मंगलवार, 10 मार्च 2020

क्यों नहीं हुआ फाल्गुन महोत्सव?

कई वर्षों से हर साल आयोजित होने वाला फाल्गुन महोत्सव इस बार क्यों नहीं हो पाया? आज हर एक की जुबान पर यह सवाल है, मगर जवाब किसी के पास नहीं है। हर जागरूक नागरिक, अधिकारी, व्यापारी, राजनीतिक नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार एक दूसरे से यह पता कर रहा है कि आखिर क्या वजह रही कि शहर का मात्र ऐसा शानदार कार्यक्रम, जो शहर की धड़कन था, जिसमें किसी न किसी रूप में सभी वर्गों की भागीदारी थी, जिसकी प्रसिद्धि अन्य शहरों तक फैल चुकी थी, वह बिना किसी चर्चा के गुपचुप ही विलुप्त कैसे हो गया?
असल में यह कार्यक्रम पत्रकारों की पहल पर होता रहा। इसमें राजनीतिक लोग, कलाकार सहित अन्य वर्गों के लोग सक्रिय सहभागिता निभाते थे। नगर निगम, अजमेर विकास प्राधिकरण, अजमेर डेयरी आदि प्रायोजक की भूमिका के लिए तत्पर रहते थे। आम लोग या तो दर्शक के रूप में मौजूद रह कर आनंद उठाते थे, या फिर अखबारों या फेसबुक पर फोटो व वीडियो युक्त कवरेज देख कर अपडेट हो जाते थे।
बेशक हर बार छोटे-मोटे मतभेद होते रहे, जो कि किसी भी समूह में स्वाभाविक भी है, मगर चूंकि आपस में मनमुटाव नहीं है, इस कारण यह दिलकश जलसा हर बार पहले से अधिक रोचकता लिए हुए आयोजित होता रहा। आम लोगों को पता नहीं, मगर इस आयोजन ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। हर बार कार्यक्रम की समीक्षा भी होती रही, ताकि गलतियों से सबक लिया जाए और आगे पहले से बेहतर व सुव्यवस्थित आयोजन हो।  इस बार ऐसा क्या हुआ कि अनौपचारिक आयोजन समिति की एक भी औपचारिक या अनौपचारिक बैठक नहीं हुई? आपस में जरूर एक दूसरे से पूछते रहे, मगर सामूहिक चर्चा कहीं भी नहीं हो पाई। शहर की इस बेहतरीन सांस्कृतिक परंपरा का यूं यकायक नदारद हो जाना बहुत ही पीड़ा दायक है।
मुझे याद आता है आयोजन को लेकर हर बार होने वाली छोटी-मोटी परेशानी के मद्देनजर एक बार दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल ने दूरदर्शितापूर्ण प्रस्ताव रखा था कि फाल्गुन महोत्सव समिति का रजिस्ट्रेशन करवा लिया जाए, लेकिन कुछ सदस्यों ने इसका यह कह कर विरोध कर दिया कि इसकी जरूरत नहीं है। बिना विधिवत पंजीकृत संस्था के भी इतने साल से सफल आयोजन हो ही रहा है। उनका एक तर्क ये भी था कि इससे संस्था के भीतर राजनीति पैदा हो जाएगी, जिसमें थोड़ा दम भी था। हुआ ये कि जो सदस्य डॉ. अग्रवाल के सुझाव से सहमत थे, वे चुप ही बैठे रहे, उन्होंने कोई दबाव नहीं बनाया, नतीजतन प्रस्ताव आया-गया हो गया। काश, संस्था का रजिस्ट्रेशन हो जाता तो आज जो नौबत आई है, वह नहीं आती। संस्था के किन्हीं एक-दो पदाधिकारियों की रुचि न भी होती तो भी अन्य सदस्य एकजुट हो कर कार्यक्रम की अनिवार्यता के लिए माहौल बना सकते थे। कम से कम निर्वाचित कार्यकारिणी पर तो जिम्मेदारी होती ही, मगर आज स्थिति ये है कि आयोजन न होने को लेकर न तो कोई जिम्मेदार है और न ही कोई जवाबदेह। आयोजन से जुड़े हर सदस्य ने आपसी चर्चा में कार्यक्रम किसी भी सूरत में करने की बात तो कही, मगर पहल किसी ने नहीं की। इसी अराजक स्थिति का परिणाम ये है कि शहर उल्लास के सामूहिक उत्सव से वंचित रह गया।
