शनिवार, 19 मार्च 2016

अजमेरनामा की आशंका सही निकली, पाक जायरीन के आने का विरोध शुरू

महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के आगामी सालाना उर्स में पाकिस्तानी जायरीन के आगमन को लेकर भले ही सत्तारूढ़ दल भाजपा ने मौन धारण कर रखा है, मगर विश्व हिंदू परिषद सहित अन्य हिंदूवादी संगठनों ने उनके आने का विरोध शुरू कर दिया है। ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारत विरोधी और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाने का विवाद चरम पर होने के चलते जैसे ही अजमेर लिटरेरी सोसायटी के बेनर तले लाहौर-पाकिस्तान के शायर प्रो. अब्बास ताबिश के कार्यक्रम शायरी सरहद से परे को भाजपा सहित अन्य हिंदूवादी संगठनों के विरोध की वजह से रद्द करना पड़ा, तब अजमेरनामा ने यह सवाल उठाया था कि कहीं इसी प्रकार का विरोध ख्वाजा साहब के आगामी सालाना उर्स के दौरान पाक जायरीन के आगमन को लेकर न खड़ा हो जाए। इस पर शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव ने बाकायदा बयान जारी कर कहा था कि उर्स के दौरान पाकिस्तान से जायरीन आयेंगे या नहीं, ये तो उन्होंने भी अभी तय नहीं किया होगा, लेकिन इस पर अनावश्यक चर्चा की जा रही है और यदि आते भी हैं तो इसको जवाहर रंगमंच में फर्जी तरीके से होने जा रहे पाकिस्तानी शायर के कार्यक्रम से जोड़ कर देखा जाना अनुचित है। अजमेर पुष्कर ब्रह्माजी व ख्वाजा साहब की सौहार्द, श्रद्धा व आस्था की नगरी है, जहां समन्वित भाव से सभी जगहों से आने वालों के सम्मान की परिपाटी चलती रही है।
उनके इस बयान से यह स्पष्ट हो गया था कि भाजपा पाक जायरीन के मुद्दे पर फिलहाल कोई स्टैंड नहीं ले रही है। उलटा उनकी इन पंक्तियों - अजमेर पुष्कर ब्रह्माजी व ख्वाजा साहब की सौहार्द, श्रद्धा व आस्था की नगरी है, जहां समन्वित भाव से सभी जगहों से आने वालों के सम्मान की परिपाटी चलती रही है, से तो यह लग रहा था कि भाजपा को पाक जायरीन के आने पर ऐतराज नहीं है।
बहरहाल, अब हिंदूवादी संगठनों ने अजमेरनामा की आशंका की पुष्टि करते हुए जिला कलेक्टर को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री, मुख्यमंत्री और गृह राज्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंप कर पाक जत्थे की अजमेर यात्रा रद्द करने की मांग कर दी है। विहिप ने तो यहां तक चेतावनी दी है कि आगामी उर्स में पाक जत्थे को अजमेर में घुसने नहीं दिया जाएगा। विहिप के महामंत्री शशिप्रकाश इंदौरिया ने कहा कि यदि पाक जत्थे को भारत आने से रोका नहीं गया और पाक से संबंध विच्छेद नहीं किए गए तो देशभर में आंदोलन होगा।
