मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अब कई नेताओं की नजर मेयर सीट पर

कांग्रेस के सत्तारूढ़ होते ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने स्वायत्तशासी संस्थाओं में अध्यक्ष, सभापति व मेयर आदि के चुनाव सीधे कराने के अपने पिछली सरकार के फैसले को फिर से लागू कर दिया है। ज्ञातव्य है कि पिछली भाजपा सरकार ने अध्यक्ष, सभापति व मेयर के चुनाव वार्ड पार्षदों में से चुनने का नियम लागू किया था। इसे यूं समझें कि जिस प्रकार कांग्रेस सरकार के दौरान कमल बाकोलिया सीधे चुनाव से मेयर बने थे, जबकि भाजपा सरकार में धर्मेन्द्र गहलोत पार्षदों में चुन कर मेयर बने। बहरहाल, अब जब कि नया आदेश लागू हो गया है तो कई नेता मेयर बनने का सपना देखने लगे हैं।
जहां तक सीट के रिजर्वेशन का सवाल है, अभी यह खुलासा नहीं हुआ है कि क्या रिजर्वेशन की लॉटरी नए सिरे से निकाली जाएगी, या फिर वर्तमान सामान्य सीट को छोड़ कर लॉटरी निकाली जाएगी। अगर नए सिरे से लॉटरी निकाली गई तो सामान्य वर्ग के लिए संभावनाएं बनी रहेंगी। कुछ का मानना है कि चूंकि अनुसूचित जाति महिला, अनुसूचित जाति पुरुष, सामान्य पुरुष वर्ग से एक-एक बार सभापति-मेयर रहे हैं, इस कारण इस बार ओबीसी पुरुष व ओबीसी महिला को चांस मिल सकता है। कुल मिला कर मेयर बनने के इच्छुक नेताओं की नजर लॉटरी पर टिकी हुई है।
मेयर की सीट सामान्य होने पर भाजपा में पार्षद जे. के. शर्मा, नीरज जैन की नजर है तो निवर्तमान एडीए चेयरमैन शिवशंकर हेडा, पूर्व यूआईटी चेयरमैन धर्मेश जैन सरीखे वरिष्ठ नेता भी मन बना सकते हैं। हालांकि मौजूदा मेयर धर्मेन्द्र गहलोत दुबारा मेयर बनने के इच्छुक नहीं बताए जाते, विशेष रूप से सीधे फाइट करके, चूंकि उनकी रुचि अब लोकसभा चुनाव में है, मगर मेयर की सीट ओबीसी के लिए रिजर्व होने पर वे भी मन कर सकते हैं। अगर मेयर की सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होती है तो हाल ही विधानसभा चुनाव में अजमेर दक्षिण से पराजित हेमंत भाटी, पूर्व मेयर कमल बाकोलिया, पूर्व उप मंत्री ललित भाटी व पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल कांग्रेस टिकट के दावेदार हो सकते हैं। इसी प्रकार भाजपा की ओर से मौजूदा जिला प्रमुख सुश्री वंदना नोगिया, पूर्व राज्यमंत्री श्रीकिशन सोनगरा के पुत्र विकास सोनगरा आदि का दावा बन सकता है।
मेयर की सीट ओबीसी के लिए रिजर्व होने पर माली, स्वर्णकार आदि ओबीसी जातियों के नेता दावा ठोक सकते हैं। ये नेता कौन होंगे, इस बारे में अभी से कयास लगाना कठिन है। बानगी के तौर बता सकते हैं कि भाजपा में तुलसी सोनी दावा ठोक सकते हैं, जिनकी विधायक का टिकट हासिल करने की इच्छा पूरी नहीं हो पाई है।
वैसे, एक बात है। मेयर का चुनाव लडऩा आसान काम नहीं है। जो भी नेता पार्टी का टिकट लेकर आएगा, उसको कम से कम तीस लाख रुपए तो केवल पार्षद प्रत्याशियों पर खर्च करने होंगे। साठ वार्डों में प्रत्याशी कम से कम पचास हजार रुपए तो मेयर प्रत्याशी से झटकेंगे, वरना काम नहीं करेंगे।
आखिर में एक फैक्टर का भी जिक्र करना अनुचित नहीं होगा, वो यह कि स्थानीय राजनीति में सिंधियों की अहम भूमिका आंकी गई है। भाजपा जरूर किसी सिंधी को टिकट नहीं देगी, क्योंकि उसका मौजूदा विधायक सिंधी है, मगर कांग्रेस भाजपा मानसिकता के सिंधी वोट बैंक में सेंध मारने के लिए कदाचित किसी सिंधी को टिकट देने पर कम से कम एक बार तो विचार कर ही सकती है।

