शुक्रवार, 3 मार्च 2017

अकबर का किला ही है उसका नाम

नया बाजार स्थित अकबर के किले का नाम बदल कर अजमेर का किला करने को लेकर किसी खादिम तरन्नुम चिश्ती की ओर से शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी को भेजे गए धमकी भरे पत्र की वजह से यह किला एकबारगी फिर से चर्चा में आ गया है। असल में यह विवाद पूर्व में भी हुआ था, जब इसमें मरम्मत का काम हुआ था और किले के मुख्य द्वार पर  लगे बोर्ड पर अजमेर का किला एवं संग्रहालय लिख दिया गया। जब इतिहासकारों ने विरोध किया तो फिर अकबर का किला लिख दिया गया। इस पर कुछ संगठनों ने विरोध जताया और अंतत: तत्कालीन जिला कलेक्टर आरुषि मलिक ने इस पर अजमेर का किला लिखवा दिया। आपको जानकारी होगी कि पिछले दिनों एक मुहिम चली थी, जिसमें अकबर को महान नहीं मानने और महाराणा प्रताप तो महान मानने पर जोर था। यह वाकया उसी दरम्यान का है।
वस्तुस्थिति ये है कि भले ही आज इस पर अजमेर का किला व एवं संग्रहालय लिखा हुआ है, मगर इस नामकरण का कोई तथ्यात्मक दस्तावेज रिकार्ड में मौजूद नहीं है। रिकार्ड के मुताबिक 1968 में एक गजट नोटिफिकेशन जारी हुआ था, जिसमें इसका नाम अकबर का किला ही बताया गया है, जिसे मैगजीन, राजकीय संग्रहालय व दौलतखाना भी कहा जाता है। किले के मुख्य द्वार के बाद दीवार पर लगे शिलालेख पर भी लिखा है कि अजमेर का मुगल किला बादशाह अकबर के द्वारा हिजरी 978(1570 ईसी) में बनाया गया है अकबर फोर्ट अजमेर। बहरहाल, इस गजट नोटिफिकेशन के बाद ऐसा कोई गजट नोटिफिकेशन रिकार्ड पर जानकारी में नहीं है कि इसका नाम फिर बदल कर अजमेर का किला किया गया हो। संभव है संगठनों के दबाव में आ कर जिला कलेक्टर आरुषि मलिक ने सामाजिक समरसता बरकरार रखने के लिए अजमेर का किला नामकरण कर दिया हो, मगर वह उचंती में ही किया गया माना जाना चाहिए।
लब्बोलुआब, बात इतनी सी है कि अगर इसका नाम अजमेर का किला करना ही था तो बाकायदा नामकरण परिवर्तन की प्रक्रिया अपना कर उसका गजट नोटिफिकेशन करवाया जाना चाहिए था। बस विवाद इतना सा है। स्थानों व योजनाओं के नाम बदलने के अनेकानेक उदाहरण हैं। सत्ता पर काबिज राजनेता अपनी पसंद व विचारधारा के अनुसार नाम बदलते रहे हैं। बस, उसकी विधिक प्रक्रिया का पालन करते हैं, ताकि नाम परिवर्तन रिकार्ड पर आ जाए।
प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि मेरे द्वारा संपादित पुस्तक अजमेर एट ए ग्लांस में अकबर के किले के बारे में जो लिखा हुआ है, वह इस प्रकार है:-
अजमेर शहर के केन्द्र में नया बाजार के पास स्थित इस किले का निर्माण अकबर ने 1571 से 1574 ईस्वी में राजपूतों से होने वाले युद्धों का संचालन करने और ख्वाजा साहब के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए करवाया था। अकबर ने यहां से समस्त दक्षिणी पूर्वी व पश्चिमी राजस्थान को अपने अधिकार में कर लिया था। जहांगीर ने भी 1613 से 1616 के दौरान यहीं से कई सैन्य अभियानों का संचालन किया। इसे राजपूताना संग्रहालय और मैगजीन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें