मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

क्या प्रो. सारस्वत आरपीएससी के चेयरमेन बनाए जा रहे हैं?

अजमेर भाजपा के देहात जिला अध्यक्ष बी.पी.सारस्वत ने एमडीएस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के पद की नौकरी छोडऩे का जैसे ही विधिवत नोटिस दिया है, वैसे ही एक तो ये कयास लगाया जा रहा है कि उन्हें लोकसभा उपचुनाव में टिकट का संकेत दे दिया गया है, वहीं एक अंदाजा ये भी लगाया जा रहा है कि उन्हें आरपीएससी का चेयरमेन बनाया जा सकता है। हालांकि प्रत्यक्षत: इस आशय की फेसबुक पोस्ट राजनीतिक पंडित एडवोकेट राजेश टंडन ने शाया की है, मगर इससे भी इतर शहर में इस प्रकार की चर्चा है। यदि ऐसा होना ही है तो सवाल ये उठता है कि इतनी टॉप सीक्रेट बात वायरल कैसे हो गई? कहीं खुद सारस्वत के मुंह से कहीं ये रहस्य उद्घाटित तो नहीं हो गया? या फिर जिस स्तर पर इस बाबत मंत्रणा हुई है, वहां से किसी ने लीक किया है? टंडन साहब के तो चलो किसी सोर्स ने बताया हो सकता है, मगर यदि राजनीति में रुचि रखने वालों तक भी इस प्रकार की सूचना है तो उनके पास यह बात कैसे पहुंची? क्या उस स्तर पर ये केवल कयास मात्र है? जो कुछ भी हो, जब तक उनकी नियुक्ति नहीं हो जाती, ये अफवाह ही कहलाएगी, क्योंकि इसकी पुष्टि तो कोई करने वाला है नहीं।
हां, इतना जरूर है कि अगर उनके उपचुनाव लडऩे की संभावना है,  तो केवल उसके लिए उनको मौजूदा पोस्ट से इस्तीफा देने की जरूरत ही नहीं है। यूनिवर्सिटी की नौकरी रहते हुए भी वे चुनाव लडऩे को स्वतंत्र हैं। इस कारण चुनाव लडऩे वाली बात में दम कम नजर आता है। हालांकि यह सही है कि स्थानीय स्तर पर उन्होंने जरूर ऐसा माहौल बना लिया है कि वे सबसे प्रबल दावेदार हैं, मगर राजनीतिक समीकरणों में उनकी दावेदारी मजबूत नजर नहीं आती। उसकी वजह ये है कि भाजपा किसी भी सूरत में गैर जाट को टिकट देने का दुस्साहस नहीं करेगी। जैसे ही किसी गैर जाट को टिकट दिया गया तो जाट भाजपा के खिलाफ लामबंद हो जाएंगे। ऐसे में एक कयास ये भी लगाया जा रहा है कि स्वर्गीय प्रो. सांवरलाल जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा को किसान आयोग का अध्यक्ष बना दिया जाएगा और नसीराबाद विधानसभा सीट देने का वादा किया जाएगा। क्या इस सौदेबाजी से जाट समुदाय राजी हो जाएगा, इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। राजी होने का एक सूरत ये ही है कि लांबा के अतिरिक्त कोई दूसरा जाट नेता ऐसा नहीं है, जिसकी वाकई दावेदारी बनती हो। अगर लांबा ने सौदेबाजी कर भी ली तो भाजपा को यह खतरा तो बना ही रहेगा कि कोई छोटा-मोटा जाट नेता निर्दलीय रूप से मैदान में उतर सकता है।
जो कुछ भी हो, मगर इतना जरूर है कि सारस्वत के नए कदम से राजनीतिक हलकों हलचल मच गई है। वे मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबी भी हैं, ये सब जानते हैं। ऐसे में अचानक नौकरी छोडऩे का नोटिस यह साफ जाहिर करता है कि जरूर कुछ न कुछ महत्वपूर्ण होने जा रहा है। एक संभावना ये भी है कि चूंकि वरिष्ठ भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी ने वसुंधरा राजे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी की वजह से ब्राह्मण समुदाय के कुछ लोग नाराज हैं, उन पर ठंडे छींटे डालने के लिए सारस्वत को कोई दमदार ओहदा दिया जा रहा हो।
