बुधवार, 20 सितंबर 2017

क्या सचिन पायलट अजमेर से चुनाव लड़ेंगे?

क्या प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट अजमेर लोकसभा सीट के लिए आगामी नवंबर-दिसंबर में संभावित उपचुनाव लड़ेंगे, यह सवाल यहां की राजनीतिक फिजां पर छाया हुआ है। हर आदमी के जेहन में यह सवाल कौंध रहा है, जिसे पैदा करने में मीडिया की अहम भूमिका है।
यूं सवाल स्वाभाविक भी लगता है, क्योंकि पिछले दो चुनाव वे यहां से लड़ चुके हैं, जिसमें एक बार जीते व दूसरी बार मोदी लहर के चलते नहीं जीत पाए। उनके यहां से लडऩे की चाहत उन लोगों में ज्यादा हो सकती है, जिन्हें अहसास है कि एक बार जब वे यहां से जीतने के बाद केन्द्र में अजमेर के पहले मंत्री बने तो खूब काम करवाए। इसके अतिरिक्त चूंकि उनके मुकाबले का दूसरा प्रत्याशी कांग्रेस में है नहीं, इस कारण भी उनसे लडऩे की उम्मीद की जा रही है। मगर बदले राजनीतिक समीकरणों में उनके यहां से लडऩे का सवाल पूरी तरह से बेमानी भी है। वजह ये है कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया ही इस कारण गया कि उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जाना है। उसी के तहत विधानसभा चुनाव में बुरी तरह परास्त और पस्त कांग्रेस में उन्होंने पिछले तीन साल में जान फूंकने के लिए दिन-रात एक कर रखा है। उनकी मेहनत का ही फल है कि आज कांग्रेस, भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में मानी जाती है। ऐसे में एक अदद लोकसभा सीट के चुनाव, वो भी एक डेढ़ साल के कार्यकाल के लिए होने वाले उपचुनाव में उनका लडऩा निहायत ही असंभव सा है। यह बात बिलकुल सीधी और सहज है, फिर भी मीडिया ने इसे तूल दे रखा है।
हालांकि यह सही है कि वे कांग्रेस के एक आइकन हैं, इस कारण उनकी हर गतिविधि पर सब की नजर रहती है। केन्द्र व राज्य में सत्ता पर काबिज भाजपा के लिए अजमेर सीट प्रतिष्ठा का सवाल है, इस कारण उसे इस मुद्दे पर विचार करना ही पड़ रहा है। उनको टक्कर देने के लिए भाजपा के पास कोई प्रत्याशी नहीं है। पिछली बार जाटों की बहुलता के आधार पर प्रो. सांवरलाल जाट को प्रत्याशी बनाया गया, मगर सब जानते हैं कि उनकी जीत में ज्यादा भूमिका मोदी लहर की ही रही। अब न तो मोदी लहर जैसी कोई बात है और न ही प्रो. जाट जैसा नेता भाजपा के पास है। ऐसे में उसका चिंतित होना स्वाभाविक है।
बात मीडिया की करें तो उसने इस मुद्दे को इस तरीके से उठाया कि सचिन चुनाव लडऩे पर केवल इसी कारण विचार करें कि अगर वे नहीं लड़े तो यह माना जाएगा कि हार के डर से घबरा गए, जबकि मुद्दा ये है ही नहीं। उनकी भूमिका अब एक सांसद की नहीं रह गई है। कांग्रेस की ओर से वे भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखे जा रहे हैं, तो भला वे क्यों बहुत कम समय के लिए सांसद बनना चाहेंगे, जो कि केन्द्र में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार के रहते अजमेर को कुछ विशेष नहीं दे सकते। दैनिक भास्कर की ओर से एक कथित सर्वे का क्या परिणाम आया, ये तो सर्वे करने वाली कंपनी ही जाने, मगर उसी सर्वे की खबर को फेसबुक पर शाया किया