रविवार, 1 दिसंबर 2024

अजमेर में अमन को भंग नहीं किया जा सकेगा

सबके हित जुड़े होने के कारण है अजमेर में सांप्रदायिक सौहार्द्र

महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती का सालाना उर्स एक माह बाद ही है। इस बीच दरगाह शरीफ में शिव मंदिर होने का दावा करते हुए कोर्ट में अर्जी पेश होने के कारण पूरा देश उद्वेलित है। सारे न्यूज चैनल्स पर गरमागरम बहस हो रही है। आशंका के बादल छाये हुए हैं। मगर जानकार मानते हैं कि बहस-मुबाहिसा कितना भी हो, यहां के अमन-चौन को भंग नहीं किया जा सकेगा। 

वस्तुतः दरगाह पूरी दुनिया में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। जाहिर तौर पर उसमें ख्वाजा साहब की शिक्षाओं की भूमिका है। साथ ही हिंदुओं की उदारता, कि वे अपने धर्म के प्रति कट्टर नहीं और अन्य धर्मों के प्रति भी पूरा सम्मान भाव रखते हैं। यदि वजह है कि इस दरगाह में साल भर में आने वाले जायरीन में हिंदुओं की तादाद भी काफी है। ऐसे में यह संदेश जाना स्वाभाविक है कि यह मरकज सांप्रदायिक सौहार्द्र का समंदर है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ये है कि जब जब भी देश भर में किसी वजह से सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगड़ा और दंगे हुए, अजमेर शांत ही बना रहा।

असल में सुकून की बड़ी वजह है, सभी धर्मों व वर्गों के लोगों का हित साधन। उर्स मेले में आने वाले लाखों जायरीन यहां के अर्थ तंत्र की धुरि हैं। मेला ही क्यों, अब तो साल भर यहां जायरीन का तांता लगा रहता है। भरपूर खरीददारी के कारण आम दुकानदार की अच्छी कमाई होती है। सैकड़ों होटलों का साल भर का खर्चा अकेले उर्स मेले के दौरान निकल जाता है। छोटी छोटी मजदूरी करने वाले भी इस दौरान खूब कमाते हैं। रहा सवाल खादिमों का तो वे सूफी मत को मानने वाले होने के कारण उदार प्रवृत्ति के हैं, मगर साथ ही उनकी आजीविका ही जायरीन पर टिकी हुई है। हालांकि अब खादिम भी अन्य व्यवसाय करने लगे हैं, फिर भी उनकी मुख्य आजीविका का जरिया खिदमत से होने वाली अच्छी आय ही है। स्वाभाविक रूप से जब वे दिल खोल कर खर्च करते हैं तो उसका लाभ आम दुकानदार को होता है। दरगाह शरीफ में लाखों रुपए का गुलाब चढ़ता है, जिसकी खेती पुष्कर में अधिसंख्य हिंदू करते हैं। समझा जा सकता है कि जिस शहर में जायरीन या पर्यटक कह लीजिए, के आगमन से अर्थ चक्र घूमता हो, वहां स्वाभाविक रूप से सभी का हित इसमें जुड़ा हुआ है कि यहां शांति कायम रहे। यहां शांति रहेगी तो बाहर से आने वाला भी बेखौफ आएगा। इसका यहां हर वर्ग को ख्याल रहता है। जब भी कोई छुटपुट घटना होती है तो सभी की कोशिश रहती है कि विवाद जल्द निपटा लिया जाए।

इन सबके बावजूद अजमेर को सांप्रदायिक तौर पर संवेदनशील माना जाता है, उसकी वजह है अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर का आंतकवाद। इसी कारण दरगाह की अतिरिक्त सुरक्षा की जाती है। एक बार तो दरगाह में बम ब्लास्ट भी हो चुका है, जिसके आरोपियों को हाल ही सजा सुनाई गई है। इस घटना के बाद अब यहां सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है। उससे आभास ये होता है कि यहां खतरा है, मगर सच्चाई ये है कि अजमेर का नागरिक आम तौर पर शांति पसंद है। वह किसी उद्वेग में नहीं बहता। शहर के ऐसे शांत मिजाज के कारण एक बार अजमेर आ चुके अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद अजमेर में ही बसना पसंद करते हैं।

बहरहाल, चाहे जिस वजह से अजमेर सुकून भरी जगह हो, मगर इसी वजह से यह सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल बना हुआ है।

शनिवार, 30 नवंबर 2024

कौन होगा एडीए अध्यक्ष?

