बुधवार, 16 नवंबर 2016

चुनाव नहीं लड़ेगी कीर्ति पाठक

किसी समय अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान उभरी और बाद में आम आदमी पार्टी में सक्रिय रहीं श्रीमती कीर्ति पाठक आज भी सक्रिय हैं। आंदोलन के दौरान व्यवस्था के खिलाफ उग्र रूप में आवाज उठाने वाली ये महिला आज व्यवस्था में कैसे सुधार किया जाए, कैसे मदद की जाए, कैसे नवाचार किया जाए, इसके लिए काम कर रही हैं। वे इन दिनों यूनाइटेड अजमेर नामक संगठन या यूं कहिए कि मुहिम की संयोजिका हैं और निरंतर किसी न किसी सकारात्मक कार्य में जुटी रहती हैं। उनकी इस सक्रियता के चलते ही कई लोगों के जेहन में यह सवाल उठता है कि कहीं वे आगे चल कर चुनाव लडऩे का मानस तो नहीं रखतीं। इसकी वजह ये है कि अमूमन इसी प्रकार समाजसेवा के बाद लोग राजनीति का रुख अख्तियार करते हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भी उनके बारे में ऐसे कयास थे, मगर उन्होंने तब भी यही कहा था कि वे कभी सक्रिय राजनीति में नहीं आएंगी। हालांकि बाद में आम आदमी पार्टी  से जुडऩे पर सक्रिय राजनीति में तो आईं और उन पर ऐसा दबाव था कि चुनावी रण में उतरें, मगर वे पीछे हट गईं। एक बार फिर उनकी सक्रियता पर ये सवाल उठ रहे हैं कि वे चुनावी तैयारी कर रही हैं। इस पर उन्हें स्पष्ट करना पड़ा है कि ऐसा कुछ नहीं है। बाकायदा घोषणा कर रही हैं कि वे कभी चुनाव नहीं लड़ेंगी। हालांकि अब भी एक संदेह तो बरकरार है ही कि वे चुनाव के वक्त कोई न कोई भूमिका अदा करेंगी। ठाली तो नहीं बैठी रहेंगी। वे किस का साथ देंगी, इसका कयास आप करिये।
बहरहाल, चुनाव न लडऩे की घोषणा करते हुए उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात रखी है, उसे हूबहू दिया जा रहा है, ताकि बाद वक्त सनद रहे:-

स्वार्थ के इस समय में निस्स्वार्थ भाव से की जाने वाली सेवा पर भी लोगों को शक होता है ...
वाजिब है क्यूँकि हमारी मनःस्थिति वर्तमान काल से जुड़ी होती है ...
यूनाइटेड अजमेर एक ग़ैर राजनैतिक initiative है , इस में सभी अजमेरवासी अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता से इतर एक अजमेरवासी के रूप में जुड़े हैं ...
पर हाँ सब के राजनैतिक जुड़ाव को छुपाया नहीं गया है ...
इस initiative की संयोजिका होने के नाते साथियों की अपेक्षाएँ मुझ से कुछ ज़्यादा हैं, और होनी भी चाहिएँ क्यूँकि जब कोई व्यक्ति lead करता है तो उसे एक example set करना होता है ...
Whatsapp group में परसों रात एक चर्चा के दौरान एक सहयोगी भाई ने अपने और उन के जानकारों के मस्तिष्क में जो प्रश्न था उसे पूछा ...
आप सभी साथियों के साथ उस उत्तर को share कर रही हूँ ताकि यदि किसी को कोई भी शंका हो तो दूर हो जाए ....
मैं कभी भी चुनाव नहीं लड़ूँगी और इस initiative से किसी भी प्रकार का वोट के रूप में फ़ायदा नहीं लूँगी ...
आशा है आप कि शंका का निवारण हो गया होगा ...
UNITED AJMER सिर्फ़ अजमेरवासियों को निस्स्वार्थ भाव से जोड़ कर अजमेर का चेहरा बदलने की कोशिश मात्र है ...
जय हिंद !!!
- कीर्ति पाठक

