बुधवार, 18 सितंबर 2019

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग चार
स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा
स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा पेशे से मूलत: वकील थे, मगर पत्रकारिता में भी उनको महारत हासिल थी। लंबे समय तक दैनिक नवज्योति में कोर्ट की रिपोर्टिंग की। बाद में दैनिक भास्कर से जुड़े, जहां उनके भीतर का पत्रकार व लेखक पूरी तरह से पुष्पित-पल्लवित हुआ। रूटीन की खबरों से हट कर वो सब कुछ जो खबर का हिस्सा नहीं बन पाता था, उसके लिए दैनिक भास्कर ने महानगर प्लस के नाम से एक पेज का अनूठा प्रयोग किया। उसमें खबरों के फॉलोअप, ह्यूमन स्टोरीज, जीवन के विविध रंगों इत्यादि का समावेश किया जाता था। इस पेज को उन्होंने बखूबी संभाला। खबर के तत्त्व को बारीकी से समझने वाले श्री हाड़ा बहुत टाइट खबर लिखा करते थे। मुझे एक भी खबर याद नहीं, जिसे संपादित करते वक्त एक भी शब्द इधर से उधर करना पड़ा हो। अपनी असीम कल्पनाशीलता का भरपूर उपयोग करते हुए उन्होंने महानगर प्लस में एक से बढ़ एक प्रयोग किए और पत्रकारिता को नया आयाम प्रदान किया। भाषा-शैली में विविध रंग भरने में भी कमाल की कारीगरी थी। उन्होंने पत्रकारिता में आए नए युवक-युवतियों को तराश कर परफैक्ट पत्रकार बनाया। मेरी नजर में वे एक संपूर्ण संपादक थे, जिनमें भाषा का पूर्ण ज्ञान था, समाचार व पत्रकारिता के सभी अंगों की गहरी समझ थी, किस खबर को कितना सम्मान चाहिए, इसका भान था। ले आउट के एक्सपर्ट थे। हैंड राइटिंग भी बहुत खूबसूरत थी, जो उनके खूबसूरत मिजाज  की द्योतक थी। यह बात दीगर है कि कंप्यूटर के इस युग में हैंडराइटिंग की प्रासंगिकता खत्म सी हो गई है। दैनिक भास्कर के कानूनी मसलों को भी उन्होंने बखूबी हैंडल किया। अजयमेरू प्रेस क्लब का संविधान बनाने में उनकी अहम भूमिका थी। मीडिया की भीतरी दुनिया की खैर खबर रखने वाले पोर्टल भड़ास डॉट कॉम पर यदा कदा अपनी भड़ास निकाल लिया करते थे। इस हिसाब से वे एक विद्रोही इंसान थे, जिसे अव्यवस्था व अन्याय विचलित कर दिया करता था। जीवन के आखिरी दिनों में दरगाह ख्वाजा साहब पर अनूठ वेबसाइट भी बनाई। माशाअल्लाह, वाकई हरफनमौला इंसान थे।
अफसोस कि जीवन यात्रा में आधे रास्ते में ही हमको अलविदा कह के चल दिए। काश वे जिंदा होते तो न जाने कितने और नवोदित पत्रकारों को दिशा प्रदान करते। उनकी अंत्येष्टि के समय पार्थिव शरीर से उठती लपटों ने मेरे जेहन में यह सवाल गहरे घोंप दिया कि क्या कोई कड़ी मेहनत व लगन से किसी क्षेत्र में इसलिए पारंगत होता है कि वह एक दिन इसी प्रकार आग की लपटों के साथ अनंत में विलीन हो जाएगा? खुदा से यही शिकवा कि यह कैसा निजाम है, आदमी द्वारा हासिल इल्म और अहसास उसी के साथ चले जाते हैं। कौतुहल ये भी कि फिर जिस दुनिया में वह जाता है, वहां वह फन उसके किसी काम भी आता है या नहीं?

