शुक्रवार, 25 जून 2021

अजमेर नगर निगम में लिफाफा सिस्टम सेट नहीं हो पा रहा


कानाफूसी है कि नगर निगम में वर्षों से कथित रूप से चल रहा लिफाफा सिस्टम इस बार के बोर्ड में ठीक से इम्प्लीमेंट नहीं हो पाया है। स्वाभाविक रूप से व्यवस्था बदलने पर नई व्यवस्था को सेट होने में थोड़ा टाइम तो लगता ही है। वैसे भी मौजूदा मेयर श्रीमती बृजलता हाड़ा राजनीति में नई-नई हैं। इस कारण उन्हें सिस्टम को समझने में टाइम लग रहा है। वे फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। उनके पतिदेव डॉ. प्रियशील हाड़ा भी कुल मिला कर सीधे-सादे व ईमानदार हैं। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि इस दंपति को लिफाफा संस्कृति व सिस्टम की ठीक से जानकारी नहीं है। अगर जानकारी है भी तो अनुभव की कमी है। ऐसे में घाघ अधिकारियों से इस बारे में चर्चा करना खतरे से खाली नहीं है। राजनीतिक रूप से भी खतरा कम नहीं है। श्रीमती हाड़ा के आगामी विधानसभा चुनाव में प्रमुख दावेदार बनने की पूरी संभावना है। जाहिर तौर पर उनका एक नया शक्ति केन्द्र बनना जिनको नागवार गुजर रहा है, वे घात लगा कर बैठे हैं कि कहीं चूक हो तो फिश प्लेट गायब करवा दें। उससे भी बड़ी बात ये कि राज्य में सरकार कांग्रेस की है। ऐसी स्थिति में किसी प्रकार की रिस्क नहीं ली जा सकती।

हालांकि जानकारी है कि कुछ एक अनुभवी व तेज-तर्रार ने अपना हिसाब-किताब बना लिया है, लेकिन कई अभी वंचित हैं। सिस्टम सेट नहीं हो पा रहा। ऐसे में स्वाभाविक रूप से वंचित वर्ग में असंतोष व निराशा व्याप्त है। उन्हें उम्मीद है कि कभी तो सिस्टम सेट होगा। ज्ञातव्य है कि पिछले बोर्ड में सभी संतुष्ट थे। किसी को कोई शिकायत नहीं थी। बिना किसी राजनीतिक भेद के सभी तत्कालीन मेयर धर्मेन्द्र गहलोत के पैर छूते थे।

खैर, असल में समस्या ये भी है कि कोटा तो पहले जितना ही है, जबकि हिस्सेदारों की संख्या बढ़ गई है। अगर राजनीतिक नियुक्तियां हुईं तो यह संख्या और बढ़ जाएगी। ऐसे में लिफाफे का वजन कम हो जाएगा।

वैसे शहर वासियों के लिए यह सुखद है कि लिफाफा सिस्टम कायम नहीं हो पा रहा। हालांकि समझा जाता है कि देर-सवेर सिस्टम लागू तो हो जाएगा, मगर यदि वह लागू नहीं हो पाता तो हाड़ा दंपति की साफ-सुथरी छवि पर कोई कीचड़ नहीं उछाल पाएगा। फिलहाल उनके लिए यही अच्छा है। सिक्के का दूसरा पहलु ये है कि अगर उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो कहीं निचले स्तर पर सेटिंग न शुरू हो जाए, वह और भी घातक होगी। 


-तेजवानी गिरधर

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बुधवार, 23 जून 2021

शुरू से ऐसे दबंग हैं भंवर सिंह पलाड़ा


24 जून को अजमेर की जिला प्रमुख श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पतिदेव जाने-माने समाजसेवी श्री भंवर सिंह पलाड़ा का जन्मदिन है। इस मौके पर तकरीबन साढ़े दस साल पहले यानि 21 दिसंबर 2010 को अजमेरनामा में प्रकाशित वह पोस्ट यकायक ख्याल में आ गई, जो उनके मौजूदा व्यक्तित्व और कृतित्व की पृष्ठभूमि का दिग्दर्शन करवाती है।

