गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024

अजमेर की चौधर करने वालों का ठीया था नाले शाह की मजार

शहर के चंद बुद्धिजीवियों को ही पता है कि अजमेर में एक स्थान नाले शाह की मजार के नाम से जाना जाता था। अब उसका कोई नामो-निशान नहीं है। दरअसल न तो नाले शाह नाम के कोई शख्स हुए और न ही वह किसी की मजार थी। वह एक ठीया था। क्लॉक टॉवर पुलिस थाने के मेन गेट से सटी बाहरी दीवार पर रोजाना रात सजने वाले मजमे को कुछ मसखरे नाले शाह की मजार कहा करते थे। दरअसल दीवार के सहारे पटे हुए एक नाले पर होने के कारण ये नाम पड़ा था। इस ठीये पर शहर की चौधर करने वाले जमा होते थे। बाखबर के साथ बेखबर चर्चाओं का मेला लगता था। अफवाहों की अबाबीलें घुसपैठ कर जातीं, तो कानाफूसियां भी अठखेलियां करती थीं। हंसी-ठिठोली, चुहलबाजी, तानाकशी व टीका-टिप्पणी के इस चाट भंडार पर शहर भर के चटोरे खिंचे चले आते थे। दुनियाभर की टेंशन और भौतिक युग की आपाधापी के बीच यह वह जगह थी, जहां आ कर जिंदगी रिलैक्स करती थी। इतना ही नहीं, वहां शहर की फिजां का तानाबाना सायास नहीं, अनायास बुना जाता था। यहां से निकली हवा शहर की आबोहवा में बिखर जाती थी।

असल में दैनिक भास्कर, अजमेर संस्करण के पूर्व संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल इस ठिये के सूत्रधार थे। तब वे नवज्योति में हुआ करते थे। उनके संपादन कार्य से निवृत्त के बाद यहां पहुंचने से पहले ही  एक-एक करके ठियेबाज जुटना शुरू हो जाते थे। सबके नाम लेना तो नामुमकिन है। चंद शख्सियतों का जिक्र किए देते हैं- स्वर्गीय श्री वीर कुमार, रणजीत मलिक, इंदुशेखर पंचोली, संतोष गुप्ता, नरेन्द्र भारद्वाज, ललित शर्मा, अतुल शर्मा, तिलोक, स्वर्गीय सीताराम चौरसिया, स्वर्गीय योगेन्द्र सेन आदि-आदि, जो कि रोजाना इस मजार पर दीया जलाने चले आते थे। डॉ. अग्रवाल के आने के बाद तो महफिल पूरी रंगत में आ जाती थी। इस मयखाने की मय का स्वाद चखने कई रिंद खिंचे चले आते थे। यहां दिनभर की सियासी हलचल के साथ अफसरशाही के किस्सों पर खुल कर चटकारे लिये जाते थे। समझा जा सकता है कि दूसरे दिन अखबारों में छपने वाली खबरों का तो जिक्र होता ही था, उन छुटपुट वारदातों पर भी कानाफूसी होती थी, जो ऑफ द रिकार्ड होने के कारण खबर की हिस्सा नहीं बन पाती थीं। अगर ये कहा जाए कि इस ठिये पर शहर का दिल धड़कता था तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। चूंकि यहां हर तबके के बुद्धिजीवी जमा होते थे, इस कारण खबरनवीसों को शहर की क्रिया-प्रतिक्रिया का भरपूर फीडबेक मिला करता था। जो बाद में अखबारों के जरिए शहर की दिशा-दशा तय करता था। जिन स्वर्गीय श्री सीताराम चौरसिया का नाम चर्चा में आया है, वे कांग्रेस सेवादल के जाने-माने कार्यकर्ता थे। सेवादल के ही स्वर्गीय योगेन्द्र सेन इस मजार के पक्के खादिम थे। बाद में यह ठीया वरिष्ठ पत्रकार इंदुशेखर की पहल पर पैरामाउंट होटल के एक कमरे में शिफ्ट हो गया था। एक घर बनाऊंगा की तर्ज पर एक सा छोटा ठिया सामने ही रेलवे स्टेशन के गेट के पास कोने में चाय की दुकान पर भी खुला, जो दैनिक न्याय के पत्रकारों ने जमाया था। लगे हाथ ये बताना वाजिब रहेगा कि नाले शाह की मजार से भी पहले क्लॉक टॉवर के सामने मौजूदा इंडिया पान हाउस के पास चबूतरे पर दैनिक नवज्योति के तत्कालीन क्राइम रिपोर्टर स्वर्गीय श्री जवाहर सिंह चौधरी देर रात के धूनी रमाया करते थे।