हालांकि खुद सारस्वत ने यह कह कर दिग्भ्रमित करने की कोशिश की है कि उनके इस्तीफे के नोटिस को उपचुनाव से नहीं जोड़ा जाए, मगर दूसरी ओर यह कह कर यह संभावना भी बरकरार रखी है कि अगर वसुंधरा राजे ने  कहा तो वे चुनाव लडऩे को तैयार हैं। वैसे इतना जरूर तय है कि अगर उन्हें आरपीएससी का चेयरमेन बनाया जा रहा है तो वह जल्द ही होगा, क्योंकि निकट भविष्य में कभी भी चुनाव की तारीख का ऐलान होने वाला है, जिसके साथ आचार संहिता लग जाएगी।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

संघी तो नहीं लेने देंगे चौधरी को टिकट

हाल ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अजमेर आईं तो उन्होंने अजमेर लोकसभा सीट के उपचुनाव के लिए उपयुक्त प्रत्याशी के लिए स्थानीय नेताओं से सलाह-मश्विरा किया। अगर खबरची व राजनीतिक पंडित एडवोकेट राजेश टंडन की फेसबुक पोस्ट को सही मानें तो चर्चा में अजमेर डेयरी के अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी का नाम आया, हालांकि उन्होंने नाम का खुलासा करने से बचते हुए उन्हें दूध वाले भैया व दूधनाथ के नाम से संबोधित किया है। खोज-खबर के अनुसार चौधरी के प्लस-माइनस पर विचारों का आदान-प्रदान भी हुआ। उससे तो यही प्रतीत होता है कि कम से कम संघियों को तो चौधरी फूटी आंख नहीं सुहाते। उन्होंने एक संघनिष्ठ और संस्कारित पुराने बैंडमास्टर नेता जी का हवाला दिया है, निश्चित ही वे अजमेर भाजपा के भीष्म पितामह रह चुके नेताजी का जिक्र कर रहे हैं। जैसे ही ये बात आई कि चौधरी के पक्ष में खूब नारे लगते हैं और मीडिया भी उन पर मेहरबान है, तो तथाकथित बैंड मास्टर से नहीं रहा गया और तपाक से बोले कि उनको खाना-वाना खिला कर भीड़ जुटाने में हैडमास्टरी है और अखबार वालों को समय-समय पर देसी घी की थैली देते हैं। इस पर मैडम ने इसे तो चौधरी की खूबी करार दिया। जब उन्हें ये बताया गया कि वे जब कांग्रेसी थे तो उनके खिलाफ अखबार वाले हड़ताल कर चुके हैं, इस पर भी मैडम ने यही प्रतिक्रिया दी कि ये तो अच्छी बात है कि हमारे यहां आ कर वे कितने सुधर गए हैं, जो मीडिया वाले हड़ताल कर चुके हैं, वे ही तारीफों के पुल बांध रहे हैं।
खैर, कुल जमा इस संक्षिप्त वार्तालाप से अंदाजा लगाया जा सकता है कि चौधरी संघ को तो हजम नहीं हैं, जबकि वसुंधरा की नजर में वे जंच रहे प्रतीत होते हैं। समझा जा सकता है कि वसुंधरा आरंभ से गैर संघियों को साथ लेकर चल रही हैं। जैसे अजमेर सीट के सांसद रहे प्रो. सांवरलाल जाट। वे भी संघ पृष्ठभूमि के नहीं थे, इस कारण संघ को कभी रास नहीं आए। वसुंधरा ही उन्हें आगे ले कर आईं और अस्वस्थता के चलते केन्द्रीय मंत्रीमंडल से हटाए जाने के बाद राज्य किसान आयोग का अध्यक्ष बनाया। हालांकि अकेली वसुंधरा ही प्रत्याशी तय नहीं करेंगी, भाजपा हाईकमान का भी अहम रोल होगा, मगर उनकी चली तो चौधरी गंभीर दावेदार हो सकते हैं। अगर वे टिकट लेने में कामयाब नहीं होते तो यह तय मान कर चलिए कि उसमें संघ वालों का ही हाथ होगा। भला कांग्रेसी कल्चर वाले को संघ क्यों आगे आने देगा?
