शनिवार, 9 अगस्त 2014

कवि गौड़ की पहल पर अजमेर में होगा साहित्कारों का समागम

अजमेर। अगले माह यहां साहित्यकारों का विशाल संगम होगा। संभवत: इस प्रकार का समागम अजमेर के इतिहास में पहली बार हो रहा है। अजमेर लिटरेचर फेस्टीवल-2014 के नाम से हो रहा यह आयोजन माखूपुरा-परबतपुरा बाइपास स्थित बिड़ला सिटी वाटर पार्क में 4 से 6 सितंबर तक होगा। अजमेर लिटरेरी सोसायटी की ओर से आयोजित इस फेस्टीवल में देश-विदेश से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, पत्रकार, लेखक, समाजसेवी और बुद्धिजीवी शिरकत करेंगे। बेशक इस आयोजन से अजमेर के साहित्कारों को बहुत कुछ सीखने-समझने का मौका मिलेगा और साहित्य के क्षेत्र में अजमेर का नाम भी चमकेगा।
संस्था के मीडिया प्रभारी गजेंद्र बोहरा ने बताया कि समारोह का उद्घाटन फिल्म निदेशक पदमश्री मुजफ्फर अली करेंगे। फेस्टीवल में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश दलवीर भंडारी, राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के प्रेम भंडारी, फिल्मकार मीरा अली सहित विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान भाग लेंगे। संयोजक रासबिहारी गौड़ ने बताया कि ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह, हिंदी की वरिष्ठ कथाकार मृदुला गर्ग, वरिष्ठ आलोचक कवि अशोक वाजपेयी, जनसत्ता के प्रधान संपादक साहित्यकार ओम थानवी, मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त अरुणा रॉय, वरिष्ठ राजनीतिक चिंतक पुरुषोतम अग्रवाल, हाईकोर्ट के पूर्व जज शिव कुमार शर्मा, दूरदर्शन के पूर्व निदेशक नंद भारद्वाज, उपनिदेशक कृष्ण कलपित, वरिष्ठ कवि शीन काफ निजाम और आलोक श्रीवास्तव सहित 50 से अधिक विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभागी समारोह में भाग लेंगे।
बोहरा ने बताया कि लिटरेचर फेस्टीवल की खास बात यह होगी कि इसके हर सत्र को अजमेर की कला, साहित्य और संस्कृति से जोड़ कर एक नया रूप दिया जाएगा। फेस्टीवल में प्रवेश के लिए पंजीयन अजमेर लिटरेरी सोसायटी की वेबसाइट www.ajmerlit.org पर कराया जा सकता है।
सोसायटी सदस्य सोमरत्न आर्य ने बताया कि इस त्रिदिवसीय समारोह में विभिन्न विषयों पर दो दर्जन से अधिक सत्र रखे गए हैं। आगाजे गुफ्तगू, सूफीमद प्रेमतत्व, राजस्थान लोक की चुनौतियां, खबरें-उत्पाद पाठक-उपभोक्ता, साहित्य में संप्रेषण, स्त्री तुम कौन हो, सच बोलने के खतरे, अच्छे दिनों की राजनीति, सोशल मीडिया की सामाजिकता और अहिंसक आंदोलन के नैतिक मूल्य सहित अन्य ज्वलंत विषयों पर विमर्श होंगे। संस्था के संयोजक प्रसिद्ध हास्य कवि, लॉफ्टर चैलेंज फेम रासबिहारी गौड़ हैं, जिनकी पहल पर ही यह आयोजन हो रहा है। देशभर में फैले अपने संपर्कों के जरिए वे इसे सफल बनाने में जुट गए हैं। ज्ञातव्य है कि इससे पहले वे अजमेर में जस्ट हास्यम जैसे बड़े और शानदार आयोजनों में अपनी अहम भूमिका निभा चुके हैं।