चूंकि आयोजन करने वालों में पहली पंक्ति में पत्रकार साथी हुआ करते हैं, इस कारण चाहे अनचाहे ये संदेश जा रहा है कि उनमें कोई मतभेद रहे होंगे, जबकि ऐसा है नहीं। सभी पत्रकार साथियों की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे शहर की सांस्कृतिक धारा को अनवरत बहने का मार्ग प्रशस्त करें।
उम्मीद है कि समिति, जिसे फिलहाल समूह कहना ज्यादा उपयुक्त रहेगा, के बेताज कर्ताधर्ता गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे, ताकि अगले साल वर्षों पुरानी परंपरा को फिर से जीवित किया जा सके।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सुरेश सिंधी होंगे एमएलए टिकट के दावेदार?

सिटी मजिस्ट्रेट पद से सेवानिवृत्त हुए अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए हैं कि राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के बीच यह चर्चा होने लगी है कि सुरेश सिंधी आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से एमएलए टिकट के दावेदार होंगे। यह चर्चा कहां से और कैसे उठी, किसने वायरल की, कुछ पता नहीं, क्या खुद उन्होंने कहींं संकेत दिया, ये भी खबर नहीं, मगर है, इसमें कोई दोराय नहीं। हाल ही पूज्य झूलेलाल जयंती समारोह समिति की ओर से आयोजित उनके अभिनंदन समारोह में मैने मंच से इस चर्चा का सवालिया जिक्र किया तो न तो उन्होंने से इसका सिरे से खंडन किया और न ही पुष्टि की। अपने उद्बोधन में वे मेरी जिज्ञासा को हजम ही कर गए।
खैर, यह चर्चा राजनीतिक जमीन पर कैसे प्रस्फुटित हुई, इस की पड़ताल की तो पहली बात ये सामने आई कि हालांकि वे एक जिम्मेदार प्रशासनिक पद पर थे, मगर उनका सहज-सरल स्वभाव और सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के कारण इस अनुमान को बल मिला। वैसे भी अजमेर का ये मिजाज है कि जैसे ही कोई व्यक्ति सामाजिक गतिविधियों में रुचि लेता है तो लोग यकायक यह कयास लगाते हैं कि कहीं उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा तो नहीं है? हालांकि अभी ये कहना मुश्किल है कि वे भाजपा टिकट के दावेदार होंगे या कांग्रेस के, मगर जैसा गणित है, उनके कांग्रेस टिकट का दावेदार होने की संभावना ज्यादा है। वो इसलिए कि भाजपा में तो पहले से लगातार चार बार जीत कर धरतीपकड़ साबित हो चुके प्रो. वासुदेव देवनानी पांचवीं बार भी खम ठोक कर खड़े हो जाएंगे। हों भी क्यों न, आखिर लगातार चार बार जीते हैं। उम्र की कोई बाधा न हो तो टिकट कटने का कोई कारण भी नहीं बनता। लोग तो यहां तक कहते हैं कि अगर उनको टिकट नहीं मिला तो वे अपने पुत्र को टिकट दिलवा देंगे। देवनानी के बाद नंबर वन कंवल प्रकाश किशनानी कौन सा हार मानने वाले हैं। महेन्द्र तीर्थानी खुल कर तो नहीं खेलते, मगर उनकी अंडर ग्राउंड सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। इन सबसे बड़ी बात ये है कि भाजपा में यहां का टिकट आरएसएस तय करती है, और लगता नहीं कि वह सुरेश सिंधी पर दाव खेलने के बारे में सोचेगी भी। यानि कि उनकी दावेदारी कांग्रेस टिकट के लिए ही बनेगी। बनेगी इसलिए कि कांग्रेस टिकट के लिए सिंधी समुदाय की ओर से ढ़ंग से दावेदारी बनी ही नहीं। दावेदारी हुई जरूर, मगर