रविवार, 31 अगस्त 2014

एक ओर सरकार की ताकत तो दूसरी ओर पायलट की प्रतिष्ठा

नसीराबाद विधानसभा उपचुनाव में एक ओर सत्तारूढ़ भाजपा ने पूरी ताकत झोंक रखी है तो दूसरी ओर अपने संसदीय क्षेत्र की विधानसभा सीट होने के कारण नसीराबाद के उपचुनाव में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की प्रतिष्ठा दाव पर लगी है। चूंकि टक्कर बराबरी की है और मामूली चूक भी पराजय का कारण बन सकती है, इस कारण दोनों दल कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहते। भाजपा ने अपने तीन मंत्री व बीस विधायक चप्पे-चप्पे पर बिखेर दिए हैं तो पायलट ने खुद विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित कर रखा है।
हालांकि नामांकन वापस लेने की तिथि से पहले तक ऐसा लग रहा था कि दोनों दलों के प्रत्याशियों को निर्दलीय कुछ नुकसान पहुंचा सकते हैं, मगर अब तस्वीर साफ है और मुकाबला आमने-सामने का है। असल में जैसे ही निर्दलीय प्रत्याशी कालूराम चौधरी के नाम वापस लिया, भाजपा प्रत्याशी सरिता गैना ने राहत की सांस ली। हालांकि भारतीय आम जन पार्टी के विजय सिंह रावत अभी मैदान में हैं, जो कुछ नुकसान पहुंचा सकते हैं, मगर भाजपा पूरी तरह से तैयार है। जानकारी के अनुसार चौधरी जल संसाधन मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट के करीबी माने जाते हैं, इस कारण बाद में कहीं हार का ठीकरा उन पर न फूटे, उन्होंने हरसंभव कोशिश कर चौधरी को बैठा दिया। उधर जागो पार्टी के प्रत्याशी इदरीस के दुर्घटना में निधन होने के बाद कांग्रेस ने राहत महसूस की है। जाहिर तौर पर वे मुस्लिम वोट बैंक में सेंध मार सकते थे। कुल मिला कर मुकाबला अब सीधे तौर पर गुर्जर और जाट के बीच है। कांग्रेस प्रत्याशी रामनारायण गुर्जर को अपनी जाति के अतिरिक्त मुस्लिम व अनूसूचित जाति का भरोसा है तो भाजपा प्रत्याशी सरिता गेना को जाटों के अतिरिक्त परंपरागत रूप से भाजपा के साथ रहे रावतों पर आसरा है।
नसीराबाद विधानसभा सीट का उपचुनाव इस कारण भी दिलचस्प है क्योंकि लंबे अरसे बाद यहां पहली बार यहां दो नए प्रत्याशी आमने-सामने हैं। हालांकि उन्हें फ्रेश तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कांग्रेस के रामनारायण गुर्जर प्रधान हैं तो भाजपा की सरिता गेना पूर्व जिला प्रमुख रह चुकी हैं, मगर दोनों पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।

इस सीट का मिजाज:-
अजमेर जिले की नसीराबाद विधानसभा सीट पर पूर्व में गुर्जर व रावतों का वर्चस्व रहा है। स्वर्गीय बाबा गोविंद सिंह गुर्जर 1980 से 2003 तक लगातार छह बार जीते। बाबा के सामने लगातार तीन बार रावत समाज के मदन सिंह रावत खड़े किए गए, मगर जीत उनकी किस्मत में थी ही नहीं, हालांकि मुकाबला हर बार कड़ा ही होता था। परिसीमन के तहत पुष्कर व भिनाय विधानसभा क्षेत्र के कुछ हिस्सों को शामिल किए जाने के कारण यहां का जातीय समीकरण बदल गया। तकरीबन 25 हजार जाट मतदाताओं के मद्देनजर 2008 में पूर्व जलदाय मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट को उतारा गया, मगर वे बाबा गोविंद सिंह गुर्जर के राजनीतिक उत्तराधिकारी श्रीनगर पंचायत समिति के पूर्व प्रधान महेन्द्र सिंह गुर्जर से महज 71 वोटों से हार गए। इसके बाद दिसम्बर 13 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रो. जाट पर फिर दाव खेला, जो कि कामयाब हो गया। उन्होंने पूर्व विधायक महेन्द्र सिंह गुर्जर को  28 हजार 900 मतों से पराजित किया। सांवर लाल को 84 हजार 953 मत मिले, जबकि महेन्द्र सिंह गुर्जर को 56 हजार 53 मत। हालांकि उसमें कांग्रेस विरोधी लहर की ही अहम भूमिका थी।
वस्तुत: नसीराबाद यों तो एससी बहुल इलाका है, लेकिन किसी एक जाति की बात करें तो गुर्जर सबसे ज्यादा हैं। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक नसीराबाद में एससी के करीब 45 हजार, गुर्जर करीब 30 हजार, जाट करीब 25 हजार, मुसलमान करीब 15 हजार, वैश्य करीब 15 हजार, रावत करीब 17 हजार हैं। इनके अलावा ब्राह्मण, यादव मतदाता भी हैं। परंपरागत मतों के हिसाब से जोड़ कर देखें तो गुर्जर, एससी, मुसलमान कांग्रेस का वोट बैंक 90 हजार से अधिक हो जाता है। क्षेत्र में प्रत्याशी के जातिगत मतों और परंपरागत मतों को जोड़कर देखें तो भाजपा का वोट बैंक भी करीब 90 हजार के लगभग हो जाता है। शेष मतों को लेकर दोनों दलों में कांटे का मुकाबला होता है।

भाजपा उत्साहित, मगर कांग्रेस भी हतोत्साहित नहीं
आसन्न उपचुनाव की बात करें तो भले ही केन्द्र व राज्य में भाजपा को मिली प्रचंड जीत के कारण भाजपा उत्साहित है, मगर मुकाबला कांटे का ही रहने की संभावना है, क्योंकि कांग्रेसी भी हतोत्साहित नहीं हैं। इसकी कुछ वजुआत हैं। हाल ही हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा व कांग्रेस का मतांतर आश्चर्यजनक रूप से कम हो गया। हालांकि पूरे संसदीय क्षेत्र में जाट को 1 लाख 71 हजार 983 की लीड मिली, लेकिन नसीराबाद में लीड घट कर 10 हजार 999 मतों पर सिमट गई। प्रचंड मोदी लहर के बाद भी लीड कम होना रेखांकित करने लायक तथ्य है। यानि कि उपचुनाव में लहर की तीव्रता बरकरार न रही तो कांग्रेस व भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला संभव है। कांग्रेसी इस कारण भी कुछ उत्साहित हैं केन्द्र व राज्य की भाजपा सरकार का चंद माह का परफोरमेंस कुछ खास नहीं रहा, विशेष रूप से महंगाई पर काबू न कर पाने की वजह से आम आदमी की अच्छे दिन आने की उम्मीद पर पानी फिरा है। इसके अतिरिक्त गुर्जरों में बाबा की इस सीट फिर हथियाने का जोश नजर आ रहा है। यह सीट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के लिए प्रतिष्ठा की मानी जाती है, क्योंकि ये उनके संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आती है और गुर्जर बहुल है। जहां तक प्रत्याशियों के स्वयं के परफोरमेंस का सवाल है, दोनों की ही छवि साफ-सुथरी है। दोनों पर कोई भी बड़ा राजनीतिक आरोप नहीं है, जिसका चुनाव पर असर पड़ता हो।