रामचंद्र चौधरी होंगे अजमेर लोकसभा क्षेत्र के प्रबल कांग्रेस दावेदार

खुसर-फुसर है कि अजमेर डेयरी के चेयरमैन रामचंद्र चौधरी आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से प्रबल दावेदार होंगे। बताया जाता है कि हाल ही संपन्न विधानसभा चुनाव के दौरान फिर से कांग्रेस में शामिल होने के दौरान ही लगभग यह तय हो गया था कि उनकी दावेदारी को गंभीरता से लिया जाएगा।
ज्ञातव्य है कि प्रदेश कांग्रेस से नाइत्तफाकी के चलते उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि वे भाजपा में तो शामिल नहीं हुए, मगर उन्होंने भाजपा को खुला समर्थन दिया था। इसके एवज में उन्हें भाजपा हाईकमान से कोई लाभ नहीं दिया। विधानसभा चुनाव में जाट वोट बैंक में सेंध मारने के लिए उन्हें कांग्रेस में लिया गया। कहते हैं कि मसूदा में उनकी मेहनत की वजह से ही कांग्रेस के राकेश पारीक विजयी हुए। अब जबकि लोकसभा चुनाव की सरगरमी बढऩे लगी है तो समझा जाता है कि वे टिकट के प्रबल दावेदार होंगे। इस दिशा में उन्होंने प्रयास भी शुरू कर दिए हैं।
यहां आपको बता दें कि अजमेर लोकसभा क्षेत्र में तकरीबन ढ़ाई लाख जाट मतदाता हैं। ऐसे में कांग्रेस किसी जाट पर ही दाव खेलने का विचार कर सकती है। यूं जाट दावेदारों में पूर्व जिला प्रमुख रामस्वरूप चौधरी का नाम भी लिया जा रहा है। रहा सवाल पूर्व विधायक नाथूराम सिनोदिया का तो वे चूंकि पिछले विधानसभा चुनाव में किशनगढ़ से बागी बन कर खड़े हो गए थे, इस कारण उनकी संभावनाएं पूरी तरह से समाप्त मानी जाती हैं। अलबत्ता जाट वोटों पर पकड़ के लिए उन्हें फिर से कांग्रेस में जरूर शामिल किया जा सकता है।
उधर पूर्व जिला प्रमुख व पूर्व मसूदा विधायक श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पतिदेव युवा भाजपा नेता व समाजसेवी भंवर सिंह पलाड़ा आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। श्रीमती पलाड़ा के हाल ही मसूदा से हार जाने के बाद सक्रिय राजनीति में बने रहने की मंशा से उन्होंने पूरे लोकसभा क्षेत्र का बारीकी से अध्ययन शुरू कर दिया है।
असल में डॉ. रघु शर्मा के केकड़ी से चुने जाने के बाद अजमेर लोकसभा क्षेत्र खाली हो गया है। उपचुनाव में हारे रामस्वरूप लांबा नसीराबाद से विधायक चुने जा चुके हैं। चूंकि लोकसभा के आम चुनाव में मात्र पांच माह शेष हैं, इस कारण यहां उपचुनाव नहीं होंगे। आम चुनाव के साथ ही अजमेर में चुनाव होने हैं। फिलवक्त दावेदारी के लिहाज से यह क्षेत्र खाली हो गया है। दोनों दल नए सिरे से विचार कर रहे हैं कि किस पर दाव खेला जाए। हालांकि देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी.पी. सारस्वत को पूरी उम्मीद है कि इस बार उन्हें मौका मिल सकता है। देखने वाली बात ये है कि क्या भाजपा भी रघु शर्मा के एक बार यहां से जीतने के बाद ब्राह्मण पर दाव खेलने पर विचार करती है या नहीं। यूं इस क्षेत्र में जाटों के तकरीबन ढ़ाई लाख वोट हैं, इस कारण दावा तो किसी जाट का ही बनता है, मगर भाजपा के कुछ जमा दो प्रबल दावेदार हैं। किशनगढ़ के भाजपा विधायक भागीरथ चौधरी व पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गैना। अगर इन पर दाव खेलना भाजपा को रिस्की लगा तो हो सकता है कि नागौर से सी. आर. चौधरी को आयातित किया जा सकता है। उधर वैश्य ये मानते हैं कि इस सीट पर उनका दावा बनता है। इस लिहाज से पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा व पूर्व यूआईटी चेयरमैन धर्मेश जैन दावेदारी करने के मूड में हैं।

