अजमेर नगर निगम चुनाव के दौरान हालांकि इस विषय पर कोई खास चर्चा नहीं रही, मगर बताया जाता है कि स्कूलों में षिक्षकों का कार्यसमय बढाए जाने से षिक्षक वर्ग षिक्षा राज्य मंत्री प्रो वासुदेव देवनानी से खासा नाराज रहा। हालांकि संगठित रूप से उसका विरोध कहीं चर्चा में नहीं रहा, मगर बताया जाता है कि षिक्षकों ने अंडरग्राउंड विषेष रूप से अजमेर उत्तर में भाजपा को नुकसान पहुंचाया है। वे अपने मकसद में कितने कामयाब रहे, इसका आकलन करना कठिन है, मगर यदि वाकई ऐसा हुआ है तो यह साइलेंट फीचर परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
मंगलवार, 18 अगस्त 2015
क्या इस बार चुप रही आरएसएस
अजमेर नगर निगम चुनाव में आरएसएस के भाजपा के समर्थन में खुल कर काम न करने की जानकारी आ रही है। हालांकि पूर्व में यह माना जा रहा था हर बार की तरह इस बार भी आरएसएस पूरे जोष खरोष से मतदान करवाएगी, लेकिन मतदान के वक्त ऐसा कहीं नजर नहीं आया। बताया जाता है कि इस बार आरएसएस मुख्यालय ने कोई साफ निर्देष नहीं दिए। उसने अपने कार्यकर्ताओं से केवल इतना भर कहा कि अपने हिसाब देख लें। बताया जाता है कि ऐसा स्थानीय स्तर पर टिकट वितरण में हुई गडबडी के कारण किया गया। वार्ड चार में आरएसएस के जिम्मेदार पदाधिकारी ने अपने दायित्व से मुक्ति पा कर बागी के रूप में चुनाव लड लिया। हालांकि बताया ये जा रहा है कि संघ ने ही उनको अनुमति नहीं दी और यही कहा कि संघ खुद तय करता है कि किस कार्यकर्ता को राजनीतिक क्षेत्र में भेजना है। स्वयंसेवक अपने स्तर पर तय नहीं कर सकता कि वह राजनीति में जाएगा। बताते हैं कि संघ के कार्यकर्ता भाजपा के राजनेताओं की मनमानी की वजह से नाराज हैं। उन्हें लगा कि चुनाव के वक्त तो उनका उपयोग किया जाता है, मगर टिकट वितरण के दौरान कोई पूछ नहीं होती। समझा जाता है कि कई वार्डों में संघ की तटस्थता से भाजपा को नुकसान हो सकता है।
सोमवार, 17 अगस्त 2015
आखिर सारी मशक्कत मेयर पद को लेकर होगी
हालांकि सट्टा बाजार और माहौल में आम राय यही है कि अजमेर नगर निगम में बोर्ड तो भाजपा का ही बनेगा, मगर बाद में सारी मशक्कत मेयर पद को ले कर होनी है। इसकी एक मात्र वजह ये है कि भाजपा में दो धुर विरोधी खेमे के प्रबल दावेदार तो हैं ही, विकल्प के रूप में भी पांच दावेदार और मौजूद हैं।
राजनीतिक पंडित इसी बात पर माथापच्ची कर रहे हैं कि भाजपा को ज्यादा सीटें उत्तर में मिलेंगी या फिर दक्षिण में। कोई कहता है कि चूंकि दक्षिण में 32 व उत्तर में 28 वार्ड हैं, इस कारण दक्षिण में भाजपा ज्यादा सीटें जीतेगी। इस पक्ष में तर्क ये दिया जा रहा है कि उत्तर के 28 में से तीन वार्ड मुस्लिम बहुल हैं, जहां से भाजपा की जीत असंभव है। बाकी बचे 25 में भाजपा हद से हद 18 सीटें जीत सकती है। दक्षिण में 32 में से भाजपा 20 से ज्यादा सीटें हथिया सकती है। दूसरी ओर कुछ का कहना है कि दक्षिण में कांग्रेस नेता हेमंत भाटी के प्रभाव वाले इलाकों में भाजपा का जीतना मुष्किल है, इस कारण वहां भाजपा 18 तक सिमट सकती है। जो भी हो, भाजपा दोनों इलाकों में यदि 16-16 और उससे अधिक सीटें हासिल करती है तो बोर्ड तो भाजपा का बन ही जाएगा।
