रविवार, 13 जुलाई 2014

लखावत के प्रयास रंग लाए, सवा सौ साल पुराना विवादित ब्रिज हटाया

राजस्थान धरोहर एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत के प्रयासों ने अपना रंग दिखाया और आखिरकार रेलवे के इंजीनियरों को सहमत करके बूढ़ा पुष्कर सरोवर के बीच रेलवे का करीब सवा सौ साल पुराना विवादास्पद ब्रिज को जेसीबी मशीन की सहायता से ध्वस्त कर दिया गया। अपने आप में यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। और यह भी तभी संभव हो पाया, जब केन्द्र व राज्य में एक ही पार्टी भाजपा की सरकार है, साथ ही लखावत ने प्राधिकरण अध्यक्ष के नाते पूरी ताकत लगा दी।
असल में बूढ़ा पुष्कर के कायाकल्प में अंग्रेजों के जमाने में बना यह ब्रिज आड़े आ रहा था। सरोवर के तट पर स्थित पंपिंग स्टेशन से सरोवर के बीच में ब्रिज बना हुआ था। रेलवे लंबे समय तक बूढ़ा पुष्कर से लाखों गैलन पानी लेता था। सरोवर का भूमिगत जलस्तर खत्म होने के बाद से रेलवे का ब्रिज अनुपयोगी हो गया था। मगर सब जानते हैं कि एक बार कब्जा होने के बाद उसे कोई नहीं छोडऩा नहीं चाहता, चाहे सरकारी महकमा हो। इस मामले में भी असल में कोई अफसर न तो पहल करना चाहता था और न ही पंगा मोल लेना चाहता था। उसकी बला से तो ब्रिज सौ दो सौ साल वहीं पड़ा रहे। अगर लखावत रुचि न लें तो ये ऐसा ही पड़ा रहता।
ज्ञातव्य है कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही फिर से बूढ़ा पुष्कर के विकास की कवायद तेज हो गई है। हालांकि इसका जीर्णोद्धार तो लखावत ने पिछली भाजपा सरकार के दौरान ही प्राधिकरण के अध्यक्ष रहते करवाया था, मगर सरकार पलटने के साथ ही यह रुक गया। असल में प्राधिकरण ही ठंडे बस्ते में चला गया था। अब लखावत ने फिर काबिज होने पर बूढ़ा पुष्कर के समग्र विकास के लिए विस्तृत मास्टर प्लान तैयार करवाने की ठानी है और इसी के अनुरूप ही समयबद्ध विकास कराया जाएगा।
लखावत ने इस सिलसिले में मौके पर ही बूढ़ा पुष्कर विकास एवं समारोह समिति की बैठक ली। सामाजिक कार्यकर्ताओं, संत-महात्माओं एवं विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों ने बूढ़ा पुष्कर के विकास के संबंध में आवश्यक सुझाव प्रस्ताव रखे। लखावत ने संबंधित विभागों सामाजिक संस्थाओं को अलग-अलग दायित्व सौंपा। वन विभाग समेत घाट निर्माता समाजों के प्रतिनिधियों को घाटों के किनारे पौधरोपण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। नेशनल हाईवे के इंजीनियरों को हाईवे निर्माण के दौरान बूढ़ा पुष्कर सरोवर में बरसाती पानी की आवक के लिए पुलिया निर्माण करने तथा अवरोधक हटाने के निर्देश दिए। नगर पालिका के ईओ प्रहलाद स्वरूप भार्गव को तीर्थ यात्रियों की सुविधार्थ सुलभ कॉम्पलेक्स बनाने, स्थायी सफाई कर्मचारी नियुक्त करने के निर्देश दिए। बूढ़ा पुष्कर, गया कुंड, मध्य पुष्कर सरोवर का सीमाज्ञान कराने के निर्देश दिए। ज्ञातव्य है कि इन तीनों तीर्थ स्थलों को हाल ही में नगर पालिका बोर्ड ने पालिका सीमा में शामिल करने का प्रस्ताव पारित किया है। बैठक में घाटों की सुरक्षा के लिए दीवार भव्य प्रवेश द्वार बनाने की जिम्मेदारी एडीए को सौंपी गई। नंद किशोर पाराशर ने बूढ़ा पुष्कर में 108 फीट ऊंची भगवान शिव की प्रतिमा का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा, जिसे लखावत ने मंजूरी देते हुए माहेश्वरी सेवा सदन के अध्यक्ष श्याम सुंदर बिड़ला के संयोजन में एक कमेटी गठित की।
