मंगलवार, 26 सितंबर 2017

लाना बन्ना, सारस्वत, जैन व पहाडिय़ा का भी नाम उछल रहा है

राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष व अजमेर सांसद रहे प्रो. सांवरलाल जाट के निधन से खाली हुई अजमेर लोकसभा सीट के लिए होने वाले उपचुनाव में भाजपा की ये मजबूरी है वह प्रो. जाट के ही परिवार से किसी को टिकट दे। अगर नहीं तो भी भाजपा किसी गैर जाट को टिकट देकर पूरी जमात को अपने खिलाफ नहीं कर सकती। अर्थात उसे किसी जाट को ही टिकट देनी होगी, चाहे वह अजमेर डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी हों या फिर सी बी गैना या कोई और। बावजूद इसके गैर जाटों में भी कई दावेदार उभर कर सामने आ रहे हैं। कदाचित वे भी जानते होंगे कि टिकट मिलना मुश्किल है, मगर कम से कम चर्चित होने का लाभ तो वे ले ही रहे हैं।
अजमेर उत्तर विधानसभा सीट की भाजपा टिकट के लिए सर्वाधिक चर्चित रहे अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत उर्फ लाला बन्ना का नाम सोशल मीडिया पर खूब उछल रहा है। उनके समर्थक बाकायदा उनकी फोटो के साथ पोस्टें डाल रहे हैं। इसी प्रकार युवा भाजपा नेता व मसूदा की विधायक श्रीमती सुशील कंवर के पति भंवर सिंह पलाड़ा के नाम का भी सोशल मीडिया पर खूब हल्ला है। उनके समर्थक उन्हें भावी सांसद के रूप में देख रहे हैं। देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी. पी. सारस्वत का नाम भी सुर्खियां पा रहा है। उनके लिए तो राजनीतिक पंडित एडवोकेट राजेश टंडन ने बाकायदा एक लंबी-चौड़ी पोस्ट फेसबुक पर डाली है। उनमें लिखा है कि भाजपा लोकसभा अजमेर उप चुनाव में प्रोफेसर सारस्वत को प्रत्याशी बनाने का बहुत गहनता से विचार कर रही है। सारस्वत को टिकट देने संघ लॉबी पूरी तरह साथ लग जायेगी, यह तो निश्चित है, भाजपा की अजमेर देहात जिला की कार्यकारिणी भी साथ लग जायेगी। उनकी जीत की संभावनाओं पर ग्राउंड से रिपोर्टें मंगवाई जा रही हैं। साथ ही उन्होंने यह आशंका भी जताई है कि सारस्वत के लड़ते ही जाट वोट नहीं मिलेगा। पूरे का पूरा प्रोफेसर सावंरलाल का खानदान चुनाव लडऩे को तैयार बैठा है।
इसी प्रकार पिछले दिनों प्रदेश के जाने-माने पत्रकार अनिल लोढ़ा ने इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर एक विश्लेषण में हालांकि कहा यही कि प्रो. जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा को इशारा कर दिया गया है, मगर साथ ही उन्होंने अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन का भी नाम लिया। यह वीडियो क्लीपिंग सोशल मीडिया पर खूब चली। ज्ञातव्य है कि जैन पूर्व में भी दावेदारी जता चुके हैं। जब जैन का नाम आता है कि लोग उनके साथ पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा का नाम भी जोडऩे से नहीं चूकते।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 25 सितंबर 2017

प्रतिष्ठापूर्ण शिक्षा बोर्ड पर अनोखा सवालिया निशान