वस्तुत: अजमेरनामा को आशंका इस कारण थी कि इससे पहले भी भारत-पाक संबंधों में तनाव के चलते लगातार दो साल तक पाकिस्तानी जायरीन उर्स मेले में नहीं आए थे। ज्ञातव्य है कि पाक जेल में वर्ष 2013 में सरबजीत की हत्या के बाद भारत-पाक के संबंधों में तनाव हो गया था। देशभर में पाक का विरोध हुआ। उर्स मेले में पाक जत्थे के आने की सूचना जैसे ही सार्वजनिक हुई, यह विरोध चरम पर पहुंच गया। इसी विरोध के चलते पाक जत्था भारत नहीं आ सका। वर्ष 2014 में भी कई अन्य कारणों से भारत-पाक संबंधों में तनाव बरकरार था, इस वजह से पाक जत्था नहीं आया। विरोध का मसला केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि सरकार के स्तर तक जा पहुंचा था। भारत सरकार की ओर से कहा गया था कि द्विपक्षीय घटनाओं के मद्देनजर भारत में जो सुरक्षा माहौल बना है, उसकी वजह से सरकार पाकिस्तानी जायरीनों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करने की स्थिति में नहीं होगी। सरकार ने पाकिस्तान सरकार से बाकायदा सिफारिश भी की कि जायरीनों के अजमेर दौरे को रद्द किया जाए।
यहां बता दें कि अमूमन हर उर्स में पाकिस्तान से जायरीन भारत सरकार के खास मेहमान बन कर जियारत के लिए अजमेर आते हैं। अटारी से उनके लिए स्पेशल ट्रेन चलती है, जो आईबी और विशेष सुरक्षा बलों की निगरानी में दिल्ली होते हुए अजमेर आती है। यहां अमूमन वे तीन-चार दिन ठहरते हैं तब तक ट्रेन विशेष सुरक्षा निगरानी में रहती है। उन्हें स्थानीय सेंट्रल गल्र्स स्कूल में ठहराया जाता है। कलेक्टर समेत राज्य के कई अफसर उनकी तीमारदारी में रहते हैं।
खैर, अजमेरनामा ने लिखा था कि उर्स मेले में ज्यादा दिन शेष नहीं हैं। आगामी अप्रैल माह के पहले सप्ताह में ही मेला शुरू होने वाला है। इसकी प्रशासनिक तैयारी बैठक भी हो चुकी है। यह कहना अभी मुश्किल है कि उर्स मेला शुरू होने तक माहौल में कुछ सुधार आ ही जाएगा। मगर यदि भाजपा अथवा सहयोगी संगठनों से अभी से इस मुद्दे को उठाया तो संभव है कि प्रशासन व सरकार को इस पर विचार करना पड़ जाए। अब जब कि विरोध के स्वर उठने लगे हैं, सवाल ये उठ खड़ा हुआ है कि प्रशासन अब क्या कदम उठाता है?
-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000