सोमवार, 14 नवंबर 2016

मोदी का कदम पड़ा उलटा, बीजेपी को बड़ी देर में समझ आया

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से 8 नवंबर की रात यकायक पांच सौ व एक हजार का नोट बंद करने की घोषणा को काले धन पर बड़ा हमला मान कर भाजपा उत्साहित थी। इसे काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक की संज्ञा देते हुए मोदी को एक महान नेता कहने वालों का हुजूम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर टूट पड़ा। बेशक यह एक कड़ा और साहसिक या कहें कि दुस्साहिक कदम था, जिसे कदाचित गैर भाजपा मानसिकता वाले भी उचित मान रहे थे। मगर उसी रात और दूसरे दिन जब बाजार में अफरातफरी मची और बाद में बैंकों व एटीएम पर लंबी कतारें लगने लगीं, इस कदम के आफ्टर इफैक्ट पर ध्यान गया। बैंकों व एटीएम के बाहर न छाया का प्रबंध, न पानी की व्यवस्था, लंबा इंतजार। आम आदमी त्राहि त्राहि कर बैठा। दिन प्रतिदिन गुस्सा बढऩे लगा। कई घटनाएं भी हुईं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी मोदी पर जम कर हमले होने लगे। तब जा कर भाजपा को समझ में आया कि मोदी का यह रामबाण उलटा पड़ रहा है। छह दिन बाद जा कर ख्याल आया कि अब डैमेज कंट्रोल की सख्त जरूरत है। इसी के चलते भाजपा अजमेर देहात के जिलाध्यक्ष प्रो. बी. पी. सारस्वत ने सभी मंडल अध्यक्ष, पदाधिकारी एवं कार्यकर्ताओं से अपील की है कि प्रधानमंत्री जी के ऐतिहासिक निर्णय के बाद सभी बैंकों और पोस्ट ऑफिस सहित वित्तीय संस्थाओं में, जहां नोट बदले जा रहे है, वहां पर आप सभी कार्यकर्ता समय निकाल कर व्यवस्थाओं में सहयोग करें। वहां नोट बदलने के लिए फॉर्म भरना, चाय-पानी की व्यवस्था करना आदि कार्य करके प्रधानमंत्री जी की इस सकरात्मक पहल में अपना योगदान दें।
कुछ इसी प्रकार कांग्रेस को भी लगा कि इस मौके पर जनता की सेवा करके उनका दिल जीता जा सकता है, सो शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष विजय जैन ने तय किया है कि कलेक्टर चौराहे पर स्थित एसबीआई पर लंबी लाइन में लग कर तकलीफ पा रहे लोगों की सहायता की जाएगी। 

बुधवार, 2 नवंबर 2016

जमीअत के जलसे से सूफीवाद को कैसा खतरा?