गुरुवार, 3 मई 2018

क्या अनादि सरस्वती टिकट की इतनी गंभीर दावेदार हैं?

शहर के जाने-माने राजनीतिक व प्रशासनिक पंडित एडवोकेट राजेश टंडन ने एक बार फिर सोशल मीडिया में साध्वी अनादि सरस्वती का नाम आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर की सीट के लिए उछाल दिया है। चूंकि वे पेशे से पत्रकार नहीं हैं, इस कारण उनके शब्द विन्यास में पत्रकारिता की बारीक नक्काशी नहीं होती, मगर जो भी अनगढ़ शैली में कंटेंट होता है, उस पर गौर करना ही होता है। खबर में ही व्यंग्य, चुटकी व तंज का अनूठा पुट डाल देते हैं, जिससे वह रोचक बन पड़ती है। अनादि सरस्वती के बारे में उनकी पोस्ट का पोस्टमार्टम करने का इसलिए जी चाहता है कि उनके पास शहर व राज्य के कई महत्वपूर्ण राजनीतिक व प्रशासनिक तथ्य होते हैं। कदाचित वे एक मात्र ऐसे बुद्धिजीवी हैं, जो न केवल हर ताजा हलचल पर नजर रखते हैं, अपितु सोशल मीडिया पर शाया भी करते हैं।
खैर, पहले उनकी पोस्ट पर नजर डालते हैं:-
जय हो मां अनादि सरस्वती जी की, इस बार अजमेर नॉर्थ से विधानसभा का चुनाव भाजपा के टिकट पर लडऩे की सर्वत्र चर्चा है, आलाकमान की मंजूरी व मजबूरी, दोनों ही हैं, जातीय समीकरण भी पक्ष में हैं, और पार्टी का नीतिगत निर्णय है, साधु सन्यासियों को ज्यादा से ज्यादा टिकट देने हैं, हिंदुत्व का कार्ड फिर से खेलना है, इसलिये अनादि सरस्वती को भाजपा के हर समारोह में मंचासीन किया जाता है, योजनाबद्ध तरीके से, और आलाकमान व संघनिष्ठों के आदेश से, स्वयं अनादि जी में भी ग्लो व ग्लैमर है, आकर्षक व मोहक तथा कुशल वक्ता हैं और वाक पटु हैं और साथ ही वे स्वयं कुशल ऑर्गेनाइजर हैं तथा आजकल कई बड़े-बड़े आयोजक एव राजनीतिज्ञ साथ लग गये हैं, शुभकामनाएं।
देखा, कितने दिलकश अंदाज में उन्होंने अपनी बात कही है। अव्वल तो अपुन यह साफ कर दें कि खुद अनादि सरस्वती ने कहीं भी यह नहीं दर्शाया है कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है भी या नहीं। वे कुशल वक्ता व वाक् पटु तो हैं, मगर वाचाल नहीं, सीमित बोलती हैं, इस कारण कहीं भी ये पकड़ में नहीं आया कि वे राजनीति की दिशा में जा रही हैं। हां, उनके एक्ट से यह अनुमान जरूर लगाया जा सकता है कि संघ उनको प्रोजेक्ट करने के मूड में है। हालांकि संघ वालों के मन को भांपना देवताओं भी बस में भी नहीं, मगर जिस तरह से पिछले दिनों वे