हालांकि भाजपा के मेयर पद के सभी दावेदार थोड़ी-थोड़ी परेशानी में हैं, मगर ऐसा लगता नहीं कि वे हार ही जाएंगे। अब तक की सूचनाओं के अनुसार शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी की पहली पसंद पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत होंगे, जबकि महिला व बाल विकास राज्य मंत्री पूर्व नगर परिषद सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत को आगे लाएंगी। इन दोनों में से जिसके पास भी विजयी पार्षदों की संख्या ज्यादा होगी, वही प्रथम दावेदार कहलाएगा।
भाजपा में आम धारणा यही है कि सारी जोड बाकी के बाद देवनानी गहलोत को ही मेयर बनवाएंगे, मगर मगर इस बार ओबीसी व सामान्य का मुद्दा गरमाने की आशंका है। सुनियोजित रूप से उसके लिए माहौल बनाया जा रहा है। हालांकि संघ के आदेश की मुखालफत करना स्थानीय भाजपा नेताओं के बूते की बात है नहीं, मगर फिर भी सामान्य पार्षद लामबंद हो सकते हैं। यदि गहलोत को लेकर ज्यादा दिक्कत हुई तो देवनानी के पास नीरज जैन, जे. के. शर्मा, भागीरथ जोषी जैसे विकल्प हैं। उधर श्रीमती भदेल के पास शेखावत के रूप में एक ही मजबूत पत्ता है। अगर वे उन्हें मेयर न बनवा पाईं तो संपत सांखला का डिप्टी मेयर पद पक्का ही समझो।
समझा जाता है कि इस बार निर्दलीय भी छह-सात जीत सकते हैं, यानि कि उनकी भी घेराबंदी होगी। कयास ये लगाए जा रहे हैं कि यदि खींचतान ज्यादा हुई तो देवनानी व श्रीमती भदेल कांग्रेस के पार्षदों का भी सहयोग लेने पर विचार कर सकते हैं। यानि कि कांग्रेस खेमे में सेंध मारी जा सकती है। हो सकता है कि कुछ स्वार्थी कांग्रेसी इस टूट-फूट में आसानी से शामिल हो जाएं। वजह ये है कि अगर कांग्रेस का बोर्ड बनने की कोई सूरत नहीं होती तो वे चाहेंगे कि अपनी पसंद के भाजपाई दावेदार को भीतर से समर्थन दें ताकि बाद में उसके मेयर बनने पर निजी अथवा अपने वार्ड के लिए लाभ हासिल किया जा सके। बताया जा रहा है कि भाजपा के प्रमुख दावेदारों ने इस लिहाज से कांग्रेसियों को चिन्हित करना भी शुरू कर दिया है। कुछ नेता ऐसे हैं जो गैर सिंधीवाद के नाम पर देवनानी को कमजोर करने के लिए शेखावत के लिए घेराबंदी करना चाहेंगे, तो कुछ नेता भावी रणनीति के तहत श्रीमती भदेल को कमजोर करने के लिए देवनानी के पसंद के उम्मीदवार का साथ देना चाहते हैं। कुल मिला कर होता क्या है, इसके लिए आगामी 20 व 21 तक का इंतजार करना होगा। वैसे आप को बता दें कि ब्यावर का सट्टा बाजार कांग्रेस की 32 सीटें मान रहा है। उसका गणित क्या है, पता नहीं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
