सोमवार, 30 सितंबर 2019

अगर पुष्कर पर गर्व है तो शर्म क्यों नहीं आती?

आपको यदि इस बात पर गर्व होता है कि ऐतिहासिक पुष्कर के प्रति करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था है तो अपनी दुर्गति पर रो रहे पुष्कर को देख कर शर्म क्यों नहीं आती? जो करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर जो पुष्कर आपको पाल-पोस रहा है, उसकी सेवा करना क्या आपका कर्तव्य नहीं है? पुष्कर की पावन धरती पर सांस ले रहे हर व्यक्ति को यह सोचना होगा कि उऋण होने के लिए वह पुष्कर को क्या दे रहा है?
अगर आप पुष्कर की आबोहवा में गुजर-बसर कर रहे हैं तो क्या आपको पता है कि:- 
पुराणों में वर्णित तीर्थों में तीर्थराज पुष्कर का महत्वपूर्ण स्थान है। पद्मपुराण के सृष्टि खंड में लिखा है कि किसी समय वज्रनाभ नामक एक राक्षस इस स्थान में रह कर ब्रह्माजी के पुत्रों का वध किया करता था। ब्रह्माजी ने क्रोधित हो कर कमल का प्रहार कर इस राक्षस को मार डाला। उस समय कमल की जो तीन पंखुडिय़ां जमीन पर गिरीं, उन स्थानों पर जल धारा प्रवाहित होने लगी। कालांतर में ये ही तीनों स्थल ज्येष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर व कनिष्ठ पुष्कर के नाम से विख्यात हुए। ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्मा, मध्य के विष्णु व कनिष्ठ के देवता शिव हैं। मुख्य पुष्कर ज्येष्ठ पुष्कर है और कनिष्ठ पुष्कर बूढ़ा पुष्कर के नाम से विख्यात हैं। पुष्कर के नामकरण के बारे में कहा जाता है कि ब्रह्माजी के हाथों (कर) से पुष्प गिरने के कारण यह स्थान पुष्कर कहलाया। राक्षस का वध करने के बाद ब्रह्माजी ने इस स्थान को पवित्र करने के उद्देश्य से कार्तिक नक्षत्र के उदय के समय कार्तिक एकादशी से यहां यज्ञ किया, जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया। उसकी पूर्णाहुति पूर्णिमा के दिन हुई। उसी की स्मृति में यहां कार्तिक माह एकादशी से पूर्णिमा तक मेला लगने लगा।
परम आराध्या देवी गायत्री का जन्म स्थान भी पुष्कर ही माना जाता है। कहते हैं कि यज्ञ शुरू करने से पहले ब्रह्माजी ने अपनी पत्नी सावित्री को बुला कर लाने के लिए अपने पुत्र नारद से कहा। नारद के कहने पर जब सावित्री रवाना होने लगी तो नारद ने उनको देव-ऋषियों की पत्नियों को भी साथ ले जाने की सलाह दी। इस कारण सावित्री को विलंब हो गया। यज्ञ के नियमों के तहत पत्नी की उपस्थिति जरूरी थी। इस कारण इन्द्र ने एक गुर्जर कन्या को तलाश कर गाय के मुंह में डाल कर पीठ से निकाल कर पवित्र किया और उसका ब्रह्माजी के साथ विवाह संपन्न हुआ। इसी कारण उसका नाम गायत्री कहलाया। जैसे ही सावित्री यहां पहुंची और ब्रह्माजी को गायत्री के साथ बैठा देखा तो उसने क्रोधित हो कर ब्रह्माजी को श्राप दिया कि पुष्कर के अलावा पृथ्वी पर आपका कोई मंदिर नहीं होगा।
वाल्मिकी रामायण में भी पुष्कर का उल्लेख है। अयोध्या के राजा त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग में भेजने के लिए अपना सारा तप दाव लगा देने के लिए विश्वामित्र ने यहां तप किया था।
भगवान राम ने अपने पिताश्री दशरथ का श्राद्ध मध्य पुष्कर के निकट गया कुंड में ही किया था। महाभारत के वन पर्व के अनुसार श्रीकृष्ण ने पुष्कर में दीर्घकाल तक तपस्या की। 
कहा जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास काल के कुछ दिन पुष्कर में ही बिताए थे। उन्हीं के नाम पर यहां पंचकुंड बना हुआ है। सुभद्रा हरण के बाद अर्जुन ने पुष्कर में कुछ समय विश्राम किया था। अगस्त्य, वामदेव, जामदग्रि, भर्तृहरि ऋषियों की तपस्या स्थली के रूप में उनकी गुफाएं आज भी नाग पहाड़ में हैं। बताया जाता है कि पाराशर ऋषि भी इसी स्थान पर उत्पन्न हुए थे। उन्हीं के वशंज पाराशर ब्राह्मण कहलाते हैं।
ऐसी मान्यता है कि वेदों में वर्णित सरस्वती नदी पुष्कर तीर्थ और इसके आसपास बहती है।