भाजपा के सारे नेताओं को यह तकलीफ हो सकती है कि उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा भाजपा के बेनर पर वार्ड मेंबर बनीं, मगर टिकट न मिलने पर अपने समर्थक भाजपाई वार्ड मेंबर्स के अतिरिक्त कांग्रेसी मेंबर्स के सहयोग से जिला प्रमुख बन बैठीं। पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद टिकट न दिए जाने पर उनका यह कदम मौजूदा राजनीति के हिसाब से उचित ही प्रतीत होता है। पाटी्र्र के प्रति निष्ठा एक मुद्दा हो सकता है, मगर स्थानीय भाजपा नेताओं का उनके प्रति आरंभ से जो रवैया था, उसे देखते हुए कम से कम उन्हें तो ऐतराज करने का अधिकार नहीं है।

आइये, वह पोस्ट पढ़ कर देख लेते हैं:-

सरकार से अकेले जूझ रहे हैं पलाड़ा, सारे भाजपाई अजमेरीलाल

एक तो प्रदेश में कांग्रेस सरकार, दूसरा ब्यूरोक्रेसी का बोलबाला, दोनों से युवा भाजपा नेता भंवरसिंह पलाड़ा अकेले भिड़ रहे हैं, बाकी सारे भाजपाई तो अजमेरीलाल ही बने बैठे हैं। सभी भाजपाई मिट्टी के माधो बन कर ऐसे तमाशा देख रहे हैं, मानो उनका पलाड़ा और जिला प्रमुख श्री सुशील कंवर पलाड़ा से कोई लेना-देना ही नहीं है।


असल में जब से पलाड़ा की राजनीति में एंट्री हुई है, तभी से सारे भाजपाइयों को सांप सूंघा हुआ है। भाजपा संगठन के अधिकांश पदाधिकारी शुरू से जानते थे कि वे स्वयं तो केवल संघ अथवा किसी और की चमचागिरी करके पद पर काबिज हैं, चार वोट उनके व्यक्तिगत कहने पर नहीं पड़ते, जबकि पलाड़ा न केवल आर्थिक रूप से समर्थ हैं, अपितु उनके समर्थकों की निजी फौज भी तगड़ी है। यही वजह थी कि कोई नहीं चाहता था कि पलाड़ा संगठन में प्रभावशाली भूमिका में आ जाएं। सब जानते थे कि वे एक बार अंदर आ गए तो बाकी सबकी दुकान उठ जाएगी। यही वजह रही कि जब पहली बार उन्होंने पुष्कर विधानसभा क्षेत्र से टिकट मांगा तो स्थानीय भाजपाइयों की असहमति के कारण पार्टी ने टिकट नहीं दिया। ऐसे में पलाड़ा ने चुनाव मैदान में निर्दलीय उतर कर न केवल भाजपा प्रत्याशी को पटखनी खिलाई, अपितु लगभग तीस हजार वोट हासिल कर अपना दमखम भी साबित कर दिया। उसका परिणाम यह हुआ कि दूसरी बार चुनाव में पार्टी को झक मार कर उन्हें टिकट देना पड़ा। मगर स्थानीय भाजपाइयों ने फिर उनका सहयोग नहीं किया और बागी श्रवण सिंह रावत की वजह से उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद भी पलाड़ा ने हिम्मत नहीं हारी।

प्रदेश में कांग्रेस सरकार होने के बाद भी अकेले अपने दम पर पत्नी श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा को जिला प्रमुख पद पर काबिज करवा लिया। जाहिर है इससे पूर्व जलदाय मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट, पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत सहित अनेक नेताओं की दुकान उठ गई है। भाजपा के सभी नेता जानते हैं कि पत्नी के जिला प्रमुख होने के कारण उनका नेटवर्क पूरे जिले में कायम हो चुका है और जिस रफ्तार से वे आगे आ रहे हैं, वे आगामी लोकसभा चुनाव में अजमेर सीट के सबसे प्रबल दावेदार होंगे। कदाचित इसी वजह से कई भाजपा नेताओं को पेट में मरोड़ चल रहा है और वे शिक्षा मंत्री व जिला परिषद की सीईओ शिल्पा से चल रही खींचतान को एक तमाशे के रूप में देख रहे हैं। हर छोटे-मोटे मुद्दे पर अखबारों में विज्ञप्तियां छपवाने वाले शहर व देहात जिला इकाई के पदाधिकारियों के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकल रहा है कि प्रदेश की कांगे्रस सरकार राजनीतिक द्वेषता की वजह से जिला प्रमुख के कामकाज में टांग अड़ा रही है। ऐसे विपरीत हालात में भी दबंग हो कर पूरी ईमानदारी से जिला प्रमुख पद को संभालना वाकई दाद के काबिल है।

