बुधवार, 29 जून 2016

आखिर सख्त होना पड़ा वंदना नोगिया को

आरंभ से लो प्रोफाइल रही जिला प्रमुख वंदना नोगिया नौसीखियेपन, सदाशयता और भोलेपन का अधिकारियों ने जब ज्यादा ही नाजायज फायदा उठाना शुरू कर दिया तो आखिर उन्हें सख्त होना पड़ा। उन्होंने प्रत्येक बुधवार को जिला परिषद कार्यालय में होने वाली जिला प्रमुख जन सुनवाई में अधीनस्थ सभी पांचों विभागों के अधिकारियों को उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं। ज्ञातव्य है कि कई बार विधायक भी जरूरी बैठकों से नदारद रहते हैं। शायद उन्हें अपने से बहुत कम उम्र की जिला प्रमुख की अध्यक्षता में भाग लेने में शर्म आती है।
हालांकि यह सही है कि वंदना नोगिया कम उम्र और नई नवेली हैं, मगर वे जिला प्रमुख की हर गतिविधि का गहराई से अध्ययन कर रही हैं और ज्यादा ध्यान मॉनिटरिंग पर दे रही हैं। जनसुनवाई के दौरान उन्होंने अनियमितताओं के कई मामले उजागर किए हैं। कदाचित वे पहली ऐसी जनप्रतिनिधि होंगी, जो कि विभागीय लापरवाही को उजागर कर उसका समाधान करने की कोशिश करती हैं। वरना आम तौर पर जनप्रतिनिधि अपने अधीनस्थ विभाग की कमियों को छुपाते हैं और केवल उपलब्धि का ही बखान करते हैं। बहरहाल, वंदना नोगिया जनसमस्याओं के निराकरण के प्रति जितनी सजग हैं, उनके अधीनस्थ आने वाले विभागों के अधिकारी उतने ही लापरवाह हैं। या फिर वंदना के कमजोर राजनीतिक कद की वजह से जानबूझकर लापरवाह बने हुए हैं। और यही वजह है कि कई विभागों द्वारा अपने अधिनस्थ अधिकारियों को भिजवाने से ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा। शिक्षा, चिकित्सा, महिला एवं बाल विकास विभाग, समाज कल्याण विभाग एवं कृषि विभाग के जिला स्तरीय अधिकारियों द्वारा कार्यालय प्रतिनिधि के तौर पर उपस्थित अधिकारियों एवं कर्मचारियों को जिला परिषद जनसुनवाई में भेजने के मामले को वंदना नोगिया ने गंभीरता से लिया गया है। उन्हें निर्देश जारी करने के साथ इतना भी आगाह करना पड़ा कि जन सुनवाई में अनुपस्थित रहने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जायेगी।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 28 जून 2016

क्या वाकई देवनानी और भदेल की छुट्टी होने वाली है?

