शनिवार, 9 मई 2020

गोलमाल है भई, गोलमाल है

पांच गुना महंगे बिक रहे हैं बीड़ी-सिगरेट, तंबाकू-गुटखा
जब से लॉक डाउन लागू हुआ है, तंबाकू, गुटखा, सिगरेट, बीड़ी आदि पर प्रतिबंध है। यानि कि बनाने और बेचने पर। न बनना चाहिए, न बिकना चाहिए। खाने पर भी। यदि खा कर कहीं थूक दिया तो जुर्माना है। जब कि सच्चाई ये है कि ये सभी वस्तुएं बिक रही हैं। यह सर्वविदित तथ्य है। ठेठ मजदूर तक को पता है। पत्रकार की खोज खबर नहीं। इसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं होनी चाहिए। प्रमाण भी है। पिछले दिनों पुलिस ने भारी मात्रा में बरामदगी भी की। वह एक मामला है, जो कि पुलिस की मुस्तैदी से उजागर हो गया, वरना ऐसे न जाने कितने स्टॉकिस्ट होंगे। निष्कर्ष ये कि स्टॉकिस्ट के पास माल आ रहा है। आता कहां से है? अर्थात उत्पादन हो रहा है। बरामद माल पहले का रखा हुआ नहीं हो सकता। पहले का रखा हुआ तो अब तक बिक बिका कर खत्म हो गया होगा। इसकी मांग कितनी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये सभी वस्तुएं लगभग तीन से पांच गुना दामों में गुपचुप बिक रही हैं। आप दुकानदार के पास जाएंगे तो वह कह देगा, माल कभी का खत्म हो गया। जान पहचान वाला हुआ तो माफी के साथ चुपके से दे देगा, कि मैं क्या करूं? ऊपर से ही महंगा आ रहा है।
बताते हैं कि जो लोग गुटखे के बिना नहीं रह सकते, वे या तो महंगा खरीद रहे हैं या फिर मीठी व फीकी सुपारी में बीड़ी का तम्बाकू या खैनी मिला कर सेवन कर रहे हैं। तंबाकू मिश्रित सुपारी की आदत इतनी गहरी है कि बिना तंबाकू के मिल रही सुपारी से खुद को संतुष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। हालत ये हो गई है कि जनरल स्टोर्स पर मीठी व फीकी सुपारी तक गायब हो चुकी है। कई लोग ऐसे हैं, जिनको ब्रांडेड बीड़ी नहीं मिल रही या खरीदने में सक्षम नहीं हैं, वे घर में बनी बीड़ी का जुगाड़ कर रहे हैं। एक बड़ा दिलचस्प प्रकरण जानकारी में आया। कोई युवक जनरल स्टोर पर बटर पेपर लेने गया। दुकानदार ने पूछा कि क्या करोगे, तो उसने बताया कि सिगरेट बहुत महंगी है, वह खरीद नहीं सकता। कहीं से तंबाकू का जुगाड़ किया है, वह बटर पेपर की सिगरेट बना कर उसमें तंबाकू डाल कर उपयोग कर लेगा। ये तो हद्द हो गई। उसे पता ही नहीं कि बटर पेपर का धुंआ फेफड़ों में गया तो कितना नुकसान करेगा। मगर क्या करे, सिगरेट के बिना रहा नहीं जाता। इसी को एडिक्शन कहते हैं। कुछ इसी प्रकार का जुगाड़ पहले भी जानकारी में आया था। कॉलेज टाइम में साथ में कुछ बिहारी युवक भी साथ पढ़ा करते थे। जरदा या खैनी नहीं मिलने पर वे कॉलेज की दीवार का चूना खुरच कर उसमें बीड़ी का तंबाकू मिला कर होंठ के नीचे दबाया करते थे।
वस्तुत: इन सभी मादक पदार्थों का बहुत बड़ा उपभोक्ता वर्ग है। वह इनका आदी है। पांच गुना रेट पर भी खरीद कर सेवन करना इसका सबूत है। हो सकता है कि महंगा होने के कारण उसने सेवन की क्वांटिटी कम कर दी हो। फिर भी देशभर में डेली की खपत बहुत होगी। सवाल सिर्फ ये कि अगर गुपचुप सप्लाई हो रही है तो उत्पादन भी हो रहा होगा। दूसरा ये कि बिक रहा है तो ऊपर से नीचे तक की चेन भी सक्रिय है। तंत्र की भी जानकारी में होगा ही। ऐसा ही नहीं सकता कि उसको पता न हो। कालाबाजारी करने वाले डाल-डाल तो तंत्र पात-पात। इसका उलट भी सही है। तंत्र डाल-डाल तो कालाबाजारिये पात-पात। तंत्र के पास इतने संसाधन नहीं कि ग्राउंड लेवल पर जा कर पकड़ सके। वह भी शिकायत पर ही कार्यवाही कर पाता है। उससे भी बड़ी बात ये है कि उसके पास केवल यही एक काम थोड़े ही है। लॉक डाउन की ड्यूटी ही इतनी श्रम साध्य है कि पूछो मत। अब चालीस डिग्री से ऊपर की गर्मी में तो उसका भी हाल बुरा है।