गुर्जर की बात करें तो उन्हें स्वाभाविक रूप से बाबा के उत्तराधिकार के साथ सहज-सरल स्वभाव का लाभ मिलेगा। उन्हें बाबा के साथ लंबे समय तक राजनीतिक यात्रा करने का अनुभव है, साथ ही कांग्रेस संगठन के अतिरिक्त श्रीनगर पंचायत समिति के प्रधान के रूप में काम करने का भी अनुभव है। श्रीनगर प्रधान के चुनाव में भाजपा के सदस्य अधिक होने के बावजूद वे प्रधान बनने में कामयाब रहे। वैश्य समाज में उनकी पैठ है, ऐसे में वैश्य समाज को वे साथ ले सकते हैं। नसीराबाद के निवासी होने के कारण मतदाताओं को सहज उपलब्धता भी उनके पक्ष में है।
नसीराबाद इलाके में बाऊजी के नाम से सुपरिचित रामनारायण गुर्जर का जन्म 15 अगस्त 1946 को नसीराबाद के सुत्तरखाना मोहल्ले में श्री गोगराज गुर्जर के आंगन में हुआ। मैट्रिक तक शिक्षा अर्जित करने के बाद वे ट्रांसपोर्ट कंपनी में मैनेजर रहे। वे 1988 में नसीराबाद नगर कांग्रेस अध्यक्ष बने और 1992 तथा 2000 में जिला देहात कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे। वे 1995 तथा 2005 में जिला परिषद सदस्य रहे। इसके 2010 में श्रीनगर पंचायत समिति सदस्य बने और 10 फरवरी 2010 को कांग्रेस के 8 और भाजपा के 11 सदस्य होने के बावजूद श्रीनगर पंचायत समिति के प्रधान बन कर अपने राजनीतिक कौशल का परिचय दिया।
बात भाजपा की सरिता गेना की करें तो उन्हें जाट मतों की लामबंदी के साथ स्वच्छ छवि की महिला होने का लाभ मिल सकता है। केन्द्र व राज्य में भाजपा के सत्ता में होने का स्वाभाविक लाभ भी उन्हें मिलेगा। एकाएक कोई भीतरघात नहीं कर सकता। जलदाय मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल है, इस कारण उन पर पूरा दबाव रहेगा कि वे ही मोर्चा संभालें, मगर सीट छोड़ कर लोकसभा चुनाव लडऩे, केन्द्र में मंत्री न बन पाने की आशंका और बेटे को टिकट नहीं दिए जाने से जरा भी बेरुखी रही तो सरिता के लिए मुश्किल हो सकती है। एक ओर जहां जिला प्रमुख रह चुकने के कारण नसीराबाद में भी संपर्क का वे लाभ लेंगी, वहीं गुर्जर की तुलना में स्थानीय संपर्कों का अभाव कुछ दिक्कत पेश आ सकती है। वैसे एक बात है, वे हैं लक्की। आपको याद होगा कि वे जिला प्रमुख सौभाग्य से ही बनी थीं। उन्हें जिला परिषद का टिकट भाग्य से ही मिला। टिकट पहले किशनगढ़ विधायक भागीरथ चौधरी की पुत्री सरिता को मिलना था, लेकिन खुद विधायक ने रुचि नहीं ली, इस कारण ऐन वक्त पर उनकी ही जेठानी सरिता गैना का भाग्य जाग गया। वे चुनाव जीत कर जिला प्रमुख भी बनी। विधानसभा चुनाव के टिकट के लिए उन्होंने कोई खास मेहनत नहीं की, मगर समीकरण ऐसे बने कि उनकी चेत गई। किस्मत का वास्तविक चेतना उनके जीतने के बाद ही तय होगा। उनका व्यक्ति परिचय इस एक पंक्ति से जुड़ा है:- राजनीति में कदम रखते ही सफलता का शिखर छूने वालों में श्रीमती सरिता गेना नाम शुमार है। वे सन् 2005 में भारतीय जनता पार्टी से जुड़ीं और जिला प्रमुख पद का चुनाव जीता। श्री जी. एल. परोदा के घर 26 फरवरी 1977 को जन्मी श्रीमती गेना ने एम.ए. तक शिक्षा अर्जित की है।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

आखिरी विकल्प के रूप में मिला सरिता को टिकट

