बुधवार, 18 दिसंबर 2019

स्मार्ट सिटी की कछुआ चाल पर कितनी विह्वल होगी स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा की आत्मा

गुरुवार, 19 दिसंबर। आज से ठीक चार साल पहले अजमेर के एक ऐसे लाल को काल के क्रूर हाथों ने हमसे छीन लिया, जिसने स्मार्ट सिटी बनने वाले अजमेर को एक सपना दिया था। वह सपना कितना कीमती था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनको उस सपने के लिए बाकायदा पुरस्कृत किया गया।
आपको याद होगा कि मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पिछले कार्यकाल में अमेरिका यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ मिल कर अजमेर सहित दो शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की थी। इसी सिलसिले में 2 अक्टूबर 2015 को अजमेर नगर निगम ने ऑन लाइन सुझाव मांगे थे। तब शहर के जाने-माने वकील व पत्रकार स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा ने दस पेज का एक सुझाव सौंपा था कि कैसे इस पुरानी बसावट वाले शहर को स्मार्ट किया जा सकता है। उनके सुझाव को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए निगम ने 29 नवंबर 2015 को उन्हें एक समारोह में प्रमाण पत्र के साथ पंद्रह हजार रुपए का नकद पुरस्कार दिया, जिसमें तत्कालीन शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी, मेयर धर्मेन्द्र गहलोत व आयुक्त एच. गुईटे मौजूद थे। समझा जा सकता है कि उन्होंने कितने महत्वपूर्ण सुझाव दिए होंगे। आज जब हम स्मार्ट सिटी की कछुआ चाल को देखते हैं तो स्वर्गीय श्री हाड़ा की पांचवीं पुण्यतिथी पर बरबस उनकी याद आ जाती है। अगर वे हयात होते तो अपनी आंखों से देखते कि उन्होंने जो सपना नगर निगम को सौंपा था, उसका हश्र क्या हो रहा है? बेशक उनकी आत्मा विह्वल होगी कि उन्होंने जो सुझाव दिए, जिन्हें कि सराहा भी गया, उस पर अमल में कितनी कोताही बरती जा रही है।
किसी समारोह में पति के साथ श्रीमती चांदनी हाडा
प्रसंगवश बता दें कि स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा पेशे से मूलत: वकील थे, मगर पत्रकारिता में भी उनको महारत हासिल थी। लंबे समय तक दैनिक नवज्योति में कोर्ट की रिपोर्टिंग की। बाद में दैनिक भास्कर से जुड़े, जहां उनके भीतर का पत्रकार व लेखक पूरी तरह से पुष्पित-पल्लवित हुआ। उन्होंने पत्रकारिता में आए नए युवक-युवतियों को तराश कर परफैक्ट पत्रकार बनाया। वे एक संपूर्ण संपादक थे, जिनमें भाषा का पूर्ण ज्ञान था, समाचार व पत्रकारिता के सभी अंगों की गहरी समझ थी। अजयमेरू प्रेस क्लब का संविधान बनाने में उनकी अहम भूमिका थी। उनकी अंत्येष्टि के समय पार्थिव शरीर से उठती लपटों ने मेरे जेहन में यह सवाल गहरे घोंप दिया कि क्या कोई कड़ी मेहनत व लगन से किसी क्षेत्र में इसलिए पारंगत होता