-तेजवानी गिरधर
अजमेर की मशाल से साभार 

क्या आपको भूमाफिया जनप्रतिनिधि चाहिए?

यह खबर लिखे जाने तक हालांकि पुष्कर नगर पालिका के अध्यक्ष पद की लॉटरी नहीं निकली है, इस कारण चुनावी आकाश पर धुंधलका छाया हुआ है, मगर बावजूद इसके वार्ड मेंबर के चुनाव के लिए दावेदारों ने मालिश शुरू कर दी है। कुछ ने तो पूरा गणित ही बैठा लिया है और मतदाता सूचियों में अपने-अपने हिसाब से नाम जुड़वा दिए हैं। यदि ठीक से जांच की जाए तो सारी पोल खुल जाएगी कि किस वार्ड में क्या बदमाशी की जा रही है। जहां तक ग्राउंड सर्वे का सवाल है, यह साफ-साफ नजर आ रहा है कि इस बार चुनाव में भूमाफियाओं का बोलबाला रहने वाला है। यानि कि ईमानदार व समर्पित दावेदार तो चुनाव लडऩे की सोच भी नहीं सकता।
पिछले चुनाव का अनुभव बताते हुए हारे हुए एक प्रत्याशी बताते हैं कि वार्ड में उनकी जबरदस्त पकड़ थी और अब भी है। उन्होंने अनेक मतदाताओं के निजी काम करवाए थे। इस कारण उनको पूरा यकीन था कि वे आसानी से जीत जाएंगे, मगर मतदान की पूर्व संध्या में ही पासा पलट गया। समझा जा सकता है कि पासा कैसे पलटा होगा। अगर उनको एक सेंपल के रूप में लिया जाए तो कल्पना कर सकते हैं कि वास्तव में अपनी मातृ भूमि की सेवा करने वालों में चुनाव लडऩे की कितनी इच्छा शेष रह गई होगी।
असल में पुष्कर में तीन तरह के लोग प्रभावशाली हैं। जमीन की दलाली करने वाले, होटल व्यवसायी व एक्सपोर्टर्स। और इन सबसे ऊपर सक्रिय राजनीति करने वाले। इन्हीं के पास राजनीति में पैसा झोंकने की गुंजाइश है। जगहाहिर है कि आज चुनाव में पैसे का कितना बड़ा रोल है। ऐसे में ये लोग ही पुष्कर पालिका चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे। जीत जाने अथवा किसी को जितवा देने के बाद ये इन्वेस्ट किए हुए धन का कई गुना दोहन करेंगे। ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार होने जा रहा है। पिछले कई चुनावों से ऐसा होता आया है। तो फिर आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ये पुष्कर के भले की सोचेंगे। अपना ही घर तो भरेंगे। यदि एक-एक का नाम लेकर बात की जाए तो यह पूरी तरह से स्पष्ट हो जाएगा कि अधिसंख्य जनप्रतिनिधियों ने राजनीति में आने के बाद कितना निजी विकास किया है। अगर राजनीति में दखल रखने वालों ने भला सोचा होता तो आज पुष्कर की बुरी हालत नहीं होती।
पुष्कर की दुर्दशा देख कर सहसा हम सरकार व प्रशासन को कोसते हैं कि वे कुछ नहीं कर रहे, मगर सच्चाई ये है कि यहां के विकास के लिए समय समय पर अतिरिक्त बजट आवंटित हुआ है। बावजूद इसके अगर पवित्र सरोवर स्वच्छ पानी को तरस रहा है, सरोवर के घाटों पर गंदगी पसरी है, सड़कों की दुर्दशा है, अतिक्रमणों की भरमार है तो इसका मतलब ये है कि जो भी राशि सरकार की ओर से आती है, वह या तो ठीक से उपयोग में नहीं लाई गई या फिर जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों व ठेकेदारों के बीच बंदरबांट में निपट गई।
बेशक पुष्कर का विकास करने की जिम्मेदारी सरकार की है, अजमेर विकास प्राधिकरण व नगर पालिका की है, मगर उतनी ही जिम्मेदारी हमारी है कि हम विकास कार्यों पर नजर रखें, ताकि केन्द्र व राज्य सरकार से विभिन्न योजनाओं के लिए मिलने वाले धन का दुरुपयोग न हो। इस कड़ी में हम समाजसेवी व बुद्धिजीवी श्री अरुण पाराशर का नाम ले सकते हैं, जिन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग न लेते हुए पुष्कर से जुड़े हर मसले पर गहन अध्ययन करने के बाद सरकार व प्रशासन पर दबाव बनाया है कि विकास के लिए आने वाले धन का सदुपयोग हो। संभवत: वे इकलौते बुद्धिजीवी हैं, जिनके पास पुष्कर के विकास के लिए अब तक बनी सभी योजनाओं के बारे तथ्यात्मक जानकारी है और फॉलोअप के लिए आरटीआई के जरिए जुटाए गए आंकड़े हैं, जिनसे स्पष्ट दिखता है कि बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है, जिसके बारे में आम मतदाता को कुछ भी नहीं।
श्री पाराशर का जिक्र करने का निहितार्थ यह है यदि हमें पुष्कर में हो रहे विकास कार्यों पर ठीक से निगरानी करनी है तो ऐसे और बुद्धिजीवियों को एक मंच पर लाना होगा। ये प्रयास करना होगा कि भूमाफियाओं की आगामी नगर पालिका चुनाव में कम से कम भूमिका हो। हर वार्ड में आपको ऐसे समाजसेवी मिल जाएंगे, जो कि वास्तव में पुष्कर का विकास चाहते हैं। उन्हें प्रोत्साहित करना होगा।