नसीराबाद विधानसभा उप चुनाव के लिए भाजपा ने पूर्व जिला प्रमुख सरिता गेना को आखिरी विकल्प के रूप में टिकट दिया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगता है कि उन्होंने टिकट के लिए कोई खास मशक्कत नहीं की। मात्र और मात्र जाट व महिला होने के नाते वे टिकट लेने में कामयाब हो गई।
दरअसल भाजपा की यह मजबूरी थी कि वह यहां से किसी जाट को प्रत्याशी बनाती। हालांकि पूर्व में लंबे समय तक, अर्थात लगातार तीन बार रावत प्रत्याशी के रूप में मदन सिंह को स्वर्गीय बाबा गोविंद सिंह गुर्जर के सामने खड़ा किया जाता रहा। ये बात दीगर है कि वे एक बार भी जीत नहीं पाए, मगर टक्कर कांटे की ही होती थी। परिसीमन के तहत पुष्कर व भिनाय विधानसभा क्षेत्र के कुछ हिस्सों को शामिल किए जाने के कारण यहां का जातीय समीकरण बदल गया। तकरीबन 25 हजार जाट मतदाताओं के मद्देनजर पूर्व जलदाय मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट को उतारा गया, मगर महज 71 वोटों से हार गए। यानि की कांटे की टक्कर रही। दिसम्बर 13 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जाट पर फिर दाव खेला, जो कि कामयाब हो गया। हालांकि उसमें कांग्रेस विरोधी लहर की ही अहम भूमिका थी। वे जब लोकसभा चुनाव लड़ कर सांसद बन गए तो यह सीट खाली हो गई और उनकी कोशिश तो यही थी कि उनके पुत्र रामस्वरूप लांबा को टिकट मिल जाए, मगर मौजूदा सांसदों के रिश्तेदारों को टिकट नहीं दिए जाने के पार्टी के फैसले की वजह से ऐसा हो नहीं पाया। हालांकि रावत समाज की इच्छा थी कि इस बार फिर उन्हें मौका दिया जाए, मगर जिले में पहले से ही दो रावत विधायक होने के कारण यह संभव नहीं था। भाजपा हाई कमान पहले ही तय कर चुका था कि किसी जाट को ही टिकट दिया जाएगा। एक मात्र कारण ये था कि पूर्व मंत्री दिगम्बर सिंह का नाम भी चला, मगर स्थानीयतावाद के आगे पार्टी को झुकना पड़ा। वैश्य समाज से पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा व ब्राह्मण समाज से देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी. पी. सारस्वत ने भी टिकट मांगा, मगर उस पर गौर नहीं किया गया।
जाट समाज को टिकट देने की वजह स्पष्ट है कि प्रो. जाट के सीट खाली करने के बाद जाट समाज यह बर्दाश्त कर सकता था कि किसी और समाज को टिकट दिया जाता। अगर गलती से भाजपा कोई नया प्रयोग करती तो उसे जाट समाज झटका भी दे सकता था। खैर, अब सवाल आया कि किस जाट नेता को टिकट दिया जाए। पक्के कांग्रेसी रहे अजमेर डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी ने लोकसभा चुनाव में खुल कर भाजपा का साथ दिया था, इस कारण उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी इनाम देगी, मगर बताया जाता है कि संघ ने उनका विरोध कर दिया। ऐसे में आखिरी विकल्प के रूप में सरिता गेना का नाम तय किया गया, जो कि पूर्व में जिला प्रमुख रह चुकी हैं। एक तरह से देखा जाए तो सरिता के लिए यह एक लाटरी के टिकट की तरह है। अब ये लॉटरी खुलती है या नहीं ये तो वक्त ही बताएगा।
