शनिवार, 20 जुलाई 2019

सोच समझ कर पश्चिम बंगाल भेजा गया है धनखड़ को

पूर्व केन्द्रीय मंत्री जगदीप धनखड़ को सोची समझी रणनीति के तहत पश्चिम बंगाल भेजा गया है। वे बेहद शातिर व तेज-तर्रार हैं। पश्चिम बंगाल की खुर्रांट मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर नकेल कसने के लिए उनके जैसा ही नेता चाहिए था। वे सुप्रीम कोर्ट के वकील होने के कारण कानून के गहरे जानकार तो हैं ही, लंबी राजनीतिक यात्रा की वजह से राजनीति के दाव-पेच भी भलीभांति जानते हैं। हां, एक बात ये जरूर है कि वे कट्टर हिंदूवादी नहीं हैं। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि कांग्रेस विचारधारा की रही है।
ज्ञातव्य है कि उनकी राजनीतिक यात्रा 1989 में झुंझुनूं से जनता दल सांसद के रूप में हुई थी। पहली बार में ही वी पी सिंह सरकार में संसदीय कार्य राज्य मंत्री बनाए गए। 1991 में जनता दल छोड़ कर कांग्रेस की सदस्यता ले ली। कांग्रेस टिकट पर अजमेर से लोकसभा चुनाव लड़ा, मगर भाजपा के प्रो. रासासिंह रावत से हार गए। उसके बाद 1993 में अजमेर जिले की किशनगढ़ विधानसभा सीट से कांग्रेस टिकट पर लड़ कर विजयी हुए। 1998 में झुंझुनू से कांग्रेस टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा, मगर तीसरे स्थान पर रहे थे। 2003 में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने पर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। गत विधानसभा चुनावों में उनके कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा होती रहती थी. मगर उन्होने भाजपा नहीं छोड़ी।
अजमेर से नाता रहने के कारण स्थानीय कांग्रेसी उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं। कंप्यूटर की माफिक तेजी से दायें-बायें चलती उनकी आंखें बयां करती हैं कि वे बेहद तेज दिमाग हैं। चाल में गजब की फुर्ती है। बॉडी लैंग्वेज उनके ऊर्जावान होने का सबूत देती है। हंसमुख होने के कारण कभी वे बिलकुल विनम्र नजर आते हैं तो मुंहफट होने के कारण सख्त होने का अहसास करवाते हैं। जब अजमेर में लोकसभा चुनाव लडऩे को आये स्वर्गीय श्री माणक चंद सोगानी शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष थे। नया बाजार में सोगानी जी के सुपुत्र के दफ्तर में हुई पहली परिचयात्मक बैठक में ही उनका विरोध हो गया, चूंकि उन्हें यहां कोई नहीं जानता था। प्रचार का समय भी बहुत कम था। फिर भी उन्होंने प्रोफेशनल तरीके से चुनाव लड़ते हुए सारे संसाधन झोंक दिए। टेलीफोन डायरेक्टरी लेकर सुबह छह बजे से आठ बजे तक आम लोगों से वोट देने की अपील करते थे। हालांकि उन्होंने चुनाव बड़ी चतुराई व रणनीति से लड़ा, मगर सारा संचालन अपने साथ लाए दबंगों के जरिए करवाने के कारण स्थानीय कांग्रेसियों को नाराज कर बैठे। वे जीत जाते, मगर स्थानीय कांग्रेस नेताओं को कम गांठा और सारी कमान झुंझुनूं से लाई अपनी टीम के हाथ में ही रखी। यही वजह रही कि स्थानीय छुटभैये उनसे नाराज हो गए और उन्होंने ठीक से काम नहीं किया। हारने के बाद पलट कर अजमेर का रुख नहीं किया।
हालांकि अजमेर व किशनगढ़ वासियों के लिए यह सुखद हो सकता है कि अब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हो गए हैं, मगर वे हाई-फाई और सेलिब्रिटी स्टाइल के नेता होने के कारण गिनती के कांग्रेसियों से उनके संपर्क हैं। हां, इतना जरूर है कि जाट समाज में उनकी खासी प्रतिष्ठा है। उनकी राज्यपाल पद पर नियुक्ति करके जाट वोट बैंक को साधा गया है। रहा सवाल पश्चिम बंगाल को तो समझा जाता है कि वे कानूनी दावपेच में ममता को अडऩे नहीं देंगे।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, 17 जुलाई 2019

देवनानी की उछल-कूद के मायने?