गोपनीयता व निष्पक्षता के मामले में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड  का नाम पूरे देश में अव्वल है। यहां के परीक्षा सिस्टम को पूरे देश के शिक्षा बोर्डों में सर्वाधिक लीक प्रूफ माना जाता है। इसी वजह से देश के अनेक बोर्डों के प्रतिनिधिमंडल यहां आ कर यहां की कार्यप्रणाली जानने-समझने आ चुके हैं। देशभर के शिक्षा बोर्डों की संस्था कोब्से की अध्यक्षता करने का सौभाग्य स्थानीय बोर्ड अध्यक्ष को मिलने की वजह आदर्श परीक्षा पद्धति ही है। हालांकि समय-समय पर कर्मचारियों की लापरवाही व बदमाशी के कारण कुछ आर्थिक गड़बडिय़ां उजागर हुई हैं। इसके अतिरिक्त पेपर लीक के मामले भी सामने आए हैं, मगर उनमें अमूमन बोर्ड के बाहर की अधिक घटनाएं हैं। कुल मिला कर ऐसा माना जाता है कि इस बोर्ड में अंकों को लेकर घपलेबाजी या सेटिंग नहीं हो सकती। ऐसे प्रतिष्ठापूर्ण बोर्ड पर एक अनोखा सवालिया निशान अंकित हो गया है।
यह मामला अनोखा इस कारण है कि इसमें परीक्षक ने सेटिंग करके अंक बढ़ाए नहीं हैं, बल्कि घटाए हैं। अंक घटने के कारण सात परीक्षार्थियों को जब नुकसान हुआ तो उन्होंने मामला उजागर किया। असल में हुआ ये है कि कम अंक मिलने और अपने परिणाम से असंतुष्ट विद्यार्थियों ने बोर्ड से अपनी अंग्रेजी विषय की उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन प्रति निकलवाईं तो इन उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन प्रति को देख कर विद्यार्थियों के होश उड़ गए। शिक्षक ने सात विद्यार्थियों को पहले कुछ और अंक दिए और बाद में उन्हें व्हाइटनर से मिटा कर कम कर दिए। हालांकि इस प्रकरण को शिक्षक की लापरवाही करार दिया जा रहा है, मगर यह मामला साफ तौर पर सायास किया गया लगता है। लापरवाही तो तब होती जब शिक्षक उत्तर पुस्तिका को ठीक से नहीं जांचता, अथवा अंकों में योग में सावधानी नहीं रखता। व्हाइटनर से पुराने अंक छिपा कर नए अंक देने से यह साफ है कि यह जानबूझ कर किया गया है। ठीक से पड़ताल होने पर ही पता लग पाएगा कि परीक्षक ने बाद में जो अंक दिए हैं, वे सही हैं या गलत। इस प्रकरण के पीछे कोई साजिश है, यह तो जांच से ही सामने आ पाएगा, मगर संभावना इस बात की भी है कि पहले शिक्षक ने असावधानी के कारण कुछ अंक दिए, मगर जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तो उसने व्हाइटनर से पुराने अंक छिपा कर नए अंक दे दिए। जहां तक व्हाइटनर लगाने का प्रश्र है तो केवल ऐसा करने मात्र से मामले को संगीन नहीं माना जा सकता। सुधार के लिए वह व्हाइटनर का उपयोग कर सकता है। मगर यदि उसने किसी दुश्मनी के भाव से अथवा किसी के कहने से इस प्रकार की कारसतानी की है तो यह वाकई गंभीर बात है।
हालांकि बोर्ड अध्यक्ष बी एल चौधरी ने जो प्रतिक्रिया दी है, वह अपेक्षित और सीधी-सपट भी है कि शिक्षक ने उत्तर पुस्तिका की जांच में लापरवाही बरती है और जांच के बाद इसकी पुष्टि हो जाएगी। बोर्ड ऐसे शिक्षक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगा और उसे डीबार कर दिया जाएगा। मगर चूंकि बोर्ड की अपनी बड़ी प्रतिष्ठा है, इस कारण इस मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 23 सितंबर 2017

नगर निगम को अब कैसे नजर आ गई रेलवे की बिल्डिंग?

पिछले काफी समय से गांधी भवन चौराहे पर रेलवे स्टेशन परिसर में एक बहुमंजिला इमारत का निर्माण चल रहा है। संभवत: उसका ढ़ांचा बन कर पूरा हो गया है और अब उसे अंतिम रूप दिया जाना शेष है। मगर चंद कदम दूर ही स्थित नगर निगम को अचानक यह निर्माण खटक गया और उसने इस बहुमंजिला व्यावसायिक निर्माण को अवैध निर्माण बताते हुए काम बंद करने का नोटिस दिया है। इतना ही नहीं उसे अवैध निर्माण मानते हुए तोडऩे तक की आवश्यक कानूनी कार्यवाही करने को चेताया गया है। यह कैसी अंधेरगर्दी है?