एक बार फिर सोशल मीडिया पर अजमेर के दोनों मंत्रियों प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल की छुट्टी होने का समाचार चल रहा है। इससे पहले भी इस आशय का समाचार दिल्ली की एक न्यूज एजेंसी जारी कर चुकी है। हालांकि सोशल मीडिया की विश्वसनीयता नहीं है क्योंकि वहां कोई भी किसी भी मकसद से किसी भी प्रकार का समाचार जारी कर देता है, जिसकी कोई जवाबदेही नहीं होती, मगर फिर भी वह नोटिस लेने लायक इस कारण है कि जरूर तिल तो है ही, वरना ताड़ नहीं बनता। जरूर कुछ न कुछ सुगबुगाहट है, वरना हवा में इस प्रकार अफवाह की अबाबील नहीं उड़ सकती।
हाल ही जारी समाचार के अनुसार राज्य के वसुंधरा राजे मंत्रीमंडल के चार मंत्रियों का हटना तय है, जिसे कि आलाकमान ने भी हरी झंडी दे दी है।  हटने वाले मंत्रियों में कालीचरण सर्राफ, राजपाल सिंह शेखावत, श्रीमती अनिता भदेल व प्रो. वासुदेव देवनानी शामिल हैं। इसमें यह भी बताया गया है कि देवनानी के स्थान पर जातिगत समीकरण को देखते हुए श्रीचंद कृपलानी को मंत्री बनाना तय हो गया है। मंत्रीमंडल का पुनर्गठन आगामी 12 जुलाई को होना बताया गया है।
असल में देवनानी संघ कोटे से मंत्री बनाए गए हैं, और संघ  लॉबी में दमदार मौजदूगी भी है, इस कारण उनको हटाए जाने की बात यकायक गले नहीं उतरती, मगर पिछले दिनों पाठ्यपुस्तकों से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के संदर्भ हटाए जाने और एक शिक्षा कर्मी के तबादला उद्योग के शिकंजे में आ कर आत्महत्या करने और सीधा देवनानी के पीए पर आरोप होने के कारण देवनानी विवाद में आए। हालांकि नेहरू प्रकरण में तो उन्होंने संघ के एजेंडे को ही पोषित किया है, मगर बताया जाता है कि संघ में भी एक लॉबी उनके खिलाफ है। समझा जाता है कि अगर संघ के दबाव में उन्हें नहीं हटाया जा सका तो कम से कम उनका विभाग तो बदला ही जा सकता है। उनके स्थान पर श्रीचंद कृपलानी को लेने की बात इस कारण गले उतरती है क्योंकि भाजपा मानसिकता के सिंधी समुदाय को नाराज नहीं किया जा सकता। दूसरा श्रीचंद कृपलानी लगातार मंत्री बनने की जुगत भिड़ा रहे हैं। इसी कारण उन्होंने विरोध स्वरूप यूआईटी की चेयरमेनशिप भी ठुकरा दी थी।
इसी प्रकार श्रीमती भदेल का नाम केवल और केवल इस कारण आया क्योंकि पिछले नगर निगम चुनाव में उनका परफोरमेंस खराब रहा। जिस प्रकार उनकी पकड़ कोली समुदाय में कमजोर साबित हुई है, उसी को देखते हुए माना जा रहा है कि इस बार भाजपा कोई और जातीय कार्ड खेल सकती है। दोनों मंत्रियों के बीच छत्तीस का आंकड़ा होने के कारण अजमेर की भाजपा में सदैव चल रही खींचतान को भी दोनों को हटाए जाने का आधार माना जा रहा है। गौर करने लायक एक बात ये भी है कि आगामी 15 अगस्त को राज्य स्तरीय स्वाधीनता समारोह अजमेर में होना है और उसमें वसुंधरा स्वयं आएंगी, तो क्या इससे पहले दोनों मंत्रियों की छुट्टी कर दी जाएगी।
बहरहाल देखते हैं कि यह समाचार, जिसे कि अफवाह की ही संज्ञा दी जानी चाहिए, कितना सही साबित होता है।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 16 जून 2016

अदिति मेहता की तरह ही हैं गौरव गोयल के पास पावर

गौरव गोयल
कानाफूसी है कि जिस प्रकार तत्कालीन कलेक्टर श्रीमती अदिति मेहता पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत का वरदहस्त था, ठीक उसी प्रकार मौजूदा कलेक्टर गौरव गोयल को भी वर्तमान मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने फ्री हैंड दे रखा है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि जिस प्रकार अदिति मेहता ने बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटा कर अजमेरवासियों को सुधार दिया था, उसी प्रकार गौरव गोयल भी अजमेर का कायाकल्प करने में कामयाब हो जाएंगे।
वस्तुत: जब से गौरव गोयल अजमेर आए हैं और जिस प्रकार त्वरित गति से काम कर रहे हैं, उससे ही लग गया था कि उन पर ऊपर का हाथ जरूर होगा। स्मार्ट सिटी के पैमाने में कहीं भी फिट नहीं बैठ रहे अजमेर को जिस प्रकार गोयल प्रयास कर दूसरी राष्ट्रीय सूची में शामिल करवाने के लिए विशेष कवायद कर रहे हैं, वह भी इसका संकेत है कि उनमें जो आत्मशक्ति है, उसके पीछे कोई राजनीतिक इच्छा शक्ति भी काम कर रही है। हाल ही जब टॉय बैंक की स्थापना के अवसर पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की तो गौरव गोयल के साथ बात करते वक्त उनका जो लहजा था, वह इस बात का सबूत दे रहा था कि वे उनके कामकाज से पूरी तरह से संतुष्ट हैं। ज्ञातव्य है कि शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी और महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल के बीच छत्तीस के आंकड़े के कारण प्रशासन पंगु हो गया था। समझा जाता है कि उसी के मद्देनजर वसुंधरा ने गौरव गोयल को विशेष पावर दे दिए हैं कि वे बिना किसी दबाव के अजमेर का कायाकल्प करें। आगाज तो अच्छा ही नजर आ रहा है, अब अंजाम देखना है कि वाकई वे अदिति मेहता की तरह आम अजमेरवासी के जेहन में स्थान बना पाते हैं या नहीं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000, 8094767000