बहरहाल, दूसरी बार जिला प्रमुख पद पर काबिज होने के बाद जिस बिंदास तरीके से पतिदेव के सहयोग से श्रीमती पलाड़ा काम कर रही हैं, वह सबके सामने है, और स्थानीय भाजपाई सदके में हैं।

-तेजवानी गिरधर

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मंगलवार, 18 मई 2021

सबा खान : एक जिंदा औरत का इंतकाल


सुर्खी पढ़ कर आपका चौंकना लाजिमी है। इंतकाल तो किसी जिंदा इंसान का होता है, भला मरा हुआ कैसे इस फानी दुनिया को छोड़ सकता है? वह तो पहले ही अलविदा कर चुका होता है। आपके दिमाग में उठा यह सवाल बिलकुल वाजिब है। मगर मेरी कलम की कोख से यह सुर्खी इसलिए पैदा हुई, क्योंकि मेरी नजर में यह शहर गिनती के जिंदा लोगों की बस्ती है।   इसका कत्तई मायने ये नहीं कि बाकी के सारे लोग मरे हुए हैं। वे भी जिंदा हैं, मगर उतने नहीं, जितने सबा खान जैसे गिनती के लोग होते हैं। मायने ये कि शहर के सारे वाशिंद जिंदा तो हैं, मगर जिस्मानी तौर पर। दिमागी या रूहानी तौर पर नहीं। या तो वे दिमाग सिरहाने रख कर सो रहे हैं या फिर उनकी रूह मर चुकी है। कुछ दोस्तों को ऐसा कहना नागवार गुजर सकता है, मगर जरा मेरे अंदाज-ए-बयां पर गौर फरमाइये। यदि आपने ये जुमला सुना हो कि अजमेर टायर्ड और रिटायर्ड लोगों का शहर है, तो बड़ी आसानी से आपको मेरी बात गले उतर जाएगी। अजमेर के बारे में यह जुमला मेरी मखलूक नहीं। जब मेरी समझदानी अभी ठीक से काम करना भी शुरू नहीं हुई थी, तब से समझदार लोगों से सुनता आया हूं। नहीं पता कि ये जुमला किसके मुंह से निकला, मगर जमीनी हकीकत यही है। किसी शायर ने यूं ही नहीं कहा कि अजीब लोगों का बसेरा है इस शहर में, सब कुछ सहन करते हैं, मगर चूं तक नहीं करते। ये चंद अल्फाज अजमेर और अजमेर वासियों की फितरत को बयां करते हैं।

बहरहाल सबा खान का जिक्र करते हुए उनके नाम के साथ मरहूम इसलिए नहीं जोडूंगा, चूंकि उनके भीतर जो जज्बा था, वो शहर में गिनती के जिंदा लोगों के जेहन में धड़क रहा है। वह कभी नहीं मरा करता। सबा ने जो पहचान बनाई, वह उनके अलविदा होने के बाद भी जिंदा है। और नाम के साथ श्रीमती इसलिए नहीं जोडूंगा कि मेरी नजर में वे मर्द औरत थीं। बिंदास। उनके कांधे पर चस्पा उन तमगों का जिक्र करना बेमानी सा है, जिसके बारे में हर किसी को पता है कि वे राजस्थान प्रदेश महिला कांग्रेस की प्रदेश महासचिव थीं, अजमेर शहर जिला महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं, सामाजिक सरोकार के क्षेत्र में अग्रणी संस्था प्रिंस सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष और जवाहर फाउंडेशन की मजबूत स्तंभ थीं। हां, इतना जरूर कहना पड़ेगा कि वे एक जिंदादिल इंसान, हरदिल अजीज और खुश मिजाज थीं। हर किसी से बड़े खुलूस के साथ मिला करती थीं, मानों बरसों जी जान-पहचान हो।

जैसे ही उनके इंतकाल की खबर आई तो वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए पूरे शहर में आग की तरह फैल गई। सुनने वाले हर शख्स की सांसें चंद लहमात के लिए ठहर सी गई। हजारों की आंखों में पानी तैरने लगा। किसी को यकीन ही नहीं हुआ। मगर यह कड़वी हकीकत थी। असल में वे भरपूर सेहतमंद थीं। गर कोरोना के शिकंजे में नहीं आतीं तो खूब जीतीं। क्या यह सरासर नाइंसाफी नहीं है कि कोरोना ने कम उम्र में ही जबरन उनकी सांसें रोक दीं? बिना यह सोचे कि ऐसे इंसानों की अजमेर को कितनी दरकार है?