हालांकि इस मामले में दोनों पक्षों की दलीलों पर गौर करें तो यह विभागीय तालमेल के अभाव अथवा नियमों की अस्पष्टता का मामला लगता है, मगर सवाल ये है कि जब बिल्डिंग इतनी ऊंचाई तक बन चुकी है, तब जा कर निगम को होश कैसे आया? एक के बाद एक मंजिल का निर्माण होता गया और अब यह विशालकाय हो चुकी है, तब जा कर ख्याल कैसे आया कि यह नियम विरुद्ध बन रही है? हालांकि निगम का यह रवैया नया नहीं है और गली-मोहल्लों में हो रहे निर्माण पूरे होने के करीब आने पर ही निगम को होश आता है, मगर ये निर्माण तो शहर की छाती पर हो रहा है, जिस पर गांधी भवन चौराहे से गुजरने वाले हर नागरिक की कई कई बार नजर पड़ चुकी है। बेहद अफसोसनाक बात है कि निगम के जिम्मेदार अधिकारियों की तंद्रा अब जा कर खुली है। स्मार्ट सिटी बनने जा रहे अजमेर में यदि ऐसे गैरजिम्मेदार व लापरवाह अधिकारी बैठे हैं तो इस शहर का भगवान ही मालिक है।
जहां तक विवाद का सवाल है, निगम का कहना है कि यह अगर रेलवे का कार्यालय होता तो कोई बात नहीं, कॉमर्शियल निर्माण के लिए तो अनुमति जरूरी है। दूसरी ओर निर्माण करवाने वाले हरसद तलेदा की तरफ से रेल भूमि विकास प्राधिकरण के जनरल मैनेजर वीरेंद्र कुमार ने तर्क दिया कि उक्त भूमि पर आरएलडीए यानी रेलवे भूमि विकास प्राधिकरण द्वारा निविदाएं आमंत्रित कर 45 वर्ष की लीज पर भूमि लेकर एमएफसी यानी मल्टी फंक्शन कॉम्पलेक्स के निर्माण के लिए दिया गया है। चूंकि एमएफसी रेलवे का संचालित भवन है, इसलिए रेल्वे अधिनियम के अंतर्गत इसके निर्माण की स्वीकृति स्थानीय नगरीय निकाय अथवा राज्य सरकार से लिए जाने की आवश्यकता नहीं है। यानि कि कुल मिला कर यह मामला नियमों की पेचीदगी का है। ऐसे में अगर यह प्रकरण कोर्ट में गया और निर्माण अवैध माना गया तो उसे तोडऩे से होने वाला नुकसान क्या देश का नुकसान नहीं होगा?
वैसे, लनता ये है कि आखिरकार इसका कोई न कोई रास्ता निकल आएगा, मगर तब तक यह विशालकाय भवन निगम को मुंह चिढ़ता रहेगा और आम जनता की जिज्ञासा बढ़ती ही जाएगी।
अंधेरगर्दी का दूसरा संगीन मामला
अजमेर नगर निगम की लापरवाही का दूसरा संगीन मामला भी गौर फरमाइये, जिसकी वजह से आम आदमी फोकट ही परेशान हो रहा है:-
नगर निगम द्वारा जलदाय विभाग के सहयोग से इस माह से सीवरेज सरचार्ज लिया जा रहा है, मगर कई उपभोक्ता ऐसे हैं, जिनके क्षेत्र में सीवरेज लाइन डाली ही नहीं गई और उनसे भी वसूली की जा रही है। असल में हुआ ये है कि निगम ने सीवरेज कनेक्शन लेने के लिए नोटिस जारी किए हैं, इस पर लोगों ने निगम में 600 रुपए की रसीद कटवा ली है। हालांकि अनेक आवेदकों के घरों के सीवरेज कनेक्शन या तो हुए नहीं हैं और या फिर सीवरेज कनेक्शन चालू किए नहीं गए हैं, लेकिन निगम ने सभी आवेदकों के नाम जलदाय विभाग को भिजवा दिए हैं, नतीजतन विभाग ने पानी के बिल के साथ सरचार्ज की राशि भी जोड़ दी गई है। ऐसे में जनता का परेशान होना स्वाभाविक ही है। जब उनका सीवरेज कनेक्शन चालू ही नहीं हुआ है तो वे काहे का सरचार्ज दें।