दो बार मंत्री रह चुकने के बाद विपक्ष का अदद विधायक रहने की पीड़ा क्या होती है, इसके अहसास से इन दिनों अजमेर उत्तर के भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी गुजर रहे होंगे। बावजूद इसके वे खामोश हो कर घर नहीं बैठ गए। उछल-कूद मचाए हुए हैं। विधानसभा में अपनी उपस्थिति खम ठोक कर दर्शा रहे हैं। यहां तक कि सदस्यता अभियान के साथ-साथ जनसुनवाई भी कर रहे हैं। उनकी इस व्यस्तता को देख कर लगता ही नहीं कि वे अपने दिल में सत्ता सुख के अभाव का दर्द भी संजोये हुए हैं। उनकी यह हालत देख कर यकायक ये फिल्मी गाना याद आ गया:- तुम इतना जो मुस्करा रहे हो, क्या गम है जिसको छिपा रहे हो।
देवनानी की सक्रियता में इसलिए भी अतिरिक्त सक्रियता नजर आती है, क्यों उनकी ही साथी विधायक श्रीमती अनिता भदेल कुछ खास चर्चा मे नहीं हैं। गर सक्रिय भी हैं तो कम से कम अखबारों में तो नजर नहीं आ रहीं।
खैर, देवनानी की सक्रियता में दिलचस्प बात ये है कि वे अजमेर के उन्हीं चिरपरिचित मुद्दों को फिर से जोर-शोर से उठा रहे हैं, जो पिछले कई सालों से पतंग के मांझे की तरह उलझे हुए हैं। चाहे पानी की बात या बिजली की या फिर यातायात की, सारी समस्याएं उनके पिछले कार्यकाल में भी मौजूद थीं, जब वे मंत्री थे। वे समस्याएं उनके उससे भी पिछले विधायकी कार्यकाल में यथावत थीं। बेशक विपक्ष में रहते उनका फर्ज है कि अजमेर की आवाज विधानसभा में उठाएं, मगर सवाल उठता है कि आज जिन मुद्दों को लेकर वे सरकार को घेर रहे हैं, उनका समाधान वे अपने मंत्रित्व कार्यकाल में क्यों नहीं करवा पाए। वे भी जानते होंगे कि अजमेर की समस्याओं का समाधान आखिर हो क्यों नहीं पाता? एक विधायक के रूप में उनका ये चौथा टर्म है। अजमेर वासी वर्षों से इस अनुभव से गुजर रहे हैं कि यहां का जिला प्रशासन आमतौर पर राजनीतिक दबाव में नहीं रहता। समस्याओं को लेकर तय शिड्युल से बार-बार बैठकें होती हैं। समीक्षा होती है। वादे होते हैं। घोषणाएं होती हैं। मगर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात। और आम जन भी सहनशीलता भी काबिले गौर है। तभी तो इस शहर को टायर्ड और रिटायर्ड लोगों का शहर कहा जाता है। कोई इलायची बाई की गद्दी से प्रभावित बताता है तो मुर्दा शहर की संज्ञा देता है।
बात देवनानी जी की चल रही थी। लगातार सक्रिय रहना उनकी आदत में आ गया है या इसका कोई प्रयोजन है। जानकार लोगों का मानना है कि उनकी महत्वाकांक्षा अभी समाप्त नहीं हुई है। हाल ही उन्होंने यह शगूफा छोड़ कर राजनीतिक हलके में तूफान लाने की कोशिश की सरकार ज्यादा दिन की मेहमान नहीं है। कहीं उनको ये उम्मीद तो नहीं कि जब भाजपा सरकार को गिराने की षड्यंत्र में कामयाब हो गई तो उनके भाग्य का भी छींका फूटेगा। या फिर ये सोचते होंगे कि राजस्थान में हंगामा करूंगा तो  मोदी जी की नजर में रहूंगा। पता नहीं किसी दिन स्टार चमकें और दिल्ली में किसी महत्वपूर्ण काम के लिए बुला लिए जाएं। उधर श्रीमती भदेल को पता है कि यदि देवनानी का भाग्य चेता तो वे भी फालतू नहीं रहने दी जाएंगी। गुटबाजी को बैलेंस करने के लिए उनको भी दूसरे पलड़े में बैठाया जा सकता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, 15 जुलाई 2019