अब जरा, उनकी शख्सियत के बारे में। उनमें गजब की फुर्ती थी, चुस्ती थी। यानि बिजली जैसी चपलता। तभी तो उनकी साथिनें पूछा करती थीं कि कौन सी चक्की का आटा खाती हो। कांग्रेस में तकरीबन दस साल शहर महिला अध्यक्ष रहीं। इस दौरान शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो कि वे कहीं नजर न आई हों। राजनीति से इतर भी वे आम अवाम के हर काम के लिए जुटी दिखाई देती थीं। उनके पास शहर का जो भी मसला आता था, जो भी फरियादी आता था, वे तत्काल आला अफसरान के चेंबर में बेधड़क घुस कर पैरवी करती थीं। सियासत उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बन गई थी। कांग्रेस और भाजपा, दोनों में इस किस्म के नेता कम ही हैं। बावजूद इसके नगर निगम के लगातार दो चुनावों में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। असल में टिकट बांटने का गणित ही कुछ और है। हां, चंद महीनों के लिए जरूर मनोनीत पार्षद बनाया गया, मगर इतने समय में वे कर भी क्या सकती थीं? असल में उनका सपना था कि चाहे अजमेर से चाहे पुष्कर से, विधायक बनें और जनता की सेवा करें।

अफसोस, एक मर्द औरत कोरोना से जंग हार गईं। और इसी के साथ अपार संभावनाओं का अंत हो गया। शहर वासियों केलिए भी, परिवार वालों के लिए भी।

इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलेही राजऊन

अल्लाह उन्हें जन्नतुल फिरदोस में आला मुकाम अता फरमाए। गमजदा परिवार वालों को सब्र जमील अता फरमाए।

-तेजवानी गिरधर

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मंगलवार, 11 मई 2021

अजमेर ने पांच बार सांसद रहे जनप्रिय नेता प्रो. रासासिंह रावत को खो दिया


भाजपा के वरिष्ठ नेता और अजमेर से पांच बार भाजपा के सांसद रहे प्रो. रासासिंह रावत का निधन हो गया। प्रो. रावत सहज सुलभता और अपनी विशेष भाषण शैली और धाराप्रवाह उद्बोधन के कारण लोकप्रिय थे। उनका जन्म सन् 1 अक्टूबर 1941 को श्री भूरसिंह रावत के घर हुआ। उन्होंने बी.ए. व एल.एल.बी. और हिंदी व संस्कृत में एम.ए. की शिक्षा अर्जित की और अध्यापन कार्य से अपनी आजीविका शुरू की। उन्हें 25 साल तक अध्यापन का अनुभव था। उल्लेखनीय सेवाओं के कारण उन्हें शिक्षक दिवस, 5 सितम्बर 1989 को राज्य सरकार की ओर से सम्मानित किया गया। अध्यापन कार्य के दौरान स्काउटिंग में विषेश सेवाएं देने के कारण उन्हें राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा गया। सामाजिक संगठन आर्य समाज अजमेर से उनका गहरा नाता रहा और पूर्व में इसके अध्यक्ष रहे व बाद में संरक्षक रहे। समाजसेवा से उनका कितना गहरा रिश्ता है, इसका अनुमान उनके दयानंद बाल सदन के प्रधान, भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के प्रधान व राजस्थान रावत राजपूत महासभा के पूर्व प्रधान व हाल तक संरक्षक का दायित्व निभाने से हो जाता है। वे सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यों में विशेष रुचि रखते थे। भाजपा की नई चुनावी रणनीति के चलते उन्हेंं राजसमंद से लड़ाया गया, लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिली। बाद में उन्हें अजमेर शहर भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया। 

भाजपा में जाने से पहले रासासिंह रावत ने दो बार कांग्रेस के टिकट पर भीम विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा था, लेकिन वे हार गए। बाद में भाजपा में शामिल हो गए। वे विरजानंद स्कूल के प्रधानाचार्य रहे। बाद में उन्हें डीएवी स्कूल का प्राचार्य बना दिया गया, फिर वे आर्य समाज क प्रधान भी बने। आर्य स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधारने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान भी रहा है।