इस मामले में निगम के एक्सईएन केदार शर्मा का हास्यास्पद बयान देखिए कि इस त्रुटि का जल्द ही समाधान कर दिया जाएगा। वे कह रहे है कि ऐसे उपभोक्ता परेशान होने के बजाए निगम की योजना शाखा में आकर प्रार्थना पत्र मय मोबाइल नंबर दे सकते हैं। इसके लिए निगम स्तर पर एक कार्मिक को जिम्मेदारी भी सौंप दी गई है। अजी महाराज, गलती आपकी और जनता निगम को चक्कर काटे, क्या वह फालतू है? आपको केवल उनके  के नाम जलदाय विभाग को भेजने चाहिए थे ना, जिनके सीवरेज कनेक्शन हो चुके हैं।
शर्मा कह रहे हैं कि उपभोक्ताओं की परेशानी को देखते हुए जलदाय विभाग के अधिकारियों से चर्चा की गई है। यदि पानी के बिल की अंतिम तिथि करीब ही है तो उक्त बिल को जमा करवा दें। अगले माह में आने वाले पानी के बिल में उक्त राशि को समायोजित कर लिया जाएगा। अरे प्रभु, पहले बिल में राशि जोडऩे और फिर समायोजित करने की मशक्कत क्यों करवाई? इस प्रकार की बेगारी करवाने के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या कानून को उसकी गर्दन नहीं नापनी चाहिए?
-तेजवानी गिरधर
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लाचार शहर के लाचार मंत्री

गत दिवस स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी की मौजूदगी में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, जो कि राज्य सरकार में मंत्री भी हैं, ने जिस प्रकार स्मार्ट सिटी में काम न होने का रोना रोया, उससे एक ओर तो यह आभास कराया गया कि उन्हें अजमेर की बड़ी चिंता है, दूसरी ओर यह भी साबित हो गया कि टायर्ड-रिटायर्ड लोगों के इस लाचार शहर के मंत्री भी कितने लाचार हैं।
शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का तो यहां तक कहना था कि स्मार्ट सिटी केवल चर्चाओं में है, काम नहीं हो रहे। स्मार्ट सिटी पर काम कम, बातें ज्यादा हो रही हैं। जिस प्रकार काम चल रहा है, इसमें सालों लग जाएंगे। हम जब जनता के बीच जब जाएंगे तो उन्हें क्या जवाब देंगे। हालत ये थी कि मंत्री की हैसियत रखने वाले देवनानी को भी पूछना पड़ा कि स्मार्ट सिटी योजना के तहत अब तक कितना पैसा खर्च हो चुका है। अफसोसनाक बात देखिए कि बैठक के आखिर तक अधिकारी भी ये नहीं बता पाए कि दिल्ली से कितना आ बजट चुका है।
महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री अनिता भदेल की लाचारी देखिए कि उन्हें यह तक कहना पड़ा कि अमृत योजना में क्या चल रहा है, इसकी उनके पास जानकारी नहीं है। बैठक में उन्हें बुलाया ही नहीं जाता है। उनके विधानसभा क्षेत्र में सीवरेज की लाइनें जाम हो चुकी हैं, गंदा पानी ओवर फ्लो होकर सड़कों पर रहा है। निगम अधिकारियों को कई बार कहा, लेकिन उनकी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है। अब जब हम जनता के बीच जाएंगे तो उन्हें क्या जवाब दें? शहर जिला भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव तक की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही थी। उन्हें यहां तक कहना पड़ा कि लेपटॉप लेकर आने से बैठक पूरी नहीं हो जाती। जनता को हमें जवाब देना है। आचार संहिता लग जाएगी तब बजट का उपयोग किया जाएगा क्या?