गया तो अधिसंख्य ने यही राय जाहिर की कि वे सांसद की बजाय मुख्यमंत्री के रूप में पसंद किए जा रहे हैं। सचिन पायलट से संबंधित खबर के लिए मीडिया की आतुरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जैसे ही प्रदेश कांग्रेस सेवादल के अध्यक्ष राकेश पारीक की जुबान फिसली, अथवा नहीं फिसली, उसे तुरंत लपक कर यह खबर बना दी कि उन्होंने सचिन पायलट के अजमेर से लडऩे की घोषणा की है, जबकि एक सामान्य बुद्धि भी अंदाजा लगा सकता है कि भला पारीक कैसे घोषणा कर सकते हैं। पारीक की ओर से भी सोचें तो कैसे कोई इतना जिम्मेदार नेता इतना अहम निर्णय सुना सकता है, जबकि इसका अधिकार क्षेत्र कांग्रेस हाईकमान व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पास है। निश्चय ही उनका ये मकसद ये रहा होगा कि सचिन पायलट को अजमेर से चुनाव लडऩे का आग्रह किया जाए। हालांकि बाद में उन्होंने जब अपनी मंशा को स्पष्ट किया तो मामले का पटाक्षेप हो गया।
बात अगर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के नजरिये की करें तो उनके प्रति लगाव के चलते वे ऐसा कह सकते हैं कि उन्हें यह चुनाव लडऩा चाहिए, मगर वे भी मन ही मन जानते हैं कि उनके ऊपर पूरे प्रदेश का दायित्व है, अत: सारा ध्यान आगामी विधानसभा चुनाव पर देंगे। हां, इतना जरूर है कि उन पर यह पूरा मानसिक दबाव रहेगा कि ऐसा प्रत्याशी मैदान में उतारें जो जीत कर आए, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और अधिक उत्साह के साथ कमर कस सके।
कुल मिला कर मोटे तौर पर यही माना जा सकता है कि वे उपचुनाव नहीं लड़ेंगे। केवल एक क्षीण सी संभावना ये है कि हाईकमान यह सोच कर  कि उनके अतिरिक्त कोई दूसरा उपयुक्त प्रत्याशी है नहीं और इस उपचुनाव को किसी भी सूरत में जीतना है, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में जीत का आगाज हो, तो उन्हें चुनाव लडऩे को कहे। अथवा स्वयं उन्हें लगे कि ऐसा करना उचित रहेगा, तभी उनके लडने की संभावना बनती है पर यह उनके स्वविवेक पर निर्भर करता है। कानूनी रूप से एक सांसद चुने जाने के बाद भी वे मुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं और छह माह में किसी भी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ कर विधायक बन सकते हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, 17 सितंबर 2017

बीजेपी की जाजम तैयार, मगर उतारे किसको?

अजमेर लोकसभा सीट के लिए आगामी नवंबर-दिसंबर में संभावित उपचुनाव के लिए भाजपा की संगठनात्मक जाजम तो तैयार है, मगर सबसे बड़ी समस्या ये है कि उस पर उतारे किस नेता को?ï उसे यह उपचुनाव इसलिए जीतना बहुत जरूरी है, क्योंकि इस के परिणाम आगामी साल में होने वाले विधानसभा चुनाव को सीधा-सीधा प्रभावित करेंगे। एक तरह से इस चुनाव का परिणाम ठीक उसी तरह से है, जैसे चावल पका या नहीं, यह देगची में से एक चावल को निकाल कर देखा जाता है। बेशक केन्द्र व राज्य में भाजपा की सरकार होने का फायदा मिलना ही है, मगर ये चुनाव इस बात का सेंपल होगा कि राजस्थान में मोदी लहर व वसुंधरा के ग्लैमर की हालत कैसी है?
