गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

अजमेर के पत्रकारों-साहित्यकारों की लेखन विधाएं

भाग चौबीस
श्री विजय कुमार शर्मा
पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब 36 साल से सक्रिय श्री विजय कुमार शर्मा अजमेर में कदाचित पहले पत्रकार हैं, जो तब इंटरनेट का इस्तेमाल किया करते थे, जब स्थानीय पत्रकार इस बारे में कुछ नहीं जानते थे। सोशल मीडिया नेटवर्किंग पर न्यूज पोर्टल व यू ट्यूब चैनल के क्षेत्र में भी वे सर्वाधिक सक्रिय हैं। पत्रकारिता के केरियर में उन्होंने देश में जितना भ्रमण किया है, उसे देखते हुए उन्हें अगर यायावर पत्रकार कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
वर्ष 1984 में हायर सेकंडरी परीक्षा पास करने के तुरंत बाद राजस्थान में पत्रकारिता की स्कूलिंग में अव्व्ल दैनिक न्याय से पत्रकारिता की शुरुआत की। उनका यायावर जीवन 1992 में आरम्भ हुआ, जब पारिवारिक कारणवश दैनिक न्याय के मालिक स्वर्गीय बाबा श्री विश्वदेव शर्मा ने अहमदाबाद से गुजरात वैभव समाचार पत्र आरम्भ किया। गुजरात के पहले हिन्दी दैनिक माने जाने वाले गुजरात वैभव के समाचार सम्पादक के रूप में उन्होने करीब दो वर्ष अपनी सेवाएं दीं। वहीं उनके तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल से नजदीकी सबंध बने। इसी प्रकार प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से उनकी मुलाकात भाजपा के खानपुर स्थित गुजरात प्रदेश कार्यालय में हुई, जब श्री मोदी खानपुर कार्यालय के ही एक कमरे में रहते थे। गुजरात का पानी उन्हें सूट नहीं किया और वे वापस राजस्थान आ गये। 1995 में दक्षिण भारत के पहले हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र चमकता सितारा के सम्पादन के लिए वे चेन्नई चले गये। वहां भी राजनीतिक पहुंच बनाई और जयललिता तथा करुणानिधि से सम्बन्ध कायम किए। स्वयं श्री शर्मा ने जानकारी दी थी कि जयललिता के शासनकाल में उनके बारे में यह बात चर्चित थी कि जयललिता की कोई भी अंदरूनी जानकारी अथवा शासन-प्रशासन की किसी भी खबर के लिए विश्वसनीय जानकारी चाहिए तो उनसे सम्पर्क किया जाए।
सूफियाना मिजाज के चलते दक्षिण भारत से भी उनका जल्द ही मोह भंग हो गया और 1997 में मध्यप्रदेश आ गये। वहां कुछ समय दैनिक जागरण के रीवा संस्करण में प्रभारी सम्पादक रहे और उसके बाद जबलपुर में दैनिक स्वदेश के कार्यकारी सम्पादक रहे। उन्होंने बताया कि भोपाल में एक क्रिकेट मेच की कवरेज करने के दौरान बीना के तत्कालीन विधायक श्री सुनील जैन और तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह के माध्यम से दैनिक भास्कर के मालिक श्री सुधीर अग्रवाल से परिचय हुआ और उन्होंने दैनिक भास्कर के राजस्थान संस्करण में जोब ऑफर किया। दैनिक भास्कर के जयपुर संसकरण में मूर्धन्य पत्रकार श्री कमलेश्वर जी के सान्निध्य में श्री रविन्द्र शाह और श्री अनिल लोढ़ा के साथ फ्रंट पेज डेस्क संभाली। नवीनतम टैक्नोलॉजी में रुझान और बेहतर कार्यक्षमता देखते हुए उन्हें दैनिक भास्कर के बीकानेर, गंगानगर और जोधपुर संस्करण में सेंट्रल डेस्क इंचार्ज बनाया गया।
1998 के अंत में पिताश्री का देहावसान होने के कारण वे पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करने वापस अजमेर आ गये और दैनिक नवज्योति में उन्हें अंचल डेस्क का प्रभारी बनाया गया। जब दैनिक नवज्योति में डिजिटल क्रांति आई और प्रत्येक पत्रकार की कम्प्यूटर ज्ञान आवश्यक कर दिया गया तो उन्होने सभी को कम्प्यूटर पर हिन्दी में कार्य सिखाने का बीड़ा उठाया और सफलता भी हासिल की। पूर्व राज्यसभा सांसद श्री औंकार सिंह लखावत, तत्कालीन शिक्षा उपनिदेशक श्रीमती ललिता गोयल और उनके पति जिला शिक्षा अधिकारी रहे श्री कृष्ण मुरारी गोयल, डायबिटीज विशेषग्य डॉ. रजनीश सक्सेना और शहर के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों को घर जाकर उन्होने कम्प्यूटर सिखाया। वर्ष 2000 में दूरसंचार विभाग की कम्पनी संचारनेट ने जब शहर में पहले 25 इंटरनेट कनेक्शन दिए, तब उनमें से एक उनका भी था। वर्ष 2000 में ही स्थापित अजयमेरु प्रेस क्लब के संस्थापक सदस्यों में से एक सक्रिय सदस्य विजय कुमार शर्मा भी थे।
वर्ष 2005 के अंत में चेन्नई के हिन्दी समाचार पत्र दक्षिण भारत ने उन्हें अपने यहां बुलाया और ये फिर एक बार दक्षिण भारत चले गये। वर्ष 2011 में माता का स्वास्थ्य खराब होने पर वे वापस अजमेर आ गये और अपनी पत्रकारिता को सरे राह टीवी चैनल में क्राइम रिपोर्टर के रूप में आगे बढ़ाया। इसी साल में उन्होने डिजिटल मीडिया के साथ कदम से कदम बढ़ाते हुए वेब पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा और www.indiannewstv.in वेब चेनल की शुरुआत की जो आज 166 देशों में विजिट किया जाता है। साथ ही सोशल मीडिया मार्केटिंग और कंटेंट राइटिंग भी करते हैं। गूगल प्ले स्टोर पर इनके एप्प indiannewstv ने बड़े-बड़े नेशनल और इंटरनेशनल न्यूज एप्स को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान प्राप्त किया है और प्ले स्टोर पर 5 स्टार रेंकिंग पाने वाला एकमात्र एप्प है।
इसे उनकी सबसे बड़ी कमी कहा जाए या खूबी, यायावर प्रकृति के श्री विजय कुमार शर्मा कभी एक स्थान पर टिक कर नहीं रहे। जब भी इनसे सम्पर्क किया जाता है, तो वे एक नये स्थान पर होते हैं। फिलहाल वे दिल्ली में हैं। हां, एक खूबी उनमे यह है कि अपने व्यवहार कुशलता के कारण जहां जाते हैं, अपने दोस्तों की संख्या में इजाफा ही करते हैं। 35 साल से ज्यादा के पत्रकारिता जीवन में उन्होने अब तक एक बार भी अधीस्वीकरण, भूमि या अन्य किसी भी सरकारी सुविधा या सम्मान के लिए आवेदन नहीं किया। उनका कहना है कि मेरा सबसे बड़ा सम्मान 166 देशों में फैले मेरे लाखों विजिटर्स और उनकी प्रतिक्रियाएं हैं।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