अजमेर में ब्लॉगिंग का इतिहास बनाम ब्लॉगरों की जन्मकुंडली

हाल ही जाने-माने पत्रकार, गजलकार श्री सुरेन्द्र चतुर्वेदी का अलंकारयुक्त भाषा-शैली में चुटीला ब्लॉग सामने आया। उन्होंने अपने चिरपरिचित अतिविशिष्ट अंदाज में ब्लॉग लिखने की अभिरुचि को कीड़े की संज्ञा दी है। जब उनका कीड़ा प्रस्फुटित हुआ तो अपना भी वही कीड़ा बाहर आने को कुलबुलाने लगा। मुझे लगा कि अजमेर के ब्लॉगरों के बारे में लिखे गए इस पहले ब्लॉग में दी गई जानकारी के समुद्र में अंजुलि मात्र मेरी जानकारी भी सुधिजन को शेयर की जाए।
अपनी बात आरंभ करने से पहले यह स्पष्ट कर दूं कि ब्लॉग की परिभाषा ये है कि उसमें लेखक किसी विषय पर अपना नजरिया पेश करता है अथवा किसी मुद्दे को अपनी ओर से एक नई दिशा प्रदान करता है। देश-विदेश के विदेश के ब्लॉगरों को पढ़ेंगे तो यह बात ठीक से समझ आएगी। मगर अजमेर में एक नया प्रयोग हुआ है। वो ये कि यहां ब्लॉग में खबरों ने भी घुसपैठ कर ली है। इसके अतिरिक्त यह एक हथियार की शक्ल भी अख्तियार कर चुका है। उसकी अपनी एक वजह है, जिसका खुलासा बाद में कभी करूंगा। दरअसल वह एक यात्रा है, जो नए मुकाम दर मुकाम तय कर रही है।
एक बात और, वो यह कि लिखना मुझे यही था कि आपको ब्लॉगर्स से ठीक परिचय करवाऊं, मगर जरूरत से ज्यादा डूबने की आदत के चलते या यूं कहिये कि रास्ते से गुजरते हुए नजर आ रही हर उपयोगी वस्तु को अपने झोले में डाल लेने की प्रवृत्ति की वजह से यह आलेख कुछ अधिक विस्तार पा गया और इसमें ब्लॉगरों के अतिरिक्त वे भी जगह पा गए, जो कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्र विधा में हाथ आजमा रहे हैं। मूलत: पत्रकारिता से पैदा हुए हैं, और सूचना संप्रेषण के नए आयामों में विचरण करते हुए यू-ट्यूब तक पहुंच गए हैं। लिहाजा इस आलेख में मैं ब्लॉगर्स के साथ अजमेर की न्यूज वेब साइट्स व यू ट्यूब चैनल पर भी तनिक नजर डालने की कोशिश करूंगा। आखिरकार वे भी मेरे भाई हैं। यदि किसी का जिक्र होने से रह जाए तो पहले से क्षमा मांग लेता हूं। अगर मेरी जानकारी में लाया गया तो मैं तुरंत संशोधन भी कर लूंगा। कुछ नए लेखक ऐसे भी हैं, जो कि पेशे से पत्रकार तो नहीं और न ही उन्होंने ब्लॉग बनाया है, मगर श्री एस पी मित्तल की स्टाइल पर अपने न्यूज आइटम को वे सीधे वाट्स ऐप व फेसबुक पर फ्री स्टाइल में परोसने लगे हैं।
खैर, बात आरंभ करता हूं। यूं तो श्री चतुर्वेदी स्वयं सटायर लिखने वालों की पहली पंक्ति में शुमार रहे हैं, जिनमें श्री नरेन्द्र चौहान, श्री श्याम शर्मा, महावीर सिंह चौहान, डॉ. रमेश अग्रवाल, श्री ओम माथुर व श्री शिव शर्मा की गिनती होती है। इनमें कॉलमिस्ट को भी जोड़ दिया जाए तो वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा व गोविंद मनवानी अव्वल रहे हैं, जो नियमित फिल्म व दूरदर्शन समीक्षा करते थे। इन सभी लेखकों के सटायर व कॉलम अखबारों में प्रकाशित हुआ करते थे। तब इंटरनेट की जानकारी चंद लोगों को ही हुआ करती थी। उस जमाने में कदाचित श्री विजय शर्मा ऐसे पहले पत्रकार थे, जो इंटरनेट फ्रेंडली हुए। वे ईमेल के माध्यम से श्री चतुर्वेदी के