अजमेर प्रवास के दौरान जन सुनवाई करने आते हैं तो वो सर्किट हाउस की बजाय सावित्री कॉलेज के सामने स्थित राजस्थान पर्यटन विभाग के होटल खादिम में होगी।
ज्ञातव्य है टंडन इससे पहले भी कई बार जनहित के मुद्दों पर मुख्य धारा से हट कर कोई न कोई कारनामा करते रहे हैं। एक बार उर्स के दौरान प्रशासन से टकराव को तो लोग वर्षों तक याद रखेंगे। जो कुछ भी हो, इस बार उनकी नौटंकी काम आ गई।
-तेजवानी गिरधर

डॉ. जयपाल ने दिखा दिया असल कांग्रेस कहां है

अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में पहली बार शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता को वह दिन देखना पड़ा, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। अब तक तो पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल व पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती की लॉबी ही आरोप लगाया करती थी कि रलावता एक गुट विशेष का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और कांग्रेस संगठन का सत्यानाश हो गया है, मगर अब तो मीडिया भी इसी सुर में बोलने लगा है। बीते दिवस मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की आजाद पार्क में हुई सभा का पूरा श्रेय मीडिया ने डॉ. राजकुमार जयपाल और पार्षदों को दे दिया गया। और साथ ही लिख दिया कि जो कांग्रेसी मुख्य धारा से अलग नजर आते थे, उन्होंने ही रलावता को आईना दिखा दिया और शहर कांग्रेस पूरी तरह से हाशिये पर चली गई।
असल में रलावता का पोदीना चौड़ा करने की पूरी पटकथा देहात प्रभारी व राजस्थान खाद बीज निगम के अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह राठौड़ ने लिखी।  रलावता ने समय कम होने का तर्क दिया तो राठौड़ ने इसे रूप में लिया कि कांग्रेस संगठन पर काबिज मौजूदा लोगों के भरोसे सभा में भीड़ नहीं जुटाई जा सकती, लिहाजा इनके विरोधियों को ही सारी जिम्मेदारी सौंप दी। बेशक यह एक षड्यंत्र के तहत हुआ, मगर इसको नाकाम करने में रलावता नाकाम हो गए, जबकि उन्हें एक दिन पहले ही इशारा मिल गया था कि उनकी फजीहत की तैयारी कर ली गई है। जहां तक षड्यंत्र का सवाल है, वह इस लिए जायज ठहराया जा सकता है, क्योंकि यह राजनीति है। जो गुट वर्षों तक कांग्रेस पर काबिज रहा और पिछले चार साल से हाशिये पर चल रहा था, वह इसी मौके ही तो तलाश कर रहा था कि कब अपनी ताकत का प्रदर्शन किया जाए। वह यह भी दिखाना चाहता था कि अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट ने गलत मोहरों पर हाथ रखा है, जिसे के वह साबित करने में भी कामयाब रहा। जाहिर तौर पर इसमें जयपाल के पुराने सिपहसालारों कुलदीप कपूर, रमेश सेनानी व फखरे मोइन समेत पार्षदों ने अपनी भूमिका अदा की।