असल में भाजपा की दिक्कत ये है कि उसे प्रो. जाट के निधन से खाली हुई सीट पर किसी जाट को ही टिकट देना मजबूरी है। सबसे पहले दावेदार प्रो. जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा हैं, मगर लगता यही है कि भाजपा उन्हें अपेक्षित मजबूत नहीं मान रही, इसी कारण रामचंद्र चौधरी पर विचार हो रहा है। चर्चा सी बी गेना की भी है, मगर सबसे उपयुक्त चौधरी को माना जा रहा है। टिकट हासिल करने के लिए उन्होंने एडी से चोटी का जोर भी लगा रखा है। उनकी सबसे बड़ी बाधा है प्रो. जाट के परिवार को राजी करना। अगर लांबा नसीराबाद विधानसभा सीट के लिए राजी हो भी गए तो संघ वाले आड़े आ जाएंगे।
जहां तक स्थानीय नेताओं का सवाल है तो उनकी चौधरी से कभी ट्यूनिंग नहीं रही। होती भी कैसे? वे शुरू से कांग्रेसी रहे। समझा जाता है कि स्थानीय लॉबिंग देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी पी सारस्वत के पक्ष में हो रही है। वे वसुंधरा की पसंद भी हैं, मगर उन्हें टिकट दिए जाने पर जाट समाज भाजपा को पटखनी खिला सकता है। दावा अजमेर से पांच बार सांसद रहे प्रो. रासासिंह रावत भी ठोक चुके हैं, मगर उन्हें तो अजमेर से रुखसत किया ही इसलिए गया था कि रावत बहुल मगरा इलाका अजमेर संसदीय क्षेत्र से बाहर हो गया था। बताते हैं कि अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन ने तो यह कह कर टिकट मांगा है कि वे जीतने पर सांसद के नाते मिलने वाले वेतन-भत्ते नहीं लेंगे, मगर भाजपा गैर जाट के रूप में किसी जैन पर दाव खेलेगी, इसमें तनिक संदेह है।
वैसे अपना मानना है कि ये जितने भी नाम हैं, इन पर विराम तभी लग जाएगा, जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का नाम फाइनल होगा। उनसे भिड़ाने के लिए भाजपा को बाहर से दावेदार लाना होगा, जैसे पहले किरण माहेश्वरी को लाया गया था। बाहर से आने वालों में सतीश पूनिया व रामपाल जाट का नाम चर्चा में है।
जैसे ईश्वर के बारे व्याख्या करते करते वेद भी आखिर में नेति नेति कह मौन हो जाते हैं, ठीक वैसे ही राजनीति के बारे में भी चर्चा करते हुए आखिर में नेति नेति ही कहना उपयुक्त होगा, क्यों कि राजनीति के ऊंट किस करवट बैठेगा है, इसकी भविष्यवाणी दुनिया का बड़ा से बड़ा ज्योतिषी नहीं कर सकता।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

राजनीतिक मकसद साधने को बढ़ाया हेड़ा का कद

अब जब कि लोकसभा उपचुनाव की सरगरमी शुरू हो गई है, ऐन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के अजमेर दौरे के साथ अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेड़ा को राज्य मंत्री का दर्जा देने से साफ है कि इसका मकसद मात्र राजनीतिक लक्ष्य साधना ही है।
