शनिवार, 4 जनवरी 2014

टंडन साहब दे रहे हैं मुख्यमंत्री को सलाह

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजेश टंडन की कांग्रेस में पूछ हो या नहीं, मगर भाजपा राज में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को सलाह जरूर देना शुरू कर रहे हैं। असल में उन्होंने राजे से मांग की है कि वे 8-9 जनवरी को आयोजित कलेक्टर-एसपी कांफ्रेंस को रद्द करें। उन्होंने बाकायदा मुख्यमंत्री सचिवालय को पत्र लिख कर कहा है कि यह लगभग तय है कि सरकार मकर संक्रांति के बाद प्रदेश में बड़े पैमाने पर कलेक्टर एसपी के तबादले करेगी और जाहिर है कलेक्टर-एसपी नए आ जाएंगे। अत: सरकार मौजूदा कलेक्टर-एसपी के बजाय आने वाले नए कलेक्टर-एसपी को अपनी कार्य योजनाओं के बारे में समझाए तो ज्यादा बेहतर होगा। वैसे भी मौजूदा को समझाने का कोई मतलब नहीं है।
यूं एक बुद्धिजीवी के नाते उनका सुझाव वाकई काम का है, मगर चूंकि वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं, इस कारण भाजपा सरकार को दी जा रही उनकी सलाह पर चौपाल पर चर्चा होना स्वाभाविक है। दिलचस्प बात ये है कि उन्हें ये पहले से पता है कि मकर संक्रांति के बाद प्रदेश में बड़े पैमाने पर कलेक्टर-एसपी के तबादले किए जाने हैं। सरकार की अंदर की जानकारी होना वाकई गौरतलब है। कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी मौजूदा कलैक्टर-एसपी ने ही उनसे ऐसी सलाह देने को कहा हो? उनको तो पता ही है, मगर वे संभव है सुझाव देने की हिमाकत न कर पा रहे हों। बात राजे तक पहुंची तो संभव है सलाह भी मान ली जाए। अगर ऐसा हुआ तो प्रदेशभर के कलैक्टर-एसपी उन्हें दुआ देंगे। बहरहाल, जो कुछ हो, टंडन साहब का यह नया अवतार है बड़ा दिलचस्प। अपना तो सुझाव है कि उनको प्रशासनिक सलाहकार बना दिया जाना चाहिए। ज्ञातव्य है कि उनको प्रशासनिक अधिकारियों के साथ उठने-बैठने का अच्छा खासा अनुभव है और उनके मसलों को भलीभांति समझते हैं। कांग्रेस राज में भी उर्स व पुष्कर मेले जैसे महत्वपूर्ण मौकों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। धरना तक देने से नहीं चूकते। अपनी इसी बेबाक बयानी और फक्कड़ अंदाज की वजह से ही वे हमेशा चर्चित रहते आए हैं।

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

भगत के खिलाफ मामला बेहद कमजोर?