जहां संगठन को व्यवस्थित तरीके से चलाने का सवाल है, इसमें कोई दो राय नहीं कि रलावता ने कांग्रेस कार्यालय को नियमित खोलने के साथ ही खुद भी वहां समय देने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। वरना स्वर्गीय श्री माणकचंद सोगानी, डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व जसराज जयपाल के जमाने में तो केवल अवसर विशेष पर ही कार्यकर्ता कार्यालय में नजर आते थे। यानि कि कांग्रेस घरों से ही चला करती थी। अलबत्ता कभी सेवादल तो कभी युवक कांग्रेस ने जरूर समय-समय पर वहां डेरा डाला। पूर्ववर्ती कांग्रेस संगठन इस कारण कामयाब थे कि असल ताकत भी उनके पास ही थी। भले ही गुटबाजी तब भी थी मगर वे मुख्य धारा से नहीं कटा करते थे। किन्हीं गुटों का पूरी तरह से आइसोलेटेड होने का नजारा पहली बार दिखाई दिया। हालत ये हो गई कि मौजूदा काबिज नेताओं की ओर से आयोजित किसी भी कार्यक्रम में कटे हुए गुट शामिल होना ही अपनी तौहीन समझते थे। यानि कि संगठन अध्यक्ष पर रलावता लॉबी जरूर काबिज है, मगर असल ताकत बाहर ही बनी हुई है। वैसे एक बात जरूर है, रलावता की जगह कोई और भी होता तो संगठन का यही हाल होता, क्योंकि असल कांग्रेस तो बाहर ही बनी रही। इसमें रलावता कर भी क्या सकते थे, मगर इसकी जिम्मेदारी भी तो उन पर ही आयद होती है। हालांकि पद संभालते ही उन्होंने वरिष्ठ नेताओं का देवरा ढोका, मगर उन्होंने उन्हें तवज्जो ही नहीं दी। यह गुटबाजी भले ही पायलट के प्रति वरिष्ठ नेताओं की नाइत्तफाकी की वजह से थी, मगर इसे भुगतना रलावता को पड़ा। हालांकि पायलट ने अपने प्रभाव की वजह से यही समझा कि आखिरकार सभी उनकी छतरी के नीचे आ जाएंगे, मगर यह अनुमान गलत निकला। कुछ दिन तो रलावता ने सभी को जोडऩे का प्रयास किया, मगर जब उन्हें नहीं गांठा गया तो वे आगे बढ़ गए और पीछे छूट गए वरिष्ठ नेताओं से जुड़े कार्यकर्ता।
भले ही निष्पत्ति के रूप में यही माना जाए कि रलावता में संगठन को मैनेज करना नहीं आता, मगर सच ये भी है कि उनकी इस असफलता की एक प्रमुख वजह डॉ. बाहेती व डॉ. जयपाल का पायलट से छत्तीस का आंकड़ा है।
सुविज्ञ सूूत्र बताते हैं कि पायलट को अपनी गलती समझ में आ गई और वे आगामी चुनाव का देखते हुए नाराज नेताओं को मैनेज करने पर विचार कर रहे हैं।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 27 जुलाई 2013