हो सकता है कि अजमेर विकास प्राधिकरण व जोधुपर विकास प्राधिकरण के अध्यक्षों के अधिकार बढ़ाने पर काफी समय से विचार चल रहा हो, मगर जिस प्रकार प्राधिकरणों को संचालित करने वाले अधिनियम में संशोधन किए बगैर राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया है, वह साबित करता है कि यह आनन फानन में किया गया है। अधिनियम में अध्यक्ष की हैसियत से अहम फैसले लेने का क्षेत्राधिकार अब भी इन्हें नहीं मिला है। अर्थात राज्य मंत्री का दर्जा एक तमगे से अधिक कुछ नहीं है। उसके लिए अधिनियम में बाकायदा संशोधन करना होगा। चूंकि सरकार इस बाबत ठीक से विचार नहीं कर पाई थी, इस कारण फिलहाल राज्य मंत्री का दर्जा देने की घोषणा कर दी गई, ताकि उपचुनाव में लाभ हासिल किया जा सके।
असल में सरकार ने लोकसभा चुनाव में वैश्य समाज को और अधिक संतुष्ट करने के लिए ही हेड़ा का कद बढ़ाया है। सरकार जानती है कि जीएसटी लागू होने के बाद वैश्य समुदाय, जो कि आम तौर पर व्यापार से जुड़ा हुआ है, उसमें काफी नाराजगी है। आपको ख्याल होगा कि पिछले साल 21 जनवरी को जब हेड़ा को अध्यक्ष बनाया गया था तो यह पूरी तरह से साफ था कि उनकी ताजपोशी केवल इस कारण संभव हो पाई, क्योंकि भाजपा अपने वोट बैंक वैश्य समाज को तुष्ट करना चाहती थी, जबकि राजनीतिक रूप से हेड़ा भूली बिसरी चीज हो चुके थे। राजनीतिक हलकों में उनकी नियुक्ति को लेकर आश्चर्य भी जताया गया था। ज्ञातव्य है कि जिले की एक भी विधानसभा सीट पर वैश्य समुदाय का व्यक्ति काबिज नहीं है, इस कारण इस समुदाय में नाराजगी रहती है। वे यह शिकायत करते रहे हैं कि वे भाजपा को तन-मन-धन से पूरा सहयोग करते हैं, मगर उसके अनुरूप राजनीतिक लाभ नहीं मिला है।
खैर, हेड़ा को एडीए का अध्यक्ष बनाए जाने से शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी व महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल के बाद सत्ता का एक और केन्द्र विकसित हो गया। जैसे ही हेड़ा अध्यक्ष बने, उन्होंने इस पद के दम पर धरातलीय राजनीतिक ताकत बढ़ाना शुरू कर दिया। यहां तक कि वे गैर सिंधीवाद के नाम पर अजमेर उत्तर विधानसभा सीट के दावेदार भी बन गए हैं। सच बात तो ये है कि उन्होंने दोवदारी मजबूत करने की दिशा में काम भी करना शुरू कर दिया है। अब उनके इर्द गिर्द भी समर्थकों को हुजूम रहता है। इसका नतीजा ये है कि देवनानी व हेड़ा के बीच टकराव आरंभ हो गया है। ये टकराव बाकायदा स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी तक भी पहुंचा है। देवनानी ने तो कृपलानी से शिकायत भी की कि हेड़ा उनके अनुशंषित कामों में रोड़ा अटकाते हैं। एलीवेटेड रोड को लेकर दोनों के बीच मतभेद खुल कर सामने आ चुके हैं। हेड़ा का दबाव रहता है कि विधायक कोटे के तहत एडीए के माध्यम से कराए जाने वाले कामों के उद्घाटन समारोहों में उन्हें भी अतिथि के तौर पर बुलाया जाए।
बहरहाल, भले ही अधिनियम में संशोधन के बिना हेड़ा का कद बढ़ाया गया है, वे और अधिक मजबूत हो गए हैं। इससे भले ही टिकट को लेकर खींचतान बढ़े, मगर भाजपा को वैश्य समुदाय का लाभ तो मिल ही सकता है। हेड़ा को राज्य मंत्री का दर्जा देते ही जिस प्रकार अजमेर जिला वैश्य सम्मेलन और श्री माहेश्वरी प्रगति संस्थान के कार्यकर्ताओं ने उनका बढ़ चढ़ कर स्वागत किया, वह यह समझने के लिए काफी है कि सरकार का निशाना ठीक लक्ष्य पर पड़ा है।
