मंगलवार, 10 सितंबर 2019

वाकई अजमेर-पुष्कर रोड को फोर लेन करने की जरूरत है

अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन ने मांग की है कि अजमेर-पुष्कर रोड को फोर लेन किया जाए। संभवत: पहली बार अजमेर के किसी नेता ने यह मांग उठाई है। वाकई मांग वाजिब है। ये बात दीगर है कि उस पर राजस्थान के उपमुख्यमंत्री एवं सार्वजनिक निर्माण विभाग मंत्री सचिन पायलट कितना गौर करते हैं। बेहतर ये होता कि जब वे न्यास अध्यक्ष थे, तब खुद गौर करते। हालांकि तब पुष्कर न्यास के कार्यक्षेत्र में नहीं था, मगर प्रभावशाली भाजपा नेता के नाते तो प्रयास कर ही सकते थे।
तेजवानी गिरधर
असल में इस रोड पर अजमेर-पुष्कर के बीच प्रतिदिन आने वाले लोगों का आवागमन तो है ही, बीकानेर व जोधपुर से आने वाले यात्री नागौर व मेड़ता होते हुए अजमेर आते हैं। विशेष रूप से पुष्कर मेला के अतिरिक्त धार्मिक दृष्टि से महत्वूपूर्ण तिथियों पर श्रद्धालुओं का आना-जाना रहता है। कावड़ यात्रियों व रामदेवरा आने-जाने वाले जातरुओं की भी भारी भीड़ रहती है। इस रोड पर यातायात का काफी दबाव है। दुर्घटना का खतरा सदैव बना रहता है। घाटी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक की रोड नाकाफी है। रोड के दोनों ओर पर्याप्त स्थान है, जिसे पक्का किया जाना चाहिए। घाटी से उतरते ही नौसर गांव वाले हिस्से की रोड की हालत बहुत खराब है। अफसोसनाक बात ये है कि इस रोड से जिला प्रशासन के अधिकारी आते-जाते हैं, वीआईपी विजिट भी होती रहती है, मगर ध्यान कोई नहीं दे रहा। पूर्व संसदीय सचिव सुरेश रावत के प्रयासों से एक हिस्सा जरूर गौरव पथ के नाम पर चौड़ा किया गया है। जरूरत अजमेर से पुष्कर के पूरे रोड को चौड़ा किए जाने की है।
आपको याद होगा कि इस रोड पर यातायात के दबाव को कम करने के लिए रेलवे ट्रेक बिछाया गया, मगर उसका उपयोग कोई कर ही नहीं रहा। इसके अतिरिक्त पहले पूर्व राज्यसभा सदस्य औंकार सिंह लखावत के प्रयासों से घाटी में सुरंग बनाने की कवायद फेल हो चुकी है। बाद में रावत के प्रयासों से सुरंग का प्रोजेक्ट तो मंजूर हो गया, मगर सरकार बदलने के बाद वह भी फाइलों में दफन हो गया दिखता है। ऐसे में अगर फोरलेन का काम हो जाए तो बहुत अच्छा रहेगा।
जैन ने एक मांग और की है, वो भी ऐतिहासिक दृष्टि से उचित प्रतीत होती है। उन्होंने कहा है कि सांझी छत को जोड़ते हुए नाग पहाड़ पर गुर्जर समाज के आराध्य देवनारायण महाराज का मंदिर बनाया जाए। ज्ञातव्य है कि पौराणिक दृष्टि से गुर्जरों का तीर्थराज पुष्कर से गहरा नाता रहा है। इस पर चर्चा अगले न्यूज आइटम में करेंगे।

-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 5 सितंबर 2019

शहर भाजपा में अपरिहार्य हैं देवनानी व अनिता

लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीत कर अंगद के पांव की तरह जमे वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल कांग्रेस के लिए तो बहुत बड़ी परेशानी बने हुए हैं ही, भाजपा के अनेक समकक्ष व दूसरे दर्जे के नेताओं के लिए भी ऐसी गलफांस हैं, जिनसे मुक्ति नितांत असंभव सी प्रतीत होती है। ऐसा नहीं कि भाजपा के अन्य नेताओं ने इन दोनों के वर्चस्व को तोडऩे की कोशिश नहीं की, मगर उन्हें कभी कामयाबी नहीं मिली। यहां तक कि शहर जिला भाजपा के अध्यक्ष पद पर काबिज रहे शिव शंकर हेड़ा, प्रो. रासासिंह रावत व अरविंद यादव भी उनकी आभा को कम नहीं कर पाए। हेड़ा अपने दूसरे कार्यकाल में जरूर पहले की तुलना में अधिक मुखर हैं, मगर देवनानी व अनिता का तोड़ नहीं निकाल पाए हैं।
