बहरहाल, सवाल ये कि क्या कुत्ताशाला दुबारा नहीं खोली जानी चाहिए?
गुरुवार, 9 जनवरी 2025
किसी जमाने में अजमेर में कुत्ताशाला हुआ करती थी
मंगलवार, 7 जनवरी 2025
सांप्रदायिक सौहार्द्र की रोशनी देते हैं ख्वाजा गरीब नवाज
राज-पाठ, शासन-सत्ता और धर्मांतरण से विमुख गरीब नवाज के भारत आगमन का मकसद यहां की आध्यात्कि संस्कृति के साथ मिल-जुल कर एक ही ईश्वर की उपासना करना और अलौकिक ज्ञान अर्जित कर उसका प्रकाश बांटना था।
ख्वाजा साहब के बारे में यह उक्ति बिलकुल निराधार है कि वे इस्लाम का प्रचार करने भारत आए थे। ऐसे मिथक उन कट्टरपंथी लोगों के हो सकते हैं जो कि इंसानी जिंदगी के हर पहलु को कट्टर धार्मिकता से जोड़ते हैं। वे किसी भी धर्म से जुड़ी अन्य उदारवादी और मानवतावादी विचारधाराओं के अंतर को समझने में असमर्थ हैं। वे नहीं जानते कि दुनिया के सभी मूल धर्मों से उदित कुछ ऐसी विचारधाराएं भी हैं, जो कि मानव समाज में अपना अलग ही आध्यात्मिक महतव रखती हैं। वे विचारधाराएं भले ही अपने-अपने धर्मों से जुड़ी हुई हैं, मगर उनका एक मात्र मकसद मानव की सेवा करना है। जैसे मूल हिंदु धर्म से निकली रहस्यवादी विचारधाराएं, ईसाई धर्म से निकाल वैराग्यवाद और इस्लाम से निकली सूफी विचारधारा। इसी प्रकार अनेक मत और पंथ अपने धर्म के आडंबरों से मुक्त हुए और उन्होंने सारा जोर मानव की सेवा में ही लगा दिया। ख्वाजा साहब का मूल धर्म हालांकि इस्लाम ही था, लेकिन वे इस्लाम व कुरान के मानवतावादी पक्ष में ही ज्यादा विश्वास रखते थे। यदि सूफी दर्शन का गहराई से अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि एक सूफी दरवेश केवल इस्लामी शरीयत का पाबंद नहीं होता, बल्कि उसकी इबादत या तपस्या इन मजहबी औपचारिकताओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ होती है। इस्लाम धर्म के मुताबिक पांच वक्त की नजाम अदा करना, रमजान के महिने में तीन रोजे रख लेना, खैरात-जकात निकाल देना, हज को चले जाना तो सभी मुसलमान अपना मजहबी फर्ज समझ कर पूरा करते हैं, लेकिन एक सूफी संत के लिए अल्लाह ही इतनी सी इबादत करना नाकाफी है। वह केवल तीस रोजे से संतुष्ट नहीं होता, बल्कि पूरे 365 दिन भूखे रहना पसंद करता है। वह एक या दो हज नहीं बल्कि अपनी आध्यामिक शक्ति से सैकड़ों हज करने में विश्वास रखता है। एक सूफी शायर ने कहा है कि दिन बदस्त आवर कि हज्जे अकबरस्त यानि किसी दीन-दुरूखी के दिन को रख लेना या उसे खुश कर देना एक बड़े हज के समान है। इस नेक काम को हर सूफी संत बढ़-चढ़ कर अंजाम देता है। इसी कारण उसकी मान्यता यही रहती है कि उसे अल्लाह ने इस जमीन पर भेजा ही इसलिए है कि वह दीन-दुरूखियों की ही सेवा करता रहे। सूफी मत की सबसे प्रबल अवधारणा ही यही है कि सभी धर्मों का प्रारंभ आत्मिक व आध्यात्मिक चिंतन से है। जब धर्म आत्मिक केन्द्र से हट जाते हैं तो उनमें केवल आडंबर और औपचारिकताएं शेष रह जाती हैं। वे धार्मिक उन्माद, कट्टरता और सांप्रदायिकता के रूप में ही प्रकट होती हैं। सूफी मत की मान्यता है कि एक आत्मविहीन धर्म पूरे सामाजिक संतुलन को बिगाड़ देता है। इसी असंतुलन की वजह से ही समाज में विद्वेष फैलता है और सांप्रदायिक दंगे भी इसी के देन हैं। सूफी मत के अनुसार किसी भी धर्म की पूर्ण परिभाषा और आत्मा उसके अध्यात्मिक रूप में ही निहित है, औपचारिकता में नहीं। यही वजह है कि दार्शनिक दृष्टि से गरीब नवाज के सूफी दर्शन और भारत के प्राचीन एकेश्वरवाद, एकात्म में पर्याप्त समानता है।