बुधवार, 23 अक्टूबर 2024

बहुआयामी व्यक्तित्व थे पत्रकार स्वर्गीय श्री अभय कुमार जैन

शहर के वयोवृद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रकारों में शुमार रहा है स्वर्गीय श्री अभय कुमार जैन का नाम। वे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। अनेक वर्ष तक अजमेर जिला पत्रकार संघ के कोषाध्यक्ष और अनेक सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक संस्थाओं में पदाधिकारी रहे। उत्तर प्रदेश के बिल्सी (बदायुं) में 7 जुलाई, 1938 को जन्मे श्री जैन ने शास्त्री, साहित्य रत्न, साहित्याचार्य (हिंदी-संस्कृत) की शिक्षा अर्जित की। उन्होंने सन् 1958 से 1961 तक मथुरा से प्रकाशित जैन संदेश का संपादन किया। आगरा से प्रकाशित दैनिक सैनिक के संवाददाता रहे। सन् 1962 से 1978 तक साप्ताहिक जैन गजट का संपादन किया। इसी प्रकार कांग्रेस समाचार का भी संपादन किया। वे कांग्रेस संगठन से भी जुड़े रहे। साथ ही मंगल मुद्रणालय का संचालन किया, जिसकी मुद्रण के क्षेत्र में खासी साख रही। उन्होंने पाक्षिक समाचार पत्र अजमेर टुडे की स्थापना की, जिसका कुशल संपादन उनके पुत्र श्री अनुराग जैन कर रहे हैं, जो समाचार एजेंसी यूनिवार्ता के अजमेर ब्यूरो चीफ हैं। स्वर्गीय श्री जैन अजमेर के पहले टीवी न्यूज चैनल अजमेर अब तक में भी सक्रिय रहे। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कलम कलाधर उपाधि से सम्मानित किया गया। उनका निधन 16 जून, 2004 को हुआ। उनके सुपुत्र श्री अनुपम जैन भी पत्रकार हैं।

रविवार, 20 अक्टूबर 2024

नानकराम जगतराय की आंखें जब नम हो गईं

अजमेर उत्तर जो कि पूर्व में अजमेर पश्चिम सीट रही, के भूतपूर्व कांग्रेस विधायक स्वर्गीय श्री नानकराम जगतराय की छवि कितनी साफ सुथरी थी, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक बार तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कहा कि उन्हें एक सौ एक नानकरामों की जरूरत है। बेशक उन्हें तेज तर्रार विधायक नहीं माना गया, मगर उनकी छवि आम आदमी की नजर में ईमानदार, सरल, सहज सुलभ विधायक की तो थी ही। 

उनकी सरलता व मितव्ययता की स्थिति ऐसी थी कि वे कई बार रोडवेज की बस से ही जयपुर आते जाते थे। बस स्टैंड से अपने घर तक टैक्सी या तांगे से आया करते थे। एक बार उनकी तांगे में घर आने की फोटो मीडिया में भी चर्चा का विषय बनी। उनकी सबसे बडी खासियत ये थी कि जो भी फरियादी उनके पास आता तो वे उसकी जायज मांग पूरी करने के लिए बिना किसी ना नुकर के तुरंत डिजायर लिख दिया करते थे। यह बात दीगर है कि इसका लाभ उनके कुछ एक नजदीकियों ने उठाया होगा, मगर उन पर किसी भी डिजायर की एवज में कुछ मांगने का आरोप नहीं लगा। ईमानदारी के कारण ही विधायक के नाते मिलने वाला भत्ता कम पड जाता था। इसके लेकर वे बहुत परेशान रहते थे। मेरे उनसे व्यक्तिगत संबंध थे। एक बार मैं उनके पास बैठा था तो अपनी परेशान बयां करते हुए उनकी आंखें नम हो गई थीं। वे बोले पहले जब वे अपनी कोठडी में बैठा करते थे, तो उनका टेलीफोन बिल और चाय पानी का खर्च सीमित था, जिसे वे आसानी से वहन कर लेते थे, लेकिन विधायक बनने के बाद हर एक कार्यकर्ता यह सोच कर कि यह सरकारी खाते का है, इस कारण उनके टेलीफोन का उपयोग बेधकडक करता है, किसी को रोका भी नहीं जा सकता, नतीजतन विधायक के नाते जो टेलीफोन भत्ता मिलता है, उससे तीन चार गुना बिल आने लगा है। उसे चुकाना बहुत मुश्किल हो रहा है। इतने पैसे कहां से लाउं? चाय पानी का खर्च भी इतना अधिक हो गया है कि उसे वहन करना बस की बात की नहीं रही। समझा जा सकता है कि जिसे वसूली का फंडा पता न हो, वह भला उपरी खर्चा कैसे झेल सकता है। दूसरा ये कि वसूली वही कर सकता है, जो तेज तर्रार हो, नानकराम जैसे सीधे सादे विधायक को भला कोई क्यों गांठने वाला था।