-तेजवानी गिरधर
अजमेर की मशाल से साभार 

रविवार, 29 सितंबर 2019

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग तेरह

डॉ श्रीमती शकुंतला तंवर
पत्रकारिता पर तो अक्सर साहित्य से छेड़छाड़ और भाषा को बिगाड़ने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि पत्रकारिता ने हमेशा उस भाषा शैली का इस्तेमाल करने का प्रयास किया है, जिसे आम आदमी आसानी से समझ सके। इस बात से इनकार नहीं है कि यदा कदा कुछ अखबारों ने अपनी ही शब्दावली थोप कर कभी हिंदी को शर्मिंदा किया हो, मगर ऐसे उदाहरण बिरले ही होंगे।
मगर, भाषा को लेकर अक्सर चलने वाले विवादों और बहस के बीच हिन्दी कि साहित्यिक सेवा सेवा करने वाले कुछ भाषा के पुजारी भी रहे जिन्होंने इसे हमेशा इसे पूजा की तरह निभाया।
उनमें से यदि अजमेर से एक बड़ा नाम चुनने की बात आए तो डॉ श्रीमती शकुंतला तंवर का नाम याद आता है।
मुल्क को आजादी मिलने के अगले वर्ष सन 48 में 27 जून को जन्मीं श्रीमती तंवर 1970 में राजकीय महाविद्यालय अजमेर से हिन्दी में स्नातकोत्तर किया और प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर अपनी साहित्य यात्रा का आगाज़ किया।
डॉ तंवर वर्ष 2008 तक सावित्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्रवक्ता के पद पर कार्यरत रह कर बालिकाओं को हिंदी साहित्य का अपना ज्ञान बांटती रहीं और इस दौरान अपने साहित्यिक सृजन को भी ऊंचाइयों तक ले जाती रहीं। हालांकि अपनी नौकरी से वे जरूर सेवानिवृत्त हैं, लेकिन एक लेखक, कवियत्री या साहित्यकार के रूप में उनकी यात्रा अनवरत है।
"कामायनी एवं उर्वशी महाकाव्यों में कामध्यात्म के नए आयाम" विषय पर अपना शोध पूर्ण कर वर्ष 1987 में राजस्थान विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।
श्रीमती तंवर की लेखन विधाओं की बात करें तो,  शायद ही कोई क्षेत्र होगा जो छूटा होगा। गीत, कविता, मुक्तक, हाइकु आदि पद्य के अतिरिक्त के गद्य में समीक्षा, आलेख परिचर्चा, निबंध, कहानियां उनकी साहित्यिक यात्रा में उनके साथी रहे। देश भर की अनेक पत्र पत्रिकाओं (गगनांचल, कदिम्बिनी, अणुव्रत, मुम्बई की युगीन काव्या, कोलकाता की नैणसी, हैदराबाद से प्रकाशित संकल्य व पुष्पक, बड़ौदा की नारी अस्मिता, जबलपुर की दीपशिखा, उदयपुर से प्रकाशित मधुमती, जयपुर की साहित्य समर्था, इंदौर की गुंजन आदि) अनेक पत्रिकाओं ने उनकी रचनाओं को स्थान देकर उनकी विचार शीलता का सम्मान किया।