श्री हरि हिमथानी
साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित श्री हरि हिमथानी की गिनती राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित सिंधी साहित्यकारों में होती है। उनका जन्म 1933 में सिंध के नवाबशाह जिले के हिसाब गांव में हुआ। भारत विभाजन के बाद वे अजमेर में आ कर बसे। उनकी पहली लघु कथा सन् 1952 में च्प्यार रोई दिनोज् का प्रकाशन एक प्रसिद्ध सिंधी मासिक पत्रिका च्कुमारीज् में हुआ। सन् 1954 में उनके नॉवेल च्रात जो बियों पहरज् और च्माझिया जा दंगाज् प्रकाशित हुए। इसके बाद उनके नॉवेल च्अभागिनज् और च्आशाज् ने उन्हें प्रतिष्ठित लेखक के रूप में स्थापित किया। सन् 1954 से 1960 के दौरान उनके पांच नॉवेल प्रकाशित हुए, जिनकी काफी सराहना हुई। सन् 1961 के दरम्यान उन्होंने आत्मकथा लिखना शुरू किया और दुर्भाग्य से उनके बड़े भाई ने दीपावली के सफाई के दौरान तकरीबन 1500 पन्ने कचरे के साथ फैंक दिए। तकरीबन दस साल तक उन्होंने लेखन बंद कर दिया। इसके बाद 1970 में उन्होंने फिर लिखना शुरू किया और एक के बाद एक पुस्तकें लिखते गए। सन् 1987 में उन्हें च्आरमेक असवार्डज् से नवाजा गया। सन् 1990 में उन्हें च्नई दुनिया पब्लिकेशनज् से सम्मानित किया गया। सन् 1993 में उन्हें अखिल भारतीय सिंधी बोली ऐं साहित सभा की ओर से च्लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्डज् दिया गया। सन् 1995 में उन्होंने च्डॉ. एच. एल. सदरंगानी गोल्ड मेडलज् हासिल किया। सन् 1996 में उन्हें राजस्थान सिंधी अकादमी ने लाइफ टाइम लिट्रेसी अचीवमेंट के लिए से च्सामी अवार्डज् से नवाजा गया। सन् 2001 में उन्हें एन.सी.पी.एस.एल. अवार्ड व 2002 में साहित्य अकादमी अवार्ड हासिल हुआ। सन् 2009 में उन्हें सिंधु वेलफेयर सोसायटी, जयपुर ने सम्मानित किया। उनकी तकरीबन दस लघु कथाएं और पंद्रह नॉवेल प्रकाशित हो चुके हैं। गत 21 अक्टूबर, 2010 को साहित्य अकादमी की ओर से उन्हें सम्मान देते हुए मीट द ऑथर के तहत साहित्य प्रेमियों से रूबरू करवाया गया।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, 17 सितंबर 2019

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग तीन

मित्रों, 
अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाओं के विषय पर जब लिखने का मन हुआ तो मुझे अंदाजा नहीं था कि यह गले पड़ जाएगा। कहते हैं न कि गए थे नमाज पढऩे और रोजे गले पड़ गए। वैसी ही हालत हुई है मेरी। असल में जिन पत्रकारों व साहित्यकारों को गहरे से जानता था, मेरा मन उनकी लेखन विधा का दर्शन करने व कराने का ही था, ताकि नए पत्रकारों व नवोदित लेखकों को साहित्य व पत्रकार जगत के बारे में एक दृष्टि दे सकूं। मगर बाद में लगा कि जिनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है, यदि उनका जिक्र तक नहीं किया तो यह वाजिब नहीं होगा। अत: मेरी कोशिश है कि शहर के सभी सुपरिचित पत्रकारों व साहित्यकारों को इस शृंखला में शामिल करूं। यदि किसी के बारे में बहुत अधिक जानकारी न दे पाऊं तो मुझे माफ कर दीजिएगा। एक बात और। सूची अधिक लंबी होने के कारण वरीयता की मर्यादा का पालन करने में कठिनाई होगी। मेहरबानी करके अन्यथा न लीजिएगा। एक निवेदन और। यदि किसी मित्र का इस यात्रा में सहभागी होने का मन करता हो तो, स्वागत है।