जमीअत उलेमा-ए-हिंद के प्रस्तावित राष्ट्रीय जलसे के विरोध के कारण अटकी आयोजन की मंजूरी के बीच उसकी तैयारी भी चल रही है, लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर ये विरोध हो क्यों रहा है? इस आयोजन से सूफीवाद को खतरा क्यों है? हालांकि मूल रूप से ऑल इंडिया उलेमा मशायख बोर्ड इसका विरोध कर रहा है, मगर कुछ खादिम भी इसके साथ जुड़े हुए हैं, अलबत्ता पूरी खुद्दाम जमात और आम मुसलमान कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं।
जहां तक महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह से जुड़े चंद सूफी मतावलंबियों के तर्क का सवाल है, वो तो पूरी तरह से बेदम नजर आता है। बताया जा रहा है कि दरगाह से जुड़े कुछ प्रतिनिधि ये तर्क दे रहे हैं कि चूंकि जमीअत की विचारधारा ख्वाजा साहब के सूफीवाद से अलग है, वे दरगाहों व खानकाहों को नहीं मानते, इस कारण जमीयत की विचारधारा वालों को अजमेर में अधिवेशन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
सवाल ये उठता है कि क्या पूरा अजमेर सूफीवाद को मानता है? अगर मानता भी है तो क्या किसी और विचारधारा वालों को यहां आने पर आप उन्हें रोकेंगे? क्या अजमेर के सारे मुसलमान केवल सूफीवाद को ही मानते हैं? क्या अजमेर में दरगाहों व खानकाहों को नहीं मानने वाले नहीं रहते हैं? क्या केवल विचारधारा भिन्न होने के आधार पर आप किसी और विधारधारा वाले को कोई जलसा नहीं करने देंगे? क्या जिस प्रकार जमीयत के जलसे का जिस तर्क के आधार पर विरोध किया जा रहा है, ठीक उसी प्रकार हिंदूवादी विचारधारा वाले संगठनों का कोई सम्मेलन हो तो वे उसका भी उसी तर्क के आधार पर विरोध करेंगे? क्या सूफीवाद इतना कमजोर है कि किसी और विधारधारा वाले अजमेर में जलसा करेंगे तो वह प्रभावित होगा? यानि कि जहां तक तर्क का सवाल है, वह बिलकुल लचर है।
दरअसल सूफीवाद के जो पैरोकार इस जलसे का विरोध कर रहे हैं, वे खुद ही सूफीवाद से नावाकिफ लगते हैं। सूफीवाद अपने आप में सभी धर्मों को समान तवज्जो देने के जीवन दर्शन पर टिका है। उसकी शिक्षाएं किसी भी धर्म के विरोध की बात नहीं करतीं। उलटे सभी को अपने में समाने की क्षमता रखती हैं। तभी तो ख्वाजा साहब के दर पर हर मजहब का आदमी आता है। कदाचित मुसलमानों से भी ज्यादा हिंदू जायरीन यहां आते हैं। जब पूरी तरह से भिन्न जीवन पद्धति को मानने वालों का यहां स्वागत है तो विशुद्ध मुसलमान का विरोध क्यों कर होना चाहिए?
कैसी विडंबना है। जिस हिंदू बहुल शहर में सूफीवाद को कोई खतरा नहीं है तो इस्लाम को मूल रूप में मानने वाले मुस्लिमों से क्या खतरा है? आखिरकार सूफीवाद इस्लाम से ही तो निकला है। यदि आसान शब्दों में कहें तो उदार और सभी मान्यताओं को अपने में समाने वाला पंथ है सूफीवाद। वस्तुत: आम मुस्लिम और सूफी में मोटा फर्क ये है कि मुस्लिम धर्म को मूल रूप में मानने वाले बुतपरस्ती व किसी मजार पर सजदा करने के खिलाफ हैं। वे केवल खुदा के आगे ही झुकते हैं और मोहम्मद साहब को उनका पेगम्बर मानते हैं, जबकि सूफी खुदा में अकीदा रखते हुए मस्जिद के अतिरिक्त दरगाहों में भी इबादत करते हैं। सूफी परंपरा में ख्वाजा साहब का मुकाम सबसे ऊंचा है, जिनकी बारगाह में आ कर हर धर्म का आदमी रूहानी सुकून पाता है।
खैर, होना तो यह चाहिए कि सूफी मत करे मानने वाले जमीअत का इस्तकबाल करें, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि भले ही चंद खादिमों में विरोध के लिए साथ रखा गया है, मगर लड़ाई वर्चस्व की है। ऑल इंडिया उलेमा मशायख बोर्ड नहीं चाहता कि जमीअत का प्रभाव बढ़े। पिछले दिनों बोर्ड ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने जलसे में बुलवाया था। वैसे बताया जाता है कि जमीअत के नेता भी काफी प्रभाव रखते हैं और जलसे की सशर्त मंजूरी के लिए पूरा दबाव बनाए हुए हैं।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

तो फिर दरगाह कमेटी की मंजूरी के मायने क्या हैं?