संघ व भाजपा पोषित मंचों के अतिरिक्त सामाजिक मंचों पर दिखाई दी हैं, उससे उनके साइलेंट एजेंड पर शक होता है। वे मूलत: आध्यात्म के क्षेत्र से हैं और पिछले कुछ वर्षों से यकायक जिस तरह से छा कर गिनी-चुनी संभ्रांत शख्सियतों में शुमार हुई हैं, वह वाकई चौंकाने वाला है। विद्वता एक मूल वजह है, लोकप्रिय होने की, मगर उनका खूबसूरत व्यक्तित्व भी हर किसी को अपनी ओर खींचता है। महिला होने का एडवांटेज तो है ही।
टंडन जी ने जिन तथ्यों को आधार बनाया है, उनमें थोड़ा दम है। एक तो वे सिंधी हैं और अजमेर उत्तर की सीट पर भाजपा सदैव किसी सिंधी को प्रत्याशी बनाती रही है। वे महिला भी कोटा पूरा करती हैं, जिसके प्रति आम तौर पर मतदाता का सहज रुझान होता है। खूबसूरती सोने में सुहागा है। वे इस कारण भी सुपरिचित हैं, क्योंकि फेसबुक व वाटृस ऐप पर छायी रहती हैं। पिछले कुछ दिनों से संघनिष्ठों से उनकी नजदीकी यह भान कराती है कि उनकी विचारधारा हिंदुत्व को पोषित करती है। जैसा कि नजर आ रहा है कि भाजपा इस बार फिर हिंदुत्व का एजेंडा आगे ला सकती है, क्योंकि एंटीइंकंबेंसी फैक्टर तगड़ा काम कर रहा है, ऐसे में किसी साध्वी को अगर मैदान में उतारा जाता है तो उसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं होगी।
मगर सवाल ये कि अगर संघ वाकई उन पर काम कर रहा है तो मौजूदा विधायक व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का क्या होगा? क्या संघ पत्ता बदलने के मूड में है? क्या देवनानी का टिकट काटना इतना आसान है? क्या देवनानी इतनी आसानी से सीट छोड़ देंगे? जानकारी तो ये है कि पिछले दिनों भी जब अनादि का नाम अफवाहों में आया था तो जैसा कि राजनीति में होता है, कुछ लोगों ने उनकी कुंडली के रहस्य जुटाना शुरू कर दिए थे। कहते हैं न कि अगर आपको अपने पुरखों के बारे में जानकारी न हो तो अपना नाम टिकट की दावेदारी में पेश कर दो, लोग आपकी सात पीढ़ी की कारगुजारियों को ढूंढ़ निकालेंगे। यही वजह है कि संघ ने कहीं भी यह अहसास नहीं कराया कि उसका अनादि के बारे में क्या दृष्टिकोण है। मगर टंडन जी ने जिस तरह से लिखा है कि अनादि सरस्वती को भाजपा के हर समारोह में मंचासीन किया जाता है, योजनाबद्ध तरीके से, तो कान खड़े होते हैं। हो सकता है कि यह कयास मात्र हो, मगर इस खबर में रोचकता तो है, लिहाजा इसकी पॉलिश कर आपकी सेवा में प्रस्तुत की है।

