अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उन्हें हार्दिक बधाई देता है।
रविवार, 19 जनवरी 2025
हर्षित हाडा राजस्थान हाईकोर्ट की ओर से सम्मानित
सिंधु रत्न श्री जोधाराम टेकचंदाणी का देहावसान
शनिवार, 18 जनवरी 2025
बुराई हर जगह है, छोड़ कर कहां जाओगे?
बाबा ने अपने जीवन का सार बताते हुए समझाया कि बेटा दुनिया तो बुरी ही है। हर जगह बुरे लोग हैं। हर जगह कोई न कोई समस्या है। ऐसी कोई जगह नहीं, जहां समस्या नहीं। यहां से छोडोगे और दूसरी जगह जाओगे तो वहां भी कोई ने कोई समस्या होगी। बस समस्या का रूप बदल जाएगा। किसी भी जगह बिलकुल आपके अनुकूल माहौल नहीं मिलेगा। इस दुनिया में जीना है तो समझौते करने ही होंगे। आप तो अपने काम से काम रखो। दूसरे क्या करते हैं, इस पर ध्यान मत दो। आप तो सज्जन बने रहो ना, कौन रोक रहा है आपको सज्जन बने रहने से? बाबा ने बहुत समझाया, मगर वे इस्तीफा देने पर अड़ ही गए। नौकरी छोड़ कर ही माने।
खैर, इस प्रसंग से बाबा की अनुभव सिद्ध बात मेरे मन में घर कर गई। वाकई चारों ओर बेईमानी है, चालाकी है, स्वार्थपरता है, उसे ठीक करना हमारे बस की बात नहीं। ठीक करना हमारा ठेका भी नहीं। कितनों को ठीक कर लोगे। उलटे खुद की खराब हो जाओगे। बेहतर ये है कि केवल अपने आप को देखो। स्वांतः सुखाय जीयो। आपको जैसा उचित लगता है, वैसा आचरण करो, दुनिया को छोड़ हो अपने हाल पर। उस पर अपना दिमाग अप्लाई मत करो। खुद की सज्जनता से वास्ता रखो, दूसरे की दुर्जनता से क्या लेना देना। अपने मन को शांत रखो। मन चंगा तो कठौती में गंगा। अगर दुनिया की आपाधापी से टकराओगे तो तनाव ही मिलेगा। वाकई ये कहावत सही है कि जो सुख चावे जीव को तो भौंदू बन कर रह।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
गुरुवार, 16 जनवरी 2025
अजमेर में भी होता था मुजरा
बुधवार, 15 जनवरी 2025
ईमानदार पत्रकारिता के प्रति पूर्ण समर्पण ने क्या सिला दिया फोटो जर्नलिस्ट महेश नटराज को?
जहां तक सरकार की ओर से मदद की उम्मीद है, वह बेमानी है। वह सिर्फ इतना कर सकती है कि न्यूनतम पारिश्रमिक तय कर उसकी सख्ती से पालना करवाए। पत्रकार साथियों को चाहिए कि वे एकजुट हो कर पत्रकार कल्याण कोष बनाना बनाएं, ताकि जब भी किसी के साथ बीमारी आदि का बुरा समय आए, या अकस्मात निधन हो तो उस कोष से सहायता दी जा सके। हमारी सोसायटी बहुत संवेदनशील है। पूरी उम्मीद की जा सकती है कि वह ऐसे कोष के लिए मुक्तहस्त सहयोग करेगी।
स्वर्गीय श्री नटराज सुपरिचित थे। उनके निधन का समाचार फेसबुक पर प्रकाशित हुआ तो हजारों शुभचिंतकों ने संवेदना व्यक्त की। इससे उनकी प्रतिष्ठा का अनुमान लगता है, मगर उस प्रतिष्ठा के नीचे दफन आर्थिक संघर्ष का क्या किसी को ख्याल है? जो सोसायटी आज उनके प्रति सम्मान व्यक्त कर रही है, क्या वह उन जैसे पत्रकारों की बहबूदी के लिए कुछ विचार करेगी?