चार बड़े बुर्ज और 54 फीट व 52 फीट चौड़े दरवाजे हैं। यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल भारतीय राजनीति में अहम स्थान रखता है, क्योंकि यहीं पर सम्राट जहांगीर ने दस जनवरी 1916 ईस्वी को इंग्लेंड के राजा जॉर्ज पंचम के दूत सर टामस रो को ईस्ट इंडिया कंपनी को हिंदुस्तान में व्यापार करने की अनुमति दी थी। टामस रो यहां कई दिन जहांगीर के साथ रहा। ब्रिटिश काल में 1818 से 1863 तक इसका उपयोग शस्त्रागार के रूप में हुआ, इसी कारण इसका नाम मैगजीन पड़ गया। वर्तमान में यह संग्रहालय है। पूर्वजों की सांस्कृतिक धरोहर का सहज ज्ञान जनसाधारण को कराने और संपदा की सुरक्षा करने की दृष्टि से भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक मार्शल ने 1902 में लार्ड कर्जन के अजमेर आगमन के समय एक ऐसे संग्रहालय की स्थापना का सुझाव रखा था, जहां जनसाधारण को अपने अतीत की झांकी मिल सके। अजमेर के गौरवमय अतीत को ध्यान में रखते हुये लार्ड कर्जन ने संग्रहालय की स्थापना करके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन एजेन्ट श्री कालविन के अनुरोध पर कई राज्यों के राजाओं ने बहुमूल्य कलाकृतियां उपलब्ध करा संग्रहालय की स्थापना में अपना अपूर्व योग दिया। संग्रहालय की स्थापना 19 अक्टूबर, 1908 को एक शानदार समारोह के साथ हुई। संग्रहालय का उद्घाटन ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन एजेन्ट श्री कालविन ने किया और उस समारोह में विभिन्न राज्यों के राजाओं के अतिरिक्त अनेकों विदेशी भी सम्मिलित हुये। पुरातत्व के मूर्धन्य विद्वान पं. गौरी शंकर हीराचन्द ओझा को संग्रहालय के अधीक्षक पद का भार सौंपा गया और ओझा जी ने अपनी निष्ठा का परिचय ऐसी बहुमूल्य कलाकृतियां एकत्रित कर दिया कि जिसके परिणामस्वरूप अजमेर का संग्रहालय दुर्लभ सामग्री उपलब्ध कराने की दृष्टि से देशभर में धाक जमाये हुए है। इसमें अनेक प्राचीन शिलालेख, राजपूत व मुगल शैली के चित्र, जैन मूर्तियां, सिक्के, दस्तावेज और प्राचीन युद्ध सामग्री मौजूद हैं। सन् 1892 में इसके दक्षिणी पूर्वी बुर्ज में नगरपालिका का दफ्तर खोला गया।
-तेजवानी गिरधर
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देवनानी को धमकीभरा पत्र लिखने वाली शातिर

नया बाजार स्थित अकबर के किले का नाम अजमेर का किला करने को लेकर जिस तरन्नुम चिश्ती ने शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी को धमकी भरा पत्र लिखा है, वह बेशक शातिर है। उसने भाषायी तकनीकी का ख्याल रखते हुए अपना नाम मुल्क की खादिम तरन्नुम चिश्ती लिखा है, जिसका मतलब ये है कि वह मुल्क की खिदमत करने वाली है, जबकि भ्रम ये हो रहा है कि वह अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की खादिम है, क्योंकि उसने नाम के साथ खादिम और चिश्ती लिखा है। वैसे उसने  एक चूक भी की है, वो यह कि खादिम शब्द पुर्लिंग है, अगर वह स्त्री है तो उसे खुद्दामा या खादिमा लिखना चाहिए था, जैसे ख्वाजा साहब के खादिम अपने आप को खुद्दाम-ए-ख्वाजा लिखा करते हैं।