है कि वह एक दिन इसी प्रकार आग की लपटों के साथ अनंत में विलीन हो जाएगा? खुदा से यही शिकवा कि यह कैसा निजाम है, आदमी द्वारा हासिल इल्म और अहसास उसी के साथ चले जाते हैं। वे अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर मुझ सहित अनेक लोगों के जेहन में जिंदा हैं। चलो, वे बहुत सारा अर्जित ज्ञान अपने साथ ले गए, लेकिन संतोष है कि नगर निगम को अपना सपना जरूर सौंप गए। मगर साथ ही अफसोस भी है कि उस सपने को पूरा होने पर नौ दिन चले, अढ़ाई कोस वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।
स्वर्गीय श्री हाड़ा की पुण्यतिथी पर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चांदनी हाड़ा के अहसासात को जानने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ इस तरह अपना अनुभव बांटा:- उन्होंने पुरस्कार स्वरूप मिली राशि से अपने पिता, बहिन, पत्नी, पुत्र व छोटे भाई के दोनों बच्चों को रणथंभोर की यात्रा करवाई। उन्होंने करीब आठ सौ सीढिय़ां चढ़ कर गणेश जी की प्रतिमा से क्या कुछ मांगा था, समझ में नहीं आया। मगर उसका परिणाम ये हुआ कि पिताश्री का गणेश जी पर से विश्वास उठ गया। आज वे कहते हैं कि मैं गणेश जी को नहीं मानता। स्वाभाविक है कि जिस पिता ने वृद्धावस्था में अपने जवान बेटे खोया होगा, उसकी आस्था तो टूटेगी ही। मेरे व परिवार के सपने तो विधाता ने छीन लिए मगर मेरे पति को असली श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके सपने को हम अजमेर वासी साकार होता हुआ देखें।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग बाईस
श्री विकास छाबड़ा
छोटे समाचार पत्रों के संचालकों में श्री विकास छाबड़ा आज एक जाना-पहचाना नाम है। एक पत्रकार के रूप में उनकी सोच पूरी तरह से सकारात्मक है। बेशक सिस्टम में खामी पर पूरा प्रहार करते हैं, मगर व्यक्ति विशेष के खिलाफ लिखने से सदैव परहेज रखते हैं। पीत पत्रकारिता से उन्हें सख्त नफरत है। यही प्रवृति उन्हें साफ सुथरे पत्रकारों की श्रेणी में खड़ा करती है। इसी आधार पर वे किशनगढ़ उपखंड व अजमेर जिला स्तर पर सम्मानित हो चुके हैं।
अजमेर जिले में छोटे समाचार पत्रों की दुनिया में श्री विकास छाबड़ा संभवत: इकलौते पत्रकार हैं, जो अपने पाक्षिक समाचार पत्र रोशन भारत को दस साल से न केवल नियमित प्रकाशित कर रहे हैं, अपितु उसकी विषय वस्तु पर पूरा ध्यान देते हैं। कहने का तात्पर्य ये है कि उनका हर अंक बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से पठनीय बनाया जाता है। उसमें आपको कॉपी-पेस्ट अथवा इंटरनेट से मैटर उठा कर पेज भरने की प्रवृत्ति कभी नहीं पाएंगे। मल्टी कलर प्रिटिंग के साथ उम्दा क्वालिटी का पेपर काम में लेते हैं।  