कुल जमा बात ये है कि कालाबाजारी जारी है तो इसका मतलब कुछ न कुछ गोलमाल है। उसका सर्वाधिक फायदा कौन उठा रहा है? स्टॉकिस्ट तो उठा ही रहा है, होल सेलर भी अपनी कमाई रख रहा है। गली का दुकानदार भी जब चार गुना रेट पर लाएगा तो वह भी रेट को पांच गुना करके कमाएगा। केवल माल की कमी का ही सवाल नहीं है। हर स्तर पर पकड़े जाने का रिस्क भी है। अब जो इतनी रिस्क ले रहा है, तो कमाएगा भी। इतना कमाएगा, कि पकड़ा भी जाए तो उसकी भरपाई कमाई से हो जाए।
इस गोरख धंधे का या तो शासन को पता नहीं है। और पता है तो संज्ञान नहीं ले रहा। कुछ न कुछ गोलमाल है। उसके लिए प्रशासन सीधे तौर पर जिम्मेदार इसलिए नहीं कि वह तो केवल शासन के आदेश को एक्जीक्यूट कर रहा है।  बीच में सुना था कि रेवेन्यू के लिए सरकार शराब के साथ पान-बीड़ी की दुकान भी खोल सकती है, मगर जैसे ही शराब खोलने पर सरकार की छीछालेदर हुई, कदाचित इसीलिए पान की दुकान खोलने का विचार ही त्यागना पड़ा।
आदेशों की भी बड़ी महिमा है। सुप्रीम कोर्ट ने तंबाकू मिश्रित पान मसाले पर रोक लगाई तो दूसरे ही दिन सारी कंपनियों ने पान मसाला व तंबाकू अलग-अलग पाउच में बेचना शुरू कर दिया। न तो आदेश की अवहेलना हुई और न ही उपभोक्ताओं को कोई दिक्कत। वे मिला कर सेवन करने लग गए। यह बात भी गौर तलब है कि तंबाकू के उत्पादों में चित्र के साथ लिखा होता है कि तंबाकू स्वास्थ्य के हानिकारक है। अरे भई, यदि हानिकारक है तो बेचने ही क्यों दे रहे हो? यानि की सरकार तो आगाह कर  रही है, अगर आपको हानि का वरण करना है तो यह आपकी मर्जी है।
कुछ ऐसा ही कोरोना को लेकर होने जा रहा है। सरकार आखिर कितने दिन लॉक डाउन करेगी। अंतत: खोलना ही होगा। आखिर चेतावनियां दे कर खोल देगी। आप जानो, आपका काम जाने।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, 2 मई 2020

कर्फ्यू के बाद भी कैसे फैला कोरोना?

बड़ा गुमान था। हमारे यहां केवल एक ही मरीज सामने आया है। उसने भी केवल अपने ही परिवार को प्रभावित किया है। वो भी ठीक हो रहे हैं। चूंकि भीलवाड़ा मॉडल की तर्ज पर तुरंत चार थाना क्षेत्रों में कफ्र्यू लगा दिया था, और तकरीबन एक माह तक शांति थी, इस कारण फहमी थी कि हम विजेता होंगे। 15 अगस्त को मेडल लेंगे। मगर गलत फहमी निकली। सब कुछ बिखर गया। फैल गया। पसर गया। संभाले नहीं संभल रहा। लॉक डाउन के दो टर्म बीत रहे हैं। रिलीफ चाहिए। मगर गिनती डेली बढ़ रही है। नयों का इलाज कराओ। उनसे संपर्क में आए लोगों को क्वारेंटाइन करवाओ। कफ्र्यू क्षेत्र में परेशान लोगों को जरूरी राहत पहुंचाओ। भाग रहे खानाबदोशों को संभालो। केन्द्र व राज्य की गाइड लाइन पर रिलीफ का फार्मूला निकालो। बहुत मुश्किल है। प्रशासन के लिए। वे ही जान सकते हैं कि कितना कठिन टास्क है। ऐसे वक्त में प्रशासन को पूरा सहयोग चाहिए। लोग कर भी रहे हैं। दानदाता अब भी सेवा में जुटे हैं। उनके जज्बे को सलाम। उनका सेवा भाव इतिहास में दर्ज हो गया है। कुछ कपड़े फाडऩे में लगे हैं। उनका काम ही यही है। आम अजमेरवासी अपनी किस्मत को कोस रहा है।
इन सब के बीच हर एक के मन में एक ही सवाल है। कफ्र्यू के बाद भी कैसे फैला कोरोना? चूक कहां हुई? हालांकि ताजा जो हालत हैं, उसे देखते हुए यह सवाल अब बेमानी सा लगता है। मुर्दे उखाडऩे सा प्रतीत होता है। अव्वल तो पता नहीं लगेगा कि फैला कैसे? गत पता लग भी गया तो आप क्या कर लोगे? कोई एक आदमी तो जिम्मेदार होगा नहीं, जिसे फांसी पर चढ़ा दोगे। लापरवाही कई स्तर पर हुई है। सरकारी एजेंसियों के स्तर पर भी, जिनका पोस्टमार्टम अखबार वाले कर ही रहे हैं। आम जनता के स्तर पर भी, जो डंडे खा कर भी बाहर निकलने से बाज नहीं आ रही थी। डंडे भी ऐसे खाये कि वर्षों तक याद रहेंगे। गनीमत रही कि आरएसी के नहीं थे। उनका मजा भी हम कई साल पहले चख चुके हैं।