वह है कौन यह तो जांच के बाद ही पता लग पाएगा, मगर उसने भ्रम यह फैलाया है कि वह खादिम है।
दिलचस्प पहलु ये है कि उसने पत्र लिखने का जो समय चुना है, उसके पीछे भी उसका मकसद है। अकबर के किले का नाम अजमेर का किला एवं संग्रहालय कर दिए जाने को काफी वक्त हो गया है। अगर उसे ऐतराज था तो तभी विरोध दर्ज करवाना चाहिए था, मगर उसने ऐसा समय चुना है, जबकि इस वक्त राजस्थान विधानसभा चल रही है। हो सकता है कि उसका ख्याल हो कि इस प्रकार का धमकीभरा पत्र लिखने पर उसकी चर्चा ज्यादा होगी। स्वाभाविक सी बात है कि राज्य के किसी मंत्री को एक समुदाय विशेष का व्यक्ति धमकी देगा तो उससे सनसनी तो होनी ही है, वह भी एक ऐसे ऐतिहासिक स्थल को लेकर जिसके साथ समुदाय विशेष की शख्सियत का ताल्लुक है।
बहरहाल, पुलिस को उस तरन्नुम चिश्ती का तो पता लगाना ही चाहिए, साथ ही इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि कहीं कोई असामाजिक तत्व अजमेर के सांप्रदायिक सौहार्द्र को तो नहीं बिगाडऩा चाह रहा।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 2 मार्च 2017

चांद के ऐलान में बदलाव की नौबत आनी ही नहीं चाहिए

महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के सालाना उर्स के सिलसिले में चांद दिखाई देने के ऐलान में बदलाव को लेकर विवाद गहरा गया है। बदलाव से खफा लोगों द्वारा हिलाल कमेटी के सदस्यों के साथ बदसलूकी के विरोध में कमेटी सदस्य इस्तीफा देने पर आमादा हैं। दुनियाभर में सूफी मत की कदीमी दरगाह में हुआ यह वाकया अफसोसनाक है। दरगाह कमेटी व नाजिम को चाहिए कि वे इस मसले का तुरंत हल निकालें और ऐसे इंतजाम पर विचार करें कि आइंदा इस किस्म की बड़ी गलती न हो।
असल में चांद दिखाई देने का ऐलान करने के लिहाज से हिलाल कमेटी की खासी अहमियत है। उर्स के दौरान किसी दिन अथवा छठी में आने के लिए जायरीन हिलाल कमेटी की ओर से किए जाने वाले चांद के ऐलान के आधार पर ही कार्यक्रम तय करते हैं और ट्रेनों में रिजर्वेशन कराते हैं। इतना ही नहीं स्थानीय स्तर पर भी सारे इंतजामों की बुकिंग इसी आधार पर की जाती है। जाहिर सी बात है कि अगर यहां चांद दिखाई देने के ऐलान में बदलाव होतो है तो वह देशभर आने वाले जायरीन के लिए परेशानी का सबब है। हालांकि हिलाल कमेटी यूं तो सोच-समझ कर ही चांद दिखाई देने का ऐलान करती है, मगर इस बार गफलत हो गई। ये कैसे हुई, इसकी जांच होनी चाहिए।
गौरतलब है कि हिलाल कमेटी ने 27 फरवरी को हुई बैठक के बाद चांद नहीं दिखाई देने का ऐलान किया। इस हिसाब से 1 मार्च से ही जमादिउस्सानी महीने की एक तारीख मानी जाती। चूंकि इस तारीख की बड़ी अहमियत है, इस कारण इसकी खबर तुरंत देशभर में फैल गई। मगर बताया जाता है कि 28 फरवरी को हिलाल कमेटी के पास अहमदाबाद से खबर आई कि चांद 27 को ही दिखाई दे चुका है और चांद की पहली तारीख 28 को ही हो गई है। इसी को आधार बना कर हिलाल कमेटी के सदर मौलाना शब्बीर और कमेटी ने ऐलान कराया कि चांद रात 27 की ही हो गई और 28 को चांद की एक तारीख है। यानि कि ख्वाजा साहब की छठी 5 मार्च को और उर्स का झंडा 24 मार्च को चढ़ेगा। जाहिर तौर पर यह ऐलान होते ही खलबली मच गई। दरगाह से जुड़े कुछ लोगों ने शहर काजी और कमेटी सदस्यों के साथ कथित तौर पर बदसलूकी की।