भूमि के बदले भूमि आवंटन के लिए रिश्वत के तौर पर प्लॉट और रुपए की डिमांड करने के मामले में एक सवाल हर एक के जेहन में है कि आखिर इस मामले में न्यास के पूर्व सदर नरेन शहाणी भगत का क्या होगा? विशेष रूप से सरकार अब भाजपा की है तो क्या उनके प्रति कड़ा रुख अपनाया जाएगा? विधानसभा चुनाव में महज इसी वजह से टिकट से हाथ धो बैठे, मगर अब क्या उनका राजनीतिक कैरियर भी चौपट हो जाएगा? असल में यह चर्चा इस कारण उठी है क्योंकि हाल ही मीडिया में यह खबर सुर्खियों में थी कि एक ओर जहां रिटायर्ड आईएएस अधिकारी खन्ना की ओर से की गई जांच में पूर्व अध्यक्ष नरेन शाहनी पर जहां कोई आरोप नहीं बन रहा, वहीं एंटी करप्शन ब्यूरो ने उन्हें रिश्वत मांगने का दोषी ठहराया है।
इस सिलसिले में जानकारी ये भी आ रही है कि भगत के खिलाफ बना मामला बेहद कमजोर है। इसकी वजह ये बताई जा रही है कि जिस दिन की वॉइस रिकॉर्डिंग एसीबी के पास है, उस दिन भगत जयपुर में कांग्रेस स्थापना दिवस के कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे। अजमेर से जयपुर जाते वक्त उनके साथ शहर कांग्रेस के दो बड़े दिग्गज भी थे। अगर यह वाकई सच है तो भगत के खिलाफ बनाया गया मामला या तो जयपुर मुख्यालय में ही दफ्तर दाखिल हो जाएगा, या फिर कोर्ट में पहुंचा तो पहली सुनवाई में ही फुस्स हो जाएगा। इसके अतिरिक्त बताया ये भी जा रहा है कि सबूत के तौर रखी गई ऑडियो रिकार्डिंग में भगत की आवाज साफ नहीं है, यानि कि फोरेंसिक लैब में वह रिजेक्ट भी हो सकती है।
सच क्या है ये तो वक्त ही बताएगा, मगर फिलवक्त खबर यही है कि भगत इस मामले में ज्यादा लपेटे में नहीं आएंगे। उन्हें जो नुकसान होना था, वह तो हो ही चुका, विधानसभा टिकट कटने की वजह से। बताया जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी असलियत जानते थे, मगर एक तो चुनाव के दौरान भगत को क्लीन चिट देने पर किसी भी प्रकार का आरोप झेलने को तैयार नहीं थे, दूसरा ये कि अगर भगत को पाक साफ घोषित कर दिया जाता तो वे टिकट के प्रबलतम दावेदार हो जाते, जबकि वे अपने चहेते डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को टिकट देने का मानस बना चुके थे। उन्होंने मेहरबानी सिर्फ इतनी ही कि उनके खिलाफ सख्त रुख नहीं अपनाया। बताते तो ये तक हैं कि उनको साफ इशारा था कि उनके लिए बेहतर यही रहेगा कि डॉ. बाहेती के साथ ईमानदारी से काम करें, वरना डॉ. बाहेती के हारने पर और साथ ही सरकार रिपीट होने पर उनका हश्र कुछ अच्छा नहीं होगा। लिहाजा भगत ने पूरी ईमानदारी के साथ काम किया। अब स्थिति ये है कि भगत के साथ लगने पर भी बाहेती हार गए और वह भी बुरी तरह। यानि की लहर इतनी तेज थी कि भगत भी हथेली नहीं लगा पाए। उधर सरकार भी नहीं आई। रहा संगठन का सवाल तो हालत ये है कि कांग्रेस की बुरी तरह से हार के लिए किसी को भी सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं माना जा रहा है। ऐसे में जाहिर है भगत को कम से कम शक की नजर से तो नहीं देखा जाएगा।

रविवार, 29 दिसंबर 2013

हार पर कांग्रेस में पिछली बार तो कार्यवाही हुई थी

हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में शहर की दोनों सीटों पर कांग्रेस की पराजय की जिम्मेदारी न तो शहर कांग्रेस अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता ने ली है और न ही उन पर जिम्मेदारी आयद की गई है। असल में यह स्थिति इस कारण है कि कांग्रेस जहां जिले की सभी आठों सीटों पर हारी है, वहीं पूरे प्रदेश में भी मात्र 21 सीटों पर जीत हासिल कर पाई। ऐसे में कौन किसको दोषी ठहराए? खुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. चंद्रभान की तो जमानत ही जब्त हो गई। राजस्थान के इतिहास में कांग्रेस की इस हालत के लिए कोई पूर्व मुख्यमंत्री अशोक को जिम्मेदार मानता है तो कोई केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस के प्रति आमजन में उपजे गुस्से को। कोई मोदी नामक सुनामी का नाम लेकर बचना चाहता है। ये सच भी है। चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर भले ही भितरघात व असहयोग के कुछ मामले हों, मगर सच ये है कि हार की मोटी वजह कांग्रेस विरोध लहर थी, जिसके तले सारे समीकरण उलट-पुलट हो गए।
प्रसंगवश आपको बता दें कि पिछले विधानसभा चुनाव में तत्कालीन शहर कांग्रेस अध्यक्ष जसराज जयपाल ने बाकायदा कार्यवाही की थी। उन्होंने  अजमेर पूर्वी ब्लॉक दो के अध्यक्ष अशोक ढ़लवाल व पश्चिमी ब्लॉक तीन के अध्यक्ष युवराज को निष्क्रियता का आरोप लगा कर हटा दिया। उनकी जगह पर क्रमश: आशा तूनवाल व पार्षद सुनील केन को ब्लॉक अध्यक्ष बनाया गया। इसी प्रकार पश्चिम ब्लॉक एक के अध्यक्ष विजय नागौरा और पूर्वी ब्लॉक तीन की अध्यक्ष लक्ष्मी नायक पर लगाम कसने के लिए क्रमश: शैलेन्द्र अग्रवाल व डॉ. जे.एम. बुंदेल को कार्यवाहक अध्यक्ष बना दिया गया। शहर अध्यक्ष ने पश्चिम ब्लॉक दो के अध्यक्ष महमूद मियां चिश्ती के इस्तीफा देने के कारण रिक्त पद पर विजय जैन को नियुक्त किया था।
ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार की कोई कार्यवाही तो नहीं होगी, मगर नया प्रदेश अध्यक्ष बनने पर पूरी टीम जरूर नए सिरे से गठित की जा सकती है। फिलहाल किसी को समझ में नहीं आ रहा कि आगामी लोकसभा में यहां कौन पार्टी की कमान संभालेगा।