कुछ लोग मानते हैं कि पुलिस ने बहुत ज्यादती की, मगर अनेक का मानना है कि अगर सख्ती न बरती होती तो, हालात कुछ और होते। यह मत भी सामने आया है कि सख्ती मुख्य चौराहों व रास्तों पर तो थी, मगर दरगाह के आसपास की तंग गलियों में आवाजाही बनी रही। मॉनिटरिंग की कमी सामने आई है, मगर आबादी का धनत्व बहुत अधिक होने के कारण भी संक्रमण को रोकना बेहद मुश्किल था। इसमें जिला प्रशासन कर भी क्या सकता था? पब्लिक भी क्या कर सकती थी? वैसे ठीक से सर्वे न होने की शिकायतें भी सामने आई हैं। इसलिए बीमारी दबी पड़ी रही। वह अब फूट कर निकल रही है। भोजन के पैकेट या खाद्य सामग्री के वितरण के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग की पालना भी ठीक से नहीं हुई। पासों का जम कर दुरुपयोग हुआ। आखिरकार कलेक्टर को सेल्फी व फोटो खींचने पर रोक लगानी पड़ी। सोशल डिस्टेंसिंग का सबसे ज्यादा भट्टा सब्जी मंडियों में बैठा। हालात ये हो गई कि मंडी दो-दो दिन के लिए बंद करनी पड़ी, नतीजन लोगों को दुगुनी रेट पर सब्जी खरीदनी पड़ी। शेल्टर्स होम्स पर नियंत्रण की कमी ने भी समस्या उत्पन्न की।
हर एंगल से सोचा जाए तो यही लगता है कि अकेला कफ्र्यू लगाना और पुलिस का सख्त होना ही पर्याप्त नहीं था। अजमेर का रेड जोन में आना सामूहिक जिम्मेदारी है। अब वापस दुरुस्त होना भी सबका दायित्व है। बेशक लॉक डाउन की अपनी समस्याएं हैं, मगर कुछ दिन और सब्र रख कर अपना बचाव रखना होगा। उसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

सेलिब्रिटी बनते जा रहे हैं एसपी कुंवर राष्ट्रदीप सिंह

यह शीर्षक पढ़ कर आप चौंक गए होंगे। भले ही आप यकीन करें या न करें, मगर यह सच है कि अजमेर के एसपी कुंवर राष्ट्रदीप सिंह एक सेलिब्रिटी बनने की ओर अग्रसर हैं। आप सोच रहे होंगे कि वे एक दबंग एसपी तो हैं, जो उन्होंने अपने काम करने के तौर-तरीके से साबित किया है, मगर अजमेर से ही उनकी सेलिब्रिटी बनने की यात्रा भी आरंभ हो चुकी है, ऐसा कैसे संभव है?
जी हां, लॉक डाउन के दौरान उन्होंने जो सख्ती बरती, वह तो उनकी दहशत व लोकप्रियता का कारण बनी ही है, मगर तीन सेलिब्रिटीज दुनिया की सबसे छोटी लडकी नागपुर निवासी 29 साल की ज्योति आमगे, कॉमेडियन राजा एंड रेंचो और सारेगामापा 2018-19 की विनर इषिता ने उनके नाम को रेखांकित करके जो वीडियो जारी किए हैं, वे साबित करते हैं कि अब वे भी उसी पंक्ति में शुमार होने जा रहे हैं। यह एक सामान्य बात नहीं है कि बहुत महंगे सेलिब्रिटी किसी एसपी के हवाले से लॉक डाउन में घरों से न निकलने की अपील करें। स्वाभाविक है कि या तो वे उनके सुपरिचित हैं और या फिर वे उनकी कार्यशैली से इतने प्रभावित हुए हैं कि इस प्रकार का वीडियो बनाने से अपने आपको रोक न पाए हों। इन सेलिब्रिटीज के वीडियो संदेश अजमेर पुलिस राजस्थान नामक फेसबुक पर मौजूद हैं। वहां एक वीडियो वह भी नजर आ जाएगा, जिसमें खुद उन्होंने अजमेर वासियों को सीधे संबोधित किया है। अजमेर के एक पत्रकार व एडवोकेट डॉ. मनोज आहुजा ने भी एक वीडियो उनको समर्पित किया है, जो इस बात का प्रमाण है कि वे महज एक एसपी ही नहीं, बल्कि कोरोना वॉरियर्स के हीरो बन चुके हैं। इन चारों वीडियो की लिंक इस आलेख के आखिर में दिए गए हैं, जिन्हें आप क्लिक करके देख सकते हैं।
उनके लोकप्रिय होने का श्रीगणेष तब हुआ, जब उन्होंने अजमेर नगर परिशद के भूतपूर्व सभापति स्वर्गीय वीर कुमार के चेले मेयर धर्मेन्द्र गहलोत सहित लगभग सभी काउंसलर्स को लॉक डाउन तोड कर राजनीति नहीं करने देने के लिए हडकाया। यह एक गुत्थी ही रह जाएगी कि गहलोत अपमान की घूंट क्यों पी गए। खैर, राजस्थान पत्रिका व स्वामी न्यूज फेसबुक लाइव पर एसपी कोषाबाषी देने वालों की झडी लग गई। हालांकि बाद में गहलोत के समर्थकों ने भी आम आदमी की आवाज उठाने के लिए उनकी तारीफ करने में कोई कसर बाकी नहीं छोडी।