तेजवानी गिरधर
पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर जिला कलेक्टर की ओर से अजमेर में कायड़ विश्राम स्थली पर जमीयत उलेमा ए हिंद के राष्ट्रीय अधिवेशन की अनुमति न दिए जाने के बाद हालांकि दरगाह कमेटी ने भी मंजूरी को निरस्त कर दिया है, मगर सवाल ये उठता है कि उसकी मंजूरी के मायने क्या हैं?
असल में दोनों मंजूरियां अलग-अलग हैं। एक है कानून और व्यवस्था के लिहाज से और दूसरी आयोजन स्थल की। हुआ यूं कि आयोजन कर्ताओं ने दोनों मंजूरियों की अर्जियां दीं। चूंकि आयोजन स्थल कायड़ विश्राम स्थली  की देखरेख दरगाह कमेटी करती है, इस कारण उसने वहां अधिवेशन की मंजूरी दे दी। रहा सवाल जिला प्रशासन की अनुमति का तो उसने पुलिस रिपोर्ट को आधार बना कर मंजूरी दिए जाने से इंकार कर दिया। यानि कि दरगाह कमेटी की मंजूरी का अर्थ ही नहीं रहा। यद्यपि उसने मंजूरी को निरस्त कर दिया, मगर जिला प्रशासन की मंजूरी के बिना आयोजन हो भी तो नहीं सकता था, क्योंकि असल मंजूरी तो वही थी। यदि वह मंजूरी निरस्त नहीं करती, तब भी आयोजन असंभव था, क्योंकि वह तो मात्र स्थान की मंजूरी ही थी। दिलचस्प बात ये है कि दोनों ही मंजूरियां जरूरी होने के बाद भी उनके बीच विरोधाभास पैदा किया जा रहा है। ऐसा जताया जा रहा है कि मानों दोनों सरकारी एजेंसियों के बीच टकराव है, जबकि ऐसा है नहीं। दोनों अलग-अलग हैं। मिसाल के तौर पर अगर दरगाह कमेटी स्थान की मंजूरी नहीं देती और जिला प्रशासन आयोजन की मंजूरी दे देता, तो क्या होता, तो स्वाभाविक रूप से आयोजकों को नया स्थान तलाशना पड़ता। अर्थात दरगाह कमेटी की मंजूरी की भी अपनी अहमियत है, भले ही वह मात्र स्थान की है।  ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या कमेटी ने जिला प्रशासन की मंजूरी से पहले अपनी मंजूरी दे कर गलत किया? क्या जिला प्रशासन मंजूरी दे देता तो दरगाह कमेटी भी मंजूरी देने के लिए बाध्य होती? क्या जिला प्रशासन की मंजूरी में ही स्थान की मंजूरी भी अंतर्निहित है? क्या मंजूरी देने की स्थिति में जिला कलेक्टर दरगाह कमेटी को बाध्य कर सकते हैं कि वह भी आयोजन स्थल की मंजूरी दे? इन सवालों पर गौर करने से यही लगता है कि विरोधाभास कहीं भी नहीं है, वह जानबूझ कर पैदा किया गया और नए आए नाजिम लेफ्टिनेंट कर्नल मंसूर अली विवाद से बचने के लिए मंजूरी निरस्त कर दी। उन्होंने बाकायदा जमीयत के महासचिव अब्दुल वाहिद को पत्र लिख कर सूचित किया है कि चूंकि जिला प्रशासन ने मंजूरी नहीं दी है, इस कारण उनकी भी मंजूरी निरस्त की जाती है।
असल में मंजूरी नए नाजिम ने दी भी नहीं थी, वह तो हाल ही इस अतिरिक्त पदभार से मुक्त हुए दौसा कलेक्टर अश्फाक हुसैन दे गए थे। आखिरकार वे भी आईएएस व कलेक्टर जैसे जिम्मेदार अधिकारी हैं। क्या उन्हें पता नहीं था कि जिला प्रशासन की मंजूरी से पहले स्थान की मंजूरी देना गलत है? जाहिर तौर पर उन्हें पता होगा, तभी तो मंजूरी दे दी। कदाचित  उन्हें इस बात का इल्म न हो कि जिला कलेक्टर मंजूरी नहीं देंगे। वैसे भी उन्होंने तो केवल आयोजन स्थल उपलब्ध करवाया था, वहां अधिवेशन जिला कलेक्टर की अनुमति के बिना हो भी नहीं सकता था। इसका अर्थ ये निकलता है कि दरगाह कमेटी को मंजूरी निरस्त करने की जरूरत नहीं थी। अगर वह निरस्त नहीं करती तो भी कानून व्यवस्था वाली मंजूरी के बिना जमीयत अधिवेशन नहीं कर सकती थी। वह ये तर्क नहीं दे सकती थी कि भले ही जिला प्रशासन ने मंजूरी नहीं दी है, मगर चूंकि दरगाह कमेटी ने मंजूरी दी है, इस कारण वे तो अधिवेशन करेंगे ही। बहरहाल, चूंकि विवाद उत्पन्न किया गया, इस कारण नए नाजिम ने मंजूरी निरस्त कर दी। बताया जा रहा है कि जमीयत आयोजन को लेकर अब भी प्रयासरत है, देखते हैं क्या होता है?
-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