बैठक में विधायक त्रय सुरेश सिंह रावत, अनिता भदेल व भागीरथ चौधरी, नगर पालिकाध्यक्ष मंजू कुर्डिया, कपालेश्वर मंदिर के महंत सेवानंद गिरी, रामसखा आश्रम के महंत रामशरण दास महाराज, उपखंड अधिकारी राष्ट्रदीप यादव, तहसीलदार गजराज सिंह सोलंकी, भाजपा नेता कंवल प्रकाश किशनानी, पार्षद संपत सांखला, पूर्व पालिकाध्यक्ष सूरज नारायण शर्मा, नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष नरेन शाहनी भगत के अतिरिक्त एडीए, नेशनल हाईवे, सार्वजनिक निर्माण, वन, जलदाय, पर्यटन सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी इंजीनियर उपस्थित थे।
-तेजवानी गिरधर

पहले भी विवादित चर्चा में आ गए थे गौरान

अब जब कि आरएएस प्री 2013 परीक्षा में पेपर लीक और परीक्षा निरस्त करने संबंधी मामलों को लेकर खफा एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने आयोग अध्यक्ष हबीब खान गौरान से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने और उनके कार्यकाल की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है, तो यकायक वह प्रकरण भी चर्चा में आ गया है, जबकि उनके नाम को मंथली मामले में गिरफ्तार अजमेर के तत्कालीन एसपी राजेश मीणा ने उजागर किया था। बात ये सामने आई कि दलाल रामदेव ठठेरा उनके पास थैला लेकर गया था। यह सवाल तब उठा था कि मीणा की गिरफ्तारी को दस दिन बीत जाने के बाद भी एसीबी ने यह तथ्य क्यों उजागर नहीं किया कि ठठेरा थैला लेकर आखिर राजस्थान लोक सेवा आयोग के किस उच्चाधिकारी के घर पर कुछ वक्त रुका था? उसने वहां क्या किया? क्या वहां आयोग से जुड़े किसी मसले की दलाली की गई? या फिर वह यूं ही मिलने चला गया, क्योंकि वह उनका पूर्व परिचित था? जाहिर सी बात है कि हर किसी को यह जानने की जिज्ञासा थी कि आखिर वह उच्चाधिकारी कौन है और दलाल ने उसके घर पर जा कर क्या किया? इस बारे में मीडिया ने खबरों के फॉलो अप में उसका जिक्र तो कई बार किया है, मगर अपनी ओर से नाम उजागर करने से बचा, क्योंकि बिना सबूत के संवैधानिक पद पर बैठे उच्चाधिकारी का नाम घसीटना दिक्कत कर सकता था। यहां तक कि मीडिया ने इशारा तक नहीं किया, जबकि ऐसे मामलों में अमूमन वह इशारा तो कर ही देता है, भले ही नाम उजागर न करे।
अपुन ने तभी इस कॉलम में लिख दिया था कि इस मामले की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को अच्छी तरह से पता है कि आखिर वह अधिकारी कौन है? ऐसा हो ही नहीं सकता कि रिपोर्टिंग और फॉलो अप के दौरान जिन्होंने पुलिस व एसीबी में अपने संपर्क सूत्रों के जरिए सूक्ष्म से सूक्ष्म पोस्टमार्टम किया हो, उन्हें ये पता न लगा हो कि वह अधिकारी कौन है? मगर मजबूरी ये रही कि अगर एसीबी ने अपनी कार्यवाही में उसका कहीं जिक्र नहीं किया अथवा कार्यवाही में उसे शामिल नहीं किया तो नाम उजागर करना कानूनी पेचीदगी में उलझा सकता है। वैसे भी यह पत्रकारिता के एथिक्स के खिलाफ है कि बिना किसी पुख्ता जानकारी के किसी जिम्मेदार अधिकारी का नाम किसी कांड में घसीटा जाए।
इशारा तो अपुन को भी था, मगर ऑन द रिकार्ड सूचना न होने के कारण नाम का खुलासा नहीं किया, अलबत्ता यह जरूर बता दिया था कि कांग्रेस सरकार एकाएक उस उच्चाधिकारी को फंसाने के मूड में नहीं है। चाहे उसके खिलाफ कुछ सबूत हों या नहीं। इसकी वजह ये है उसकी नियुक्ति ही विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बिगड़े जातीय समीकरण के तहत की थी। इसके अतिरिक्त यदि उस पर हाथ डाला जाता तो आयोग की कार्यप्रणाली को ले कर भी बवाल खड़ा हो जाता।