बुधवार, 22 जनवरी 2020

अगला चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं रलावता?

विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से हारने के बाद भी महेन्द्र सिंह रलावता ने हिम्मत नहीं हारी है। सच तो ये है कि वे पहले से भी कहीं अधिक सक्रिय हैं। उनका दफ्तर जिस तरह से काम कर रहा है, इतना तो उनके शहर कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहते भी नहीं था। जन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सरकार से लगातार संपर्क में रहते हैं। सरकार भी उन्हें एक विधायक सा दर्जा दे कर उनकी सिफारिशों पर अमल कर रही है। वे जमीन पर भी पूरी तरह से सक्रिय हैं। बीते चुनाव में जातीय लिहाज से जो-जो गलतियों हुईं, उन्हें दुरुस्त कर रहे हैं। ओवरऑल उनका जो ताजा परफोरमेंस है, वह यही संकेत देता है कि वे आगामी चुनाव की तैयारी के लिए तानाबाना बुन रहे हैं। आगामी चुनाव में उन्हें फिर टिकट मिलेगा ही, यह कहना अभी संभव नहीं है, मगर वर्तमान की सक्रियता का लाभ उन्हें आगामी नगर निगम चुनाव में तो मिलेगा ही। जाहिर तौर जब वे अपनी पसंद के नेताओं को पार्षद का टिकट दिलवाएंगे तो निगम की राजनीति में उनका दखल बना रहेगा। हो सकता है कि अपनी पसंद के किसी नेता को निगम का मेयर बनवाने में कामयाब हो जाएं।