जाहिर तौर पर छपाई महंगी होती होगी, मगर उसकी भरपाई विज्ञापनों से भलीभांति कर लेते हैं। उनका सारा ध्यान जनसमस्याओं व ज्वलंत विषयों पर रहता ही है, साथ ही वर्तमान भौतिक युग के अनुसार कमर्शियल आस्पेक्ट का पूरा ख्याल रखते हैं, जो कि किसी भी समाचार पत्र को जिंदा रहने के लिए बेहद जरूरी होता है। फ्री डिस्ट्रीब्यूशन का कोई सिस्टम शुरू से ही नहीं रखा गया। उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण व सरकारी महकमों को छोड़ कर सभी पेड कस्टमर बनाए हैं। अखबार को प्राण वायु देने के लिए मार्केटिंग पर पूरा फोकस रखा व इसके लिए टीम भी बना रखी है।
श्री विकास छाबड़ा ने दैनिक भास्कर की सरक्यूलेशन एजेंसी से पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया। उसके बाद भास्कर की एड एजेंसी को बहुत खूब चलाई। इसी दरमियां दैनिक भास्कर का किशनगढ़ ब्यूरो ऑफिस इनके बिल्डिंग परिसर में खुल गया। उन्हें अखबार में लिखने का शौक तो जब ग्यारहवीं क्लास में थे, तभी लग गया। उस वक्त नवज्योति में मंच हमारा आवाज आपकी नाम से पाठकों के लिए कॉलम में वे शहर की समस्याओं को उठाया करते थे। उन्होंने सीकर से प्रकाशित दैनिक उद्योग आस पास व उसके बाद अजमेर से प्रकाशित सरेराह अखबार में भी बतौर ब्यूरो चीफ काम किया। उसके बाद खुद का अखबार रोशन भारत शुरू किया।
इससे पूर्व श्री छाबड़ा ने किशनगढ़ दर्पण, मकराना दर्पण, पीसांगन दर्पण, रूपनगढ़ दर्पण, मार्बल डायरेक्ट्री जैसी पुस्तकों के साथ किशनगढ़ जैन दिग्दर्शिका, किशनगढ़ अग्रवाल दिग्दर्शिका, शासन प्रशासन पुलिस सम्पर्क सूत्र दिग्दर्शिका, जैन दर्पण आदि कई पुस्तकों का प्रकाशन किया है।
श्री छाबड़ा ने रोशन भारत के अजमेर संस्करण के साथ ही जयपुर संस्करण का प्रकाशन भी शुरू किया। अजमेर संस्करण का विमोचन पिंक सिटी प्रेस क्लब जयपुर में किया तो जयपुर संस्करण का विमोचन काचरिया पीठ के पीठाधीश्वर जयकृष्ण जी देवाचार्य के सान्निध्य में किशनगढ़ के होटल हेलीमेक्स में किया गया। उनकी एक पुस्तक किशनगढ़ दर्पण के एक अंक का विमोचन में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने किया।
पाठकों से बेहतर जुड़ाव के लिए फंडे भी इस्तेमाल करते हैं। हाल ही में रोशन भारत ने अपने पाठकों के लिए जीतो इनाम की शानदार क्विज शुरू की। किशनगढ़ के आर.के. कम्यूनिटी सेन्टर में हाल ही आयोजित पुस्कार वितरण समारोह का स्तर इतना भव्य रखा गया कि लोग इसे किशनगढ़ का नं. 1 प्रोग्राम का दर्जा दे रहे है।
श्री छाबड़ा केवल स्वयं काम करने में विश्वास न करके स्टॉफ व टीम से काम करवाना ज्यादा बेहतर समझते है। उनका मानना है कि जो काम पैसे से हो सकता है, उसके लिए खुद मत उलझो। अपनी शक्ति और बेहतर करने में लगाओ। यही उनकी सफलता का राज प्रतीत होता है। एक पाक्षिक समाचार के सफलतम प्रकाशन के जरिए शानदार लिविंग स्टैंडर्ड मैन्टेन करना कोई उनसे सीखे।