असल में लगातार तीन बार विधायक रहने और देवनानी के दो बार शिक्षा राज्य मंत्री व श्रीमती भदेल के एक बार मंत्री बनने के कारण भाजपा के अनेक कार्यकर्ता उनसे उपकृत हुए हैं। वे उनका अहसान कभी नहीं भुला सकते। और यही वजह है कि संगठन से इतर दोनों की अपनी-अपनी टीम है, जो उन्हें जितवाने का काम करती है। जनप्रतिनिधि के रूप में लगातार पंद्रह साल काम करने के कारण उन्हें गहरा अनुभव हो चुका है कि किसकी क्या औकात है और उसी के अनुरूप वे उनसे व्यवहार करते हैं। श्रीमती भदेल तो फिर भी ज्यादा विवाद में नहीं रहीं, मगर देवनानी के खिलाफ पूरा संगठन खड़ा हो गया, लेकिन न तो वह उनका टिकट कटवा पाया और न ही जीतने से रोक पाया। दोनों की जीत में जहां उनकी निजी टीम की भूमिका है, वहीं दोनों विधानसभा सीटों का जातीय ढ़ांचा ही ऐसा है कि उन्हें जीतने में कोई दिक्कत नहीं होती। हालांकि भाजपा के अनेक कार्यकर्ता श्रीमती भदेल के व्यवहार से दुखी हैं, मगर वे उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते, चूंकि सिंधी व माली वोट बैंक के अतिरिक्त निजी प्रयासों से अनुसूचित जाति के वोटों के दम पर वे हर बार जीत जाती हैं। इसी प्रकार सिंधियों के एक मुश्त वोटों के साथ भाजपा मानसिकता के बनिये हर बार देवनानी की नैया पार लगा देते हैं। बेशक संगठन का अपना ढ़ांचा है, मगर अधिसंख्य नेता व कार्यकर्ता देवनानी व अनिता के शिकंजे में हैं। लंबे समय तक अजमेर की भाजपा बाकायदा दो धड़ों में विभाजित रही है। प्रदेश हाईकमान भी उनके झगड़े को खत्म नहीं कर पाया। सच तो ये है कि प्रदेश स्तर पर जारी गुटबाजी से ही उनको संबल मिलता है। जहां संघ देवनानी पर वरदहस्त रखे हुए है, वहीं अनिता भदेल पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की विशेष कृपा से देवनानी के टक्कर में मंत्री बन बैठीं। पिछले विधानसभा चुनाव में जब नए चेहरे लाने की चर्चा आई तो अनिता पूरी तरह से आश्वस्त थीं कि अगर देवनानी का टिकट नहीं कटा तो उनका भी नहीं कटेगा। और कटता भी क्यों, आखिर दोनों लगातार तीन बार जीत चुके थे।
ताजा जानकारी अनुसार एडीए का चेयरमेन रह चुकने के बाद शहर भाजपा अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा कुछ मजबूत हुए हैं, मगर वे दोनों के वर्चस्व को खत्म नहीं कर पाए हैं। बताया जाता है कि तीसरी लॉबी के विकसित होने की आशंका के बीच देवनानी व भदेल ने अंडर द टेबल हाथ मिला लिया है। जिन के झगड़े पब्लिक डोमेन में आम थे, जिनके बीच सदा छत्तीस का आंकड़ा था, उनके बीच तरेसठ का आंकड़ा बनता दिखाई दे रहा है। स्वाभाविक रूप से उन कार्यकर्ताओं को भारी दिक्कत हो रही है, जो इनके झगड़े के कारण आइडेंटिफाई हो गए थे।
इस बीच कानाफूसी ये है कि हेड़ा प्रदेश हाईकमान के कान भरने में कामयाब हो गए हैं कि इन दोनों की वजह से संगठन का सत्यानाश हुआ है, लिहाजा दोनों को संगठन चुनाव में दखन न देने दिया जाए। हालांकि उनके पास इस बात का जवाब नहीं होगा कि यदि यह सच है तो फिर दोनों चौथी बार कैसे जीत गए?