राजनीतिक पंडित इसी बात पर माथापच्ची कर रहे हैं कि भाजपा को ज्यादा सीटें उत्तर में मिलेंगी या फिर दक्षिण में। कोई कहता है कि चूंकि दक्षिण में 32 व उत्तर में 28 वार्ड हैं, इस कारण दक्षिण में भाजपा ज्यादा सीटें जीतेगी। इस पक्ष में तर्क ये दिया जा रहा है कि उत्तर के 28 में से तीन वार्ड मुस्लिम बहुल हैं, जहां से भाजपा की जीत असंभव है। बाकी बचे 25 में भाजपा हद से हद 18 सीटें जीत सकती है। दक्षिण में 32 में से भाजपा 20 से ज्यादा सीटें हथिया सकती है। दूसरी ओर कुछ का कहना है कि दक्षिण में कांग्रेस नेता हेमंत भाटी के प्रभाव वाले इलाकों में भाजपा का जीतना मुष्किल है, इस कारण वहां भाजपा 18 तक सिमट सकती है। जो भी हो, भाजपा दोनों इलाकों में यदि 16-16 और उससे अधिक सीटें हासिल करती है तो बोर्ड तो भाजपा का बन ही जाएगा।
हालांकि भाजपा के मेयर पद के सभी दावेदार थोड़ी-थोड़ी परेशानी में हैं, मगर ऐसा लगता नहीं कि वे हार ही जाएंगे। अब तक की सूचनाओं के अनुसार शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी की पहली पसंद पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत होंगे, जबकि महिला व बाल विकास राज्य मंत्री पूर्व नगर परिषद सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत को आगे लाएंगी। इन दोनों में से जिसके पास भी विजयी पार्षदों की संख्या ज्यादा होगी, वही प्रथम दावेदार कहलाएगा।
भाजपा में आम धारणा यही है कि सारी जोड बाकी के बाद देवनानी गहलोत को ही मेयर बनवाएंगे, मगर मगर इस बार ओबीसी व सामान्य का मुद्दा गरमाने की आशंका है। सुनियोजित रूप से उसके लिए माहौल बनाया जा रहा है। हालांकि संघ के आदेश की मुखालफत करना स्थानीय भाजपा नेताओं के बूते की बात है नहीं, मगर फिर भी सामान्य पार्षद लामबंद हो सकते हैं। यदि गहलोत को लेकर ज्यादा दिक्कत हुई तो देवनानी के पास नीरज जैन, जे. के. शर्मा, भागीरथ जोषी जैसे विकल्प हैं। उधर श्रीमती भदेल के पास शेखावत के रूप में एक ही मजबूत पत्ता है। अगर वे उन्हें मेयर न बनवा पाईं तो संपत सांखला का डिप्टी मेयर पद पक्का ही समझो।
समझा जाता है कि इस बार निर्दलीय भी छह-सात जीत सकते हैं, यानि कि उनकी भी घेराबंदी होगी। कयास ये लगाए जा रहे हैं कि यदि खींचतान ज्यादा हुई तो देवनानी व श्रीमती भदेल कांग्रेस के पार्षदों का भी सहयोग लेने पर विचार कर सकते हैं। यानि कि कांग्रेस खेमे में सेंध मारी जा सकती है। हो सकता है कि कुछ स्वार्थी कांग्रेसी इस टूट-फूट में आसानी से शामिल हो जाएं। वजह ये है कि अगर कांग्रेस का बोर्ड बनने की कोई सूरत नहीं होती तो वे चाहेंगे कि अपनी पसंद के भाजपाई दावेदार को भीतर से समर्थन दें ताकि बाद में उसके मेयर बनने पर निजी अथवा अपने वार्ड के लिए लाभ हासिल किया जा सके। बताया जा रहा है कि भाजपा के प्रमुख दावेदारों ने इस लिहाज से कांग्रेसियों को चिन्हित करना भी शुरू कर दिया है। कुछ नेता ऐसे हैं जो गैर सिंधीवाद के नाम पर देवनानी को कमजोर करने के लिए शेखावत के लिए घेराबंदी करना चाहेंगे, तो कुछ नेता भावी रणनीति के तहत श्रीमती भदेल को कमजोर करने के लिए देवनानी के पसंद के उम्मीदवार का साथ देना चाहते हैं। कुल मिला कर होता क्या है, इसके लिए आगामी 20 व 21 तक का इंतजार करना होगा। वैसे आप को बता दें कि ब्यावर का सट्टा बाजार कांग्रेस की 32 सीटें मान रहा है। उसका गणित क्या है, पता नहीं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