शुक्रवार, 27 मई 2016

शिव शंकर शर्मा देवनानी का पीए हो न हो, नजदीकी तो है ही


जयपुर जिले के कोटपुतली के प्रागपुरा इलाके की राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, दांतिल में कार्यरत कार्यालय सहायक दिनेश शर्मा के कार्यस्थल पर ही फांसी का फंदा लगा कर आत्महत्या कर लेने का मामले में प्रमुख आरोपी शिव शंकर शर्मा शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का पीए है या नहीं, मगर मीडिया में छपी खबरों और फेसबुक में शाया एक फोटो तो चुगली खा ही रही है कि वह देवनानी का करीबी है। फेसबुक से मिली जानकारी के अनुसार उसने एक पोस्ट के जरिए यह जताने की कोशिश की कि वह देवनानी का करीबी है। 28 अक्टूबर 2014 को उसने देवनानी की एक फोटो पोस्ट कर लिखा कि उन्होंने जयपुर के मोती डूंगरी स्थित गणेश मंदिर में धोक दे कर आशीर्वाद लिया। जाहिर तौर पर इस प्रकार की पोस्टें आम तौर पर नेताओं के समर्थक इसलिए लगाते हैं कि ताकि लोगों को ये लगे कि अमुक नेता उसका करीबी है। और इसी बात का वे फायदा उठाते हैं। मगर दिलचस्प बात ये है कि यही फोटो अगले दिन यानि 29 अक्टूबर को स्वयं देवनानी ने अपनी वाल पर भी पोस्ट की है। एक रोचक बात ये भी है कि अधिसंख्य भाजपाई उसके फेसबुक फ्रेंड हैं। स्थानीय भाजपाई भी खुसर फुसर कर रहे हैं कि यह वहीं शिव शंकर शर्मा जो देवनानी के काफी करीब है। चुनाव के दौरान भी वह काफी सक्रिय था।
बेशक देवनानी के पास इसका ठोस जवाब हो सकता है कि इस प्रकार की पोस्टें तो फेसबुक पर आती ही रहती हैं, कोई समर्थक अगर निजी स्तर पर कुछ कुकृत्य करता है तो उसको उनसे जोड़ कर नहीं देखा सकता, मगर फेसबुक की इन पोस्टों से यह तो स्पष्ट है कि शिव शंकर शर्मा खुद को देवनानी का करीबी बता कर ही विभागीय कर्मचारियों पर रुतबा झाड़ता रहा होगा। गत दिवस दैनिक नवज्योति समाचार पत्र ने तो बाकायदा संकेत दिए हैं कि वह देवनानी का करीबी है। उसमें लिखा है कि पिछले कार्यकाल में वह उनका पीए था और उनके सारे निजी काम उसके मार्फत होते थे और विभाग में अपनी काफी पैठ जमा रखी थी।
अपुन तो पहले ही उसे कथित पीए लिखा था क्योंकि कभी पुलिस ने कहा कि वह पीए नहीं है तो कभी देवनानी के नाम से खबरें छपीं कि वह उनका पीए नहीं है, जबकि मृतक ने सुसाइड नोट में उसे पीए बताया है, इसलिए अहम मसला ये नहीं था कि वह पीए है या नहीं, मगर इतना तय था कि शिव शंकर शर्मा खुद को देवनानी का पीए बताता रहा होगा और उस पर यकीन करके मृतक दिनेश शर्मा ने रिश्वत की राशि दी होगी। अब यह जांच से ही सामने आएगा कि वस्तुस्थिति क्या है? क्या वह देवनानी को बताए बिना उनके नाम पर तबादलों का गोरखधंधा कर रहा था या यह सब देवनानी की देखरेख में हो रहा था? हालांकि मंत्री होने के कारण यकायक उन पर कोई आंच आती हुई नजर नहीं आ रही, मगर कांग्रेसियों तो उन्हें निशाने पर लेने का मौका मिल ही गया है।