चंद व्यापारियों को रास नहीं आ रही मदारगेट की सुधरी यातायात व्यवस्था

मदारगेट बाजार में चौपहिया वाहनों पर रोक के बाद सुधरी यातायात व्यवस्था चंद व्यापारियों को रास नहीं आ रही। उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपना व्यापार ही सूझ रहा है, पूरे शहर के नागरिक भले ही तकलीफ पाएं।....
व्यापारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पिछले दिनों जिला कलेक्टर आरुषि मलिक को ज्ञापन देकर नई व्यवस्था पर ऐतराज जताया है। असल में ऐतराज चंद व्यापारियों को ही है, जिनके बड़े शो रूम हैं, जहां खरीददारी को आने वाले चौपहिया वाहनों पर आते हैं। बाकी के छोटे दुकानदारों को तो उलटा सुविधा है, क्योंकि पैदल व मोटरबाइक-स्कूटर आदि पर आने वाले अब सुगमता से आ-जा रहे हैं। आम जनता को तो बहुत ही सुविधा है। देखिए, व्यापारियों का तर्क- पूरे शहर में से सिर्फ मदार गेट बाजार में ही चौपहिया वाहनों के प्रवेश पर रोक क्यों लगाई गई है? क्या प्रशासन का कोई अधिकारी मदारगेट के व्यापारियों से द्वेषता रखता है? सवाल ये उठता है कि क्या वाकई इतनी अंधेरगर्दी है कि कोई अधिकारी मदारगेट के व्यापारियों से द्वेष रखे और द्वेषता रखते हुए चौपाहिया वाहनों पर रोक लगा दे? क्या ये इतना आसान है? व्यापारियों की तकलीफ देखिए, वे कहते हैं कि केवल मदारगेट बाजार में ही चौपहिया वाहनों पर रोक क्यों लगाई गई है, अर्थात अगर अन्य बाजारों में भी चौपहिया वाहनों पर रोक लगा दी जाए तो वे शांत हो जाएंगे। बेशक अन्य बाजार भी भीड़ भरे हैं, उनमें भी जरूरत के मुताबिक चौपहिया वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई जा सकती है, लगाई जानी चाहिए, कुछ में है भी, मगर सोचने वाली बात ये है कि क्या मदारगेट सर्वाधिक भीड़ भरा नहीं है, जिसमें चौपहिया वाहन प्रवेश करने पर बार-बार जाम लग जाता है। मदारगेट बाजार की तुलना अन्य बाजारों से कैसे की जा सकती है?
व्यापारियों का कहना है कि तीन माह पहले जब चौपहिया वाहनों पर रोक लगाई गई थी, तब प्रशासन की ओर से कहा गया था कि यह प्रयोग के तौर पर है, यदि आम सहमति बनी तो फिर शहर के सभी भीड़ वाले बाजारों में चौपहिया वाहनों के आवागमन पर रोक लगाई जाएगी। सवाल ये उठता है कि यदि प्रयोग सफल हो गया है तो उसे जारी क्यों नहीं किया जाना चाहिए? बेशक यह प्रयोग अन्य जरूरत वाले बाजारों में भी किया जाना चाहिए। व्यापारियों की तकलीफ ये है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले उनसे सहमति क्यों नहीं ली गई, तो सवाल ये उठता है कि इसमें उनकी सहमति की जरूरत क्या है? उनका तर्क तो ऐसा है कि अगर वे सहमत नहीं हैं तो प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा। यातायात व्यवस्था को सुधारने की कोई कोशिश नहीं करेगा। हद हो गई। क्या इसका भी जवाब किसी के पास है कि जब कुछ व्यापारी अपनी दुकानों के आगे अस्थाई अतिक्रमण करते हैं तो क्या प्रशासन से मंजूरी लेते हैं?
हां, दुकानदारों की इस बात में जरूर दम है कि वायदे के मुताबिक मदारगेट बाजार के आसपास वाहन पार्किंग की सुविधा भी उपलब्ध नहीं करवाई गई है। प्रशासन को इस बारे में जल्द से जल्द ही फैसला लेना चाहिए।
बहरहाल कलेक्टर के कहने पर व्यापरियों की बात अतिरिक्त कलेक्टर (प्रशासन) किशोर कुमार ने भी सुनी और उन्होंने कहा है कि अब जब भी जिला यातायात सलाहकार समिति की बैठक हो तो मदारगेट के व्यापारी भी बैठक में आ जाएं, ताकिनगर निगम, पुलिस आदि सभी विभागों के अधिकारियों की मौजूदगी में व्यापारियों को सभी सवालों के जवाब मिल जाएंगे।