रविवार, 16 अगस्त 2015
तंवर पर गहलोत का ठप्पा होने से कटा टिकट
पूर्व मनोनीत पार्षद महेन्द्र तंवर पर पूर्व मुख्यमंत्री अषोक गहलोत का ठप्पा होने के कारण मिलता हुआ टिकट कट गया। उन्हें इस बात का दुख है कि भले ही वे गहलोत के समर्थक रहे हैं, मगर पिछले काफी समय से प्रदेष कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के कार्यक्रमों में षिरकत करते रहे, फिर भी उनका टिकट काट दिया गया। यदि उनकी निष्ठा पायलट के प्रति नहीं होती तो वे क्यों उनके कार्यक्रमों में जाते। बहरहाल, टिकट कटने से दुखी तंवर भाजपा में चले गए। अब सवाल ये उठता है कि भाजपा में रहते हुए उनकी गहलोत के प्रति आस्था का क्या होगा। वैसे बताते हैं कि उनकी नाराजगी का फायदा उठाते हुए भाजपा ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया है। साथ ही ये भी चर्चा है कि उन्हें मनोनीत काउंसलर बनाने का वादा किया गया है। अब देखने वाली बात ये है कि क्या वाकई ऐसा हो पता है।
पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत को घेरने की कोशिश
आसन्न नगर निगम चुनाव में वार्ड 56 से खड़े भाजपा प्रत्याशी व पूर्व मेयर धर्मेन्द्र गहलोत को घेरने की कोशिश की जा रही है। बताया जाता है कि वैश्य व सामान्य वर्ग में आने वाली जातियों को उनके खिलाफ लामबंद करने की मुहिम चल रही है। इसमें कुछ मीडिया कर्मी भी शामिल हैं। बाकायदा माहौल बनाया जा रहा है कि गहलोत न जीत पाएं और जीत भी जाएं तो मेयर चुनाव के वक्त सामान्य बनाम ओबीसी का मुद्दा गरमाया जाए।
असल में ऐसा इस कारण हो रहा है कि गहलोत भाजपा की ओर से मेयर पद के सबसे प्रबल दावेदार हैं। संघ का भी उनको समर्थन प्राप्त है। माना जाता है कि अगर भाजपा का बोर्ड बनता है और अजमेर दक्षिण की तुलना में अजमेर उत्तर में भाजपा पार्षदों की संख्या अधिक रहती है, जिसकी की संभावना है भी, शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी के लिए उनके खास सिपहसालार गहलोत ही पहली प्राथमिकता होंगे। खुद गहलोत भी पार्षदों की घेराबंदी में माहिर हैं। यहां तक कि जरूरत पडऩे पर कांग्रेस के पार्षदों को भी प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में सामान्य वर्ग, विशेष रूप से वैश्य सतर्क हो गया है। उसकी तकलीफ ये है कि भाजपा ने केन्द्र में राज्य मंत्री, अजमेर शहर के दोनों राज्य मंत्री और राजस्थान पुरा धरोहर प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष गैर वैश्य वर्ग से हैं, जबकि वैश्य वर्ग सदैव भाजपा का साथ देता रहा है। उन्हें लगता है कि उनकी उपेक्षा की जा रही है।