सोमवार, 6 जनवरी 2025
साइकिल की सीट देख कर कर दिया पीठ दर्द का इलाज
सत्तर के दशक की बात है। एक बार तोषनीवाल इंडस्ट्रीज में काम करने वाले पी. भट्टाचार्य उनके पास गए। तकलीफ ये बताई कि उनकी पीठ में छह माह से दर्द है। कई इलाज करवाए। मगर ठीक नहीं हुआ। सारी दास्तां सुन कर डॉक्टर साहब ने उनसे पूछा- आप कैसे आए हैं? उन्होंने बताया- साइकिल से। डाक्टर साहब ने चलो बाहर, मुझे दिखाओ। बाहर जा कर डॉक्टर साहब ने सीधे साइकिल की सीट को चैक किया। उस जमाने में चमड़े की कड़क सीट हुआ करती थी। वहीं खड़े-खड़े भट्टाचार्य जी से कहा- आपको कोई बीमारी नहीं है, जा कर मैकेनिक से सीट के नीचे की स्प्रिंग चैंज करवा लो। भट्टाचार्य जी तो हक्के-बक्के रह गए। चंद दिन बाद आ कर उन्होंने रिपोर्ट दी कि कमर का दर्द पूरी तरह से गायब हो गया है। है न दिलचस्प वाकया।
इस किस्से की पुष्टि उनके सुपुत्र जाने-माने इंटरनेशनल टेबल टेनिस अंपायर श्री रणजीत मलिक ने भी की। एक किस्सा खुद उन्होंने बताया। वो ये कि एक बार वे कॉलेज जाने से पहले जेब खर्ची लेने के लिए पिताश्री के क्लीनिक में गए तो वहां एक आदमी बहुत कराह रहा था। साथ में आए व्यक्ति ने डॉक्टर साहब को बताया कि पिछले एक माह से सिर में तेज दर्द है। कई डाक्टरों को दिखाया, मगर कोई राहत नहीं मिली। राहत तो दूर बीमारी तक का पता नहीं लग रहा। इस पर डॉक्टर साहब ने बीमार के अटेंडेंट से कहा- जा कर किसी नाई से नाक के बाल कटवाओ। अटेंडेंट भौंचक्क सा खड़ा रहा। इस पर डॉक्टर साहब ने कहा- अरे भाई, जैसा मैं कह रहा हूं, करो। जो इलाज करवाते करवाते तंग आ गया हो, वह इस उपाय को भी करने को राजी हो गया। आधे घंटे बाद आ कर मरीज ने डॉक्टर साहब के पैर पकड़ लिए। वह ठीक हो गया था। रणजीत जी ने पिताश्री से इस वाकये का राज पूछा। इस पर डॉक्टर साहब ने बताया कि आम तौर पर नाक के बाल बाहर की ओर आते हैं, जिसे कि हम काट देते हैं। इस आदमी के नाक के बाल अंदर की तरफ चले गए थे, इसी कारण इसके सिर में दर्द रहता था। है न कमाल का डायग्रोस और लाजवाब इलाज।
श्री मलिक ने बताया कि एक बार एक मरीज पिताश्री को दिखाने आया। मरीज ने फीस पूछी। पता लगा कि फीस पांच सौ रुपए है। इस पर उस बीमार ने अपना बटुआ निकाल कर कहा कि वह गरीब आदमी है, उसके पास केवल नब्बे रुपए ही हैं। इस पर पिताश्री ने उससे कहा कि दवाई ले लो और ये नब्बे रुपए भी रख लो। उन्होंने बताया कि वे गरीबों का मुफ्त इलाज किया करते थे। गरीब मरीजों के लिए वे भगवान का ही रूप थे। गरीब गांव वाले इलाज के एवज में सब्जियां भेंट कर जाते थे।
डॉक्टर साहब का देहावसान 87 वर्ष की उम्र में 16 अक्टूबर 2000 को हुआ।
श्री मलिक ने डाक्टर साहब के बारे में कुछ और जानकारियां दीं, जो कि उनको द संस्कृति स्कूल में कार्यरत श्री राजेन्द्र प्रसाद शर्मा ने उनसे साझा कीं। श्री शर्मा की ही लेखनी में संस्मरण हूबहू आपके समक्ष प्रस्तुत है-