भारी दबाव में प्रो. जाट को बनाना पड़ा किसान आयोग का अध्यक्ष

जाट नेता डॉ. हरिसिंह के साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री सुभाष महरिया और महरिया के छोटे भाई फतेहपुर से निर्दलीय विधायक नंदकिशोर महरिया के कांग्रेस में शामिल होने की प्रबल संभावनाओं के चलते भाजपा हाईकमान को पूर्व केन्द्रीय जलदाय राज्य मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट को राजस्थान किसान आयोग का अध्यक्ष बनाना पड़ा। हालांकि केन्द्रीय मंत्रीमंडल से हटाए जाने के बाद से ही जाट समाज में रोष था, जिसका खुल कर प्रदर्शन भी हुआ, नतीजतन भाजपा हाईकमान पर प्रो. जाट को मंत्री के समकक्ष पद देने पर विचार करना पड़ रहा था। यह भी लगभग तय सा था कि उन्हें किसान आयोग का अध्यक्ष बनाया जाएगा। मगर इस मामले में सुस्ती दिखाई जा रही थी।  जैसे ही यह जानकारी आई कि हरिसिंह और महरिया बंधुओं को कांग्रेस में लिया जा सकता है, जाटों के भाजपा से खिसक कर कांग्रेस में जाने का खतरा भांप कर भाजपा हाईकमान भी हरकत में आया। और आखिरकार प्रो. जाट को किसान आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया।
असल में प्रो. जाट को मंत्रीमंडल से हटाए जाने के कारण विशेष रूप से अजमेर का जाट समाज भाजपा से नाराज था। हालांकि प्रदेश स्तर पर तो कोई बड़ा नुकसान होने की आशंका नहीं थी, मगर जाट बहुल अजमेर संसदीय क्षेत्र और अजमेर जिले की तीन विधानसभा सीटों पर जाट भाजपा को झटका देने की स्थिति में थे। ऐसे में प्रो. जाट को राजनीतिक रूप से पुन: प्रतिष्ठित करने का भारी दबाव था।
वस्तुत: प्रो. जाट के साथ बड़ा राजनीतिक मजाक हुआ। वे अच्छे खासे  राज्य में केबीनेट मंत्री थे, मगर केवल पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री सचिन पायलट को हराने के लिए लोकसभा चुनाव लड़ाया गया। दाव कामयाब होने के बाद उन्हें इसके एवज में केन्द्र में राज्य मंत्री बनाया गया, मगर कथित रूप से स्वास्थ्य कारण बताते हुए उन्हें हटा दिया गया और वे महज सांसद बन कर रह गए। ज्ञातव्य है कि वे वसुंधरा के काफी करीब रहे हैं, मगर वसुंधरा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच ट्यूनिंग ठीक न होने का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा था। मगर जब देखा कि कुछ जाट नेता कांग्रेस का रुख कर रहे हैं तो तुरतफुरत में उन्हें किसान आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000