लीजिए, शृंखला की अगली कड़ी:-
यदि भाषा के संपूर्ण ज्ञान के हिसाब से देखा जाए तो डॉ. बद्री प्रसाद पंचोली का नाम शीर्ष पर है। यानि अल्टीमेट। झालावाड़ के खानपुर में 1 जून, 1935 को जन्मे डॉ. बद्रीप्रसाद पंचोली राजस्थान के प्रतिष्ठित साहित्यकार और हिंदी व संस्कृत के जाने-माने विद्वान हैं। उन्होंने हिंदी व संस्कृत में एम.ए. व पीएचडी की है। आप राजकीय महाविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं।
वस्तुत: वे हिंदी व संस्कृत भाषा और व्याकरण के इतने प्रकांड विद्वान हैं कि उन्हें शब्दों की व्युत्पत्ति तक का पूर्ण ज्ञान है। मेरी जानकारी के अनुसार वेद संस्थान के स्वर्गीय श्री अभयदेव शर्मा भी उनके समकक्ष माने जाते थे। श्री पंचोली को मैने ऐसे जाना कि मैं जब दैनिक न्याय में था, तब आपका संपादकीय नियमित रूप से प्रकाशन हेतु आता था। लेखन के क्षेत्र में उन्होंने लंबी यात्रा तय की है। उन्होंने तकरीबन चालीस साल तक न्याय में नियमित रूप से संपादकीय लिखा। दुनिया का शायद ही ऐसा कोई विषय हो, जिस पर आपकी कलम न चली हो। हम जानते हैं कि संपादकीय आम तौर पर घटनाओं की संतुलित समीक्षा के साथ समाज को दिशा देने का काम करते हैं। इस लिहाज से उन्होंने लंबे समय तक एक उपदेशक के रूप में भी समाज को अपनी सेवाएं दी हैं। उनकी शैली में घुमाव भले ही कुछ खास न हो, मगर इतना सधा हुआ इतना लिखा करते थे कि वह धारा प्रवाह तो होता ही था, उसमें व्यवस्था पर प्रहार करती धार भी पर्याप्त होती थी। आम तौर पर नैतिकता पर जोर हुआ करता था। जिस भी विषय पर संपादकीय लिखा, उस पर संक्षेप में संपूर्ण जानकारी मिल जाती थी। न तो उसमें कोई अवांछनीय शब्द होता था और न ही उसमें कुछ जोड़ा जा सकता था। लेखनी पर कितना नियंत्रण था, इसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे। यूं समझिये कि ए फोर साइज के कागज से कुछ छोटे कागज पर ऊपर कोने से लिखना शुरू करते और ठीक नीचे के कोने तक संपादकीय पूरा हो जाता। कांट-छांट कहीं भी नहीं। कागज की बचत के लिए हाशिया तक नहीं छोड़ते। है न समझ से परे कि क्या किसी की अपनी लेखनी पर इतनी कमांड हो सकती है कि उसे शब्दों की गिनती तक का पता हो कि कितने में अपनी बात पूरी करनी है। यह जानकर आपका मन उनको नमन करने को करता है कि नहीं।

अजमेर में पहली पंक्ति के साहित्यकारों में स्वर्गीय श्री मनोहर वर्मा का नाम श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे प्रदेश के प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार थे। आजीविका के लिए 1953 से रेलवे में नौकरी की, लेकिन तभी से लेखन की निजी रुचि को भी पोषित करते रहे। उन्होंने बाल साहित्य पर अनेकानेक पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें 1973 में राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से विशिष्ट साहित्यकार के रूप में सम्मानित किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर व दैनिक नवज्योति में समीक्षक के रूप में सेवाएं दीं। स्वाभाविक है खबर की भाषा-शैली की गहरी जानकारी थी और बहुत बारीकी से नक्काशी किया करते थे। जीवन के आखिरी क्षणों तक पत्रकारिता व साहित्य की सेवा की। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि।

-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, 16 सितंबर 2019

अजमेर के ठिये-ठिकाने

ठिये-ठिकाने। आप समझे ना। जहां शहर की चौधर करने वाले जमा होते हैं। जहां बाखबर के साथ बेखबर चर्चाओं का मेला लगता है। अफवाहों की अबाबीलें भी घुसपैठ कर जाती हैं, तो कानाफूसियां भी अठखेलियां करती हैं। हंसी-ठिठोली, चुहलबाजी, तानाकशी व टीका-टिप्पणी के इस चाट भंडार पर शहर भर के चटोरे खिंचे चले आते हैं। दुनियाभर की टेंशन और भौतिक युग की आपाधापी के बीच यह वह जगह है, जहां आ कर जिंदगी रिलैक्स करती है। इतना ही नहीं, जहां अनायास शहर की फिजां का तानाबाना बुना जाता है। जहां से निकली हवा शहर की आबोहवा में बिखर जाती है।
दैनिक भास्कर, अजमेर संस्करण के संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल जिंदगी के इस अनछुए से ठिये को अपने आलेख में बखूबी छू चुके हैं। उन्होंने ठिये-ठिकाने पर ऐसा शब्द चित्र खींचा है, जिसे पढऩे पर आपके जेहन में हूबहू नक्शा उभर आएगा। उसकी सुर्खी है- ठिये-ठिकाने, जहां जि़न्दगी मुस्कुराती है।