रविवार, 13 मार्च 2016

विजय जैन का अंदाज-ए-आगाज तो बेहतर है

शहर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद से नवाजे गए विजय जैन का अंदाज-ए-आगाज तो बेहतर है। हालांकि वे कितने सफल होंगे, ये तो वक्त की मांद में छिपा हुआ है, मगर जैसी शुरुआत है, उससे लगता है कि वे सब को साथ लेकर चलने कामयाब हो सकते हैं। चाहे नई कार्यकारिणी में स्थान पाने के लिए या फिर प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के प्रभाव की वजह से अधिसंख्य बड़े व छोटे नेता एक मंच पर दिखाई देने लगे हैं। इसका श्रेय जैन को भी दिया जा सकता है, जो कि कूल मांइडेड हैं और सब पुराने नेताओं का पूरा सम्मान कर रहे हैं। ये कम बात नहीं है कि एक ओर जहां मीडिया अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट को विवाद बना कर तूल दे रहा है, वहीं सचिन की पसंद से बनाए गए जैन की ओर से आहूत बैठकों व कार्यक्रमों में गहलोत गुट के माने जाने वाले भी खुल कर शिरकत कर रहे हैं। कुल मिला कर मृतप्राय: सी कांग्रेस में जान आई है। कार्यकर्ताओं को लगता है कि अब नई टीम संगठन को सक्रिय करके अपना जनाधार बढ़ाएगी। हर परिवर्तन के साथ नई ऊर्जा का संचार होता है, मगर सच ये है कि जिस उम्मीद में जैन को अध्यक्ष बनाया गया है, वह बेहद चुनौतीपूर्ण है।
जाहिर तौर पर जैन के ऊपर सबसे बड़ा दायित्व निष्क्रिय हो चुकी कांग्रेस में जान फूंकने के साथ आगामी विधानसभा चुनाव में अच्छा परफोरमेंस दिखाना है। वह भी तब जब कि लगातार तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस शहर की दोनों सीटें भाजपा से हारी है। हालांकि कुछ कारणों के चलते पिछले नगर निगम चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा है, जिससे पता लगा कि धरातल पर कांग्रेस जिंदा है, मगर अगर आज भी संगठन तो छिन्न-भिन्न सा ही है। बेशक मौजूदा सरकार का परफोरमेंस कुछ खास न होने के कारण कांग्रेस को उम्मीद है कि अगली सरकार उसी की होगी, मगर अकेले इसी उम्मीद के चलते कोई लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकेगा।
सबको याद है कि मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री सचिन पायलट ने स्थानीय सांसद होने के नाते खूब काम करवाए, मगर परिणाम सिफर ही रहा। हालांकि इसकी वजह मोदी लहर को माना जा सकता है, मगर सच्चाई ये है कि अनेक गुटों में बंटे कांग्रेसी अपनी ही पार्टी की जड़ें खोद रहे थे। नतीजतन पायलट की ओर से कराए गए काम अस्तित्व में होते हुए भी जनता को नजर नहीं आए।
आज भी कमोबेश कांग्रेस संगठन के वही हालात हैं। वो के वो ही नेता और वो के वो ही कार्यकर्ता। गुटों में बंटे हुए कार्यकर्ताओं को एकजुट करना जैन के लिए एक बड़ी समस्या है। बेशक उनके इर्दगिर्द इस वक्त कार्यकर्ताओं का हुजूम नजर आता है, मगर सच ये है कि उनमें से अधिसंख्य वे हैं, जो संगठन में पद पाना चाहते हैं। एक बार कार्यकारिणी घोषित हो जाने के बाद कई छिटक सकते हैं। ऐसे में जैन को ऐसी कार्यकारिणी बनानी होगी, जिसके जरिए सभी गुटों को उनके वजूद के मुताबिक प्रतिनिधित्व मिले। इसके अतिरिक्त बूथ और वार्ड स्तर पर निष्क्रिय पदाधिकारियों को हटा कर नए ऊर्जावान कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देनी होगी। यही सही है कि चुनाव के वक्त कई फैक्टर काम करते हैं, राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय मुद्दे प्रभावी होते हैं, मगर जब तक स्थानीय स्तर पर चुनाव लडऩे वाली कार्यकर्ताओं की सेना सुव्यवस्थित नहीं होती, मुकाबला करना बेहद कठिन होता है। अब देखना ये है कि कार्यकारिणी बनाते वक्त जैन कितनी सूझबूझ और चतुराई दिखाते हुए सभी को जोड़ कर रख पाते हैं।
रहा सवाल स्वयं जैन का तो उन्हें भी स्थापित होना होगा। अब तक वे ब्लॉक अध्यक्ष रहे और उन पर शहर स्तर की सोच का कोई दायित्व नहीं रहा। सीधे ब्लॉक से शहर स्तर पर देश की सबसे बड़ी पार्टी की शहर जिला इकाई का दायित्व आया है। उसी के अनुरूप सोच, उसी अंदाज की बॉडी लैंग्वेज और उसी के अनुसार गंभीरता दिखानी होगी। हाशिये पर जा चुके पुराने नेताओं का मार्गदर्शन लेना होगा। जैन के पक्ष में एक पहलु ये भी है कि उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़े कार्यकर्ता ऊर्जावान हैं, साथ ही पूर्व शहर जिला युवक कांग्रेस के अध्यक्ष गुलाम मुस्तफा व भूपेन्द्र सिंह राठौड़ सरीखे नेता भी लंबे अरसे बाद यकायक सक्रिय हुए हैं और सुकेश कांकरिया, बिपिन बेसिल, मुजफ्फर भारती सरीखे कंधे से कंधा लगा कर खड़े हैं, मगर इतने मात्र से कुछ नहीं होगा, इस फौज को बढ़ाना होगा। खैर, देखते हैं क्या होता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