मौजूदा समय में इन्फोर्मेशन टैक्नॉलोजी आधारित सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके ने एसपी जता दिया है कि वे पुलिस में नई व त्वरित कार्यशैली में विश्वास रखते हैं। अपने अधीनस्थ पुलिस कर्मियों को संबोधन के साथ-साथ व उसीके बहाने उन्होंने आम जनता को भी आगाह करने के लिए ऑडियो क्लिप्स का इस्तेमाल करने में फुर्ती दिखाई है। हालांकि उन संदेशों की विषय वस्तु के साथ जुड़े कुछ आवृत तथ्य अलग से चर्चा का मुद्दा हो सकते हैं, मगर पूरी पारदर्शिता के साथ सीधे संवाद करना वक्त की महती जरूरत थी, जो एक मिसाल के रूप में स्थापित हो गया। आप गौर से सुनेंगे तो पाएंगे कि उन्होंने सख्त शब्द चित्र की नक्काशी में बड़ी नफासत के साथ संवेदनाओं का रंग बारीक तूलिका से सजाया है, जो उनके नारियल की तरह भीतर से संवेदनशील होने आभास कराता है। ऐसा नहीं है कि उनकी अब तक की रोशनाई से भरी यात्रा में उनकी पद चापों के नीचे अतिरिक्त सख्ती की कहानियां दफन नहीं हैं, मगर तस्वीर का दूसरा रुख ये भी तो है कि लातों के भूत बातों से मानते कहां हैं। विशेष रूप से तब जब कि जरा सी आवारगी खुद की जान पर तो बन ही आए, दूसरों की जान भी आफत में डाल दे। फिर गेहूं के साथ घुन भी तो पिसता ही है।
कोरोना के खतरे के बीच जंगे मैदान में उतरे हुए पत्रकारों की स्वास्थ्य जांच करवाना उनके मीडिया फ्रेंडली होने का सबूत है। इसके लिए ऊर्जावान पत्रकार मनवीर सिंह व अभिजित दवे भी साधुवाद के पात्र हैं, जिन्होंने बखूबी संयोजन किया। जाने-माने फोटोग्राफर दीपक शर्मा व उनके सहयोगियों के जरिए लॉक डाउन के दौरान ड्रॉन के जरिए अजमेर की विहंगम दृश्यावली को केमरे में कैद करके इतिहास की धरोहर बनाना एसपी साहब की सहमति के बिना संभव नहीं था। हाल ही उन्होंने हवाई केमरे के जरिए निगरानी का जो षगल किया है, वह नवाचार की श्रेणी में गिना जा सकता है।
सबसे बड़ी बात ये है कि उनके तेवरों की जमीन पर खुद ब खुद ऐसा नेरेटिव खड़ा हो गया है कि प्रशासनिक शक्तियों से संपन्न जिला कलैक्टर विश्वमोहन शर्मा अपेक्षाकृत कम अलर्ट हैं। और यही वजह है कि शर्मा बहुत अधिक आलोचना के शिकार हो रहे हैं। अजमेर दक्षिण की विधायक श्रीमती अनिता भदेल ने तो अजमेर के हॉट स्पॉट बनने के लिए सीधे-सीधे उनको ही जिम्मेदार ठहरा दिया। वे अजमेर उत्तर के विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी सहित अन्य भाजपा व कांग्रेस नेताओं के निशानों को भी झेल रहे हैं। यह दीगर बात है कि उन पर अनेक जटिल व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी है, और इतने संकटापन्न काल में उनमें कमियां रहना स्वाभाविक है। अपेक्षाएं अत्यधिक हैं और संसाधन सीमित। उसी का नतीजा है कि फेसबुक पर इस मत ने भी स्थान पा लिया:- अजमेर को कप्तान साहेब ने बचाए रखा था। जिला कलेक्टर और अधिकारियों ने अपनी जिद्द के आगे किसी की नहीं सुनी।
ये शब्दावली पढ़ कर मुझे यकायक लगा कि एसपी साहब के चेहरे की चमक कहीं कलेक्टर साहब के धुंधले चित्र पर तो नहीं उभर कर आ रही।
बहरहाल, किसी का मत किसी के प्रति कैसा और क्यों है, यह अलग विषय है, मगर कुल जमा बात ये है कि एसपी कुंवर राष्ट्रदीप सिंह सुपर हीरो बनते जा रहे हैं। इसे अगर प्रोजेक्शन की संज्ञा दी जाए तो भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि बोलने वाले के तो बेर भी बिक जाते हैं और मौन रहने वाले के सेब भी धरे रह जाते हैं। रहा सवाल मेरे मत का तो अपुन इस तरह के नेरेटिव के साथ नहीं हैं, चूंकि दोनों जिम्मेदार अफसरों की वर्क कल्चर्ज सर्वथा भिन्न है। दोनों की कोई तुलना नहीं हो सकती। हां, इतना जरूर है कि किसी भी टास्क की सफल पूर्णाहुति के लिए दोनों के बीच बेहतर तालमेल निहायत ही जरूरी है। यद्यपि मेरे पत्रकारिता के गुरुओं ने जो घुट्टी पिलाई, उसमें महिमामंडन की विधा का अर्क नहीं था, फिर भी मेरा मानना है कि किसी की वास्तविक तारीफ में कोई बुराई नहीं है और निरपेक्ष व सरकारात्मक आलोचना से भी पीछे हटे तो पत्रकारिता धर्म की पालना नहीं हो पाएगी।