वस्तुत: संगठनात्मक लिहाज से भाजपा बहुत अधिक सक्रिय हो गई है। बूथ स्तर तक की चुनावी सेना व सैनिक कमर कस कर तैयार हैं। सत्ता है तो साधन-संसाधन की भी कोई कमी नहीं है। मगर डर सिर्फ इस बात का है कि जनता का मूड कहीं बिगड़ तो नहीं गया है? उसकी अनेक वजुआत हैं। यथा नोटबंदी व जीएसी की वजह से आई बाजार में आई घोर मंदी, महंगाई, बेराजगारी, काले धन को लेकर की गई बड़ी-बड़ी घोषणाएं इत्यादि इत्यादि। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री वसुंधरा को अपेक्षित फ्री हैंड न मिलने के कारण उनका परफोरमेंस निल है। इस बात को ठेठ गांव में बैठा भाजपा का कार्यकर्ता भी जान रहा है। मोदी व वसुंधरा के नाम पर जनता का वोट लेने वाला कार्यकर्ता के सामने जब सवाल खड़े करती है, तो उससे जवाब देते नहीं बनता।
मायूस मोदी समर्थकों के साथ ही ग्रहों का चक्र भी मोदी से कुछ यूं  नाराज सा है कि पिछले दो महीने से हर घटना सरकार के लिए अपयश लेकर आ रही है। वो चाहे गोरखपुर में बच्चों का असमय संसार छोडऩा हो या फिर एक के बाद रेल दुर्घटनाएं या बाबा राम रहीम का भाजपा के सरंक्षण में बेनकाब होना या फिर एबीवीपी की ताजा चुनावी पराजय, जिधर देखिये, हवा में एक नकारात्मक सी प्रतिक्रिया है।
ऐसे हालात में ऐसा कौन सा प्रत्याशी होगा, जो भाजपा की नैया पार लगाएगा, यह सवाल भाजपा के लिए यक्ष बन कर खड़ा है। उस पर सबसे बड़ा दबाव ये है कि जाट के अतिरिक्त किसी अन्य जाति के प्रत्याशी को उतारे जाने का विचार मात्र भयावह है। वजह स्पष्ट है। यह सीट अब जाट बहुल हो चुकी है। दूसरा ये कि प्रो. सांवरलाल जाट के निधन से खाली हुई है। तो जाट प्रत्याशी के अतिरिक्त अन्य पर दाव खेलने पर जाट समुदाय नाराज हो सकता है। जाटों में भी प्रो. जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा का भारी दबाव है, जो लगातार गांवों में ऐसे दौरे कर रहे हैं, मानो वे ही प्रत्याशी होने वाले हैं। भाजपा समझ रही है कि लांबा का कद व पकड़ उनके पिता प्रो. जाट के मुकाबले कमजोर है। बेशक केन्द्र व राज्य सरकार की ताकत उनके साथ हो सकती है, मगर पिछली बार की तरह मोदी लहर जैसा आलम नहीं है, जिस पर सवार हो कर नैया पार लग जाए। उलटा एंटी इंन्कंबेंसी अलग सता रही है। ऐसे में लांबा पर दाव खेलने से पहले भी उसे सौ बार सोचना होगा। अगर लांबा को नसीराबाद विधानसभा सीट के लिए राजी कर भी लिया जाता है तो जाटों में सिर्फ अजमेर डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी, किशनगढ़ विधायक भागीरथ चौधरी व सी बी गेना ही विकल्प बचते हैं। अगर कांग्रेस की ओर से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट आ गए, जैसा कि इन दिनों हौवा बना हुआ है, तो इनमें से कोई भी नहीं टिक पाएगा। कारण कि सचिन पायलट हाईप्रोफाइल हैं और उनके केन्द्रीय राज्यमंत्री रहते कराए गए काम जनता के जेहन में हैं। ऐसे में भाजपा स्थानीय जाट की बजाय बाहरी जाट पर विचार कर सकती है। इस रूप में सतीश पूनिया का नाम चर्चा में आया है। रहा सवाल गैर जाट का तो उस पर दाव खेलने का रिस्क भाजपा शायद नहीं ले पाएगी। कुल मिला कर भाजपा की मजबूत सेना को एक मजबूत सेनापति की दरकार है, जिसका फैसला करने से पहले वह कांग्रेस खेमे में झांक कर रही है, उधर से कौन आ रहा है?