राजस्थान में विधानसभा उपचुनाव में सफलता से उत्साहित भाजपा में सरकारी राजनीतिक नियुक्तियों की कवायद आरंभ हो गई है। कुछ नियुक्तियां बजट सत्र से पहले हो सकती हैं। कानाफूसी है कि अजमेर विकास प्राधिकरण में अध्यक्ष के लिए दावेदारों ने एक्सरसाइज तेज कर दी है। समझा जाता है कि अजमेर में अनुसूचित जाति की एक विधायक श्रीमती अनिता भदेल व सिंधी समुदाय से दूसरे विधायक वासुदेव देवनानी के रहते सामान्य वर्ग के वेश्य, ब्राह्मण व राजपूत का तरजीह मिलेगी। वणिक वर्ग में पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिया का नाम सबसे उपर है। उन्होंने नागौर जिले के खींवसर विधानसभा क्षेत्र में उन्होंने पूरी गंभीरता से एडी चोटी का जोर लगा दिया। सफलता के श्रेय उनके खाते में भी दर्ज हो गया है। उन्हें लंबे समय से राजनीतिक लाभ नहीं मिल पाया है, इस कारण इस बार मौका मिल सकता है। वे साधन संपन्न भी हैं, जिसकी प्राधिकरण अध्यक्ष बनने में बहुत जरूरी है। दूसरे हैं पूर्व संघ महानगर प्रमुख सुनिल दत्त जैन। तीसरे हैं, प्रवीण जैन, जिन पर केन्द्रीय राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी का वरद हस्त है। कुछ लोग अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन का नाम भी ले रहे हैं। पिछला अधूरा कार्यकाल उन्हें आज तक सालता है। आरएसएस पदाधिकारियों से उनके अच्छे संबंध हैं। विकल्प के रूप में वे अपने पुत्र अमित जैन का नाम आगे कर सकते हैं। इसी प्रकार नगर निगम के पूर्व मेयर धमेन्द्र गहलोत भी प्रबल दावेदार है, मगर देवनानी से ताजा नाइत्तफाकी बाधा बन सकती है।

राजपूत वर्ग में अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत का नाम चल रहा है, जो ताजा बदले समीकरण में विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के नजदीक जा चुके हैं। ब्राह्मण समुदाय में भाजपा छोड चुके पार्षद ज्ञान सारस्वत की गिनती है, मगर पिछले विधानसभा चुनाव में बगावत करने के कारण बडी बाधा बनी हुई है। संघ का एक धडा आगामी निगम चुनाव से पहले उनकी पार्टी में दमदार वापसी चाहता है। केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव के करीबी जे के शर्मा भी लाइन में हैं, मगर वे पार्टी से निलंबित हैं। आरएसएस पृष्ठभूमि के वकील जगदीश राणा के नाम पर भी विचार चल रहा है। हालांकि किसी सिंधी के प्राधिकरण का अध्यक्ष बनने की बहुत कम संभावना है, मगर कोई साधन संपन्नता के दम पर बाजी मार भी सकता है। अजमेरशहर भाजपा अध्यक्ष रमेश सोनी की लॉटरी लग सकती है। महिलाओं में डॉ कमला गोखरू व भारती श्रीवास्तव के नाम हैं। जो भी बने, मगर उसमें देवनानी की स्वीकृति जरूर ली जाएगी।

 