-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 25 अप्रैल 2020

लॉक डाउन में नशे के आदी लोग बेहाल

नशे के विरोधी सभी सुधिजन से क्षमायाचना के साथ प्रस्तुत ये पोस्ट तस्वीर के दूसरे रुख की महज प्रस्तुति है। क्षमायाचना की भी वजह है। जमाना ही ऐसा है कि सच बोलने से पहले उसे बर्दाष्त न कर पाने वालों को नमस्ते करना जरूरी है। वस्तुत: यह सुव्यवस्था की ऐसी विसंगति पर रोशनी डालने कोशिश है, जो बुरी होते हुए भी साथ चली आई है। यह सरकार के स्तर पर तय नीति के धरातल पर कहीं न कहीं व्यावहारिक न होने का इशारा मात्र करती है।
सरकार ने लॉक डाउन के तहत ऐसी व्यवस्था की है कि आम आदमी बेहद जरूरी उपभोक्ता वस्तु, विशेष रूप से जीने के लिए आवश्यक खाद्य सामग्री से महरूम न रह जाए। दूध, सब्जी, किराने का सामान, दवाई इत्यादि की उपलब्धता बनी रहे, इस का पूरा ध्यान रखा गया है। तकरीबन एक माह से घरों में ही कैद रह कर सोशल डिस्टेंसिंग का काल व्यतीत करते लोगों के बीच से उठी रही एक गोपनीय मांग पर नजर पड़ी तो मैं अचंभित रह गया। वार्ड में नियमित रूप से खाद्य सामग्री का वितरण कर रहे एक पार्षद के किसी मुरीद ने उनसे कहा कि खाद्य सामग्री तो मिल रही है, पड़ी भी है, मगर थोड़ी दारु का भी इंतजाम कर दो ना। स्वाभाविक सी बात है कि पार्षद निरुत्तर हो गए।
खैर, इस मांग को गोपनीय की उपमा इसलिए दी कि क्यों कि आदमी ये तो सवाल खुलकर कर सकता है कि उसे राशन सामग्री समय पर क्यों नहीं मिल रही, लॉक डाउन को तोड़ कर मु_ियां तान सकता है कि खाद्य सामग्री के वितरण में भेदभाव क्यों हो रहा है, मगर ये मांग नहीं कर सकता कि उसे पीने को शराब चाहिए, खाने को गुटखा चाहिए, दम मारने को सिगरेट-बीड़ी चाहिए। वह ये गुहार नहीं लगा सकता कि नशे की लत पूरी न होने से वह बेहाल हो गया है। चिड़चिड़ा हो गया है। अवसाद में जी रहा है।
सीधी-सीधी सी बात है, सरकार की यह जिम्मेदारी तो है कि वह आपको भूखा न सोने दे, मगर नशे की वस्तुएं भी सुलभ करवाए, ये उसका ठेका नहीं, भले ही सामान्य दिनों में बाजार में बेचने के लिए ठेका या लाइसेंस भी उसी ने दिया हुआ है। वस्तुत: नशे के ये शौक आपके निजी हैं, उसका जिम्मा सरकार नहीं ले सकती। चूंकि नशे के ये उत्पाद स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, इस कारण इस विषय पर मुंह खोलना ही अपराध बोध कराता है। पैरवी करो कि एक माह से बंद दुकान के दुकानदार की कि उसका सामान चूहे चट कर गए होंगे, मगर इस पर कलम कैसे चलाई जा सकती है कि लोग नशे का सामान न मिलने से त्रस्त हैं या तीन-चार गुना रेट में लेने को मजबूर हैं। यह बात दीगर है कि सोसायटी का एक बड़ा तबका इसका उपभोग करता है। आम आदमी क्या, नशे के हानिकारक होने से भलीभांति परिचित डाक्टर्स में से भी कुछ इनका उपभोग करते हैं।