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 16 सितंबर 2017

राजपूतों के बाद अब सिंधी भी सरकार से नाराज

कुख्यात आनंदपाल एनकाउंटर को लेकर राजपूत समाज की नाराजगी अभी थमी ही नहीं है कि अब जयपुर में हुए उपद्रव के दौरान कथित तौर पर मारे गए भरत कोडवानी के परिजन को उचित मुआवजा नहीं दिए जाने को लेकर सिंधी समुदाय भी प्रदेश की भाजपा सरकार से नाराज हो रहा है। हालांकि पुलिस का दावा है कि उसकी मौत उपद्रव के दौरान नहीं हुई, मगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मौत का कारण नहीं पता लग पाने के कारण संशय बना हुआ है। सिंधी समुदाय का मानना है कि भरत की मृत्यु उपद्रव के दौरान ही हुई, इस कारण उसके परिजन को भी उतना ही मुआवजा मिलना चाहिए, जितना एक मुस्लिम युवक के परिजन को। उसमें भेदभाव को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर जम कर आक्रोष नजर आ रहा है। ज्यादा गुस्सा इस कारण है कि उसकी मौत उपद्रव वाले दिन ही हुई, जबकि इसकी जानकारी दो दिन बाद सामने आई। इसे इस रूप में लिया जा रहा है कि यह जानबूझ कर किया गया, ताकि मामला दब जाए। गुस्से की वजह ये भी बन रही है कि पुलिस यह मानने को ही तैयार नहीं है कि उसकी मौत उपद्रव के दौरान हुई। डीसीपी सत्येन्द्र सिंह ने कहा कि भरत की मौत का रामगंज में हुए उपद्रव से कोई लेना-देना नहीं है। उसका शव उसके ही ई-रिक्शा में घटनास्थल से बहुत दूर माणक चौक के पास मिला था। दूसरी ओर एसएमएस के अधीक्षक डॉ. डी एस मीणा ने कहा कि प्रारंभिक जांच में भरत के शरीर पर चोट के निशान मिले हैं। जांच के लिए विसरा एफएसएल को भेजा है। मौत धारदार हथियार, चोट, गोली लगने या अन्य किसी कारण से होने के सवाल पर वे बोले- पुलिस कमिश्नर को रिपोर्ट भेज दी है। वे ही बताएंगे।
बहरहाल, इस मुद्दे को लेकर सिंधी समुदाय लामबंद होता जा रहा है।  बाकायदा अपीलें की जा रही हैं कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए जिला व उपखंड स्तर पर ज्ञापन दे कर विरोध दर्ज करवाया जाए। सिंधी समुदाय से भाजपा का बहिष्कार करने का आह्वान किया जा रहा है। कुछ लोग इस मसले को इस रूप में भी उठाने लगे हैं कि जो भाजपा अब तक कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है, आज वही तुष्टिकरण करते हुए हिंदू युवक के मामले में भेदभाव बरत रही है। तुष्टिकरण को इस रूप में भी पुष्ट किया जा रहा है कि जिन लोगों ने पुलिस के टकराव कर जयपुर को हिंसा में धकेल दिया, उनके ही युवक के उपद्रव के दौरान माने जाने पर सरकार उसके परिजन को मुआवजा देने को मजबूर हो रही है। स्वाभाविक रूप से यह मुद्दा राजनीतिक तो हो ही रहा है, मगर हिंदूवादी भी सरकार के रवैये को लेकर तंज कस रहे हैं। विरोध करने वालों की भाषा तो बहुत कड़वी है, जिसकी पुनरावृत्ति यहां करना उचित नहीं, मगर उसका सार यही है कि वे वसुंधरा सरकार का बोरिया बिस्तर गोल करने तक की अपील कर रहे हैं, जिससे तुष्टिकरण की उम्मीद नहीं थी।