अजमेर जिले में जिला प्रमुख बनने के बाद विधानसभा का टिकट पाने वाली सरिता गैना दूसरी महिला बन गई हैं। इससे पहले पूर्व जिला प्रमुख सुशील कंवर पलाड़ा को मसूदा से भाजपा ने टिकट दिया और वह विधायक बनी। उन्होंने उस धारणा को भंग कर दिया कि जो नेता एक बार जिला प्रमुख बन गया, उसके राजनीतिक भविष्य पर पूर्व विराम लग जाता है। बहरहाल, भाजपा ने सरिता पर दाव खेल दिया है, अब देखना ये है कि वह कितना कामयाब होता है।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, 23 अगस्त 2014

बाबा के उत्तराधिकार व सहज-सरल स्वभाव का लाभ मिलेगा रामनारायण गुर्जर को

हालांकि नसीराबाद विधानसभा उपचुनाव में भाजपा का प्रत्याशी घोषित होने के बाद ही यह कहा जा सकेगा कि भिड़ंत कैसी रहेगी, मगर कांग्रेस प्रत्याशी रामनारायण गुर्जर को पुड्डुचेरी के पूर्व उपराज्यपाल बाबा गोविंद सिंह गुर्जर की विरासत और खुद के सहज-सरल स्वभाव का लाभ जरूर मिलेगा। बाबा के दो अन्य उत्तराधिकारियों पूर्व विधायक महेन्द्र सिंह गुर्जर व सुनिल गुर्जर की तुलना में वे बेशक बेहतर उम्मीदवार माने जा रहे हैं। कुद शिकायतों के कारण पूर्व विधायक महेन्द्र सिंह गुर्जर की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट से ट्यूनिंग गड़बड़ हो चुकी थी, कदाचित इस कारण वे टिकट से वंचित रह गए, जबकि इस प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव के लिहाज से सुनिल गुर्जर की अनुभवहीनता टिकट में आड़े आ गई।
जहां तक रामनारायण गुर्जर का सवाल है, उन्हें बाबा के साथ लंबे समय तक राजनीतिक यात्रा करने का अनुभव है, साथ ही कांग्रेस संगठन के अतिरिक्त श्रीनगर पंचायत समिति के प्रधान के रूप में काम करने का भी अनुभव है। इससे भी बड़ी बात ये है कि उनकी छवि साफ सुथरी है और सहज-सरल स्वभाव के कारण लोकप्रिय हैं। जो कुछ भी हो, मगर कांग्रेस की ओर से यह सीट बाबा की विरासत के रूप में ही काउंट हो गई है। ज्ञातव्य है कि बाबा गोविंद सिंह गुर्जर इस सीट पर 1980 से 2003 तक लगातार छह बार विजयी रहे। उनके निधन के बाद 2008 में महेन्द्र सिंह गुर्जर विजयी हुए। उन्होंने पूर्व मंत्री सांवरलाल जाट को मामूली अंतर से हराया। इसके 2013 के चुनाव में मोदी लहर के चलते जाट ने यह सीट हथिया ली।
यहां आपको बता दे कि हालांकि कुछ और गुर्जर नेताओं ने भी दावेदारी की थी, मगर उनका कद इतना बड़ा नहीं था कि उन पर दाव खेला जा सके। चाहते तो स्वयं सचिन पायलट या उनकी माताश्री रमा पायलट भी चुनाव मैदान में उतर सकती थीं, मगर उन्होंने अपने आप को रोक लिया।
आइये, जरा रामनारायण गुर्जर के बारे में भी कुछ जान लें:-
नसीराबाद इलाके में बाऊजी के नाम से सुपरिचित रामनारायण गुर्जर का जन्म 15 अगस्त 1946 को नसीराबाद के सुत्तरखाना मोहल्ले में श्री गोगराज गुर्जर के आंगन में हुआ। मैट्रिक तक शिक्षा अर्जित करने के बाद वे ट्रांसपोर्ट कंपनी में मैनेजर रहे। वे 1988 में नसीराबाद नगर कांग्रेस अध्यक्ष बने और 1992 तथा 2000 में जिला देहात कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे। वे 1995 तथा 2005 में जिला परिषद सदस्य रहे। इसके 2010 में श्रीनगर पंचायत समिति सदस्य बने और 10 फरवरी 2010 को कांग्रेस के 8 और भाजपा के 11 सदस्य होने के बावजूद श्रीनगर पंचायत समिति के प्रधान बन कर अपने राजनीतिक कौशल का परिचय दिया।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