उदाहण पेश है। कोई बीस साल पहले मेरे छोटे भाई को जब लीवर के पास आंत में केंसर डाइग्नोस हुआ तो उसे मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में भर्ती करावाया गया। तब केंसर की रोकथाम के लिए इसी अस्पताल की ओर से टीवी पर विज्ञापन आया करता था कि सिगरेट-गुटखा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। एक दिन मैं भौंचक्क रह गया, जब हास्पिटल के बाहर चाय-कॉफी व नाश्ते के रेस्टोरेंट में दूध लेने गया तो देखा कि एक डॉक्टर सिगरेट के कश लगा रहा है। गौर से देखा तो यह वही शख्स था, जो कि मेरे भाई के कॉटेज वार्ड का रेजीडेंट डाक्टर था। विरोधाभास की कैसी आत्यंतिक मिसाल। एक ओर जो अस्पताल कैंसर से बचाव व इलाज के लिए देश भर में प्रसिद्ध है, उसी का एक चिकित्सक यह परवाह नहीं कर रहा कि सिगरेट पीने से उसे भी कैंसर हो सकता है। ऐसा ही एक उदाहरण और। अजमेर में एक ऐसे सर्जन हयात हैं, जो सरकारी नौकरी में रहते ऑपरेशन की एवज में महंगी शराब की बोतल अपनी कार की डिक्की में रखवाया करते थे।
कहने का तात्पर्य ये कि नशे की वस्तुओं को भले ही त्याज्य कहा जाए, मगर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इसने समाज को अपने शिकंजे में कस लिया है। एक तबके के लिए जरूरी उपभोक्ता वस्तु बन गई है। क्या यह सही नहीं है कि हमारी व्यवस्था ने ही उसे पहले नषे का आदी होने के लिए स्वतंत्र कर रखा है, भले ही स्वास्थ्य के हानिकारक होने की चेतावनी के साथ। अब अगर हम रोक लगाएंगे तो वह कोसेगा ही।
नशे से दूर रहने वालों के ये बात गले में ही अटक सकती है, मगर धरातल की सच्चाई ये ही है। इस सच्चाई की कड़वाहट ये है कि नशे के आदी लोग अपनी मानसिक क्षुधा को शांत करने के लिए बड़ी भारी ब्लैक के शिकार हैं। उदाहरण के लिए पांच रुपए का एक गुटखा, जिसकी होलसेट रेट चार रुपए है और फैक्ट्री से तो दो रुपए में ही निकल रहा होगा, वह बीस रुपए में बिक रहा है। मिराज नामक तम्बाकू का दस रुपए का पाउच पचास रुपए में बेचा जा रहा है। ऐसा ही हाल शराब का है। शराब न मिलने से बौराए लोग हथकड़ व घटिया शराब पीने को मजबूर हैं। एक अहम बात ये है कि प्रतिबंध के कारण एक ओर जहां कालाबाजारियों के पौ बारह हैं, वहीं आम आदमी लुटने को मजबूर है। सरकार को राजस्व की हानि हो रही है, वो अलग। इसके लिए सरकारी तंत्र को इसलिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता, क्योंकि सीमित नफरी व संसाधनों में उसकी पूरी ताकत लॉक डाउन की पालना में लगी हुई है। बावजूद इसके जहां-जहां उसकी जानकारी में आया है, उसने पूरी सख्ती से कार्यवाही की भी है।
मेरे एक पत्रकार साथी डॉ. मनोज आहूजा, जो कि वकील भी हैं, ने जमीनी हकीकत पर कलम चलाई है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को खत लिख कर उन्होंने बताया है कि लोग शराब नहीं मिलने से तंग आ चुके हैं। 25 रुपये में मिलने वाला क्वार्टर 200 रुपये में बिक रहा है। जिनके पास दो सौ रुपए नहीं हैं, वे नकली शराब खरीद रहे हैं। हरियाणा ब्रांड की शराब आने लगी है मार्केट में। इनसे मरने वाले कहीं कोरोना के आंकड़ों को पीछे न छोड़ दें। उन्होंने तर्क दिया है कि शराब बंदी लागू होने पर भी सरकार ऐसे लोगों को शराब मुहैया करवाती है, जो एडिक्ट हैं। ऐसे में उन्होंने शराब बंदी के फैसले को अव्यावहारिक बताया है। इस विषय पर चर्चा न कर पाने की विवशता का इजहार करते हुए कहते हैं कि नशा सब छुप कर ही करते हैं। सब जानते हैं कि ये सामाजिक बुराई है, इसलिए बोल नहीं पा रहे।
सुरा के आदी लोगों की पैरवी करते हुए अजमेर जिला कांग्रेस कमेटी सीए प्रकोष्ठ के अध्यक्ष सीए विकास अग्रवाल ने भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व प्रदेश आबकारी विभाग के संयुक्त सचिव ओम राजोतिया को पत्र लिख कर देशी व अंग्रेजी शराब की दुकानों को खुलवाने के आदेश जारी करने की मांग की है। अग्रवाल ने सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि पूरे प्रदेश में चोरी-छिपे शराब की सप्लाई मनमाने दामों पर की जा रही है, जिसकी गुणवत्ता पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता है। कई जगह पर तो अवैध व हथकड़ शराब बेची जा रही है, जिससे पीने वालों की जान खतरे में पड़ गई है। जो लोग शराब का नियमित सेवन करते हैं, उनको शराब नहीं मिलने से उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर हो रहा है। रात में नींद नहीं आने, चिड़चिड़ापन व हाइपर्टेंशन की प्रमुख समस्या हो गयी है। अत: जैसे दैनिक उपयोग की वस्तुओं को छूट दे रखी है, वैसे ही देशी व अंग्रेजी शराब की दुकानों को भी एक समय सीमा के तहत खोलने की इजाजत दी जानी चाहिए।