खैर, वस्तुस्थिति जो भी हो, मगर सरकार के लिए नई मुसीबत खड़ी हो गई। जिस प्रकार सिंधी समुदाय एकजुट हो रहा है, उससे भाजपा को अपना वोट बैंक खिसकता नजर आ रहा है। विधानसभा चुनाव से सवा साल पहले  इस प्रकार किसी समुदाय विशेष का रुष्ठ होना चिंता का विषय है ही। इसका नुकसान अजमेर लोकसभा सीट के लिए आगामी नवंबर-दिसंबर में प्रस्तावित उपचुनाव में भी हो सकता है, क्योंकि विशेष रूप से इस संसदीय क्षेत्र का अजमेर शहर सिंधी बहुल है।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, 13 सितंबर 2017

रावत समाज ने ठोकी ताल, भाजपा की बढ़ी मुसीबत

अजमेर जिले के रावत समाज ने आगामी नवंबर-दिसंबर में अजमेर संसदीय क्षेत्र के संभावित चुनाव के लिए ताल ठोक दी है। समाज किसी रावत को टिकट देने की मांग कर रहा है। भाजपा के लिए यह मुसीबत का सबब है। वह इस चुनौती से कैसे निपटेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
असल में भाजपा की लगभग मजबूरी सी है कि वह किसी जाट को ही टिकट दे। एक तो इस वजह से कि यह सीट प्रो. सांवरलाल जाट के निधन से खाली हुई है, दूसरा ये कि अजमेर संसदीय क्षेत्र अब जाट बहुल माना जाता है। हालांकि रावत मतदाताओं की संख्या भी कम नहीं है, जिनका रुझान भाजपा की ओर रहता आया है। ज्ञातव्य है कि पांच बार लोकसभा का चुनाव प्रो. रासासिंह रावत ने समाज के वोटों के दम पर ही जीता था। हर एक चुनाव को छोड़ कर पांच बार अस्सी से नब्बे प्रतिशत मतदान करने वाले रावतों और पार्टी के जनाधार वाले वोटों के योग से प्रो. रावत को जीतने में दिक्कत नहीं होती थी। केवल एक बार डॉ. प्रभा ठाकुर उन्हें हरा पाई, वो भी इसलिए कि उन्होंने भाजपा के राजपूत वोट बैंक में सेंध मारी थी। खैर, रासासिंह रावत का अवसान तब जा कर हुआ, जब परिसीमन में इस संसदीय क्षेत्र का रावत बहुल इलाका मगरा कट गया। अकेले इसी वजह से भाजपा ने प्रो. रावत को टिकट नहीं दिया गया। उनके स्थान पर भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को लाया गया और वे मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट से हार गईं। इसके बाद में हुए चुनाव में भाजपा ने प्रो. जाट पर दाव खेला और जाटों की बहुलता व विशेष रूप से मोदी लहर के कारण वह प्रयोग सफल रहा। लहर इतनी प्रचंड थी कि लोग सचिन पायलट के कराए गए कामों को ही भूल बैठे। अब जबकि प्रो. जाट का निधन हो गया है, ऐसे में भाजपा पर दबाव है कि वह किसी जाट को और विशेष रूप से प्रो. जाट के परिवार से किसी को टिकट दे। हालांकि प्रो. रावत के पांच बार सांसद बनने से रावत भाजपा मानसिकता के ही माने जाते हैं, मगर जिस प्रकार उन्होंने ताल ठोकी है, वह भाजपा के लिए चिंता का कारण है। एक ओर वह किसी गैर जाट को टिकट दे कर जाटों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगी, दूसरी ओर वर्षों से कायम अपने रावत वोट बैंक को भी नहीं खोना चाहेगी। ऐसा नहीं है कि रावतों का जिले में प्रतिनिधित्व नहीं है। पुष्कर के विधायक सुरेश रावत हैं। इसके अतिरिक्त संसदीय क्षेत्र से ही सटे और जिले के ब्यावर से भी शंकर सिंह रावत विधायक हैं। ऐसे में रावतों का टिकट के लिए अडऩा अटपटा है, मगर लोकतंत्र में कुछ न कुछ हासिल करने के लिए समाज अड़ते ही हैं। अब देखना ये होगा कि भाजपा रावतों के कितने दबाव में आती है।