दमदार नहीं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट यह प्रयोग करना चाहते थे, मगर वैसा हो न पाया। कुल जमा बात ये है कि कांग्रेस में प्रबल सिंधी दावेदारों का अभाव सा है। यही वजह है कि जैसे ही सुरेश सिंधी रिटायर हुए, तो ऐसा माना गया कि सुरेश सिंधी इस वेक्यूम को भर सकते हैं। दावेदारी में हर लिहाज से फिट भी बैठते हैं। लंबे समय तक भिन्न-भिन्न पदों पर अजमेर में ही रहे हैं, इस कारण सुपरिचित  चेहरा हैं। अजमेर की समस्याओं व जरूरतों से भलीभांति परिचित है। बेदाग हैं। ऊर्जावान हैं। ईमानदार हैं। कूल माइंडेड हैं। दिलेर हैं। एक बार भूतपूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री प्रो. सावंरलाल से भिड़ंत के किस्से पब्लिक डोमेन में हैं। भूतपूर्व विधायक स्वर्गीय श्री नानकराम जगतराय की तरह लो-प्रोफाइल हैं। प्रदेश कांग्रेस हाईकमान तक पहुंच रखते हैं। अगर अगली बार फिर कोई धन्ना सेठ नोटों की बोरियां लेकर नहीं आया तो दावेदारों की अग्रिम पंक्ति में आसानी से खड़े हो सकते हैं। रहा सवाल पैसे का तो लगता नहीं कि जिस तरीके से ईमानदारी से नौकरी की, चुनाव के लायक पैसा जोड पाए होंगे।
अपनी समझ तो यही कहती है कि फिलवक्त तो वे यकायक राजनीति में सक्रिय नहीं होंगे और सरकारी तंत्र से ही जुड़ कर पार्ट टाइम काम करेंगे। और जब लगेगा कि उपयुक्त समय व मौका है तो राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागृत हो भी सकती है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

दिल्ली बदली है, अब अजमेर बदलेंगे: आम आदमी पार्टी उतरेगी निगम चुनाव में

अजमेर। दिल्ली विधानसभा में प्रचंड बहुमत से जीतने के बाद आम आदमी पार्टी बेहद उत्साहित है। हालांकि अंदरखाने यह पहले से तय था कि आगामी नगर निगम चुनाव में भागीदारी निभाई जाएगी, लेकिन जैसे ही दिल्ली का चुनाव हुआ, पार्टी की ओर से बाकायदा ऐलान कर दिया गया है कि वह ताल ठोक कर मैदान में उतरने को तैयार है। एक नारा भी जारी हो गया है - दिल्ली बदली है , अब अजमेर बदलेंगे। इसके अतिरिक्त साफ़ नीयत और भ्रष्टाचार मुक्त निगम का वादा भी किया गया है। यहां तक कि चुनाव लडने के इच्छुक कार्यकर्ताओं से अपील भी की गई है कि जो भी अजमेर के साथी अपने अपने वार्ड में चेहरा बन कर सेवा करना चाहते हैं, उनको अपील है कि आइए, जुड़िए और बदलाव के कारक बनिए। 
जानकारी के अनुसार अन्ना हजारे आंदोलन के बाद आम आदमी पार्टी को अजमेर में खडा करने वाली श्रीमती कीर्ति पाठक पिछले दिनों चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली में थीं। वहां से लौटने के बाद वे पूरी तरह से सक्रिय हो गई हैं। वे पार्टी के कार्यकर्ताओं से संपर्क साध रही हैं और मेयर सहित काउंसलर के लिए चेहरों की तलाष आरंभ कर चुकी हैं। समझा जाता है कि पार्टी की नजर कांग्रेस व भाजपा से नाराज कार्यकर्ताओं से संपर्क साधेगी। सफलता कितनी मिलेगी, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तय है कि पार्टी को बहुत अधिक मेहनत करनी होगी, क्योंकि लंबे समय से चुप्पी के बाद सक्रियता लाने में काफी जोर आएगा। हालांकि श्रीमती कीर्ति पाठक ने लगातार सामाजिक सरोकारों में सक्रिय रह कर अपनी पहचान बना रखी है, लेकिन उनके अतिरिक्त पार्टी के पास फिलवक्त कोई बडा चेहरा नहीं है।