1. यह घटना 1976 की है। उस समय मेरे पिताजी की पोस्टिंग पुलिस हॉस्पिटल में कंपाउंडर के पद पर थी। एक सज्जन, जो कि शास्त्री नगर में रहते थे, की वृद्ध माताजी अस्वस्थ चल रही थीं। उस समय के अच्छे फिजीशियन डॉक्टर आर. एन. माथुर का इलाज चल रहा था। उसके तहत उनके ड्रिप पिताजी द्वारा लगाई जा रही थी। दो दिन तक ड्रिप बराबर चली, लेकिन तीसरे दिन उनको जबरदस्त रिएक्शन हो गया। पिताजी के पास जो भी एंटी डोज थे, वो देकर हालत को काबू किया गया। साथ ही उनको सलाह दी कि वे डॉक्टर माथुर को दिखाएं। उन्होंने भी एंटी रिएक्शन का जो भी ट्रीटमेंट था, वो दिया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। फिर उन्होंने डॉक्टर एम. एस. माथुर, जो कि अच्छे फिजिशियन माने जाते थे, से इलाज करवाया, लेकिन फिर भी रिएक्शन खत्म नहीं हुआ। आखिर एक दिन वो पापा से सलाह करने आए। पापा ने उनको सलाह दी कि वो डॉक्टर मलिक साहब को दिखाए। उस समय डॉक्टर साहब हरिनगर, शास्त्री नगर में निवास करते थे। डॉक्टर साहब अपने डेकोरम का पूरा ध्यान रखते थे। डॉक्टर साहब से जब उन सज्जन ने घर पर चल कर देखने को कहा तो डॉक्टर साहब ने उनसे अपने डेकोरम के अनुसार टैक्सी लेकर आने को कहा। उन दिनों शहर में गिनी-चुनी टैक्सी हुआ करती थी। टैक्सी लाई गई। डॉक्टर मलिक साहब ने पेशेंट को देख कर एनाल्जिन लिख कर दी। पहले दिन, दिन में तीन बार, दूसरे दिन दो बार व तीसरे दिन एक बार देकर बंद करने की हिदायत दी। साथ ही कहा कि सिर्फ एनाल्जिन ही देनी है, उसका कोई भी सब्सीट्यूट नहीं होना चाहिए। उन सज्जन ने अपना सिर पीट लिया और यह सोच कर तीन दिन तक गोली नहीं दी कि मेरी मां को कोई जुकाम-बुखार-बदन दर्द थोड़े ही है। तीसरे दिन वो पापा के पास झगड़े के मूड से आए कि उन्होंने कहाकि कैसा अच्छा डॉक्टर बतलाया, जो इतना उनका खर्चा भी करवा दिया और दवा के नाम पर केवल एनाल्जिन दे दी। पापा ने उनको समझाया कि अगर मलिक साहब ने लिखी है तो सोच समझ कर लिखी है, वो देकर तो देखें। दूसरे दिन से एनाल्जिन चालू की गई और उनको आश्चर्य तब हुआ जब पहले दिन ही रिएक्शन का आधा असर खत्म हो गया और वो माताजी तीन दिन एनाल्जिन लेकर बिल्कुल स्वस्थ हो गईं।
2. यह घटना 1959 की है। मेरे पिताजी अभी का जवाहर लाल नेहरू चिकित्सालय, जो कि तब विक्टोरिया हॉस्पिटल हुआ करता था, में कंपाउंडर के पद पर कार्यरत थे। उस समय उनके पास हॉस्पिटल के स्टोर का चार्ज था। स्टोर की ऑडिट करने के लिए टीम आई हुई थी। एक दिन टीम के इंचार्ज ने पापा को बताया कि उनके बहुत तेज घबराहट, बेचौनी आदि हो रही है और ये समस्या उनको पिछले काफी सालों से है। उन्होंने कई डॉक्टर्स को दिखा कर इलाज लिया, लेकिन फर्क नहीं पड़ा। पिताजी ने उनसे कहा कि वे घबराए नहीं दोपहर में डॉक्टर मलिक अपने चेंबर में आएंगे, तब उनको दिखा देंगे। डॉक्टर मलिक उस समय विक्टोरिया हॉस्पिटल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी थे। डॉक्टर मलिक साहब को दिखाया गया। उन्होंने केवल उनसे उनकी मेडिकल हिस्ट्री पूछी और पिताजी से बोले इनका यूरीन टेस्ट करवा कर लाओ। यूरीन टेस्ट की रिपोर्ट ले जा कर दिखाई तो वे बोले पेट का एक्सरे करवा कर लाओ। एक्सरे की रिपोर्ट देखने के साथ ही डॉक्टर मलिक बोले, मरना चाहता है क्या, ये इतना बड़ा स्टोन पेट में लेकर क्यों घूम रहा है, इसका जल्द से जल्द ऑपरेशन करवाओ। जब वह सज्जन पेट संबंधी कोई बीमारी नहीं बता रहे थे, कई एक्सपर्ट डॉक्टर्स से इलाज ले चुके, लेकिन कोई भी ठीक से डायग्नोस नहीं कर पाया। ऐसे जानकार डॉक्टर थे मलिक साहब।