लोकापर्ण भले ही गहलोत ने किया, क्रेडिट तो भाजपा ले गई

पंचशीलनगर में स्थित झलकारी बाई स्मारक का लोकार्पण भले ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किया, मगर अखबारों में विज्ञापनों के जरिए इसको बनाने की क्रेडिट भाजपा ले गई।
असल में यह बना ही पिछली भाजपा सरकार के दौरान था, जिसका श्रेय सीधे-सीधे तत्कालीन नगर सुधार न्यास अध्यक्ष के खाते में जाता है। उन्होंने इस पर एक करोड़ आठ लाख रुपए खर्च किए। इसके अतिरिक्त  विधायक श्रीमती अनिता भदेल ने दस लाख व सांसद रासासिंह रावत ने चार लाख रुपए अपने फंड से दिए। राजस्थान पुरा धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के तत्कालीन अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत का मार्गदर्शन रहा। संयोग से नई सरकार कांग्रेस की आ गई और इसका लोकार्पण नहीं हो पाया। कांग्रेस राज में यह पूरी तरह से उपेक्षित रहा। न्यास ने भी इसके रखरखाव पर कोई ध्यान नहीं दिया। अब जब कि मौजूदा कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के चार माह शेष रह गए हैं तो लोकार्पण का श्रेय मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ले लिया। जाहिर तौर पर यह भाजपाइयों को कैसे गले उतरता। सो उन्होंने किसी प्रकार का विरोध जताने की बजाय निर्माण करवाने का श्रेय लेने के लिए एक तरीका निकाला। विधायक श्रीमती अनिता भदेल के करीबी और कोली समाज के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत भाटी को आगे रख कर समाज की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे और भाजपा नेताओं को श्रेय देते हुए अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन दिए गए, ताकि लोगों को ठीक से पता लगे कि यह स्मारक भाजपा शासन की देन है, लोकार्पण भले ही गहलोत कर रहे हों। वैसे एक रोचक बात ये भी है कि इसका औपचारिक लोकार्पण भले ही अब जा कर हो रहा हो, मगर कोली समाज व भाजपा विधायक श्रीमती भदेल की पहल पर यहां पर 2011 में ही झलकारी बाई की जयंती मना ली गई। अर्थात यह स्मारक एक अर्थ में तो लोकार्पित हो ही चुका था।
जो कुछ भी हो, इन विज्ञापनों के जरिए हेमंत भाटी भी छा गए, जिनके प्रयासों से यहां पर कोली समाज के काफी लोग जुटे। ज्ञातव्य है कि हेमंत भाटी पूर्व उप मंत्री ललित भाटी के छोटे भाई हैं, जो कि इस बार अजमेर दक्षिण से कांग्रेस टिकट के दावेदार हैं। भले ही हेमंत भाटी की पहल पर भाजपा को क्रेडिट लेने का लाभ मिला, लेकिन साथ ही इससे उनकी सदाशयता भी उभर कर आई कि कांग्रेसी मुख्यमंत्री के मुख्य आतिथ्य में समारोह होने के बावजूद अपनी समाज की प्रेरणा स्रोत झलकारी बाई के सम्मान में उन्होंने समाज के लोगों को एकत्रित किया। जहां तक भाजपा नेताओं का सवाल है, उन्होंने कार्यक्रम से परहेज ही रखा। श्रीमती भदेल अजमेर नहीं हैं और प्रो. वासुदेव देवनानी ने इस कारण जाने से इंकार कर दिया कि लोकार्पण पट्टिका पर उनका नाम नहीं लिखा गया। न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन को सबसे ज्यादा मलाल रहा कि काम उन्होंने करवाया, मगर लोकार्पण कांग्रेसी मुख्यमंत्री कर रहे हैं। उन्होंने शिलान्यास पट्टिका हटाने पर ऐतराज करते हुए यह शिकायत भी की कि कांग्रेस राज में इस पर कुछ भी खर्च नहीं किया गया। इस शिकायत के बाद भी वे समारोह में केवल इसी कारण गए क्योंकि कोली समाज की ओर से उन्हें समाज को दी इस अप्रतिम भेंट देने के उपलक्ष्य में विशेष रूप से निमंत्रित किया गया था।
रहा सवाल कार्यक्रम के इम्पैक्ट का तो कांग्रेसी भले ही गहलोत के हाथों लोकार्पण का कोली समाज में श्रेय लेने का सपना देख रहे हों, मगर चूंकि समाज के अधिसंख्य लोग हेमंत भाटी के बुलावे पर आए, इस कारण वे अहसान तो भाजपा का ही मानने वाले हैं।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

रघु शर्मा के साथ भगत को देख सभी चौंके

लैंड फॉर लैंड मामले में फंसने के कारण अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके नरेन शहाणी भगत को पहली बार एक सार्वजनिक सरकारी समारोह में देख सभी चौंके। मौका था जवाहर रंगमंच पर आयोजित राजीव गांधी विद्यार्थी डिजीटल योजना के तहत लैपटॉप तथा नव प्रवेशित साईकिल के लिए चैक वितरण समारोह का, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में सरकारी मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा मौजूद थे। इसमें उनके साथ जब लोगों ने भगत को भी देखा तो चौंकना स्वाभाविक था। शाहनी मंच पर पहुंचे, तो शिक्षा विभाग के अफसरों ने उनका अभिनंदन किया। वे मंच पर रघु शर्मा के साथ बैठे। साथ ही रघु शर्मा के साथ विद्यार्थियों को लेपटॉप भी वितरित किए। अखबारों ने इस घटना को बाकायदा रेखांकित किया। यह घटना यूं भले ही सामान्य लगती हो, मगर राजनीति के जानकार माथापच्ची कर इसके अर्थ निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