खैर, एसीबी व सरकार ने जरूर गोरान का नाम अपनी ओर से उजागर नहीं किया, मगर मीणा ने अपनी जमानत अर्जी में इसका हवाला दे कर उस रहस्य से पर्दा उठा दिया था। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि एसीबी की प्राथमिकी में जिक्र है कि उन्हें ट्रेप करने वाले दिन ठठेरा गोरान के बंगले पर भी थैला लेकर गया था। मीणा ने इस पर ऐतराज जताया है कि गोरान को नामजद क्यों नहीं किया गया। हालांकि सवाल ये भी रहा कि क्या मीणा को इस तरह किसी और के खिलाफ कार्यवाही न करने पर सवाल उठाने का अधिकार है या नहीं, या कोर्ट उस पर प्रसंज्ञान लेगा या नहीं। वैसे भी एसीबी जब अपनी कार्यवाही को एसपी के खिलाफ अंजाम दे रही थी तो इसी बीच किसी काम से ठठेरा के गोरान के बंगले पर जाने से ही तो यह आरोप नहीं बन जाता कि वे उन्हें भी रिश्वत की राशि देने गया था। हां, इतना जरूर है कि चूंकि गोरान भी आपीएस रहे हैं, इस कारण उसके ठठेरा के संबंध होना स्वाभाविक लगता है।
खैर, जहां तक कानूनी पृष्ठभूमि का सवाल है ये तो एसीबी ही अच्छी तरह से बता सकती है कि गोरान के खिलाफ मामला बनता था या नहीं, मगर ठठेरा के गोरान के घर पर भी जाने से वे भी संदेह के घेरे में तो आ ही गए थे।
आपको याद होगा कि तब एसीबी के कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह ने गोरान को यह कह कर क्लीन चिट दे दी कि उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला है। बात बिलकुल ठीक थी। जब साक्ष्य मिला ही नहीं तो कार्यवाही होती भी क्या, मगर ठठेरा का गोरान के घर जाने का खुलासा ही अपने आप में कई सवाल खड़े कर गया था।
अव्वल तो जब गोरान के घर पर ठठेरा के जाने को यदि सामान्य मुलाकात ही माना गया है, तो एसीबी को जरूरत ही क्या पड़ी कि उसने प्राथमिकी में इसका जिक्र किया। जब गोरान व ठठेरा के बीच कुछ गलत हुआ ही नहीं तो उसका जिक्र करना ही नहीं चाहिए था। चलो, एससीबी की इस बात को मान लेते हैं कि उनको गोरान के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला है, मगर क्या इतना कहने भर से बात समाप्त हो जाती है। बेहतर ये होता कि वे इस बारे में ठठेरा ने क्या स्पष्टीकरण दिया, इसका खुलासा करते, ताकि उनकी बात पर यकीन होता। फरार आरपीएस लोकेश सोनवाल के घर निकलते समय वह बैग लेकर गोरान के घर गया और बाहर निकला तो बैग उसके हाथ में नहीं था, तो सवाल ये उठता है कि उस बैग में क्या था? क्या उसने आगरा गेट सब्जीमंडी से सब्जी खरीद कर गोरान के घर पहुंचाई थी? इसके अतिरिक्त अजीत सिंह ने यह भी नहीं बताया कि क्या उन्होंने इस बारे में गोरान से भी कोई पूछताछ की थी? यदि पूछताछ की थी तो उन्होंने ठठेरा के आने की क्या वजह बताई? अजीत सिंह की यह बात यकीन करने लायक थी कि मंथली प्रकरण में गोरान की कोई लिप्तता नहीं पाई गई है, मगर एसपी मीणा को मंथली देने जाते समय बीच में उसका गोरान के घर थैला लेकर जाने ने संदेह तो पैदा किया ही था।
खैर, अब जब कि फिर गोरान निशाने पर लिए जा रहे हैं तो उनका पुराना प्रकरण चर्चा में आता है तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, 7 जुलाई 2014

एडीए अध्यक्ष के लिए वैश्य समाज का दावा हुआ कमजोर