तेजवानी गिरधर
पिछले दिनों अजयमेरू प्रेस क्लब मेें चाय पर चर्चा के दौरान भी उन्होंने अजमेर के एक खास ठिये का जिक्र करते हुए मौजूद पत्रकार साथियों को तकरीबन पंद्रह साल पीछे ले जा कर गहरी डुबकी लगवाई थी। उस ठिये का नाम यूं तो कुछ नहीं, मगर क्लॉक टॉवर पुलिस थाने के मेन गेट से सटी बाहरी दीवार पर रोजाना रात सजने वाले मजमे को कुछ मसखरे नाले शाह की मजार कहा करते थे। दरअसल दीवार के सहारे पटे हुए एक नाले पर होने के कारण ये नाम पड़ा था। अपने आलेख में डॉ. अग्रवाल ने इसे कुछ इस तरह बयां किया है:-
अजमेर रेलवे स्टेशन के बाहर मुख्य सड़क पर ऐसी ही एक चौपाल बरसों तक लगा करती थी, जिसमें बैठने के लिए लोग अपने दुपहिया वाहनों का इस्तेमाल किया करते थे। कई बार यह रात्रि चौपाल भोर होने तक खिंच आती थी। अजमेर की इस चौपाल में बहुसंख्या भले ही शहर के पत्रकारों की रहा करती हो, मगर शिरकत बड़े-बड़े मंत्रियों व अफसरों से लेकर पंक्चर बनाने वालों तक की रहती थी।
असल में डॉ. अग्रवाल ही इस ठिये के सूत्रधार थे। तब वे नवज्योति में हुआ करते थे। उनके संपादन कार्य से निवृत्त के बाद यहां पहुंचने से पहले ही  एक-एक करके ठियेबाज जुटना शुरू हो जाते थे। सबके नाम लेना तो नामुमकिन है। चंद शख्सियतों का जिक्र किए देते हैं:- स्वर्गीय वीर कुमार, रणजीत मलिक, इंदुशेखर पंचोली, संतोष गुप्ता, नरेन्द्र भारद्वाज, ललित शर्मा, अतुल शर्मा, तिलोक आदि आदि, जो कि रोजाना इस मजार पर दीया जलाने चले आते थे। डॉ. अग्रवाल के आने के बाद तो महफिल पूरी रंगत में आ जाती थी। इस मयखाने की मय का स्वाद चखने कई रिंद खिंचे चले आते थे। यहां दिनभर की सियासी हलचल के साथ अफसरशाही के किस्सों पर खुल कर चटकारे लिये जाते थे। समझा जा सकता है कि दूसरे दिन अखबारों में छपने वाली खबरों का तो जिक्र होता ही था, उन छुटपुट वारदातों पर भी कानाफूसी होती थी, जो ऑफ द रिकार्ड होने के कारण खबर की हिस्सा नहीं बन पाती थीं। अगर ये कहा जाए कि इस ठिये पर शहर का दिल धड़कता था तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। चूंकि यहां हर तबके के बुद्धिजीवी जमा होते थे, इस कारण खबरनवीसों को शहर की क्रिया-प्रतिक्रिया का भरपूर फीडबेक मिला करता था। जो बाद में अखबारों के जरिए शहर की दिशा-दशा तय करता था। जिन पंक्चर बनाने वाले का जिक्र आया है, उनका नाम है श्री सीताराम चौरसिया। कांग्रेस सेवादल के जाने-माने कार्यकर्ता। सेवादल के ही योगेन्द्र सेन इस मजार के पक्के खादिम थे। बाद में यह ठीया वरिष्ठ पत्रकार इंदुशेखर की पहल पर पैरामाउंट होटल के एक कमरे में शिफ्ट हो गया। एक घर बनाऊंगा की तर्ज पर एक सा छोटा ठिया सामने ही रेलवे स्टेशन के गेट के पास कोने में चाय की दुकान पर भी खुला, जो दैनिक न्याय के पत्रकारों ने जमाया था। लगे हाथ ये बताना वाजिब रहेगा कि नाले शाह की मजार से भी पहले क्लॉक टॉवर के सामने मौजूदा इंडिया पान हाउस के पास चबूतरे पर दैनिक नवज्योति के क्राइम रिपोर्टर स्वर्गीय जवाहर सिंह चौधरी देर रात के धूनी रमाया करते थे।
डॉ. रमेश अग्रवाल
शहर के दूसरे ठियों पर चर्चा से पहले डॉ. अग्रवाल के आलेख की चंद पंक्तियों का आनंद लीजिए:-
कहते हैं दिल से दिल को राहत होती है। इंसान को अगर कुछ दिन, किसी दूसरे इंसान की शक्ल दिखाई न दे तो वह यूं कुम्हला जाता है, जैसे धूप के बगैर कोई पौधा। इंसान की इसी फितरत ने तरह-तरह के मजमों को जन्म दिया। गांव की चौपालें, मारवाड़ की हथाइयां, भोपाल के पटिये, बीकानेर के पाटे, कस्बों में ठालों के अड्डे, छोटे शहरों में पान की दुकानें और बड़े शहरों में काफी हाउस, न जाने कब से एक-दूसरे के दिल तक पहुंचने का माध्यम बनते रहें हैं। टीवी, सिनेमा, इंटरनेट या फेसबुक ने इंसान को भले चलता- फिरता चित्र भर बना डाला हो, मगर ये सब मिलकर आज भी उन्मुक्त अट्टहास से आबाद उन असंगठित, अनाम और अनौपचारिक ठिकानों का विकल्प नहीं बन पाए हैं, जिन्हें कहीं ठिया कहा जाता है तो कहीं बैठक। ऐसे ठिकानों के रसिक फुरसतियों के घर, उनकी अनुपस्थिति में जब कोई उनका चाहने वाला उन्हें पूछने पहुंचता है तो घर का दरवाजा खोलती अम्मा या भाभी की आंखों में उलाहना देखकर ही समझ जाता है कि उनका अजीज इस समय कहां बैठा होगा।