दो धड़ों में बंटी हुई है आम आदमी पार्टी

बजरंगगढ स्थित शहीद स्मारक का नजारा
प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे के देशव्यापी आंदोलन के दौरान अन्नावादी दो धड़ों में बंटे हुए थे ही, अन्ना के प्रमुख सहयोगी अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में बनी आम आदमी पार्टी में भी धड़ेबाजी जारी है। दिल्ली में पार्टी की सरकार बनने पर खुशी जाहिर करने के लिए दो अलग-अलग कार्यक्रम होना इसका ताजा उदाहरण है। ज्ञातव्य है कि पार्टी की जिला संयोजक श्रीमती कीर्ति पाठक के नेतृत्व में बजरंगगढ़ स्थित शहीद स्मारक पर हवन किया गया और मिठाई बांट कर खुशी का इजहार किया गया, जिसमें दीपक गुप्ता, सुशील पाल, नील शर्मा, देवेंद्र सक्सेना, योगेश बालम, गिरीश मीणा, सरस्वती चौहान, रमा शर्मा, जयश्री शर्मा, गौरव व उमाशंकर चौहान, ओम स्वरूप माथुर, ललित खत्री, मुकेश और हरीश मौजूद थे। दूसरी ओर इंडिया मोटर सर्किल पर पार्टी कार्यकर्ताओं के एक गुट ने बधाई समारोह का आयोजन किया। इसमें राजेंद्र सिंह हीरा, मुबारक खान, सत्यनारायण भराडिया, केशवराम सिंघल, राजेश राजोरिया, नरेश बाली, भूपेंद्र सिंह सनोद, एडवोकेट जयबीर सिंह, मुकुल शेखावत, डॉ. ए. के. यादव, अक्षय शर्मा, धरूप पचोरी, नितिन, नाजिम हुसैन, गौरव, चंदू, हंसराज, प्रदीप, राहुल, अजय, रमेश आदि मौजूद थे।
इंडिया मोटर सर्किल पर हुए कार्यक्रम का चित्र
दिलचस्प बात ये है कि दोनों ही आयोजनों में कहा गया कि पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव के लिए तैयार है। श्रीमती पाठक ने कहा कि जिस प्रकार दिल्ली में जनता ने आम आदमी पार्टी में विश्वास जताया है, उसी प्रकार आने वाले लोकसभा चुनावों में लोगों का समर्थन मिलेगा। इसी प्रकार दूसरे गुट की विज्ञप्ति में कहा गया कि कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य अजमेर की जनता को ये बताना था कि आम आदमी पार्टी की राजनीतिक क्रांति की शुरुआत दिल्ली के बाद अब राजस्थान के अजमेर में भी हो चुकी है। दोनों ही स्थानों पर सदस्यता अभियान भी चलाया गया। मगर सवाल उठता है कि जो लोग आपस में ही बंटे हुए हैं, वे कौन सी क्रांति की उम्मीद लगाए बैठे हैं। बहरहाल, अपना तो ये कहना है कि स्थापित और कथित रूप से सत्ता की ही राजनीति करने वाली पार्टियों में गुटबाजी तो आम बात है, मगर केवल आम आदमी के लिए ही गठित नई नवेली आम आदमी पार्टी में भी वर्चस्व की लड़ाई चले तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है। और वह भी तब जबकि दिल्ली में सत्ता पर काबिज होने के बाद वह लोकसभा चुनाव में देशभर में हुंकार भरने की तैयारी कर रही हो। राजस्थान में तो सभी 25 सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान पार्टी के प्रदेश संयोजक अशोक जैन ने कर रखा है। यानि कि अजमेर में भी पार्टी अपना प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारेगी। और अगर यह गुटबाजी जारी रही तो उसका परफोरमेंस कैसा रहेगा, यह समझा जा सकता है।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

क्या पीसीसी चीफ बनने पर भी चुनाव लड़ेंगे सचिन पायलट?