-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

एक कदम ने जीवन की दिशा बदल दी

स्वाभिमान बडी कीमत वसूल करता है

यह शृंखला इसलिए आरंभ की है, ताकि वह सब कुछ जो मेरे जेहन में दफन है, वह आपको बांट दूं, ताकि जब मैं इस फानी दुनिया से अलविदा करूं तो इन यादों का बोझ साथ न रहे।

बात सन् अगस्त 1983 की है। मेरे पिताश्री तत्कालीन वरिष्ठ जिला शिक्षा अधिकारी स्वर्गीय श्री टी. सी. तेजवानी के नागौर में निधन के बाद पूरा परिवार अपने पैतृक शहर अजमेर में लौट आया। यहां किसी अखबार में नौकरी पाने के मकसद से नागौर के सूचना व जनसंपर्क अधिकारी श्री के. बी. एल. माथुर से एक सिफारिशी पत्र अजमेर के सूचना व जनसंपर्क अधिकारी श्री देवी सिंह नरूका के नाम ले कर आया। उन्होंने मुझे तब शीघ्र प्रकाशित होने जा रहे दैनिक रोजमेल के स्टेशन रोड, मार्टिंडल ब्रिज के पास स्थित दफ्तर में स्थानीय संपादकीय प्रभारी स्वर्गीय श्री राजनारायण बरनवाल के पास भेजा। उन्होंने कहा कि अखबार शुरू होने को है, लेकिन फिलहाल पूरा स्टाफ रख लिया है, अत: बाद में कभी आना। मैं वहां से दैनिक नवज्योति गया। अपने नाम की पर्ची प्रधान संपादक श्री दीनबंधु चौधरी के चैंबर में भेजी। मैं बाहर बैठा इंतजार कर ही रहा था कि वहां दैनिक नवज्योति के नागौर जिला संवाददाता श्री माणक गौड आ गए। उन्होंने वहां देख कर सवाल किया, कैसे आए? मैंने प्रयोजन बताया। वे बोले, अरे, चलो में ही आपको चौधरी जी से मिला देता हूं। वे मुझे अंंदर ले गए। मेरी तारीफ करते हुए चौधरी जी से बोले कि यह लड़का बहुत टेलेंटेड है। चौधरी जी ने बिना कोई सवाल-जवाब किए ही कह दिया कि कल ही ज्वाइन कर लो। तनख्वाह चार सौ रुपए प्रतिमाह मिलेगी। मैं नवज्योति से बाहर निकल कर सोचने लगा कि इतने बड़े अखबार में मैं काम भी कर पाऊंगा या नहीं। बड़े-बड़े पत्रकार मुझे जमने देंगे या नहीं। सोचते-सोचते गली पार कर आधुनिक राजस्थान पहुंच गया। वहां प्रधान संपादक स्वर्गीय श्री दिलीप जैन से मिला। वे पहले से परिचित थे, क्योंकि नागौर रहते हुए मैं आधुनिक राजस्थान को समाचार भेजा करता था। उन्होंने भी मेरे आग्रह को तुरंत स्वीकार करते हुए अगले ही दिन से ज्वाइन करने को कह दिया। मुझे यहां थोड़ा सा अपनापन लगा। छोटा अखबार है। लगा कि यहां जल्द ही पकड़ बना लूंगा। हुआ भी वही। दूसरे ही दिन मैंने ज्वाइन कर लिया। आरंभ में मुझे अंदर के पेजों के संपादन का काम मिला। कोई छह माह ही हुए थे कि तत्कालीन संपादकीय प्रभारी श्री सतीश शर्मा ने मेरी प्रतिभा को देखते हुए कहा कि आप फ्रंट पेज पर आ जाओ, मैं सिखाऊंगा। वे पेश से तो मास्टर थे, पत्रकारिता के भी मास्टर थे। जल्द ही मैने स्वतंत्र रूप से प्रथम पेज का संपादन आरंभ कर दिया। अपने ही मार्गदर्शन में उन्होंने मुझे एडिटोरियल का इंचार्ज भी बना दिया। यहां तकरीबन पांच साल काम किया। वहां बहुत कुछ सीखा। इसके बाद दैनिक न्याय के संपादकीय प्रभारी स्वर्गीय श्री राजहंस शर्मा ने मुझे बुलाया और कहा कि पिताश्री बाबा विश्वदेव शर्मा ने मुझ पर अखबार का दायित्व सौंपा है, मेरा विश्वास है कि आप इंचार्जशिप संभाल लेंगे। मैने ज्वाइन कर लिया। मुझे फ्री हैंड दिया गया। मैने भी जम कर बैटिंग की। इस प्लेटफार्म ने मुझे पहचान दी। दैनिक न्याय के भी कई संस्मरण हैं, जो फिर कभी शेयर करूंगा। वहां पांच साल काम करने के बाद किसी बात को लेकर स्वाभिमान की रक्षार्थ इस्तीफा दे दिया। बाबा इस्तीफा मंजूर करने को तैयार नहीं थे, मगर मेरी जिद के चलते उन्हें स्वीकार करना ही पड़ा। विदाई देते समय उस जमाने के दबंग पत्रकार की आंखें नम होने पर अपनी पीठ थपथपाई कि मैने निष्ठा व अपने काम के दम पर उनका दिल जीत लिया है।