जिला परिषद में जिला प्रमुख पद के लिए हुए चुनाव में वैश्य समाज की श्रीमती सीमा माहेश्वरी के जीतने के साथ ही अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद पर वैश्य समाज की दावेदारी कमजोर हो गई है। ज्ञातव्य है कि विधानसभा चुनाव में श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के मसूदा से निर्वाचित होने के बाद उन्होंने जिला प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया था और इसी कारण उप चुनाव की नौबत आई।
जहां तक जातीय समीकरण का सवाल है, जिले में इस वक्त एक भी विधायक वैश्य समाज से नहीं है। ऐसे में अब वैश्य समाज का दबाव था कि उनके किसी नेता को प्राधिकरण का अध्यक्ष पद दिया जाए। मगर अब जब कि जिला प्रमुख पद पर वैश्य समाज की सीमा माहेश्वरी काबिज हो गई हैं, वैश्य समाज उतने दमदार तरीके से दावा नहीं कर पाएगा। ज्ञातव्य है कि नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन चाहते हैं कि उन्हें फिर मौका दिया जाए, ताकि वे अपने अधूरे काम पूरे कर सकें, साथ ही नए कार्य भी हाथ में लें। जाहिर तौर पर उनका तर्क ये है कि पिछली बार जिस विवाद की वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा, वह विवाद था ही नहीं। भाजपा की छोडिय़े, कांग्रेस सरकार में ही उन्हें क्लीन चिट दी गई। यानि कि वे पूरी तरह से पाक साफ साबित हो चुके हैं। उनके तर्क में दम भी है, मगर अब उनका दावा कुछ कमजोर हो गया है। विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर की टिकट के लिए एडी चोटी का जोर लगाने वाले शिवशंकर हेडा के भी ऊपर अच्छे रसूखात हैं और वैश्य तुष्टिकरण के नाते उनका नंबर आना संभावित है, मगर चुनाव के दौरान उनसे जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं पर देवनानी विरोधी काम करने का आरोप है।
बात अगर राजपूत समाज की करें तो यूं तो नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत का दावा काफी मजबूत माना जाता है, मगर मसूदा से श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के विधायक होने के कारण राजपूत समाज का कोटा भी पूरा हो गया है। शेखावत का तर्क ये हो सकता है कि विधानसभा चुनाव में वे अजमेर उत्तर से टिकट के प्रबल दावेदार थे, मगर हाईकमान के आश्वासन के बाद उन्होंने सब्र किया, अत: उन्हें अब उचित इनाम मिलना ही चाहिए। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे से उनके करीबी रिश्ते भी हैं। मगर उनके साथ एक दिक्कत ये भी है कि उन्हें उन्हें वरिष्ठ भाजपा नेता ओम प्रकाश माथुर लॉबी का माना जाता है, जिनकी वसुंधरा राजे से नाइत्तफाकी जगजाहिर है। हालांकि तस्वीर का दूसरा रुख ये है कि माथुर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबी हैं, इस कारण ऊपर की सिफारिश भी रंग ला सकती है।
जिला प्रमुख चुनाव के बाद बदले समीकरण में नगर निगम के पहले मेयर धर्मेन्द्र गहलोत को भी प्रबल दावेदार माना जाता है। उन पर अजमेर उत्तर के विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी का वरदहस्त है। वे काफी ऊर्जावान भी हैं। इसी क्षमता के कारण उनका नाम नए शहर भाजपा अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में है, मगर उनकी रुचि एडीए चेयरमेन बनने में बताई जा रही है। उनके साथ दिक्कत ये है कि देवनानी विरोधी पूरी लॉबी उनके भी खिलाफ खड़ी है। पूर्व शहर भाजपा अध्यक्ष पूर्णाशंकर दशोरा का भी नाम चर्चा में है, मगर उनकी निर्विवाद छवि और निर्गुट शैली की वजह से फिर से शहर भाजपा अध्यक्ष बनाने पर विचार हो रहा बताया।