यदि प्रदेश भाजपा की यह रणनीति है कि पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा से मुक्ति पा ली जाए, तो कदाचित वह थोड़ा बहुत कामयाब हो जाए, मगर अजमेर में यह नीति कामयाब होती नहीं दिखाई देती। यदि संगठन में देवनानी व भदेल के कुछ विरोधी काबिज हो भी गए तो भी अधिसंख्य वे ही संगठन में स्थान पा जाएंगे, जो इन दोनों से निजी तौर पर जुड़े हुए हैं।
रहा सवाल कभी अजमेर भाजपा के भीष्म पितामह रहे औंकार सिंह लखावत की तो वे इन दिनों इतिहास लेखन में व्यस्त बताए जाते हैं। स्थानीय स्तर पर भले ही उनकी जाजम सिमट चुकी हो, मगर उनका कद प्रदेश स्तर पर इतना बड़ा हो गया है कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। देवनानी के तो वे शुरू से धुर विरोधी थे, मगर बताते हैं कि अब उनके अनिता से भी पहले जैसे संबंध नहीं रहे।
कुल जमा बात ये है कि इस बार संगठन के चुनावों पर आगामी नगर निगम चुनाव की छाया रहेगी। सारा तानाबाना उसी के आधार पर बुना जाएगा। चुनाव लडऩे के इच्छुक घूम फिर कर देवनानी व अनिता से ही अपने तार जोड़ेंगे। हां, इतना जरूर है कि इस बार हेड़ा के इर्दगिर्द जमा हुई लॉबी भी बंदरबांट में अपना हिस्सा ले पड़ेगी। वैसे भी इस बार अस्सी वार्डों के लिए प्रत्याशी तलाशे जाएंगे, इस कारण अधिसंख्य दावेदार स्थान पा ही जाएंगे।
-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

रिजू झुंझुनवाला बनाम राजनीति का कुतियापा

एक कहावत है- राजनीति बड़ी कुत्ती चीज है। यह कहावत कब व कहां से चलन में आई, पता नहीं और इसमें कुत्ती शब्द का इस्तेमाल क्यों कर किया गया है, यह भी समझ से परे है। हां, इतना जरूर है कि यह कहावत इस आशय का भाव परिलक्षित करती है, जिससे राजनीति का शातिराना पक्ष उभरता है।
खैर, राजनीति वाकई कुत्ती चीज है। और इस कुत्ती चीज का चतुर लोग बड़ी चतुराई से इस्तेमाल करना जानते हैं। आपको याद होगा कि लोकसभा चुनाव में भीलवाड़ा से अजमेर आ कर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े रिजू झुंझुनवाला के बारे में कहा गया कि वे पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं। जब वे हार गए तो ये कहा गया कि अजमेर के कांग्रेसियों ने उन्हें लूट लिया और काम भी नहीं किया। खैर, हारने के बाद भी अजमेर को अपनी कर्मभूमि बनाने के लिए उन्होंने इन्हीं कांग्रेसियों में से कुछ को साथ लेकर पूर्वांचल जन चेतना समिति की इकाई बनाई। यह वाकई एक सराहनीय व स्वागतयोग्य कदम