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

तिराहे पर खड़े हैं शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी

-तेजवानी गिरधर-
अजमेर उत्तर से लगातार तीन बार जीत चुके शिक्षा राज्यमंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का टिकट यूं तो आगामी विधानसभा चुनाव में कटना कठिन सा प्रतीत होता है, मगर राजनीति के जानकारों का मानना है कि चौथे चुनाव के मौके पर वे तिराहे पर खड़े हैं, जहां उन्हें तय करना होगा कि आगे की राजनीतिक यात्रा किस रास्ते में ले जायी जाए।
तेजवानी गिरधर
जैसा कि सर्वविदित है कि हाल ही संपन्न हुए लोकसभा उपचुनाव में अजमेर संसदीय क्षेत्र की आठों सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था, उसी कारण संसदीय क्षेत्र के सातों मौजूदा भाजपा विधायकों के टिकट पर तलवार लटक गई है। हालांकि सातों के टिकट काट दिए जाएंगे, ऐसा अनुमान लगाना बेमानी है, मगर इतना तय है कि उपचुनाव के परिणाम के बाद भाजपा मौजूदा विधायकों को टिकट देने से पहले सभी समीकरणों को हर दृष्टिकोण से आंकना चाहेगी। ऐसे में किस का टिकट कटेगा और किस का बचेगा, कुछ भी नहीं कहा जा सकता। जहां तक प्रो. देवनानी का सवाल है तो आम धारणा यही है कि वे येन-केन-प्रकारेण टिकट तो ले ही आएंगे। उसकी अहम वजह है उनकी आरएसएस में गहरी पेठ। राजनीतिक जानकार ये भी मानते हैं कि इस बार टिकट वितरण में आरएसएस का पलड़ा भारी रहेगा, ऐसे वे कोई जुगाड़ बैठा ही लेंगे। वैसे भी भाजपा की आरएसएस लॉबी के जो प्रथम दस भाजपा नेता हैं, उनमें देवनानी शामिल हैं। यही वजह है कि उनकी टिकट कटना मुश्किल होगा। बात अगर उनके टिकट कटने की है तो उसकी बड़ी वजह ये है कि स्थानीय स्तर पर भाजपा की एक बड़ी लॉबी उनके खिलाफ है। यूं तो वह लॉबी मूलत: गैर सिंधीवाद की पोषक है, मगर विशेष रूप से उनके निशाने पर देवनानी हैं। यह कह कर कि अब देवनानी का जनाधार नहीं रहा है या उनका जीतना मुश्किल है, वह लॉबी गैर सिंधी को टिकट देने पर दबाव बनाएगी। उसके दबाव के बाद भी यही माना जाता है कि देवनानी का टिकट कटना आसान काम नहीं है। यह बात दीगर है कि वे खुद ही आत्मविश्वास खो दें और पीछे हट जाएं, तो बात अलग है।
जानकारी के अनुसार देवनानी को शिफ्ट करने पर कहीं न कहीं विचार हुआ जरूर है। यही वजह है कि पिछले दिनों भाजपा के अंदरखाने उनको प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाने की चर्चा हुई थी। संभव है कि वसुंधरा उनको यह पद देने पर सहमत नहीं रही हों, मगर खुद देवनानी की रुचि भी इसमें कम ही रही होगा। जाहिर सी बात है कि जो सत्ता का मजा चख चुका हो, वह काहे को संगठन का काम संभालेगा। संभव है कि देवनानी ने हाईकमान के सामने यह तर्क दिया हो कि संघ के शैक्षिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में वे तभी समर्थ होंगे, जबकि वे सत्ता में रहें।
पता चला है कि देवनानी ने राज्यसभा में जाने का भी विकल्प रखा था, मगर राज्य के तीन राज्यसभा सदस्यों के चुनाव का गणित ही ऐसा बैठा कि उनका नंबर नहीं आ पाया। उनका क्या, वसुंधरा की पहली पसंद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी तक को चांस नहीं मिला। राज्यसभा में जाने की देवनानी की मंशा कदाचित इस कारण रही होगी कि केन्द्र में पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवानी को हाशिये पर डाल दिए जाने के बाद एक भी सिंधी भाजपा नेता नहीं है। अगर देवनानी को राज्यसभा में जाने का मौका मिल जाता तो वे उस कमी को पूरा करने की कोशिश कर सकते थे।
हालांकि राजनीति में कभी भी कुछ भी संभव है, मगर फिलहाल देवनानी तिराहे पर तो खड़े हैं। एक मात्र सुरक्षित विकल्प विधानसभा चुनाव लडऩा है, मगर अब वह पहले जैसा आसान नहीं रह गया है। एक तो केन्द्र व राज्य सरकार के खिलाफ एंटी इंकंबेंसी फैक्टर, दूसरा स्थानीय स्तर पर भाजपा के एक धड़े के भितरघात करने की आशंका। इसके अतिरिक्त माना जा रहा है कि इस बार कोई न कोई गैर सिंधी भाजपाई निर्दलीय रूप से मैदान में जरूर उतरेगा, जिसका मकसद खुद जीतना कम, देवनानी को हराना अधिक होगा। ऐसे में चौथी बार भी आत्मविश्वास से भरे देवनानी को बहुत जोर आएगा। अगर आठ माह बाद बनी स्थितियां देवनानी को अनुकूल नहीं लगीं तो संभव है कि वे क्विट कर जाएं और नई राजनीतिक संभावनाएं तलाशने को मजबूर हो जाएं।