यूं तो शत्रुघ्न गौतम के केकड़ी से विधायक होने के कारण देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी. पी. सारस्वत का दावा कुछ कमजोर माना जा सकता है, मगर जिला प्रमुख चुनाव में अहम भूमिका निभाने व वसुंधरा के करीबी होने के कारण उन्हें गंभीर माना जा सकता है। वैसे उनके किसी विश्वविद्याय का कुलपति बनाए जाने के भी आसार हैं। रहा सवाल सिंधी समाज का तो अजमेर उत्तर से प्रो. वासुदेव देवनानी विधायक हैं, इस कारण इस समाज से भी किसी को अध्यक्ष बनाए जाने की संभावना कुछ कम है। ज्ञातव्य है कि श्रीमती वसुंधरा राजे की चार माह की सुराज संकल्प यात्रा में पूरे समय साथ रह कर गांव-गांव में केबल नेटवर्क के जरिए प्रचार प्रसार करने वाले शहर भाजपा के प्रचार मंत्री व स्वामी समूह के एमडी कंवलप्रकाश किशनानी को भी दावेदार माना जा रहा है, मगर स्थानीय गुटबाजी कुछ बाधक बन सकती है। अनुसूचित जाति से इस कारण नहीं बनाया जाएगा क्योंकि अजमेर दक्षिण से श्रीमती अनिता भदेल विधायक हैं। साथ ही अजमेर नगर निगम में मेयर का पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और उस पर कांग्रेस के कमल बाकोलिया काबिज हैं। जिले में रावतों का दबदबा है और उसके दो विधायक  पुष्कर से सुरेश सिंह रावत और ब्यावर से शंकर सिंह रावत हैं, इस कारण उनका नंबर भी आता नजर नहीं आता।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, 6 जुलाई 2014

कांग्रेसियों को विरोध करना नहीं आता और भाजपाइयों को सत्ता चलाना

अजमेर जिला परिषद के बोर्ड पर भाजपा काबिज है, बावजूद इसके यदि उसकी साधारण सभा में भाजपाई प्रशासनिक शिथिलता पर उग्र होंगे और विपक्ष में बैठे कांग्रेसी मस्ती में चुप बैठे रहेंगे तो यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर वे अपनी नई भूमिका में आ क्यों नहीं रहे हैं। यह सवाल दैनिक भास्कर के चीफ सिटी रिपोर्टर सुरेश कासलीवाल ने अपनी रिपोर्ट में उठाया है। नई भूमिका के अनुरूप राजनेताओं के रवैये में परिवर्तन न आने पर मीडिया का इस प्रकार चौंकना वाजिब है।
असल में अपुन को लगता ये है कि दोनों ही दलों के नेता अपनी-अपनी आदत से मजबूर हैं। वर्षों तक एक ही प्रकार की भूमिका निभाने के कारण वे उसके इतने आदी हो गए हैं कि नई भूमिका मिलने पर भी उसके अनुरूप आचरण करना उन्हें आता ही नहीं है। जहां तक भाजपाइयों का सवाल है, वर्षों से वे केवल विरोध ही करते रहें हैं, इस कारण उन्हें इसमें महारत हासिल हो गई है। यही महारत पर उन पर हावी भी हो गई है। वह भी इतनी कि छूटती ही नहीं। जहां भी समस्या देखते हैं, तुरंत विरोध करने पर आमादा हो जाते हैं। विरोध करते-करते सत्ता में आने के बाद भी उन्हें ये अहसास नहीं हो पा रहा कि अब वे सत्ता में हैं और उनका विरोध अपनी ही सत्ता के खिलाफ काउंट होगा।