डॉ शकुंतला तंवर की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुईं जो साहित्य के विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत बनीं। वर्ष 2000 में गीत काव्य "मन में कई समंदर, 2003 में कविता संग्रह "सूर्य की साक्षी में", 2013 में हाइकु संग्रह "मखमली छुअन", तथा कविता संग्रह "मुझे भी कुछ कहना है" प्रकाशित हो चुकी हैं, और एक पुस्तक "चिंतन के शिखर पर" प्रस्तावित है।
अमित टंडन
केवल लेखन ही नही, अपितु संपादन भी श्रीमती तंवर का एक पहलू है। 1989 से वर्ष 2007 तक निरन्तर उन्होंने कॉलेज की पत्रिका मृणालिनी का संपादन किया। इसके अतिरिक्त 2011 में आधुनिक काव्य संचयन सहित अनेक न पत्रिकाओं का संपादन अथवा सह संपादन किया। वे आकाशवाणी पर भी सक्रिय रहीं और समय समय पर अनके गोष्ठियों एवं परिचर्चाओं में उनके उपस्थिति नज़र आई। विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं व समूहों से जुड़ कर असंख्य काव्य गोष्ठियां, परिचर्चा, विमर्श बैठकों का आयोजन व संचालन वे करती रही हैं और ये क्रम अब भी जारी है। मशहूर पत्रिका कदिम्बिनी की ओर से गठित कदिम्बिनी क्लब की अजमेर इकाई का वर्षों तक संचालन करके उन्होंने अजमेर के कवियों-साहित्यकारों को एक सूत्र में जोड़े रखा। ना केवल वरिष्ठ सृजनकार उनके आयोजनों का हिस्सा रहे, बल्कि नवांकुरों को भी वे मंच प्रदान कर आगे बढ़ाती रहीं।
साहित्य सेवा के लिए उन्हें कई बार अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया जाता रहा है। उनकी पुस्तक "मन में कई समंदर" को लखनऊ में केशवचंद्र स्मृति पुरस्कार से नवाज़ा गया; "सूर्य की साक्षी में" पुस्तक को भी वर्ष 2008 में ही जबलपुर में शकुंतला दुबे सम्मान प्रदान किया गया। वर्ष 10 में जैमनी हरियाणवी अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया, वहीं अलवर में जगमग दीप ज्योति की ओर से उन्हें कुमुद टिक्कू सम्मान प्रदान किया गया। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में भी उन्हें साहित्य मधुपर्क व मार्तण्ड सम्मान से नवाज़ा गया।
इतना कार्य करने के बाद भी उनकी उंगलियां अभी भी कलम चलाने से थकी नही हैं औऱ सृजन का सफर जारी है। अजमेर के साहित्य गौरव के रूप में डॉ श्रीमती शकुंतला तंवर का नाम सबसे ऊपर की पंक्ति में है।