बताया जा रहा है कि वैश्य समाज के लोग गहलोत को वार्ड में घेरने के लिए गुप्त बैठकें कर रहे हैं। हालांकि वैश्य वर्ग का रुझान भाजपा की ओर रहता आया है, मगर यदि गहलोत के खिलाफ मुहिम चलाने वालों को कुछ कामयाबी हासिल हुई तो वे गहलोत के वोटों में सेंध मार सकते हैं। हालांकि अभी ये कहना बेहद मुश्किल है कि यह मुहिम किस स्तर तक चली है, कितनी असरकारक है और मुहिम को कितनी कामयाबी हासिल होगी, मगर इतना पक्का है कि एक तबका गहलोत के खिलाफ जुट गया है। जाहिर तौर पर गहलोत भी इस स्थिति से वाकिफ होंगे। उन्होंने भी अपनी पूरी ताकत झौंक रखी है। वे एकाएक कमजोर तो नहीं पडऩे वाले, मगर मुहिम के प्रति आभास होने पर उन्हें और अधिक मेहनत करनी होगी। हालांकि मतदान होने में अभी वक्त बाकी है। यदि ऐन वक्त पर संघ का डंडा चला तो मुहिम के कर्णधार दुबक भी जाएंगे।
यहां ज्ञातव्य है कि वार्ड 56 में वैश्य व सामान्य जातियों का काफी वोट हैं, इसका अनुमान वार्ड में आने वाले इलाकों से हो जाता है। जरा नजर डालिये:-
रीजनल कॉलेज तिराहे से आनासागर सक्र्यूलर रोड पर चलते हुए वृंदावन गार्डन, गोविंदम पैलेस होते हुए बधिर विद्यालय तक दांईं ओर के सभी मकान। बधिर विद्यालय से आगे चलते हुए राजस्थान पत्रिका कार्यालय तक दांई तरफ के सम्पूर्ण मकान। राजस्थान पत्रिका कार्यालय से राजस्थान फूड प्लाजा व चौपाटी से सर्किट हाउस, बजरंगगढ़, सुभाष उद्यान को छोड़ते हुए बारादरी के सहारे चलते हुए रामप्रसाद घाट तक। रामप्रसाद घाट से लवकुश उद्यान तक दांई तरफ के समस्त भाग, लवकुश गार्डन से पुष्कर रोड पर आगे चलते हुए अरिहंत कॉलोनी, महावीर कॉलोनी आदि। अद्वैत आश्रम, रामनगर रोड तक दांईं तरफ के समस्त मकान। रामनगर रोड पर आगे चलते हुए पंचोली चौराहा होते हुए बाड़ी नदी तक दांईं तरफ के समस्त मकान। बाड़ी नदी के सहारे आगे चलते हुए मोती विहार कॉलोनी को सम्मिलित करते हुए पुष्कर रोड तक दांईं तरफ के सभी मकान। पुष्कर रोड पर आगे चलते हुए रीजनल कॉलेज तिराहे तक दांई तरफ के समस्त मकानात।
जहां तक कांग्रेस प्रत्याशी अमित कुमार पंचोली का सवाल है, उनका प्रभाव रामनगर और पंचोली चौराहा इलाके में अधिक है। गहलोत को अन्य क्षेत्रों से ही उम्मीद है। मगर यदि वहां उनके खिलाफ रची साजिश थोड़ी भी कामयाब होती है तो यह उनके लिए कुछ परेशानी पैदा कर सकती है।
असल में ऐसा इस कारण हो रहा है कि गहलोत भाजपा की ओर से मेयर पद के सबसे प्रबल दावेदार हैं। संघ का भी उनको समर्थन प्राप्त है। माना जाता है कि अगर भाजपा का बोर्ड बनता है और अजमेर दक्षिण की तुलना में अजमेर उत्तर में भाजपा पार्षदों की संख्या अधिक रहती है, जिसकी की संभावना है भी, शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी के लिए उनके खास सिपहसालार गहलोत ही पहली प्राथमिकता होंगे। खुद गहलोत भी पार्षदों की घेराबंदी में माहिर