था, मगर इसकी आलोचना इस रूप में हुई कि वे हारने के बाद भी यहां दुकान चलाना चाहते हैं। यानि कि वे भी हार कर गायब हो चुके प्रत्याशियों की तरह से अजमेर छोड़ कर चले जाते तो ठीक रहता। चलो माना कि उन्होंने दुकान लगा दी, मगर किसी को लूट थोड़े ही रहे हैं, गांठ का ही तो पूरा कर रहे हैं। इसीलिए कहते हैं कि राजनीति बड़ी कुत्ती चीज है। आप हार कर भाग जाएं तो भी आलोचना और हार कर भी डटे रहें तो भी परेशानी। चंदा दें तो ऐतराज, न दें तो भी चर्चा। सीधी सी बात है कि उन्हें अगर अगले चुनाव की अभी से तैयारी करनी है तो किसी न किसी मंच के जरिए ही काम करेंगे। काम भी जनहित का ही कर रहे हैं। इसमें बुराई है? उनके प्रतिनिधि रजनीश वर्मा, जो कि समिति के ट्रस्टी हैं, और अध्यक्ष राजेन्द्र गोयल व महासचिव शिव कुमार बंसल ने पर्यावरण संतुलन के लिए वृक्षारोपण का डट कर काम किया तो जिला प्रशासन ने भी उसे रियलाइज किया। 15 अगस्त के समारोह में सम्मानित भी किया। संभव है कुछ पहले से स्थापित संस्थाओं या व्यक्तियों को यह रास न भी आया हो।
कुल मिला कर हारने के बाद भी रिजू झुंझुनवाला अजमेर में सक्रिय हैं और चर्चा में भी हैं। वे अजमेर आएं या नहीं, उनका झुंझुना तो बज ही रहा है। इसी चर्चा के तालाब में शहर के जाने-माने वकील राजेश टंडन ने ब्लॉग लिख कर कंकड़ फैंक मारा। स्वाभाविक रूप से तरंगे उठनी ही थीं। ब्लॉग का कंटेंट ही ऐसा था। उन्होंने लिखा कि छात्र संघ चुनाव में कई कफनखसोट रिजू के पास गए चंदा लेने तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया। उन्होंने जो लिखा, उसका कुल जमा मायने ये है कि उनकी समिति अनापशनाप खर्चे कर रही है, जिससे रिजू तंग आ चुके हैं। एक चर्चित अधिकारी भी लपेटे में लिए गए।
अब जब शहर के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी ने यह बात लिखी है तो जरूर उनके पास पुख्ता जानकारी होगी। यह बात दीगर है कि उन्होंने सारी बात इशारों ही इशारों में कही है। समिति के जिम्मेदार पदाधिकारी भौंचक्क हैं, मगर लगता है कि उन्हें प्रतिक्रिया जाहिर करने में रुचि नहीं है। वे किसी पचड़े में नहीं पडऩा चाहते। इसी बीच राष्ट्रीय स्तर पर जाने-माने गजलकार सुरेन्द्र चतुर्वेदी, जो कि आजकल नियमित ब्लॉग लेखन कर रहे हैं, को लिखने का प्लॉट मिल गया। अपने पुराने मित्र की बात पर मित्रतापूर्वक प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए उन्होंने दुख जताया कि किसी संस्था के बारे में पूरी जानकारी के बिना ऐसा नहीं लिखना चाहिए। उन्होंने अपेक्षा की है कि टंडन की बात में अगर अक्षरश: सच्चाई है तो उसे सिद्ध करने की जिम्मेदारी भी लें। खैर, बात छिड़ी है तो शायद दूर तक जाएगी। कदाचित रिजू चंदे से तंग न भी आए हों, मगर कहीं राजनीति के कुतियापे से तंग न आ जाएं।