बहरहाल, कोराना जैसी वैश्विक महामारी में एक ओर जहां लोगों की जान पर बन आई है, सरकार ही पहली प्राथमिकता जान बचाने की है। वही बेहतर समझती है कि वर्तमान में नशीली वस्तुओं पर रोक क्यों व कितनी जरूरी है, मगर तस्वीर का दूसरा पहलु भी संज्ञान में रहना चाहिए।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

कोरोना से जंग अभी बाकी है, आपस की जंग फिर कर लेना

अजमेर शहर भर में लगभग एक माह का लॉक डाउन और चार थाना क्षेत्रों में कफ्र्यू भोगने के साथ पांच के अतिरिक्त नए पोजीटिव सामने नहीं आने से उम्मीद जगी थी कि अजमेर भी भीलवाड़ा का तरह मॉडल बनने जा रहा है, मगर वह दिवा स्वप्न एक झटके में रेलवे म्यूजियम ने तोड़ दिया। उसके बाद मुस्लिम मोची मोहल्ले ने तो पूरे सिस्टम की पोल ही खोल कर रख दी। अर्थात जो क्रेडिट हम लेने जा रहे थे, वह भगवान भरोसे थी। जमीन पर  जो होना था, वह किया ही नहीं गया। नतीजा ये निकला कि सुप्त पड़ा कोराना का बम फट गया। बेशक बदइंतजामी की मार खाने के बाद अब हम चाक-चौबंद होने लगे हैं, मगर इस महामारी से निपटने के प्रति एकजुट होने की बजाय हम आरोप-प्रत्यारोपों में उलझ रहे हैं। जमीन पर आम जनता व दुकानदारों को राहत देने की बजाय, राजनीति करने पर उतर आए हैं। कभी एसपी और मेयर टकरा रहे हैं, तो कभी कांग्रेस और भाजपा। कभी फूड पैकेट्स के वितरण में भेदभाव की आवाज बुलंद रही है तो कभी जनप्रतिनिधियों को नहीं गांठने का आक्रोष उबल रहा है।
इस गंभीर मसले का सबसे अहम पहलु ये है कि कफ्र्यू के बाद भी अंदर ही अंदर पक रहे कोरोना मवाद का हमें पता ही नहीं लगा तो इसका मतलब साफ है कि कफ्र्यू पूरी तरह से निरर्थक हो गया। कफ्र्यू के दौरान हमें जो एक्ससाइज करनी थी, कहीं न कहीं वह हमने ठीक से की नहीं। एक भी मरीज सामने न आने पर केवल आत्मविमुग्ध हो कर चैन की बांसुरी बजाते रहे। बेशक... बेशक, कफ्र्यू के दौरान भी लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग की अवहेलना की, वह सोचनीय है, मगर साथ ही केवल उन लोगों को जाहिल ठहराना भी हमारी समझ की त्रुटि कहलाएगी, जो उन तंग गलियों में एक ही कमरे में चार से आठ की संख्या में रहने को मजबूर हैं।
गर हम ये कह कर खुद को बरी किए देते हैं कि हमने तो कफ्र्यू लगा दिया था, लोगों ने ही पालना नहीं की, तो इसका अर्थ ये है कि कफ्र्यू की मूल अवधरणा को समझने में हम चूक कर रहे हैं। अगर हम सभ्य कहलाने वाले लोग इतने ही अनुशासित नागरिक होते तो केवल लाउड स्पीकर पर घर से बाहर न निकलने की मुनादि करवाने से काम चल जाता। साथ में डंडे की फटकार की जरूरत ही क्या होती? अर्थात हमारी व्यवस्था उतनी चाक चौबंद नहीं थी, जितनी एसपी के सख्त चेहरे पर झलकती है।
अगर इस प्रकार मुस्लिम मोची मोहल्ला अचानक हॉट सेंटर बन कर सामने आया है तो 15 लाख लोगों की स्क्रीनिंग के दावे पर खुद ब खुद बड़ा सवालिया निशान लगता है। इलाके का एक मरीज अगर खुद अवतरित नहीं होता तो हम किसी बड़ी आपदा के मुहाने पर बैठ कर खैरियत मना रहे होते। इसी प्रकार रेलवे म्यूजियम शेल्टर होम में भी लापरवाही की चादर ओढ़े बैठे थे। सोशल डिस्टेंसिंग की कामयाबी अगर हम खुले रोड्स और बंद बाजारों में पसरे सन्नाटे को देख कर संतुष्ट हैं, तो हम पूरी तरह से गलत हैं। लॉक डाउन की कामयाबी का पैमाना बड़ी तादाद में वाहनों की जब्ती व चालान को ही मान लिया जाए तो वह भी एक भ्रम है। कितने दुर्भाग्य की बात है कि पूरे उत्तर भारत में संपूर्ण साक्षर घोषित हुए अजमेर के 16 हजार से ज्यादा वाहन चालक आवारा की श्रेणी में दर्ज हो चुके हैं। उसकी अपनी अलग कहानी है। असल जरूरत शेल्टर होम में सोशल डिस्टेंसिंग की थी, जहां एक साथ डेढ़ सौ खानाबदोशों को ठहराया गया था। घटना स्थल का दौरा कर चुके मीडिया कर्मियों का कहना है कि कई दिन तक न नहाने के कारण वे बदबू मार रहे थे।