-अमित टंडन
7976050493

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग बारह

श्री हरीश वर्यानी
सिंधी भाषा के दैनिक समाचार पत्र हिंदू के अजमेर संस्करण के सम्पादक श्री हरीश वर्यानी अजमेर के पत्रकार जगत व देश के सिंधी साहित्य जगत में जाना पहचाना नाम है। सिंधी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है। एक ओर जहां अरबी लिपि के जानकारों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, उन्होंने सिंधी भाषा का दैनिक गत तकरीबन 37 साल से प्रकाशित-संपादित कर सिंधी भाषा व साहित्य के संरक्षण के लिए अविस्मरणीय काम किया है। इस योगदान के लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। वे तीन बार राजस्थान सिंधी अकादमी के सदस्य रह चुके हैं। आकाशवाणी, जयपुर पर उनकी अनेक वार्ताएं प्रसारित हो चुकी हैं।

जनाब नवाब हिदायत उल्ला
जनाब नवाब हिदायत उल्ला का नाम यूं तो नई पीढ़ी के उभरते हुए पत्रकारों में शुमार है, मगर रिपोर्टिंग में सक्रियता के चलते जल्द ही स्थापित पत्रकारों में गिने जाने लगे हैं। वर्तमान में अजयमेरू प्रेस क्लब के महासचिव हैं। उन्होंने बी.ए. की डिग्री हासिल करने के बाद पत्रकारिता में कदम रखा और जयपुर की एक समाचार व फीचर एजेंसी से जुड़ गए। इसके अतिरिक्त दैनिक हुक्मनामा को भी अपनी सेवाएं दी। वर्तमान में स्वयं का पाक्षिक समाचार पत्र सलाम अजमेर प्रकाशित करते हैं। साथ ही पंजाब केसरी में भी संवाददाता के रूप में काम कर रहे हैं। विशेष रूप से दरगाह इलाके की रिपोर्टिंग में महारत हासिल की है।

डॉ. लाल थदानी
राजस्थान सिंधी अकादमी के अध्यक्ष रहे डॉ. लाल थदानी अजमेर में एक अरसे से सामाजिक गतिविधियों में सर्वाधिक सक्रिय लोगों में शुमार किए जाते हैं। वे भूतपूर्व राजस्व मंत्री स्वगीय श्री किशन मोटवानी के करीबी रहे और प्रमुख समाजसेवी होने के नाते अजमेर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस टिकट के प्रबल दावेदारों में भी शामिल रहे हैं। समाजसेवा के क्षेत्र में वे अनके संस्थाओं से जुड़े हुए हैं, मगर सिंधी सत्कार समिति एवं संदेश संस्था के संस्थापक अध्यक्ष रहते हुए अनेकानेक गतिविधियां संचालित की हैं। वे सन् 1998 में राष्ट्रीय स्तर पर विजयश्री अवार्ड और सन् 2001 में रेड एंड व्हाइट बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं। सन् 1998 में बेस्ट सिटीजन ऑफ इंडिया, सन् 1999 में राज्यपाल के हाथों सिंधी अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त कर चुके हैं। उन्हें लेखन में भी रुचि है। उनकी एक पुस्तक काश मैं कुछ कर पाता और एक गजल संग्रह का प्रकाशन हो चुका है। इसके अतिरिक्त पाक्षिक समाचार पत्र हेमू कालानी के कार्यकारी संपादक हैं। उनके द्वारा लिखित, निर्देशित दहेज आधारित नाटक टूटती रेखाएं और राजनीतिक व्यंग्य मूंगफली का छिलका को अखिल भारतीय स्तर पर पुरस्कार मिल चुका है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग ग्यारह
अजमेर की पत्रकार बिरादरी में कुछ नाम ऐसे भी रहे, जिन्हें फील्ड पर कभी नहीं देखा गया, या यूं कहें कि एडिटिंग डेस्क व पेज डिजाइनिंग से शुरुआत की और अंत तक उसी वर्क प्रोफाइल में रह कर एक इतिहास हो गए।  उनमें से दो ऐसे हैं, जिनसे वर्षों का साथ रहा, मगर मुझ से ज्यादा करीबी वरिष्ठ पत्रकार श्री अमित टंडन की है, लिहाजा उन पर उन्होंने ही कलम चलाना सहज स्वीकार कर लिया।
पेश है उनका नजरिया:-