क्या पाक जायरीन का भी भाजपा विरोध करेगी?

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारत विरोधी और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाने का विवाद चरम पर होने के चलते जैसे ही अजमेर लिटरेरी सोसायटी के बेनर तले गत दिनों लाहौर-पाकिस्तान के शायर प्रो. अब्बास ताबिश के कार्यक्रम शायरी सरहद से परे को भाजपा सहित अन्य हिंदूवादी संगठनों के विरोध की वजह से रद्द करना पड़ा, यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि कहीं इसी प्रकार का विरोध ख्वाजा साहब के आगामी सालाना उर्स के दौरान पाक जायरीन के आगमन को लेकर न खड़ा हो जाए। हालांकि अब तक भाजपा व हिंदूवादी संगठनों की ओर से इस प्रकार के संकेत नहीं आए हैं, मगर प्रशासन और गुप्तचर पुलिस इस मामले में सतर्क है।
असल में ये आशंका इस कारण उत्पन्न होती है क्योंकि इससे पहले भी भारत-पाक संबंधों में तनाव के चलते लगातार दो साल तक पाकिस्तानी जायरीन उर्स मेले में नहीं आए थे। ज्ञातव्य है कि पाक जेल में वर्ष 2013 में सरबजीत की हत्या के बाद भारत-पाक के संबंधों में तनाव हो गया था। देशभर में पाक का विरोध हुआ। उर्स मेले में पाक जत्थे के आने की सूचना जैसे ही सार्वजनिक हुई, यह विरोध चरम पर पहुंच गया। इसी विरोध के चलते पाक जत्था भारत नहीं आ सका। वर्ष 2014 में भी कई अन्य कारणों से भारत-पाक संबंधों में तनाव बरकरार था, इस वजह से पाक जत्था नहीं आया। विरोध का मसला केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि सरकार के स्तर तक जा पहुंचा था। भारत सरकार की ओर से कहा गया था कि द्विपक्षीय घटनाओं के मद्देनजर भारत में जो सुरक्षा माहौल बना है, उसकी वजह से सरकार पाकिस्तानी जायरीनों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करने की स्थिति में नहीं होगी। सरकार ने पाकिस्तान सरकार से बाकायदा सिफारिश भी की कि जायरीनों के अजमेर दौरे को रद्द किया जाए।
यहां बता दें कि हर उर्स में पाकिस्तान से जायरीन भारत सरकार के खास मेहमान बन कर जियारत के लिए अजमेर आते हैं। अटारी से उनके लिए स्पेशल ट्रेन चलती है, जो आईबी और विशेष सुरक्षा बलों की निगरानी में दिल्ली होते हुए अजमेर आती है। यहां अमूमन वे तीन-चार दिन ठहरते हैं तब तक ट्रेन विशेष सुरक्षा निगरानी में रहती है। उन्हें स्थानीय सेंट्रल गल्र्स स्कूल में ठहराया जाता है। कलेक्टर समेत राज्य के कई अफसर उनकी तीमारदारी में रहते हैं।
इस बार भी चूंकि जेएनयू का मसला बेहद गरम है, इस कारण आशंका है कि कहीं भाजपा व उसके सहयोगी संगठन फिर से विरोध के स्वर ऊंचे न कर दें। चूंकि पाक शायर प्रो. अब्बास ताबिश के मामले में तो भाजपा ने कार्यक्रम होने से ऐन पहले पूर्व संध्या पर ही विरोध किया, इस कारण आनन फानन में आयोजकों ने कदम पीछे कर लिए, मगर वीजा की औपचारिक मंजूरी होने सहित कार्यक्रम की अनुमति तक की औपचारिकता पूरी हो चुकी थी। यह दीगर बात है कि जवाहर रंगमंच के किराये से मुक्ति के लिए पंजीयन अन्य संस्था ने करवाया था।  
बहरहाल, उर्स मेले में ज्यादा दिन शेष नहीं हैं। आगामी अप्रैल माह के पहले सप्ताह में ही मेला शुरू होने वाला है। इसकी प्रशासनिक तैयारी बैठक भी हो चुकी है। यह कहना अभी मुश्किल है कि उर्स मेला शुरू होने तक माहौल में कुछ सुधार आ ही जाएगा। मगर यदि भाजपा अथवा सहयोगी संगठनों से अभी से इस मुद्दे को उठाया तो संभव है कि प्रशासन व सरकार को इस पर विचार करना पड़ जाए।
-तेजवानी गिरधर
7742067000, 8094767000