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

अनेक सरकारी दफ्तरों की वजह से खास है अजमेर

सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह और तीर्थराज पुष्कर के साथ रेलवे का मंडल कार्यालय होने के कारण तो इस शहर को दुनियाभर में जाना ही जाता है, अनेक महत्वपूर्ण राज्य स्तरीय सरकारी दफ्तरों के यहां स्थापित होने के कारण इसे  विशिष्ट दर्जा हासिल है।
राजस्थान राजस्व मंडल
आजादी और अजमेर राज्य के राजस्थान में विलय के बाद राज्य के लिए एक ही राजस्व मंडल की स्थापना नवंबर 1949 में की गई। पूर्व के अलग-अलग राजस्व मंडलों को सम्मिलित कर घोषणा की गई कि सभी प्रकार के राजस्व विवादों में राजस्व मंडल का फैसला सर्वोच्च होगा। खंडीय आयुक्त पद की समाप्ति के उपरांत समस्त अधीनस्थ राजस्व विभाग एवं राजस्व न्यायालय की देखरेख एवं संचालन का भार भी राजस्व मंडल पर ही रखा गया। इसके प्रथम अध्यक्ष बृजचंद शर्मा थे। इसका कार्यालय जयपुर के हवा महल के पिछले भाग में जलेबी चौक में स्थित टाउन हाल, जो कि पहले राजस्थान विधानसभा भवन था, में खोला गया। बाद में इसे राजकीय छात्रावास में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद एमआई रोड पर अजमेरी गेट के बाहर रामनिवास बाग के एक छोर के सामने यादगार भवन में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद इसे जयपुर रेलवे स्टेशन के पास खास कोठी में शिफ्ट किया गया।
सन् 1958 में राव कमीशन की सिफारिश पर अजमेर में तोपदड़ा स्कूल के पीछे शिक्षा विभाग के कमरों में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद 26 जनवरी 1959 को जवाहर स्कूल के नए भवन में शिफ्ट किया गया। इसका उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय ज्ञ् श्री मोहनलाल सुखाडिय़ा ने किया। सन् 1966 में अध्यक्ष के अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बदल कर कम से कम तीन और अधिकतम सात निर्धारित की गई। कुछ ही साल पहले इसकी सदस्य संख्या की सीमा 15 कर दी गई। इसमें सुपर टाइम आईएएस अधिकारियों के अतिरिक्त राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी, वरिष्ठ अभिभाषक और आरएएस से पदोन्नत वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को पदस्थापित किया जाता है।
राजस्थान लोक सेवा आयोग
आजादी से पहले देशी रियासतों में प्रशासनिक तथा न्यायिक अधिकारियों के पदों पर रजवाड़ों के अधीन जागीरदार या बड़े पदों पर आसीन अधिकारियों की संतानों को ही लगाने की प्रथा थी। स्वाधीनता प्राप्ति से कुछ ही पहले के सालों में देशी रियासतों में राज्य सेवा में भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग अथवा चयन समिति का गठन किया था। सन् 1939 में जोधपुर, 1940 में जयपुर, 1946 में बीकानेर में लोक सेवा आयोग व 1939 में उदयपुर में चयन समिति स्थापित की गई थी। आजादी के बाद देशी रियासतों का एकीकरण किया गया और सभी वर्गों में से स्वतंत्र रूप से योग्य व्यक्तियों के चयन के लिए 16 अगस्त, 1949 को राजस्थान लोक सेवा आयोग का गठन किया गया। तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार वल्लभाई पटेल के नीतिगत निर्णय के तहत 11 जून 1956 में श्री सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में गठित राजस्थान केपिटल इन्क्वायरी कमेटी की सिफारिश पर अजमेर के महत्व को बरकरार रखते हुए राजस्थान लोक सेवा अयोग का मुख्यालय अजमेर में रखा गया। अगस्त, 1958 में इसे अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया। पूर्व में यह रवीन्द्र नाथ टैगोर मार्ग पर स्थित भवन में संचालित होता था, जबकि अब यह जयपुर रोड पर घूघरा घाटी के पास स्थित है। आयोग के प्रथम अध्यक्ष मुख्य न्यायाधीश सर एस. के. घोष थे। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले इसका विखंडन कर अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड गठन कर दिया गया, लेकिन कांग्रेस सरकार ने उसे भंग कर दिया गया।
रीजनल कॉलेज
पुष्कर रोड पर स्थित रीजनल कॉलेज देश के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में से एक है। केन्द्र सरकार की ओर से गठित नेशनल कौंसिल फॉर एज्यूकेशन रिसर्च एंड टेनिंग (एनसीईआरटी) ने सन् 1963 में क्षेत्रीय महाविद्यालय की स्थापना की। विज्ञान, तकनीकी, कृषि व वाणिज्य के शिक्षक प्रशिक्षण के लिए स्थापित इस प्रकार के देश में तीन और महाविद्यालय हैं। यहां पढऩे वालों को आवासीय सुविधा भी उपलब्ध है। यहां अनेक प्रांतों के छात्र-छात्राएं पढऩे आते हैं। इसी महाविद्यालय परिसर में डेमोंस्ट्रेशन स्कूल स्थापित है। यह स्कूल अपने आप में अनूठा है। यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा पद्धति में होने वाले परिवर्तनों का परीक्षण किया जाता है।
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड
आजादी के बाद विभिन्न रियासतों के विलीनीकरण के दौरान तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभाई पटेल के नीतिगत निर्णय के तहत 11 जून 1956 को श्री सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में गठित राजस्थान केपिटल इन्क्वायरी कमेटी की सिफारिश पर अजमेर के महत्व को बरकरार रखते हुए 4 दिसम्बर 1957 को पारित शिक्षा अधिनियम के तहत माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का मुख्यालय अजमेर रखा गया। यह प्रदेशभर के सेकंडरी व सीनियर सेकंडरी के छात्रों की परीक्षा आयोजित करता है। पूरे देश के माध्यमिक शिक्षा बोर्डों में इसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है। विशेष रूप से परीखा संबंधी कार्यों की गोपनीयता के मामले में इसकी मिसाल दी जाती है। यही वजह है कि देशभर के शिक्षा बोर्डों के अध्यक्षों की संस्था कोब्से का नेतृत्व करने का गौरव इसे हासिल है।
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय की स्थापना मूलत: अजमेर विश्वविद्यालय के नाम से 1 अगस्त, 1987 को हुुई। बाद में 5 मई 1992 को इसका नाम बदल मौजूदा कर दिया गया। विश्वविद्यालय के पास अपना खुद का विशाल व खूबसूरत भवन जयपुर रोड से सटे पुष्कर बाईपास पर है। यह अजमेर से तकरीबन सात किलोमीटर दूर है। इस विश्वविद्यालय से प्रदेश के नौ जिलों के तकरीबन 214 राजकीय व निजी महाविद्यालय जुड़े हुए हैं और यह करीब डेढ़ लाख विद्यार्थियों की परीक्षा आयोजित करता है। वर्तमान में इसमें कुल 24 विषयों के विभाग हैं।