देवनानी के विरोध के चलते तो नहीं हुई मोदी की सभा स्थगित

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आगामी 31 मई की अजमेर यात्रा यकायक तो तय हुई और तुरत फुरत में स्थगित भी हो गई। हालांकि कहा ये जा रहा है कि ऐसा राज्यसभा चुनाव की वजह से हुआ, मगर यह बात किसी के गले नहीं उतर रही।
यह बात सच है कि वीवीआईपी के पहले से तयशुदा बड़े कार्यक्रम भी किन्हीं भी अपरिहार्य कारणों से आखिरी वक्त पर स्थगित या रद्द हो जाते हैं। मगर ताजा मामला कुछ भिन्न है। सामान्य सी बात है कि राज्यसभा चुनाव का कार्यक्रम तो पहले से ही तय था। जाहिर तौर पर ऐसे मौके पर राजनीतिक जोड़-तोड़ के लिए प्रधानमंत्री का राजधानी में रहना जरूरी था। बावजूद इसके अजमेर का कार्यक्रम अचानक तय कर दिया गया।
अव्वल तो इसी पर अचरज हो रहा था कि जब यहां कोई बड़े स्तर का उद्घाटन या समारोह नहीं हो रहा था तो ऐसी कौन सी विशेष बात थी कि जिसके चलते अजमेर में उनकी सभा निर्धारित की गई। चलो ये बात मान ली जाए कि अपनी सरकार के कार्यकाल के दो साल पूरे होने पर उपलब्धियां गिनाने के लिए वे जनता के बीच जाना चाहते थे, मगर उसके लिए राजस्थान और विशेष रूप से अजमेर ही को क्यों चुना गया? और चुन भी लिया तो उससे ज्यादा अचरज इस बात पर है कि अचानक स्थगित क्यों किया गया? राज्यसभा चुनाव वाली बात तो कम ही समझ में आती है।
आम तौर पर प्रधानमंत्री स्तर के वीवीआईपी के कार्यक्रम 15-20 दिन पहले तय होते हैं। उसके लिए बाकायदा एक हफ्ता पहले खुफिया तंत्र अपना जाल बिछा लेता है। मोदी की यात्रा तो आधिकारिक रूप से अचानक 26 मई को तय हुई और उसकी तैयारी केलिए भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी सहित राज्य सरकार के पांच मंत्री अजमेर आ गए। प्रशासन व पुलिस का तंत्र भी तुरत फुरत में मुस्तैद हो गया। सभा कायड़ विश्राम स्थली पर करना तय हुआ। किसी को भी आशंका नहीं थी कि कार्यक्रम यकायक स्थगित हो जाएगा, क्योंकि स्थगित होने का कोई कारण ही नहीं दिखाई दे रहा था। कानाफूसी है कि कहीं परनामी की मौजूदगी में स्वामी कॉम्पलैक्स में हो रही मंत्रियों की बैठक के दौरान शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी के जबरदस्त विरोध के चलते तो मोदी की सभा स्थगित नहीं की गई। हो सकता है राज्य सरकार को लगा हो कि चूंकि तबादला व्यवसाय के चक्कर में एक शिक्षा कर्मी की आत्महत्या की वजह से देवनानी कांग्रेस के निशाने पर हैं और मीडिया में भी बढ़-चढ़ कर खबरें आ रही हैं, तो चंद दिन बाद ही मोदी की यात्रा को देखते हुए कांग्रेसी इसे बड़ा मुद्दा न बना लें।  मोदी तो असम में जीत और दो साल पूरे करने की खुशी में सीना फुला कर आएं और यहां उन्हीं की पार्टी की राज्य सरकार के एक मंत्री का भ्रष्टाचार के आरोप में कड़ा विरोध होने पर किरकिरी हो जाए। हालांकि ये कयास मात्र ही है, मगर मोदी की अचानक तय हुई यात्रा अचानक ही स्थगित होने पर सभी आश्चर्यचकित हैं।