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

प्रो. अब्बास ताबिश के कार्यक्रम के संदर्भ में प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं क्या?

सरकार ही क्यों नहीं रोक देती ऐसे कार्यक्रम

इसमें कोई दोराय नहीं कि जब दिल्ली के जेएनयू विश्वविद्यालय में भारत विरोधी और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जाने का विवाद चरम पर है, पूरे देश में गरमागरम बहस छिड़ी हुई है, उसका राजनीतिकरण भी हो चुका है, ऐसे में किसी पाकिस्तानी शायर का यहां कार्यक्रम होता तो उससे माहौल बिगड़ सकता था। यह अलग बात है कि लाहौर-पाकिस्तान के शायर प्रो. अब्बास ताबिश, जो कि उर्दू अदब के वैश्विक चेहरा माने जाते हैं, के जवाहर रंगमंच पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम शायरी-सरहद से परे का भाजपा, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा युवा मोर्चा ने मुखर विरोध किया, नतीजतन आयोजक संस्था अजमेर लिटरेरी सोसायटी को कार्यक्रम रद्द करना पड़ा, वरना कार्यक्रम के दौरान देशभक्ति से ओतप्रोत कोई व्यक्ति भी हुड़दंग कर सकता था। वजह साफ है कि भारत और पाकिस्तान के संबंध ठीक नहीं हैं और आम भारतीय में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा भरा हुआ है। विशेष रूप से इन दिनों। कदाचित समन्वयक और लाफ्टर चैलेंज फेम रास बिहारी गौड़ के पास सांस्कृतिक आदान-प्रदान के तर्क हो सकते हैं, वह बहस का एक विषय भी हो सकता है, मगर श्रद्धा और भावना के आगे कोई तर्क नहीं टिकता।
अजमेर में कायम शांति बरकरार रखने के लिए कार्यक्रम का स्थगित होना उचित ही है, मगर सवाल ये उठता है कि जिस दल की वर्तमान में केन्द्र व राज्य में सरकार है, उसके होते हुए क्यों ऐसे कार्यक्रम की अनुमति दी गई। देश के हालात को देखते हुए खुद सरकार को ही सांस्कृतिक आदान-प्रदान से जुड़े ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगा देनी चाहिए। कम से कम अति संवेदनशील अजमेर सरीके शहरों में तो विशेष सावधानी बरती ही जा सकती है। विहिप के महामंत्री शशिप्रकाश इंदौरिया इस बयान में दम है कि पठानकोट एयरबेस पर हमले के बाद पाक की दोगली चालें सामने आई थीं और ऐसे में पाक के कलाकारों को भारतीय मंच देना यहां की जनता और आतंकियों से लोहा लेते शहीद हुए जवानों के परिवारों के दिलों पर आघात करने जैसा है। आयोजकों को यह सोचना चाहिए कि देश में पाक के खिलाफ माहौल होने के बावजूद उन्हें कार्यक्रम का न्योता क्यों दिया जाए। मगर सवाल ये है कि सरकार खुद ही ऐसे न्यौतों