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

लखावत के प्राधिकरण अध्यक्ष बनने के साथ ही अनिता का चांस कम हो गया था

एक पार्षद पद से राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाली श्रीमती अनिता भदेल के भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष बनने के साथ ही उनका कद काफी बढ़ गया है। संगठन में अब वे अहम भूमिका में आ गई हैं। हालांकि इससे पहले वे प्रदेश सचिव भी रही हैं, मगर उपाध्यक्ष पद पर पहुंचने के साथ ही उनका कद प्रदेश स्तरीय नेताओं में शुमार हो गया है। इसकी वजह न केवल उनका लगातार तीन बार विधायक बनना है, अपितु सदैव सक्रिय रहना भी है। हां, इतना जरूर है कि एक ओर जहां मंत्रीमंडल का विस्तार होने को है और उनके भी मंत्री बनने की संभावना है, यकायक प्रदेश उपाध्यक्ष बनाए जाने के साथ वह कम हो गई है। हालांकि राजनीति में कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता, मगर फिलवक्त ऐसा प्रतीत होता है कि शायद अब उनको चांस न मिले।
असल में उनका चांस तभी कुछ कम हो गया था, जब कि वरिष्ठ भाजपा नेता औंकार सिंह लखावत को राजस्थान धरोहर प्रोन्नति प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया, जो कि राज्य मंत्री के समकक्ष है। चूंकि अजमेर में मुख्य रूप से पार्टी लखावत व विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी गुट में बंटी हुई है, इस कारण तभी लग रहा था कि गुटों में संतुलन बनाए रखने के लिए अनिता भदेल की बजाय देवनानी का चांस लग सकता है। वैसे भी एक व्यक्ति एक पद की नीति के नाते अनिता का चांस अब कम हो गया है, हालांकि जब तब देवनानी मंत्री न बन जाएं, तब तक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। ऐन वक्त पर क्या गणित बनता है, कुछ कहा नहीं जा सकता। हालांकि जानकार सूत्रों का कहना है कि देवनानी का मंत्री बनना तय सा है, मगर चूंकि सिंधी समाज से श्रीचंद कृपलानी व ज्ञानदेव आहूजा भी विधायक बन कर आए हैं, इस कारण मुख्यमंत्री वसुंधरा के पास विकल्प हैं। मगर चूंकि अनिता को संगठन में ले लिया गया है और अजमेर में देवनानी के अतिरिक्त कोई प्रबल दावेदार नहीं है, इस कारण कम से कम आधी बाधा तो उनकी दूर हो गई है। वैसे जानकारी ये भी है कि किशनगढ़ विधायक भागीरथ चौधरी, मसूदा विधायक श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा व केकड़ी विधायक शत्रुघ्न गौतम भी मंत्री बनने के लिए एडी चोटी का जोर लगा रहे हैं। एक फार्मूला ये भी हो सकता है कि इनमें से किसी को मंत्री बना कर अजमेर का कोटा पूरा कर दिया जाए और देवनानी की जगह कृपलानी या आहूजा को मंत्रीमंडल में ले लिया जाए। ये एक कयास मात्र है, संभावना देवनानी के ही मंत्री बनने की है, क्योंकि उनके लिए आरएसएस ने पूरा जोर लगा रखा है। उनकी गिनती संघ लॉबी के प्रमुख कर्ता-धर्ताओं में होती है। इस कारण शायद उनको नजरअंदाज किया जाना वसुंधरा के लिए कुछ कठिन होगा। इसे दूसरे रूप में यूं कहा जा रहा है कि देवनानी संगठन में नहीं लिए गए हैं, अर्थात यह उनका मंत्रिमंडल में स्थान पक्का होने का संकेत है। बहरहाल, देखते क्या होता है, जल्द सामने आ जाएगा।

बुधवार, 6 अगस्त 2014

क्या सारस्वत की किस्मत में केवल सेवा ही लिखी है?