श्री यशवंत भटनागर
ऐसे नामों में दो लोग याद आते हैं। एक श्री यशवंत भटनागर और दूसरे श्री अनिल दुबे। हालांकि श्री दुबे जब तक अजमेर में रहे तो डेस्क तक सीमित रहे मगर पिछले करीब डेढ़ दशक पहले जबसे किशनगढ़ में भास्कर के ब्यूरो चीफ बनाये गए थे तो वहां फील्ड वर्क में भी उन्होंने जड़ें जमाईं।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर वाली कहावत को चरितार्थ करने वाले पत्रकार साथियों में श्री नरेन्द्र चौहान के बाद श्री यशवंत भटनागर का नंबर आता है। आप फितरतन इन्हें रहीम, कबीर, रैदास, कुछ भी संज्ञा दे सकते हैं। दीन दुनिया से दूर एक शांत धीर गम्भीर इंसान।
श्री भटनागर को पत्रकारिता में 30 साल से ज्यादा ही हो गए होंगे। कॉलेज में पढ़ाई के साथ ही उन्होंने दैनिक नवज्योति में डेस्क पर काम शुरू कर दिया था। ये वो दौर था जब बेरोजगार युवा सौ-डेढ़ सौ रुपए की जेबखर्ची के लिए पार्ट टाइम जॉब अक्सर कर लिया करते थे। और उस पर अखबार की नौकरी, तो एक रुतबा माना जाता था। श्री भटनागर का सफर शुरू तो हुआ नवज्योति से,  लेकिन जल्दी ही एक मोड़ ऐसा आया कि शहर में आधुनिक राजस्थान नाम से एक और अखबार शुरू हुआ और अपने साथी श्री अरुण बरोठिया के साथ श्री भटनागर उसे जमाने मे जुट गए। उस वक्त छोटे, मझोले हर तरह के अखबार की अहमियत थी और अखबारनवीसों का रुतबा हुआ करता था। आधुनिक राजस्थान ने भी जल्दी पैर जमाए, मगर श्री भटनागर की किस्मत कहीं और लिखी थी। इस बीच रोज़मेल नाम से एक और नया अखबार शुरू हुआ और स्थापित करने वाली टीम में भी श्री भटनागर का नाम जुड़ा। वो अखबार बहुत तेजी से बढ़ा और शहर में छा गया। हालांकि कुछ समय बाद किन्हीं कारणों से रोज़मेल बंद हो गया और श्री भटनागर चूंकि अब पत्रकारिता में रम चुके थे, तो किसी और क्षेत्र में जॉब तलाशने की जगह अखबार में ही काम ढूंढा और उस वक्त के सबसे बड़े टेबलॉयड दैनिक न्याय से जुड़ गए। हर अखबार में उन्होंने डेस्क और समाचारों के संपादन का कार्य ही किया। न्याय में भी हालांकि कुछ टूटन पैदा हुई और कुछ समय के लिए वो अजमेर से बंद हुआ। मगर तब न्याय के अन्य साझेदारों ने अलवर में संस्करण खोला तो श्री भटनागर अपने एक अन्य साथी वरिष्ठ पत्रकार श्री ओम माथुर के साथ अलवर चले गए। (श्री माथुर वर्तमान में दैनिक नवज्योति के स्थानीय संपादक हैं)
अलवर में भी दानापानी ज्यादा नहीं था। इसी दरम्यान न्याय के और साझेदार ने अहमदाबाद में एक अखबार गुजरात वैभव शुरू किया और श्री भटनागर वहां चले गए। कुछ समय वहां कार्य करने के बाद अजमेर लौटे और पुन: उसी दैनिक नवज्योति को जॉइन किया, जहां से कैरियर की शुरुआत की थी। उसके बाद कई साल तक वहीं डेस्क पर संपादन किया। 1997 जब भास्कर ने अजमेर में कदम रखा, तब श्री भटनागर वहां जुड़े और सिटी डेस्क, डाक डेस्क, स्क्रीनिंग डेस्क आदि कई डेस्क के प्रभारी के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
ये एक ऐसा सफर था, जिसमें मंजि़ल का पता नहीं था। सिर्फ सड़क थी और चलते जाना था। बस एक जुनून था कि काम करना है। बिना रिपोर्टिंग किये सिर्फ डेस्क पर काम करके पत्रकारिता में एक लंबी पारी खेलना और मीडिया जगत में नाम बनाना आसान नहीं होता। शायद ऐसे उदाहरण मिलें भी नहीं। मगर श्री भटनागर एक अपवाद बने। खबरों का ऐसा ज्ञान, भाषा पर पकड़, सम्पादन में कसावट। अनेक न्यू कमर्स रहे, जिन्होंने उनके अधीन रह कर काम सीखा। श्री भटनागर से मार्गदर्शन पाने वालों में राजस्थान पत्रिका जयपुर संस्करण के स्थानीय संपादक श्री अमित वाजपेयी भी हैं। ऐसे ही अनेक वर्तमान पत्रकार व डेस्क संपादक उनके अधीन रहे और आज अच्छा काम कर रहे हैं।