देवनानी सहित अन्य जनप्रतिनधियों ने स्ट्रीट लाइट जैसी मूलभूत सुविधा को लेकर हो रही लापरवाही का रोना रोया, जिसका संचालन ईएसएल कंपनी करती है।
समझा जा सकता है कि हमारे जनप्रतिनिधि कितने लाचार हैं। जब वे ही संतुष्ट नहीं हैं तो जनता की क्या हालत होगी, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है।
रहा सवाल जनप्रतिनधियों का तो वे समझ रहे हैं कि वे वैसा परफोरमेंस नहीं दे पाए हैं, जिसकी जनता अपेक्षा कर रही है। चार साल पूरे होने को हैं। बाकी एक साल बचा है। अगर ही हाल रहा तो जनता पलटी भी खिला सकती है। बस इसी बात की उन्हें चिंता सता रही है। विधानसभा चुनाव की छोड़ो, दो माह बाद लोकसभा उपचुनाव होने हैं। उन्हें डर है कि जनता का असंतोष भारी न पड़ जाए। ऐसे में जाहिर तौर पर हाईकमान कान उमेड़ेगा, इस कारण इस महत्वूपूर्ण बैठक में अपना असंतोष जाहिर कर दिया ताकि बाद में कहा जा सके वे तो पहले ही कह रहे थे कि जनता के काम ठीक से नहीं हो रहे।
एक ही पार्टी के जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की हालत ये है कि वे एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं। काम न होने की शिकायत का ठीकरा अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा पर फोडऩे की कोशिश की गई। अजमेर नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत का कहना था कि एडीए एवं आवासन मंडल की कई योजनाएं हैं, लेकिन उन्हें निगम को ट्रांसफर नहीं किया है, जबकि इन क्षेत्रों में साफ सफाई एवं लाइट की जिम्मेदारी निगम प्रशासन की रहती है।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, 20 सितंबर 2017

क्या सचिन पायलट अजमेर से चुनाव लड़ेंगे?

क्या प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट अजमेर लोकसभा सीट के लिए आगामी नवंबर-दिसंबर में संभावित उपचुनाव लड़ेंगे, यह सवाल यहां की राजनीतिक फिजां पर छाया हुआ है। हर आदमी के जेहन में यह सवाल कौंध रहा है, जिसे पैदा करने में मीडिया की अहम भूमिका है।
यूं सवाल स्वाभाविक भी लगता है, क्योंकि पिछले दो चुनाव वे यहां से लड़ चुके हैं, जिसमें एक बार जीते व दूसरी बार मोदी लहर के चलते नहीं जीत पाए। उनके यहां से लडऩे की चाहत उन लोगों में ज्यादा हो सकती है, जिन्हें अहसास है कि एक बार जब वे यहां से जीतने के बाद केन्द्र में अजमेर के पहले मंत्री बने तो खूब काम करवाए। इसके अतिरिक्त चूंकि उनके मुकाबले का दूसरा प्रत्याशी कांग्रेस में है नहीं, इस कारण भी उनसे लडऩे की उम्मीद की जा रही है। मगर बदले राजनीतिक समीकरणों में उनके यहां से लडऩे का सवाल पूरी तरह से बेमानी भी है। वजह ये है कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया ही इस कारण गया कि उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जाना है। उसी के तहत विधानसभा चुनाव में बुरी तरह परास्त और पस्त कांग्रेस में उन्होंने पिछले तीन साल में जान फूंकने के लिए दिन-रात एक कर रखा है। उनकी मेहनत का ही फल है कि आज कांग्रेस, भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में मानी जाती है। ऐसे में एक अदद लोकसभा सीट के चुनाव, वो भी एक डेढ़ साल के कार्यकाल के लिए होने वाले उपचुनाव में उनका लडऩा निहायत ही असंभव सा है। यह बात बिलकुल सीधी और सहज है, फिर भी मीडिया ने इसे तूल दे रखा है।