डॉक्टर एन. सी. मलिक के चमत्कारिक इलाज के बारे में पिछले ब्लॉग पर प्रतिक्रिया देते हुए दैनिक न्याय परिवार के वरिष्ठ पत्रकार श्री वृहस्पति शर्मा, जो कि आजकल जयपुर निवास करते हैं, ने भी अपना स्वयं का अनुभव शेयर किया है। वह हूबहू आपकी नजरः-
मै स्वयं इसका जीवंत उदाहरण हूं। वर्ष 1979 मे मुझे पेट मे भयंकर बीमारी हुई। कई माह तक परेशान रहा। अजमेर, जयपुर एवं उदयपुर के अनेक डॉक्टर्स को दिखाया। न जाने कितने टेस्ट, एक्स रे करवाये गये। खाने मे अधिकतर वस्तुएं बंद कर दी गईं। लगता था जीवन का अंत नजदीक है। डॉक्टर्स को कुछ समझ नहीं आ रहा था। अंत मे यह फाइनल रहा कि ऑपरेशन किया जाएगा, तभी पता लगेगा कि वास्तव मे समस्या क्या है? ऑपरेशन से एक दिन पहले मैं एवं पत्नी आगरा गेट गणेश जी एवं हनुमान जी के मंदिर गये। जब हम वहां से आ रहे थे, तब मेरा एक मित्र मिला। उसने मेरी हालत देख कर सारी बात पूछी। मैने उसे सब कुछ बताया और यह भी बताया की कल ऑपरेशन है। उसने मेरे को कहा कि मेरी बात मानो, एक बार डॉक्टर मलिक साहब को दिखा लो। मैने कहा की मैं तो जानता ही नहीं हूं। उसने कहा मै जानता हूं एवं मैं उनके यहां जाता रहता हूं। मैं अपनी सारी जांच रिपोर्ट्स, एक्स रे आदि लेकर डाक्टर मलिक के यहां भगवान का नाम लेकर गया। डॉक्टर साहब ने दो मिनट मेरी बात सुनी। मैने मेरी फाइल उनके आगे रखी। सच कहता हूं उन्होंने उसके हाथ भी नहीं लगाया। इसके अलावा उन्होंने सभी डॉक्टर्स के लिये जो शब्द यूज किए एवं जो गालियां दीं, मैं उनका यहां उल्लेख नहीं कर सकता। डॉक्टर साहब ने मुझे कहा कि जेन्टल मैन, तुम एक दम ठीक हो जाओगे। उन्होंने मुझे 10 दिन की दवा लिखी, जो शायद 15 रुपए की आई। जब मैने खाने के लिये पूछा तो उन्होंने कहा सब कुछ खाओ। उन्होंने यह भी कहा की 10 दिन के बाद आने की आवश्यकता नहीं है। सच कहता हूं, आधा तो मैं उसी वक्त ठीक हो गया। 10 दिन बाद मैं बिलकुल ठीक हो गया और आज तक मुझे फिर वो समस्या नहीं हुई।
रविवार, 5 जनवरी 2025
नेहरू जी की जियारत के वक्त शैखुल मशाएख हज़रत सैयद इनायत हुसैन थे दीवान
प्रसंगवश बता दें कि सैयद इनायत हुसैन साहब ने दारूल उलूम मोईनिया उस्मानिया से आलिम फाज़िल की डिग्री 7 अगस्त 1924 को हासिल की। उसके बाद हिकमत की तालीम हासिल करने के लिए मुमबा-उत-तिब (तिब्बिया) कॉलेज, लखनऊ गये। वहां से आपसे कामिलुल तिब (हकीम) व जराहत की सनद मार्च 1926 में हासिल की। बाद में अजमेर तशरीफ लाकर खानकाह शरीफ, कमानी गेट के पास अपना दवाखाना खोला। कई मरीज अपनी गुरबत ज़ाहिर कर देते तो आप दवा तक के पैसे न लेकर उसका मुफ्त इलाज कर देते थे। सन् 1947 में देश विभाजन होने पर तत्कालीन दीवान सैयद आले रसूल अली खां के