यानि रमा का नाम चार दावेदारों की रणनीति का हिस्सा था

नसीराबाद विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की ओर से जैसे ही अचानक अपेक्षा से पहले रामनारायण गुर्जर का नाम घोषित हुआ है, उससे यह साफ हो गया है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की माताश्री रमा पायलट का नाम कैसे उभर कर आया। अपुन को पहले ही आशंका थी कि पूर्व विधायक महेन्द्र सिंह गुर्जर के साथ तीन और दावेदार हरिसिंह गुर्जर, सौरभ बजाड़ और पार्षद नौरत गुर्जर आए हैं तो या तो ये ऊपर से इशारा है या फिर यह भी एक रणनीति है। रामनारायण गुर्जर का नाम घोषित होने से तो साफ ही हो गया कि रमा का नाम इन चारों दावेदारों की उपज था। वो इसलिए कि  महेन्द्र सिंह गुर्जर को पता लग गया था कि टिकट रामनारायण गुर्जर को मिलने जा रहा है, इस कारण अपने साथ तीन और दावेदारों को जोड़ कर दबाव बनाने की कोशिश की। वे जानते थे कि अन्य तीन को टिकट मिलना नहीं है, क्योंकि उनका कद इतना बड़ा नहीं है, मगर ऐसा करने से प्रदेश आलाकमान दबाव में आ जाएगा। अगर उनको टिकट नहीं भी मिलता है तो कम से कम रामनारायण गुर्जर को नहीं मिले, इस कारण खुद की रमा पायलट का नाम भी सुझा दिया। उनको लगता था कि सचिन अपनी मां के नाम पर तुरंत सहमत हो जाएंगे, मगर सचिन किसी चक्कर में नहीं आए।
ज्ञातव्य है कि रमा पायलट वाली मांग के मामले में रामनारायण गुर्जर व स्वर्गीय बाबा गोविंद सिंह गुर्जर के दत्तक पुत्र सुनील गुर्जर शांत थे। इसी से ऐसा प्रतीत हुआ कि कहीं न कहीं कुछ पेच है।
खैर, अब जबकि नाम घोषित हो गया है तो यह सोचने का विषय होगा कि क्या महेन्द्र सिंह गुर्जर सहित चारों दावेदार उनका पूरा समर्थन करेंगे। आशंका इस कारण उत्पन्न होती है क्योंकि उन्होंने ही एक गुट बना कर दबाव कायम करने की कोशिश की थी।
एक बात और, बेशक कांग्रेस के पास मौजूदा विकल्पों में से रामनारायण गुर्जर ही बेहतर विकल्प हैं, क्योंकि वे बाबा के परिवार से हैं, बुजुर्ग हैं, मगर रमा पायलट से बेहतर नहीं। इसकी वजह ये है कि कांग्रेस यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल बनाने पर ही जीतने की स्थिति में आ सकती है। रामनारायण गुर्जर के मामले में शायद ऐसा न हो। सब दावेदारों को एकजुट करना कुछ कठिन हो सकता है, जबकि रमा के आने पर सचिन के कारण खुद ब खुद दावेदार एक हो जाते। अगर रमा मैदान में उतरतीं तो कांग्रेस शर्तिया टक्कर लेने की स्थिति में होती। फिर भी रामनारायण गुर्जर को कमजोर नहीं माना जा सकता।  वे गुर्जरों को इस नाते एक जुट करने में कामयाब हो सकते हैं कि बाबा की विरासत को फिर से उनके परिवार में लाना है।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

ये रमा पायलट का नाम कहां से आया?