हालांकि यह सही है कि वे कांग्रेस के एक आइकन हैं, इस कारण उनकी हर गतिविधि पर सब की नजर रहती है। केन्द्र व राज्य में सत्ता पर काबिज भाजपा के लिए अजमेर सीट प्रतिष्ठा का सवाल है, इस कारण उसे इस मुद्दे पर विचार करना ही पड़ रहा है। उनको टक्कर देने के लिए भाजपा के पास कोई प्रत्याशी नहीं है। पिछली बार जाटों की बहुलता के आधार पर प्रो. सांवरलाल जाट को प्रत्याशी बनाया गया, मगर सब जानते हैं कि उनकी जीत में ज्यादा भूमिका मोदी लहर की ही रही। अब न तो मोदी लहर जैसी कोई बात है और न ही प्रो. जाट जैसा नेता भाजपा के पास है। ऐसे में उसका चिंतित होना स्वाभाविक है।
बात मीडिया की करें तो उसने इस मुद्दे को इस तरीके से उठाया कि सचिन चुनाव लडऩे पर केवल इसी कारण विचार करें कि अगर वे नहीं लड़े तो यह माना जाएगा कि हार के डर से घबरा गए, जबकि मुद्दा ये है ही नहीं। उनकी भूमिका अब एक सांसद की नहीं रह गई है। कांग्रेस की ओर से वे भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखे जा रहे हैं, तो भला वे क्यों बहुत कम समय के लिए सांसद बनना चाहेंगे, जो कि केन्द्र में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार के रहते अजमेर को कुछ विशेष नहीं दे सकते। दैनिक भास्कर की ओर से एक कथित सर्वे का क्या परिणाम आया, ये तो सर्वे करने वाली कंपनी ही जाने, मगर उसी सर्वे की खबर को फेसबुक पर शाया किया गया तो अधिसंख्य ने यही राय जाहिर की कि वे सांसद की बजाय मुख्यमंत्री के रूप में पसंद किए जा रहे हैं। सचिन पायलट से संबंधित खबर के लिए मीडिया की आतुरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जैसे ही प्रदेश कांग्रेस सेवादल के अध्यक्ष राकेश पारीक की जुबान फिसली, अथवा नहीं फिसली, उसे तुरंत लपक कर यह खबर बना दी कि उन्होंने सचिन पायलट के अजमेर से लडऩे की घोषणा की है, जबकि एक सामान्य बुद्धि भी अंदाजा लगा सकता है कि भला पारीक कैसे घोषणा कर सकते हैं। पारीक की ओर से भी सोचें तो कैसे कोई इतना जिम्मेदार नेता इतना अहम निर्णय सुना सकता है, जबकि इसका अधिकार क्षेत्र कांग्रेस हाईकमान व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पास है। निश्चय ही उनका ये मकसद ये रहा होगा कि सचिन पायलट को अजमेर से चुनाव लडऩे का आग्रह किया जाए। हालांकि बाद में उन्होंने जब अपनी मंशा को स्पष्ट किया तो मामले का पटाक्षेप हो गया।
बात अगर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के नजरिये की करें तो उनके प्रति लगाव के चलते वे ऐसा कह सकते हैं कि उन्हें यह चुनाव लडऩा चाहिए, मगर वे भी मन ही मन जानते हैं कि उनके ऊपर पूरे प्रदेश का दायित्व है, अत: सारा ध्यान आगामी विधानसभा चुनाव पर देंगे। हां, इतना जरूर है कि उन पर यह पूरा मानसिक दबाव रहेगा कि ऐसा प्रत्याशी मैदान में उतारें जो जीत कर आए, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और अधिक उत्साह के साथ कमर कस सके।
कुल मिला कर मोटे तौर पर यही माना जा सकता है कि वे उपचुनाव नहीं लड़ेंगे। केवल एक क्षीण सी संभावना ये है कि हाईकमान यह सोच कर  कि उनके अतिरिक्त कोई दूसरा उपयुक्त प्रत्याशी है नहीं और इस उपचुनाव को किसी भी सूरत में जीतना है, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में जीत का आगाज हो, तो उन्हें चुनाव लडऩे को कहे। अथवा स्वयं उन्हें लगे कि ऐसा करना उचित रहेगा, तभी उनके लडने की संभावना बनती है पर यह उनके स्वविवेक पर निर्भर करता है। कानूनी रूप से एक सांसद चुने जाने के बाद भी वे मुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं और छह माह में किसी भी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ कर विधायक बन सकते हैं।
-तेजवानी गिरधर
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