अजमेर के प्रति दिल में दर्द रख कर दिन-रात दौड़ रही सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती कीर्ति पाठक की फेसबुक पर की गई टिप्पणी काबिले गौर है कि अगर अजमेर को होट स्पॉट बनने के लिए कोई दोषी है, तो वो सिर्फ और सिर्फ हम नागरिक हैं। पुलिस कब तक एक ही दरवाजे के आगे गश्त लगाएगी? हम स्व अनुशासित जीवन नहीं जी रहे। मगर साथ ही स्वीकार करती हैं कि एक ही जगह से ये बीमारी इसी लिए परवान चढ़ रही है, क्योंकि यहां संकड़ी गालियां हैं, एक ही कमरे में कई-कई लोग रहते हैं और फिजिकल डिस्टेंसिंग नहीं हो पाती / नहीं रखते।
इस मंजर के ठीक उलट अजमेर दक्षिण की भाजपा विधायक श्रीमती अनिता भदेल का सार्वजनिक बयान भी सोचने को विवश करता है। संकट के वक्त प्रशासनिक तौर पर समस्या से निपटने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार जिला कलेक्टर पर हमला करते हुए पूरी समस्या के लिए उन्हें ही दोषी करार देना सहज है, कुछ लोग उसे दिलेरी की संज्ञा भी दे सकते हैं, आपकी भावना वाजिब भी हो सकती है, मगर ऐसा करके क्या हम अपने ही टीम लीडर का हौसला पस्त नहीं कर रहे। हो सकता है कि आपकी उनसे मतभिन्नता हो अथवा किसी निर्णय से असहमति हो, मगर इसका अर्थ ये भी नहीं कि पूरा ठीकरा ही उन पर फोड़ दिया जाए। श्रीमती भदेल के आक्रामक रुख से यह साफ झलकता है कि प्रशासन व जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल का अभाव है। उसका नतीजा है कि सरकार की ओर से प्रभारी सचिव भवानी सिंह देथा को मध्यस्थता करनी पड़ी। तालमेल की बात चली तो यह कहते हुए भी अफसोस होता है कि तकरीबन 16-16 साल से लगातार विधायकी करने वाले जनप्रतिनिधि, दो बार मेयर रह चुके शख्स और एक-एक बार विधायक रह चुके नेताओं को इतना दरकिनार करना अच्छे लोकतंत्र की निशानी नहीं है।
जनसहभागिता से खाने के पैकेट व सूखी खाद्य सामग्री बांटने के लिए मुक्तहस्त पास जारी किए जाने का दुरुपयोग भी विचारणीय है, मगर जरूरतमंद लोगों की मदद में उनके योगदान को अजमेर की सद्भावी संस्कृति के रूप में इतिहास में याद किया जाएगा। प्रशासन तो बहुत बाद में चेता, वरना लोग भूखे ही मर जाते।
एक जुट हो कर इस गंभीर समस्या से मुकाबला करने के वक्त कुछ अति समझदार बुद्धिजीवी कलेक्टर व एपी को भिड़ाने से नहीं चूक रहे। सोशल मीडिया पर इस किस्म की पोस्टें पसरी पड़ी हैं। यह साजिशन हो रहा है या अनायास पता नहीं, मगर धु्रवीकरण तो झलक ही रहा है। बतौर बानगी देखिए एक पोस्ट:- अजमेर को कप्तान साहेब ने बचाए रखा था। जिला कलेक्टर और अधिकारियों ने अपनी जिद्द के आगे किसी की नहीं सुनी। कोई सिंघम की जयजयकार कर रहा है तो कोई जिला कलेक्टर को निकम्मा साबित करने में जुटा है। बेशक हमें अभिव्यक्ति की आजादी है, मगर इसका अतिरेक ऐसा आभास देता है, मानो हमें सर्टिफिकेट जारी करने का लाइसेंस मिला हुआ है। सरकार को सब कुछ पता है कि कौन क्या कर रहा है, उसका भी अपना तंत्र है, मगर संकट के वक्त वह पहली प्राथमिकता समस्या से निपटने पर दे रही है। तभी तो चार आईएएस को सहयोग के लिए लगाया है, तभी तो उच्चाधिकारियों को दौरा कर समन्वय बैठाया जा रहा है।
-तेजवानी गिरधर
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