खैर, फ्री होते हुए श्री दिलीप जैन ने बुलवा लिया। वहां कुछ समय काम किया। चूंकि मिजाज से अति संवेदनशील हूं, इस कारण फिर किसी बात पर स्वाभिमान की खातिर इस्तीफा दे दिया। जैसे ही तत्कालीन सांध्य दैनिक दिशादृष्टि के संपादक श्री राधेश्याम शर्मा को पता लगा, उन्होंने मुझे बुलवाया और कहा कि वे अब दिशा दृष्टि को सांध्य की जगह प्रात:कालीन करना चाहते हैं और उसका दायित्व मुझे सौंपना चाहते हैं। मैने प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया। करीब दो साल काम करने के बाद वहां से भी जी उचट गया। केवल स्वाभिमान के कारण। उन्होंने भी मुझे बड़ी मुश्किल से छोड़ा। छोड़ कर घर बैठ गया। सन् 1996 में दैनिक भास्कर का आगमन हुआ। वहां के कई प्रसंग याद हैं, मगर फिलहाल इतना ही। तकरीबन आठ साल तक सिटी चीफ रहने के बाद जयपुर तबादला हो गया। वहां मुझे पहले स्टेट डेस्क पर बैठाया गया और कुछ समय बाद ही सिटी एडिशन का जिम्मा दिया जा रहा था। वह वाकई की-प्रोस्ट थी, मगर माताश्री की तबियत खराब रहने के चलते छह माह बाद ही इस्तीफा दे दिया। तत्कालीन संपादक श्री एन. के. सिंह ने इस्तीफा मंजूर न करते हुए वापस अजमेर भेज दिया। यहां तत्कालीन संपादक श्री इंदुशेखर पंचोली से पटरी बैठी नहीं, जो कि बैठनी भी नहीं थी, क्योंकि वे मुझ से जूनियर थे। यहां भी स्वाभिमान आड़े आया। खैर, इसकी भी एक कहानी है, जिसका जिक्र फिर कभी करूंगा। कोई तीन दिन बाद ही फिर इस्तीफा दे दिया। कुछ समय खाली बैठा रहा। फिर युवा भाजपा नेता व समाजसेवी श्री भंवर सिंह पलाड़ा ने श्री सुरेन्द्र चतुर्वेदी के माध्यम से बुलवा कर अखबार शुरू करने की मंशा जताई। हम दोनों ने उन्हें साफ कह दिया कि यह घाटे का सौदा है, पर वे नहीं माने, इस पर हम तैयार हो गए। हमने स्वर्गीय श्री नवल किशोर सेठी से सरे-राह टाइटल लिया। करीब पौने दो साल काम करने के बाद स्वाभिमानवश इस्तीफा दे दिया। श्री पलाड़ा मुझे नहीं छोडऩा चाहते थे, लेकिन मैं भी जिद पर अड़ गया। विदाई के वक्त मैने उनका मन भी बाबा की तरह द्रवित देखा।
खैर, उसके बाद दैनिक महका भारत के अजमेर संस्करण के स्थानीय संपादक के रूप में काम किया। अखबारों की प्रतिस्पद्र्धा के कारण वह समाचार पत्र अनियमित हो गया। फिर कुछ समय के लिए दैनिक न्याय सबके लिए में संपादक के रूप में काम किया। आर्थिक संकट के कारण अखबार बंद करने की नौबत आ गई। उसके बाद मेरे परम मित्र स्वामी न्यूज के एमडी श्री कंवल प्रकाश किशनानी के सहयोग से अजमेरनामा डॉट कॉम नाम से न्यूज पोर्टल शुरू किया, जो कि अब भी चल रहा है।
लब्बोलुआब, जीवन की इस यात्रा से एक ही निष्कर्ष निकला कि यदि मैं दैनिक नवज्योति में मिल रही नौकरी को स्वीकार कर लेता तो जीवन में इतना भटकाव नहीं होता और आज वहां स्थानीय संपादक पद पर पहुंच चुका होता। दूसरा सबक ये कि स्वाभिमान बड़ी कीमत वसूलता है। मेरे परिवार ने बहुत सफर किया। जिस स्वाभिमान की मैने दुनिया में रक्षा की, उससे अपने परिवार के सामने समझौता करना पड़ा। मैं उसे वह नहीं दे पाया, जिसे देना मेरा फर्ज था।
प्रसंगवश अतीत में जरा पीछे जा कर बताना चाहता हूं कि सन् 1979 में पत्रकारिता की शुरुआत लाडनूं ललकार के संपादक स्वर्गीय श्री राजेन्द्र जैन ने करवाई। मुझे सहायक संपादक बनाया। सन् 1980 से 1983 तक आधुनिक राजस्थान के अतिरिक्त जयपुर से प्रकाशित दैनिक अणिमा व दैनिक अरानाद के संवाददाता के रूप में काम किया।
अखबारी जीवन के अनेक संस्मरण मेरे जेहन में अब भी सजीव हैं। उनका जिक्र फिर कभी करूंगा।