गप्प, चुहल और मटरगश्ती के ऐसे ठिकानों के लिए किसी खास तरह की जगह की दरकार नहीं होती। ऐसी चौपाल किसी बारादरीनुमा हथाई में भी लग सकती है, तो गांव के किसी चौगान में भी। किसी पेड़ की छांव ऐसे फुरसतियों का स्थायी ठिकाना बन सकती है, तो किसी मंदिर की पेडिय़ां भी। गुजरे जमाने में इसी मकसद से मकान के बाहर मोखे, मोड़े या चबूतरे बनाए जाते थे। कई बार किसी का उजाड़ कमरा भी ऐसे ठिकानों की शक्ल ले लेता है। शहरों में मुड्डे अथवा मुड्डियों वाली चाय की थडिय़ां इस काम के लिए बेहतरीन जगह मानी जाती है।
इन चौपालों को महज गप्प ठोकने का अड्डा कहना इंसान की जिंदादिली का मजाक उड़ाने से कम नहीं होगा। जिंदगी से भरपूर इन ठिकानों का हिस्सा वही इंसान बन सकता है, जिसका दिल उसके दिमाग के सामने कतई कमजोर न हो।
बात अब शहर के कुछ और ठियों की। उनमें सबसे ऐतिहासिक है नया बाजार चौपड़। न जाने कितने सालों से यह चौराहा शहर की रूह रहा है। यहां से शहर का बहुत कुछ तय होता रहा है। सबको पता है कि अजमेर क्लब रईसों का आधिकारिक ठिकाना है। अंदरकोट स्थित हथाई भी सबकी जानकारी में है। इसी प्रकार पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती के निवास स्थान की जाफरी वर्षों तक आबाद रही। वहां भी शहरभर के बतोलेबाज जमा हुआ करते थे। इसी प्रकार कांग्रेस नेता कैलाश झालीवाल का मदारगेट स्थित ऑफिस भी कई सालों से खबरनवीसों, कांग्रेस कार्यकर्ताओं व कांग्रेस नेत्रियों का ठिकाना रहा है। ऐसा ही अड्डा रेलवे स्टेशन के सामने स्थित शहर के जाने-माने फोटोग्राफर इन्द्र नटराज की दुकान पर भी सजता था, जहां विज्ञप्तिबाज विभिन्न अखबारों के लिए विज्ञप्तियां दे जाते थे। बौद्धिक विलास के लिए पत्रकारों का जमावड़ा जाने-माने पत्रकार श्री अनिल लोढ़ा के कचहरी रोड पर नवभारत टाइम्स के ऑफिस में भी होता था। जवाहर लाल नेहरू अस्पताल के सामने स्थित मुड्डा क्लब भी शहर के बातूनियों का ठिकाना रहा है। इसी प्रकार पलटन बाजार के सामने जम्मू की होटल कॉफी के शौकीनों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा। मूंदड़ी मोहल्ला का चौराहा भी बतरसियों की चौपाल रही है।
ठियों की बात हो और पान की दुकानें ख्याल में न आएं, ऐसा कैसे हो सकता है। ये शहर की पंचायती करने वालों से आबाद रही हैं। एक समय क्लॉक टावर थाने के नुक्कड़ पर इंडिया पान हाउस हुआ करता था, जो बाद में अतिक्रमण हटाओ अभियान में नेस्तनाबूत हो गया और बाद में सामने ही स्थापित हुआ। स्टेशन रोड पर मजदूर पान हाउस, जनता पान हाउस, गुप्ता पान हाउस व चाचा पान हाउस, हाथीभाटा के नुक्कड़ पर हंसमुख पान वाला, केन्द्रीय रोडवेज बस स्टैंड के ठीक सामने निहाल पाल हाउस, रामगंज स्थित मामा की होटल आदि भी छोटे-मोटे ठिये रहे हैं।  वैशाली नगर में सिटी बस स्टैंड पर गुप्ता पान हाउस पहले एक केबिन में था, जो बाद में एक बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर में तब्दील हो गया। वहां पान की दुकान अब भी है। शाम ढ़लते ही सुरा प्रेमियों का जमघट ब्यावर रोड पर दैनिक न्याय के पास फ्रॉमजी बार में लगता था। ऐसे कई और ठिये होंगे, जो मुझ अल्पज्ञानी की जानकारी में नहीं हैं। आपको पता हो तो इस सूची में इजाफा कर दीजिए।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, 15 सितंबर 2019