सटायर देश भर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं को भेजा करते थे। मैं समझता हूं कि श्री चतुर्वेदी जितना अजमेर में छपे, उससे कई गुना देशभर में छपे। तब इंटरनेट पर ब्लॉग लेखन के बारे में कम बुद्धिजीवियों को ही जानकारी थी। इंटरनेट पर काम आने वाले यूनिकोड की भी किसी को समझ नहीं थी। चाणक्य व कृतिदेव को यूनीकोड या मंगल फॉंट में कन्वर्ट करने का फार्मूला तक किसी की जाननकारी में नहीं था। मेरी नजर में संभवत: डॉ. राजेन्द्र तेला पहले लेखक थे, जिन्होंने अपनी कविताओं के प्रकाशन के लिए ब्लॉग बनाया था। यदि किसी और ने भी ब्लॉग बनाया हो तो मुझे उसकी जानकारी नहीं।
बात अगर न्यूज बेस्ड आइटम्स की करें तो मेरा दावा है कि मैने सबसे पहले अजमेरनामा व तीसरी आंख के नाम से ब्लॉग बनाया। इसमें मेरी तकनीकी मदद एनडीटीवी के अजमेर ब्यूरो जनाब मोईन कादरी ने की। ब्लॉग की साज-सज्जा में मेरा सहयोग किया मेरे दोनों पुत्रों हेमंत तेजवानी व कमल तेजवानी ने। बाद में उसी को आगे बढ़ाते हुए मैने अजमेरनामा के नाम से न्यूज पोर्टल भी शुरू किया। इसकी संरचना में स्वामी न्यूज चैनल के सीएमडी श्री कंवल प्रकाश किशनानी, जनाब मुबारक व जनाब कादरी ने अहम भूमिका रही। बाद में इसे व्यवस्थित रूप दिया श्री आनंद शर्मा ने। मेरे से तकरीबन 15 दिन पहले पत्रकार मुजफ्फर अली व स्वर्गीय सुमित कलसी की टीम ने न्यूज-व्यू के नाम से पोर्टल आरंभ किया था। वह अजमेर का पहला पोर्टल कहा जा सकता है। मुजफ्फर अली आज भी ताजा विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं।
ब्लॉग लेखन के क्षेत्र में दूसरा बड़ा कदम रखा वरिष्ठ पत्रकार श्री एस  पी मित्तल ने। प्रिंट व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में खूब काम करने के बाद श्री मित्तल ने अपनी पूरी पत्रकारिता ही ब्लॉग के नाम समर्पित कर दी है। अजमेर में केबल नेटवर्क पर व्यवस्थित व नियमित न्यूज चैनल चलाने वाले वे पहले पत्रकार हैं। हालांकि उनसे भी पहले श्री नानक भाटिया ने यूनाइटेड न्यूज चैनल आरंभ किया, मगर वह कुछ समय तक ही चल पाया। श्री मित्तल ने अपनी वेब साइट भी आरंभ की, मगर चूंकि उन्हें बेहतर यही लगा कि अपने ब्लॉग सीधे वाट्स ऐप व फेसबुक पर पोस्ट करें, जिसने उन्हें शीघ्र ही चर्चित कर दिया। वे प्रतिदिन तीन या चार ब्लॉग लिखते हैं। उनमे टिप्पणीयुक्त ताजा समाचार तो होते ही हैं और विभिन्न विषयों पर स्वतंत्र विचार भी होते हैं। कई लोग उनके ब्लॉग का इंतजार करते है, ताकि वे घटनाओं से अपडेट रहें।
इसी क्रम में नवोदित पत्रकार नरेश राघानी ने जल्द ही पकड़ बना ली। चूंकि उनका काफी टाइम राजनीति में बर्बाद हुआ और लोगों को उनकी लेखन क्षमता का भान नहीं था, इस कारण किसी को यकीन ही नहीं होता था कि वे खुद लिख सकते हैं। शुरुआती दिनों में उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार ओम माथुर पर कटाक्ष करते हुए जो बहुत टाइट ब्लॉग लिखा तो आम धारणा यही थी कि वह मैने लिखा है, जबकि सच्चाई यही है कि मेरी उसमें कोई भूमिका नहीं थी। भाषा-शैली के लिहाज से उन्होंने अभिव्यक्ति के विभिन्न प्रयोग किए हैं। वे भी लगभग नियमित ब्लॉग लिखते हैं, मगर  