खैर, बातचीत के आखिर में वे यहां तक बोल गए कि वे विधायक होने से पहले ज्यादा सुखी थे। यह सही है कि अब रौब बढ गया है, लोगों के काम भी हो रहे हैं, मगर सुख चैन छिन गया है, क्योंकि लोगों की अपेक्षाएं बहुत अधिक हैं और उन सब को पूरा करना संभव नहीं। ऐसे में लोग नाराज हो जाते हैं। जिसके नौ काम करो, मगर दसवां काम न कर पाओ तो पुराने सभी नौ कामों पर पानी फिर जाता है।


अतुल अग्रवाल कांग्रेस छोड भाजपा में शामिल

अजमेर में कांग्रेस के कार्यक्रमों में अतिरिक्त सक्रिय रहने वाले नेता अतुल अग्रवाल भाजपा में शामिल हो गए हैं। वे भूतपूर्व कांग्रेस नेता स्वर्गीय श्री सुरेश अग्रवाल के पुत्र हैं, जो अजमेर नगर जिला कांग्रेस का अध्यक्ष बनते बनते रह गए थे। वे भूतपूर्व राजस्व मंत्री स्वर्गीय श्री किशन मोटवानी के करीबी थे। अतुल अग्रवाल खुद भी नगर जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी कर चुके हैं।अतुल अग्रवाल सोशल मीडिया पर लिखते हैं कि 100 साल पुराने कांग्रेस परिवार के सदस्यों ने छोड़ी कांग्रेस। कांग्रेस के हतकर्मी रवैये को देख कर और नैतिकता के आधार पर किसी भी बड़े नेता ने अजमेर संभाग को सुधारने की कोशिश नहीं करी। इससे आहत होकर कांग्रेस के स्वार्थी नेताओं को मद्देनजर रखते हुए मजबूरन कांग्रेस छोड़ने पर हुए मजबूर। थामा भाजपा का हाथ। यहां उल्लेखनीय है कि वे अजमेर संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड चुके श्री रिजू झुंझुनवाला की संस्था जवाहर फाउंडेशन में सक्रिय हैं।


शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

क्या यह भ्रांत सांप्रदायिक सद्भाव नहीं?

हाल ही अखबारों में इस शीर्षक की खबर पढने को मिली कि हर साल की तरह इस साल भी मुस्लिम परिवार ने तैयार किया रावण का पुतला। बहुत सुखद लगा। सांप्रदायिक सद्भाव का नायाब उदाहरण पेश किया। वस्तुतः हम सांप्रदायिक सद्भाव को बहुत महत्व देते हैं। सांप्रदायिक सद्भाव जरूरी है भी। मगर कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि हम छद्म व भ्रांत सांप्रदायिक सद्भाव को जीते हैं। 

असल बात यह है कि रावण का पुतला बनाना पूर्णतः आजीविका का जरिया है। रावण का पुतला बनाने वाला यह जान कर थोडे ही रावण का पुतला बनाता है कि वह मुस्लिम है और उसको सांप्रदायिक सद्भाव प्रस्तुत करने के लिए रावण का पुतला बनाना है। वह पेट पालने के लिए कर रहा है, मगर यह हमारी सोच है कि एक मुस्लिम रावण का पुतला कैसे बना रहा है। सच ये है यह उसका काम है, उसे पुतला बनाने में महारत हासिल है। इतना ही नहीं, वह दुर्गा व गणपति की प्रतिमा भी बनाता है। उसे इससे कोई प्रयोजन ही नहीं कि लोग उसकी तारीफ करेंगे। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि आजीविका के साथ बोनस में सस्ती लोकप्रियता मिल रही हो तो उसे कौन छोडेगा। हां, अगर कोई मुस्लिम बिना पैसे लिए पुतला बनाए तो समझा जा सकता है कि वह सांप्रदायिक सद्भाव की सच्ची मिसाल प्रस्तुत करना चाहता है। जो भी हो, इसका सकारात्मक पहलु ये है कि मौजूदा माहौल में यह कृत्य वाकई साहस का काम है, भले ही मकसद आजीविका हो। इसकी तो दाद देनी ही चाहिए वह अन्य धर्म का काम करने से परहेज नहीं कर रहा। रहा सवाल, मीडिया का तो वह भी साधुवाद का पात्र है कि भ्रांत सांप्रदायिक सद्भाव ही सही, उसके जरिए भी वह सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश तो दे रहा है।