अनिता भदेल कर रही हैं बहिन को तैयार

चौराहे पर चर्चा है कि अजमेर नगर निगम के आगामी चुनाव में मेयर का पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित होने के बाद अजमेर दक्षिण की भाजपा विधायक श्रीमती अनिता भदेल अपनी छोटी बहिन के इस पद पर चुनाव लडऩे की संभावनाओं पर विचार कर रही हैं। हालांकि यह अफवाह फिलहाल प्रीमैच्योर है, मगर चर्चाओं में है जरूर। हो सकता है कि वे फिलहाल केवल पार्षद का चुनाव लड़वाने पर ही विचार कर रही हैं और मेयर के चुनाव की संभावना बाद में तलाशें। हालांकि इस पद के लिए भाजपा की अनेक महिला नेत्रियां दावेदार हैं, जिनमें सबसे प्रमुख हैं जिला प्रमुख श्रीमती वंदना नोगिया। वो इस वजह से कि एक ओर जहां कोली समुदाय से श्रीमती भदेल हैं, वहीं शहर भाजपा अध्यक्ष पद पर भी कोली नेता डॉ. प्रियशील हाड़ा की नियुक्ति कर दी गई है। ऐसे में मेयर पद के लिए भी किसी कोली महिला को चुनाव लड़ाना नामुमकिन सा है, मगर राजनीति में हर किस्म की संभावनाएं मौजूद रहती हैं। एक प्रबल संभावना तो ये भी है कि स्वयं श्रीमती भदेल भी ऐन वक्त पर दावेदारी ठोक सकती हैं और वे सक्षम भी हैं, हालांकि वे यह चुनाव लडऩे से वे साफ इंकार कर चुकी हैं।  बेशक मेयर पद का प्रत्याशी तय करते समय जातीय समीकरण का पूरा ख्याल रखा जाएगा, मगर इतना भी तय है कि पार्टी जिस को भी प्रत्याशी बनाएगी, उसके प्रति अडिग रही तो सारे समीकरण ताक पर भी रख सकती है। अब तक का अनुभव तो यही बताता है।

क्या धर्मेन्द्र गहलोत को अभयदान मिल चुका है?

ऐसी चर्चा है कि अजमेर नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत को गुप्त रूप से अभयदान मिल चुका है। बेशक राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद जिस प्रकार के हालात पैदा हुए, उससे लगने लगा था कि गहलोत शहीद कर दिए जाएंगे। इस आशंका को इसलिए भी बल मिला क्योंकि कांग्रेस का राज आते ही निगम आयुक्त चिन्मयी गोपाल से उनका तल्ख टकराव शुरू हो गया। बताया यही गया कि सरकार की मंशा के अनुरूप ही चिन्मयी ने अपना तीखा रुख अख्तियार किया, मगर इसके पीछे अधिकारियों की अपनी राजनीति भी रही। बात ये भी सही है कि सत्ता परिवर्तन के बाद गहलोत ने बाकी का कार्यकाल शांति से बिताने का मानस बनाया था, मगर हालात की कुछ ऐसे बने कि उन्हें अपने चिरपरिचित अंदाज में आना पड़ा। उनकी विरोधी लॉबी ने चिन्मयी का सहारा लेकर हमले करना जारी रखा। गहलोत तनिक गुस्सैल तो हैं ही, इस कारण भिड़ गए, मगर शुभचिंतकों ने यही राय दी कि टकराव से नुकसान ही होगा। राजनीतिक हलकों से ताजा जानकारी यही आ रही है कि भले ही उनकी नाइत्तफाकी चिन्मयी से जारी है, कभी बढ़ती भी दिखाई देती है, मगर उन्होंने इतना तो मैनेज कर लिया है कि वे अपना बाकी का कार्यकाल पूरा कर ही लेंगे। यह सही है कि उनकी छवि धाकड़ नेता की है, मगर मेयर पद के दूसरे कार्यकाल में उन्होंने बड़ी चतुराई से सबको मैनेज किया है। 