रहा कांग्रेस का सवाल तो उसके लिए रावत एक बेहतरीन कार्ड के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। गुर्जरों, अनुसूचित जाति व मुस्लिमों के वोट तो बहुतायत में कांग्रेस को मिलने ही हैं। कांग्रेस के पास एक और कार्ड राजपूतों का भी है। वे भी भाजपा मानसिकता के माने जाते हैं, मगर कुख्यात आनंदपाल मामले के बाद भाजपा से रुष्ठ हैं। ऐसे में कांग्रेस राजपूत कार्ड भी खेल सकती है, जो कि एक बार प्रभा ठाकुर के रूप में सफल हो चुका है।  इस लिहाज से कांग्रेस सुविधानजक स्थिति में है। उसके पास बहुत विकल्प हैं। गुर्जर कार्ड के अतिरिक्त वह किसी दिग्गज जाट को भी मैदान में उतार सकती है। इस सिलसिले में राजस्थान के दिग्गज जाट नेता स्वर्गीय परसराम मदेरणा की पोती दिव्या मदेरणा का नाम चर्चा में आया है। बहरहाल, जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएंगे कई नाम उभरेंगे व डूबेंगे। प्रत्याशियों का फैसला नामांकन पत्र भरने की तिथी से एक-दो दिन पहले ही हो पाएगा। तब तक चर्चाओं की जुगाली चलती रहेगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

टंडन साहब, क्या अनादि सरस्वती जी को चुनाव लड़वा कर ही मानोगे?

लंबी चुप्पी के बाद साध्वी अनादि सरस्वती एक बार फिर चर्चा में हैं। राजनीति के पंडित एडवोकेट राजेश टंडन ने फिर उनका नाम उछाला है। वे गईं तो थीं अविनाश माहेश्वरी स्कूल में आयोजित अश्विनी कुमार जी के सुंदरकांड पाठ में शिरकत करने और टंडन साहब ने उनका फोटो फेसबुक पर यह कह कर चिपका दिया कि वे अजमेर उत्तर से भाजपा की भावी विधायक हैं। यूं फोटो तो खुद अनादि जी ने भी शाया किया है, मगर उसका मकसद महज इतना सा दिखता है, जितना आम तौर पर फेसबुकियों का अपनी दिनचर्या को सार्वजनिक करने का होता है। इसमें कुछ खास बुराई भी नहीं है, क्योंकि इस बहाने व्यक्ति अपने समर्थकों या मित्रों के बीच लाइव रहता है। मगर टंडन साहब को इसमें भी कुछ खास अर्थ दिखाई दिया। उन्हें लग रहा है कि अनादि सरस्वती इस प्रकार हर सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक कार्यक्रम में शिरकत कर अपना जनाधार बढ़ा रही हैं।
अगर ये मान भी लिया जाए कि टंडन साहब का इशारा कपोल कल्पित है या अनादि सरस्वती ने भी कभी इस दिशा में सोचा तक न हो, मगर कानाफूसियों के बाजार में चर्चा तो हो ही रही है। बहरहाल, साध्वी अनादि सरस्वती का इस रूप में चर्चित होना कदाचित शिक्षा राज्य मंत्री व अजमेर उत्तर के विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी को तकलीफ दे रहा होगा। वो इसलिए लिए कि उनके पासंद एक भी दावेदार उन्हें नजर नहींं आता, लिहाजा चौथी बार भी