गुरुवार, 28 नवंबर 2024

आजादी के बाद अजमेर के पहले कांग्रेस अध्यक्ष थे स्व श्री जीतमल लूनिया

अजमेर में 15 नवम्बर, 1905 को जन्मे श्री जीतमल लूनिया ने एम.ए. तक शिक्षा अर्जित की। वे सन् 1914 में इंदौर गए और स्वर्गीय श्री हरिभाऊ उपाध्याय के साथ मिल कर मालवा मयूर नामक मासिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया। सन् 1916 में हिंदी साहित्य मंदिर की स्थापना की। सन् 1922 में उसका कार्यालय बनारस स्थानांतरित हो गया। इसके बाद स्व. श्री अर्जुन लाल सेठी के सुझाव पर सन् 1925 में अजमेर आ गए। यहां सस्ता साहित्य मंडल के नाम से प्रकाशन कार्य शुरू किया। उन्होंने अहसहयोग आंदोलन में भाग लिया और कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गए। सरकार ने उसे गैर कानूनी घोषित कर दिया और उन्हें एक साल तक कारावास में रखा गया। इसके बाद पत्नी श्रीमती सरदार बाई के साथ सत्याग्रह में भाग लिया और छह-छह माह तक कारावास भोगा। सन् 1933 में अजमेर सेवा भवन नामक संस्था की स्थापना की और अछूतोद्धार व राष्ट्रोत्थान के कामों में लग गए। सन् 1940 में फिर सत्याग्रह में भाग लिया और 1942 में फिर एक साल का कारावास भोगा। सन् 1947 में शहर कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए और 15 अगस्त को देश की आजादी पर नया बाजार स्थित राजकीय संग्रहालय पर तिरंगा झंडा फहराया। वे 1948 में नगर परिषद के अध्यक्ष चुने गए। सन् 1970 में दिल्ली में स्वतंत्रता सेनानी प्रशस्ति एवं ताम्रपत्र से सम्मानित किए गए। सन् 1973 में शराबबंदी सत्याग्रह में भाग लिया और जेल गए।

अजमेर एट ए ग्लांस से साभार


नाम पहले भी बदले जाते रहे हैं

आज जब विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी के निर्देश पर खादिम टूरिस्ट बैंग्लो का नाम अजयमेरू के नाम पर कर दिया गया है, फॉय सागर का नाम वरूण सागर किया जा रहा है, किंग एडवर्ड मेमोरियल का नाम ऋषि दयानंद के नाम पर करने की कवायद हो रही है तो ख्याल आता है, ऐसा पहली बार नहीं हो रहा। पहले भी कई स्थानों के नाम बदले हैं। 

आज जिसे हम तारागढ के रूप में जानते हैं, प्रारंभ में उसका नाम अजयमेरू दुर्ग था। सन् 1505 में मेवाड़ के राजकुमार पृथ्वीराज ने इस पर अधिकार किया तथा अपनी रानी ताराबाई के नाम से दुर्ग का नाम तारागढ़ रख दिया।

कुछ और उदाहरण लीजिए-

अजमेर के प्रबुद्ध नागरिक ऐतेजाद अहमद खान ने कुछ साल पहले फेसबुक पर एक फोटो शाया की थी, जो कि यह प्रमाणित करती है कि हम जिसे केसरगंज (Kesar) इलाके के नाम से जानते हैं, वह असल में (Qaiser) गंज है, जिसकी स्थापना 1883 में हुई थी। इसका अपभ्रंश होते हुए वह केसरगंज हो गया और ये ही आजकल प्रयोग में आ रहा है। 

शहर के अन्य कई स्थान भी पहले किसी और नाम से थे, जो कि बाद में बदल गए। इनकी बानगी देखिए- जिसे हम आज रामगंज कहते हैं, वह कभी रसूल गंज हुआ करता था। इसका प्रमाण ये है कि पुलिस चौकी वाली गली में उसकी नामपट्टिका लगी हुई है। इसी प्रकार आज जिस पर्यटन स्थल को हम ढ़ाई दिन का झौंपड़ा कहते हैं, वह कभी सरस्वती कंठाभरण संस्कृत विद्यालय हुआ करता था। इसी प्रकार अजमेर शहर के केन्द्र में नया बाजार के पास स्थित अकबर के किले का निर्माण अकबर ने 1571 से 1574 ईस्वी में राजपूतों से होने वाले युद्धों का संचालन करने और ख्वाजा साहब के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए करवाया था। बाद में इसे राजपूताना संग्रहालय और मैगजीन के नाम से भी जाना जाने लगा। अब नाम राजकीय संग्रहालय कर दिया गया है।