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

अजमेर के वजूद में रेलवे का अहम किरदार

माना जाता है कि अजमेर का वजूद दरगाह, पुष्कर और कुछ राज्य स्तरीय दफ्तरों के साथ रेलवे की वजह से है। इनके सिवाय अजमेर कुछ भी नहीं। उसमें भी यहां की अर्थव्यवस्था का एक केन्द्र यदि रेलवे को कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। रेलवे में काम कर रहे तकरीबन दस हजार कर्मचारियों का करीब सत्तर करोड़ रुपए का सालाना वेतन यहां की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। जाहिर तौर पर बाजार पर इसका असर दिखाई देता है। इतना ही नहीं रेलवे के कबाड़ ने भी यहां की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। कई लोगों ने रेलवे के कबाड़ को खरीदने के धंधे को अपनाया और आज वे करोड़पति हैं। वही पैसा अन्य व्यवसायों में खर्च होने के कारण यहां की आर्थिक प्रगति का हिस्सा बना है। देश की राजनीतिक राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुुंबई को जोडऩे वाली यहां की रेलवे लाइन जाहिर तौर पर यहां के व्यापार की रीढ़ की हड्डी है।
सब जानते हैं कि अजमेर में रेलवे का सफर काफी पुराना है। आजादी से पहले राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र रहे अजमेर में अंग्रेजों ने रेलवे के विकास पर विशेष ध्यान दिया। अजमेर में रेलवे का इतिहास कितना पुराना है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अजमेर सबसे पहले आगरा से रेल मार्ग से सन् 1875 में जोड़ा गया और सन् 1876 में ही बॉम्बे बड़ौदा एंड सेंट्रल इंडियन रेलवे कंपनी ने यहां मीटरगेज सिस्टम के लोकोमोटिव वर्कशॉप की स्थापना कर दी थी। इसको वर्कशॉप पश्चिम रेलवे का प्रमुख व उत्तर पश्चिम रेलवे का सबसे बड़ा कारखाना होने का गौरव हासिल है। भारतीय रेलवे के करीब एक सौ साठ साल के इतिहास में सन् 1885 को स्वर्णाक्षरों में लिखा गया, जब यहां देश का पहला लोकोमोटिव (इंजन) बनाया गया। अब यह नई दिल्ली में नेशनल रेल म्यूजियम में अजमेर का नाम रोशन कर रहा है। इसी वर्कशॉप से पहले व दूसरे विश्व युद्ध में कलपुर्जे व युद्ध सामग्री अफ्रीका व ऐशियाई देशों में भेजी गई। यह वर्कशॉप बाद में वक्त की रफ्तार के साथ बदला और 1979 में यहां पहला डीजल इंजन रखरखाव के लिए अजमेर आया। भाप के आखिरी इंजन सन् 1985 में दुरुस्त कर भेजा गया। इसी प्रकार मई 1997 में पहला ब्रॉडगेज वैगन यहां दुरुस्त कर भेजा गया और अप्रैल 2000 में पहली मीटरगेज ड्यूमेटिक ट्रैक मशीन व जून 2001 में ब्रॉडगेज यूनिमेट ट्रेक मशीन की मरम्मत की गई।
केरिज व लोको कारखाने के ढ़लाईखाने भारतीय रेल की शान रहे हैं। उसे लोकोमोटिव सेंट्रल वर्कशॉप ऑफ दी राजपूताना-मालवा रेलवे, अजमेर कहा जाता था। केरिज कारखाने में स्टील ढ़ालने का विशाल ढ़लाईखाना भिलाई के इस्पात कारखाने के समकक्ष माना जाता था। केरिज का ढ़लाईखाना तो वर्षों पहले बंद हो गया, लोको का बे्रक ब्लॉक्स बनाने वाला ढ़लाई कारखाना भी सिमटता चला गया। हालांकि यहां स्थापित रेलवे मंडल कार्यालय जोन मुख्यालय बनने की सर्वाधिक पात्रता रखता था, परंतु राजनीतिक कारणों से इसे वह दर्जा हासिल नहीं हो पाया और जोन मुख्यालय जयपुर में स्थपित हो गया।