नियमितता के मामले में श्री मित्तल का कोइ सानी नहीं। राघानी वेब साइट के अतिरिक्त यूट्यूब पर भी हाथ आजमा रहे हैं। युवा पत्रकार नवीन वैष्णव ने भी सोशल मीडिया के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है, मगर आमतौर पर उनका जोर न्यूज कंटेंट पर रहता है। नि:संदेह वे सधी हुई खबर लिखते हैं। सोशल मीडिया में यूट्यब के माध्यम से एमटीटीवी के सुशील पाल ने भी धूम मचा रखी है। स्टिंग ऑपरेशन से लेकर ताजा आर्य प्रकरण में खासी चर्चा हासिल की है। अरे, श्री विजय शर्मा को तो मैं भूल ही गया। अजमेर में वे सोशल मीडिया किंग हैं। उन्होंने विविध आयामीय प्रयोग किए हैं। प्रिंट से लेकर सोशल व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में न जाने क्या-क्या किया है।
एक और बड़ा नाम है श्री विजय मौर्य का, जिन्होंने राजस्थान पत्रिका में लंबे समय तक काम किया व ई-पत्रिका का काम संभाला। मेरी समझ में गूगल, वेब साइट व यूट्यूब के बारे में बारीक जानकारी के मामले में वे टॉप हैं। वे सबगुरू के नाम से एक बड़ा न्यूज पोर्टल चला रहे हैं और व्यावसायिक दृष्टि से अव्वल हैं। न्यूज पोर्टल, यूट्यूब चैनल व ब्लॉग के क्षेत्र में अब काफी साथी आ गए हैं, जिनमें मुझे चंद नाम याद आ रहे हैं, वे हैं श्री विजय पाराशर, श्री तीर्थदास गोरानी, श्री विजय कुमार हंसराजानी, श्री अशोक बंदवाल।
कॉलमिस्ट के रूप में एक और नाम का जिक्र भी जरूरी है। वो हैं दैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार प्रताप सनकत का। वे श्री चतुर्वेदी की ही बेबाक शैली में प्याज के छिलके की तरह खबरों के छिलके उतारा करते थे। वर्तमान में यदाकदा फेसबुक पर अवतरित होते हैं। इसी क्रम में श्री अरविंद कौशिक का नाम लेना जरूरी है। वे न्याय में एक कॉलम लिखा करते थे, जिसकी खासियत ये थी कि उसमें उर्दू के शब्दों का प्रयोग बहुतायत में होता था। यही उनकी लेखनी की खूबसूरती थी।
बात ताजा दौर की। पेश से वकील व आदत से राजनीतिक पंडित राजेश टंडन का ब्लॉग तो मैने नहीं देखा, मगर वाट्स ऐप व फेसबुक पर वे सारे हथियार यथा तीर-कमान व थाली-चिमटा लिए फ्री स्टाइल शाब्दिक कुश्ती खेलते हैं। यूं तो पुलिस महकमे की दाई हैं, मगर राजनीति व प्रशासनिक हलके में जम कर लाठी भांजते हैं। वे हमारी तरह यूं ही कलमघसीट नहीं, बल्कि प्रयोजनार्थ लिखा करते हैं।
ब्लॉग की कैटेगिरी के फेसबुकिया लेखक भी अब सामने आने लगे हैं। इनमें वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रेम आनंदकर, वरिष्ठ वकील सत्य किशोर सक्सेना, वरिष्ठ बैंक अधिकारी रहे वेद माथुर व सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती कीर्ति पाठक के नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें ताजा नाम पार्षद चंद्रेश सांखला का है। हालांकि उन्होंने फिलहाल नगर निगम में व्याप्त विसंगतियों को निशाना बनाया है। इसी क्रम में त्रिवेन्द्र पाठक का भी नाम लिया जा सकता है। जिन साथियों के नाम मुझ से छूट गए हैं, वे मेहरबानी करके मेरे वाट्स ऐप नंबर 8094767000  पर सूचित करने की कृपा करें, ताकि उनको भी सुशोभित किया जा सके।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, 6 जुलाई 2019