इस सिलसिले में शहर काजी मौलाना तौसीफ अहमद सिद्दीकी का कहना है कि तकरीबन डेढ़ साल पहले अजमेर में देशभर के उलेमा काजियों के सम्मेलन में तय किया गया था कि खबर मुस्तफीज के आधार पर अजमेर से कहीं बाहर भी चांद दिखाई दिया और अजमेर में चांद नहीं दिखा, तब भी अजमेर में चांद दिखाई देना मान लिया जाएगा। इस खबर मुस्तफीज के आधार पर पहले भी अहमदाबाद से मिली शहादत के आधार पर अजमेर में चांद का ऐलान किया जा चुका है। इस बार हुआ तो लोगों ने विरोध कर दिया। सवाल उठना लाजिमी है कि अगर खबर मुस्तफीज की ही अहमियत है तो चांद के बारे में ऐलान पहले कैसे कर दिया गया। ऐसा करने से पहले कमेटी को पुख्ता हो जाना चाहिए था।
बहरहाल, ताजा हालात ये है कि हिलाल कमेटी के सदस्यों के साथ बदसलूकी के विरोध में कमेटी सदस्य कमेटी के मोहतमिम दरगाह नाजिम के छुट्टी से लौटने पर इस्तीफा देने का ऐलान कर चुके हैं। बेशक हिलाल कमेटी के सदस्यों के साथ हुई बदसलूकी गलत है, मगर उन्हें ये भी सोचना चाहिए कि इस प्रकार चांद की तारीख में बदलाव करने पर लाखों लोगों को कितनी परेशानी होती है और लोगों का गुस्सा होना लाजिमी है। हिलाल कमेटी के सदस्यों को भी सोचना चाहिए कि वे कितनी जिम्मेदारी वाली जगह पर बैठे हैं, जहां के ऐलान पर पूरे देश के जायरीन की नजर रहती है। अगर इस प्रकार चांद दिखाई देने में बदलाव की नौबत आती है तो फिर आइंदा लोग उनके पहले ऐलान पर कैसे ऐतबार करेंगे। बेहतर ये है कि दरगाह नाजिम कमेटी सदस्यों के साथ बैठ कर यह इंतजाम करें कि तारीख में बदलाव की नौबत ही न आए। इसके लिए कोई टाइम मुकर्रर करना चाहिए कि उसके बाद खबर मुस्तफीज को नहीं माना जाएगा, वरना ऐसा वाकया फिर मुकाबिल हो सकता है।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, 26 फ़रवरी 2017

मनन चतुर्वेदी की अनूठी पेंटिंग : कहीं स्टंट बन कर न रह जाए

राजस्थान बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष मनन चतुर्वेदी बहुत सक्रिय हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। कदाचित इस प्रकार के अन्य आयोगों के अध्यक्षों की तुलना में अधिक। यह बहुत अच्छी बात है कि वे इस प्रकार के पद पर रह कर केवल उसका लाभ लेने की बजाय दिल लगा कर काम कर रही हैं। बेशक उसका लाभ होता ही होगा।
गत दिवस उन्होंने अजमेर में बच्चों को नशे की लत से छुटकारा दिलाने के लिए जागरूकता अभियान के तहत लगातार 24 घंटे की पेंटिंग बनाई। यह एक नया प्रयोग था, लिहाजा लोगों में कौतुहल भी खूब रहा। कुछ सरकारी तामझाम तो था ही, कुछ जागरूक लोगों की भागीदारी भी रही। इनमें छपास के रोगी व आधुनिक फेसबुकिये भी मौजूद थे। बड़ी तारीफ हुई। मीडिया कवरेज भी जम कर मिला। कार्यक्रम सफल रहा। मगर असल सवाल ये कि क्या वाकई ऐसे स्टंट जनता में वास्तव में जागरूकता पैदा करते हैं?