रेलवे भर्ती बोर्ड
रेलवे भर्ती बोर्ड, अजमेर की स्थापना मूलत: सन् 1983 में रेलवे सेवा आयोग, अजमेर के रूप में हुई थी। बाद में 1985 में इसका मौजूदा नामकरण किया गया। यह उत्तर-पश्चिम रेलवे के अजमेर, जयपुर, जोधपुर, बीकानेर डिवीजन और पश्चिम-केन्द्र रेलवे के कोटा डिवीजन के लिए ग्रुप सी के वर्किंग व सुपरवाइजरी स्टाफ का चयन करता है। यह हफ्ते में पांच दिन सोमवार से शुक्रवार तक खुलता है। इसके मौजूद अध्यक्ष श्री वी. डी. एस. कास्वां, सदस्य सचिव श्री आर. के. शर्मा व सहायक सचिव ए. के. जैन हैं।
केन्द्रीय विश्वविद्यालय
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान की स्थापना 20 मार्च, 2009 को हुई। यह अजमेर-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर किशनगढ़ के पास बांदरा सिंदरी में मुख्य मार्ग से सात सौ मीटर दूर स्थापित की गई है, जो अजमेर से 46 व किशनगढ़ से 20 किलोमीटर दूर है। देश की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल इसकी विजिटर और प्रथम वाइस चासंलर प्रो. एम.एम. सांखुले हैं। इसका भवन पूरा बनने तक सत्र 2010-2011 के सभी अकादमिक कार्यक्रम किशनगढ़ के श्री रतनलाल कंवरलाल पाटनी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में संचालित किए जा रहे हैं। वहां इंटरनेट सुविधा से युक्त छात्र व छात्रा के लिए पृथक-पृथक आवास, पूर्णत: सुसज्जित प्रयोगशाला, 10 एमबीपीएस हाई स्पीट इंटरनेर फेसिलिटी, भाषा प्रयोगशाला और केंटीन मौजूद है। 
इसके अतिरिक्त यहां स्थापित आयुर्वेद निदेशालय पूरे प्रदेश के आयुर्वेद व यूनानी अस्पतालों का नियंत्रण करता है। इसी प्रकार श्री सीमेंट, ब्यावर, आर.के. मार्बल, किशनगढ़, तोषनीवाल इंडस्ट्रीज, एचएमटी, सोकलिया गोडावण संरक्षित क्षेत्र, पेट्रोलियम टेबल टेनिस अकेडमी, राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र, ब्यावर का पावरलूम आदि के कारण भी अजमेर को पूरे देश में जाना जाता है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com
अजमेर एट ए ग्लांस से साभार

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

सांस्कृतिक विरासत के वारिस बी. एल. सामरा

आज आपकी मुलाकात करवा रहे हैं अजमेर शहर की एक मशहूर शख्सियत श्री बी. एल. सामरा से, जो भारतीय जीवन बीमा निगम के  अजमेर मंडल कार्यालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से 31 जुलाई 2019 को सेवानिवृत्त हुए हैं। वे अपने विद्यार्थी जीवन से ही सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े रहे  और एक साप्ताहिक और एक पाक्षिक समाचार पत्र का संपादन किया। रचनात्मक लेखन और राजभाषा हिंदी से गहरा लगाव रखने वाले श्री सामरा पत्रकारिता एवं साहित्य क्षेत्र में सुरेंद्र नीलम के नाम से पहचान रखते हैं और अपनी एक विशिष्ट अभिरुचि के कारण अपने कार्य क्षेत्र में मिली व्यापक शोहरत के कारण आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है। वे पिछले 50 वर्ष से हमारी सांस्कृतिक धरोहर से संबंधित सामग्री का संकलन कर रहे हैं।