तकरीबन पचास नए नेता होंगे पैदा

अजमेर नगर निगम में साठ के बजाय अस्सी वार्ड किए जाने से जहां वार्ड छोटे हो जाएंगे और उनकी मॉनिटरिंग आसान हो जाएंगी, वहीं अजमेर शहर को तकरीबन पचास नए नेता भी मिलेंगे। वर्तमान में साठ वार्डों के आधार पर कुल साठ नेता पार्षद के रूप में स्थानीय राजनीति में सक्रिय हैं। इतने ही हारे हुए नेता हैं। अर्थात कुल एक सौ बीस नेता शहर की नेतागिरी करते हैं। अब जब बीस वार्ड बढ़ रहे हैं तो चालीस नए नेता मैदान में आ जाएंगे। पुराने वार्डों में भी तकरीबन दस नए नेता पैदा होने का अनुमान है। अर्थात कुल पचास नेता नए पैदा हो जाएंगे। यदि हर वार्ड में दोनों पार्टियों में दो या तीन दावेदार माने जाएं तो, इस लिहाज से नेताओं की फेहरिश्त और लंबी हो जाएगी।
ज्ञातव्य है कि नगर निगम के नए वार्डों के परिसीमन व वार्डों के पुनर्गठन के लिए गठित टीम ने अपनी विशेष रिपोर्ट दस्तावेजों के साथ निगम आयुक्त को सौंप दी है। स्वायत्त शासन विभाग ने आपत्तियां दर्ज करवाने के लिए पंद्रह दिन का समय दिया है। इसी के साथ राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। मौजूदा पार्षदों व हारे हुए नेताओं ने नए वार्डों का अध्ययन शुरू कर दिया है। वे अपने लिए वार्ड का चयन करने के लिए अपनी सुविधानुसार आपत्तियां दर्ज करवाएंगे। जानकारी के अनुसार कई वर्तमान पार्षद व हारे हुए नेताओं की जमीन खिसक गई है। उन्हें आसपास के वार्डों में दावेदारी करनी होगी।
जहां तक भाजपा का सवाल है, वहां बाकायदा समितियां बना कर परिसीमन की मॉनिटरिंग का काम किया जा रहा है। हालांकि प्रत्याशियों के चयन में संगठन की भूमिका रहेगी और अगर चुनाव होने तक शिवशंकर हेडा ही शहर अध्यक्ष रहे तो वे अपनी जाजम बिछाने का प्रयास करेंगे, मगर समझा जाता है कि मौजूदा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल की ही ज्यादा चलेगी। पूर्व का अनुभव तो यही बताता है। पिछली बार तो हालत ये थी कि हेडा के पूर्ववर्ती अध्यक्षीय कार्यकाल में उनकी एक नहीं चली और सभी टिकट देवनानी व भदेल ने ही दिए।
उधर कांग्रेस में शहर अध्यक्ष विजय जैन के अतिरिक्त मुख्य रूप से अजमेर दक्षिण में हेमंत भाटी व अजमेर उत्तर में महेन्द्र सिंह रलावता की अहम भूमिका रहने वाली है। ललित भाटी, डॉ. राजकुमार जयपाल, कमल बाकोलिया, डॉ. श्रीगोपाल बाहेती भी टांग अड़ाएंगे ही। पूर्व सांसद व केकड़ी विधायक डॉ. रघु शर्मा, जो कि स्वास्थ्य मंत्री भी हैं, उनकी सिफारिश से भी कुछ टिकट फाइनल होंगे। हो सकता हाल ही लोकसभा चुनाव हारे रिजु झुंझुनवाला भी कुछ दावेदारों की पैरवी करें। हारने के बाद भी अपनी संस्था पूर्वांचल जन चेतना समिति के जरिए सामाजिक सरोकारों के काम करवा कर अजमेर को अपनी कर्मभूमि बनाए रखना चाहते हैं। खैर, फिलवक्त सभी संभावित दावेदारों ने अपने-अपने आकाओं की पगचंपी शुरू कर दी है। सब की नजर प्रदेश स्तर पर संभावित परिवर्तन पर भी टिकी हुई है।
रहा सवाल मेयर का तो उसकी सरगरमी आरक्षण की लॉटरी खुलने के बाद ही आरंभ होगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमरत्न आर्य पर फैसला आप करेंगे या कोर्ट?