चूंकि मामला पब्लिक डोमेन में आ गया है, लिहाजा अपुन भी फोकट रायचंद बन गए। रिजू झुंझुनवाला तो बड़े आदमी हैं ही, टंडन व चतुर्वेदी भी कम बड़े नहीं हैं। बड़े लोगों की बड़ी बातें। अपुन ठहरे छोटे से पत्रकार। अपुन तो इतना ही कह सकते हैं कि थे जाणो रघुनाथ, कान्हों भोलो है। आपणे तो इत्ती सी बात पल्ले पड़ी के बडो आदमी छींके तो बा भी खबर बण जावे। बे अठै आवे तो चोखो, न आवे फेर भी बां को झुंझुनो तो बाज ही रियो है। अर म्हारा जान का भी तो बां को झुंझुनो ही बजा रिया हां। सॉरी, फिसल गया। हिंदी लिखते लिखते मारवाड़ी पर आ गया। निष्पत्ति यही कि राजनीति में जिंदा रहने की पहली शर्त है चर्चा में रहना, भले ही चर्चा अनुकूल हो या प्रतिकूल। अभी तो पूरे साढ़े चार साल बाकी पड़े हैं, न जाने कितने मोड़ों से उन्हें गुजरना होगा। हां, अपुन टंडन साहब के एक पैट वर्ड खफनखसोट को सुसंस्कृत तरीके से इस्तेमाल करते हुए कहते हैं कि कपड़ा फाडऩे में हम बडे माहिर हैं। बडे बडे लोग पनाह मांगते हैं। चुनाव से पहले जयपुर में मुख्यमंत्री निवास पर एक बैठक में खुद अशोक गहलोत ने अजमर वालों से तौबा मांग ली थी। मगर ख्याल रहे, अजमेर में बाहर का जाया ही पनपता है।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 27 अगस्त 2019

टंडन के अनशन पर बैठने के बाद जारी किया लैटर, ये नौटंकी क्यों?

ट्रांसपोर्ट कारोबार को केसरगंज से ब्यावर रोड पर बनाए गए नए ट्रांसपोर्ट नगर में शिफ्ट करने की मांग को लेकर जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजेश टंडन की ओर से बाकायदा पर्याप्त समय पहले चेतावनी दिए जाने के बाद जिला कलेक्टर ने एसपी को इस मामले में लैटर तब जारी किया, जब टंडन भूखहड़ताल पर बैठ ही गए। वे चाहते तो अनशन पर बैठने से पहले ही लैटर जारी करते और टंडन को बुलवा कर कहते कि आप अनशन पर न बैठें। साफ है कि जिला कलेक्टर ने टंडन को जानबूझकर अनशन पर बैठने दिया, ताकि उनकी कॉल पूरा हो जाए। साथ ही ये भी जाहिर कर दिया कि देखो प्रशासन कितना गंभीर है कि टंडन के अनशन पर बैठने पर लैटर जारी कर दिया। क्या इसमें फिक्सिंग और नौटंकी की बू नहीं आती?