एक अर्थ में उनका विरोध करना जरूर वाजिब है। वो ये कि यदि कहीं कोई समस्या है तो सुधार के लिए विरोध करना ही चाहिए। वे विरोध न करते हुए भला चुप कैसे बैठ सकते हैं? आखिर वे जनप्रतिनिधि बने ही क्यों हैं?  मगर इसका ये भी मतलब निकलता है कि प्रशासन उनकी मंशा को समझ ही नहीं पा रहा। या फिर वह समझना ही नहीं चाहता। या फिर वह भी आदी हो गया है कि भाजपाई तो चिल्लाएंगे ही, चिल्लाते रहें। उन्हें जो करना है, करेंगे। प्रशासन जानता है कि कितना भी काम करेंगे, मगर भाजपाई तो आदत के मुताबिक विरोध करेंगे ही। वरना होना चह चाहिए कि सत्तारूढ़ दल के लोगों को तो चिल्लाने की जरूरत ही नहीं पडऩी चाहिए। कम से कम उनसे संबंधित काम तो बिना चिल्लाए ही होने चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा। इस स्थिति से ऐसा लगता है कि सत्ता में आने के बाद भी भाजपाइयों ने अपनी आदत को सुरक्षित रखने के लिए प्रशासन को सामने रख लिया है। यानि कि सत्ता तो प्रशासन में निहित है और भाजपाई उसके विरोध में। यह मानसिकता इस वजह से भी है कि सरकार चाहे किसी दल की हो, नेताओं का पाला सीधे प्रशासन से पड़ता है। यानि कि उनके लिए प्रशासनिक अधिकारी ही सत्ता हैं। इस कारण उसको निशाने पर रखते हैं। उनकी कोफ्त की एक वजह ये भी हो सकती है कि कांग्रेस सरकार के रहते जिन मुद्दों पर उन्होंने प्रशासन को घेरा, उनका निराकरण उनके सत्ता में आने के बाद भी नहीं हो रहा तो वे जनता को क्या जवाब देंगे।
रहा सवाल प्रशासन को तो वह इतना असंवेदनशील भी नहीं हो सकता कि व्यर्थ ही भाजपाइयों के गुस्से का शिकार बनना चाहेगा। भाजपाइयों की घुड़की सुन कर भी अनसुना करने की एक वजह ये भी हो सकती है कि जो मांग की जा रही है, वह या तो नियमों अथवा संसाधनों की कमी के कारण पूरी नहीं की जा सकती, या फिर व्यावहारिक धरातल पर संभव नहीं है।
मसले के एक अनछुआ पहलू भी है, जरा उस पर गौर करें। वस्तुत: प्रशासन भी यह जानता है कि असल सत्ता तो उसमें ही निहित है, जो कि सच भी है। कायदे-कानूनों की बारीक जानकारी उनके पास ही होती है, इस कारण असल में सरकार तो वे ही चलाते हैं। वे इसके प्रति जवाबदेह भी होते हैं। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि कोई ऐसा काम जो कि नियमों के तहत असंभव है, उसके लिए चाहे सत्तारूढ़ दल के नेता कितना ही दबाव बनाएं, वह किसी भी सूरत में करने वाला नहीं है। कारण ये है कि राजनेता तो मौखिक आदेश दे कर बच जाते हैं और कागजी कार्यवाही पर प्रशासनिक तंत्र के ही हस्ताक्षर होते हैं। यदि बाद में कभी गड़बड़ का मामला उजागर होता है तो राजनेता तो बच जाते हैं, जबकि अफसर व बाबू फंस जाते हैं।
ऐसा एक प्रकरण मुझे खयाल में आता है। तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत व सार्वजनिक निर्माण मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी ने मुख्य सड़क से नारेली स्थित ज्ञानोदय तीर्थ के भीतर तक संपर्क सड़क बनाने को कह दिया। भला सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधिकारियों की क्या बिसात कि उसकी अवहेलना करें। उन्होंने सड़क बनवा दी। तत्कालीन विधायक गोविंद सिंह गुर्जर यह मामला विधानसभा में उठाया। जांच हुई तो पता लगा कि नियमों के तहत सड़क गलत बनाई गई है। इस पर शेखावत जी व चतुर्वेदी जी का तो कुछ नहीं बिगड़ा, जिन्होंने कि मौखिक आदेश दिया था, मगर बेचारे विभाग के अभियंता नियम विरुद्ध काम के लिए नोटिस झेलते रहे और वर्षों तक वेतन वृद्धि को रोके जाने का दंड भोगते रहे।
इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि वास्तविक जवाबदेह कौन है और सच में सत्ता किसमें निहित है।