एक नाबालिगा के साथ छेड़छाड़ के आरोप से घिरे दिग्गज भाजपा नेता सोमरत्न आर्य इन दिनों सर्वाधिक चर्चा में हैं। उन पर पाक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हो चुका है। अब वे अग्रिम जमानत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। यह प्रकरण इन दिनों सर्वाधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। इस मुद्दे को लेकर सोशल मिडिया पर लटके पड़े बुद्धिजीवी आपस में उलझ रहे हैं। कोई आर्य को फांसी की सजा देने की पैरवी कर रहा है तो कोई उनकी स्वच्छ छवि को गिनवा कर आरोप को साजिश बता रहा है। हालत ये हो गई है कि जो लोग कथित पीडि़ता का साथ दे रहे हैं, उन पर ब्लैकमेलिंग के आरोप लगने लगे हैं।
असल में आर्य की कथित करतूत को लेकर सबसे पहले एमटीटीवी ने बिना उनका नाम प्रकाशित किए छोटी से खबर चलाई। इसी के साथ सोशल मीडिया पर जंग शुरू हो गई, मगर चूंकि इस मामले में पीडि़ता सामने नहीं आई थी, इस कारण आर्य का नाम उजागर करने की हिम्मत किसी शेख चिल्ली में नहीं थी। कुछ लोग क्लू दे कर उनकी ओर इशारा कर रहे थे। ब्लॉगर भी भला क्यों चुप रहने वाले थे। जैसे ही थाने में रिपोर्ट दर्ज हुुई, एमटीटीवी की कयासी खबर पर मुहर लग गई। स्वाभाविक रूप से सारी क्रेडिट भी उस के खाते में दर्ज हो गई। जब तक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था, तब तक अपना भी इस बारे टांग अड़ाने का कोई मानस नहीं था। इस बीच मेरे एक परिचित ने मेरे वाट्स ऐप अकाउंट पर एक संदेश भेजा- समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध। इसका सीधा सा अर्थ था कि वे मुझे भी कुछ लिखने को उकसा या प्रेरित कर रहे थे। जब इस मुद्दे पर अनेक लोगों की जुगाली परवान चढऩे लगी की तो मुझे भी लगा कि अपना भी दृष्टिकोण रखना ही चाहिए।
इस मुद्दे पर बहुत कुछ अंटशंट लिखा जा चुका है। उसकी चर्चा न ही की जाए तो बेहतर रहेगा। लिखने वालों ने अपनी ओर से आर्य को पूरी तरह से नंगा कर दिया है। मुकदमा दर्ज होने के बाद स्वाभाविक रूप से उनको कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की भी मांग उठ रही है। कुछ लोगों ने जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं, उससे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आर्य ने पक्के तौर पर कुकृत्य किया ही है। अगर वे निर्णय पर पहुंच गए हैं तो न्यायिक व्यवस्था की जरूरत ही क्या है? उनके कहे अनुसार ही सजा दे दी जानी चाहिए। मगर अपनी राय भिन्न है। अभी आरोप मात्र लगा है। गिरफ्तारी होगी। सबूत पेश होंगे, जिरह होगी, तब जा कर कोर्ट फैसला करेगा। उससे पहले उनका चरित्र हनन करना पूरी तरह से गैरकानूनी व गैर मानवीय है।
मुझे पत्रकारिता में जो ट्रेनिंग मिली है, उसके अनुसार यदि किसी को चोरी के आरोप में पकड़ा जाता है तो खबर लिखते समय हम ये हैडिंग नहीं लगाते कि चोर पकड़ा गया। हम लिखा करते हैं कि चोरी का आरोपी गिरफ्तार। अगर हम उसे चोर करार दे रहे हैं तो फिर पर उसके खिलाफ मुकदमा चलने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। ये तो हुई विधिक बात।
अब बात करते हैं, धरातल पर मौजूद कुछ और तथ्यों की। यह एक सर्वविदित सच्चाई है कि आर्य का अब तक का पूरा जीवन पूरी तरह से समाज सेवा में बीता है। शहर की सर्वाधिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते रहे हैं। राजनीति, समाजसेवा सहित ऐसा कोई फील्ड नहीं, जिसमें उनका दखल न हो। डिप्टी मेयर रह चुके हैं। ब्लड डोनेशन का रिकार्ड बना चुके हैं। ऐसे बहुआयामीय व्यक्तित्व की सामाजिक स्वीकारोक्ति स्वाभाविक है। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेसी नेताओं तक ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी और सिर्फ ये कहा कि अगर उन्होंने ऐसा कृत्य किया है तो उन्हें सजा मिलनी ही चाहिए। मामला उजागर होने पर अधिसंख्य लोगों को सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि वे ऐसा घृणित कृत्य कर सकते हैं।