हकीकत तो ये है कि जिला यातायात प्रबंधन समिति की बैठक में ही इस बाबत निर्देश जारी किए जा चुके थे, मगर पुलिस प्रशासन उसे इम्प्लीमेंट करने में नाकाम रहा। इस बात को जिला कलेक्टर की ओर से जारी ताजा पत्र में भी स्वीकार किया गया है। कलेक्टर विश्व मोहन शर्मा ने पुलिस अधीक्षक कुंवर राष्ट्रदीप को पत्र भेजकर यातायात प्रबंधन समिति में लिए गए निर्णय का हवाला देते हुए निर्देश कहा कि 15 अगस्त तक शिफ्टिंग की जानी थी, लेकिन यह अब तक पूरी नहीं हुई है और इससे शहर की यातायात व्यवस्था बिगड़ रही है।
कलेक्टर विश्व मोहन शर्मा की ओर से जारी आदेश की प्रति लेकर एडीएम सिटी अरविंद सेंगवा शाम करीब सात बजे धरना स्थल पर पहुंचे। उन्होंने टंडन को आदेश की प्रति प्रदान करते हुए कहा कि जिला प्रशासन ट्रांसपोर्ट कारोबार को नए ट्रांसपोर्ट नगर शिफ्ट करने के लिए कटिबद्ध है और इसके लिए जो भी जरूरी कदम होंगे वह सभी उठाए जाएंगे। प्रशासन की ओर से सकारात्मक कार्रवाई के बाद टंडन ने भूख हड़ताल खत्म कर दी।
असल में ऐसा नहीं है कि पुलिस अधीक्षक ने कोशिश नहीं की, मगर कामयाबी हासिल न हो पाई। यही वजह रही कि टंडन को अपनी चेतावनी के आधार पर अनशन पर बैठना पड़ा। सवाल ये उठता है कि क्या अब जो नया आदेश जिला कलेक्टर ने पुलिस अधीक्षक को दिया है, उस पर सख्ती से अमल हो पाएगा? और अगर नहीं हुआ तो? फिर क्या होगा? अचरज की बात है कि तेज तर्रार टंडन महज एक लैटर पर यकीन करके अनशन समाप्त करने को राजी हो गए।
क्या वे इस लैटर का ही इंतजार कर रहे थे कि वह जारी हो और वे अनशन से उठ जाएं। उन्होंने यह तकाजा तक नहीं किया कि आखिर कब तक शिफ्टिंग का काम पूरा करवाओगे? होना तो ये चाहिए था कि वे एक रात काट लेते, मगर यह आश्वासन ले कर उठते कि किस तारीख तक शिफ्टिंग होगी।
खैर, देखते हैं कि प्रशासन, पुलिस को लैटर जारी कर इतिश्री कर लेता है, या वाकई इसका फॉलोअप कर शिफ्टिंग करवा पाता है। बेशक प्रशासन की अपनी दिक्कतें हैं, मगर बीस साल हो गए ट्रांसपोर्ट नगर बने हुए, फिर भी शिफ्टिंग नहीं हो पाई तो यह वाकई शर्मनाक है। रहा सवाल टंडन का तो वे वाकई साधुवाद के पात्र हैं, जिन्होंने जनहित के मुद्दे पर प्रशासन पर दबाव बनाया। अफसोस सिर्फ इतना है कि उन्होंने फेसबुक पर साथ देने वालों के साथ जिला कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक का भी आभार व्यक्त कर दिया, जिन्होंने, बकौल टंडन, जनहितकारी कदम त्वरित उठाया और उनके निवेदन को स्वीकार किया। क्या एक पत्र जारी करना मात्र जनहितकारी कदम है? अपुन तो उनके कदम को तभी सलाम करेंगे, जब वे वाकई कामयाब हो जाएंगे। रहा सवाल जनता का तो वह वैसे भी जिला प्रशासन के नहीं, बल्कि भगवान भरोसे है।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 15 अगस्त 2019

नरेश बागानी ने दी अजमेर को अनूठी सौगात

अजमेर के सुपरिचित व्यवसायी व सिंधी सोशल ग्रुप अजमेराइट्स के अध्यक्ष नरेश बागानी का सपना आखिर साकार हो गया। उनके प्रयासों से रीजनल कॉलेज के सामने आनासागर चौपाटी पर बने आई लव अजमेर के नाम से सैल्फी पॉइंट का स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर लोकार्पण हो गया। वे इस ईवेंट को राजनीतिक रंग नहीं देना चाहते थे, इस कारण जिला कलेक्टर विश्वमोहन शर्मा व अजमेर विकास प्राधिकरण के आयुक्त निशांत जैन के हाथों ही लोकार्पण करवाने का निश्चय किया।