श्री अनिल दुबे
अब कुछ बात श्री अनिल दुबे की। श्री दुबे आए तो जोधपुर से थे, मगर अजमेर के होकर रह गए। भास्कर में संपादन डेस्क पर काम करते-करते उनमें जब प्रबंधन को योग्यता नजऱ आई, तो उन्हें किशनगढ़ ब्यूरो के प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी गई। जैसा पूर्व में अजऱ् किया कि श्री दुबे ने कभी बिरले ही रिपोर्टिंग की होगी, क्योंकि वे अजमेर संस्करण में डेस्क कार्मिक ही थे। मगर किशनगढ़ में जब प्रभारी के रूप में रिपोर्टिंग का मोर्चा संभाला तो कई आयाम स्थापित किये। मार्बल नगरी की महत्ता के अनुरूप स्थानीय समाचारों को जिले भर में शाया कर वहां अखबार के लिए अच्छा मार्केट तैयार किया। यूं कहें कि भास्कर अखबार को किशनगढ़ में स्थापित करने में श्री दुबे की महत्वपूर्ण भूमिका थी, तो गलत नहीं होगा। असल में ब्यूरो चीफ पर ही विज्ञापन, परिशिष्ट, स्पेशल पृष्ठ आदि की जि़म्मेदारी अधिक होती है। सोर्स डेवलप करके समाचार की संख्या बढ़ाना, अखबार की बिक्री बढ़ाना, रेवेन्यू जनरेट करना, सब ब्यूरो चीफ के ऊपर होता है, और श्री दुबे सबसे लंबे समय तक भास्कर के लिए किशनगढ़ में इस पद पर रहे और बखूबी अपने काम को अंजाम देते रहे।
-अमित टंडन
7976050493