वस्तुत: कोई भी संदेश देना और उसका अनूठा प्रयोग करना अच्छी बात है, मगर धरातल पर वह कितना कारगर होता है, वह ज्यादा जरूरी है। चाहे दहेज के खिलाफ नुक्कड़ नाटक हों या फिर भ्रूण हत्या रोकने केलिए लघु नटिकाओं का प्रदर्शन, सच्चाई ये है कि इनसे संदेश तो जाता है, मगर न तो दहेज रुका, न ही भ्रूण हत्या। कानून भी कई बार बेबस सा नजर आता है, क्योंकि उसका इंप्लीमेंटेंशन ठीक से नहीं होता। बच्चों में नशे की आदत वाला मसला भी ऐसा ही है। पुलिस ने कई बार कार्यवाही की, मगर नतीजा ढ़ाक के तीन पात ही रहा है। यदि गहराई से जांच करेंगे तो पाएंगे कि जिन दुकानदारों को बच्चों को नशे का सामान बेचने के आरोप में पकड़ा गया, वे फिर से यही धंधा कर रहे हैं। पुलिस को भी सब पता है। या तो वह व्यवस्था का हिस्सा बनी हुई या फिर शिकायत मिलने पर फौरी कार्यवाही कर इतिश्री कर रही है। अर्थात समस्या का समाधान करने के तरीके में ही कहीं गड़बड़ है। बेशक समस्या है कि नशे का कारोबार करने वालों पर कैसे काबू पाया जाए, मगर उससे भी कहीं ज्यादा ये जानना जरूरी है कि बच्चे नशे की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं? अगर हमारा ध्यान उस पर नहीं है तो समझिये कि नब्ज हमारी पकड़ में है ही नहीं, ऐसे में इलाज की उम्मीद बेमानी है।
मनन चतुर्वेदी को साधुवाद कि उन्होंने एक अनूठा प्रयोग किया। मकसद तो तारीफ ए काबिल है। मगर प्रत्यक्षत: नजर यही आया कि इस अभियान का कथित रूप से हिस्सा बने लोग औपचारिता भर निभा रहे थे। किसी को चर्चित चेहरा बनी मनन के दीदार का शौक था तो किसी को उनकी पेंटिंग देखने का। या तो छपास पीडि़त थे, या फिर फेसबुकिये, जिन्हें मनन के साथ फोटो खिंचवाने का शौक था। स्टाइलिश मनन भी बड़े मजे से सैल्फियां खिंचवा रही थीं। वे सोशल एक्टिविस्ट हैं, ये तो सर्वविदित ही है, एक अच्छी पेंटर भी हैं, ये भी स्थापित हो गया। साथ ही स्टंटबाज भी। खुदा करे, उनका अभियान कामयाब हो, कहीं स्टंट भर बन कर न रह जाए।
-तेजवानी गिरधर

पाथ वे के लिए आनासागर को पाटना क्या अवैध नहीं?

यह इस मुर्दा शहर अजमेर की विडंबना ही कही जाएगी, जिसमें एक ओर तो आनासागर के डूब क्षेत्र में हो रहे अतिक्रमण और निर्माण को अवैध माना जा रहा है व उसे हटाने के लिए हाईकोर्ट को निर्देश देने पड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर आनासागर को खूबसूरत बनाने के नाम पर पाथ वे के लिए प्रशासन खुद ही उसे पाट रहा है।
ज्ञातव्य है कि सबको पता है कि आनासागर के डूब क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में सिंचाई विभाग तथा यूआईटी स्तर पर कराए गए सर्वे में 130 आवास ऐसे हैं, जो पूर्णतया डूब क्षेत्र में बने हैं। सरक्यूलर रोड स्थित सभी वाणिज्यिक मॉल, आवासन मंडल के वैशाली नगर सेक्टर तीन तथा इसके नीचे बने आवास, गैस एजेंसी का गोदाम, माहेश्वरी पब्लिक स्कूल के सामने स्थित मंदिर व आवास, आदर्श विद्या मंदिर, विश्राम स्थली, महावीर कॉलोनी का अधिकांश हिस्सा झील के डूब क्षेत्र में ही आता है। झील की वर्तमान दुर्दशा के लिए केवल आम आदमी ही जिम्मेदार नहीं, बल्कि सरकारी एजेंसियां भी इसमें पूरी तरह शामिल हैं। झील के भराव क्षेत्र में शुमार होने के बावजूद आवासन मंडल ने वैशाली नगर सेक्टर तीन तथा इसके नीचे आवासों का निर्माण करा डाला, जिन्हें पानी की मार से बचाने के लिए रिंग डेम का निर्माण तक हुआ। इसके अलावा एडीए की अनदेखी के कारण इसके फुल टैंक लेवल के दायरे में आम लोगों ने आवास ही नहीं बड़े वाणिज्यिक मॉल भी खड़े कर दिए। इन्हें हटाने के बजाय इनका नियमन किया जाता रहा है।