पाकिस्तान चले जाने पर सन् 1948 में दरगाह ख़्वाजा साहब के 34वें दीवान बने और अपने अख्लाक (व्यवहार) से लोगों का दिल जीत लिया। आपके हिन्दुस्तान भर में हज़ारों की तादाद में मुरीद थे। खास तौर से हैदराबाद, बॉम्बे, कोलकाता, कटक आदि में आपने खानकाहें कायम कीं और चिश्तिया सिलसिले को फरोग दिया। सन् 1959 में दिल का दौरा पडऩे से आपका इन्तेकाल हुआ। सोलह खम्बे के पास गुम्बद ख़्वाजा हुसैन अजमेरी में आपका मज़ार है।
शनिवार, 4 जनवरी 2025
केन्द्र सरकार दरगाह कमेटी व नाजिम को लेकर गंभीर नहीं
सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कमेटी के प्रशासनिक मुखिया व कमेटी के सदस्यों की नियुक्ति में अत्यधिक लेटलतीफी बरती जाती है। ऐसे अनेक मौके रहे हैं, जबकि नाजिम की अनुपस्थिति में कार्यवाहक नाजिम से ही काम चलाया गया है। स्थिति यह आ गई कि 813वां उर्स नाजिम व कमेटी के अभाव में संपन्न होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से पेश की गई चादर के दौरान कमेटी की ओर से इस्तकबाल करने वाला कोई नहीं था। अल्पसंख्यक मंत्रालय के अधिकारी ने उपस्थित हो कर औपचारिकता निभाई।
सरकार की मनमर्जी देखिए कि जब अब तक यहां नौकरी कर रहे सरकारी अधिकारी की नियुक्ति का नियम है और यही परंपरा भी रही है, उसके बावजूद इस पद पर सेवानिवृत्त आईएएस को नियुक्त कर दिया जाता है। जबकि यहां पूर्णकालिक अधिकारी की जरूरत है। जरूरत इसलिए है कि यह उस दरगाह का प्रबंध देखने वाली कमेटी का प्रशासनिक मुखिया है, जो पूरी दुनिया में सूफी मत मानने वालों का सबसे बड़ा मरकज है। इतना ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के चलते अत्यंत संवेदनशील स्थान है। आतंकियों के निशाने पर है और एक बार तो यहां बम ब्लास्ट तक हो चुका है।
बेशक प्रतिदिन आने वाले जायरीन की सुविधा के मद्देनजर सरकार गंभीर रहती है, उसके लिए बजट भी आवंटित होता है, मगर दरगाह कमेटी व नाजिम को लेकर सरकार एक ढर्रे पर ही चल रही है। वस्तुस्थिति ये है कि यह कमेटी, विशेष रूप से नाजिम न केवल दरगाह की दैनिक व्यवस्थाओं को अंजाम देते हैं, अपितु खादिमों व दरगाह दीवान के बीच आए दिन होने वाले विवाद में भी मध्यस्थ की भूमिका उन्हें निभानी होती है। यह काम कोई पूर्णकालिक अधिकारी ही कर सकता है। होना तो यह चाहिए कि इस पद पर नियुक्ति ठीक उसी तरह से की जाए, जिस तरह आरएएस व आईएएस अधिकारियों तबादला नीति के तहत की जाती है। उसमें विशेष रूप से यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वह दबंग हो। एक सेवानिवृत्त अधिकारी में कितनी ऊर्जा होती है, यह बताने की जरूरत नहीं है, जबकि यहां ऊर्जावान अधिकारी की जरूरत है। ऐसा अधिकारी ही यहां की व्यवस्थाओं को ठीक ढ़ंग से अंजाम दे सकता है।
अफसोसनाक बात है कि इस ओर केन्द्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय कत्तई गंभीर नहीं है। यही वजह है कि जब भी कोई नाजिम अपना कार्यकाल पूरा करके जाता है या इस्तीफा दे देता है तो लंबे समय तक यह पद खाली ही पड़ा रहता है। कार्यवाहक नाजिम से काम चलाया जाता है, जिसके पास न तो प्रशासनिक अनुभव होता है और न ही उतने अधिकार होते हैं।