भगत की बॉडी लैंग्वेज से ऐसा अहसास हो रहा था, मानो पिछले दिनों इस्तीफे के बाद उन पर जो मानसिक दबाव था, उससे वे बाहर आ चुके हैं, तभी तो एक सार्वजनिक समारोह में बिंदास हो कर उपस्थित हुए। सवाल ये उठता है कि क्या उन्हें आयोजक विभाग ने बुलवाया। जाहिर तौर पर नहीं। चूंकि अब वे न्यास अध्यक्ष पद पर नहीं हैं। सरकारी कार्यक्रम में एक कांग्रेसी नेता के नाते भी उन्हें नहीं बुलवाया जा सकता था, जिस पर कि विशेष से फिलवक्त आरोप लगा हुआ है। यह भी पक्का है कि वे बिना बुलाए मेहमान की तरह नहीं पहुंचे होंगे। इतनी निर्लज्जता की उनसे उम्मीद नहीं की जा सकती। अर्थात उन्हें रघु शर्मा ने ही बुलवाया। और अगर ऐसा है तो इसके राजनीतिक मायने निकलते हैं। सबसे बड़ा तो ये कि  रिश्वत प्रकरण में आरोपी होने के बाद भी सरकारी तौर पर उनसे परहेज नहीं किया जा रहा है। यानि की उनके बारे में सरकार का रुख नरम है। रघु शर्मा दूध पीते बच्चे तो हैं नहीं। जरूर उन्होंने कुछ सोच कर उन्हें बुलवाया होगा। सरकार यानि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का रुख जो भी हो, रघु शर्मा अपने स्तर पर ऐसा कदम उठा रहे हैं तो जरूर उसकी कोई वजह होगी। अब जबकि इस घटना पर लोगों की नजर है और कोई विवाद हो सकता है तो संभव है रघु शर्मा उन्हें बुलवाने की बात से इंकार करें, मगर उनके इस बात का कोई भी जवाब नहीं होगा कि बिन बुलाए भगत के आने पर उन्होंने ऐतराज क्यों नहीं किया। क्या उन्हें पता नहीं था कि भगत के उनके साथ मंच पर होने से कुछ विवाद हो सकता है? अगर ये भी मान लिया जाए कि वे बिन बुलाए ही वहां पहुंच गए, तो क्या रघु शर्मा को इतनी भी अक्ल नहीं कि वे उन्हें मंच पर बुलवाने की रिस्क लेंगे।
कयास ये भी लगाया जा सकता है कि केन्द्रीय मंत्री सी पी जोशी के इशारे पर रघु ने उन पर फंदा डाला होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि विधानसभा चुनाव को लेकर जोशी एक बार फिर लॉबिंग करने में जुट गए हैं। वे इन दिनों दावेदारों पर हाथ रख रहे हैं, ताकि बाद में चुनाव जीतने पर उनके काम आएं। कुल मिला कर यह साफ है कि यह छोटी सी घटना कोई खास अर्थ रखती है। इसे इस रूप में भी लिया जा सकता है कि उन्हें फिर से प्लेटफार्म उपलब्ध करवाया जा रहा है। इसका आधार ये है कि उन पर जो आरोप है, उसकी जांच नौ दिन चले अढ़ाई कोस की रफ्तार से चल रही है। कहने वाले तो यहां तक कहने लगे हैं कि वे इस केस से बाहर आ जाएंगे। सच जो भी हो, भगत का सरकारी कार्यक्रम में सार्वजनिक मंच पर मुख्य सचेतक के साथ मौजूद होना अन्य दावेदारों को पच नहीं रहा।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