पक्के तौर टिकट हासिल करने का विश्वास रखते हैं। अगर संघ की बात करें तो वह क्या सोचता है और क्या करने वाला है, किसी को भनक तक नहीं लगने देता। वह एक साथ कई प्रयोग कर रहा होता है। कुछ गुप्त तो कुछ सार्वजनिक। हो सकता है कि अनादि सरस्वती को आगे लाने का उसका विचार हो, मगर जिस प्रकार वे हेडा के साथ एकाधिक कार्यक्रमों में नजर आई हैं, उससे जरूर प्रतीत होता है कि वे उन्हें देवनानी के मुकाबले में प्रमोट करना चाहते होंगे। कहने की जरूरत नहीं कि वे गैर सिंधीवाद के नाम पर टिकट चाहते हैं। कदाचित उन्हें लगता हो कि इसमें कामयाब नहीं हो पाएंगे तो बेहतर है विकल्प के तौर पर अनादि सरस्वती को ही आगे लाया जाए, जो कि सिंधी समुदाय की हैं। यहां इस बात को ख्याल में रखना ही चाहिए कि टिकट लाने की कलाकारी देवनानी में है, वो तो एक बात है, मगर विकल्प का अभाव भी कहीं न कहीं उनकी दावेदारी को कमजोर नहीं होने देता। अगर अनादि सरस्वती इस प्रकार उभर कर आती हैं तो वह बात तो खत्म हो ही जाएगी कि देवनानी का विकल्प ही नहीं है।
अब पता नहीं खुद अनादि सरस्वती की रुचि राजनीति में है या नहीं, मगर मौका अच्छा है। अगर देवनानी टिकट लाने में कहीं कमजोर होते हैं तो चांंस बनता है। ज्ञातव्य है कि पिछली बार जब टंडन साहब ने खोज खबर ला कर दी थी कि आरएसएस उनको चुनाव लड़वाने के मूड में है। आरआरएस के एक प्रमुख कार्यक्रम के बाद वे कई बार अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा के साथ कार्यक्रमों में नजर आईं। इससे यह संदेश गया कि या तो उन्हें प्रोजेक्ट किया जा रहा है, या फिर वे स्वयं राजनीतिक व सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर राजनीतिक जमीन तलाश रही हैं। हालांकि उन्होंने कभी इसका खंडन नहीं किया कि उनकी राजनीति में कोई रुचि नहीं है। उनकी चुप्पी को मौन स्वीकृति भी माना जा सकता है, मगर ऐसा भी हो सकता है कि उन्होंने प्रतिक्रिया जाहिर कर व्यर्थ विवाद में पडऩा उचित नहीं समझा हो। इसी प्रकार की नीति संघ की रहती है। हो सकता है कि उनका नाम इस प्रकार राजनीति में घसीटे जाने पर उनको गुस्सा भी हो, चूंकि एक साध्वी के तौर पर उनका जो सम्मान है, वह एक राजनीतिक व्यक्ति की तुलना में कई गुना अधिक है। इसे यूं समझा जा सकता है कि साध्वी के रूप में हर राजनीतिज्ञ उनके आगे नतमस्तक हो रहा है, जो कि राजनीति में आने पर कम हो जाने वाला है। मगर संभावना इसकी भी कम नहीं है कि सुर्खियों में रहने की चाह में वे भी इस प्रकार की खबरों में रस ले रही हों, जो कि एक मानव स्वभाव है। वैसे उन्हें चर्चाओं को अन्यथा नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वे तो फिर भी एक आइकन हैं, जिनकी हर गतिविधि पर नजर रहती है, हालत तो ये है कि अगर कोई सामान्य व्यक्ति भी थोड़ा सा सामाजिक कार्यों में रुचि बढ़ाता है तो यही कयास लगाया जाता है कि वह आगे चल कर राजनीति की पगडंडी पकड़ेगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000