हैं। यहां तक कि जरूरत पडऩे पर कांग्रेस के पार्षदों को भी प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में सामान्य वर्ग, विशेष रूप से वैश्य सतर्क हो गया है। उसकी तकलीफ ये है कि भाजपा ने केन्द्र में राज्य मंत्री, अजमेर शहर के दोनों राज्य मंत्री और राजस्थान पुरा धरोहर प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष गैर वैश्य वर्ग से हैं, जबकि वैश्य वर्ग सदैव भाजपा का साथ देता रहा है। उन्हें लगता है कि उनकी उपेक्षा की जा रही है।
बताया जा रहा है कि वैश्य समाज के लोग गहलोत को वार्ड में घेरने के लिए गुप्त बैठकें कर रहे हैं। हालांकि वैश्य वर्ग का रुझान भाजपा की ओर रहता आया है, मगर यदि गहलोत के खिलाफ मुहिम चलाने वालों को कुछ कामयाबी हासिल हुई तो वे गहलोत के वोटों में सेंध मार सकते हैं। हालांकि अभी ये कहना बेहद मुश्किल है कि यह मुहिम किस स्तर तक चली है, कितनी असरकारक है और मुहिम को कितनी कामयाबी हासिल होगी, मगर इतना पक्का है कि एक तबका गहलोत के खिलाफ जुट गया है। जाहिर तौर पर गहलोत भी इस स्थिति से वाकिफ होंगे। उन्होंने भी अपनी पूरी ताकत झौंक रखी है। वे एकाएक कमजोर तो नहीं पडऩे वाले, मगर मुहिम के प्रति आभास होने पर उन्हें और अधिक मेहनत करनी होगी। हालांकि मतदान होने में अभी वक्त बाकी है। यदि ऐन वक्त पर संघ का डंडा चला तो मुहिम के कर्णधार दुबक भी जाएंगे।
यहां ज्ञातव्य है कि वार्ड 56 में वैश्य व सामान्य जातियों का काफी वोट हैं, इसका अनुमान वार्ड में आने वाले इलाकों से हो जाता है। जरा नजर डालिये:-
रीजनल कॉलेज तिराहे से आनासागर सक्र्यूलर रोड पर चलते हुए वृंदावन गार्डन, गोविंदम पैलेस होते हुए बधिर विद्यालय तक दांईं ओर के सभी मकान। बधिर विद्यालय से आगे चलते हुए राजस्थान पत्रिका कार्यालय तक दांई तरफ के सम्पूर्ण मकान। राजस्थान पत्रिका कार्यालय से राजस्थान फूड प्लाजा व चौपाटी से सर्किट हाउस, बजरंगगढ़, सुभाष उद्यान को छोड़ते हुए बारादरी के सहारे चलते हुए रामप्रसाद घाट तक। रामप्रसाद घाट से लवकुश उद्यान तक दांई तरफ के समस्त भाग, लवकुश गार्डन से पुष्कर रोड पर आगे चलते हुए अरिहंत कॉलोनी, महावीर कॉलोनी आदि। अद्वैत आश्रम, रामनगर रोड तक दांईं तरफ के समस्त मकान। रामनगर रोड पर आगे चलते हुए पंचोली चौराहा होते हुए बाड़ी नदी तक दांईं तरफ के समस्त मकान। बाड़ी नदी के सहारे आगे चलते हुए मोती विहार कॉलोनी को सम्मिलित करते हुए पुष्कर रोड तक दांईं तरफ के सभी मकान। पुष्कर रोड पर आगे चलते हुए रीजनल कॉलेज तिराहे तक दांई तरफ के समस्त मकानात।
जहां तक कांग्रेस प्रत्याशी अमित कुमार पंचोली का सवाल है, उनका प्रभाव रामनगर और पंचोली चौराहा इलाके में अधिक है। गहलोत को अन्य क्षेत्रों से ही उम्मीद है। मगर यदि वहां उनके खिलाफ रची साजिश थोड़ी भी कामयाब होती है तो यह उनके लिए कुछ परेशानी पैदा कर सकती है।
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