मास्साब चौधरी जी को निपटाना आसान नहीं होगा

अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट से खुला पंगा लेने वाले अजमेर देहात जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व अजमेर डेयरी के अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी को भले ही पायलट के इशारे पर उनके गुट के नेताओं ने चारों से ओर से घेर लिया है, मगर उन्हें निपटाना इतना आसान भी नहीं होगा। हांलाकि कांग्रेस एक समुद्र है और इसमें न जाने कितने रामचंद्र चौधरी आए और गए, साथ ही सचिन के सीधे राहुल गांधी से ताल्लुक भी हैं, मगर जहां तक स्थानीय राजनीति का सवाल है, चौधरी को नजरअंदाज करना हंसी खेल नहीं है। एक तो मदेरणा-मिर्धा लॉबी के आशीर्वाद के कारण उनको बेदखल करने से पहले पार्टी दस बार सोचेगी। दूसरा जाट खेमा पहले से ही पार्टी से नाराज चल रहा है और जिले में तकरीबन ढ़ाई लाख जाट वोट हैं, उनको चलते रस्ते नाराज करना मंहगा पड़ सकता है। मगर यदि भारी दबाव के चलते उन्हें पार्टी से बाहर करने की नौबत आ भी गई तो वे विधानसभा चुनाव और बाद में लोकसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
आपको पता होगा कि चौधरी हसबैंड मेमोरियल स्कूल में फिजिक्स के टीचर रहे हैं और अजमेर डेयरी पर वर्षों से उनका एकछत्र राज है। पुराने लोगों में मास्साब के नाम से जाने जाने वाले चौधरी की को-ऑपरेटिव मूवमेंट पर कितनी पकड़ है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देहात जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद भी और जिले के दिग्गज जाट नेता पूर्व मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट व पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी के एडी चोटी का जोर लगाने के बाद भी उन्हें डेयरी से बेदखल नहीं किया जा सका। हालांकि ऊपर मदेरणा-मिर्धा लॉबी का वरदहस्त है, मगर स्थानीय स्तर पर अकेले अपने दम पर राजनीति करते हैं। बस दिक्कत ये है कि जब उनको रीस यानि गुस्सा आता है तो किसी के बस में नहीं आते। और उनकी यही फितरत उनके लिए कई बार भारी परेशानी का सबब बन जाती है। रीस आने के बाद आगा-पीछा नहीं देखते। एक बार तो दैनिक नवज्योति से सीधा पंगा मोल ले लिया। तब नवज्योति को यहां बोलबाला था। वे सार्वजनिक रूप से नवज्योति को गाली देते थे। इसके चलते कांग्रेस के एक बड़े जलसे का जिला पत्रकार संघ ने बायकाट कर दिया, मगर चौधरी ने कोई परवाह नहीं की। आखिर तक वे झुके नहीं। सचिन के मामले में भी वे रीस पर काबू नहीं रख पाए और आज सचिन समर्थकों से चारों ओर से घिर गए हैं।
सब जानते हैं कि विवादों से उनका चोली-दामन का साथ रहा है और उनकी अब तक की जिंदगी संघर्षों में ही बीती है। ज्ञातव्य है कि मसूदा में निर्दलीय ब्रह्मदेव कुमावत ने चौधरी को हरा दिया था, लेकिन पार्टी को सरकार बनाने के लिए कुमावत की जरूरत थी, इस कारण उन्हें संसदीय सचिव बनाया गया। यह बात चौधरी को इतनी बुरी लगी कि उनके समर्थकों ने बिजयनगर में आयोजित किसान सम्मेलन में ब्रह्मदेव कुमावत के साथ हाथापाई कर दी। यह विवाद काफी दिन तक चलता रहा। मगर इस बार का संघर्ष देख कर यही लगता है कि कहीं उन्होंने रोंग नंबर तो डायल नहीं कर दिया। उन्होंने चैलेंज भी तो ऐसी शख्सियत को दे दिया है, जो इन दिनों चमकता सितारा हैं। सचिन युवा हैं तो उतना जोश भी है। यूं पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती व पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल भी उनकी छतरी के नीचे नहीं आए, मगर कम से कम उन्होंने इस तरह खुली बगावत तो नहीं की। उन्होंने चौधरी की तरह कभी सार्वजनिक रूप से पायलट से मुंहजोरी नहीं की है। उनके विरोध की रस्साकस्सी ने कभी सार्वजनिक रूप से नौटंकी का रूप नहीं लिया है। कम से कम अनुशासनहीनता तो नहीं की। मगर चौधरी ने तो खुले आम चुनौती दे कर आलाकमान तक को सकते में डाल दिया है। चौधरी के इस रवैये के कारण पार्टी की काफी थू-थू तो हो रही है, पायलट की भी बड़ी भारी किरकिरी हुई है।
हालांकि पायलट चाहें तो पार्टी हाईकमान में अपनी जबदस्त पेठ के चलते खुद ही चौधरी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखवा सकते हैं, मगर उनके इशारे पर चौधरी को झटका देने के लिए निचले स्तर पर ही कांग्रेसी नेता लामबंद हो गए हैं। कांग्रेस विधायकों समेत जिले के कई कांग्रेसी नेताओं ने चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सभी ने कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान को पत्र भेजकर चौधरी को कांग्रेस से निष्कासित करने की मांग की है। बेशक चौधरी जमीनी नेता हैं, उनकी अजमेर डेयरी अध्यक्ष के नाते जिले पर निजी पकड़ है और उनकी जाति के तकरीबन ढ़ाई लाख वोट जिले में हैं, मगर उन्होंने विरोध का जो तरीका अपनाया है, उसे हाईकमान गंभीर मान सकता है। हाईकमान को डर है कि अगर इस तरह का विरोध छूत की तरह फैला तो यह पार्टी के लिए बहुत घातक होगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000