सर्वविदित है कि राजस्थान हाईकोर्ट की दो जनहित याचिकाओं में झीलों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों का मूल स्वरूप बनाए रखने के अलावा इनके कैचमेंट एरिया में होने वाले अतिक्रमण को हटाने और बहाव क्षेत्र को कब्जा मुक्त कराने को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय दिए थे। इसी तरह अजमेर की आनासागर झील समेत छह जल स्रोतों को दुर्दशा मुक्त करने के लिए कॉमन कॉज सोसायटी की जनहित याचिका में भी हाईकोर्ट ने 2009 में जिला प्रशासन को विभिन्न दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके अनुसार कैचमेंट एरिया में होने वाले अवैध निर्माणों को रोकने के लिए आवश्यक उपाय किए जाने को कहा गया। ऐसे में यह बेहद विचारणीय है कि क्या खूबसूरती के नाम पर पाथ वे बनाने के लिए आनासागर को पाटा जाना अवैध नहीं? मगर अफसोस कि इस मुर्दा शहर का कोई धणी धोरी नहीं। आनासागर की खूबसूरती के नाम पर जो काम हो रहा है, सब उसकी तारीफ कर रहे हैं, इससे क्या हाईकोर्ट के निर्देशों की अवहेलना नहीं हो रही, इसकी किसी को सुध नहीं। जो प्रभावशाली लोग हैं, वे चुप हैं और जो नैपथ्य में चले गए, उनकी कोई सुनने वाला नहीं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से प्रशासन को खुली छूट मिली हुई है।
एक बारगी मान भी लिया जाए कि पर्यटन के लिहाज से ये अच्छा काम है, मगर कोई तो मास्टर प्लान होना चाहिए। बेशक ऐतिहासिक आनासागर अजमेर का गौरव है। अगर आज तक इसे ठीक से डवलप किया जाता तो यह अकेला पर्यटकों को आकर्षित में सक्षम होता, मगर अफसोस कि आज तक किसी जनप्रतिनिधि या प्रशासन ने इस दिशा में ठोस प्रयास नहीं किया। हां, बातें बहुत होती रहीं और उसी के अनुरूप छिपपुट प्रयोग भी हुए, मगर आनसागर की हालत जस की तस रही।
सच तो ये है कि लंबे समय तक यह गंदगी और बदबू की समस्या से ग्रसित रहा, इस कारण सारा ध्यान केवल इसी पर था कि कैसे इससे निजात पाई जाए। इस पर बड़ी मुश्किल से काबू पाया जा पाया है। इसके अतिरिक्त डूब क्षेत्र में सैकड़ों मकान व अन्य व्यावसायिक भवन बन जाने के बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद भी अब तक ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इसका स्वरूप क्या होगा? इसे कितना भरा होना चाहिए, इसको लेकर भी खूब माथापच्ची हुई, क्योंकि बारिश के मौसम में अचानक ज्यादा वर्षा होने पर चैनल गेट खोलने पर निचली बस्तियों में पानी भरने की खतरा बना रहता है। हर बारिश में प्रशासन की इसी पर नजर रहती है।
अभी पाथ वे का काम हो रहा है, मगर वह फाइनल भी होगा या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसा इसलिए कि उनके पहले प्रशासन ने लगातार हो रही आत्महत्याओं के चलते सुरक्षा के मद्देनजर रामप्रसाद घाट और पुरानी चौपाटी पर लोहे की जाली लगवाई गई, वह अब आनासागर का खूबसूरत नजारा पाने के लिए पाथ वे बनाने के लिए तोड़ी जा रही है। अफसोस होता है कि दो साल पहले इस जाली पर लाखों रुपए खर्च किए गए, अब तोडऩे व फिर नए सिरे निर्माण पर लाखों रुपए लगाए जा रहे हैं। यानि कि ठेकेदारों के वारे-न्यारे हैं। इस बात की क्या गारंटी है कि आने वाले समय में प्रशासन में बैठे अफसर इसे कायम रखेंगे? ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इसके लिए कोई मास्टर प्लान क्यों नहीं बना दिया जाता?
-तेजवानी गिरधर