यह सब जानते हैं कि ईसाई समुदाय के लोग जिस स्थान पर रहा करते थे, उसे क्रिश्चियनगंज कहा जाता है, मगर आज कई लोग उसे कृष्णगंज के नाम से पुकारना पसंद करते हैं और कुछ संस्थाओं के नाम इसी नाम पर हैं। हालांकि क्षेत्र के पुलिस थाने का नाम क्रिश्चियनगंज गंज थाना है। इसी प्रकार अंदरकोट को आज कई लोग इंद्रकोट कहना पसंद करते हैं, जब कि इसका अर्थ था परकोटे के अंदर का हिस्सा। इसी प्रकार आपको ख्याल होगा कि जवाहरलाल नेहरू अस्पताल को आज भी कई पुराने लोग विक्टोरिया अस्पताल के नाम से जानते हैं, जिसका नाम आजादी के बाद नेहरू जी के नाम से कर दिया गया। इसी प्रकार इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के शासन की रजत जयंती के मौके पर रेलवे स्टेशन के सामने विक्टोरिया क्लॉक टावर निर्माण करवाया गया, जिसे आज हम केवल क्लॉक टावर या घंटाघर के नाम से जानते हैं और उसी के नाम पर क्लॉक टावर पुलिस थाने का नाम है। लंबे समय तक राजकीय महाविद्यालय के नाम से जाना जाने वाले ब्रिटिशकालीन कॉलेज का नाम कुछ साल पहले की सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय कर दिया गया। उसके मुख्य द्वार को भगवा रंग से रंग दिया गया है। इसी प्रकार अजमेर विश्वविद्यालय का नाम महर्षि दयानंद सरस्वती के नाम कर दिया गया। ऐसे ही जयपुर रोड पर तत्कालीन यूआईटी चेयरमेन डॉ श्रीगोपाल बाहेती ने शायद तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मिजाजपुर्सी में अशोक उद्यान बनाया, जिसे बाद में भाजपा सरकार में सम्राट अशोक उद्यान कर दिया गया। 

आपको ख्याल में होगा कि कुछ साल पहले अजमेर रेलवे स्टेशन को अजमेर शरीफ किया जा रहा था, मगर विरोध के चलते उसे रोक दिया गया। 

वस्तुतः कालचक्र में जब भी जो प्रभावशाली हुआ, उसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर नाम बदल दिए। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। इसमें उद्वेलित होने जैसी कोई बात नहीं है।

बुधवार, 27 नवंबर 2024

जब नरसिंह राव को काले झंडे दिखाने को आमादा थे पत्रकार

अजमेर के पत्रकार जागरूक व तेज तर्रार रहे हैं। कई मामलों में ज्वलंत विषयों पर खोजपूर्ण पत्रकारिता इनकी पहचान रही है। लंबी फेहरिश्त है। अजमेर दुनिया में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल है। यहां आए दिन दरगाह शरीफ व तीर्थराज पुष्कर में वीवीआई का आगमन होता है। उसका कवरेज पूरी गंभीरता से करते हैं। एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहराव का अजमेर आगमन हुआ। उनका दरगाह जियारत का कार्यक्रम था। पत्रकार चाहते थे कि उनसे बातचीत हो जाए, मगर एसपीजी सुरक्षा कारणों से इसके लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि पत्रकारों को कवरेज के लिए दरगाह में प्रवेश नहीं दिया गया। इससे पत्रकार नाराज हो गए और राव से मिलने को अड गए। दरगाह के सामने वाला रोड देहली गेट तक खाली करवा लिया गया था। सारे पत्रकार ईगल स्टूडियो में जा कर बैठ गए। योजना बनी कि विरोध स्वरूप राव को काले झंडे दिखाए जाएं। जैसे ही प्रशासन को पता लगा, वह हरकत में आ गया। कलेक्टर एसपी के तो हाथ पांव फूल गए। व्यवस्था ये दी गई कि हेलीपेड पर बात करवा दी जाएगी। सारे पत्रकार हेलीपेड पहुंच गए। राव जब वहां पहुंचे तो सब अलर्ट हो गए कि अब बात हो जाएगी। तय यही हुआ कि सभी लाइन से खडे हो जाएं, एक एक से बात करवाई जाएगी। राव आए। धीरे धीरे चलते गए। पत्रकारों ने सवाल दागना शुरू कर दिए। मौनी बाबा राव मुस्कराते हुए आगे बढते गए। सवाल सुने, मगर एक का भी जवाब नहीं दिया। पत्रकारों को बडी निराशा हुई, मगर क्या किया जा सकता था। प्रशासन ने तो अपना मिलवाने का वादा निभा दिया, मगर जवाब देने वाला जवाब न देना चाहे तो उसका कोई उपाय नहीं।