भाजपा की सरकार आने के बाद जैसा कि लग रहा था कि प्रो. बी. पी. सारस्वत को उनकी सेवा का लाभ मिलेगा और वे अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष अथवा किसी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर बनाए जाएंगे, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी किस्मत में केवल सेवा ही लिखी है।
पिछले से पिछले तीन विधानसभा चुनावों में वे ब्यावर सीट के दावेदार रहे, जबकि पिछले चुनाव में तो अजमेर उत्तर अथवा केकड़ी से प्रबल दावेदार थे, मगर उन्हें मौका नहीं मिला। पार्टी ने उनकी सेवाएं देहात जिला इकाई में लीं। बेशक देहात जिले की छहों सीटों पर पार्टी की जीत में मोदी लहर और वसुंधरा इफैक्ट की भूमिका रही, मगर सांगठनिक लिहाज से उनकी कार्यशैली को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। जिले में पूरी निष्पक्षता के साथ शानदार सदस्यता अभियान चलाने का श्रेय भी उनके ही खाते में दर्ज है। पार्टी की इतनी सेवा के बाद अब लग रहा था कि इस बार तो जरूर उन्हें किसी लाभ के पद से नवाजा जाएगा, मगर देहात जिले की फिर से जिम्मेदारी देने के साथ फिलवक्त तो उसकी संभावना कम हो गई है।
आपको बता दें कि महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में सेंटर फोर एन्थे्रप्रिनियरशिप एंड स्माल बिजनिस मैनेजमेंट के आठ वर्ष तक डायरेक्टर रहे प्रो. बी. पी. सारस्वत उच्च शिक्षा जगत के साथ राजनीति में भी एक जाना-पहचाना नाम है। वे मूल्य आधारित विचारधारा के पोषक हैं और मूल्यों की रक्षा के कारण ही वर्तमान उठापटक की राजनीति में अप्रासंगिक से नजर आते हैं। नैतिक मूल्यों की रक्षा की खातिर ही उन्होंने भाजपा के शिक्षा प्रकोष्ठ के प्रदेशाध्यक्ष पद को त्याग दिया, हालांकि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया। उन्हें कुशल संगठक के अतिरिक्त प्रखर वक्ता, सशक्त नेता व स्पष्ट वक्ता के रूप में जाना जाता है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद व विश्व हिंदू परिषद में सक्रिय रहे हैं। पिछली अशोक गहलोत सरकार के दौरान विहिप नेता श्री प्रवीण भाई तोगडिय़ा के त्रिशूल दीक्षा कार्यक्रम के दौरान उनको सहयोग करने वालों में प्रमुख होने के कारण उनके खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ था।
उनका जन्म जिले के छोटे से गांव ब्रिक्चियावास में सन् 1960 में हुआ। विद्यार्थी काल से ही वे संघ और विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए। वे सन् 1981 से 86 तक परिषद के विभाग प्रमुख रहे। वे सन् 1992 से 95 तक संघ के ब्यावर नगर कार्यवाह रहे। वे सन् 1997 से 2004 तक विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री रहे हैं। वे सन् 1986 से 97 तक राजस्थान यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अनेक पदों पर और 2001 से 2003 तक अजमेर यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं। काम के प्रति निष्ठा की वजह ही उन्हें विश्वविद्यालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जाती रही हैं। वे चीन, सिंगापुर, श्रीलंका व पाकिस्तान आदि देशों की यात्रा कर चुके हैं।