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग दो
ताजिंदगी दैनिक नवज्योति से जुड़े रहे श्री नरेन्द्र चौहान लाजवाब इंसान तो हैं ही, खबरनसीस भी अपनी किस्म के इकलौते हैं। चंद लफ्जों में उनका इजहार करने के लिए इतना कहना ही काफी होगा- ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। यह उनके मिजाज में तो है ही, लफ्जों की बाजीगरी में भी नजर आत है। डॉ. रमेश अग्रवाल की तरह लिखने का उनका अपना अलग अंदाज है। वे उर्दू के लफ्जों का जमकर तड़का लगाते हैं। अजमेर में उनके अलावा दैनिक न्याय से जुड़े रहे श्री अरविंद कौशिक के सटायर व टिट-बिट्स उर्दू की चाशनी में ही डूबे हुआ करते थे।
श्री चौहान को हिंदी में तो महारत हासिल है ही, कई जगह ठेठ उर्दू के लफ्जों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें समझने के लिए आपको दिमाग पर पूरा जोर लगाना पड़ जाएगा। या फिर उर्दू के जानकार का दरवाजा खटखटाना पड़ जाएगा। मगर इतना तय है कि कंटेंट से भरपूर उनके आलेख को पढऩे के बाद लगेगा कि आपका वाकई किसी दमदार खबरनवीस से पाला पड़ा है। उनकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि जहां पत्थर पर रगडऩा जरूरी होता है, वहां बड़ी बेदर्दी से रगड़ते हैं और सहलाते भी बड़े खुलूस से हैं। यूं तो अनेक मुद्दों पर लिखते हैं, मगर अमूमन पर बदइंतजामियों पर जमकर तंज कसते हैं। मुल्क के ताजा तरीन मसलों पर भी सटीक लिखते रहे हैं। वे बेहतरीन कार्टूनिस्ट भी हैं। दैनिक नवज्योति में लंबे समय तक फ्रंट पेज पर उनके कार्टून शाया हुए हैं। भले ही नए खबरनवीस उन्हें न जानते हों, मगर वे अजमेर की पत्रकारिता के आइकन हैं।
गत दिनों दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक श्री दीनबंधु चौधरी के जीवन पर रचित गौरव ग्रंथ, जिसका संपादन करना मेरी खुशनसीबी थी, में श्री चौहान की कलम से निकले जज्बात की चंद सफें बतौर बानगी पेश हैं:-
चलो अब इन कमायतों के दरमियां गलों सी गुफ्तगू करें और देखें कि इस सफर की हिमाकतों के दौर में कैसे कैसे लोग मिले हैं।
जुस्तजू हो तो सफर खत्म कहां होता है, यूं तो हर मोड़ पर मंजिल का गुमां होता है।
तुम्हारे शहर के सारे दिए तो सो गए कब के, हवा से पूछना
दहलीज पर ये कौन जलता है।