को नामंजूर क्यों नहीं करती। अगर शायर प्रो. अब्बास ताबिश के भारत आगमन और कार्यक्रम की मंजूरी की प्रक्रिया के दौरान ही रोक लगा दी जाती तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। समझा जा सकता है कि किसी भी कार्यक्रम की तैयारी में कितना श्रम और अर्थ व्यय होता है। सरकार व प्रशासन के स्तर पर मंजूरी मिल जाने के बाद उसे रद्द करने के लिए दबाव बनाना नीतिगत दृष्टि से गलत ही कहा जाएगा। बेहतर तो ये रहे कि खुद भाजपा संगठन सरकार में बैठे नुमाइंदों पर दबाव बनाए कि मौजूदा हालात में इस प्रकार के कार्यक्रमों को स्वीकृति नहीं दी जाए। ऐसा करना भाजपा के लिए कठिन भी नहीं है। केन्द्र व राज्य, दोनों ही सरकारें भाजपा इकलौते दम पर चला रही है। माहौल बिगडऩे का जो खतरा भाजपा संगठन के नेताओं का नजर आता है, वो सरकार में बैठे भाजपा नेताओं भी समझ में आता होगा। मगर अफसोस कि ऐसा हुआ नहीं। जो काम सरकार व प्रशासन को करना चाहिए था, वह संगठन को करना पड़ा। गर कूटनीतिक संबंधों की वजह से सरकार ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगाने में असमर्थ है तो, कम से कम कानून व्यवस्था के लिहाज से प्रशासन का दायित्व तो बनता ही है। यहां सवाल प्रशासन और पुलिस की इंटेलीजेंसी पर भी उठता है। क्या उसे अनुमान नहीं था कि ऐसे कार्यक्रम की स्वीकृति देने से माहौल बिगड़ सकता है? अजमेर में शांति बनी रहे, इसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर प्रशासन की बनती है, न कि भाजपा व उसके सहयोगी संगठनों की। ये तो अच्छा हुआ कि उन्होंने समय से पहले ही कार्यक्रम रद्द करवा लिया, वरना बाद में अगर कुछ हंगामा होता तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होता? होना तो यह भी चाहिए कि भाजपा को जिला कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक की ऊपर से खिंचाई करवानी चाहिए, जिन्होंने यहां कायम अमन की चिंता किए बगैर कार्यक्रम रोकने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया।
बहरहाल, ताजा घटनाक्रम से अजमेर को आए दिन बेहतरीन सांस्कृतिक कार्यक्रम देने वाले रास बिहारी गौड़ निरुत्साहित होंगे, वहीं शहर जिला भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव को पहली बार दमदार उपस्थिति दर्ज करने का मौका मिला है। थोड़ा हट कर बात करें तो गौड़ के भाजपा के स्थानीय नेताओं से अच्छे संपर्क हैं, उन्हें मित्रता के नाते भी यह कार्यक्रम न करने की सलाह दी जा सकती थी। ऐसी नौबत ही नहीं आती।
-तेजवानी गिरधर
7742067000, 8094767000