यादव को मिला यादव का आशीर्वाद

शहर भाजपा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व प्रवक्ता अरविंद यादव को सांसद भूपेन्द्र यादव से नजदीकी का फायदा मिल ही गया। हालांकि पार्टी को उनकी सेवाएं भी अहम रही हैं, जिसे कम कर के नहीं आंका जा सकता, मगर माना यही जा रहा है कि भूपेन्द्र यादव ने अपनी जाजम जमाने के लिए उनके नाम पर मुहर लगवाई और वे शहर अध्यक्ष बन गए।
असल में अब तक उन्हें कोई भी गंभीर दावेदार नहीं मान रहा था। हालांकि उनका नाम भी दावेदारों में गिना जाता था, मगर औपचरिकता के नाते। यकायक वे इस पद पर पहुंच जाएंगे, इसका अनुमान किसी को नहीं था। कदाचित उन्होंने भी कोई खास पहल न की हो, क्योंकि उनकी बॉडी लेंग्वेज से कभी ये नहीं लगा कि वे कोई बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं। अब तक उन्होंने लो प्रोफाइल हो कर ही काम किया है। यही उनकी विशेषता है। किसी भी गुट से संलिप्तता न रखने, सदैव कूल मांइड रहने और केवल पार्टी की सेवा करते रहने के गुण ने ही आज उन्हें इस मुकाम पर पहुंचाया है। ज्ञातव्य है कि यादव को औंकार सिंह लखावत व प्रो. वासुदेव देवनानी के गुटों में बंटी भाजपा में कभी किसी एक गुट के साथ नहीं देखा गया। सबके साथ समान व्यवहार किया। अलबत्ता उन्हें पूर्व राज्य मंत्री श्रीकिशन सोनगरा का नजदीकी जरूर गिना जाता था।
भारतीय जनता युवा मार्चो के शहर अध्यक्ष से लेकर मातृ संगठन में कई पदों पर रहते हुए आज वे उस मुकाम पर आ गए हैं, जहां पर उन्हें शहर की भाजपा की कमान संभालनी है। समझा जाता है कि उनमें युवा जोश है और निर्गुट होने के कारण एक संतुलित कार्यकारिणी बनाने में कामयाब होंगे, जो कि सबको स्वीकार्य होगी। बाकी एक बात जरूर है कि संगठन के लिहाज से अब सांसद भूपेन्द्र यादव का दौर शुरू हो गया है।
जहां तक अरविंद यादव की पारिवारिक पृष्ठभूमि का सवाल है उनके पिता स्वर्गीय जगन्नाथ यादव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महानगर संघ चालक भी रहे हैं। उन्हीं के संस्कारों का प्रतिफल है कि वे सदैव एक सच्चे कार्यकर्ता की तरह ही काम करते रहे हैं। इसका साक्षात उदाहरण ये है कि वरिष्ठ उपाध्यक्ष होने के बाद भी प्रवक्ता जैसा छोटा जिम्मा लेकर वे रोज पार्टी की ओर से विज्ञप्ति जारी करते रहे। समझा जा सकता है कि रोज विज्ञप्ति जारी करना कितना श्रमसाध्य है। हालांकि इसमें भी कोई दोराय नहीं कि इस काम में उनका सहयोग देकर प्रचार मंत्री कंवल प्रकाश किशनानी ने अहम भूमिका निभाई है। दरअसल में प्रेस विज्ञप्ति व फोटो आदि के लिए पार्टी में पहली बार कंप्यूटर व इंटरनेट का उपयोग करने का श्रेय किशनानी को ही है। उनके पास इससे संबंधित सभी संसाधन है, जिसका पार्टी को भरपूर लाभ मिला है।

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

कांग्रेस आईटी सोशल मीडिया सेल ने मचा रखी है धूम

राज्य और केन्द्र में केन्द्र में बुरी तरह से पराजित कांग्रेस के कुछ नए चेहरों ने सोशल मीडिया पर धूम मचा रखी है। शहर कांग्रेस आईटी सोशल मीडिया सेल के अनुपम शर्मा व नील शर्मा फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप इत्यादि सोशल मीडिया पर छाये हुए हैं। वे केन्द्र की मोदी सरकार और राज्य की वसुंधरा सरकार की एक भी त्रुटि को नहीं बख्शते। रोज कुछ नई पोस्ट ला कर हमले बोल रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि उनकी पोस्ट ऐसी होती हैं जैसे कोई प्रोफेशनल बना रहा हो।
कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्य कांग्रेस संगठन व अन्य अग्रिम संगठन जितने सक्रिय नहीं, उससे कहीं अधिक वे सक्रिय हैं। कांग्रेस संगठन कभी सोता तो कभी जागता रहता है, मगर एक समय वह भी याद आता है, जबकि ब्लैकमेल कांड के कारण बदनाम होने के बाद युवक कांग्रेस निष्क्रिय हो गया था, जबकि कांग्रेस सेवादल अत्यधिक सक्रिय था। शैलेन्द्र अग्रवाल के नेतृत्व में सेवादल आए दिन धरना-प्रदर्शन करता और शहर कांग्रेस के पदाधिकारी उसमें आमंत्रितों के रूप में भाग लिया करते थे। अब उसी तरह की जिम्मेदारी आईटी सेल ने संभाल रखी है।
सेल के पदाधिकारियों व वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रताप यादव, शैलेष गुप्ता आदि ने वाट्स एप पर ग्रुप बना रखे हैं और दिनभर उन पर भाजपा की बखिया उधेड़ी जाती है। उनकी सक्रियता को देख कर लगता है कि अगर यही सक्रियता चुनाव से पहले होती तो कदाचित कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं होती। मजे की बात ये है कि चुनाव के दौरान भाजपा का आईटी सेल बेहद सक्रिय था और लगातार कांग्रेस पर हमले करता था, मगर सत्ता में आने के बाद वह शांत हो कर बैठा है।