यहां तंगी-ए-कफस है, वहां फिक्रे-आशियाना
न यहां मेरा ठिकाना, न वहां मेरा ठिकाना।

आंखन देखा वह मंजर आज भी मेरे दिलों दिमाग में जेबस्त है। झील के किनारे गुजरते हुए अब जब पानी की उत्ताल तरंगों से टकरा शीतल हवा की बहारें मन-शरीर को छूती हैं तो उस दौर का अफसाना-ए-जिक्र जरूरी हो जाता है और अफसानों को हकीकत में तब्दील होते देखने का सुखद अहसास भी होता है।
श्री चौहान ने खुद के बारे में लिख कर भेजा था, मगर वह शाया नहीं किया जा सका, चूंकि ऐसा फॉरमेट नहीं था, मगर आपकी नज्र हैं चंद सफें-
एक मायावरी और मुख्र्तालास जी जिंदगी की क्या पहचान। मां-बाप ने नाम दिया, मास्टरों ने पढ़ाया लिखाया और कुछ दिमाग का खोखलापन खत्म किया। कहानियों, किस्सों की तिलस्मी तलब 'नवज्योतिÓ के दरवाजे ले आई। ड्राइंग के शौक ने सफेद और काली लकीरें खींचने की आदत को परवान चढ़ाया। राजस्थान में पहली बार नवज्योति में रोजाना बड़े राष्ट्रीय रिसालों की तर्ज पर पाकेट कार्टून छपने शुरू हुए। हैडलाइन थी- 'यही जिंदगी हैÓ, जो अभी भी तमूदार है। एक लेखकीय नजर से मामूली इंसान की तकलीफें, राजनेताओं, नौकरशाहों की उठापटक, तिकड़मबाजी, जद्दोजहद पर उठ कर कलमघसीटी की। नतीजतन 'शहर अपने ही आइने मेंÓ 'चकतलानÓ, 'चिंतन का मंथनÓ, 'मेरे इर्द गिर्दÓ, रिवर्स गियरÓ, 'कबीरा खड़ा बाजार में, 'नजरियाÓ जैसे मामलों में शब्दों को कागज पर उकेरा। चापलूसी और मक्कारी से परहेज ने कई परेशानियों को झेलना भी सिखाया। यह मेरे सच और मेरे झूठ हैं, इसके अलावा दिमाग में कुछ नहीं है। साफगोई की तराजू आपके हाथ में है।
कुल जमा ये कहने का मन करता है कि बिंदास जेहनियत का ऐसा इंसान व खबरनवीस अजमेर की अखबारी दुनिया का सुनहरा सितारा है।
क्रमश:
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, 14 सितंबर 2019