बात अगर कांग्रेसी नेताओं की करें तो यही समझ में आता है कि वे सत्ता भोगते-भोगते इतना सुस्त व आरामतलब हो चुके हैं कि जब विरोध करने की जरूरत है तो उसे करने को तैयार ही नहीं हैं। जनता जाए भाड़ में। और फिर जब उसकी भूमिका भाजपाई ही अदा कर रहे हैं तो वे काहे को अपने शरीर को तकलीफ दें।
लब्बोलुआब, यह आम धारणा सही ही प्रतीत होती है कि कांग्रेसियों को केवल सत्ता चलाना आता है, विरोध करना नहीं, जब कि भाजपाइयों को केवल विरोध करना आता है, सत्ता चलाना नहीं। कांग्रेसियों को पता है कि अफसरों से कैसे काम करवाया जाता है, जबकि भाजपाइयों को केवल हल्ला मचा कर ही अफसरों से काम करवाने की आदत पड़ चुकी है।
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, 2 जुलाई 2014

यानि कि जिला परिषद में अब भी पलाड़ा का दबदबा

भाजपा की सीमा माहेश्वरी के अजमेर जिला प्रमुख निर्वाचित होने के साथ यह सुनिश्चित हो गया है कि जिला परिषद में पूर्व जिला प्रमुख व मौजूदा मसूदा विधायक श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पति युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा का ही दबदबा है।
दरअसल भाजपा में शुरुआती गुटबाजी के बाद हुई मशक्कत के परिणामस्वरूप यह एक दिन पहले ही तय हो गया था कि सीमा माहेश्वरी ही जिला प्रमुख निर्वाचित होंगी। ज्ञातव्य है कि जिला प्रमुख के चुनाव को लेकर भाजपा में तीन धड़े थे। जलदाय मंत्री सांवर लाल जाट सीमा माहेश्वरी को जिला प्रमुख बनाना चाहते थे, मगर अकेले उनके दम पर सीमा का जिला प्रमुख बनना संभव नहीं था। कारण कि भंवर सिंह पलाड़ा चाहते थे पूजा अजमेरा को जिला प्रमुख बनवाया जाए और रावतों के नेता किसी रावत को। ऐसे में जाट के इशारे पर सीमा माहेश्वरी के पति दिनेश तोतला पलाड़ा की शरण में चले गए। पलाड़ा की एक ही शर्त थी उनकी पत्नी श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के तीन साल के कार्यकाल के दौरान जिस प्रकार ईमानदारी के साथ काम हुआ, ठीक वैसा ही आगे भी होता रहे। कहने की जरूरत नहीं है कि पलाड़ा की देखरेख में ही जिला परिषद प्रशासन ने पूरी मेहनत से काम किया, जिसकी तारीफ पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने भी की। यहां तक कि अजमेर जिला परिषद को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मानित किया गया। खैर, तोतला ने जब पलाड़ा को विश्वास दिलाया कि वे उनके कहे अनुसार ही चलेंगे और जिला परिषद की गरिमा गिरने नहीं दी जाएगी। इस पर पलाड़ा ने सीमा माहेश्वरी को आशीर्वाद दे दिया। उधर रावतों को यह कह कर मनाया गया कि उप जिला प्रमुख रावत और दो विधायकों भी रावत होने के कारण जिला प्रमुख पद रावत को नहीं दिया जा सकता। इस पर रावत नेता मान गए। जब निचले स्तर पर सुलह हो गई तो भाजपा विधायक सुशील कंवर पलाड़ा, भागीरथ चौधरी, शंकर सिंह रावत, शत्रुघ्न गौतम व सुरेश रावत और देहात अध्यक्ष प्रो. भगवती प्रसाद सारस्वत ने भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी से जयपुर में मुलाकात की व कार्यवाहक जिला प्रमुख सीमा माहेश्वरी को ही अगले जिला प्रमुख के रूप में पार्टी प्रत्याशी घोषित करने का आग्रह किया, जिसे परनामी ने मान लिया।
बहरहाल, कुल मिला कर कहानी ये है कि अगर पलाड़ा राजी नहीं होते तो सीमा किसी भी सूरत में जिला प्रमुख नहीं बन सकती थीं। इसका ये भी अर्थ निकलता है कि सुशील कंवर के विधायक बनने के बाद भी जिला परिषद में उनकी व उनके पति भंवर सिंह पलाड़ा की ही चलेगी।