कदाचित ऐसी पंक्तियां पढ़ कर यह प्रतिक्रिया उठे कि उनका पक्ष लिया जा रहा है। मगर ऐसा है नहीं। एक आरोप की वजह से उनके पूरे जीवन की साधना पर पानी फेर देना न्यायोचित नहीं होगा। हां, अगर आरोप प्रमाणित हो जाता है तो निश्चित ही उन्हें सजा मिलेगी और मिलनी भी चाहिए। सोशल मीडिया पर चटकारापूर्ण ट्रायल करने की बजाय निर्णय कोर्ट पर छोड़ दिया जाना चाहिए। वैसे भी न्यायाधीश फेसबुकियों को बुला कर मतदान करवाने वाले नहीं हैं। फिलहाल वे अग्रिम जमानत की कोशिश में हैं। हां, अगर लंबे समय तक फरार रहते हैं तो उनकी गिरफ्तारी के लिए लोगों का लामबंद होना जायज होगा, ताकि जल्द से जल्द फैसला हो और पीडि़ता को समय पर न्याय मिले।
सिक्के का एक पहलु ये भी है कि कोई कितना भी प्रतिष्ठित क्यों न हो, उसे अपराध की छूट नहीं हो सकती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, आसाराम बापू। वे वर्षों से जेल में हैं। यह अलहदा बात है कि उनके भक्त आज भी उन्हें निर्दोष मानते हैं और हर पूर्णिमा को जोधपुर जेल के बाहर जुट कर अपनी आस्था का इजहार करते हैं।
तस्वीर का एक चेहरा और। कोई भी नाबालिग यूं ही किसी के खिलाफ खड़ी नहीं हो सकती। जमीन की इसी हकीकत के मद्देनजर पोक्सा जैसा कड़ा कानून बनाया गया है। यही वजह है कि जब भी कोई नाबालिग पीडि़ता देहलीज पार करती है तो सहज ही उस पर यकीन कर लिया जाता है कि उसके साथ कुछ न कुछ हुआ होगा। मगर फैसला तब भी केवल आरोप लगाने मात्र से नहीं किया जाता। बाकायदा न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जाती है।
उनके एक मित्र सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रभान प्रजापति का दर्द देखिए, वे कहते हैं:- आज उनके व्यक्तित्व पर चरित्र हीनता का दाग लगना और फिर संपूर्ण शहर में से किसी का भी उनका प्रत्यक्ष रूप से सामने आकर साथ न देना इस बात का प्रमाण है कि मानवता, सामाजिकता रिश्ते, दोस्ती सब एक हाशिये में आकर खड़ी हो गई हैं।
बात भले ही सही हो, मगर कोर्ट किसी के उनके साथ आने से प्रभावित होने वाला नहीं है। चाहे जितने एकजुट हो जाओ। वह तो पीडि़ता के बयान, सबूत, जिरह व कानूनी प्रावधान के तहत ही फैसला देगा। वैसे भी आर्य का कोई कितना भी करीबी मित्र क्यों न हो, वह यह तो कह सकता है कि वे ऐसा नहीं कर सकते, मगर वह यह नहीं कह सकता कि आर्य ने ऐसा नहीं किया है।
दूसरी ओर आर्य के विरुद्ध पीडि़ता का साथ देने की मुहिम चला रही समाजसेविका श्रीमती कीर्ति पाठक का भी दर्द इसी प्रकार का है। वे कहती हैं कि अजमेर को कुंभकर्णों की जरूरत नहीं है। संगठित विरोध ही समस्या का समाधान है। अर्थात उनकी पीड़ा है कि लोग साथ क्यों नहीं दे रहे? उनकी अपेक्षा अपनी जगह उचित ही है? मगर इस मामले में भी फार्मूला वही लागू होता है। न्यायालय इस आधार पर फैसला करने वाला नहीं है कि समाज में उनके खिलाफ कितने लोग खड़े हैं या कितने लोग पीडि़ता को न्याय दिलाने के लिए दबाव बना रहे हैं। इस मामले में कोर्ट के बाहर पीडि़ता का साथ दे रहे ये तो कह सकते हैं कि आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए, मगर वे यह नहीं कह सकते कि आर्य दोषी हैं ही।
इस पूरे प्रकरण के गर्भ में कई तथ्य हैं, मगर चूंकि उन्हें प्रमाणित तौर पर नहीं कहा जा सकता, इस कारण उनका उल्लेख नहीं किया जा रहा है।
लब्बोलुआब, सार ये है कि फैसला न्यायालय के हाथ है। हम क्यों तो लाठियां भांजें और क्यों मुट्ठियां तानें? हां, अगर मुट्ठियां तानने से समाज सुधार होता है तो मैं उस मुहिम को सलाम करता हूं।
-तेजवानी गिरधर
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