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग एक
राजस्थान में अजमेर पत्रकारिता की पाठशाला रही है। आज राज्य में पत्रकारिता का जो कल्चर है, उसमें अजमेर की अहम भूमिका है। बेशक राष्ट्रदूत व राजस्थान पत्रिका का भी योगदान रहा है, मगर अजमेर में स्थापित दैनिक नवज्योति के मुख्यालय व दैनिक न्याय ने ऐसे कई पत्रकारों को जन्म दिया है, जो आज विभिन्न समाचार पत्रों में प्रतिष्ठित हैं। जहां राजस्थान पत्रिका सधी हुई भाषा व संक्षिप्तिकरण के लिए जाना जाता रहा है, वहीं दैनिक नवज्योति की पहचान समाचार में संपूर्ण अपेक्षित कंटेंट समाहित किए जाने के रूप में है। दैनिक न्याय का योगदान इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि यहां शुद्ध हिंदी पर विशेष जोर दिया जाता था। दैनिक भास्कर के राजस्थान में आने के बाद पत्रकारिता को नई दिशा मिली। यदि ये कहा जाए कि भास्कर ने अखबारी जगत के कल्चर में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। भास्कर ने पत्रकारों को प्रोफेशनल बनाया है। विशेष रूप से भाषा-शैली की बात करें तो मध्यप्रदेश के नई दुनिया समाचार पत्र में किए गए प्रयोग भास्कर के माध्यम से ही राजस्थान में आए हैं।
इसमें कोई दोराय नहीं कि राजस्थान की पत्रकारिता अपने आप में परिपूर्ण व संपन्न रही है, मगर मेरी नजर में पत्रकारिता की स्कूलिंग मध्यप्रदेश की बेहतर है। जब भास्कर अजमेर में स्थापित हुआ तो आरंभ में भोपाल से पत्रकार भेजे गए थे। उनकी कार्यशैली को गहनता देखा तो पाया कि वे वर्सटाइल हैं। अर्थात उनसे समाचार लिखवाइये या संपादकीय, सटायर लिखवाइये या छोटी-मोटी कविता, आकर्षक हैडिंग बनवाइये या लेआउट, इस सब में वे पारंगत थे।
विषय की भूमिका के बाद अब बात अजमेर के जाने-पत्रकारों की भाषा-शैली की। मेरा प्रयास है कि विषय के साथ पूरी ईमानदारी के साथ न्याय करूं। स्वभाविक रूप से यह मेरा नजरिया है, जिन लोगों ने इन पत्रकारों का जाना होगा, उनका दृष्टिकोण भिन्न हो सकता है। अत: समालोचकों का स्वागत है। एडीशन-ऑल्ट्रेशन अपेक्षित है, ताकि जिन करेक्टर्स को हम जानना चाहते हैं, उन्हें परिपूर्णता के साथ समझें।
आइये, अब मुद्दे पर आते हैं। मूर्धन्य पत्रकार श्री अनिल लोढ़ा, जिन्होंने जयपुर जा कर अपनी धूम मचाई, की समाचार लेखन व न्यूज आइटम की शैली अनूठी है। असल में कॉलेज टाइम में वे बेहतरीन डिबेटर हुआ करते थे। उनकी शैली की विशेषता ये है कि भाषा बहुत टाइट होती है। मेरी नजर में वे एक मात्र पत्रकार हैं, जिनकी लेखनी में एक भी शब्द इधर से उधर नहीं किया जा सकता। चाह कर भी नहीं किया जा सकता। अलबत्ता, लोच का तनिक अभाव होता है, जो कि समाचार को रोचकता प्रदान करता है, मगर लेखन इतना धारा प्रवाह होता है, जो सीधे जेहन में उतरता चला जाता है।  हर शब्द व पंक्ति एक दूसरे से गहरी गुंथी होती है। पत्रकारिता में परफेक्शन की वे मिसाल हैं। जिन पत्रकारों की सीखने में रुचि है, उनके लिए वे प्रेरणा स्तम्भ हैं। वैसे भी राजस्थान में अनेक स्थापित पत्रकार उनकी देन हैं। ज्ञातव्य है कि श्री लोढ़ा अजमेर में दैनिक नवज्योति, राजस्थान पत्रिका व नवभारत टाइम्स से जुड़े रहे। जयपुर में भास्कर के आने पर स्टेट कॉआर्डिनेटर रहे। इसके बाद इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रवेश किया और बेहतरीन राजनीतिक विश्लेषक के रूप में स्थापित हो गए। वे सुनहरा राजस्थान नामक साप्ताहिक का भी शानदार संचालन कर रहे हैं।
बात अब डॉ. रमेश अग्रवाल की। लंबे समय तक दैनिक नवज्योति में रह कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने के बाद भास्कर ज्वाइन किया। कुछ वर्ष जयपुर भी रहे व अब लौट कर अजमेर को दिशा दे रहे हैं। गाहे-बगाहे संपादकीय टिप्पणी के अतिरिक्त कॉलम भी लिखते हैं। उनका अपना एक बड़ा पाठक वर्ग है। उनमें एक आदर्श पत्रकार के दर्शन किए जाते हैं। वे जिस शैली में अपनी बात रखते हैं, वह इस अर्थ में अद्वितीय है कि उसकी कॉपी अब तक कोई पत्रकार नहीं कर पाया है। की ही नहीं जा सकती। उनके लेखन में कई ऐसे शब्द मिल जाएंगे, जो आम तौर पर आपने सुने या पढ़े ही नहीं होंगे। कुछ शब्द ऐसे प्रयोग में लाते हैं, जिनका अर्थ समझने के लिए आपको डिक्शनरी का सहारा लेना पड़ जाएगा। शायद कुछ शब्द उत्तरप्रदेशी हिंदी के होते हैं, जो कि आम पाठक के सिर के ऊपर से गुजर जाते हैं। मगर ये ही शब्द उनके लेखन में खुशबू प्रदान करते हैं। सच कहा जाए तो उनके कुछ पेट वर्ड ऐसे हैं, जिन्हें पढ़ कर तुरंत कह बैठेंगे कि ये उनकी लेखनी है, क्योंकि उनका उपयोग सिर्फ वे ही करते हैं। कड़वी से कड़वी बात को भी बहुत मीठे अंदाज में कहना कोई उनसे सीखे, जो कि उनके स्वभाव में भी है। हालांकि बक्शते फिर भी नहीं हैं। भाषा शैली में ट्विस्ट व लोच का अत्यंत रुचिकर समावेश होता है। आम तौर पर एक-आध शेर का तड़का डाल कर यह अहसास करवा देते हैं कि वे मूलत: साहित्यिक टच के पत्रकार हैं। पत्रकार से कहीं अधिक साहित्यिक व्यक्ति हैं। कुल मिला कर वे अपने लेखन में कई करवटें लेते हुए विविधता के साथ स्वादिष्ट प्रस्तुति देते हैं। साथ ही जो कहना चाहते हैं, उसे पाठक में गहरे पैठा कर ही सुकून पाते हैं।
पिछले विधानसभा चुनाव में दैनिक भास्कर में प्रकाशित उनके एक पॉलिटिकल आइटम की चंद पंक्तियां बतौर बानगी पेश हैं:-
चुनावी गलियों में डंडे खड़काता चुनाव आयोग यह देख कर गद् गद् है कि उसके डंडे की फटकार से चुनावी उम्मीदवारों की घिग्घी बंध गई है।
चुनाव आयोग इन उम्मीदवारों की भोली सूरत और छुंछे हाथ देख कर कैसे ठगौरी खा रहा है।
कहते हैं कि पार्टी के सीनियर भाई गुलाम मुस्तफा ने इमरान भाई की बहियां मरोड़ते हुए यह कह कर उनका मुंह कील दिया कि तुम्हें अध्यक्ष बना दिया ना।
सरे आम ऐसी टकिहाई के बाद इमरान भाई भले ही, जनाब महेन्द्र सिंह रलावता के लिये काम न करें, रलावताजी के अंगरखे के टांके ढीले पड़ते दिखाई नहीं देते।
रलावताजी के एक करीबी दोस्त ने बगैर मतलब समझाए न जाने क्यूं एक शेर पिछले दिनों हमें सुनाया था कि:-
मेरे लिये किसी कातिल का इन्तजाम न कर 
करेंगी कत्ल खुद अपनी हरकतें मुझको।

क्रमश:

-तेजवानी गिरधर
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