सोमवार, 4 नवंबर 2019

अनिता भदेल आाखिर में अपना पत्ता खोलेंगी?

हालांकि जिस दिन अजमेर नगर निगम के मेयर की लॉटरी अनुसूचित जाति की महिला के नाम पर निकली, अजमेर दक्षिण से मौजूदा विधायक व पूर्व राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल ने उसी दिन साफ कर दिया था कि वे मेयर पद का चुनाव नहीं लड़ेंगी, पार्टी कहेगी तो भी नहीं, मगर कानाफूसी है कि वे आखिरी समय में दावा ठोकेंगी।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि श्रीमती भदेल ने एक रणनीति के तहत मेयर पद की दावेदारी से अपने आप को अलग रखा है। अगर वे जरा सी भी रुचि दिखातीं तो उनके विरोधी अभी से कार सेवा में जुट जाते। वैसे भी अभी बहुत टाइम पड़ा है। जानकारों का मानना है कि श्रीमती भदेल के लिए विपक्ष के एक विधायक के तौर पर चार साल टाइम खराब करने की बजाय आगामी पांच साल के लिए मेयर बनना ज्यादा उपयोगी है। अभी वे सिर्फ एक विधानसभा का प्रतिनिधित्व करती हैं, मेयर बनने पर दो विधानसभा क्षेत्रों से भी अधिक इलाके की प्रतिनिधि हो जाएंगी। इसके अतिरिक्त स्मार्ट सिटी के तहत अभी करोड़ों रुपए के काम होने हैं। हालांकि यह तय है कि जब मेयर का चुनाव होगा, तब तक जिला प्रमुख वंदना नोगिया पद मुक्त हो जाएंगी, इस कारण दमदार तरीके से दावेदारी करेंगी, मगर उनसे अधिक दमदार दावेदारी श्रीमती भदेल की रहेगी। वंदना को मौका तो मिला, मगर उन्होंने उसका फायदा उठा कर जाजम नहीं बिछाई। रहा सवाल श्रीमती भदेल का तो अब ये उन पर निर्भर है कि वे किसी वार्ड से चुनाव लड़ कर मेयर पद की दावेदारी में आएंगी, या फिर सीधे मेयर पद की दावेदारी करेंगी। ज्ञातव्य है कि भले ही सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया हो कि मेयर का चुनाव पार्षदों में से ही होगा, मगर सीधे मेयर पद का चुनाव लडऩे की अधिसूचना अब भी वजूद में है। श्रीमती भदेल अभी भले ही अपने स्टैंड पर कायम हों, मगर राजनीति समझने वाले मानते हैं कि वे आखिरी समय में मैदान में आ डटेंगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

हेमंत भाटी की पत्नी का दावा सामने आते ही मची हलचल

कांग्रेस नेता हेमंत भाटी ने अजमेर नगर निगम के अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित मेयर पद के लिए अपनी पत्नी श्रीमती सुनीता भाटी  का जैसे ही दावा ठोका है, गुलाबी सर्दी के बीच यकायक सियासत में गरमाहट आ गई है।
ज्ञातव्य है कि अब तक की जानकारी के अनुसार अनुसूचित जाति के पुरुष के सामान्य वर्ग की महिला के साथ शादी होने पर महिला को अनुसूचित जाति के तहत मिलने वाले लाभ नहीं मिला करते, लेकिन भाटी ने एक अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा है कि उनकी पत्नी मेयर पद के लिए दावा करने की पात्रता रखती हैं। एक बयान में उन्होंने बताया कि गत 21 अक्टूबर को राज्यपाल ने जो अधिसूचना जारी की है, उसमें यह स्पष्ट है कि सामान्य वर्ग की महिला को अनुसूचित जाति के पुरुष के साथ शादी करने पर उसे भी अनुसूचित जाति के सारे लाभ मिलेंगे। हालांकि अधिसूचना में ये अलग से स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या वह चुनावों में भी आरक्षण के लाभ पर लागू होगी, मगर मोटे तौर पर तो यही माना जा रहा है। राज्यपाल की ओर से जारी अधिसूचना की खबर 22 अक्टूबर की राजस्थान पत्रिका में भी छपी है। उसकी कटिंग इस समाचार के साथ दी जा रही है।
खैर, बात भाटी के दावे की। जैसे ही उन्होंने दावा किया है, उन दावेदारों की पेशानी पर लकीरें खिंच गई हैं, जो कि यह सोच कर निश्चिंत थे कि भाटी की पत्नी चुनाव लडऩे की पात्रता नहीं रखतीं हैं। अनुसूचित जाति के पुरुषों की पत्नियों के साथ-साथ अनुसूचित जाति की महिला पार्षदों को भी तकलीफ होना स्वाभाविक है, जो चुनाव की तैयारियों में जुटी हुई हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि राजनीतिक रसूखात, जनाधार व साधन संपन्नता के लिहाज से भाटी का दावा अन्य की अपेक्षाकृत भारी पड़ेगा। भले ही वे विधानसभा चुनाव में हार गए हों, मगर नगर निगम के पिछले चुनाव में उन्होंने जिस तरह अपना वर्चस्व साबित किया है, वह सबके सामने है। अकेले उन्हीं के दम पर कई पार्षद जीत कर आए थे। निगम में भाजपा को चुनौती उनके दक्षिण क्षेत्र के पार्षदों के कारण दी जा सकी, वरना उत्तर में तो हालत बहुत खराब थी। बहरहाल, अब देखते हैं कि आगे-आगे होता है क्या?
-तेजवानी गिरधर
7742067000