नरेश बागानी
संयोग से चिकित्सा मंत्री डॉ. रघु शर्मा अजमेर में ही थे और उन्होंने अचानक एक कार्यक्रम में उन्हें बुलवा लिया, इस कारण वे नहीं आ पाए। मगर अपने प्रतिनिधि के रूप में प्रशिक्षु आईएएस व उपखंड अधिकारी डॉ. अर्पिता शुक्ला को भिजवा दिया। निशांत जैन व डॉ. अर्पिता ने मिल कर इसका औपचारिक लोकार्पण किया। कासलीवाल अस्वस्थता के करण नहीं आ पाए।
तकरीबन तीन साल पहले एक बार नरेश बागानी ने मुझे बताया था कि वे अजमेर को कोई अनूठी सौगात देना चाहते हैं। वे इस दिशा में लगे रहे। अजमेर विकास प्राधिकरण व अजमेर नगर निगम के चक्कर लगाते थे, मगर कभी कानूनी पेचीदगियों और कभी आचार संहिता के कारण मामला लंबित बना रहा। कोई दो माह पहले वे मिले और जानकारी दी कि अभी तक स्वीकृति नहीं मिली है।
इस पर मैं और पत्रकार व महिल समाजसेवी राशिका महर्षि उन्हें अजयमेरू प्रेस क्लब के अध्यक्ष सुरेश कासलीवाल के पास ले गये और स्मार्ट सिटी होने जा रहे अजमेर में इस सैल्फी पॉइंट की चर्चा की। कासलीवाल को प्रस्ताव पसंद आया और उन्होंने जिला कलेक्टर विश्वमोहन शर्मा से बात की। शर्मा को भी बात जंची और उन्होंने प्रस्ताव बना कर भेजने को कहा। बागानी ने अपनी संस्था सिंधी सोशल ग्रुप अजमेराइट्स के बैनर पर आवेदन किया, जिसे शर्मा ने जरूरी औपचाकिताओं के बाद मंजूरी दी, जिसमें प्राधिकरण के आयुक्त जैन का भी सहयोग रहा। औपचारिकताओं को पूरा करवाने में कासलीवाल ने अहम भूमिका निभाई। इस सिलसिले में मैने भी कासलीवाल, बागानी व राशिका के साथ दो-तीन बार प्राधिकरण के अधिकारियों के साथ मौके का दौरा किया। सभी के सुझावों का समाहित करते हुए सैल्फी पॉइंट की तैयारियां अंतिम चरण में थी कि बागानी की मुलाकात हरीश गिदवानी से हुई और उन्होंने अपनी ओर से भी आर्थिक सहयोग का प्रस्ताव रखा। बागानी तुरंत राजी हो गए। दोनों ने दिन रात एक कर यह सौगात तैयार करवाई, जो अब आनासागर चौपाटी पर शोभा बढ़ा रही है।
सुरेश कासलीवाल
बागानी ने बताया कि सबसे पहले उन्होंने इस प्रकार का सैल्फी पॉइंट अमेरिका में देखा था। वहीं से उन्हें प्रेरणा मिली। उसके बाद दुबई, मुंबई व मद्रास में भी ऐसे सेल्फी पॉइंट देखे। अब अपना सपना पूरा होने पर वे बेहद खुश हैं। बेशक यह निर्जीव पत्थर से बना है, मगर लोकार्पण के दौरान उमड़ी भीड़ ने इसे सजीव बना दिया है।
बागानी ने बताया कि उनकी संस्था अजमेर के हित में कार्यक्रम आयोजित करती रहेगी। गिदवानी ने घोषणा की कि अगली 15 अगस्त के आसपास एक और सौगात दी जाएगी। बागानी ने बताया कि संस्था के संरक्षक छांगोमल जेठानी, उपाध्यक्ष प्रदीप जेठानी, सचिव दीपक साधवानी, कोषाध्यक्ष कमल मूलचंदानी,, गिरीश लालवानी, सुरेश प्रियानी, राम असवानी, मोती जेठानी, विजय साधवानी, राजा जेठानी, राजेश लुधानी, मनोज मधुरम, अशोक दासानी, शेवक पंजवानी, ललित नागरानी, रामेश शिवनानी, सुलिल लालवानी आदि का उन्हें भरपूर सहयोग मिला है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000