सांसद के रूप में उन्होंने सभी पांचों कार्यकालों में उन्होंने लोकसभा में अपनी शत-प्रतिशत उपस्थिति दर्ज करवाई। अजमेर से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा मुद्दा रहा होगा, जो उन्होंने लोकसभा में नहीं उठाया। यह अलग बात है कि दिल्ली में बहुत ज्यादा प्रभावी नेता के रूप में भूमिका न निभा पाने के कारण वे अजमेर के लिए कुछ खास नहीं कर पाए। एक बार उनके मंत्री बनने की स्थितियां निर्मित भी हुईं, लेकिन चूंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के सोलह सहयोगी दलों के साथ मिल कर सरकार बनाने के कारण वे दल आनुपातिक रूप में मंत्री हासिल करने में कामयाब हो गए और प्रो. रावत को एक सांसद के रूप में ही संतोष करना पड़ा। उनकी सबसे बड़ी विशेषता ये थी कि वह सहज उपलब्ध हुआ करते थे। बेहद सरल स्वाभाव और विनम्रता उनके चारित्रिक आभूषण थे। 

रासा सिंह रावत के निधन पर भाजपा शहर जिला अध्यक्ष डॉ. प्रियशील हाड़ा, राज्यसभा सांसद भूपेंद्र यादव, अजमेर लोकसभा सांसद भागीरथ चौधरी, विधायक वासुदेव देवनानी, विधायक अनिता भदेल, राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष ओंकारसिंह लखावत, महापौर ब्रजलता हाड़ा, धर्मेश जैन, अरविंद यादव, शिव शंकर हेड़ा, धर्मेंद्र गहलोत, सुरेंद्र सिंह शेखावत, नीरज जैन, रमेश सोनी, जयकिशन पारवानी, संपत सांखला, संजय खंडेलवाल, आनंद सिंह राजावत, दीपकसिंह राठौड़, सीमा गोस्वामी, रमेश मेघवाल, हेमंत सुनारीवाल, देवेन्द्र सिंह शेखावत आदि ने दुख व्यक्त किया है।

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रविवार, 7 फ़रवरी 2021

क्या ब्रिजलता हाडा अपने जेठ स्वर्गीय राजेन्द्र हाडा का स्मार्ट सिटी का सपना साकार करेंगी?


अब जब कि अजमेर नगर निगम के मेयर पद पर भाजपा की ब्रिजलता हाडा काबिज हो गई हैं, तो यकायक उनके जेठ स्वर्गीय वकील श्री राजेन्द्र हाडा बाबत लिखे एक आलेख का स्मरण हो आया। अजमेर को स्मार्ट सिटी बनाने को लेकर उन्होंने एक सपना देखा था। मगर धरातल पर स्मार्ट सिटी का कामकाज  बहुत धीमी गति से चल रहा है। इस पर मैने ’स्मार्ट सिटी की कछुआ चाल पर कितनी विह्वल होगी स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा की आत्मा’ हैडिंग से लिखा था। अब जब कि उनकी ही भाभी ब्रिजलता हाडा धर्मपत्नी डॉ प्रियषील हाडा मेयर बन गई हैं तो यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे स्मार्ट सिटी की दिषा में बहुत  गंभीरता से काम करेंगी। यह न केवल अजमेर के हित में होगा, अपितु स्वर्गीय राजेन्द्र हाडा को असली श्रद्धांजलि होगी। 

प्रसंगवष वह आलेख हूबहू पेष हैः-


स्मार्ट सिटी की कछुआ चाल पर कितनी विह्वल होगी स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा की आत्मा


गुरुवार, 19 दिसंबर 2019। आज से ठीक चार साल पहले अजमेर के एक ऐसे लाल को काल के क्रूर हाथों ने हमसे छीन लिया, जिसने स्मार्ट सिटी बनने वाले अजमेर को एक सपना दिया था। वह सपना कितना कीमती था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनको उस सपने के लिए बाकायदा पुरस्कृत किया गया। 