इन दिनों अजमेर के लोगों, विशेष रूप से राजनीति में रुचि रखने वाले नागरिकों व कार्यकर्ताओं-नेताओं में यह सवाल चर्चा में है कि क्या अजमेर के सांसद व केन्द्रीय कंपनी मामलात राज्य मंत्री सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी अजमेर से चुनाव लड़ेंगे? ज्ञातव्य है कि पिछले कुछ दिन से पायलट को विधानसभा चुनाव में बुरी तरह से पराजित कांग्रेस का पुनरुद्धार करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा जोरों पर है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष पद के कुछ और दावेदारों के नाम भी आए, मगर अधिसंख्य समाचार पत्रों का अनुमान है कि सचिन को ही यह जिम्मेदारी दी जा रही है। ऐसे में यह सवाल भी स्वत: ही उठ रहा है कि ऐसे में क्या वे अजमेर से लोकसभा चुनाव भी लड़ेंगे? सवाल वाजिब भी है। आज कांग्रेस की जैसी स्थिति है, उसे संवारने और प्रदेश की पच्चीसों सीटों पर प्रत्याशियों का चयन और उनके लिए चुनावी रणनीति बनाना ही अपने आप में बहुत बड़ा टास्क है। किसी भी राजनीतिज्ञ के लिए इतने बड़े टास्क के साथ-साथ खुद की सीट पर भी पूरा ध्यान देना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है। इसकी वजह ये भी है कि हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में अजमेर संसदीय क्षेत्र की आठों सीटों पर कांग्रेस के हारने के बाद यहां से चुनाव लडऩा बेहद चुनौतीपूर्ण है। यदि आंकड़ों की बात करें तो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस व भाजपा को मिले वोटों में तकरीबन दो लाख का फासला है। उसे पाट कर जीत दर्ज करने के लिए कांग्रेस प्रत्याशी को एडी चोटी का जोर लगाना होगा। अन्य संभावित स्थानीय दावेदारों की तुलना में सचिन जैसी सेलिब्रिटी के लिए भले ही यह असंभव न हो, मगर दुष्कर जरूर है। यूं पूर्व भाजपा सांसद प्रो. रासासिंह रावत के पांच टर्म की तुलना में एक ही टर्म में अच्छा परफोरमेंस देना उनके पक्ष में जाता है और जनता भी मानती है कि  ठहरे हुए शहर व जिले को विकास की ओर उन्मुख किया है, मगर इतना तो तय है कि यहां से जीतने के लिए सचिन को पूरी ताकत लगानी होगी। विशेष रूप से इस वजह से भी कि यहां कांग्रेस संगठन की स्थिति ठीक नहीं है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी मनमुटाव बढ़ा है। ऐसे में साथ ही प्रदेश कांग्रेस की जिम्मेदारी का निर्वहन करना कठिन ही है। वैसे भी उन्हें यदि प्रदेश की जिम्मेदारी दी जाती है तो स्वाभाविक रूप से उनसे ये उम्मीद की जाएगी कि वे लोकसभा चुनाव में पार्टी की स्थिति सुधारने के अतिरिक्त आगामी विधानसभा चुनाव तक पार्टी को फिर भाजपा की टक्कर में ला खड़ा करें। अगर वे ऐसा कर पाते हैं तो यह भी स्वाभाविक है कि वे ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे। प्रदेश के कुछ मसलों पर उनकी भी भागीदारी को देखते हुए राजनीतिक पंडित यह अनुमान पहले से लगाते रहे हैं कि उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए तैयार किया जा रहा है।
बहरहाल, अब ये तो कांग्रेस हाईकमान और खुद सचिन को ही निर्णय करना है कि एक साथ दो टास्क हाथ में लेते हैं या नहीं, मगर आम जन में तो यह चर्चा है ही क्या पीसीसी चीफ बनने पर वे अजमेर से चुनाव लड़ेंगे अथवा नहीं?