नसीराबाद विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की ओर से यकायक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की माताश्री रमा पायलट का नाम उभर आया है। दिलचस्प बात ये है कि खुद दावेदारों ने ही उनका नाम सुझाया है। हालांकि अब तक ये माना जा रहा था कि विशेष परिस्थिति में स्वयं सचिन भी मैदान में उतर सकते हैं, मगर बताते हैं कि उन्होंने चुनाव न लडऩे की बात कह दी है।
अब जब कि रमा पायलट का नाम आया है तो इसमें दो ही बातें हो सकती हैं। या तो ऊपर से सुझाया गया है कि रमा पायलट का नाम लो और उनको प्रत्याशी बनाने की मांग करो, या फिर ये भी एक रणनीति का हिस्सा है। ज्ञातव्य है कि रमा का नाम सुझाने वाले नेताओं में पूर्व विधायक महेंद्र गुर्जर, हरिसिंह गुर्जर, सौरभ बजाड़ और पार्षद नौरत गुर्जर शामिल हैं, जबकि अन्य प्रबल दावेदार रामनारायण गुर्जर व सुनील गुर्जर इस मामले में शांत हैं।  इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं कुछ पेच है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि रमा की मांग करने वालों में से केवल पूर्व विधायक महेन्द्र सिंह गुर्जर ही प्रबल दावेदार हैं। वजह साफ है कि वे पहले विधायक रहे हैं और बाबा गोविंद सिंह गुर्जर के परिवार से हैं। असल में इस सीट पर दावा ही बाबा के परिवार का है, जिसका कि इलाके पर खासा अच्छा प्रभाव है। यही वजह है कि बीच में किसी ने बाबा की धर्मपत्नी का नाम भी सुझाया था। वैसे बाबा के परिवार से मुख्य रूप से महेन्द्र सिंह गुर्जर, रामनारायण गुर्जर व सुनील गुर्जर के नाम ही आगे हैं। इनमें से कोई भी आगे आए और बाकी के दोनों व अन्य दावेदार पूरा साथ दें तो यह सीट कांटे की टक्कर की बन सकती है।  मगर अब जबकि महेन्द्र सिंह गुर्जर के साथ हरिसिंह, सौरभ व नौरत आए हैं, इससे लगता है कि महेन्द्र सिंह अपनी दावेदारी मजबूत कर रहे हैं। रहा सवाल रमा पायलट का तो यदि प्रदेश अध्यक्ष चाहेंगे तो वे इंकार भी नहीं कर सकते। ऐसे में लगता ये भी है कि उन्हें ये कहा गया हो कि रमा के नाम पर अपनी सहमति दे दो। जो कुछ भी हो, मगर इतना तय है कि अगर रमा मैदान में उतरीं तो यहां कांग्रेस टक्कर लेने की स्थिति में आ जाएगी। वे न केवल खुद राजनीति की खिलाड़ी हैं, अपितु प्रदेश अध्यक्ष के नाते उनके पुत्र का भी साथ होने से मजबूत उम्मीदवार साबित होंगी। भाजपा को भी उनकी ही टक्कर का नेता मैदान में उतारना होगा।
कांग्रेस इस चुनाव को लेकर विशेष उत्साहित है। इसी कारण अब तक टिकट के लिए प्रतिद्वंद्वी दावेदार भी कहने लगे हैं कि किसी को भी टिकट दे दो, जिताने के लिए जान लड़ा देंगे। कांग्रेस के उत्साह की वजह ये भी है कि  लोकसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन विधानसभा चुनाव से बेहतर रहा। वो ये कि वह सिर्फ 10 हजार 999 मतों से ही पिछड़ी, जबकि विधानसभा चुनाव में सांवर लाल जाट 28 हजार 900 मतों से जीते थे। अपने ही विधानसभा क्षेत्र में जाट का पिछडऩा तनिक सोचने को विवश करता है, मगर इसकी वजह ये आंकी जाती है कि लोकसभा चुनाव में खुद सचिन पायलट के होने के कारण गुर्जर मत एकजुट हो गए थे। जो भी हो, मगर अंतर कम होना कांग्रेस की हताशा को कम तो करता है। एक और फैक्टर भी कांग्रेसी अपने पक्ष में गिन कर चल रहे हैं कि महंगाई का हल्ला मचा कर जिस प्रकार भाजपा केन्द्र व राज्य में सत्ता में आई और उसके बाद महंगाई और बढ़ गई है, इस कारण आम जनता में अंदर ही अंदर प्रतिक्रिया पनप रही है। राज्य में भाजपा सरकार का अब तक कोई खास परफोरमेंस भी नहीं रहा है, इस कारण कांग्रेसी मानते हैं कि आम जन का भाजपा से मोह भंग हुआ होगा। खैर, देखते हैं कि कांग्रेस किसे चुनाव मैदान में उतारती है।
-तेजवानी गिरधर