आपको याद होगा कि मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पिछले कार्यकाल में अमेरिका यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ मिल कर अजमेर सहित दो शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की थी। इसी सिलसिले में 2 अक्टूबर 2015 को अजमेर नगर निगम ने ऑन लाइन सुझाव मांगे थे। तब शहर के जाने-माने वकील व पत्रकार स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा ने दस पेज का एक सुझाव सौंपा था कि कैसे इस पुरानी बसावट वाले शहर को स्मार्ट किया जा सकता है। उनके सुझाव को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए निगम ने 29 नवंबर 2015 को उन्हें एक समारोह में प्रमाण पत्र के साथ पंद्रह हजार रुपए का नकद पुरस्कार दिया, जिसमें तत्कालीन शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी, मेयर धर्मेन्द्र गहलोत व आयुक्त एच. गुईटे मौजूद थे। समझा जा सकता है कि उन्होंने कितने महत्वपूर्ण सुझाव दिए होंगे। आज जब हम स्मार्ट सिटी की कछुआ चाल को देखते हैं तो स्वर्गीय श्री हाड़ा की पांचवीं पुण्यतिथी पर बरबस उनकी याद आ जाती है। अगर वे हयात होते तो अपनी आंखों से देखते कि उन्होंने जो सपना नगर निगम को सौंपा था, उसका हश्र क्या हो रहा है? बेशक उनकी आत्मा विह्वल होगी कि उन्होंने जो सुझाव दिए, जिन्हें कि सराहा भी गया, उस पर अमल में कितनी कोताही बरती जा रही है।

प्रसंगवश बता दें कि स्वर्गीय श्री राजेन्द्र हाड़ा पेशे से मूलत: वकील थे, मगर पत्रकारिता में भी उनको महारत हासिल थी। लंबे समय तक दैनिक नवज्योति में कोर्ट की रिपोर्टिंग की। बाद में दैनिक भास्कर से जुड़े, जहां उनके भीतर का पत्रकार व लेखक पूरी तरह से पुष्पित-पल्लवित हुआ। उन्होंने पत्रकारिता में आए नए युवक-युवतियों को तराश कर परफैक्ट पत्रकार बनाया। वे एक संपूर्ण संपादक थे, जिनमें भाषा का पूर्ण ज्ञान था, समाचार व पत्रकारिता के सभी अंगों की गहरी समझ थी। अजयमेरू प्रेस क्लब का संविधान बनाने में उनकी अहम भूमिका थी। उनकी अंत्येष्टि के समय पार्थिव शरीर से उठती लपटों ने मेरे जेहन में यह सवाल गहरे घोंप दिया कि क्या कोई कड़ी मेहनत व लगन से किसी क्षेत्र में इसलिए पारंगत होता है कि वह एक दिन इसी प्रकार आग की लपटों के साथ अनंत में विलीन हो जाएगा? खुदा से यही शिकवा कि यह कैसा निजाम है, आदमी द्वारा हासिल इल्म और अहसास उसी के साथ चले जाते हैं। वे अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर मुझ सहित अनेक लोगों के जेहन में जिंदा हैं। चलो, वे बहुत सारा अर्जित ज्ञान अपने साथ ले गए, लेकिन संतोष है कि नगर निगम को अपना सपना जरूर सौंप गए। मगर साथ ही अफसोस भी है कि उस सपने को पूरा होने पर नौ दिन चले, अढ़ाई कोस वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। 

स्वर्गीय श्री हाड़ा की पुण्यतिथी पर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चांदनी हाड़ा के अहसासात को जानने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ इस तरह अपना अनुभव बांटा:- उन्होंने पुरस्कार स्वरूप मिली राशि से अपने पिता, बहिन, पत्नी, पुत्र व छोटे भाई के दोनों बच्चों को रणथंभोर की यात्रा करवाई। उन्होंने करीब आठ सौ सीढिय़ां चढ़ कर गणेश जी की प्रतिमा से क्या कुछ मांगा था, समझ में नहीं आया। मगर उसका परिणाम ये हुआ कि पिताश्री का गणेश जी पर से विश्वास उठ गया। आज वे कहते हैं कि मैं गणेश जी को नहीं मानता। स्वाभाविक है कि जिस पिता ने वृद्धावस्था में अपने जवान बेटे खोया होगा, उसकी आस्था तो टूटेगी ही। मेरे व परिवार के सपने तो विधाता ने छीन लिए मगर मेरे पति को असली श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके सपने को हम अजमेर वासी साकार होता हुआ देखें।

-तेजवानी गिरधर

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