हालांकि भाजपा की ओर से गैर सिंधी प्रत्याशी का प्रयोग लगभग असंभव प्रतीत होता है, मगर हेड़ा का कद बढ़ाने से वह यह कहने की स्थिति में तो होगी कि उसने सिंधियों के साथ वैश्यों के राजनीतिक हितों का भी ध्यान रखा है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

आम आदमी पार्टी को भी तलाश है उम्मीदवार की

अजमेर में आगामी लोकसभा उपचुनाव के लिए एक ओर जहां कांग्रेस व भाजपा कमर कस रहे हैं और संभावित प्रत्याशियों के नामों पर चर्चा शुरू हो गई है, वैसे ही आम आदमी पार्टी भी किसी ऐसे प्रत्याशी की तलाश कर रही है तो कांग्रेस व भाजपा से विमुख मतदाताओं के वोट हासिल कर पार्टी की उपस्थिति दर्शा सके। जानकारी के अनुसार इस सिलसिले में अन्ना हजारे आंदोलन की धूम मचा चुकी व वर्तमान में यूनाइटेड अजमेर नामक संस्था के जरिए सामाजिक कार्यों में जुटी श्रीमती कीर्ति पाठक का मन टटोला गया है, हालांकि वे बहुत पहले ही कह चुकी हैं कि वे कभी चुनावी राजनीति में नहीं आएंगी।
ज्ञातव्य है कि अन्ना हजारे आंदोलन के दौरान कीर्ति पाठक बहुत सक्रिय रहीं व उनका नाम खूब चमका और उन्हीं की बदौलत बाद में आम आदमी पार्टी का वजूद पैदा हुआ। मगर जैसे ही पार्टी में जूतपैजार वाली स्थिति आई और उन पर झूठे आरोप लगे तो उन्होंने पार्टी से टाटा बाय बाय करने में ही भलाई समझी। अगर वे इस वक्त तक पार्टी में होतीं तो कदाचित सम्मानजनक उपस्थिति दर्ज करवा पातीं। हालांकि उनके मैदान से हटने के बाद में भी आम आदमी पार्टी सक्रिय रही, मगर उसका वजूद कभी कायम नहीं हो पाया। असल में इस पार्टी की स्थानीय इकाई को लेकर सदा विवाद ही रहे। पिछले चुनाव में तो पार्टी के घोषित प्रत्याशी के ऐन वक्त पर चुनाव मैदान से हटने पर पार्टी की उग्र कार्यकर्ता किरण शेखावत ने उनका मुंह काला कर दिया। बड़ा बवाल हुआ। कुल मिला कर वर्चस्व की लड़ाई के चलते पार्टी में आस्था रखने वाले कार्यकर्ता धीरे-धीरे छिटकते गए। ऐसी कमजोर स्थिति में ही मंगलवार को महावीर सर्किल स्थित बाबा जी की नसियां में कथित प्रदेश स्तरीय सम्मेलन कामयाब नहीं हो पाया। दावे के मुकाबले दस प्रतिशत भी कार्यकर्ता नहीं जुटे। उसकी एक वजह ये भी रही कि पार्टी की अजमेर लोकसभा पीओसी जयश्री शर्मा ने पहले ही विरोध दर्ज करवा दिया था।
बहरहाल, पार्टी के कर्ताधर्ताओं ने हिम्मत नहीं हारी है। वे किसी ऐसे पुराने कांग्रेस या भाजपा नेता की तलाश में हैं, जो कि अपना थोड़ा-बहुत जातीय समीकरण रखता हो, संपन्न हो और कांग्रेस व भाजपा से अलग हो चुके कार्यकर्ताओं को एकजुट कर सके। हालांकि पार्टी जानती है कि इस उपचुनाव में जीतना नितांत असंभव है, मगर यदि अन्ना हजारे व अरविंद केजरीवाल के नाम से वोट हासिल किए जा सकें व पार्टी का थोड़ा-बहुत भी प्रदर्शन ठीक ठाक हो तो उससे आगामी विधानसभा चुनाव के लिए मैदान तैयार किया जा सकेगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

नए अवतार में आएंगे लाला बन्ना?

अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत उर्फ लाला बन्ना की भाजपा में वापसी से ऐसा प्रतीत होता है कि सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो जाएगा, मगर जिस घटनाक्रम के बाद वे लौटे हैं, उससे इस बात की संभावना अधिक है कि वे लाला बन्ना का दूसरा संस्करण या दूसरा अवतार होंगे।
वस्तुत: कोई ये कह सकता है कि किसी भी राजनीतिक व्यक्ति के लिए अंतत: मूल धारा में आना मजबूरी होता है, अत: वह हालात से समझौता कर लेता है, मगर जिस प्रकार का लाला बन्ना का व्यक्तित्व है, वे भाजपा में लौटने मात्र के लिए नहीं लौटे हैं। सब जानते हैं कि वे कितने ऊर्जावान और महत्वाकांक्षी हैं। भाजपा में ही ऐसे बहुत से हैं, जो भाजपा में रहते हुए भी मृतप्राय: हैं, मगर लाला बन्ना भाजपा से बाहर रहते हुए भी अपने वजूद को जिंदा रखे हुए रहे। उनकी अपनी फेन्स फॉलोइंग है, जिसने उन्हें विस्मृत नहीं होने दिया। इस बीच संजीदगी व गंभीरता भी बढ़ी है, लिहाजा पक्का मान कर  चलिए कि इस बार बड़ी चतुराई से मोहरे खेलेंगे। और उसकी वजह भी है, वे केवल स्थानीय स्तर पर जिंदा नहीं है, बल्कि ऊपर भी उनके तार बहुत मजबूत हैं। यानि कि अब लाला बन्ना का नया अवतार सामने आना वाला है।
रहा सवाल स्थानीय समीकरणों का, तो कुछ लोग यह मान कर चल सकते हैं कि चूंकि वे पूर्व में महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल के खास सिपहसालार रहे, इस कारण अब भी शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी विरोधी सेना के सेनापति होंगे ही, ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। कहते हैं न कि रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय, टूटे से फिर न ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय। इसकी वजह ये है कि भाजपा में औपचारिक तौर पर भले ही वापसी अब जा कर हुई, मगर वास्तविक सुलह तो नगर निगम के महापौर धर्मेन्द्र गहलोत से हाथ मिला कर हो गई थी। तभी ये तय हो गया था कि वे देर-सवेर भाजपा में शामिल होंगे, अन्यथा सुलह की जरूरत ही क्या थी? बाद में जिस प्रकार भाजपा के दिग्गज नेता ओम प्रकाश माथुर के अजमेर आगमन पर उनकी जो जिंदादिल मौजूदगी थी, वह इस बात का प्रमाण थी कि वापसी सुनिश्चित है। खैर, गहलोत के साथ सुलह राजगढ़ भैरोंधाम के मुख्य उपासक चंपालाल जी महाराज की पहल पर हुई या फिर दोनों सुलह चाहते थे, किसका इनीशियेटिव था पता नहीं, मगर इतना तय है कि सुलह के साथ उन दोनों के बीच कुछ तो तय हुआ ही होगा। ऐसे में यह सुनिश्चित तौर पर नहीं कह सकते कि लाला बन्ना फिर पुराने समीकरणों में समाहित हो जाएंगे। असल में भाजपा से बाहर रह कर उन्हें इस बात का भी ठीक अनुमान हो गया होगा कि उनकी राजनीतिक भलाई कैसा रोल अदा करने में है? कौन अपना और कौन पराया है? सबसे बड़ी बात ये है कि नीचे से ऊपर वे जिस लॉबी के हिस्से रहे हैं, वह कोई कमजोर लॉबी नहीं है। और उसमें भी वे कमजोर स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि वे किसी नई रणनीति के सूत्रधार होंगे। चूंकि उनमें पहले से अधिक परिपक्वता आई होगी, इस कारण लगता नहीं कि वे भावावेश में गैर सिंधीवाद की मुहिम का हिस्सा होंगे या मेयर बनने के लिए विरोधियों से हाथ मिलाने जैसा कदम उठाएंगे। बेशक अजमेर में गैर सिंधी व गैर अनुसूचित जाति के नेताओं के लिए सीमित संभावनाएं हैं, मगर उन सीमित संभावनाओं में भी वे अपने लिए स्थान सुनिश्चित कर लेंगे, ये मान कर चला जा सकता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000