राजस्थान के मेवाड़ अंचल में राजसमंद जिले के एक छोटे से गांव आसन ठीकरवास में 8 जून 1958 को एक सामान्य वणिक परिवार में जन्मे श्री सामरा 11 वर्ष की आयु में जब छठी कक्षा के विद्यार्थी थे, तभी परिवार में घटी एक छोटी सी घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल कर रख दी तथा जीवन का मकसद और मिशन तय कर दिया। हुआ यह था कि इनके दादा जी ने जो मेवाड़ की रियासत में कामदार थे, उन्हें तांबे का एक पुराना पैसा दिया, जिसको अपनी बाल सुलभ बुद्धि से उन्होंने अनुपयोगी मान कर फेंक दिया। उनके दादा जो यह सब देख रहे थे, उन्होंने प्यार भरी डांट लगाते हुए इन्हें अपने पास बुलाया और पूछा कि पैसे को क्यों फेंक दिया, इस पर उन्होंने जवाब दिया कि यह पैसा पुराना और खोटा है, तो दादा ने उनके सिर पर हाथ फेरकर नसीहत देते हुए कहा - बेटे, पैसा पुराना हो गया तो क्या हुआ, मगर पैसा लक्ष्मी का रूप होता है और उसको फेंक कर उसकी बेकद्री नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया में ईश्वर ने ऐसी कोई चीज नहीं बनाई है, जो फिजूल और फालतू है। कुदरत ने जो कुछ भी इस दुनिया में बनाया है, उस सबकी अपनी उपयोगिता है। भले ही हम नहीं जानते, मगर धरती का एक- एक कण और वनस्पति का एक तिनका भी औषधि हो सकता है। अगर हम हिफाजत करें तो एक कौड़ी की चीज भी करोड़ की बन सकती है और हिफाजत नहीं करें तो करोड़ की चीज भी कौड़ी की बन जाती है । कचरा और कूड़ा समझी जाने वाली सामग्री भी हमारी विरासत और धरोहर का हिस्सा हो सकती है। दादा जी की डांट भरी नसीहत ने श्री सामरा के जीवन का मकसद निर्धारित कर दिया और उन्होंने इसे जुनून के साथ अपने शौक और अभिरुचि सहित अपना मिशन बना दिया और पिछले 50 वर्ष से हमारी सांस्कृतिक धरोहर से संबंधित सामग्री का संचय करने में जी जान से जुटे हुए हैं। आज इनके संग्रह में सैकड़ों पांडुलिपियां, स्टैंप पेपर, पोस्ट कार्ड व विविध डाक सामग्री और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी प्रत्येक वह सामग्री, जिससे हमारी बुजुर्गों की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर की झलक मिलती है, उसका संग्रह करने में जी जान से जुटे हुए है। आज उनके संग्रह में सैकड़ों घडिय़ां, ताले, हस्तलिखित पांडुलिपियां, बेहतरीन किताबें, सिक्के, डाक टिकट, पोस्टकार्ड, स्टैंप पेपर तथा हमारे बुजुर्गों की कला साधना के विविध नमूने, रियासतकालीन राजकीय पत्र व्यवहार, जन्म कुंडलियां, जो 20 -25 फीट लंबी हैं, कलम दवात, लेखन सामग्री, पेन स्टैंड, लेम्प स्टैंड, इत्र की खूबसूरत बोतलें, इत्रदान, फूलदान  आदि सैकड़ों वस्तुओं के बेहतरीन नमूनों का नायाब खजाना है।
श्री सामरा के पास हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि समुदायों के प्राचीन धर्म ग्रंथ मौजूद हैं, जिसमें सवा सौ वर्ष पूर्व प्रकाशित कई तरह की बाइबल व क्रिसमस कार्ड तथा नव वर्ष से संबंधित शुभकामना वाले ग्रीटिंग कार्ड का संग्रह मौजूद हैं।
उनकी श्रमसाधना, इच्छाशक्ति और संकल्पयुक्त जीवन यात्रा आज के युवाओं के लिए प्रेरणास्पद है। श्री सामरा विरासत के वारिस बन कर उसकी हिफाजत के लिए जुटे हुए हैं। उनके इस जज्बे और जुनून को सलाम।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com